आदरणीय महानुभाव
श्री गुंरु गीताका यह दूसरा अध्याय आज आपकी सेवा में प्रस्तुत हैं।पूज्य स्वामीजी गीता के श्लोकों का आधार बनाकर साधकों के प्रश्नों की समस्याओं का समाधान बताया करते थे। लगभग अट्ठाईस साल का आपका सानिध्य मिला। आप ब्रह्मनिष्ठ गुरु थे, गीता आपकी दृष्टि में शांति, सुख , शक्ति , तथा आधुनिक जीवन की समस्याओं को सुलझााने वाला अद्भुद ग्रंथ है।
उसी दृष्टि को यहॉं निरूपित किया गया हे।
दूसरा अध्याय
क्लैब्यं मा स्म गमःपार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
श्रुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप।।3।।
क्लैव्यं मा स्म गम,... श्रुद्रं हृदय दौर्बल्यं...
गीता में संपूर्ण योजना- व्यथित मन को,दुविधाग्रस्तमन को, संप्रेषित है। अर्जुन योद्धा है,... उसकी मन की यह दुविधा क्यों हुयी,... विद्वानों ने बहुत विवेचना की है। उसके भीतर की ममता,... उसके भीतर के द्वन्द्व को, जो उसके सतोगुणी व्यक्तित्व पर अचानक तमस की छाया के आने से पैदा हुआ,... ममता,... गुरुजनों को लेकर है,... दूसरे कोई और होते तो तो वह लड़ जाता,... पर अचानक ममता,... परिजनों का वध,... उस द्वन्द्व को खड़ा कर देता है, जो आज के मानव मन की समस्या है,।
...
कृष्ण उस व्यथित मन से जो गांडीव रखकर, रथ के पिछवाड़े बैठ गया है,... पसीने में नहा गया है, उसका आत्मविश्वास खो गया है,...उसे मार्ग बताते हैं।
आज चाहे, ममता की अपूर्णता पर, उत्साह जनक प्रतिफल के प्राप्त न होने पर उत्पन्न व्यथा हो, , परिस्थितियों की प्रतिकूलता हो, अपमान का भय हो, मनुष्य का मन पराजय की आकांक्षा से या कर्म की व्यर्थता से ऊबकर किसी अरण्य की शरण में जाना चाहता है।संगीत सुनने का नशा, डिस्को में बढ़ती भीड़,तरह-तरह के नशे,बाबाओं के प्रवचन की भीड़ यह सब पलायन ही है। अजीब प्रकार का पोलापन हमारे भीतर व्याप्त है, हम बहुत देर तक कठिन परिस्थितियों का सामना नहीं कर सकते। वह धैर्य हमारे भीतर नहीं है। कहीं न हीं हम युघिष्ठिर के संस्कारों से ग्रसित हैं। सतत प्रयत्न हमारे जीवन का मूल्यवान नहीं बन पाया। हारे को हरिनाम हमें प्रिय लगा है।
यह दुविधा हजारों वर्ष बाद भी आज वैसी ही है,.
..
कृष्ण कहते हैं- हे, अर्जुन नपुंसकता को मत प्राप्त हो,... शास्त्र ने मनुष्य को ‘पुरुष’ शब्द की संज्ञा दी है। पुरुष वही है, जो पुरुषार्थ करे,... और मनुष्य वही है, जिसके पास मन-नाम की शक्ति है। अर्जुन की मूल समस्या, उसकी दुविधा है, वह वृहत्तम जीवन मूल्य से जहां यह युद्ध-मानवता की रक्षार्थ या मूल्यों की रक्षार्थ था, वहां वह अचानक अपनी ‘वैयक्तिक’ समस्या से उत्क्रांत हो उठता है। उसके सारे तर्क,... समष्टिगत मूल्यों से हटकर नितांत व्यक्तिगत आग्रह-दुराग्रह तक सीमित हो जाते हैं। व्यक्ति की आज भी यही समस्या है,... वह अपने लिए तथा समाज या परिवार के हित के बीच सामंजस्य नहीं पा रहा है। इस पराजित मन को, दुविधाग्रस्त मन को,... जो वास्तव में आत्मविश्वासी मन है,... जगाने के लिए एक धक्के़े की जरूरत थी,... राख में दबे अंगारे को उठाने की ताकत, इस एक शब्द में है- नपुंसकता को प्राप्त मत हो,... हृदय की दुर्बलता ही आज की सबसे बड़ी समस्या है।
गीता के इस अध्याय को”सांख्य योग की संज्ञा दी गई है। अध्याय में दो विपरीत परम्पराओं को देखकर भ्रम बहुत फैला है। मनुष्य तो एक ही है। उसकी उर्जा का आधार भी एक ही है। फिर विषमता कहाँ है?
जहाँ पुरुषार्थ है, वहीँ सांख्य है। पुरुषार्थ मूल तत्व की ओर ले जाता है। ”सोर्स“, जो कारण है। जो आत्म है, आत्म कोई नपुंसक शक्ति नहीं है। उसे पाना ही स्वधर्म है,और प्रयत्न योग है। विषय , इन्द्रियों और मन के संबंध से निश्चित लक्ष्य की प्राप्ति प्रयत्न से ही प्राप्त होती है। संसार में सफलता प्रयत्न से ही मिलेेगी। यही कर्म योग है। तिलक महाराज ने प्रयत्न को योग का मार्ग मानकर अपना महान ग्रंथ लिखा है। ज्ञानेश्वरी पुरुषार्थ के मार्ग का ग्रन्थ है। जीवन में दोनो ही पथ अपरिहार्य है। यही वैदिक पथ है। दोनो ही मार्ग अविरोधी हैं। हम जिस मनुष्य की कल्पना गीता के आधार पर कर रहे हैं, वह वीतरागी नहीं है, वह कृष्ण के पथ का है, जहाँ सांख्य भी है, योग भी है, कर्म भी है, जगत अपनी संपूर्ण क्रूरताओं के साथ है, परन्तु वह सामना भी कर रहा है, और विजय भी प्राप्त कर रहा है, और दूसरों को दिला भी रहा है। उसके अधरें पर बांसुरी भी है, तो गीता का शंखनाद भी है।
आज की इस दुनिया में जहाँ अनिर्णय ही जीवन का आधार बन गया है। ज्योतिषियों की भीड़, बाबाओं की जमात, इसी दुर्बलता के कारण पोषण पाते हैं। न तो यह हमारी जीवन शैली हे, न हमारा धर्म है, न हमारी संस्कृति हैं
गीता, यहां प्रयत्न को रेखांकित करते हुए ‘कर्मयोग’ का आधार तलाश कर रही है।
‘उतिष्ठ’,... उठो, जागो, अनावश्यक विचारणा का परित्याग करो,... ‘सोचो,... खूब सोचो,... पर विचार जो दृढ़ हो जाए उस पर कायम रहो, उस पर बार-बार मत सोचो,... तभी हृदय की दुर्बलता कम होती है। हम किसी भी प्रकार की साधना करें, अगर हमारा आत्मविश्वास दृढ़ नहीं होता है,... तो वह साधना व्यर्थ है। आज की सबसे बड़ी समस्या, मानव की यही दुविधा है,... वह अनावश्यक विचारणा के दबाव में रहता है, सही निर्णय नहीं ले पाता है। निर्णय हमेशा बुद्धिकी स्थिरता में होता है। विवेक के आलोक में होता है। गीता उस राह पर चलने के लिए संकेत करती है।
कार्पण्य दोषो पहत स्वभावः
पृच्छामि तवां धर्मसंमूढचेताः ।7
”मेरा स्वभाव कृपणता दोष से दूषित हो गया है,... कायरता रूप दोष करके उपह्त स्वभाव वाला अर्थात् मेरी बुद्धि पर जड़ता छा गयी है, जिससे में अपने कर्तव्य के बारे में मूढ़ हो गया हूं।“
... यह कार्पण्य दोष,... अत्यधिक विचारणा से ग्रस्त मनुष्य पर आ जाता है। उसकी निर्णय क्षमता चली जाती है। वह दिग्भ्रमित हो जाता है। क्या करना है, क्या नहीं करना है? वह तय नहीं कर पाता है। यह कायरता दोष नहीं है। ... कायर व्यक्ति के पास तो एक रास्ता होता है, भाग जाए। समर्पण कर दे। जो है वही भाग्य है। मान लो। तुम्हारी जन्म पत्री में काल सर्प दोष है, फलां- फला, उपाय करो, तुम पर कृपा नहीं हो रही है, यह उपाय करो, लूट का बाजार चल पड़ा है,यह कायरों का मार्ग है। हजार साल की गुलामी से पैदा हुई दीनता है। गीता का प्रारम्भ ”लोभ“ को रेखांकित करते हुए हुआ हे। लोभ से दूषित चित्त ही आम भारतीय की पहचान है। भारत की गुलामी का कारण लोभ और मित्र द्रोह ही है। इस दोष से आम भारतीय आज भी ग्रसित है। गीता का प्रारम्भ ही अद्भुद है।
दूसरी हमारी एक और पहचान है, हम बहुत बड़े विद्वान है यही हम मानकर चलते हैं।
उसकी पहचान है, जहां चुनौती तो है,... सामना करने का सामर्थ्य भी है,... पर उत्साहहीनता है। उसका कारण सम्मोह, भय, ममता, करुणा, कुछ भी हो सकता है? हम इसकी पहचान हमारी उस मनोवृत्ति से कर सकते हैं, जिसकी पहचान हम आतंकवादियों के साथ सद्व्यवहार कर बताते हैं। हम वर्षों तक कानून की स्वयं पालना नहीं कर सकतेे हैं। इसके लिए हमें दुःख भी नहीं है। क्यों कि यह हमारा स्वभाव है।
आज समाज इसी ‘कार्पण्प्य दोष’ से ग्रसित है। जानते हैं, समाने अमंगल हो रहा है, अशुभ हो रहा है, परन्तु व्यक्तिगत स्वार्थ से बुद्धि इतनी जड़ हो गई है कि विकल्प सूझता ही नहीं है। प्राप्त विवेक का अनादर ही , यही कार्पण्य दोष है। दिग्भ्रमित हो जाना,... यह भय से भी होता है,., झूठी प्रतिष्ठा को मूल्य मानकर भी होता है। इसीलिए यहाँ लोक ने भगवान राम को आदर तो दिया, पर पूर्ण अवतार कृष्ण को ही माना है, गीता यहाँ हमारे मूल स्वभाव पर सीधा आघात कर रही है। स्पष्ट है, यहाँ अर्जुन भयभीत नहीं है। वह मोहग्रस्त है। अपनी झूठी प्रतिष्ठा के सम्मेाहन में है।
... आज समाज भी मोहग्रस्त है, सुख लोलुपता में है, वह छोटे-छोटे स्वार्थों की पूर्ति को ही बहुत बड़ा मान रहा है,... उसे दूर का नहीं दिखाई पड़ता है। यह दोष अहंकारी की विशेषता है। मध्यकाल में यह दोष राजनैतिक पराभव का कारण बना।
यही कार्पण्प्य दोष है। बुद्धि पर जड़ता छा गई है। विचार ही कुंठित हो गया है। ... अनावश्यक विचारणा का दबाव है। इलेक्ट्रोनिक मीडिया हर मनुष्य की निर्णय क्षमता को प्रभावित कर रहा है। उसका मस्तिष्क एक कचरा पात्र बन गया है। यह कायरता पहीं है, यह सामर्थ्य होते हुए भी अविवेक के आदर की प्रवृत्ति है।
... यह कहने से पूर्व की घटना है-
अर्जुन ने श्री कृष्ण से कहा था-
सेनयोरुभयोर्मध्यं रथं स्थापय मेऽअच्युत ।।1. 21 ।
”हे कृष्ण मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिए-“
.. मेरा रथ - शब्द महत्वपूर्ण है। उसके लिए यहां कृष्ण मात्र सारथी है,... वह अपने अहंकार में है-
परन्तु वही अर्जुन जब दुविधाग्रस्त हो जाता है,... तब कहता है-
मैं आपका शिष्य हूं- आपकी शरण में हूं, मेरे लिए जो भी कल्याणकारी हो वह मुझे स्पष्ट रूप से बताइए-
... गीता की यह भूमिका है...यह संवाद चिंतनीय है। मनुष्य स्वभाव से दिग्भ्रमित है। क्या करना है,... क्या यह नहीं, वह अपना निर्णय बुद्धिचातुर्य से करता है। यही दुख का कारण है। वह हर प्राप्त परिस्थिति का दुरुपयोग करता है। विवेक का अनादर करता है।बुद्धि चातुर्य शब्द महत्वपूर्ण है। इसकी सही पहचान अनिवार्य्र है। जहाँ हम अपने गलत कार्य को गलत जानते हुए भी तर्क के आधार पर न्यायोचित ठहराने का प्रयास करते हैं। आप टी.वी चैनल्स इस प्रवृत्ति को देख सकते हैं।
गीता का संदेश- प्राप्त परिस्थिति का सदुपयोग तथा विवेक का आदर है। विवेक का आदर ही बुद्धि के शत-प्रतिशत शुद्ध होने पर उसे विवेकी बनाता है। विवेकी ही स्थितिप्रज्ञ है। यही सांख्य सोग की उपसंपदा है। सामर्थ्य का सदुपयोग प्रयत्न में सफलता सौंपता है। यही कर्मयोग की उपलब्धि है, यही ज्ञान योग की संपदा है। यही भक्ति की परिकाष्ठाहै।
अशोच्यानन्वशाोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।11।
यहां से श्री कृष्ण,... एक शिक्षक, एक गुरु,... एक अधिष्ठाता की तरह अपना कथन प्रारंभ करते हैं-
प्रायः हमारी दुविधा यही है कि हम दुखी होते हैं, शोकमग्न होते हैं। परन्तु अपने आपको न्यायोचित ठहराने के लिए बड़ी-बड़ी बातें करते हैं।
शोक होने के लिए- पहली बात तो यह है कि उससे जुड़ाव होना आवश्यक है। यह वस्तु मेरी है, यह व्यक्ति मेरा है,... इससे अलगाव हो गया है, यही दुख है। जो मेरा है, उससे ममता, आसक्ति, कामना हो जाती है। वह इच्छा पूर्ति नहीं करता है तो उससे ही दुख होता है, क्रोध आता है, पर जो अपना नहीं है, उसके प्रति कोई भाव जन्मता ही नहीं है।
... अब सवाल होता है जिससे प्रियता है, ममता है, उसके प्रति हमारा क्या लगाव हो? ... क्या आसक्ति उचित है?
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पंडिता।।11।
”पंडितजन, जिनके प्राण चले गए हैं उनके लिए और जिनके प्राण नहीं गए है उनके लिए शोक नहीं करते हैं।“
संसार में कहा जाता है, दो ही बाते हैं, सत और असत। सत का कभी अभाव नहीं होता तथा असत हमेशा परिवर्तनशील होता है। शरीर और शरीरी। देह और देही। क्षर और अक्षर। शरीर तो विनाशशील है, पर जो शरीर में रहता है, उसका विनाश नहीं होता है इसीलिए जो अविनाशी है, उसके लिए शोक करना व्यर्थ है, तथा जो विनाशी है, परिवर्तनशील है वहां यह परिवर्तन स्वभाववश है।
- इसे हम यों समझ सकते हैं- जीवन में अच्छी-बुरी अनेक परिस्थितियां आती हैं, हानि-लाभ, मान-अपमान निरंतर आता है,... यह हमारे बूते का नहीं है। यह तो हमको स्वभाववश मिलता है। प्रारब्धवश है। कोई भी परिस्थिति नित्य नहीं है, वह सदैव परिवर्तनशील है। अतः उसका सामना करना ही सार है। सामना मात्र वर्तमान में रहकर ही हो सकता है। शोक हमेशा अतीत को लेकर होता है। जो गया सो गया। हमारे जीवन की अनेक समस्याओं का समाधान यही है। हम प्रायः जो चला गया है, लौटकर नहीं आता है, उसका बार-बार चिन्तन कर, अपने वर्तमान को ही कलुषित करते रहते हैं। वर्तमान को ही विषाक्त बना देते हैं। सृजनात्मकता का ह्रास हो जाता है। प्रबंधन की क्षमता हमेशा वर्तमान में ही परिलक्षित होती है। साथ ही आज जो सामने कठिनाइयां आ रही हैं, परिस्थितियां विषम है, वे भी भयभीत नहीं कर सकती। क्योंकि यह बोध रहता है कि यह विनाशशील है, परिवर्तनशील है। आज है कल नहीं रहेगी। सामना करने की शक्ति बढ़ती है। आत्मधात का संकल्प अत्यधिक दुःख में भी गिर जाता है। पलायन का गीत नहीं उभरता। भीषण दुःख है, जिसकी कल्पना भी नहीं होसकती, वह चुपचाप आकर आत्मा को गीले कपड़े की तरह निचोड़ जाता है, तभी कृष्ण के शब्द कांपते कदमों के संबल बन जाते हैं।
गीता- कर्मयोग का ग्रन्थ है। यहां पलायन का गीत नहीं है। आज के समय की चुनौतियों का यहां सामना करने का स्पष्ट निर्देश हमें प्राप्त होता है।
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्ण-सुख दुःखदा।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्ति तिक्षस्व भारत।।14।
”इन्द्रियों के जो विषय, मन-बुद्धि, इन्द्रियों और बाह्य विषयों के संपर्क से ही शीत-उष्ण, अनुकूल और प्रतिकूल, प्रिय-अप्रिय, सुख-दुख के अनुभव होते हैं। ये आते-जाते हैं। ये अस्थिर तथा अनित्य है, तुम इन्हें सहन करो, विचलित मत हो।
“
मात्रा-स्पर्शः, जिनसे माप-तोल होता है, जिनसे ज्ञान होता है। उन ज्ञान के साधन इन्द्रियों, मन, बुद्धि, अंतःकरण का नाम मात्रा दिया गया है। इन्द्रियों और अंतःकरण से जिनका संयोग होता है, उनका नाम स्पर्श है। इन्द्रियों तथा अंतःकरण हम जिन बाह्य पदार्थों का ज्ञान होता है, वे मात्रा स्पर्श है।
शीतोष्ण सुख दुःख कार्य है। पदार्थों में सुख-दुख देने की शक्ति नहीं है। वह तो हमारे संबंध जोड़ देने पर होती है।
आगमा पायिनः, ये ठहरने वाले नहीं है, आने-जाने वाले हैं। अनित्य हैं, मात्र पदार्थ ही अनित्य नहीं है, जिनसे उनका ज्ञान होता है, इन्द्रियां और अंतःकरण भी अनित्य है। वे भी परिवर्तनशील है।
इन्द्रियों और बाह्य पदार्थ से यदि सुख मिलता है, तो उसके प्रति राग होता है। यदि दुःख मिलता है तो उसके प्रति द्वेष होता है। सारा जीवन इसी तरह राग-द्वेष से प्रभावित रहता है। तनावपूर्ण बना रहता है। यहां पर यह कहा गया है कि विषय तो रहेंगे,... ज्ञान के साधन भी रहेंगे,... परन्तु जो करना है, वह यही है कि विषयों के प्रति अंतःकरण में जो राग-द्वेष होते हैं, उनसे अप्रभावित रहा जाए। इन्द्रियों द्वारा विषय भोग तो होगा, उससे सुख, दुख भी होगा, हम इन्द्रियों को विषय भोग से दूर नहीं रख सकते,... उन्हें रोकना असंभव है,... परन्तु विषयों के प्रति राग-द्वेष से प्रेरित होकर,... विवेक न खो जाए। ....अंतःकरण में राग-द्वेष का विकार होना ही दोषी है।
मात्रा स्पर्श में भी निर्विकार रहना ही उनको सहना है। इसी को तितिक्षा कहा है। ... यह किस प्रकार संभव है-
यह पूज्य स्वामीजी का यह प्रिय श्लोक था। यही उनकी साधन प्रणाली थी।
यह मात्र एक चिन्तन का या, मनन योग्य सूत्र ही नहीं है।पूरी साधन प्रणाली है। तितिक्षा सहन करना ही नहीं है। जब हम किसी अप्रिय बात को बर्दाश्त करते हैं, तो उसकी छाप हमारे अंतःकरण में अंकित हो जाती है। वही संस्कार रूप में बदल जाती है। यह निरंतर घटता रहता है। हम जहां भी होते हैं, जो भी छोटी से छोटी घटना हमारे सम्मुख होती है, उसका प्रभाव हमारे मन के द्वारा, चिंतन के द्वारा हमारे अंतःकरण में जमा होता रहता है। वह संस्कार रूप में, बीज रूप में इकट्ठा होता रहता है। जब भी अनुकूल वातावरण उसे मिलता है, वह अंकुरित हो जाता है। अचानक मनोकाश पर काली बदली छा जाती है। प्रश्न यह उठता है, इसे बीज बनने से कैसे रोका जाए।
पूज्य स्वामी कहा करते थे, दो बाते हैं, भीतर से जो संग्रह जमा है, संस्कार है वहां निरंतर ब्रह्माण्ड की अनंत लहरों से आघात होते रहते हैं। वहां अंतर्मन है। वह बहुत शक्तिशाली है, वहां भीतर का संग्रह जो जमा है, वह उफान खाकर ऊपर आ जाता है, मस्तिष्क उससे प्रभावित हो जाता है,... हमें यहां बर्फ हो जाना है। बर्फ पर लहरें नहीं बनती, चित्त की वृत्तियां निरंतर उठती रहती है। एक क्षण भी नहीं ठहरतीं। जाग्रत में विचारणा है,... निद्रा में स्वप्न आते रहते हैं। निरंतर विचारणा का ही प्रभाव रहता है। यही तो राग-द्वेष है। राग जो प्रिय प्रभाव अंकित हो गया है। तथा बाहर के जो संवेग हैं,... वे भी निरंतर मात्रा-स्पर्श होने से निरंतर अंतःकरण पर प्रभाव डालते रहते हैं। दोनों तरफ से निरंतर जैसे समुद्र टकरा रहा हो। इन दोनों वेगों को ही सहन करना,... तितिक्षा है।
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के प्रारंभ में ही इस साधना सार की ओर संकेत किया है। अधिकांश ने यह शंका की है कि गीता के दूसरे अध्याय में 11 से 13 तथा 16 से 30 तक के श्लोकों में जहां देह और देही की चर्चा्र है, वहाँ बीच में यह श्लोक कैसे आगया है।देह और देही के बीच का संबंध ही मात्रा स्पर्श है।
... इन वेगों को किस प्रकार सहन किया जाए कि यह संस्कार रूप में राग-द्वेष में परिणित न हो,... मात्र वर्तमान में रहने से ही यह सध सकता है,... यह अनासक्ति या निर्विचारता मात्र चिन्तन के धरातल पर नहीं है। यह विचारणा का विषय नहीं है। ... वर्तमान में रहने का यहां तात्पर्य है कि कर्म के साथ पूरी संलग्नता हो; मन लेश मात्र भी विपरीत नहीं जाने देना चाहिए, मन विपरीत जाता है, चिन्तन करने से। हम देखते हैं, पर इन्द्रियां जहां वस्तु को देख रही है, वहां भी हम सोचते रहते हैं। हम सुनते हैं वहां भी सोचते रहते हैं। इन्द्रियां और मन की एकता नहीं रहती। मन, एक साथ दो काम कर सकता है। हम खाना खाते हुए गाना भी सुन सकते हैं।
... मन को एक ही जगह पर ले आना, एकाग्रता कहा जाता है। पर तितिक्षा उन क्रियाओं, अवस्थाओं में निर्विकारता का पाना है। यहां इन्द्रियां, मन, बुद्धि एकीकृकृत हो जाती है। तब क्रिया के साथ अंतर्मन लग पाता है। जो स्वाभाविक अवस्था कहलाती है। यह निर्विकार भाव ही वर्तमान में रहना है। यहां क्रिया तो हो रही है परन्तु उसके साथ चिन्तन नहीं चल रहा है। वह पहले हो सकता है,... बाद में क्रिया की पूर्णता पर हो सकता है, परन्तु क्रिया के साथ मन का भटकाव नहीं होता है।
...
जब विचार होता है,... तब विचार ही होता है।अन्यथा मन तो रहेगा पर संबंध टूटा रहेगा।
यही वर्तमान में रहने की पहली सीढ़ी है।
भगवान ने गीता के प्रारंभ में ही साधन सूत्र दिया है। कार्पण्प्य दोष, मूढ़ता, हृदय दौर्बल्यम,... आदि जो भी आज के मनुष्य की दुर्बलता है, उसके दुख का कारण है, उसका समाधान इस सूत्र में है,यह मात्र एक चिन्तन प्रधान अवधारणा ही नहीं है। यही वास्तविक साधन सूत्र है।
पूज्य स्वामीजी की साधना प्रणाली का यही आधार रहा है।
इन दोनों प्रवाहों का प्रभाव कैसे कम किया जाए, यही मूल समस्या है। भीतर की हलचल भी अशांत कर जाती है, बाहर का धक्का भी जोरों से लगता है। अंतःकरण निरंतर विकारी बना रहता है। राग-द्वेष का संग्रह ही संस्कार है। वर्तमान में रहने की कला का अभ्यास निरंतर ‘सजगता’ में है, अवेयरनेस, वह भी ‘कॉन्सटेन्ट’,... निरंतर जैसे, नल से पानी की धार गिरती है। एक क्षण भी रूक गयी तो वह बूंद बन जाती है। यही वास्तविक ध्यान है। ध्यान सजगता है। यही क्रिया योग है। यहां मात्र चिन्तन परक कोई अवधारणा नहीं है। भीतर का स्पंदन उठा,... मात्र लहरें है, लहरों को शब्द तक आने से पूर्व, विचार की शक्ल में आना होता है, वहां सजगता रही, आने वाला विचार रुक जाएगा, उसके पीछे आने वाला कुछ दूरी पर ठहर जाएगा।
... वहां निरंतर ध्यान रहे, सजगता बनी रहे,... एक खालीपन, निविचारता आने लगती है। यही पानी का बर्फ हो जाना होता है। बाहर घटना घटी, तुरंत प्रतिक्रिया होती है। टेलीविजन से आ रहे चैनल्स ने मस्तिष्क को कचरा पात्र बना दिया है। संवेग ही संवेग हैं, संग्रह कम होने के स्थान पर जमा होता जाता है। इसे कैसे कम किया जाए। यह कोई घंटेभर आंख मींचकर एकाग्रता से कम होने वाला नहीं है। यह सध जाए, संबंध तो रहेगा, पर संग्रह जमा नहीं होगा, यह संभव हो जाता है-तितिक्षा से, इस वेग को सहन किया जाए। यहां सहन करना, अप्रभावित होने की क्षमता है। पता है, यह अनित्य है, निरन्तर परिवर्तनशील है, मार्ग में मिल गया, पथिक है, चाहे अनुकूल हो या प्रतिकूल, इसके प्रभाव को भीतर नहीं जाने देना है। यह भीतर जाता है, चिन्तन से, उस पर बार-बार सोचने से मात्र क्रिया हो, मन पूरी तरह क्रिया के साथ हो, पर प्रतिक्रिया नहीं हो। विचारणा का दबाव नहीं हो, उसी अवस्था में क्रिया, क्रिया- योग हो जाती है। यहां जीवन और जगत से पलायन नहीं है। इन्द्रियों द्वारा विषयों का संपर्क रोका जाना संभव नहीं है, यह तो स्वाभाविक है। पर उसके द्वारा निरंतर उत्पन्न इस राग-द्वेष के संग्रह को रोका जा सकता है। वह मात्र वर्तमान में रहने से ही संभव है, और इसका साधन है, निरंतर सजगता; कॉन्सटेन्ट अवेयरनेस द्धबनी रहे। तब हम साधन सूत्र को समझ सकते हैं, क्रिया में ला सकते हैं।
भगवान ने दूसरे अध्याय में,... देह और देही के इन ग्यारह से तीस तक श्लोकों के बीच में इस साधन सूत्र को इसीलिए पिरोया है, ताकि आगे जाकर इससे प्राप्त स्थिति, ‘स्थितिप्रज्ञता’ पर वे कह पाएं, ‘स्थितिप्रज्ञता’, साध्य है, वर्तमान में रहना, साधन सामग्री है, जो असाम्प्रदायिक, अजातीय, सार्वभौमिक, सार्वकालिक है। हजारों वर्ष बाद भी यह सूत्र आज की दुनिया के लिए भी उतना ही प्रभावी है, जितना ‘अर्जुन’ के लिए था, जिसने भगवान कृष्ण की शरण में आकर, ‘कार्पण्प्य दोष’ से मुक्ति का उपाय चाहा था।
और महत्वपूर्ण बात यह वैराग्य का पथ नहीं है, यह इसी जीवन में प्रयत्न और पुरुषार्थ की गहरी समझ है जो जीवन में विवेक के आदर से प्राप्त होती है, और हम उसे पाने के लिए अधिकारी हैं।
श्री गुंरु गीताका यह दूसरा अध्याय आज आपकी सेवा में प्रस्तुत हैं।पूज्य स्वामीजी गीता के श्लोकों का आधार बनाकर साधकों के प्रश्नों की समस्याओं का समाधान बताया करते थे। लगभग अट्ठाईस साल का आपका सानिध्य मिला। आप ब्रह्मनिष्ठ गुरु थे, गीता आपकी दृष्टि में शांति, सुख , शक्ति , तथा आधुनिक जीवन की समस्याओं को सुलझााने वाला अद्भुद ग्रंथ है।
उसी दृष्टि को यहॉं निरूपित किया गया हे।
दूसरा अध्याय
क्लैब्यं मा स्म गमःपार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
श्रुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप।।3।।
क्लैव्यं मा स्म गम,... श्रुद्रं हृदय दौर्बल्यं...
गीता में संपूर्ण योजना- व्यथित मन को,दुविधाग्रस्तमन को, संप्रेषित है। अर्जुन योद्धा है,... उसकी मन की यह दुविधा क्यों हुयी,... विद्वानों ने बहुत विवेचना की है। उसके भीतर की ममता,... उसके भीतर के द्वन्द्व को, जो उसके सतोगुणी व्यक्तित्व पर अचानक तमस की छाया के आने से पैदा हुआ,... ममता,... गुरुजनों को लेकर है,... दूसरे कोई और होते तो तो वह लड़ जाता,... पर अचानक ममता,... परिजनों का वध,... उस द्वन्द्व को खड़ा कर देता है, जो आज के मानव मन की समस्या है,।
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कृष्ण उस व्यथित मन से जो गांडीव रखकर, रथ के पिछवाड़े बैठ गया है,... पसीने में नहा गया है, उसका आत्मविश्वास खो गया है,...उसे मार्ग बताते हैं।
आज चाहे, ममता की अपूर्णता पर, उत्साह जनक प्रतिफल के प्राप्त न होने पर उत्पन्न व्यथा हो, , परिस्थितियों की प्रतिकूलता हो, अपमान का भय हो, मनुष्य का मन पराजय की आकांक्षा से या कर्म की व्यर्थता से ऊबकर किसी अरण्य की शरण में जाना चाहता है।संगीत सुनने का नशा, डिस्को में बढ़ती भीड़,तरह-तरह के नशे,बाबाओं के प्रवचन की भीड़ यह सब पलायन ही है। अजीब प्रकार का पोलापन हमारे भीतर व्याप्त है, हम बहुत देर तक कठिन परिस्थितियों का सामना नहीं कर सकते। वह धैर्य हमारे भीतर नहीं है। कहीं न हीं हम युघिष्ठिर के संस्कारों से ग्रसित हैं। सतत प्रयत्न हमारे जीवन का मूल्यवान नहीं बन पाया। हारे को हरिनाम हमें प्रिय लगा है।
यह दुविधा हजारों वर्ष बाद भी आज वैसी ही है,.
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कृष्ण कहते हैं- हे, अर्जुन नपुंसकता को मत प्राप्त हो,... शास्त्र ने मनुष्य को ‘पुरुष’ शब्द की संज्ञा दी है। पुरुष वही है, जो पुरुषार्थ करे,... और मनुष्य वही है, जिसके पास मन-नाम की शक्ति है। अर्जुन की मूल समस्या, उसकी दुविधा है, वह वृहत्तम जीवन मूल्य से जहां यह युद्ध-मानवता की रक्षार्थ या मूल्यों की रक्षार्थ था, वहां वह अचानक अपनी ‘वैयक्तिक’ समस्या से उत्क्रांत हो उठता है। उसके सारे तर्क,... समष्टिगत मूल्यों से हटकर नितांत व्यक्तिगत आग्रह-दुराग्रह तक सीमित हो जाते हैं। व्यक्ति की आज भी यही समस्या है,... वह अपने लिए तथा समाज या परिवार के हित के बीच सामंजस्य नहीं पा रहा है। इस पराजित मन को, दुविधाग्रस्त मन को,... जो वास्तव में आत्मविश्वासी मन है,... जगाने के लिए एक धक्के़े की जरूरत थी,... राख में दबे अंगारे को उठाने की ताकत, इस एक शब्द में है- नपुंसकता को प्राप्त मत हो,... हृदय की दुर्बलता ही आज की सबसे बड़ी समस्या है।
गीता के इस अध्याय को”सांख्य योग की संज्ञा दी गई है। अध्याय में दो विपरीत परम्पराओं को देखकर भ्रम बहुत फैला है। मनुष्य तो एक ही है। उसकी उर्जा का आधार भी एक ही है। फिर विषमता कहाँ है?
जहाँ पुरुषार्थ है, वहीँ सांख्य है। पुरुषार्थ मूल तत्व की ओर ले जाता है। ”सोर्स“, जो कारण है। जो आत्म है, आत्म कोई नपुंसक शक्ति नहीं है। उसे पाना ही स्वधर्म है,और प्रयत्न योग है। विषय , इन्द्रियों और मन के संबंध से निश्चित लक्ष्य की प्राप्ति प्रयत्न से ही प्राप्त होती है। संसार में सफलता प्रयत्न से ही मिलेेगी। यही कर्म योग है। तिलक महाराज ने प्रयत्न को योग का मार्ग मानकर अपना महान ग्रंथ लिखा है। ज्ञानेश्वरी पुरुषार्थ के मार्ग का ग्रन्थ है। जीवन में दोनो ही पथ अपरिहार्य है। यही वैदिक पथ है। दोनो ही मार्ग अविरोधी हैं। हम जिस मनुष्य की कल्पना गीता के आधार पर कर रहे हैं, वह वीतरागी नहीं है, वह कृष्ण के पथ का है, जहाँ सांख्य भी है, योग भी है, कर्म भी है, जगत अपनी संपूर्ण क्रूरताओं के साथ है, परन्तु वह सामना भी कर रहा है, और विजय भी प्राप्त कर रहा है, और दूसरों को दिला भी रहा है। उसके अधरें पर बांसुरी भी है, तो गीता का शंखनाद भी है।
आज की इस दुनिया में जहाँ अनिर्णय ही जीवन का आधार बन गया है। ज्योतिषियों की भीड़, बाबाओं की जमात, इसी दुर्बलता के कारण पोषण पाते हैं। न तो यह हमारी जीवन शैली हे, न हमारा धर्म है, न हमारी संस्कृति हैं
गीता, यहां प्रयत्न को रेखांकित करते हुए ‘कर्मयोग’ का आधार तलाश कर रही है।
‘उतिष्ठ’,... उठो, जागो, अनावश्यक विचारणा का परित्याग करो,... ‘सोचो,... खूब सोचो,... पर विचार जो दृढ़ हो जाए उस पर कायम रहो, उस पर बार-बार मत सोचो,... तभी हृदय की दुर्बलता कम होती है। हम किसी भी प्रकार की साधना करें, अगर हमारा आत्मविश्वास दृढ़ नहीं होता है,... तो वह साधना व्यर्थ है। आज की सबसे बड़ी समस्या, मानव की यही दुविधा है,... वह अनावश्यक विचारणा के दबाव में रहता है, सही निर्णय नहीं ले पाता है। निर्णय हमेशा बुद्धिकी स्थिरता में होता है। विवेक के आलोक में होता है। गीता उस राह पर चलने के लिए संकेत करती है।
कार्पण्य दोषो पहत स्वभावः
पृच्छामि तवां धर्मसंमूढचेताः ।7
”मेरा स्वभाव कृपणता दोष से दूषित हो गया है,... कायरता रूप दोष करके उपह्त स्वभाव वाला अर्थात् मेरी बुद्धि पर जड़ता छा गयी है, जिससे में अपने कर्तव्य के बारे में मूढ़ हो गया हूं।“
... यह कार्पण्य दोष,... अत्यधिक विचारणा से ग्रस्त मनुष्य पर आ जाता है। उसकी निर्णय क्षमता चली जाती है। वह दिग्भ्रमित हो जाता है। क्या करना है, क्या नहीं करना है? वह तय नहीं कर पाता है। यह कायरता दोष नहीं है। ... कायर व्यक्ति के पास तो एक रास्ता होता है, भाग जाए। समर्पण कर दे। जो है वही भाग्य है। मान लो। तुम्हारी जन्म पत्री में काल सर्प दोष है, फलां- फला, उपाय करो, तुम पर कृपा नहीं हो रही है, यह उपाय करो, लूट का बाजार चल पड़ा है,यह कायरों का मार्ग है। हजार साल की गुलामी से पैदा हुई दीनता है। गीता का प्रारम्भ ”लोभ“ को रेखांकित करते हुए हुआ हे। लोभ से दूषित चित्त ही आम भारतीय की पहचान है। भारत की गुलामी का कारण लोभ और मित्र द्रोह ही है। इस दोष से आम भारतीय आज भी ग्रसित है। गीता का प्रारम्भ ही अद्भुद है।
दूसरी हमारी एक और पहचान है, हम बहुत बड़े विद्वान है यही हम मानकर चलते हैं।
उसकी पहचान है, जहां चुनौती तो है,... सामना करने का सामर्थ्य भी है,... पर उत्साहहीनता है। उसका कारण सम्मोह, भय, ममता, करुणा, कुछ भी हो सकता है? हम इसकी पहचान हमारी उस मनोवृत्ति से कर सकते हैं, जिसकी पहचान हम आतंकवादियों के साथ सद्व्यवहार कर बताते हैं। हम वर्षों तक कानून की स्वयं पालना नहीं कर सकतेे हैं। इसके लिए हमें दुःख भी नहीं है। क्यों कि यह हमारा स्वभाव है।
आज समाज इसी ‘कार्पण्प्य दोष’ से ग्रसित है। जानते हैं, समाने अमंगल हो रहा है, अशुभ हो रहा है, परन्तु व्यक्तिगत स्वार्थ से बुद्धि इतनी जड़ हो गई है कि विकल्प सूझता ही नहीं है। प्राप्त विवेक का अनादर ही , यही कार्पण्य दोष है। दिग्भ्रमित हो जाना,... यह भय से भी होता है,., झूठी प्रतिष्ठा को मूल्य मानकर भी होता है। इसीलिए यहाँ लोक ने भगवान राम को आदर तो दिया, पर पूर्ण अवतार कृष्ण को ही माना है, गीता यहाँ हमारे मूल स्वभाव पर सीधा आघात कर रही है। स्पष्ट है, यहाँ अर्जुन भयभीत नहीं है। वह मोहग्रस्त है। अपनी झूठी प्रतिष्ठा के सम्मेाहन में है।
... आज समाज भी मोहग्रस्त है, सुख लोलुपता में है, वह छोटे-छोटे स्वार्थों की पूर्ति को ही बहुत बड़ा मान रहा है,... उसे दूर का नहीं दिखाई पड़ता है। यह दोष अहंकारी की विशेषता है। मध्यकाल में यह दोष राजनैतिक पराभव का कारण बना।
यही कार्पण्प्य दोष है। बुद्धि पर जड़ता छा गई है। विचार ही कुंठित हो गया है। ... अनावश्यक विचारणा का दबाव है। इलेक्ट्रोनिक मीडिया हर मनुष्य की निर्णय क्षमता को प्रभावित कर रहा है। उसका मस्तिष्क एक कचरा पात्र बन गया है। यह कायरता पहीं है, यह सामर्थ्य होते हुए भी अविवेक के आदर की प्रवृत्ति है।
... यह कहने से पूर्व की घटना है-
अर्जुन ने श्री कृष्ण से कहा था-
सेनयोरुभयोर्मध्यं रथं स्थापय मेऽअच्युत ।।1. 21 ।
”हे कृष्ण मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिए-“
.. मेरा रथ - शब्द महत्वपूर्ण है। उसके लिए यहां कृष्ण मात्र सारथी है,... वह अपने अहंकार में है-
परन्तु वही अर्जुन जब दुविधाग्रस्त हो जाता है,... तब कहता है-
मैं आपका शिष्य हूं- आपकी शरण में हूं, मेरे लिए जो भी कल्याणकारी हो वह मुझे स्पष्ट रूप से बताइए-
... गीता की यह भूमिका है...यह संवाद चिंतनीय है। मनुष्य स्वभाव से दिग्भ्रमित है। क्या करना है,... क्या यह नहीं, वह अपना निर्णय बुद्धिचातुर्य से करता है। यही दुख का कारण है। वह हर प्राप्त परिस्थिति का दुरुपयोग करता है। विवेक का अनादर करता है।बुद्धि चातुर्य शब्द महत्वपूर्ण है। इसकी सही पहचान अनिवार्य्र है। जहाँ हम अपने गलत कार्य को गलत जानते हुए भी तर्क के आधार पर न्यायोचित ठहराने का प्रयास करते हैं। आप टी.वी चैनल्स इस प्रवृत्ति को देख सकते हैं।
गीता का संदेश- प्राप्त परिस्थिति का सदुपयोग तथा विवेक का आदर है। विवेक का आदर ही बुद्धि के शत-प्रतिशत शुद्ध होने पर उसे विवेकी बनाता है। विवेकी ही स्थितिप्रज्ञ है। यही सांख्य सोग की उपसंपदा है। सामर्थ्य का सदुपयोग प्रयत्न में सफलता सौंपता है। यही कर्मयोग की उपलब्धि है, यही ज्ञान योग की संपदा है। यही भक्ति की परिकाष्ठाहै।
अशोच्यानन्वशाोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।11।
यहां से श्री कृष्ण,... एक शिक्षक, एक गुरु,... एक अधिष्ठाता की तरह अपना कथन प्रारंभ करते हैं-
प्रायः हमारी दुविधा यही है कि हम दुखी होते हैं, शोकमग्न होते हैं। परन्तु अपने आपको न्यायोचित ठहराने के लिए बड़ी-बड़ी बातें करते हैं।
शोक होने के लिए- पहली बात तो यह है कि उससे जुड़ाव होना आवश्यक है। यह वस्तु मेरी है, यह व्यक्ति मेरा है,... इससे अलगाव हो गया है, यही दुख है। जो मेरा है, उससे ममता, आसक्ति, कामना हो जाती है। वह इच्छा पूर्ति नहीं करता है तो उससे ही दुख होता है, क्रोध आता है, पर जो अपना नहीं है, उसके प्रति कोई भाव जन्मता ही नहीं है।
... अब सवाल होता है जिससे प्रियता है, ममता है, उसके प्रति हमारा क्या लगाव हो? ... क्या आसक्ति उचित है?
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पंडिता।।11।
”पंडितजन, जिनके प्राण चले गए हैं उनके लिए और जिनके प्राण नहीं गए है उनके लिए शोक नहीं करते हैं।“
संसार में कहा जाता है, दो ही बाते हैं, सत और असत। सत का कभी अभाव नहीं होता तथा असत हमेशा परिवर्तनशील होता है। शरीर और शरीरी। देह और देही। क्षर और अक्षर। शरीर तो विनाशशील है, पर जो शरीर में रहता है, उसका विनाश नहीं होता है इसीलिए जो अविनाशी है, उसके लिए शोक करना व्यर्थ है, तथा जो विनाशी है, परिवर्तनशील है वहां यह परिवर्तन स्वभाववश है।
- इसे हम यों समझ सकते हैं- जीवन में अच्छी-बुरी अनेक परिस्थितियां आती हैं, हानि-लाभ, मान-अपमान निरंतर आता है,... यह हमारे बूते का नहीं है। यह तो हमको स्वभाववश मिलता है। प्रारब्धवश है। कोई भी परिस्थिति नित्य नहीं है, वह सदैव परिवर्तनशील है। अतः उसका सामना करना ही सार है। सामना मात्र वर्तमान में रहकर ही हो सकता है। शोक हमेशा अतीत को लेकर होता है। जो गया सो गया। हमारे जीवन की अनेक समस्याओं का समाधान यही है। हम प्रायः जो चला गया है, लौटकर नहीं आता है, उसका बार-बार चिन्तन कर, अपने वर्तमान को ही कलुषित करते रहते हैं। वर्तमान को ही विषाक्त बना देते हैं। सृजनात्मकता का ह्रास हो जाता है। प्रबंधन की क्षमता हमेशा वर्तमान में ही परिलक्षित होती है। साथ ही आज जो सामने कठिनाइयां आ रही हैं, परिस्थितियां विषम है, वे भी भयभीत नहीं कर सकती। क्योंकि यह बोध रहता है कि यह विनाशशील है, परिवर्तनशील है। आज है कल नहीं रहेगी। सामना करने की शक्ति बढ़ती है। आत्मधात का संकल्प अत्यधिक दुःख में भी गिर जाता है। पलायन का गीत नहीं उभरता। भीषण दुःख है, जिसकी कल्पना भी नहीं होसकती, वह चुपचाप आकर आत्मा को गीले कपड़े की तरह निचोड़ जाता है, तभी कृष्ण के शब्द कांपते कदमों के संबल बन जाते हैं।
गीता- कर्मयोग का ग्रन्थ है। यहां पलायन का गीत नहीं है। आज के समय की चुनौतियों का यहां सामना करने का स्पष्ट निर्देश हमें प्राप्त होता है।
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्ण-सुख दुःखदा।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्ति तिक्षस्व भारत।।14।
”इन्द्रियों के जो विषय, मन-बुद्धि, इन्द्रियों और बाह्य विषयों के संपर्क से ही शीत-उष्ण, अनुकूल और प्रतिकूल, प्रिय-अप्रिय, सुख-दुख के अनुभव होते हैं। ये आते-जाते हैं। ये अस्थिर तथा अनित्य है, तुम इन्हें सहन करो, विचलित मत हो।
“
मात्रा-स्पर्शः, जिनसे माप-तोल होता है, जिनसे ज्ञान होता है। उन ज्ञान के साधन इन्द्रियों, मन, बुद्धि, अंतःकरण का नाम मात्रा दिया गया है। इन्द्रियों और अंतःकरण से जिनका संयोग होता है, उनका नाम स्पर्श है। इन्द्रियों तथा अंतःकरण हम जिन बाह्य पदार्थों का ज्ञान होता है, वे मात्रा स्पर्श है।
शीतोष्ण सुख दुःख कार्य है। पदार्थों में सुख-दुख देने की शक्ति नहीं है। वह तो हमारे संबंध जोड़ देने पर होती है।
आगमा पायिनः, ये ठहरने वाले नहीं है, आने-जाने वाले हैं। अनित्य हैं, मात्र पदार्थ ही अनित्य नहीं है, जिनसे उनका ज्ञान होता है, इन्द्रियां और अंतःकरण भी अनित्य है। वे भी परिवर्तनशील है।
इन्द्रियों और बाह्य पदार्थ से यदि सुख मिलता है, तो उसके प्रति राग होता है। यदि दुःख मिलता है तो उसके प्रति द्वेष होता है। सारा जीवन इसी तरह राग-द्वेष से प्रभावित रहता है। तनावपूर्ण बना रहता है। यहां पर यह कहा गया है कि विषय तो रहेंगे,... ज्ञान के साधन भी रहेंगे,... परन्तु जो करना है, वह यही है कि विषयों के प्रति अंतःकरण में जो राग-द्वेष होते हैं, उनसे अप्रभावित रहा जाए। इन्द्रियों द्वारा विषय भोग तो होगा, उससे सुख, दुख भी होगा, हम इन्द्रियों को विषय भोग से दूर नहीं रख सकते,... उन्हें रोकना असंभव है,... परन्तु विषयों के प्रति राग-द्वेष से प्रेरित होकर,... विवेक न खो जाए। ....अंतःकरण में राग-द्वेष का विकार होना ही दोषी है।
मात्रा स्पर्श में भी निर्विकार रहना ही उनको सहना है। इसी को तितिक्षा कहा है। ... यह किस प्रकार संभव है-
यह पूज्य स्वामीजी का यह प्रिय श्लोक था। यही उनकी साधन प्रणाली थी।
यह मात्र एक चिन्तन का या, मनन योग्य सूत्र ही नहीं है।पूरी साधन प्रणाली है। तितिक्षा सहन करना ही नहीं है। जब हम किसी अप्रिय बात को बर्दाश्त करते हैं, तो उसकी छाप हमारे अंतःकरण में अंकित हो जाती है। वही संस्कार रूप में बदल जाती है। यह निरंतर घटता रहता है। हम जहां भी होते हैं, जो भी छोटी से छोटी घटना हमारे सम्मुख होती है, उसका प्रभाव हमारे मन के द्वारा, चिंतन के द्वारा हमारे अंतःकरण में जमा होता रहता है। वह संस्कार रूप में, बीज रूप में इकट्ठा होता रहता है। जब भी अनुकूल वातावरण उसे मिलता है, वह अंकुरित हो जाता है। अचानक मनोकाश पर काली बदली छा जाती है। प्रश्न यह उठता है, इसे बीज बनने से कैसे रोका जाए।
पूज्य स्वामी कहा करते थे, दो बाते हैं, भीतर से जो संग्रह जमा है, संस्कार है वहां निरंतर ब्रह्माण्ड की अनंत लहरों से आघात होते रहते हैं। वहां अंतर्मन है। वह बहुत शक्तिशाली है, वहां भीतर का संग्रह जो जमा है, वह उफान खाकर ऊपर आ जाता है, मस्तिष्क उससे प्रभावित हो जाता है,... हमें यहां बर्फ हो जाना है। बर्फ पर लहरें नहीं बनती, चित्त की वृत्तियां निरंतर उठती रहती है। एक क्षण भी नहीं ठहरतीं। जाग्रत में विचारणा है,... निद्रा में स्वप्न आते रहते हैं। निरंतर विचारणा का ही प्रभाव रहता है। यही तो राग-द्वेष है। राग जो प्रिय प्रभाव अंकित हो गया है। तथा बाहर के जो संवेग हैं,... वे भी निरंतर मात्रा-स्पर्श होने से निरंतर अंतःकरण पर प्रभाव डालते रहते हैं। दोनों तरफ से निरंतर जैसे समुद्र टकरा रहा हो। इन दोनों वेगों को ही सहन करना,... तितिक्षा है।
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के प्रारंभ में ही इस साधना सार की ओर संकेत किया है। अधिकांश ने यह शंका की है कि गीता के दूसरे अध्याय में 11 से 13 तथा 16 से 30 तक के श्लोकों में जहां देह और देही की चर्चा्र है, वहाँ बीच में यह श्लोक कैसे आगया है।देह और देही के बीच का संबंध ही मात्रा स्पर्श है।
... इन वेगों को किस प्रकार सहन किया जाए कि यह संस्कार रूप में राग-द्वेष में परिणित न हो,... मात्र वर्तमान में रहने से ही यह सध सकता है,... यह अनासक्ति या निर्विचारता मात्र चिन्तन के धरातल पर नहीं है। यह विचारणा का विषय नहीं है। ... वर्तमान में रहने का यहां तात्पर्य है कि कर्म के साथ पूरी संलग्नता हो; मन लेश मात्र भी विपरीत नहीं जाने देना चाहिए, मन विपरीत जाता है, चिन्तन करने से। हम देखते हैं, पर इन्द्रियां जहां वस्तु को देख रही है, वहां भी हम सोचते रहते हैं। हम सुनते हैं वहां भी सोचते रहते हैं। इन्द्रियां और मन की एकता नहीं रहती। मन, एक साथ दो काम कर सकता है। हम खाना खाते हुए गाना भी सुन सकते हैं।
... मन को एक ही जगह पर ले आना, एकाग्रता कहा जाता है। पर तितिक्षा उन क्रियाओं, अवस्थाओं में निर्विकारता का पाना है। यहां इन्द्रियां, मन, बुद्धि एकीकृकृत हो जाती है। तब क्रिया के साथ अंतर्मन लग पाता है। जो स्वाभाविक अवस्था कहलाती है। यह निर्विकार भाव ही वर्तमान में रहना है। यहां क्रिया तो हो रही है परन्तु उसके साथ चिन्तन नहीं चल रहा है। वह पहले हो सकता है,... बाद में क्रिया की पूर्णता पर हो सकता है, परन्तु क्रिया के साथ मन का भटकाव नहीं होता है।
...
जब विचार होता है,... तब विचार ही होता है।अन्यथा मन तो रहेगा पर संबंध टूटा रहेगा।
यही वर्तमान में रहने की पहली सीढ़ी है।
भगवान ने गीता के प्रारंभ में ही साधन सूत्र दिया है। कार्पण्प्य दोष, मूढ़ता, हृदय दौर्बल्यम,... आदि जो भी आज के मनुष्य की दुर्बलता है, उसके दुख का कारण है, उसका समाधान इस सूत्र में है,यह मात्र एक चिन्तन प्रधान अवधारणा ही नहीं है। यही वास्तविक साधन सूत्र है।
पूज्य स्वामीजी की साधना प्रणाली का यही आधार रहा है।
इन दोनों प्रवाहों का प्रभाव कैसे कम किया जाए, यही मूल समस्या है। भीतर की हलचल भी अशांत कर जाती है, बाहर का धक्का भी जोरों से लगता है। अंतःकरण निरंतर विकारी बना रहता है। राग-द्वेष का संग्रह ही संस्कार है। वर्तमान में रहने की कला का अभ्यास निरंतर ‘सजगता’ में है, अवेयरनेस, वह भी ‘कॉन्सटेन्ट’,... निरंतर जैसे, नल से पानी की धार गिरती है। एक क्षण भी रूक गयी तो वह बूंद बन जाती है। यही वास्तविक ध्यान है। ध्यान सजगता है। यही क्रिया योग है। यहां मात्र चिन्तन परक कोई अवधारणा नहीं है। भीतर का स्पंदन उठा,... मात्र लहरें है, लहरों को शब्द तक आने से पूर्व, विचार की शक्ल में आना होता है, वहां सजगता रही, आने वाला विचार रुक जाएगा, उसके पीछे आने वाला कुछ दूरी पर ठहर जाएगा।
... वहां निरंतर ध्यान रहे, सजगता बनी रहे,... एक खालीपन, निविचारता आने लगती है। यही पानी का बर्फ हो जाना होता है। बाहर घटना घटी, तुरंत प्रतिक्रिया होती है। टेलीविजन से आ रहे चैनल्स ने मस्तिष्क को कचरा पात्र बना दिया है। संवेग ही संवेग हैं, संग्रह कम होने के स्थान पर जमा होता जाता है। इसे कैसे कम किया जाए। यह कोई घंटेभर आंख मींचकर एकाग्रता से कम होने वाला नहीं है। यह सध जाए, संबंध तो रहेगा, पर संग्रह जमा नहीं होगा, यह संभव हो जाता है-तितिक्षा से, इस वेग को सहन किया जाए। यहां सहन करना, अप्रभावित होने की क्षमता है। पता है, यह अनित्य है, निरन्तर परिवर्तनशील है, मार्ग में मिल गया, पथिक है, चाहे अनुकूल हो या प्रतिकूल, इसके प्रभाव को भीतर नहीं जाने देना है। यह भीतर जाता है, चिन्तन से, उस पर बार-बार सोचने से मात्र क्रिया हो, मन पूरी तरह क्रिया के साथ हो, पर प्रतिक्रिया नहीं हो। विचारणा का दबाव नहीं हो, उसी अवस्था में क्रिया, क्रिया- योग हो जाती है। यहां जीवन और जगत से पलायन नहीं है। इन्द्रियों द्वारा विषयों का संपर्क रोका जाना संभव नहीं है, यह तो स्वाभाविक है। पर उसके द्वारा निरंतर उत्पन्न इस राग-द्वेष के संग्रह को रोका जा सकता है। वह मात्र वर्तमान में रहने से ही संभव है, और इसका साधन है, निरंतर सजगता; कॉन्सटेन्ट अवेयरनेस द्धबनी रहे। तब हम साधन सूत्र को समझ सकते हैं, क्रिया में ला सकते हैं।
भगवान ने दूसरे अध्याय में,... देह और देही के इन ग्यारह से तीस तक श्लोकों के बीच में इस साधन सूत्र को इसीलिए पिरोया है, ताकि आगे जाकर इससे प्राप्त स्थिति, ‘स्थितिप्रज्ञता’ पर वे कह पाएं, ‘स्थितिप्रज्ञता’, साध्य है, वर्तमान में रहना, साधन सामग्री है, जो असाम्प्रदायिक, अजातीय, सार्वभौमिक, सार्वकालिक है। हजारों वर्ष बाद भी यह सूत्र आज की दुनिया के लिए भी उतना ही प्रभावी है, जितना ‘अर्जुन’ के लिए था, जिसने भगवान कृष्ण की शरण में आकर, ‘कार्पण्प्य दोष’ से मुक्ति का उपाय चाहा था।
और महत्वपूर्ण बात यह वैराग्य का पथ नहीं है, यह इसी जीवन में प्रयत्न और पुरुषार्थ की गहरी समझ है जो जीवन में विवेक के आदर से प्राप्त होती है, और हम उसे पाने के लिए अधिकारी हैं।
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