Monday, November 18, 2013

श्री गुरु गीता दसवां अध्याय

श्री गुरु गीता दसवां अध्याय
बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः
सुखं दुःखं भवो ऽभावो भयं चाभयमेव च।10/4

”निश्चय करने की शक्ति एवं तत्व ज्ञान और अमूढ़ता, क्षमा, सत्य तथा इन्द्रियों को वश में करना और मन का निग्रह तथा सुख दुःख उत्पत्ति और प्रलय एवं भय और अभय भी मेरे से ही होते हैं।“

निश्चय करने की शक्ति- मन ही निरंतर विचारणा में रहता है, ... वही निश्चित कर पाता है, परन्तु जहां भी वह कुछ निश्चित करता है, वहीं उसके विरूद्धभी वही तर्क खड़ा कर देता है। जिसे दुविधा कहा जाता है, वह यही मन है। जाना जहां तक मन है, मन का प्रभाव है, वह कुछ भी निश्चित नहीं होने देता है।
मन का पूरा जोर इसी पर रहता है कि कुछ भी निश्चित नहीं हो पाए, ... वही हमेशा अनिश्चय को खड़ा करता रहता है। वही विकल्प है। उसके पास अनिश्चय को बनाए रखने की बहुत बड़ी ताकत है।
पूज्य स्वामीजी ने कहा है, ‘मन को पूर्ण रूपेण एकाग्र रखते हुए किंचित मात्र भी विपरीत नहीं होने देना चाहिए। जाना, ... यह अत्यंत ही कठिन साधन सौपा है। जहां मन पूरा जाता है, पूरा लगता है, वहां मन ही खो जाता है, ... मन हमेशा दो काम एक साथ करता है। वह प्रेम भी करता है, घृणा भी, ... जिसका हिस्सा ज्यादा होता है, वह वैसा ही घट जाता है। वह दोनों ओर की यात्रा पर एक साथ जाता है। भगवान बुद्ध ने कहा था- ‘मध्यममार्ग’ जहां अतियां नहीं हो, ... वहां मन स्वतः खो जाता है, ... स्वामीजी की भाषा में वह नीचे उतरना शुरू हो जाता है। वह अन्तर्मुखी होने लग जाता है।
सच में हम जहां भी होते हैं, ... आधे-अधूरे होते हैं। पूरे मन से रह नहीं पाते। जहां पूरे मन से होते हैं। वहां मन ही समाप्त हो जाता है। मन एक साथ दो इन्द्रियों के साथ जा सकता है, ... हम खाना खाते हुए रेडियो पर गाना भी सुन सकते हैं। एक साथ दो विचारों पर चल सकते हैं। मन दोनों ही विचारधाराओं को तर्क देकर खड़ा कर सकता है। यह विकसित रहना ही मन का स्वभाव है।
मैंने अपना अध्ययन किया, पाया, मैं अपने मन पर नियंत्रण पाने का प्रयास वर्षों से करता आया हूं, पर हर बार पराजित ही होता आया हूं। एक झटके  के साथ दूसरा प्रवाह आता है, और वह सब कुछ घट जाता है जो सोचा भी नहीं था, ... क्यों? मन की इस प्रक्रिया को समझ नहीं पाया था, ... जाना नहीं था, ... जानकर आदर नहीं दे पाया था, ... मन तो हमेशा अनिर्णय  की स्थिति बनाए रखना चाहता है। भगवान कृष्ण कह रहे हैं, जहां निश्चय करने की शक्ति है, वहां मैं हूं। वहां यह विभाजित मन नहीं रहता है, वहां फिर भीतर द्वन्द्व नहीं रहता। अपने आपसे मैं जो निरन्तर लड़ता रहा हूं, ... निरंतर यह नहीं रहता।
स्वामीजी ने वर्षों पहले कहा था- ‘‘मन को पूर्ण रूपेण एकाग्र रखते हुए किंचित मात्र भी विपरीत नहीं होने देना चाहिए, ... वे बहुत सहजता से स्वाभाविक अवस्था में रहने का संकेत कर रहे थे। पर हम जो क्रिया पूछने गए थे, ... जो साधना के लिए कोई गुरुतर गंभीर उपाय पूछना चाह रहे थे, ... वहां संतुष्ट नहीं हो पाए थे। स्वामीजी, ने  ‘अनंत यात्रा में इस प्रक्रिया को समझाया भी था, ... पर शब्दों से जुड़ नहीं पाए। वे कहते रहे- प्रयोग करो- करके देखो, ... पर आदर था, ... पर विश्वास नहीं था।
 जाना पूरा मन कभी भी किसी भी क्रिया के साथ नहीं जाता, ... वह एक हिस्सा बचाकर रखता है, जानता है, पूरा मन गया, वहा वह खो जाता है, वहां वह विसर्जित हो जाता है।
अपने आपको देखा- पाया, मैं जहां से चला था, आज भी वहीं का वहीं हूं। मात्र देह में परिवर्तन आया है, पर भीतर मैं वही का वहीं हूं। वही विभाजित मन है। हर क्रिया के साथ आधा जाता है, आधा खड़ा खड़ा देखता है, रोकता है, कभी बताता है, तर्क विपरीत लाता है। जहां आधे से अधिक चला जाता है, वहां क्रिया घट जाती है। इसीलिए हर क्रिया के बाद संतोष नहीं आता, संताप आता है।
जाना, पूरे मन से कोई निर्णय नहीं ले पाया, ... इसीलिए स्मृतियों का दबाव निरन्तर बना रहा। जहां दुविधा होती है, वहां भय होता है। भविष्य में भय ही अधिक रहता है। जहां क्रिया में पूरा मन चला जाता है, वहां उसकी कोई स्मृति ही नहीं रहती है।
भगवान कृष्ण कह रहे हैं- जहां निश्चय करने की शक्ति है, वहां मैं हूं।
सच है, शब्दार्थ में समझना सरल है, पर मैं जानते हुए भी जानने का आदर नहीं कर पाया। जाना, ...यह भरोसा अवश्य है,  जिस दिन पूर्ण निश्चय हो पाएगा, उस दिन मन पूरी तरह एकाग्रता में रहेगा, वहां मन विसर्जित हो जाएगा, जो परम है, वही तब प्रारब्ध होगा।
 वर्तमान में रहना ही एकमात्र मार्ग है, यह पथ विहीन मार्ग है। जहां तक स्मृति है, मन है जहां तक कल्पना है, मन है। मात्र वर्तमान में, ... मन अनुपस्थित है। मन का अर्थ है, कांपती चेतना, ... जहां विचलन है, ... जहां मात्र निश्चयात्मकता है, ... वहां मन नहीं रहता। पूज्य स्वामीजी कहते थे- मैं ध्यान नहीं सिखाता। यह तो स्वाभाविक अवस्था है, ... सहजावस्था है। यहां मन नहीं रहता। गलती हमारी यही रही, उनकी बातों पर भरोसा ही नहीं था, घ्यान ही तो मन की औषधि है। घ्यान में ही तो मन अपनी सब विषमताओं के साथ खो जाता है। घ्यान सचमुच सिखाया नहीं जाता। यही तो वह प्रसाद है, गीता के दूसरे अध्याय में जिसकी वर्णना है।
 जहां मन में कोई द्वन्द्व नहीं रहता, ... शांत अवस्था प्राप्त हो जाती है, हर समता में ... कहीं विषमता नहीं होती, ... वहां बुद्धि स्थिर होती है, निश्चयात्मकता प्राप्त होती है। स्वामीजी कहा करते थे ‘थिंक वन्स डिसाइड वन्स नेवर हेव ए सैकण्ड थॉट’, ... तब  हम इसका भाषायी अर्थ तो जान लेते थे, ... पर इसके रहस्य से दूर रह जाते थे, ... जहां यह निश्चयात्मकता आती है, वहीं अंतर्मुखता का द्वार खुल जाता है।

एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति  तत्त्वतः
सो ऽविकम्पेन योगेन युज्यजे नात्र संशय।। 10-7
और योग शक्ति को जो तत्व से जानता है वह पुरुष निश्चल ध्यान योग द्वारा मेरे में ही एकाकी भाव से स्थित होता है।
भगवान कृष्ण ने कहा है- जो मेरी योग शक्ति को तत्व से जानता है-
हम हमारी साधना से परिचित है, ... हम ‘योगवित होना चाहते हैं, योग माने जुड़ना- मन और प्राण की युति को योग कहा जाता है। योग- परमात्मा से जुड़ना, योगी की शक्ति होती है। यहां भगवान कृष्ण कह रहे हैं- परमात्मा की योग शक्ति- जिसके द्वारा  वह परमात्मा, विराट सामान्य से जुड़ जाता है।
यहां भगवान कृष्ण कह रहे है- मेरी योग शक्ति को, ईश्वर स्वयं भक्त तक पहुंच जाता है। स्वामीजी कहा करते थे- प्रकृति स्वयं कार्यभार संम्भाल लेती है- ... जितना हम आगे बढ़ते है, ... उतनी वहां से भी पहल होनी शुरू हो जाती है। भक्त कहते हैं, ... प्रभु की कृकृपा, ... प्रभु स्वयं भक्त से मिलने को कदम बढ़ा लेते हैं। परमात्मा की इस योग शक्ति को जो तत्व से जानता है, ... शक्ति एक ही है, जो व्यक्ति में है, वही समष्टि में है, वहां व्याप्त है, जो स्वयं की आत्मकृकृपा को प्राप्त होता है, वही ‘परमात्मा की कृपा को पा लेता है।संत कबीर ने यहीं कहा है-
हेरत-हेरत हे सखी कबिरा रहा हेराय
समुद समानी बुंद में यह तत कहा न जाए।

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च।।10-20
हे अर्जुन मैं सब भूतों के हृदय में स्थित सबका आत्मा हूं, तथा संपूर्ण भूतों का आदि, मध्य और अन्त भी मैं ही हूं।
भारतीय जीवन दृष्टि का यह सूचक है। जहां भलाई है वहां बुराई भी है। सब मैं, मैं ही हूं। हृदय, यहां बायलोजिकल हार्ट नहीं है। स्वामीजी कहा करते थे- मन जब अंतर्मुखी होता है, तब वह बाहर इन्द्रियों से सिकुड़ना प्रारंभ कर देता है। बाहर जब उसकी गति अवरुद्ध हो जाती है, तब वह अंदर आता है, ... वह मस्तिष्क से नीचे उतरता हुआ अपने मूल स्थान नाभि तक आता है, पर वहां ठहर पाना कठिन है, वह हृदय पर आकर ठहर जाता है। मस्तिष्क से हृदय तक की यात्रा विचार की भाव तक यात्रा है। विचार में जहां विस्तार है, वहां भाव में गहनता है। भाव, हृदय में उपजता है। जब मन एकाग्रता को प्राप्त होता है, तब स्वाभाविक रूप से बुद्धि शुद्धहोने लगती है, जब बुद्धि शत-प्रतिशत शुद्ध होती है, तब वह विवेक में ढल जाती है, ... तब हृदय की मुक्तावस्था प्राप्त होती है। यही अद्वैत तत्व है। जहां तक बुद्धि की सीमा है, द्वैत है। विवेक की प्राप्ति ही अद्वैत तत्व की प्राप्ति है।
दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम्।।
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्। 10/38
दमन करने वालों की दमन शक्ति मैं ही हूं।जीतने की इच्छा वालों की नीति हूं।गोपनीयों में अर्थात् गुप्त रखने योग्य भावों में मौन हूं, तथा ज्ञानवानों का तत्व ज्ञान मैं ही हूं।
गुप्त रखने योग्य भावों में मौन हूं। जहां मौन है, वहां वाक् का दबाव नहीं है। मौन स्वतः गुप्त है, ... पर भगवान कृष्ण यहां कह रहे हैं, ... उस मौन में भी जो गुप्त है।
... स्वामीजी कहा करते थे, वहां अन्तर्मुखी है। वह विचार को तो छोड ही देता है, अपनी निर्विचारता को भी गुप्त रखता है। दूसरे को अहसास भी नहीं होने देता कि वह मौन है। भीतर वाक् पश्यंति के द्वार पर ही रुक गई है। प्रभावहीन हो गई है।
दूसरे को बताने की भी इच्छा वहां नहीं रही है। मौन-बैखरी के स्तर पर नहीं होता, वहां तो जो भीतर है वह निरन्तर कंपता है, हम अपने आपसे ही बात करते रहते हैं। सपनों में भी हम अपने आपसे बतियाते हैं। मौन, ... सब शून्य में विसर्जित हो गया है। यह परम गोपनीय मौन है।
भगवान कृष्ण कह रहे हैं, वहां मैं हूं।
जहां तक मन है, दूसरे को प्रभावित करना है, दूसरे से प्रभावित होना है, वहां विचार है वहां मौन मैं प्रवेश नहीं हो सकता है। मौन में प्रवेश होते ही, मन मिट जाता है। मन मिटना नहीं चाहता। वह छोटे बच्चे की तरह दरवाजे पर धक्का देता चला जाता है, ... वह जो दूसरा है, वह नाना रूप धर के आना चाहता है। स्मृति और कल्पनाएं मौन में प्रवेश  करने के लिए अनेक रास्ते तलाश करती है। हमारी आदत निरन्तर अपने आपसे बतियाने की रहती है। मौन है, भीतर का यह आंतरिक संवाद शून्य में विसर्जित हो गया है। न अतीत का दबाव बचा न कल्पना का सम्मोहन, ... उस शांत झील में जहां कोई कंपन नहीं, उस परम ज्योति में जहां लौ पर कोई कंपन नहीं। वायु नहीं है, पर ज्योति है, पर कंपन नहीं है। वह परम मौन है। यही अंतर्मुखता में प्रवेश होता है। मन जब अंतर्मुखी होता है, तब मौन में प्रवेश होता है। रास्ता एक ही है, निरन्तर वर्तमान में रहने का अभ्यास, ...
वर्तमान में रहना सधता है, जब किसी भी क्रिया के साथ पूरी समग्रता के साथ, पूरे मन के साथ रहा जाए। पूरा मन, ... जहां पूरा मन रहता है वहां स्वाभाविक रूप से मन का लय होना, ... मन का विसर्जित होना शुरू हो जाता है। हम एक क्रिया से दूसरी पर, दूसरी से तीसरी पर, तीसरी से चौथी पर भटकते चले जाते हैं। पर जहां पूरी तरह रहना होता है, वहां क्रिया की समाप्ति के साथ मन अपने मुकाम पर भीतर चला आता है, वहां से दूसरी पर जाता है। पहली अवस्था में मन परिधि पर हमेशा भटकता रहता है, इसी अवस्था मंे मन परिधि से केन्द्र पर तथा केन्द्र से परिधि पर जाता है। उसका केन्द्र बदल जाता है। वह भीतर रहना सीख जाता है। वहीं वर्तमान है। यही मन की स्वाभाविक अवस्था है। सहजावस्था है। यहीं अंतर्मुखता है, ... यही मौन उपलब्ध होता है।
भगवान कृष्ण कहते हैं- ‘परम गोपनीयों में, मैं मौन हूं।’
ज्ञानवानों का तत्व ज्ञान मैं ही हूं-
तत्वज्ञान पुस्तकीय ज्ञान नहीं है, ... तत्व ज्ञान अनुभव जन्य ज्ञान है। ज्ञान के तीन स्तर है, इन्द्रिय जन्य ज्ञान, बुद्धिजन्य ज्ञान तथा अनुभव जन्य ज्ञान। तत्व ज्ञान अनुभव जन्य ज्ञान है, निजि अनुभव।दर्शनशास्त्र के बहुत बड़े विद्वान ने ‘अद्वैत दर्शन पर महत्वपूर्ण पुस्तक लिखी थी। स्वामीजी को भेंट की थी, ... स्वामीजी ने पूछा था-‘इसमें आपका स्वयं का क्या है? वे उत्तर नहीं दे पाए थे। लगा मानो उन्होंने हम सबसे पूछा हो। मैं भी चुप था। मेरे पास मेरा कोई अनुभव नहीं था। मात्र बुद्धिजन्य संग्रह ही था। उसको सहेजकर रखने की प्रकट करने की लालसा थी। पर मेरी अपनी खोज नहीं  थी। जाना अज्ञान जितना नहीं भटकाता, उतना ओढ़ा हुआ ज्ञान भटकाता है। एक मित्र की पुस्तक की बात हो रही थी- ‘तत्वज्ञान’ स्वामीजी ने धीरे से पूछा‘- क्या यहां संग्रह से अधिक कुछ है? शास्त्र की बाते हैं, जिन्हें वे अधिक जानते हैं, इसके पीछे सूक्ष्म अहंकार छिपा होता है। एक मित्र आए थे- बोले ‘योग पर पुस्तक लिख रहा हूं, काफी सामग्री संग्रहित कर ली है, आपके पास कुछ और है क्या? स्वामीजी ने सुना- ‘बोले’ योग तो  स्वयं करना है, सुना हुआ तो दूसरे का है।

जाना- मेरी भी हालत कुछ ऐसी ही है, मेेरे पास अपना स्वयं का कुछ भी नहीं है।
जो कुछ है, ओढ़ा हुआ है। शब्द प्रमाण हैं। स्वामीजी कहते थे- मैं कहता हूं, इसीलिए सही है, यही सोचना गलत है, आप प्रयोग करे,ं ... वह सही लगे, आगे बढ़े, अन्यथा छोड़ दे। प्रकृति में नित्य नए विचार आएंगे, ... कुछ ठहरेंगे, कुछ छूटते चले जाएंगे। उन्हीं को पत्थर की लकीर मानकर दोहराते रहो, यह उचित नहीं है।
उधार का ज्ञान, ज्ञान नहीं होता, अपना ज्ञान ही ज्ञान है। जाना, दूसरों के अनुभव जो शब्द में आए थे, उनका ही संग्रह होता गया, वे स्मृति में चले गए, ... जब भी बोला, वे कूदकर बाहर आते रहे, ... यह मुगालता रहा, मैं जानता हूं। भीतर दो आदमी हो गए। एक कहता है, मैं जानता हूं। मेरा जाना गया है, ... दूसरा कहता यह गलत है, यह मेरा अपना नहीं है। स्मृति का संग्रह ज्ञान नहीं होता।
प्रामाणिकता जीवन में तभी आती है, ... जब अनुभव होना शुरू होता है। तब आंतरिक जीवन में क्रांति होनी शुरू होती है, उससे पवित्रता आती है। जहां पवित्रता होती है, वहां प्रसन्नता होती है।
बहुत कठिनाई आई, बहुत पीड़ा हुई, जब जाना, जब भीतर से आवाज आई, ... मैं नहीं जानता, ... यह मेरा जाना नहीं है। उस अज्ञानता में अंधेरा नहीं था, ... पाया एक गहरी शांति भीतर उतनी शुरू हुई हैं। छù अहंकार जिसे पाल-पोसकर बड़ा कर रहा था, वह भीतर की शांत तपन से पिघलना शुरू हो गया है। सरलता तभी आती है जब बोध स्वयं से उपजता है। सच स्मृति पाप है, ज्ञान नहीं है, कल्पना, दुष्कर्म है,  और तभी सुना , विचार ही पाप है, यह हमेशा दूसरे को लेकर ही शुरू होता है। जब दूसरा गिरेगा तभी तो अपने घर की वापसी होगी। तब जो मौन प्राप्त होने लगता है, ... वहीं अनुभव जन्यता है। जहां तक स्मृति का दबाव है, ... वहां तक झूठा ज्ञान है, दूसरों की जूठन है, माथे पर लदा बोझा है। पर जहां निजी अनुभव में प्रवेश होता है, ... स्वयं का साक्षात्कार होता है, ... वहीं तत्व ज्ञान है।
भगवान कृकृष्ण यहां कह रहे हैं- जो स्वयं में स्वयं से जाना गया है, वही मैं हूं। निजी अनुभव ही परमात्मा है। यहां ज्ञान जानकारियों का संग्रह नहीं है। ज्ञान ज्ञानी का निजी अनुभव है, वही उसकी पहचान है।

अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां   च नारद।
गन्धर्वाणां चित्ररथः‘‘सिद्धानां कपिलो मुनिः 10ः26
 सब वृक्षों में पीपल का वृक्ष, देव ,षियों में नारद मुनि,गन्धर्वों में चित्ररथ,भगवान कृष्ण कह रहे हैं- सिद्धो में कपिल मुनि मैं हूं। कपिल मुनि सत्य के प्रवर्तक हैं। वर्तमान में रहना सत्य की निष्ठा है। सांख्य का कहना है यहां करना कुछ नहीं है, बस जो विस्मृति हो गई है, उसको हट जाना है। संसार की ओर मुंह है, परमात्मा की ओर पीठ है, बस यही विस्मृति है, ... बस थोड़ा घूम जाना है, ... जिधर मुंह है उधर पीठ का हो जाना है। द्वार तो एक ही है।
योग का कहना है- तुम्हें करना है। योग के आचार्य पतंजलि हैं। यहां करना है। भगवान कृष्ण ने ‘‘निष्काम कर्मयोग’’ का भी संकेत दिया है। संभवतः जिस प्रकार के योग- यानी विधियां हो सकती है, सब गीता में समाहित है। फिर भगवान का यह कहना कि सिद्धों में मैं कपिल मुनि हूं, एक विरोध को लाता है। दर्शन में सांख्य-योग को एक ही निष्ठा में रखा जाता है। ये दो मार्ग है। विधियां है। अद्वैत दर्शन की विधि में सांख्य- योग को लेता है। योग में शरीर का सहारा है, शरीर से मन, मन से बुद्धि तथा बुद्धि से विवेक यात्रा है।
पतंजलि की भाषा में प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि है। सांख्य में शरीर का सहारा नहीं है। मात्र जो विस्मृति है, मूर्च्छा है, उसका हट जाना विधि है। वर्तमान में रहना, अप्रमाद है। यहां सुमिरन है। कॉन्सटेन्ट अवेयरनेस है। पूज्य स्वामीजी कहा करते थे-
श्मििवतजे ंतम तमुनपतमक जव ादवू जींज दव मििवतज पे तमुनपतमकश् पर प्रयत्न करने के बाद ही अप्रयत्न में प्रवेश होता है। करना, और करना, ... न करने की ओर ले जाता है। करना, लाजमी है। भगवान बुद्ध की उपलब्धि भी ‘सांख्य’ की है, पर वे पहुंचे वहां योग के द्वारा ही है। स्वामीजी कहते थे- ‘प्रारंभ में सारे प्रयास किए, परन्तु अपने साठ साल से अधिक प्रयोगशीलता के बाद जाना, रास्ता एक ही है, निरन्तर वर्तमान में रहना।
-जगत में जो भी जाना है, पाया जाता है, करके ही पाया जाता है, वहां प्रयत्न आवश्यक है। उसके लिए चलना जरूरी है। गति जरूरी है। परन्तु अन्तर्यात्रा न करने से मिलती है। वहां करना छूट जाता है। जहां करना होता है, वह शरीर से होता है, पर न करना, प्रारंभ मन से होता है, बाद में मन भी छूट जाता है।
‘वर्तमान में रहना’- जब कहा जाता है। तब एक ही वाक्य में कहा जाए तो जहां शरीर है, वहीं मन रहे, यह स्वाभाविक अवस्था है। पर जब मन वहीं रहना शुरू कर देता है, तब इस स्वाभाविक अवस्था में मन की भी उपयोगिता खो जाती है। यही सांख्य की विधि है। योग- मन को शरीर के साथ रखने की विधि है। समाधि का सारतत्व यही है कि जहां शरीर है वहीं मन रहे। वहां निरोध, मन की वृत्तियों का असहयोग होना शुरू हो जाता है। झील शांत हो जाती है। कंपन नहीं होता। परन्तु शरीर तो फिर भी क्रियारत रहेगा। क्रिया नहीं है तो शरीर शव हो जाएगा। पर मन, अमन की अवस्था में भी शरीर के साथ रहेगा। अंतर्मुखी अवस्था में अंतर्मन सारे कार्य व्यवहार संभाल लेता है।



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