Monday, November 25, 2013

श्री गुरु गीता सतरहवां अध्याय

श्री गुरु गीता सतरहवां अध्याय


‘‘सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्द्धः स एव सः।। 17-3

हे भारत सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके अन्तःकरण के अनुरुप होती है तथा यह पुरुष श्रद्धामय है इसलिए जो पुरुष जैसी श्रद्धा वाला है वह स्वयम् वही है। अर्थात् जैसा जिसकी श्रद्धा है वैसा ही उसका स्वरूप है।

यो यच्छ्र्र स एव सः जो मनुष्य जैसी श्रद्धा वाला है, वैसी ही उसकी निष्ठा होगी और उसके अनुसार ही उसकी गति होगी। उसका प्रत्येक भाव और क्रिया अन्तःकरण की श्रद्धा के अनुसार ही होगी।

जहां सत का प्राधान्य है, वहीं पर वर्तमान में रहना अनुभव में प्रवेश कराता है। अक्रिया, ... जहां करना न करना पूर्ण हो, ... करना तो काम है, ... पर कर्ता गौण हो गया है। यहां मन पूरी तरह डूब जाता है। मन पूरा चला जाता है। जहां मन पूरा गया, वहीं बहिर्मुखता कम हो जाती है। अक्रिया में अहंकार खो जाता है। वहां जो कर्म है, न उसका चिन्तन बनता है, न योग बनता है। यह बहुत ही सूक्ष्म क्रिया है।
पर जहां रज का प्राधान्य है, वहां क्रिया की मांग होती है, ... लगता है बिना किए कुछ होने वाला नहीं है। मैं हमेशा साधन की मांग करता था, ... तलाश करता था, ... स्वामीजी जो कह रहे थे- शब्द तो आ रहे थे, ... पर उनका अर्थ खो गया था। रजोगुण- कुछ न कुछ करने में भरोसा रखता है। बिना किए चैन नहीं मिलता। ... वहां ध्यान का अर्थ ही कुछ न कुछ करना होता है।
जहां तमस है, ...वहां कुछ भी न करने का आग्रह है। पर एक भरोसा है, गुरु करेंगे, ... भगवान करेंगे, ... बस। वह दूसरे पर सब छोड़ने को तुरंत राजी हो जाता है। गुरुडम प्रायः तामसी लोग फैलाते हैं। उन्हें गुरु और गुरुडम रास आते हैं।
मनुष्य की श्रद्धा उनके अंतःकरण के अनुरूप होती है- अंतःकरण की पहचान श्रद्धा की पहचान है। तीनों गुण कहीं पर भी समान मात्रा में नहीं होते। प्रकृति का स्वभाव है, हर व्यक्ति की अपनी पृथक पहचान। कहीं कुछ ज्यादा है, कहीं कुछ कम। अपनी श्रद्धा को पहचानना ही, अपने आपको जानने का मार्ग है। उसी अनुरूप कार्य करने से सफलता की संभावना बनती है।
यह सतरवां अध्याय साधन पक्ष की आधारशिला है-

भगवान कृष्ण कह रहे हैं-
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः।
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः।। 4
‘सात्विक पुरुष तो देवों को पूजते हैं और राजस यक्ष और राक्षसों को तथा अन्य तामस मनुष्य है, वे प्रेत और भूत गणों को पूजते हैं।

गुणों के आधार पर मनुष्यों का विभाजन है, ... तो तामस है, उसकी पहचान प्रमाद है, आलस्य है, जड़ता है। रजोगुण का आधार गति है, विस्तार है, तथा सतोगुण दोनों का संतुलन है। भोजन, यज्ञ, तप, रस भी इन तीनों प्रवृत्तियों का पृथक-पृथक होता है। शरीर का तप, वाणी का तप, तथा मन का तप यह भी तीन प्रकार का है। यह भी गुणों के आधार पर तीन प्रकार का है।
यह गुणों का विभाजन, मनुष्य की बर्हिजगत की यात्रा पर ‘सत पथ’ की ओर आने को संकेतित करता है। जो तामसी है, उनका अगला विकास राजसी में होना है, तथा इसके बाद ‘वे सात्विक’ होंगे। ‘क्या सात्विक, पलायन का पर्याय है।
 स्वामीजी पश्चिम के दो शब्द एक्ट्रोवर्ट तथा इन्ट्रोवर्ट को स्वीकार नहीं करते थे, ... बहिर्मुखी वह है जो बाहर ही बाहर भटकता है, परन्तु अंतर्मुखी वह है जो भीतर का मार्ग पा लेता है, ... वह मन का मूल निवास जहां है, वहां है, वहॉं मन नियंत्रण में है, वह तो गति है, उर्जा है, परन्तु बाहर जाना न जाना अब विवेकाधीन है। ‘अंतर्मुखीः मन की भीतरी यात्रा का गवाह है। यहां मन इन्द्रियों से सिकुड़ता हुआ। विषयों को छोड़ता हुआ भीतर आता है, बुद्धि का आधार संकल्प-विकल्प है। बुद्धि जब निश्चयात्मक होती है। तब अनावश्यक चिन्तन गिर जाता है। तब मन अंतर्मुखी होता है। तब उसे हृदय की प्राप्ति होती है। विचारणा, विचार में तथा विचार भाव में रूपांतरित हो जाता है। अंतर्मुखी कटा हुआ, पलायनवादी, आत्महीन नहीं होता है। ‘भगवान कृष्ण कह रहे हैं- ‘माम अनुस्सर युद्ध च’ व युद्ध भी करता है, संघर्षरत है तथा वह निरन्तर स्मरण में भी है, वह है, वह अपने मूल स्रोत से जुड़ा हुआ है। उसे उसका अहसास है।

पूज्य स्वामीजी कहते थे- मन की शांति तो भांग पीकर भी आ जाती है। वह तमस है। पर शांत मन,  साधना की, उसकी प्राप्ति है। मनुष्य के जीवन का उद्देश्य सुख व शांति प्राप्त होना है। जगत भी उतना ही सत्य है, जितना कि ब्रह्म है। जगत ही ईश्वर की साकार उपस्थिति है। उसकी सेवा, उसके प्रति कर्तव्य कर्म की भावना, पूजा है। जो बाहर साध पाता है वही भीतर भी साध पाता है, ... जो बाहर के संबंध तोड़कर मात्र भीतर ही रहना चाहता है, वह अंतर्मुखी नहीं है।
अंतर्मुखी तो शक्ति का भंडार है, जहां शांति है, वही शक्ति है। शक्ति इस जीवन में हमारे कार्य व्यवहार सही चले, हम सुखी हो, शांत हों। स्वयं शांति से जीएं दूसरों को जीने दे, ... यह अंतर्मुखी की पहचान है। गलती यही हुई है। हमारे शास्त्रों के अधूरे अध्ययन से यह हुआ है। गीता में भगवान कृष्ण ने इसी संतुलन को रूपायित किया है। पर हमने उनका अधूरा ही संदेश ग्रहण किया है। जो याचक है, वही दीन है, वह भिखारी है।

स्वामीजी कहते थे- मैंने सन्यास लेकर पहला संकल्प यही लिया था कि मैं भीख नहीं लूंगा। प्रारंभ में कठिनाई आई, तब गुरुजी ने अपने भोजन से एक दो चपाती देना शुरू कर दिया था। यही कारण है कि मेरा भोजन अल्प से अल्प होता चला गया। सन्यास लेकर गुरुकुल चलाया, पहले काम किया, सेवा की फिर अन्न ग्रहण किया।’’
यही संतुलन, सुख व शांति का पाना गीता का संदेश है।

स्वामीजी कहते थे- यह तो अंतर्मुखता है, यह निरन्तर वर्तमान में रहने से प्राप्त होती है, यह जो मनोवैज्ञानिक बंटवारा, बहिर्मुखी व अंतर्मुखता होता है, वह यहां नहीं है। उन्होंने जो बाहर से चुप रहता है, उसे भी  बहिर्मुखी कहा है। जो बाहर से संबंध छोड़ देता है, उसे भी कहा है। बहिर्मुखी वही है जो भीतर आना ही नहीं चाहता। वह बाहर एक काम से दूसरे में, दूसरे से तीसरे में। उसका मन बाहर ही बाहर भटकता रहता है। अंतर्मुखी वह है, जो भीतर का रास्ता भी जानता है, वहीं रहता है, पर जब बाहर जाना होता है, उतनी गति व शक्ति के साथ बाहर जाता है। वही काम पूरा हुआ, मन स्वाभाविक रूप से, सहजता में भीतर चला आता है। वह बाहर नहीं भटकता।

यह संतुलन ही, वर्तमान में रहकर पाया जाता है। यही अब तक नहीं हो पाया है। या तो बाहर ही उलझे रहे, या बाहर का दरवाजा बंदकर बस भीतर मुड़ गए। इससे जीवन असंतुलित हो गया। जो जीवन की इन दोनों धाराओं पर सम्यक रहताहै, ... वही अंतर्मुखी है। संसार तो रहेगा। हम नौकरी भी करेंगे, ... धंधा भी होगा, परिवार भी होगा, सही कार्य सुचारू रूप से करने हैं। यही जीवन जीने की कला है।
अंतर्मुखी व्यक्ति शांत है। पर अत्यधिक सक्रिय भी। वह याचक नहीं है। वह दाता होता है। वह परमात्मा की महान शक्ति से जुड़ा होता हुआ भी सामान्य जीवन परन्तु अद्वितीय जीता है। वह विशेष नहीं है। उसके जीवन में असामान्यता नहीं है। वह सामान्य है। सहज है। सरल है। स्वाभाविक है।

विज्ञान, टैक्नोलॉजी, ... प्रबन्धन, वहां सबका सदुपयोग है, ... यह मनुष्य को सुख देने के लिए है, ... मनुष्य सुखी व शांत जीवन जीता है, यही सार तत्व है। यहां द्वन्द्व नहीं है। यह जो कहा जाता है कि मनुष्य को दो में से एक चुनना है, यह असंगत है। भगवान कृष्ण ने इस व्यक्तित्व के लिए -‘स्थितिप्रज्ञ’ शब्द कहा है। वह दोनों तरफ सहजता से जाता है।
यहां छोड़ना कुछ भी नहीं है। जिसे छूटना होता है, स्वतः होता है। रात स्वप्न में देखा, ... कहीं गया हूं, ... वहां बहुत बढ़िया भोजन रखा है, ... पाया झुकाव उधर है, पाया स्वाद भी है, तथा क्रोध भी है। जब आप भीतर मुड़ते हैं, ...तब बाहर जो अप्रिय घटता है, रुक सकता है। उसकी सीधी पहचान होती है।
संसार को अवास्तविक कहकर, मात्र बुद्धि विलास बहुत हुआ है। पूज्य स्वामीजी कहते थे- यह भी उतना ही सच है, ... सच मानकर ही जाना जाता है, ... तभी वर्तमान में रहा जाता है। जिस दिन यह स्वप्नवत लगता है, ... यानी निरन्तर परिवर्तनशील व गतिशील, तब वास्तविक रहना होता है। यह अनुभवजन्य सत्य है। परन्तु इन्द्रिय जन्य ज्ञान पर कल्पना व विचार से थोपा हुआ आदर्श अव्यवहारिक है। रहना ही यहां महत्वपूर्ण है।  यहां ब्रह्म और माया दोनों ही स्वीकार हैं। माया, ... जो है नहीं, जो भासती है, पर प्रारंभ में माया को अस्वीकार नहीं किया जा सकता है।माया ब्रह्म की ही शक्ति है।

जो तथाकथित ब्रह्मवादी हैं, वे शास्त्रों की दुहाई देकर यही समझाते है। बाहर जो है, वह भ्रम है, माया है। संसार माया है। संसार जो माया है उसे ही समझाते हैं, कि वह माया है। जब वह माया है, स्वयं माया है, तब कौन किसको छोड़कर कहां जा सकता है? नास्तिक कहता है, ... भीतर कुछ नहीं है। पदार्थ में स्वतः गति आती है, वही चेतना है। दोनों ने एक-एक आधार पकड़ लिया है। भगवान कृष्ण ने दोनों को यथावत स्वीकार किया है। पूरी गीता एक तरफ नहीं झुकती है।
पूज्य स्वामीजी कहते थे-‘गीता के इसी संतुलन का नाम ‘स्थितिप्रज्ञ’ है। यह कोई काल्पनिक व्यवस्था नहीं है। वरन् यह इस संतुलन को पाकर जीने की कला है।
हमने हमारे यहां जिस सन्यास को परिभाषित किया, उससे महान आत्माएं तो पैदा हुई, पर साथ ही समाज अकर्मण्यता में डूब गया। साधना के नाम पर पलायन, तथा आलस्य छाता गया। समाज में तमोगुण व्याप्त हो गया। भारत की हजार वर्ष की दासता में इन धर्म ग्रन्थों का बहुत बड़ा सहयोग रहा है। बाहर दासता, गुलामी, गरीबी, बढ़ती गई। बहुत बड़े जन समुदाय को धर्म के नाम पर काहिली में डालने का उपक्रम इन धार्मिक भाषा तथा धर्मग्रन्थों ने किया।
इस बाहर-भीतर को स्वामीजी कहते थे- आप मकान की दूसरी मंजिल पर रहते हैं, नीचे कोई आया, आप गए बात की, फिर ऊपर आ गए, ... अब अगर इस वार्ता का आप चिन्तन करते रहे, तो आप ऊपर शरीर से होते हुए भी नीचे ही रह रहे हैं। बस इसी कला को समझना है। तभी बाहर और भीतर का सधता है। जो बहिर्मुखी है वह निरंतर बाहर ही बाहर रहता है। उससे बाहर की समृति आती है। वह सुख देती है। उसे भीतर की शांति से जोड़ना है। तब समृति न तनाव देती है, न हताशा, ... वरन जीवन को सत्पथ सौंपती है, उसे शक्ति सम्पन्न बनाती है। हम बाहर की अवलेलना कर उसे छोटा मानकर, हेय मानकर नहीं रह सकते। हमें दोनों को ही एक साथ स्वीकारना होगा। गृहस्थ और सन्यास एक दूसरे के पूरक हैं। यह मन की अवस्था है। देह की नहीं। मात्र कपड़ा रंगने तथा घर- क्रियात्मक जीवन छोड़ने से मन की निर्विचारता नहीं आती।
... जिन्होंने दो मानकर अलगाव किया है, वह मात्र बुद्धि के आधार पर वितंडावाद ही है। दो है नहीं, सांख्य का कथन है, ‘पुरुष और प्रकृकृति, ... दो होते हुए भी एक है। हम शरीर को आत्मा से अलग नहीं कर सकते। दोनों को जोड़ने वाली शक्ति मन है। मन ही दोनों जगह जाता है। जहां स्वस्थ मन है, ... शक्तिशाली मन है, नियंत्रित मन है। वहां बाहर का भी सघता है, भीतर का भी सघता है। बाहर जाते समय किसी प्रकार की पाप ग्रन्थि नहीं बनती। भीतर आते समय किसी प्रकार की विशिष्टता का बोध नहीं होता।
गीता ने इस व्यक्तित्व निरुपण को इस अध्याय में आहार से जोड़ा है। सम्यक आहार। तामसी, राजसी तथा सात्विक आहार। तप, दान सभी को परिभाषित किया है। यहां भीतर तक आने की एक सुव्यवस्थित प्रक्रिया है। यही संतुलन पाना पूर्णता है। यहां दो में विभाजन नहीं है। सन्यासी और गृहस्थ दोनों एक साथ हो जाना होता है। यही आत्मकृपा है। यहां भीख नहीं मांगनी है। पराश्रय नहीं है, ... यह सघता है, ... वर्तमान में रहने से, अन्तर्मुखी होने से।
.... जो बाधा है, वह मन का चिन्तन है। बस बाहर शरीर रहे, वहीं मन हो, यह संतुलन सधता जाता है।

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