Sunday, November 24, 2013

श्री गुरु गीता पंद्रहवां अध्याय


ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
छन्दांसियस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित। ।‘1
‘जिसका मूल ऊपर की ओर तथा शाखाएं नीचे की ओर, उस संसार रूप पीपल के वृक्ष को अविनाशी कहते हैं, तथा जिसके पत्ते वेद कहे गए हैं, उस संसार रूप वृक्ष को जो मूल सहित तत्व से जानता है, वह वेद के तात्पर्य को जानने वाला है।’

यह साधन सूत्र है। संसार का फैलाव नीचे की ओर है, ... वह मूल से बाहर ले जाता है, तीनों गुण लताआंेें की तरह है, फूल पत्ते वहीं है, ... तत्व से जानना, ... मूल को जानना, घर वापसी है। साधन- ‘बटुक’ को सौंपता है। ‘अनंतयात्रा’ में स्वामीजी ने कहा है- ‘चूड़ाला नीलकंठ को बटुक बनाकर ले जाती है। यज्ञोपवीत बटुक का है। यह मात्र संकेत है। जो बालक है- उसका अंतःकरण शुद्ध होता है। पवित्रता, प्रसन्नता, प्रामाणिकता का वहां आधार है।

... तत्व को वही जान पाता है, ... जहां चित्त की शुद्धि है। वापसी है। ‘यही अन्तर्यात्रा है। वापिस लौटना है। मन इन्द्रियों के सिकुड़कर अंदर की ओर लौटता है। यहां धारा राधा में बदल जाती है।
यही ‘मूल’ सहित तत्व को जानना है। वृक्ष का फैलाव नीचे है, ... अश्वत्य का वृक्ष है। शाखा-प्रशाखाएं अनंत होती चली जाती है। फैलाव ही फैलाव है। जितना बाहर संसार में जाएंगे, ... उलझाव है। यहां तो लौटना है। वापसी है।

यतन्तोयोगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्।
यतन्तोऽप्यकृकृतात्मामानो नैनं पश्यन्त्य चेतसः।।11

 योगीजन  भी  अपने हृदय में स्थित हुए यत्न करते हुए ही तत्त्व से जानते हैं, और  जिन्होंने अपने अन्तःकरण को शुद्ध नहीं किया है ऐसे अज्ञानी जन तो यत्न करते हुए भी इस आत्मा को नहीं जानते हैं।
... प्रयत्न अपरिहार्य है, ... वैराग्य साधन है। जहां राग है, ... वहां उसका असहयोग रहता है। राग वस्तु में नहीं मन में है। चिन्तन में है। चिन्तन स्वतः कम होने लगता है, निरंतर वर्तमान में रहने से। विराग अपने आप आने लगता है।
भगवान कृष्ण यहां महत्वपूर्ण संकेत कर रहे हैं-
योगी जन भी अपने हृदय में स्थित हुए इस आत्मा को यत्न करते हुए ही तत्व से जानते हैं और जिन्होंने अपने अंतःकरण को शुद्ध नहीं किया है ऐसे अज्ञानीजन तो यत्न करते हुए भी इस आत्मा को नहीं जानते हैं-
क्या प्रयास करना आवश्यक है? पानी खौलता है, ... तब भाप बनती है, रूपांतरण तभी होता है, परन्तु कुनकुना पानी खौल नहीं पाता है। प्रयत्न की एक आवश्यकता है। प्रयत्न यही है, निरन्तर ध्यान रहे, मन वर्तमान में रहे, ... बस इससे अधिक नहीं, ... जहां भी हो, जो भी काम हो, मन पूरा उसी में रहे।
परन्तु एकाग्रता की अपनी सीमा है, शक्ति यहां प्राप्त होती है, परन्तु चित्त शुद्ध नहीं है तो यह शक्ति उतनी ही तीव्रता से विदा हो जाती है। पतन हो जाता है। चित्त की शुद्धि अपरिहार्य है। एकाग्रता जहां तमस है, वहां जल्दी आती है। तमोगुण में अधिक शक्ति उत्पन्न होती है। बुरा आदमी अहंकारी होता है, उसमें लगन तीव्रता के साथ रहती है। स्वामीजी कहा करते थे- ‘गांव का भोपा जो बोलता है, वह सच हो जाता है क्यों? उसने मन को सौ टका एक ही तरह से ढाल लिया है। उससे पीछे ताकत होती है।“

परन्तु शक्ति व शांति वहीं रहती है, जहां चित की शुद्धता है। पात्र वहीं निर्मल रहता है। जहां आचरण में प्रामाणिकता आती है, वहां पवित्रता आती है, वहां प्रसन्नता रहती हैं वहां निर्मलता आती है, ... अहंकार नहीं रहता। प्रकृति ही सारे कार्य व्यवहार संभाल लेती है।
शक्ति मानसिक होती है। एकाग्रता की शक्ति मानसिक है। मन एकाग्र हुआ है, ... जब मन और प्राण की युति होती है, ... तब यह और बढ़ जाती है, ... परन्तु इसके आगे का विकास तभी होता है, जब मन का विसर्जन हो जाता है, मन-अंतर्मन में लय होता है। जब हृदय खुलता है, वहीं वास्तविक आधार है, जहां चित्त की शुद्धि होती है। जहां शांति है, शक्ति है, संतोष है।

 इस एकाग्रता से जो शक्ति होती है, प्राप्त होती है, ... वह निरपेक्ष है। उसका कहीं भी प्रयोग हो सकता है। जहां अशुद्ध अंतःकरण होता है, वहां शक्ति मानसिक एकाग्रता से प्राप्त होती है। वहां शक्ति आती है। उसमें तीव्रता है, परन्तु वह टिक नहीं पाती है, अशुद्धियां उसे पतन की ओर ले जाती है। यह वासना से प्रेरित होती है।

शास्त्र पढ़कर, सुनकर जो जाना गया है, जाना जाता है, वह मात्र परिधि पर रह जाता है। गुरुतत्व जहां है, वहां प्रवेश द्वार है। समर्थ गुरु पहले साधक के भीतर की सफाई करवाते हैं। चित्त शुद्धि, करुणा, प्रेम मुदिता, उपेक्षा, तितिक्षा, यहाँं भीतर के द्वार खुलने की अनंत प्रतीक्षा की यहां दस्तक होती है। स्वामीजी कहते थे- जिज्ञासा है, मात्र कौतुहल रहता है, लोग आते हैं, पूछते चले जाते हैं। भगवान ने गीता में कहा है- बहुत कम लोग तत्व से जानना चाहते हैं। मैं पचास साल के अधिक समय से प्रयोग करता रहा, ... किससे कहता, सबका ताले की चाबी पर संकेत होता है, पर गुरु गुच्छा संभाल कर रखते हैं। जानते हैं, मात्र एकाग्रता अहित भी करती है। छापेखाने में जो परम गोपनीय था, उसे खोल तो दिया, पर उससे अहित अधिक हो गया। तैयारी के अभाव में कम वाट के बल्ब में तेज वोल्टेज आ जाता है। तो बल्ब फ्यूज होने का खतरा हो जाता है। वही अधिक हो गया है।



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