गीता का दूसरा अध्याय
तीसरा भाग
गीता का दूसरा अपनेे आपमें पूर्ण ग्रंथ है। पूज्य स्वामीजी अपने प्रवचनो में इसी अध्याय के श्लोकांे को समझाया करते थे। इस भाग में सिद्ध पुरुष के लक्षणों को समझाया गया है।
गीता का दूसरा अध्याय, दो भागों में विभाजित है।
जहां पहले भाग में साधन पक्ष को स्पष्ट किया गया है, ... वहां साधक की दृष्टि से साधन तत्व को समझने का प्रयास है। किस प्रकार वह दीक्षित हो, तथा साधन में प्रवेश करे।
दूसरे अध्याय में अर्जुन सिद्ध पुरुष के लक्षण पूछता है। ‘क्या वास्तव में ऐसी स्थिति होती है भी या नहीं? या ये मात्र शब्दों का जंजाल ही है। अत्यधिक वैज्ञानिक आधार पर ‘भगवान कृकृष्ण’ ने वस्तुगत निरुपण किया है। उन्होंने कहीं यह नहीं कहा है, ... मुझे देखो, पर यह संकेत दिया है, जहां ये तो सारतत्व संभव है, ... वहां वह ‘वस्तु’ प्राप्त होगी। जहॉं कार्य दिखाई पड़ता है, वहॉंकारण अवश्य होगा। यह एक वस्तु परक ,वैज्ञनिक विधि हेै।
साथ ही ‘सिद्धों के लक्षण समझाते हुए फिर साधक को गहराई में ले जाते हुए उसके चित्त की बनावट तथा किस प्रकार वह अपनी वर्तमान स्थिति को समझकर अपने रूपांतरण का प्रयास कर सकता है, यह बतलाया है।
‘‘प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्’
आत्मन्येवात्मना तुष्टःस्थितप्रज्ञस्तदोच्यते।।55 ।
जिस काल में साधक मनोगत ;मन में स्थितद्ध संपूर्ण कामनाओं को त्याग देता है और अपने आपसे अपने आपमें ही संतुष्ट रहता है, स्थिर बुद्धि वाला कहा जाता है।
... यहां संकेत है मनोगत कामनाओं का परित्याग। कामना का निवास कहाँ है? कामना स्वयं में ‘आत्म’ में तो नहीं है। कामना का मन में स्थाई निवास नहीं होता है। वह आती है, जाती है, उसका रूप भी बदलता रहता है, ... देखा जाए तोे वह शरीर तट पर बैठा हुआ पथिक है, सामने नाव आती है, जाती है। इसी प्रकार कामना का प्रवाह रहता है। ... रहा सवाल मन का, क्या मन कामना रूप है। मन और मतिष्क को एक मान लेने से यह उलझन है। मन एक गति है, एक उर्जा है, उसकी प्रतीति विचार के कारण से होती है। निर्विचारता अवस्था में भी मन रहता है, तब पता लगता है कि मन तो एक करण है। उसमे ंभी कामना स्थाई रूप से नहीं रहती, एक वेग है, एक प्रवाह है, आती है, जाती है, परन्तु शरीर, मन, बुद्धि विषय इनके संयोग से तादात्म्य होने के कारण वह कामना अपने भीतर मानकर चलता है। वह कामनाओं का निवास अपने भीतर मानता है। अपने आपको कामनाओं का घर मानता है।
रहा सवाल त्यागने का, गीता कहती है, जो त्याग देता है। स्मृति सदा अतीत में रहती है, तथा कामना का निवास भविष्य में है। वह एक क्षण आगे चलती है। फिर उसका त्याग किस प्रकार किया जाए। यह मात्र एक वैचारिक अवधारणा ही नहीं है, कामना विचार रूप है, ... विचारों की अनवरत शृंखला है। मार्ग एक ही है। वह ध्यान है। निरंतर साक्षी भाव में अवलोकन से ही, ... धीरे-धीरे विचारों की संख्या कम होती जाती है, ... विचारों की संख्या कम होने से, ... निरंतर वर्तमान में रहने से, जिसे छूटना है, वह छूटता जाता है। त्याग उसी का हो सकता है, जो आपका है, पर आपने अपना मान रखा है। स्वयं का त्याग नहीं हो सकता। तथा जो आपका नहीं है, उसका त्याग भी नहीं हो सकता है, ... इसीलिए जब आप अनावश्यक विचारों के दबाव से बाहर आते जाते हैं, तब विषयों से इन्द्रियों का संबंध टूटता है, तथा इन्द्रियां मन में लीन होने लगती है, मन-बुद्धिमें लीन होने लगता है। बुद्धिकी निश्चलता की ओर साधक बढ़ता है। रास्ता एक ही है। जितना ध्यान सधता जाता है, उतनी ही स्मृतियां तथा कल्पनाएं छूटती जाती है, तथा मन अंतर्मुखी होने लगता है। निर्विकारता, ... विचार ही विकार है, इस गहरी समझ से जगती है।
... इससे प्राप्त होता है, सन्तोष, ... अगर हाथ लगातार हिलता रहे तो उससे किसी भी प्रकार का पात्र पकड़ ही नहीं जा सकता। हाथ का स्थिर होना आवश्यक है। उसी तरह जब बु(ि स्थिर होती है, तब अनावश्यक कामनाओं का दबाव अपने आप कम होने लगता है। ‘राह’ स्पष्ट हो जाती है। तब अन्तःकरण में स्थिरता प्राप्त हो जाती है। चित की शुद्धि स्वाभाविक है। और प्राप्त होता है संतोष, अंतःकरण में किसी भी प्रकार का बाह्य का प्रलोभन नहीं रहता है।
वह अपने आपसे, अपने-आप में ही संतुष्ट होने लगता है। तृप्ति का बोध जगता है। ‘वैर जो भटकाता था, वह शांत हो जाता है, ... जहां इच्छाएं कम होती जाती है, वहां संतोष का जन्म होता है, ... स्वरूपगत संतोष की प्राप्ति का वह पात्र बनने लगता है।
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषुु विगत स्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते।।2.56
यहां भी पूर्व प्रसंग का ही विस्तार है, ... सिद्ध के लक्षणों के आधार साधक के साधन पक्ष को रेखांकित किया गया है।दुःखों की प्राप्ति में मन जिसका उद्वेग रहित है,सुखों की प्राप्ति में जिसकी स्पृहा दूर होगई है,नष्ट हो गए हैं ,राग ,भय, क्रोध जिसके ऐसा मुनि स्थिर बुद्धि कहा जाता है।
मोह भी अंधकार है। यह बाहर नहीं भीतर का अंधेरा है। यह चेतना पर अंधेरा है, जहां सत्य पर पर्दा पड़ जाता है। जो है, वह नहीं जो वह चाहता है, वह देखता है।
मोह जो मेरा है। धृतराष्ट्र भी यही पूछता है- ‘मेरे और पांडवों के पुत्रों ने- शुरूआत ही मोह से होती है। मोह ही चिंता है, मोह ही भय है। मोह ही जीवन का दुख है। मोह ही तृष्णा है। कामना जब गहरी होती है, मोह बन जाता है, ... मोह का सम्मोहन यही है कि जो मेरा नहीं है, वह मेरा मानता है।
... जिस काल में बुद्धि-मोह रूपी दलदल से तर जाती है, वह वैराग्य को उपलब्ध होता है।
राग का विपरीत विराग है, ... राग भी बुद्धि में ही होता है, उसका विपरीत विराग भी बुद्धि में ही है। यह मेरा है, ... यह मेरा नहीं है। जहां तक राग की सत्ता है, ... विराग भी कहीं गहरे में छिपा है। ... स्वामी जी कहा करते थे- छोड़ो और छूटने पर बल मत दो। जो तुम्हारा है नहीं वह छूट सकता है। पकड़ता कौन है, ... देखो, सब मन का ही पकड़ा हुआ है। उससे ही छूट जाने दो। शब्द है वीतराग, ... जहां न राग है, न विराग है। वहां जो पकड़ता है जो भागता है, ... वह स्थिर है। कमलदलवत। दलदल में कीचड़ में, कमल खिलता है। वहां वह मोह से ऊपर है। न पकड़ा है, न छोड़ा है। वस्तु है, ठीक है, नहीं है, ठीक है, वस्तु को जो पकड़ता है, वह स्थिर है। वहां वितरागता है। ... वह ‘राग’ के पार चला गया है।
गीले कपड़े पर धूल आ जाती है, वह चिपक जाती है। सूखे पर नहीं, ... मोह पकड़ता है, पर जहां राग से पार है, वहां विराग भी गया, वह राग से ही परे है। वहां वीतराग है।
.... ममकार ही अहंकार को घेरता है। यह मेरा है, ... इसके प्रति जागना ही वीतरागता में प्रवेश है। वैराग्य, भागना, तो इस मेरे का ही रूपांतरण है। घर छोड़ा, आश्रम बन गया। वहां यह मेरा कुछ और नया बना देगा। ... भीतर का गीलापन, जहां भी जाएगा धूल के कण अपने आप चिपक जाएंगे। मेरे के ही कारण यह दुनिया है, जिस दिन यह मेरा नहीं है, ... न कोई दुनिया है न घर है। तथाकथित सन्यासी त्यागी नहीं है, वीतरागता वहां है जहां जिसके भीतर यह दुनिया बनाने वाला, विसर्जित हो जाता है, ... मोह का अंधेरा खो जाता है, ... भगवान कृष्ण कहते हैं, जिसके भीतर यह ‘मेरा’ खो गया है, जिसकी बुद्धि इस मोह रूपी दलदल से पार हो गई है, उसे वितरागता प्राप्त होती है, उसके जीवन में, उसे जीवन की सार्थकता प्राप्त हो जाती है।
... बुद्धिकी स्थिरता, तथा परमात्मा में उसका अचल होना, ... समत्व योग की अपरिहार्यता है। हमारी सामान्य बुद्धि कैसी है, सब जगह अशांत, स्थिर नहीं है। कांपती हुयी।
जहां यह बुद्धि की अस्थिरता होती है, वहां बाहर उसका प्रदर्शन, ... स्थिरता में ढृढ़तर में होता है। सदा अपने को सही बताने का मोह, बाहर से ठोस-ठोस भीतर से पोलापन रहता है, ... भीतर भय रहता है। स्वामीजी कहा करते थे- साधन कैसा भी हो, अगर आप में निष्ठा है, लगन है तो आपको आत्मविश्वास की प्राप्ति होगी। वहां ठोसपन होता है। बाहर और भीतर एकरसता रहती है। विभाजन नहीं है। परन्तु जब स्थिरता आती है, ... तब बाहर का आकर्षण विलीन होने लगता है, ... अपने को न्यायोचित ठहराने का यही बताने की रूचि ही खो जाती है। ... वहीं बुद्धिस्थिर होने को होती है। जहां भी चंचलता है, ... भटकाव है, कंपन है, वहां दूसरा उपस्थित है।
... यह भटकाव कब कम होता है, जब चित्त राग और विराग से, ... विषयों का मन से संबंध टूट जाता है, पहले मन स्थिर होता है, मन की स्थिरता दो जगह से एक जगह पर रहने पर होती है, जब विषय, इन्द्रिय, मन, एक सूत्र में बंधते है, तब विषय, इन्द्रियों में डूब जाते हैं, इन्द्रियां मन में, तब मन की स्थिरता होते ही मन बुद्धि में विलीन होने लगता है। यही बुद्धि की स्थिरता है। बुद्धिकी अशुद्धि.. उसका भटकाव है, जब वह विपरीत मन के द्वारा, विषयों में बहती है, ... यहां धारा के विपरीत आना है। अब चयन गया, राग भी गया, द्वेष भी गया, दोनों किनारों के बीच यह मध्य का मार्ग है, यहां मात्र उपरामता है, एक तटस्थता है, ... वहां ‘मोह’ खोने लगता है, ... तब बुद्धि समत्व योग को प्राप्त होती है।
‘अपने में ही अपनी आत्मा में संतुष्ट होना, अपरिहार्यता है।
जाना, क्या हम अपने आप से संतुष्ट हो पाते हैं, संतोष हम दूसरे में तलाशते हैं। भगवान कृष्ण कहते हैं- जो स्वयं से संतुष्ट है, स्वयं में तृप्त, ... पर हम तो हमेशा दूसरे में संतोष तलाश करते हैं, वह मिलता नहीं, ... हम एक दूसरे की तलाश में चले जाते हैं। हमारा सारा झुकाव उसकी तरफ हो जाता है।मैंने जाना, मेरी अशांति मेरी ही है। मेरे भीतर भटकाव है, ... अतृप्ति, बैचेनी, मैं क्या चाहता हूं, मैं भी नहीं जानता। स्वयं से असंतुष्ट, ... अपने आपको अपने आप में, तृप्ति जो दे पाए, ... सुकून दे पाए। आनंद दे पाए, वही तो आनंद है, वह दूसरों को भी दे सकता है।
संतोष पाना है, तो स्वयं में पाना है, कामना बाहर की ओर ले जाती है। ... जब कामना का बहाव, यह भटकाव छूट जाता है। तब भीतर स्थिरता प्राप्त होती है। करना न करना के बीच कभी अंतराल अनुभव नहीं होता, ... हमें चाहिए अथवा नहीं यह भी पता नहीं, बस करते चले जाते हैं, बहाव ही बहाव है, ... जब यह बहाव रूकता है, ... तब भीतर ठहराव होता है। ... तब भीतर संतुष्टि का अहसास मिलता है। भीतर का संतोष जब प्रकट होता है, तब बाहर का सम्मोहन अपने आप गिर जाता है, अन्यथा यह असंतोष, बाहर संतोष तलाश करने के लिए भटकाता रहता है। विषय बदलते रहते हैं, व्यक्ति बदल जाते हैं, ... पर प्यास नहीं मिटती है, एक भटकाव बना रहता है। परन्तु जब वीतरागता, जन्मती है। बुद्धि
स्थिर अपने आप में होती है, ... तब अपने भीतर संतोष की प्राप्ति उसकी उपसंपदा है। जब आवे संतोष धन, सब धन धूरि समान- वास्तविक धन यही है। अपने स्वरूप में, स्वरूप से संतुष्ट, ... भगवान ने स्थितिप्रज्ञ का यह पहला लक्षण बताया है।
पहला कदम है, ... जहां भी हम कार्य करते हैं, बाधाएं आती है। असफलता मिलती है।
कामना की अपूर्ति से दुःख होता है। वह दुःखों का संग्रह करता चलता है। यहां तक हो जाता है कि स्वयं दुख रूप हो जाता है। दुख को न तो कोई कम नहीं कर सकता है, न कोई रोक सकता है। ये प्राकृतिक विधान से ही प्राप्त होते हैं। पहले भी कहा गया है, यहॉं मात्र कर्म करने का अधिकार है, फल विलंब से, तथा प्रतिकूल भी आ सकता है, ... परन्तु इस स्थिति में उद्वेग नहीं रखना है। क्योंकि हर स्थिति यहां परिवर्तनशील है। कोई भी परिस्थिति स्थाई नहीं है। हां, हम यह कह सकते हैं कि अपने भीतर दुःखों का संग्रह नहीं बनावें। हम सोचते हैं, दूसरे को बतावेंग, अपनी व्यथा सुनाएंगेे तो दुःख हल्का होगा, बीमारी के चिन्तन से बीमारी बढ़ती है। दुखों से प्रीत करने पर जीवन में दुःख बढ़ते हैं।
दूसरा कदम है- सुखों की प्राप्ति होने पर स्पृहा नहीं होती। अनुकूलता प्राप्त होने पर यह ऐसी ही बनी रहे, ... यह लालसा नहीं पनपती। पहले कहा, ... दुखों से उद्वेग न हो, ... प्रतिकूलता का भय, उसकी चिन्ता, जीवन को नहीं सोखले, दूसरा कहा है- सुख लोलुपता, अकर्मण्य तथा स्वार्थी नहीं बनावे। सुखों की लालसा डरपोक बना देती हे। अपने भीतर सुखों का संग्रह जमा तो हो, पर उनकी पुनरूक्ति की चाहत नहीं हो, यह अभी मिले ही, वैसा ही मिले, यह कामना नहीं हो। पर जीवन के प्रति दृष्टिकोण सुखात्मक हो, ... प्रसन्नता का हो, यह बूंद-बूंद अमृत का, संग्रह करने से घट भर जाता है। जीवन में जहां भी सुख मिला हो, उसका ही संग्रह हो, ... तो नकारात्मकता अपने आप कम होने लगती है। ‘वैर’ को पनपने को जगह नहीं मिलती है।
... मनुष्य की सारी परेशानियां, क्रोध, और भय के कारण है। जब पहले बताए दो कदम सधते हैं, तो ‘राग’ में कमी आती है। संसार के पदार्थों का मन पर जो आकर्षण होता है, प्रियता का भाव होता है, उसे ‘राग’ कहा जाता है, जहां ‘राग’ के कारण पर बाधा पहुंचती है, तो मन विचलित होता है। सामने वाला अगर निर्बल है, हीन है, तो क्रोध आता है, वह अगर सबल है, परिस्थिति बड़ी है तो भय होता है। मृत्यु का भय सबसे बड़ा होता है।
जो स्थितिप्रज्ञ है- वह भय और क्रोध से परे है। राग से परे है। जब राग से परे है, तो द्वेष से भी परे है। साधक में तो यह उद्वेग तथा स्पृहा दोनों रहते हैं। अंतःकरण में जो छिपा प्रभाव है, जो बार-बार बाहर आना चाहता है, वह यही वासना है। मुझे यह प्राप्त हो जाए, यह कामना है। वासना का ही दूसरा नाम आसक्ति है। कामना पूरी होने की संभावना आशा है, कामना पूरी होने पर, और और पुनरुक्ति की भावना बढ़ती है, यह लोभ है। लोभ की मात्रा बढ़ जावे, इसका नाम तृष्णा है। भगवान बुद्ध ने ‘तृष्णा’ को ही दुःख का कारण बताया है।
जो सिद्धहैं, वे तो कामना के इस प्रवाह से मुक्त है। परन्तु साधक के अंतःकरण में उद्वेग भी रहता है, तथा स्पृहा भी रहती है।
वह कैसे कम हो-
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम
नाभिनन्दति न द्वेेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।2.57
सब जगह आसक्ति रहित हुआ जो मनुष्य उस-उस शुभ अशुभ को प्राप्त करके न तो अभिनन्दित होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है।दुखों की प्राप्ति में मन जिसका उद्वेग रहित है, तथा सुखों की प्राप्ति में स्पृहा-लालसा दूर हो गई है, राग, भय, क्रोध जिसके छूट गए हैं, वह स्थिर बुद्धि है।
दुख को कोई नहीं चाहता है, सभी सुख चाहते हैं, ... दुख सुख की ही छाया है, सुख-दुख दोनों एक ही है। एक ही मनोभाव के दो सिक्के हैं, ... जहां दोनों से परे जाने का भाव है। यह स्थिति पहले भी विवेचित हुई है। कामना की पूर्ति ही सुख है, अपूर्ति दुख है। जहां कामना ही निःशेष हो जाती है, वहां न क्रोध है, न भय है। वह समाधिस्थ है।
... जो समाधिस्थ है उसका भय व क्रोध दोनों छूट जाते हैं।
क्रोध के छोड़ने पर बल नहीं है, उसके छूट जाने पर, ...
भय हमेशा अपने से बड़े से होता है।
क्रोध हमेशा अपने से छोटे पर होता है।
क्रोध से लड़कर, उसे दबाकर रखा जा सकता है, ... पर वह मौका तलाशता है, बाहर और तेजी से आता है। भय से जो लड़ते है, ... वे निर्भय हो सकते है, ... निर्भय का अर्थ है, भय है दबा दिया है हम सामना करते हैं। पर वास्तव में अभय वहां भय है ही नहीं।
मैंने अपना अध्ययन किया, रात सपने में पाया, अचानक क्रोध फूट पड़ा, ... बहुत तेजी से उबाल आया, ... थोड़ी देर बार ध्यान आया, यह तो सपना था, ... अपने आप तेजी से हंसी आई, ... कहां रखा था इतना संभालकर, ... कुएं में पानी भरा हो तो बाल्टी से बाहर आ सकता है, पर सूखे कुंवे से क्या आएगा? यहां तो बस तीली लगाने की देर है... भीतर तो विस्फोटक भरा हुआ है, ... जाना दूसरा कोई निर्मित नहीं है। हम व्यर्थ ही अपने आपको न्यायोचित ठहराने के लिए दूसरों को दोषी ठहराते रहते हैं। वह तो हमारी पूंजी है।
... भगवान ने स्थितिप्रज्ञ के लक्षण बताए हैं- दुख में अनुद्विग्न हो, सुख की लालसा नहीं हो, क्रोध में कांपे नहीं, भय से भयभीत न हो, ... ये मात्र लक्षण ही नहीं, साधन सूत्र भी है।
... क्रोध का विलोम अक्रोध है, भय का अभय, इनको उभारने से साधन पथ नहीं मिलता है। हां, जहां स्थितिप्रज्ञता है, वहां ये नहीं है। न क्रोध को दबाना है, न भय को दबाना है, इन्हें जानना है, उसके उठते ही उसे देखना है, वह मैं ही हूं। असली स्थिति को जानना ही, साधन सूत्र बनता है।
हर्ष में, विषाद में, अनुकूल में, प्रतिकूल में विषाद नहीं होता, ... यहां पर भगवान कछुवे का उदाहरण देकर समझाते हैं, जैसे कछुवा अपने अंगों को अपने भीतर समेट लेता है, ऐसा ही स्थितिप्रज्ञ अपनी इन्द्रियों को विषयों से सिकोड़ना जानता है।
स्वामीजी कहा करते थे, ... इन्द्रियां दो होती है। बाह्य इन्द्रियां, तथा अंतःइन्द्रियां, ... बाह्य की इन्द्रियां तो दिखाई पड़ती है, पर भीतर की नहीं। बाहर की इन्द्रिय तो विषयों से जुड़ती है, वहां से वह सूचना लाकर, बुद्धि को देती है। जोड़ता मन है।
वह जो भीतर की , वासना है, उसे सिकोड़ लेता है। मन का नाश तो मृत्यु है, इन्द्रियों का नाश तो मृत्यु पर ही होता है। वह तो होंगी, ... मन भी होगा, पर संबंध टूट सा जाता है। रस जो है, जो संबंध जोड़ता है, वह सिकुड़ जाता है। तब इन्द्रिय तो होगी, रसना भोजन लेगी, स्वाद भी पता होगा, आंखे देखेगी भी, कान सुनेंगे भी, ... पर जब भीतर से भावना उठेगी, ... तब आंख जो सामने विषय है, उसे देखेगा, अन्यथा विषय एक वस्तु के रूप में सामने होगा।जुड़ाव नहीं होगा।
स्वामीजी से पूछा जाता था- आप घंटों बाहर बरामदे में बैठे रहते हैं- क्या देखते हैं?
वे कहते थे- कुछ नहीं, ...
तब हम समझ नहीं पाते थे, हम तो जो बाहर जा रहा है, उसे देखते है, ... पहचान बनाने का प्रयास करते हैं। भीतर सारी सूचनाएं जाती रहती हैं। पर वे निर्विकार बैठे रहते थे, ... कहते थे जैसे सीरियल चल रहा हो, बस, ... भीतर कुछ नहीं जाता, कुछ भी संग्रहित नहीं होता। होगा कैसे यहां संबंध टूटा हुआ है।
... समय होता था, भोजन का ग्यारह बजे, ... अगर समय निकल गया, ... तो उन्हें भोजन की भी जरूरत नहीं होती थी, ... सामने आया, ... जितना लेना होता, उतना लिया बाकी बाहर निकाल दिया, ... जिव्हा है, ... पता है। थाली में क्या है, पर जो नहीं है उसका भाव नहीं है। इन्द्रियां कैसे सिकुड़ती है, ... तब जाना। अंतःइन्द्रिय सिकुड़कर मन में चली जाती है। वहां भीतर कोई वासना नहीं है। मन, बुद्धि में बह जाता है। बुद्धि स्थिर है।
तब जाना, इन्द्रियां व्यवहार के माध्यम के लिए भी प्रयुक्त हो सकती हैं।
हमारी इन्द्रियां वासना का माध्यम बनती है, वासना को बाहर ले जाकर विषयों से जुड़ती है, उसके प्रभाव को भीतर लाती है।
भगवान का कथन यही है कि- यहां वे विषयों को वस्तु बता रहे हैं। भीतर की इन्द्रिय यहां सिकड़ु गई है, ... कान जो है, वही सुनते हैं। आंखें जो हैं वही देखती है। बाहर माना वस्तु है। विषयों पर वासना का किसी भी प्रकार का आरोपण नहीं है।
सवाल बार-बार यही पूछा गया था कि इन भीतर की इन्द्रियों को कैसे सिकोड़ेंगे? स्वामीजी, ... जहां से बात शुरू करते थे, ... वहीं उसका अंत भी था, ... बहुत कम शब्द, ... अहर्निश मौन, वे अपने आपको ही सामने रख देते थे, ... वर्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ाते जाओ, ... भीतर इन्द्रियां, अपने आप सिकुड़ने लगती है। बाहर का भटकाव इसीलिए है कि भीतर रस है। बिना दूसरे के संतोष नहीं है, ... कुछ पाना है, हासिल करना है, ... दौड़ है, इसको समझो, दृ
.
... भीतर जो निरंतर कांपता है, ... जो बाहर की ओर धक्का देता है, ... उसे देखो, ... वहीं वर्तमान है। दो क्षणों के बीच का जो अंतराल है, ... वहां रूको, अनुभव करो, ... वह वासना तिरोहित होने लगेगी। बाहर तो जो हो रहा है वह यांत्रिक है, ... उसको बेकार ही होना है। बाहर के परिवर्तन से बदलाव नहीं होगा, ... भीतर उतरना होगा, ... यही जब पता लगता है, भीतर की इन्द्रिय है, ... वह सजग है उसका पता लगते ही वह अपने आप सिकुड़ने लगती है। कोई भी विकार उठे, ... बाहर तक आए, उसे उठते ही देखो, ... अवेयरनेस, ... तत्क्षण वह वहीं रूक जाती है, ... वह बाहर की इन्द्रिय को पकड़ने से पहले ही वह संपर्क गिर जाता है, ... भीतर मात्र तरंगे हैं, कंपन है। विकार ही विचार है। ... मात्र गवाही, ... बस देखंे, ... जो भीतर की इन्द्रियों के प्रति सजग है, वह कछुवे की तरह सिकोड़ लेता है। बाह्य इन्द्रियों से लड़ना, फिजूल है, ... पागलपन है, साधन सूत्र, अपने प्रति गहरी सजगता, जागरण ही है।
यहां सिद्ध को संकेत करते हुए, ... वहां तक पहुंचने के लिए साधक को फिर बताया गया है।
जिसकी, ... कहीं पर भी आसक्ति नहीं है, वह अलग है, परिस्थितियां अलग है। नाटक में बड़ा रोल मिलने पर वह बड़ा नहीं होता है, छोटा मिलने पर छोटा नहीं। वह जान जाता है, ... यह एक खेल है, ... उसमें उसे जो पार्ट मिला है। उसे अपना रोल पूरा करना है, परिस्थिति, घटना, वस्तु, व्यक्तित्व से उसकी आसक्ति नहीं रहती है।
बाहर से वह अपना पार्ट पूरा करता रहेगा, ... मन उसका पूरी तरह वहां रहेगा, ... पर घटना से बाहर आते ही, मन उसका मुकाम पर चला जाता है। यही वर्तमान में रहने की कला है।
अनुकूल परिस्थिति में न तो वह खुशी से नाच उठता है, नहीं वह दुख में द्वेषभाव में डूब जाता है।
यह सरल नहीं है,मूल बात है, मन यहॉं पर नियंत्रित रहे। याद रहे, स्मृति पाप है, अवधारणा दुष्कर्म है, अनावश्यक विचारणा अभिषाप है। पाप अगर है तो स्मृति है। मनोवैज्ञानिक स्मृति को न बननेदें। वह बनती है, बार-बार सोचने से। यहॉं गहरी समझ के साथ सतर्कता रहे।
यदा संहरते चायं कूर्मोऽअंगानीव सर्वशः।
इन्द्रियाणिन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।ं 58।
”जिस तरह कछुवा अपने अंगों को सब ओर से समेट लेता है, ऐसे ही जिस काल में यह कर्मयोगी इन्द्रियों के विषयों से इन्द्रियों को सब प्रकार से समेट लेता है तब उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित हो जाती है।“
यहॉं मन के अंतर्मन विलीन होने की, बुद्धि के विवेक में परिणित होने के रहस्य को खोला गया है। यह विद्या है, यह रहस्य है।
इन्द्रियां तो हमेशा मन के साथ संयुक्त है, ... विषय बाहर है, ... इन्द्रियों और विषयों का संबंध मन के द्वारा जुड़ता है। संबंध जुड़ता है चिन्तन करने से। चिन्तन न होने से मन तो होगा पर संबंध टूट जाएगा। अब यहाँ इन्द्रियां भी है, विषय भी है, पर मन अगर वहां अनुपस्थित है तब जो अवस्था होती है, वह अनिर्वचनीय है। भगवान पतंजलि ने अपने योगसूत्र में इस रहस्य पर संकेत किया है।
यह श्लोक साधन सूत्र है, चिन्तन के आधार पर व्याख्या मूलक नहीं है। प्रायः इसका यह अर्थ किया जाता रहा है कि- जैसे कछुवा चलता है उसके 6 अंग दिखाई पड़ते हैं, पर वह जब अपने अंगों को समेट लेता है तब उसकी केवल पीठ ही दिखाई पड़ती है। इसी प्रकार स्थितिप्रज्ञ पांच इन्द्रियां तथा मन इन 6 ओं को विषयों से हटा लेता है। संहरते का आशय क्या है? यह समझना महत्वपूर्ण है।
... उसका मन विषयों का चिन्तन नहीं करता। इन्द्रियां तो देह के साथ रहेगी। जब आवश्यकता होगी, ... तब मन उस इन्द्रियांे के साथ जुड़कर, विषय से जुड़ जाता है।अन्यथा संबंध टूटा रहता है, यही वर्त्तमान में रहने की कला है। परन्तु अनावश्यक रूप से हम जो चौबीस घंटे विषय चिन्तन में डूबे रहते हैं वह यहां नहीं होता।
पूज्य स्वामीजी बताया करते थे- सामने व्यक्ति आया, ... एक बार तो पता नहीं लगता कौन है, जब वह सामने आता है, बोलता है, तब आंखे उसे पहचानती है, कान में उसके शब्द दो चार बार आते हैं, ... तब उसकी पहचान होती है, मन तत्काल बोध करा देता है। सब याद आता है, पर वह हटा, ... तत्काल दर्पण साफ हो जाता है।
यहां इन्द्रियां भी होगी, विषय भी होंगे, ... पर मन अनुपस्थित है। वह है पर नियंत्रण में है। संबंध तो मन से ही जुड़ता है। इन्द्रियों की अपनी स्वतंत्र सत्ता नहीं है। विषयों की भी नहीं है। बुद्धि ... मन के द्वारा विषयों के संसर्ग से जो सूचना आती है, ... वहां ज्ञान लेती है। साधना का सार मन के इस नियंत्रण को पाना है।
... यहां बलपूर्वक, इन्द्रिय निग्रह नहीं है, न ही विषयों का परित्याग है, यह स्वाभाविक अवस्था है। प्रायः इस श्लोक के आधार पर, छोड़ने और छूटने की परंपरा चल पड़ी है। अगर पूरी तरह मन को विषयों तथा इन्द्रियों से हटा दिया जाए, ... तो जीवन ही शेष नहीं बचता है, ... यहां जीवन जीते हुए इस कला को प्राप्त होना है।
इसी संकेत और आगे स्पष्ट किया गया है-
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः
रस वर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्टा निवर्तते।ं2.2.59
”निशेधात्मक प्रतिबन्धों से इन्द्रियभोगों की वस्तुओं से तो दूर रहा जा सकता है, लेकिन मन में रस बना रहता है, यह आसक्ति उस परम के साक्षात्कार के बाद ही जाती हैं।
निराहारी- संपूर्ण विषयों का त्याग करके, एकान्त में बैठ जाना। हठपूर्वक इन्द्रियों को विषयों से पूर करने का साधक प्रयास करते है। यह बताया भी जाता हैं। इस तरह वे बलपूर्वक विषय से तो दूर हो जाते हैं, पर उनके भीतर ‘रस’ आकर्षण विषयों के प्रति बना रहता है। घर छोड़ आए, आश्रम बना लिया। संतान छोड़ आए- चेले बना लिए। मात्र रूप बदलता रहता है। भीतर सत्ता, संपत्ति, भोग तीनों यथावत रहते हैं। मुख्य बात भीतर के रस, ... विसर्जन भी है ‘रस’ की सत्ता कहां है? आसक्ति कहां रहती है। मन तो ऊर्जा है, इन्द्रियां जड़ है। जब तब विषय, इन्द्रियां तथा मन का संयोग नहीं होता है। ‘रस’ का परिपाक नहीं होता। यह संबंध टूट जाए, यही साधना का सार है। मात्र ‘वर्तमान’ में रहने की जो पद्दति है, जहां न स्मृति का दबाव है, न अवधारणा का आश्रय न अनावश्यक विचारणा का प्रभाव है, वहां मन इन्द्रियों से स्वाभाविक रूप से सिकुड़ने लगता है। संबंध टूटना शुरू होता है। जितना मन वर्तमान में रहने का अभ्यस्त होता जाता है, उतना ही वह अन्तर्मुखी होता जाता है। संबंध टूटने लगता है, तब रस की निवृति स्वाभाविक रूप से होने लगती है।
‘परं दृष्ट्वा निवर्तते-
‘परम का साक्षात्कार ही इस ‘रस’ की निवृति कराता है। मात्र चिन्तन के आधार पर मैं निष्काम हूं, राग करना, कामना करना मेरा काम नहीं है, इस प्रकार की भावना, या जप करना, निष्काम भाव की उत्पत्ति नहीं करा सकता है, ... यह तो ‘क्रिया है। आप की अपनी भाषा है, आप के अपने संस्कार हैं, अपना सांप्रदायिक सोच है,यह बहिर्मुखी यात्रा है। व्यर्थ है। मात्र अहंकार की पोषक है। यहां साधक को अंतर्मुखी होना है, और उपाय एक ही है, निरंतर वर्तमान में रहना। यह संभव हो पाता है, सजगता से, गहरे ध्यान से। अंतर्मुखता की उपलब्धि में ही ‘परम’ का अनुभव है। जो ‘ै,विराट है, जो आत्म है, जो परमात्मा है, ... वहां साधक को परम शांति प्राप्त होती है। साधारण भाषा में हमारे जीवन का जो सोर्स है, उसके साथ एकान्व्तिि का भाव है। इस आंतरिक यात्रा का किसी सांप्रदायिकता के साथ कोई संबंध नहीं हेै। यह पाना मनुष्य का मौलिक अधिकार है।
.यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्च्तिः।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः।।60।
यहां भगवान, इस साधन सूत्र को स्पष्ट करते हुए संकेत करते हैं- इस बुद्धिमान पुरुष को भी, ... उसकी इन्द्रियां अगर नियंत्रण में नहीं है तो बलात्कार से हर लेती हैं, ... इसलिए इस पुरुष को चाहिए कि संपूर्ण इन्द्रियां वश में करके, समाहित चित्त हुआ, मेरे परायण स्थित होवे।
यहां भगवान साधक को स्पष्ट कर रहे हैं कि -‘इन्द्रियां भी शक्तिशाली है, वे भी साधक को पतन दिला देती है।
इन्द्रियां कैसे गिराएगीं ? सवाल यहां खड़ा होता है। शक्ति मन की है। मन तो नियंत्रित है, तब भी क्या इन्द्रियों की पृथक शक्ति है?
इन्द्रियां, ... बाह्य और अंतःइन्द्रिय, ... दोनों जुड़ी है, मन से, इन्द्रिया जुड़ी है विषय से, ... मन जुड़ा है अस्तित्व से आत्मासे, इन्द्रियां भी द्वार है, ... मन भी द्वार है, ... पर भीतर जहां एक ओर विराट उर्जा का स्रोत है, ... वहीं हमें नचाने वाली महान शक्तिशाली पूंजी हमारा संस्कार भी है। वह अत्यधिक शक्तिशाली है। पूज्य स्वामीजी महाराज उसे स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि यह संस्कार अंतर्मन से जुड़ा हुआ है, अंतर्मन विराट से जुड़ा हुआ है। महान शक्तिशाली विराट की महान उर्जा के धक्के इस संस्कार को लगते हैं, यह मन और इन्द्रियों से जुड़कर, वह कुछ करा देता है कि हम कह उठते है कि हम तो मात्र कठपुतलियां हैं, हमें कोई और नचाता है।
... साधना यही है कि बाहर का संवेदन, ... भीतर संस्कार न बन पावे, ... तथा भीतर के बीज अनुकूल वातावरण पाकर, उत्पन्न न होने पावे, ... मात्र वर्तमान में निरंतर रहना ही वह कला है, जहां से संस्कार अनुकूल वातावरण पाकर वृक्ष नहीं बन पाते, फैल नहीं पाते, ... वरना कोठे में पड़ा हुआ बीज कितने ही साल हो जावंे, अनुकूल वातावरण पाकर अंकुरित हो जाता है। इन्द्रियां हमारे संस्कार केन्द्र से सीधी प्रभावित होती है। हम कहते हैं, ... फलाना काम गलत है नहीं करेंगे, ... पर फिर भी कर बैठते हैं। हम इन्द्रियों को, अतीत में ताकत दिए जाते रहे हैं। वे आदत सी बन जाती है, ... जब यह गहराई में चली जाती है, चित्त पर संग्रहित हो जाती है, तब संस्कार बन जाती है। संस्कार सबसे प्रबल चीज है।
... फिर क्या किया जाए? साधक इन्द्रियों पर बलात नियंत्रण को साधन मान लेते हैं। सारा परिश्रम इस पर आ जाता है। स्वामीजी कहा करते थे- अवधारणा दुष्कर्म है, कंडीशनिंग हर प्रकार की कमजोरी ही करती है। हमने जो-जो आदतें निर्मित कर रखी है, उन्हें धीरे-धीरे शिथिल करते जाओ, गिराते जाओ, इन्द्रियों को हमने जो रंग दिया है, वह रंग हटाना है, रंग आ रहा है, संस्कार से। भीतर वेग होता है, वहां बर्फ हो जाना कहा जाता है, लहरें उठे हीं नहीं, बाहर से जो प्रभाव आ रहा है, वहां चट्टान की तरह अप्रभावित होना है, ... तब इन्द्रियां जो बलवती है, वे अपना वेग खोने लगती है।
मेरे परायण होवे- जहां-जहां गीता में ‘माम’ शब्द का प्रयोग होता है, वह महत्वपूर्ण है।
जो वर्तमान है, वह ‘माम का द्वार है। वहां शुद्ध चेतना है। वहां अस्तित्व है। वहां परमात्मा है। ‘‘मेरे परायण होवे, ... वह इन क्षणों में जहां पतन का वेग प्रभावशाली हो जाता है, उस वेग के प्रभाव से बाहर आ जाता है। वह सारा बोझ, दायित्व अपने ऊपर नहीं लेता है।
वह यह नहीं कहता, मेरा संकल्प है, मैं छोड़ दूंगा, मैं मुक्त हो जाऊंगा, ... वह यहां कहता है, ‘दाई विल वी डन, ...’ तेरी इच्छा पूरी हो। मैं तुझ पर छोड़ता हूं। वहीं अंतःप्रेरणा है, वही ‘माम’ का समर्पण है। अब तू ही सम्हाल, पर सारा जोर उस ‘माम’ पर रहे, ... माम की शरणागति ही इस माया से बाहर ले जाएगी। ... यह मानना मैं शक्तिशाली हूं, ... मैंने यह किया, मैं विकारों के बाहर आ गया हूं। मेरी इन्द्रियां मेरे वश में है। आज नहीं कल, पतन करा देती है, यह सांप-सीढ़ी का खेल है। जरा सा भी अहंकार आया पतन तत्काल द्वार पर आ जाता है। भगवान ने संकेत किया- मेरे परायण होवे, ... ‘माम अनुस्सर’ वह जो विराट है, उसके प्रति समर्पण, तू ही सहारा है, ... तेरे हाथों में ही मैं सुरक्षित हूं, यह अहसास, उस वेग को सहन करने की महान शक्ति देता हैं, तभी स्थितिप्रज्ञता की ओर साधक बढ़ता है-
ध्यायतो विषयान्पुंसः संग्स्तेषूपजायते।
संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते।।62।
क्रोधाÚवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।63।
हम नीचे उतरते हैं, ... कब और कैसे, ... यह मालुम नहीं पड़ता, ... जब नीचे उतरते चले आते हैं तब तलहटी में आकर, नीचे लाने वाली सीढ़ियों को देखते हैं, तब पता होता है, कितने ऊपर से नीचे आते चले गए हैं।
भगवान कृकृष्ण ने गीता में इन श्लोकों में मनुष्य के अधःपतन की, ... पूरी यात्रा विवेचित की है। पूज्य स्वामी जी जब कहा करते थे, ... अभी तो भीतर बहुत संग्रह भरा हुआ है, ... जरा भी परिवर्तन नहीं आया, ... तब न जाने क्यों अच्छा नहीं लगता था, ... कहां है संग्रह? ... हम तो संसारी है, संसार में रहना है, यहां तो अच्छा और बुरा सभी होता है, ... हम जानबूझकर अपनी गलतियों को, विकारों को न्यायोचित ठहराने का प्रयास करते रहे।
... संस्कार ही संसार का जनक है, ... भीतर न जाने कबसे, ... कितने जन्मों के बिम्ब, प्रतिबिम्ब छापें सुरक्षित हैं, ... भीतर से एक लहर आती है, ... बाहर फैलती चली जाती है, ... पूरा शरीर उसके साथ बह जाता है, विषय सदा बाहर रहते हैं? भीतर से तब यह विकारों की लहर कैसे उठती है, वह मन को छूती है, मन बुद्धि को ग्रस लेता है, विकार ही फैलता चला जाता है।
... भगवान ने कहा है, क्रिया निर्दोष है, उसका कोई कसूर नहीं है, उसमें विकार नहीं है। विकार तो मन में है, विषय के चिंतन में है, चिंतन होते ही वह भावना दृढ़ होती जाती है। कोई विचार उठा, अगर उस पर ध्यान नहीं है, तो वह जैसे उठा है, चला जाएगा, पर वही विचार बार-बार उठा है, चिंतन ने उसे आधार दिया है, ... तब वह भोग के रूप में अवश्य प्राप्त होगा।
... जहां से मन का प्रवाह शुरू होता है, ... वह भटकाव को प्राप्त होता है, ... गीता कहती है, विषय के चिंतन से, ... विकार की लहर, विषय की इच्छा, ... विषय का भोग करने की इच्छा जगती है, मन में, वह पहली लहर है, ... यह लहर कहां से उठती है, ... स्वामीजी समझाते थे, ... संग्रह जो जमा है, वह निरंतर जमा होता रहता है, भीतर विराट के समीप जो अंतर्मन है, वहीं संस्कार है, ... वहां अत्यंत तेज प्रवाह उठा करता है, वहीं भुक्त-अभुक्त वासनाएं बीज रूप में संग्रहित है, ... वहीं काम है, ... समस्त कामनाओं का बीज है, ... यहीं वह लहर उठती है, जो बाहर जगत में भोग चाहती है।
‘विषय’ का विचार ही पहला वेग है, एक लहर सी होती है। उसके नीचे मात्र कंपन है, ... कांपती हुई पत्ती है, बस वह कंपन और स्थूल होकर विचार के रूप में आते हैं।
... बाहर हम पचास चीजें देखते हैं, इन्द्रियों ने देखा, बस, कोई असर नहीं होगा, पर अगर मन का जुड़ाव हो गया, चिंतन हो गया, तो भीतर उसका प्रवाह जमा होने लग जाएगा, वह संस्कार में परिणित होने लगेगा। उसी तरह भीतर और जमाव है, ... विषयासक्ति है, तब वह दृश्य अत्यंत ही वेगवान हो उठेगा।
... मात्र एक चाह, एक कामना, एक स्मृति जिसका आधार चिन्तन होता है, उस क्षण की भीतर बार-बाहर पुनरावृति। यही सारे उपद्रव की जड़ होती है।
... सामने घटना घटी, ... तथ्य है, जहां आपने उसका नामांकन किया, ... वह आपकी संपत्ति हो गई, ... स्वामीजी कहा करते थे- ‘‘कान्सटेन्ट अवेयरनेस, ... मैं तो यहां तक कहूंगा- चौबीस घन्टे, ... जैसे धार गिरती है, एक क्षण को भी रूक जावे तो वह बूंद बन जाती है। भीतर इतनी सजगता रहे।’’ तथ्य, तथ्य है, मगर उनमें जीवन्तता, ... हम अपनी कल्पना से डालते हैं। चिंतन, हमारी कल्पना से आता है, हम उस तथ्य को संग देते हैं। चिंतन और कुछ नहीं, उसको अपनी कल्पना से साहचर्य प्रदान करना होता है। संग होते ही, वह स्मृति का हिस्सा बन जाता है।
भगवान कह रहे हैं- विषयों का चिन्तन करने से, उन विषयों में आसक्ति हो जाती है। आसक्ति से कामना पैदा होती है, कामना में बाधा आने पर क्रोध आता है।
... क्रोध आता तभी है, जब कामना में बाधा पड़ती है।
... क्रोध का स्वभाव, स्वरूप अंधकार है, ... क्रोध जो चाहा है, नहीं मिला, उसके बीच का अंतराल है, ... यह अंतराल जितना बड़ा होता है, उतना ही क्रोध बढ़ता जाता है।
... भगवान कह रहे हैं- क्रोध से मोह होता है।
... जो वस्तु पास ही है, सामने रखी है, उसका आकर्षण कम होता चला जाता है। अप्राप्य के प्रति मोह पैदा होता है। मोह भी एक दूरी है, अंतराल से पैदा होता है। मिल जाए तो मोह कम हो जाता है। क्रोध तभी आता है, जब कामना पूरी नहीं हुई, ... यह मिल जाए, यह भावना दृढ़ हुई, बाधा है, क्रोध है, क्रोध में तब वह वस्तु और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, ... वही केन्द्र बन जाती है, तब मोह पैदा होता है।
जहां मोह पैदा होता है, वहां स्मृति भ्रष्ट हो जाती है।
महाभारत का प्रारंभ, ... मोह से ही है। मेरे पुत्र, ... और पांडु के पुत्रों ने क्या किया?
... यहां मोह है, मोह अंधकार देता है, अंधा कर देता है।
... काम से कामनाएं पैदा हुई, बाधाएं आई, क्रोध आया, ... क्रोध से मोह आया, ... क्रोध उत्तेजित करता है, मूढ़ता देता है, मोह, अंधा कर देता है, ... मोहग्रस्त ... जिसे चाहता है, ... उसे पाने के लिए सब कुछ दांव पर लगा देता है, और तब अंधकार छा जाता है तब स्मृतिनाश होता है।
... स्वामीजी स्मृति को ‘पाप’ कहते थे-,जो मनोवैज्ञानिक संग्रह हम रखते रहते हैं।
भगवान कृष्ण जिसे स्मृति कह रहे हैं वह हमारी विवेक शक्ति है।शब्दों को हमे उसी अनुरूप ही ग्रहण करना है।
‘पाप...’ जो हमेशा दूसरे में ले जाता है ।स्मृति हमेशा दूसरे को सजीव रखती है, दूसरे को लेकर होती है। तथ्यगत स्मृति तथा मनोवैज्ञानिक स्मृति में भेद है। तथ्यगत स्मृति सहज है जो जाना है, वैसा ही है। हम अपनी तरफ से यहां कल्पना का सहारा लेकर कुछ भी अतिरिक्त जोड़ते नहीं है। मोह में, जैसी हमारी धारणाएं होती है, हम वैसा ही देखते हैं, वैसा ही सोचते हैं। सामने दिख कुछ और रहा है, हम ग्रहण कुछ और कर रहे हैं। मोह अज्ञान का अंधकार है। वह स्मृति पर छा जाता है। अब सब रंगीन ही दिखाई पड़ता है। रंग भी वह जो हमने डाला है। उसका विवेक खो जाता है। मात्र बुद्धिचातुर्य ही उसके पास रह जाता है। विवेक वह है जो सत-पथ की ओर ले जाता है।
भगवान कहते हैं- जहां स्मृति भी नष्ट होती है, वहीं बुद्धि भी नष्ट हो जाती है।
स्मृति बुद्धि नहीं है, स्मृति बुद्धि की एक क्षमता है। याद रखना, स्मरण रखना, ... जो छाप बनी है, उसे रखना, वह बुद्धि का ही एक कार्य है। बुद्धि ... मन का ही एक परिष्कृकृत रूप है, हम जिसे कहते हैं, बुद्धिमानी, वह भी बुद्धि का ही एक भाग है, ... जो सामने दिख रहा है, व्यक्त है, पर बुद्धि का जीवन्त सतत क्रियारत क्षमता है, ... उसका छोर हाथ में आ गया है, कहना कठिन है, उसका विकास निरन्तर होता है। वह जो अव्यक्त है; जो प्रकट नहीं हुई है, वह भी बुद्धि के अंतर्गत है।बुद्धिका पतन भी होता है तो उसका विकास भी।
जहां यह स्मृति नष्ट होती है, वहां यह बुद्धि, जो संग्रह को प्रकट करती है, , वह प्रभावहीन हो जाती है, जो जाना गया है, जिसकी सहायता से अच्छे-बुरे का फैसला होता है, वह प्रभावहीन हो जाती है।
यह जो जाना गया है, जो जानना है, जिसमें जानने की शक्ति है। बुद्धि के ही रूप हैं, एक का दूसरे में विकास है। एक व्यक्त है, दूजा अव्यक्त है।
... लेकिन जब यह ‘स्मृति का नाश है, बुद्धि ही नष्ट होती है, ... तब भीतर की जो विकास की संभावना का द्वार था, वह भी नष्ट हो जाता है। ... वह द्वार ही मनुष्य को मुक्ति या पतन दोनों दिला सकता है। जब विषय प्रधान होता है, तब प्रवाह में, इन्द्रियां विषय में, मन, इन्द्रियों में, तथा बुद्धि मन में डूब जाती है। मात्र विषय ही प्रधान रह जाता है, ... चेतना का यह अधःपतन होता है। हो सकता है, वह मात्र एक कोषीय जीव ही नहीं, जड़ तक रूप ले ले। यह एक प्रवाह है, यह अंतिम पतन है, जब यह होता है, तब सब नष्ट हो जाता है।मनुष्य की संभावना उसकी चेतना के उच्चतम विकास में है।
... पर जब विषय, इन्द्रियों में डूबते हैं, इन्द्रियां मन में तथा मन बुद्धि में डूबता है तब ऊर्ध्वगमन का पथ खुलता है।
भगवान पहले श्लोक में ‘पतन’ की व्याख्या कर रहे थे- तत्काल वे अगले श्लोक में मनुष्य के ऊर्ध्वगमन की ओर संकेत करते हैं। पाप क्या है, हमेशा अपने से परे जो दूसरा है, ... उसमें ही जो डूबा रहता है, वही पाप है, जो व्यक्ति ‘स्वं’ में है, आत्मकृपा में है, वह पुण्य में है। यह साधन सूत्र है।
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति।।64
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धि पर्यवतिष्ठते।।65
... राग-द्वेष से मुक्त, अपने वश में की गई, इन्द्रियों के द्वारा जो विषय से जुड़ता है, ... स्वयं में चित्त, विधेयात्मा है, उसे ही दिव्य प्रसाद की प्राप्ति होती है।
... यहां वह व्यक्ति पतन के मार्ग को समझ चुका है... कामना किस प्रकार बाहर भटकाती है, ... वह जान गया है, कामना से क्रोध, क्रोध से मोह, मोह से स्मृतिनाश, स्मृतिनाश से बुद्धिनाश तथा पूरा पतन हो जाता है, इस यात्रा को उसने जाना है।
भगवान ने यहां ‘विधेयात्मा’ शब्द को प्रयोग में लिया है। स्वयं में ठहरा हुआ। ‘आत्मकृपा प्राप्त’ जो व्यक्ति अब अपने भीतर ठहरा हुआ है, जिसका ‘पराश्रय’ पेड़ के पीले पत्तों की तरह झड़ गया है, जो अपने केन्द्र में स्थित है, वह विधेयात्मा है, स्वायत्त हुआ साधक, उसे ही आनंद की प्राप्ति होती है।
इस साधन सूत्र को स्पष्ट करते हुए भगवान कहते हैं-
अंतःकरण की इस निर्मलता के प्राप्त होने पर संपूर्ण दुःखों का अभाव हो जाता है उस प्रसन्नचित्त पुरुष की बुद्धि भी निर्मल हो जाती है।
... अगर विकार कम करते जाएं तो चित्त शुद्धहोता है, या चित्त की शुद्धि है तो विकार स्वतः ही गिर जाते हैं।
इसी सवाल से बरसों तक जूझना पड़ा।
‘स्वामी जी कहा करते थे- अंतर्मन ..शक्तिशाली है, ... जब बाह्यमन अंतर्मन में विलीन हो जाता है, ... तब कहां विकार, ... वहां तो परम है, विराट है, वह उससे निरंतर जुड़ा हुआ है, ...
शब्द बाहर से स्पर्श कर निकल जाते हैं-
समझा यही जाता था, ... बाहर से जो संग्रह आता है, उससे बचंे, त्याग और वैराग्य को अपनाएं, ... विक्षेप जितने हटाते जाएंगे, ... भीतर की शद्ध(ता अपने आप आती जाएगी।
... स्वामीजी कहा करते थे- काश्तकार गेहूं बोता है, तो गेहूं तो अपने आप बढ़ता है, पर काश्तकार जो खरपतवार है, उसे हटाता रहता है।
. यहाँ तो विक्षेप अपने आप गिर जाते हैं।
परन्तु हमने तो यह माना है कि विकार जो है, वे भीतर हैं। चित्त ही अशुद्ध है। हम चित्त की शुद्धि का ही प्रयास करते रहे, ... एक संघर्ष सा बन गया, हाथ कुछ आया नहीं।
... कारण से कार्य होता है, पर क्या कार्य भी बीज बनकर, कारण बन सकता है? हम यह मानते रहे कि बाहर से जो प्रयास हो रहा है, वह भीतर तक कारण होगा, ...
स्वामीजी कहा करते थे- ‘शरीर से किसी भी प्रकार की गई साधना का कोई फल प्राप्त नहीं होगा, वह अव्यवहारिक है।
... अशांति के कम होने का उपाय खोजा जाता है। क्या यह सूत्र मात्र एक व्याख्या परक ही है, ... अंतःकरण कैसे शुद्ध हो जाए, यही सवाल बार-बार उठता रहा। ‘‘‘मो सो कौन कुटिल खल कामी’’,भगवान यहां ‘अंतःकरण शुद्धि को सबसे पहले रखते हैं। इससे पहले उन्होंने कहा- जो स्वायत्ता में है, आत्मकृपा में है, विधेयात्मा में है।
‘राग-द्वेष से भरा हुआ चित्त, जब वियुक्त होता है, तब मन की गति भीतर की ओर मुड़ती है। मन द्वार बन जाता है। अब यह घर की वापसी का क्षण है। मन जो निरंतर मस्तिष्क में रह रहा था, अपने मूल स्थान नाभि की ओर लौटना चाहता है।
... अंतःकरण की शुद्धि का विचार ही असंगत है, ... क्या हम अपने अंतर्मन के बारे में जानते हैं। वह जो हमारे भीतर निरंतर, ग्रन्थों में, समाज में, नीति में नियम में भीतर का मन जो बनता है, हमें टोकता है, रोकता है, क्या वह अंतर्मन है?
वह तो हमारे इसी बाह्य मन का दूसरा भाग है। बाह्य मन ही है। हम उसे ही अंतर्मन मानकर, अंतःकरण की शुद्धि का प्रयास करते रहे। यह दूसरा मन मन की दूसरी परत है, सजग है, पर भीतर है। हम उसे जानते हैं। वह अंर्तमन नहीं है। वह हमारे बाह्य मन की दूसरी परत है।
स्वामीजी कहा करते थे- मान लो कागज है, उसकी बाहरी परत हम जानते हैं... परिचित हैं, पर भीतरी परत का अहसास भी है, ... यह दूसरी परत भी कागज ही है, पर अब बहुत नीचे, चेतना का आखिरी छोर है, बस, वह विराट के अत्यधिक समीप है। यहां तक बाह्यमन जाता है, जब जाता है, उसी में खो जाता है। उसी के द्वारा हम बाहर-भीतर जुड़ते हैं। वह विराट नहीं है। विराट वह है, जो दोनों के बाहर है।
यह अन्तर्मन, आत्मा के विराट से अत्यधिक समीप है, ... इसलिए शुद्ध है, ... यहां अशुद्धि नहीं है। शरीर तक आते-आते अशुद्धियां बढ़ती चली जाती है। स्वामीजी कहते थे- दो प्रवाह है, एक बाहर से भीतर आता है, एक भीतर से बाहर जाता है। ... शुद्धि मात्र जागरण है। जगना है, इस प्रवाह के प्रति सजगता है।
... रास्ता यही है, लौटें, पूर्व में भगवान ने कछुए का उदाहरण देकर संकेत किया था- ‘सिकुड़ना है, विषय इन्द्रियों में डूबे, इन्द्रियां मन में डूबंे, छोड़ें बाहर की यात्रा- ‘पराश्रय गिराएं, ... भीतर लौटंे, स्वाश्रय में आवंे। भीतर जो अंतःइन्द्रियां है, वे भी होंगी, देखें, छोडं़े, स्मृति-पार नहीं जाने देती। वहां विपुल संस्कार का दबाव है। ... बीज सुरक्षित है। उनकी अंकुरण क्षमता खत्म हो। भुने बीज की तरह हो जाएं।
यह मात्र चिन्तन नहीं है। नहीं कोई ऑटो सजेशन है, कि मैं यह नहीं हूं, ... वह नहीं हूं, ... यह भी भावना रही तो अहंकार फिर लौट आएगा- यहां मात्र कान्सटेन्ट अवेयरनेस-सतत निगरानी। दृश्य व दृष्टा का स्पष्ट भेद रहना आवश्यक है। जो भी दिख रहा है, मात्र दृश्य है, उसका कोई चिन्तन नहीं है, ... यह बाह्यमन की अंतर्मुखता का पाना है। जब उसे बाहर कोई आलंबन नहीं मिलता है, तब वह अपने आप भीतर लौटता है। यह इन्द्रियों का सिकुड़ना कहा जाता है। वह आज्ञाचक्र पर होता हुआ, हृदय तक आता है। जहां उसे अंतःकरण का बोध होता है। जो शुद्ध है। जो निर्विकार है। वहां मात्र दर्पण है, ... यह शुद्धतम है, ... पर यह विराट नहीं है, यह भी उसी मन का शुद्धतम रूप है। यही अंतःकरण है, ... जहां मन विश्राम पाता है। जब भी यहां तक पहुंच होती है, शांत मन की प्राप्ति होती है। यही अंतर्यात्रा का आखरी पड़ाव है, यहां तक मन है, उसका बोध रहता है। जो भी अनुभव होते हैं। मानसिक होते हैं। यहां दृष्टा कापूर्ण बोध नहीं है, ... पर वह है इतना भरोसा पैदा होता है। यही आत्मविश्वास है।
... हां, जब अंतःकरण की शुद्धि प्राप्त होती है, तब विकार अपने आप गिर जाते हैं। विकारों से लड़ने की चेष्टा हम करते रहे, असंतोष ही बढ़ता रहा। यहां क्रिया योग। क्रिया यहां शारीरिक नहीं है। मानसिक है। विचार ही विकार है। यह कुंजी है। मटमैली बूंद, थिर होती है, धूल अपने आप गिर जाती है, ... बूंद का ज्योतित होना ही, अंतःकरण की शुद्धि है। यही अंतर्मन की प्राप्ति है।
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयतः शान्तिाशान्तस्य कुतः सुखम।।66!
कुतः सुखम
अयुक्त- जो अपने से दूर है, अपने से अलग है, ... उसके अंतःकरण में शुद्ध बुद्धि नहीं होती है। उसकी भावना नहीं, जहां भावना नहीं है, वहां शांति नहीं है, ... वहां सुख कैसे आएगा-
सारा जोर अयुक्त पर है, ... जिसके भीतर निरंतर विभाजन है, ... स्वामीजी कहा करते थे जुड़े तो हम है, ... अलग कहां है, ... पर हम अपने आपको अलग माने बैठे हैं, ... यहां तक कि जो भी चराचर जगत है, उससे भी हम अपने अंतःकरण से जुड़े हुए हैं। यह ज्ञान, ... यही अनुभूति, आत्मज्ञान है। यह जो वह अलग है मैं अलग हूं यह जो भेद कर रखा है, यह हमारा माना हुआ ही है। यह खतम हो जाए तब हम मुक्त हैं, यह अनुभूति जगती है।
... भावना क्या है, ... यहां मेरा -तेरा नहीं होता है, ... एक सम्मोहन है भीतर का, आकर्षण, हम उसे गुरुत्वाकर्षण के रूप में समझ सकते हैं। पृथ्वी पर कहीं भी जाओ, उसकी शक्ति सब जगह है, ... इसी प्रकार जो ‘युक्त’ है, जो उस विराट से जुड़ा है, उसकी अनुभूति में है, उसके पास कोई भेद नहीं है, वहां स्वाभाविक भावना उपजती है। यहां तेरा-मेरा का विभाजन नहीं है। यह सहज है। सबके प्रति है।
जो वियुक्त है, वह अपने आप से जो दूर है, पर दूसरों से जुड़ा रहता है। दूसरे उसके स्वप्न में है, दूसरे उसकी विचारणा में है, वह पराश्रय के बिना रह नहीं पाता है। मन को लगाने के लिए बाहरी खूंटियों की जरूरत होती है। जब बाहर का आकर्षण चला जाता है, तब मन भीतर लौटता है, ... वह अपने आपसे जुड़ता है। यही युति योग है। योग शारीरिक व्यायाम नहीं है। यह तो बाह्यमन का अंतर्मन में लय है, यह युति ही येाग है। द्वार मन ही है, श्वास भी द्वार है, वह प्राण को साथ लाती है। पहले युति मन और प्राण की होती है। शक्ति प्राण में है, वह पोषण करता है। सृजन करता है, मन में गति है। मन की गति चक्राकार है। प्राण की गति ऊर्ध्वाकार है। दोनों गतियां एकोन्मुख होती है। द्वार खुलता है, मन अन्तर्मुखी होता है। वह मुक्त होने लगता है।
‘‘मैंने अपने आप से पूछा था, ... मैं शिष्य हूं, पिता हूं, पुत्र हूं, भाई हूं, न जाने क्या-क्या हूं पर यह संबंध दूसरों के साथ था, रमण महर्षि कहा करते थे- ‘अपने आपको जानो, ... मैं क्या हूं? लगता था, व्यर्थ की जिज्ञासा है। बाहर जब जानना चाहते हैं, तब कौतुहल बढ़ता जाता है, पर जब अपने भीतर मुड़ते हैं, तब एक खालीपन सा रह जाता है। प्याज को छीलते जाओ, बचता क्या है, मैं की पहचान हमेशा दूसरों से जोड़कर होती है।
... अमरीका के फ्रेडरिक नगर में अकेला घूम रहा था, पत्नी घर पर थी। मैं नितान्त अकेला। कोई परिचित नहीं। घने वृक्षों के बीच अकेला था। पास में बोर्ड लगा देखा। ‘अरबन वाइल्ड सैन्चुरी’’ ,मैं नीचे उतर गया।सामने घाटी में हिरन घूम रहे थे, खरगोश थे- पर मेरी पहचान वहां खो गई थी। नितान्त अकेलापन, सारे बाहर के सम्बन्ध निःशेष हो गए थे, ... तब मैं हूं, मात्र मैं, यह देह है, यह मन है, दो बात साफ दिखाई दी। मैं वहीं पत्थर पर बैठ गया । बाहर की पहचान खोती जारही थी। श्वास की भी प्रतीति खोगई थी। जब संज्ञा लौटी तब उठना चाहा पर उठा नहीं गया।भीतर का खलीपन बाहर के खालीपन को छू गया था।लौटते हुए रास्ता भूल गया। इधर-उधर देखा, पढ़ा, पगडंडी मिली, ... घर की पहचान सामने आई, ... जाना,सारे संबंध दूसरों से, स्थान से, व्यक्ति से जुड़कर ही आते है। जब अपने आप से जुड़ा जाता है, ... तब ‘देह’ और ‘मन’ ये ही दो द्वार बच जाते हैं। देह तो आत्म के समीप है, ... वह पृथक कहां है? मन ही मुक्त व बंधन में होता है। तब ‘मन’ की पहचान शेष रह जाती है।
जाना- साधन सूत्र इसी ‘मन’ के द्वार से पार जाना है। जो इस द्वार से बाहर भटकता रहता है, वह अशांति है। शांत मन तभी होता है। जब वह अपने भीतर जो अनंत रस की धारा बह रही है, उसमें डूब जाता है।
... मन की शांति तो नशा करने से भी आ जाती है, शांत मन अलग बात है। ... वहां संतोष उपजता है, ... अपने भीतर तृप्ति, सुकून। यही बहुमूल्य है।
बात फिर लौटकर साधन सूत्र पर आती है-
भगवान कृकृष्ण फिर कहते हैं-
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनु विधीयते।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि।।67।
... सरोवर में नाव चल रही है, तेज हवा के झोके, ... लहरों को उठा देते हैं, नाव कांप जाती है, ... इन्द्रियां विषयों से जुड़ती है। इन्द्रियों की अपनी स्वतंत्र सत्ता नहीं है। मन, इन्द्रियों के द्वारा भोग को प्राप्त होता है। जिस भी इन्द्रिय के साथ मन विषय भोग को जुड़ जाता है, वह एक ही इन्द्रिय रस, अयुक्त पुरुष की बुद्धि को हर लेती है।
इसके विपरीत, ... जिसकी इन्द्रियां, नियंत्रण में है, वहां विषय भोग भी उसे लालायित नहीं कर पाते हैं, उसकी बुद्धि भी स्थिर होती है।
... साधक के लिए, ... ऊर्ध्वमन की यात्रा उसका वरण है।
विषय तो बाहर है, इन्द्रियां उनसे जुड़ती है, मन उन्हें जोड़ता है, जिस भी एक इन्द्रिय के साथ मन जुड जाता है, वह इन्द्रिय उस विषय के साथ जुड़कर उसे बाहर ले जाती है।
... यहां बात समझने की है, ... यह जो तेज हवा चली है, जो आंधी बन गई है, जो नाव डुबो रही है। यह हवा बाहर से नहीं आई है। यह भीतर से उठी है। चित्त की सारी उर्जा विक्षिप्त होकर बाहर जाना चाह रही है, इसे कौन रोक सकता है, जितना रोकोगे, और जोर से आंधी उठेगी, ... यही समझना है, ... इसे जिसने उठाया है, ... वही इसे नियंत्रित भी कर सकता है।
... हमारे पास कामना को उठते ही, सहयोग या असहयोग करने की क्षमता है। विचार तभी ठहरता है, जब हम रस लेते हैं। बार-बार के चिन्तन से हल्की हवा का झोंका, आंधी बन जाता है, ... असहयोग-वासना के उठते ही हो गया तो वह लहर उठेगी, ... चट्टान से टकराकर लौट जावेगी।
स्वामीजी कहा करते थे, ... भीतर बर्फ़ बनना है, ... लहर ही नहीं उठे, ... बाहर के लिए वे चट्टान की उपमा देते थे, ... मन प्रभावित नहीं हो, डांवाडोल नहीं हो, बाहर के धक्के लगंे, वे टकरा-टकरा कर लौट जावंे।
शक्ति हम ही देेते हैं, तभी हवा, आंधी बन जाती है। यही साधना सूत्र है। भीतर निरंतर सजगता रहे, यह सजगता, निरंतर वर्तमान में रहने से ठहरती है। तब वासना को कोई सहयोग नहीं मिलता है, ... तब स्वतः विषय इन्द्रियों में, तथा इन्द्रियां मन में, तथा मन बुद्धि में डूब जाता है, ... वहां प्रज्ञा स्थिर हो जाती है।
... यह पुरुष संयमी होता है।
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
यस्यांजाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने।।69
जो सबके लिए अंधेरी रात होती है, उसमें यह जागता है। सामान्यतः इसका पहला अर्थ, जो सरल है, उससे हम भिज्ञ नहीं है। हम सोते हैं। एक मूर्च्छा होती है। परन्तु ज्ञानी की देह विश्राम करती है, उसकी सजगता वहां भी रहती है।
स्वामीजी को देखा था, ... मैंने ही नहीं, सबने जहां-जहां वे ठहरते थे, ... एक ही करवट सोते थे, ... जहां हाथ था, जैसा था, वैसा ही रहता।
बंबई में आंख का ऑपरेशन हो रहा था। चिकित्सक ने एनस्थीया दे दिया था। पर उन्हें लगा। मरीज होश में है। वे आपस में बात करने लगे कि इंजेक्शन दिया या नहीं? स्वामी जी बोले वह तो आपने दे दिया है, आप अपना काम करते रहें। चिकित्सक हैरान थे। बाद ऑपरेशन, जब उन्होंने स्वामीजी से पूछा तो वे बोले- ‘मैं आंख का ऑपरेशन देखता रहा था।’
... पार्वती बाई के यहां शादी थी। छोटा सा मकान था। जहां स्वामीजी सो रहे थे। वही लड़की का बक्सा जमाया जा रहा था। वे सामान रखते हुए कुछ तलाश कर रही थी तभी स्वामीजी ने नींद में ही से बताया, ...
अनेक उदाहरण देखे, तब जाना, ... जो संयमी है, उसकी जागृति सदा है। स्वामी जी ने अनंत यात्रा में लिखा है, ... जागृत में स्वप्न में तथा विचारणा में एक्य का अनुभव ही प्राप्त करना ही जीवन का उद्देश्य है। यह एक्य का अनुभव सजगता में होता है। जो निरंतर बनी रहती है।
... इसका दूसरा अर्थ जो कहा जाता है, वह यह है कि भोग विलास की जिस रात्रि में लोग जगते हैं, वहां यह ज्ञानी सोता है। उसका कोई आकर्षण नहीं होता है।
... सोना और जगना, ... साधन यात्रा के महत्वपूर्ण सूत्र है।
कहा जाता है, हम जो भी क्रिया करते हैं, ... वहां हम क्रिया के साथ नहीं होते, ... या तो आगे होते हैं, या पीछे होते हैं। हम सोचते हुए क्रियारत होते हैं। यही निद्रा है। यही मूर्च्छा है। जगने का अर्थ है, जहां क्रिया है, वही मन है। जहां देह है, वही मन है। यही साधना है।
एषां ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्मति।
स्थ्त्विास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति।ं72।
... भगवान कृष्ण ने इस दूसरे अध्याय के समापन पर साधन पथ की महत्ता को पुनः संकेतित किया है। इसको पाकर जो मोहित नहीं होता है, ... इससे पूर्व वे कहते हैंः जैसे नाना नदियों का जल, समुद्र में बिना उसमें उद्वेलन लाए हुए समा जाता है, उसी प्रकार इस स्थितिप्रज्ञ पुरुष में संपूर्ण भोग बिना विकार उत्पन्न किए समा जाते हैं, इस पुरुष को शांति की प्राप्ति होती है।
... यहीं पतन का द्वारा भी छिपा हुआ है, वह है उसका स्वयं पर मोहित हो जाना, ... गर्व न कीजे बावरे, हरि है गर्व प्रहारि, ... साधन पथ पर, ... स्वयं पर मोहित, जहां भी साधक होता है, उसका पतन वहीं से शुरू हो जाता है। मोह-अंधकार है यह जागरण का विरोधी है। स्वयं पर मोहित होते ही, स्वयं भगवान बनने की चेष्टा शुरू हो जाती है।
... विराट का अनुभव, ... इस शुद्र शरीर में जहां परम शांति भी देता है, ... वहीं पर ही लेश मात्र भी कामना शेष रह गई, ... तो वह एक ही विषय, जिस भी इन्द्रिय से जुड़ता है, वह लहर को आंधी बना लेता है। चित्त पूरी विक्षिप्तता के साथ उधर चल पड़ता है।
स्वामी जी कहा करते थे- पतन को सम्हालना बहुत कठिन है। कुछ न कुछ आसक्ति कहीं ना कहीं रह जाती है, वह वापिस अधःपतन का मार्ग खोल देती है।
‘यह साधन सूत्र है। यहां ‘उर्ध्वगमन का पथ भी है, तो अधःपतन का भी। द्वार, दोनों तरफ खुलता है।
अपने प्रति गहरी सजगता, ... गहरा आत्म विश्वास यहां महत्वपूर्ण है। स्वयं कृपा, ... कब ‘पर कृकृपा’ में ढल जाए कहना कठिन है, ... भगवान ने गीता के दूसरे अध्याय में जहां साधन पथ की हर सीढ़ी को उन्मीलित किया है, वहीं अंत में जो इस स्थिति को पाकर मोहित नहीं होता है, ... बहुत गहरा निरंतर मार्गदर्शन करता रहे, अपने आपका निरन्लर अध्ययन करता रहे,... वह सूत्र ही सोंपा है। पर अधिकांश साधक, ... यात्रा की अंतिम उपलब्ध आने से पूर्व इसे भूल जाते हैं।वे स्वयं जाग्रत होने की सूचना लेकर दूसरों का पथ प्रदर्शन करने चल देते हैं।उस इत्र फ़रोश की तरह जो स्वयं सुगन्ध का अहसास नहीं ले पाता है, परन्तु डिब्बा लेकर गांव- गांव बेचने चल देता है।
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