श्री गुरुगीता चौथा अध्याय
सांख्य निष्ठा का अर्थ है, वह तुम्हारे पास ही है, कहीं बाहर जाना नहीं है। उसके लिए कोई प्रयास नहीं करना है। यह बात तर्क से समझ में नहीं आती। हम बचपन से कुछ ना कुछ करते ही रहना चाहते हैं। मेरा हर सवाल यही खत्म होता था, ‘हमें क्या करना है? स्वामीजी ने न सत्संग करा रहे थे, न ध्यान सिखा रहे थे, ... वे अप्रयत्न समझाने की चेष्टा कर रहे थे। यहां भीतर तक संग्रह जमा था। बहुत पढ़ा था, सूचनाएं असंख्य थीं, ...इसका अहंकार था। बिना कुछ किए क्या कुछ पाया जा सकता है। स्वामीजी कहा करते थे- पाना क्या है? यह सवाल ही गलत है। जिसे पाना है, वह तुम्हारी स्वाभाविक अवस्था है, जिसे सहजावस्था भी कहा जा सकता है।
हम पूछते थे, ”आपको कुछ परिवर्तन दिखाई देता है?“
वे हॅंस कर रह जाते थे, ”अभी तो बहुत संग्रह जमा है।“
हम उनसे चाहते क्या हैं, यह भी नहीं पता था, बस एक विश्वास था , वे हमारे साथ हैं, हमारा अशुभ नहीं होगा?एक प्रकार का लोभ था, शॉर्टकट भयमुक्त होने का।
वे यही कहते थे, ‘‘करने की क्या जरूरत है, सिर्फ जानना ही पर्याप्त है। जानते ही सब हो जाता है। शरीर के द्वारा की गई कोई विधि वहां तक नहीं ले जाती। गुरु भी, ईश्वर भी, जो जाना या माना जाता है, वह माया में ही है। वह तो परिवर्तनशील है। केवल सत्य ही सत्य को प्रकट कर सकता है।’’
फिर क्या किया जाए?
स्वामीजी का एक ही उत्तर रहता था। ”वर्तमान में रहने का अधिक से अधिक प्रयास रखा जाए, बस बहुत छोटी सी विधि है।“
‘सांख्य कहता है- जो कुछ भी किया जाता है, वह बाहर होता है, बहिर्मुखता में है, हम जिसे खोज रहे हैैंं, वह भीतर है। वह तो अंतर्मुखी होकर ही पाया जा सकता है, ... भीतर जाने का रास्ता बहुत विरल है, ... वहां कर्म नहीं पहुंचता। वहां अकर्म का सहारा लेना होता है। जहां क्रिया में अहंकार होता है, वहां कर्म बनता है, जहां अहंकार रहित क्रिया है, वहां अकर्म घटता है।
... स्वामीजी कहा करते थे- तेरी इच्छा पूरी हो, जो हो रहा है, उसे होने देना है। सहजावस्था में जहां भी जो घट रहा है, वहां प्रतिक्रिया न हो, प्रायः हम प्रतिक्रिया को ही क्रिया जानते हैं। चाहे दुःख आ रहा है या सुख, दोनों ही स्वीकार है। जो भी घट रहा है, उसके लिए हम राजी हैं। यह कहना सरल हे। बाहर जो घट रहा है, उसे सीरियल की तरह देखते रहो, कोई प्रतिक्रिया नहीं हो। पर क्या हम क्रिया नहीं करेंगे? क्रिया के लिए आप स्वतंत्र हैं, जहॉं क्रिया के साथ मन रहा वहॉं क्रिया स्वतः निर्दोष हो जाती है। परन्तु हम हमेशा प्रतिक्रिया में ही तो रहते हें। क्योंकि हमारा मन वहॉं अत्यधिक सक्रिय रहता है। लगातार विचारणा का दबाग बना रहता है।
‘वीतरागभयक्रोधा मन्मया भामुपाश्रिताः।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मावमागताः।। 4-10
‘राग भय और क्रोध से रहित, अनन्य भाव से मेरे में स्थित वाले, मेरे शरण हुए बहुत से पुरुष, ज्ञान रूप तप से पवित्र हुए मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं।
‘राग-चित्त पर पड़ी हुआ वासना की छाप है, ... विराग होना है, राग के विपरीत विराग होता है, वीतराग... राग से, विराग से दोनों से पार हुआ। उसकी अपनी कोई स्वतंत्र इच्छा नहीं है, जो भी नाटक में रोल मिला है, वह उसे बढ़िया करेगा। उसका कोई चयन नहीं है। आसक्त, विरक्त, तीसरा है अनासक्त। वीतराग का अर्थ हुआ, जो कहीं बंधा हुआ नहीं है। राग को तो भूल जाते हैं, पर विराग का दंश हटाए नहीं हटता है। वह छाया की तरह ग्रहण लगा देता है। यहां तक द्वन्द रहता है। पर जहां वीतरागता है, वहां वह इस द्वन्द से बाहर है। भगवान यहां कह रहे हैं- जो वीतराग हो जाता है, जो मेरे-तेरे के भाव से उठ जाता है, वह मेरे स्वरूप को प्राप्त हो जाता है।
भगवान का स्वरूप है, विराट, ... वह उसी विराट में समा जाता है। पूज्य स्वामी जी कहा करते थे- बाह्यमन का अंतर्मन में लय हो जाता है, अंतर्मन विराट के समीप है। वह उसी में है, ... वह उसी का अंश हो जाता है, तभी उस महान शक्ति का पता लगता है। यही ज्ञान है। वह पलायन में नहीं है। वह काष्ठवत नहीं है।
‘अनन्य भाव से मेरे में स्थिति वाले जो मुझ से अपने आपको भिन्न नहीं मानते। कहाजाता है, ”तेरा तुझको सौंपत क्या लागे मेरा,“ यहॉं जो मेरा था वही तेरा होगया है। यहां संकल्प जो जगा था, उसका भी समर्पण हो जाता है, वहीं अनन्य भाव है, ...मात्र श्रद्धा शेष रह जाती है। ”बीन भी हूॅं तुम्हारी रागिनी भी हूॅं। शरणागति वहीं तक है, जहां दूसरा भी है। पर यहां तो दूसरे का पूरा अभाव हो गया है।
जब तक बाह्य मन सक्रिय रहता है, अहंकार रहता है। मैं बचा रहता है। उसका ‘अंतर्मन’ में लय होना ही समर्पण है। बाह्यमन बहुत उपाय तलाश करता है। वह किसी न किसी बहाने बाहर भटकाता रहता है। उसका अहंकार बाह्य का सहारा पाकर ही खड़ा होता है। भगवान ने इसी श्लोक में- विधि को स्पष्ट भी किया है- साधना, किस प्रकार की हो, जहां ज्ञान का आधार तो हो, पर अहंकार का नहीं।
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।। 4-11
हे, अर्जुन! जो मेरे को जैसे भजते हैं, मैं (भी) उनको वैसे ही भजता हूं। इस रहस्य को जानकर ही बुद्धिमान मनुष्य गण सब प्रकार से मेरे मार्ग का अनुसरण वर्तते हैं-
पूज्य स्वामी जी का यह प्रिय श्लोक था। वे कहा करते थे- ‘ज्ञानी कुछ नहीं करता, पर नहीं करते हुए भी करता है। प्रकृति उसके सारे प्रबन्ध को स्वयं संभाल लेती है। उनके साथ रहकर जाना था, ... मानो अदृश्य सदैव पथ प्रदर्शित कर रहा हो।
... जैसा हम होते हैं, वैसे ही अनुगूंज हमारे पास आती महसूस होती है, इसे बुद्धि के आधार पर स्पष्ट नहीं किया जा सकता है, ... पर वही होता है, घटता है, जैसी आवाज हम में होती है, वैसी ही अनुगूंज हमारे पास आ जाती है, जो चित्र हम बनाते जाते हैं, ... एक कोई महान दर्पण है, ... वह सारी गतिविधियों को वापिस भेजता चला जाता है। हम एक भला कदम आगे बढ़ाते हैं, दूसरी तरफ से उतने ही कदम हमारी तरफ बढ़ते हैं। यही स्थिति अमंगल भावना की भी है। हम जैसा बोते जा रहे हैं, वैसी ही फसल तैयार होती जा रही है।
भगवान कह रहे हैं- जो जिस रूप में मुझे भजता है, मैं भी उसको वैसे ही भजता हूं। स्वामीजी इसे प्राकृतिक विधान कहा करते थे- वे कहा करते थे- प्रकृति में कहीं भी गलत नहीं है, हमें पता नहीं है, ... हमारी अज्ञानता है, बस, लेकिन वहां अन्याय नहीं होता है।
कई महिनों से मैं अशांत था, ... क्यों, पता नहीं, ... संभवतः सभी के प्रति जो भी परिचित रहे, एक अजीब प्रकार की नाराजगी मन में आती रही। स्वामीजी कहा करते थे- मन फिरकनी की तरह है, ... बाह्य का बल लगा वह घूमती जाती है, ... उसके घूमने से विचार पैदा होते हैं, ... विचारों से फिरकनी घूमती जाती है, उसे बल मिलता जाता है, .पर बाह्यका बल हटते ही फिरकनी गिर जाती हैै।.. पर तब यह वाक्य मात्र सूचना ही दे रहा था।
अचानक जब भीतर मुड़ा, अपने आपको देखा, तो पाया, नकारात्मकता का दबाव इतना बढ़ गया है कि बस मन घूमता ही रहता है, वह भी दूसरों के द्वारा आहत किए गए क्षणों के बोझ से।
तब अचानक यह श्लोक सुनाई पड़ा, ... एक अनुगूंज स्वप्न में हुयी।
जो मेरे को जैसे भजते हैं, मैं भी उनको वैसे ही भजता हूं। ... भगवान भजते हैं, वह तो सब जगह है, ... बाहर-भीतर, ... मैं जिसको जिस रूप में देख रहा हूं, वह भी मुझे उसी रूप में देख रहा है। ‘प्रेम न हाट बिकाय, ... मेेरे भीतर का प्रेम का स्रोत सूखता चला गया था। मेरे भीतर वही तो सुनाई पड़ रहा है, जो मैं बाहर देख रहा हूं। मेरा ही सोचा हुआ, मेरा ही देखा हुआ, मेरा ही जाना हुआ, ... सब दिशाओं से मेरेे ही पास तो लौट रहा है।
यह आत्म स्वीकृति गहरी थी।
विराट कोई अवधारणा नहीं है। वह तो सत्य है, जीवन्त। दोष मेरा ही था। मैं मात्र सूचनाओं का संग्रह ही करता रहा। मेरे चेहरे से मेरी प्रसन्नता भी चली गई। एक खिन्नता ही व्याप्त हो गई। मैं मात्र जिन्दगी में जो घटियापन था, उसे ही स्याही सोख्ते की तरह संजोता रहा। प्रकृति ने बार-बार बुलाया ,वहाँ की रमणीयता में भी नहीं खोपाया, मात्र अपने मन में व्याप्त होती लहरों की अनुगूंज ही सुनता रहा। और हर बार हर लहर के साथ तैरता रहा। उसे सातत्य देता रहा। मैं और लहर दोनों एकरस हो गए। मैं ही कंकड़ फेंकता, लहर उठती, उसके साथ दूर तक चला जाता। जब बाहर के हर संवेदन के प्रति तटस्थ होता चला गया। तब जाना- ‘स्मृति पाप क्यों है? भगवान के वचन, अचानक उतरे, भीतर तक उतरते चले गए, मैं उसको वैसे ही भजता हूं।
भजन, हृदय से होता है, वह भी नहीं है। जहां हर लहर के प्रति संग नहीं रहना होता। एक तटस्थता आने लगती है। वहीं दृष्टा भाव है। वह जब जगता है, तब पता लगता है, बाहर कहीं खूंटियां नहीं है। खूंटियां भीतर ही है।
... अब यह जानना मात्र सूचना नहीं थी। यह शास्त्र वचन नहीं रहा। यह मेरा अपना सच था, ... दुःख पाया, क्योंकि बाहर दुःख भेजता रहा। दूसरों के प्रति उपेक्षा रखी, ... वही दुख ही वापिस लौटकर मेरे पास आया। डाक की तरह, रचना जैसे लौटती है। प्रकाशन योग्य नहीं समझी गई।
प्रेम आता ही कैसे, ... दिया कहां था? जो हम देते हैं, ... हमारे पास तो दो हाथ है, पर विराट के करोड़ों हाथ है। हम कितना देंगे, ... क्या दे सकते हैं, पर जब वह विराट लौटाता है, तब यह सचमुच पता नहीं था। वह कई गुना होकर लौटता है।
स्वामीजी कहते थे- हमें प्रकृति के कार्य में सहयोग करना है। प्रकृति ने हरेक को उसकी योग्यता के अनुसार सामर्थ्य देकर भेजा है। यहां उपभोग नहीं, दुरपयोग नहीं, सदुपयोग होना है। जब हम प्रकृति को कुछ सोंपते हैं, ... प्रकृति उदार है, वह नहीं रखती है, वह तो कई गुना लौटा देती है।
आइने में देखता था, ... मेरा चेहरा ही सख्त हो गया है। शरीर में दर्द आ गया है। भीतर क्रोध है। बाहर सबके प्रति क्रोध का भाव उपजता है, अहंकार किसी को अपने पास ठहरने नहीं देता। जाना जो भीतर धुंवा उठ रहा था, वही बाहर भी जा रहा था। जो जब लौटता है, विषाक्त, जहां प्रेम नहीं, मात्र एक उपेक्षा, तब भी यह यहीं जाना कि यह तो मेरा ही धन था, जो बाद में मय ब्याज लौटा है।
बचपन में, मैं आश्वस्त था, न तो इतना ज्ञान था, न ज्यादा सूचनाओं का संग्रह था। बस, जो कुछ कहना है, बाहर परमात्मा है या नहीं पता नहीं, ... पर वह है सुनता है, उससे कह दिया, ... शायद यही प्रार्थना रही होगी, ... बैठा रहता था, ... इतना आश्वस्त था कि मेरे पास उत्तर आएगा। कई बार मंदिर जाता था, ... दूर बैठ जाता था, ... अगर ऊपर का फूल नीचे दाएं गिर गया तो मेरी बात सुनी गई है, अन्यथा नहीं, ... देखता था, ... कई बार फूल उसी आधार पर नीचे आ जाता था, ... बाद में देखता था, जो चाहा था वैसा घट गया, ... क्यों? तब मुझे मेरी प्रार्थना पर भरोसा था। बचपन में घर से दूर था, ... एक संवाद था। जो कहना है, उसे परम परमात्मा से कह दो। धीरे-धीरे, बुद्धि बढ़ती गई, प्रार्थना भी छूट गई। सचमुच वह अनुभूति भी विदा हो गई। भीतर बस एक जला हुआ विषाक्त मन रह गया। जहां बस धुंवा ही उठता था।
जब मन शांत होने लगता है, ... तब उपजता है, उत्तर भीतर से आ रहा है। मैंने लगाई अर्जी, जैसी दाता की मर्जी, ... यही पूर्वाभास है। यह होना है या नहीं, ... स्वतः बोध होने लग जाता है। पर उसके लिए धैर्य चाहिए, ... अपार, भीतर की हर गंदगी के प्रति तीव्र अनुभवन, ... सफाई पूरी हो, कहीं भी वह ठहर जाए, अब उसके प्रति कोई आग्रह नहीं, बस एक तटस्थता, प्राप्त विवेक का आदर, जो गलत माना जा रहा था, ... उसे रोकने में सहायक है, ... वरना कुम्हार के चाक की तरह नए-नए बर्तन हर क्षण बनते चले जा रहे हैं।
न मां कर्माणि लिम्पति न मे कर्मफले स्पृहा।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते।। 4.14
भगवान ने यहां अपने बारे में कहा है- कर्मों के फलों में मेरी कोई स्पृहा नहीं है, इसलिए मेरे को कर्म लिपायमान नहीं करते।
-कर्मों के फल में स्पृहा नहीं है। आकांक्षा ही नहीं है। फल की आकांक्षा हो तो खेल भी कर्म बन जाता है। स्वामीजी कहा करते थे- यहां पाने को कुछ भी नहीं है, ... बस जो अनावश्यक है, उसका छूटता जाना है, परमात्मा ने यह सृष्टि क्यों रची, बस एक खेल है, इससे अधिक नहीं, यह अनादि है, ... चल रहा है, जिस दिन खेल रुक जाएगा, सृष्टि ही रुक जाएगी। परमात्मा जो बस रच रहा है। जो भी रचा हुआ है, वहां वहीं है।
स्वामीजी जब कहते थे- ‘वर्तमान में रहो, तब हम सुन लेते थे। पर रहे तो भविष्य में ही। घूम-फिर कर सवाल अपने भविष्य के सुख का ही पूछते थे। जाना, मात्र सुन लेते थे, ... पर रहते तो भविष्य में ही, या फिर भूत में।
बड़ा मजा है, भविष्य में जिया नहीं जाना। शरीर तो वर्तमान में रहता है पर मन सपनों में खोया रहता है। फल हमेशा कल में आता है। कर्म हमेशा वर्तमान में ही होता है।
पर अगर आज मैंने दुःख को रचा है, तो कल वही हाथ में आएगा। इस सत्य पर विश्वास नहीं था।
हम यही सोचते हैं, ज्योतिषी के पास जाते हैं, वह कहता है आज जो खाली पन है, वह कल भर जाएगा, वह अंगूठी देता है, वह सपने देता है। हम यह भूल जाते हैं। जो आज खाली है, उदास है, वह मात्र सपनों में ही कल अपनी आकांक्षा की पूर्ति देख रहा है। कल जब हिसाब लगेगा तो बस एक बड़ा खालीपन ही हाथ में आएगा।
आज के साथ जीना ही साधना है, ‘कल के साथ जीना मात्र सपनों में होता है। ‘वर्तमान’ ही बहुमूल्य है, भगवान कहते हैं- ‘मेरे भीतर कल की कोई स्पृहा नहीं है।
‘स्वामीजी“, ने चूड़ाला आख्यान पर एक साधना परक वृतांत लिखा था। नाम रखा था- अनंत यात्रा, ... परमात्मा भी क्षणजीवी है। हर क्षण में वह है। अपनी संपूर्ण गहराई के साथ, ... वही क्षण अनंत है। एक क्षण भी अनंत के द्वार खोल देता है। यह यात्रा, ... बाहर नहीं जाती है। जब मन ठहरता है, उसे बाहर जाने का रास्ता नहीं मिलता, तब वह अनंत की ओर मुड़ जाता है। यहीं अंतर्मुखता है। यहां पर बस वर्तमान है, कहीं कोई , कल नहीं है। कोई अगला क्षण नहीं है। अगला हर क्षण, कल में किसी आकांक्षा को लेकर उपजता है।
भगवान कह रहे हैं- जो इस बात को समझ लेता है, वह मेरे स्वरूप को समझ लेता है। वह भी मेरे स्वरूप को पा लेता है।
अनंत का मार्ग क्या है? फल की कोई लालसा नहीं। कोई आकांक्षा नहीं। जो कर रहे हैं, ... बस वही है। कर्म ही पर्याप्त है, ... कर्म बस एक खेल बन जाए।
‘वर्तमान’ क्या है, ... एक तेजी से फिसलता क्षण, जहां भविष्य हर पल भूत में बदल जाता है। हम उसे पकड़ नहीं पाते, ... उसका साक्षी होना कठिन है। परमात्मा का वर्तमान अनंत है, पर हमारा, ... हमें इसी क्षण में हो रहे कार्य को ही साथ लेकर वर्तमान में रहना सीखना होगा। क्रिया तो है, पर उसके साथ कोई चिन्तन नहीं है। कोई फलाकांक्षा नहीं। कोई स्पृहा नहीं। जो भविष्य की ओर ले जाती है, वह स्थगित, तब मात्र वर्तमान बच जाता है। वहां कर्म तो है, ... पर मन वहां निष्क्रिय है, और जो शक्ति कर्म करा रही है, वह सजग है, ... भीतर का कोलाहल ही भविष्य की ओर झांकने को निरंतर धकेलता रहता है।
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणोे गतिः।।4.17
कर्म की गति अगाध है, ...
भगवान ने इसके पूर्व कहा है, कर्म क्या है, अकर्म क्या है, ऐसे इस विषय में बुद्धिमान पुरुष भी मोहित होता है।
जहां हम प्रतिक्रिया में होते हैं, दूसरे से संबोधित होते हैं, वहां त्मंबजपवद होता है। वह प्रतिकर्म है। कर्म वही होता है, जो दूसरे को केन्द्र में रखकर नहीं किया जाता है। यहां स्वामित्व अपना है। असमर्थता अकर्म नहीं है। अकर्म है- जहां भीतर का कर्ता मात्र साक्षी है। उसका अहंकार तिरोहित हो गया है। कर्म सहजावस्था है। दूसरे की प्रतिक्रिया में नहीं है। निषिद्ध कर्म वे हैं, जो करने योग्य नहीं है।
कौन है, जो, जो भी मिल जाए, जो चाहना है, वह पूरी हो जाए फिर भी असंतुष्ट रहता है कुछ ना कुछ मांग बनी रहती है? क्या मैं तो वह नहीं हूॅं?
पूज्य स्वामीजी कहा करते थे- ‘मैं कितना तुम्हें संतुष्ट करने की चेष्टा करूं पर मांग तो कभी किसी की पूरी होती नहीं है, रोज नई मांग कौने में उठ खड़ी होती है।
जो मिले, उससे संतुष्ट हो जाए, कोई नई लहर नहीं,... तो चित्त ही विदा हो जाताहै। चित्त का स्वभाव है नई-नई मांग पैदा करते रहना। मिलते ही किसी दूसरी मांग को खड़ा कर देना। चित्त तो सदा से ही असंतुष्ट है, ... असंतोष के साथ ही मन खड़ा होता है। संतोष के आते ही चित्त विदा हो जाता है। होना यही चाहिए मांग कम से होती जाए, जो पूरी हो रही है, वहां संतोष हो, जो पूरी होने वाली नहीं है, उनका पता अपने आप लग जाता है, उन्हें छूट जाने दें। जहां अपेक्षा है, वहां असंतोष है। जो मिल गया, वही बहुत है। पर होता विपरीत है, जो नहीं मिला है, उसके लिए मन भटकता रहता है, जो मिल गया है, उसको देखने की भी फुरसत नहीं होती है।
भगवान कहते हैं- जो मिल जाए उसमें जो संतुष्ट है, तथा द्वन्द से पार है जो , द्वन्द से पार होना कठिन है। यह मन का स्वभाव है। वह दो काम एक साथ कर सकता है। वह स्वयं दुश्मन को खड़ा कर सकता है, उसके साथ तर्क- वितर्क कर सकता है। वह उसकी भाषा भी बना सकता है, उसे भी तर्क दे सकता है। खुद का बचाव भी कर सकता है। यही द्वन्द है।
मेरे पांव में दर्द था। घर से बाहर खड़ा था एक नीम हकीम आ गया। वह दर्द की दवा के लिए कह रहा था। उत्सुकता जगी। उसने पांव देखा। बोला, पिंडली में खून जमा है। आप कहो तो देख ले। दर्द बहुत था, ... दिखा दिया, ... उसने एक यंत्र निकाला, ... फिर एक पैकेट जिसमें ‘स्टरलाइज नीडिल थी, ... हल्का सा पंच किया, ... पंप लगाया, जब हटाया तो वहां पर खून की बूंदें आ गईं थी, ... उसने, कंेची से, उन बूंदों को हटाया, ... मक्खन की तरह कुछ वहां था, ... बोला, यह जमा हो गया है, निकाल दिया है।
पाया, दर्द वहां नहीं था, ... पांव जो भारी था, ... हल्का हो गया था। पर मैं उसे धन्यवाद भी नहीं दे पाया। तत्काल मन ने कहा, यह कोई गड़बड़ तो नहीं हो गई, ... कुछ और बीमारी हो गई तो, मन ने जो किया था उसका दूसरा हिस्सा पूरी ताकत से खड़ा हो गया था। वह कह रहा था- टिटनेस का इंजेक्शन लगवा लंे, ... अगर आप पूरा पंच करवालेंगे, ... तो फिर कभी दर्द नहीं होगा, पर मन अब पूरी तरह से जो हुआ उसके विरोध में आ चुका था, ... टिटनेस का इंजेक्शन लगवा लिया। वह दूसरे दिन भी आया। दर्द कैसा है, वह बार-बार पूछता रहा। पर मन अब उसके विरोध में जा चुका था।
जाना मन कभी भी एक तरफ सौ टका खड़ा नहीं होता। एक हिस्सा निरन्तर दूसरे के विरोध में खड़ा रहता है। यही द्वन्द्व है। जाना मैं हमेशा दो रास्तों पर चलता रहा हूं, एक मन होना चाहता हूॅं, मुश्किल यही है, वह जो दूसरा है, वह और मजबूत हो जाता है।
भगवान कहते हैं- ‘
यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते।ं4.--22
”अपने आप जो कुछ प्राप्त हो उसमें ही संतुष्ट रहने वाला,हर्षादि द्वंद्वों से अतीत हुआ, ईर्ष्या से रहित,सिद्धि और असिद्धि में समत्व भाव वाला पुरुष कर्मों को करके भी नहीं देखता है।“
द्वन्द्वातीत, द्वन्द्व से बाहर, जो दो, के बाहर होता है, वही कर्म के बंधन से मुक्त होता है।
स्वामीजी कहा करते थे- थिंक वन्स डीसाइड वन्स, नेवर हेव ए सैकन्ड थॉट...
....एक बार सोचो, निर्णय करो, ... फिर दुबारा मत सोचो। पर जाना, निर्णय के बाद भी विचारणा का वेग तेजी से आता है। आक्रमण सा हो जाता है। निर्णय करने वाला मन, अपने बचाव में हारता, टूटता सा रहता है। तो फिर मन तो द्वन्द्व से बाहर नहीं आ सकता, ... फिर जो मन से बाहर है, जो मन को भी जानता है, वही हो सकता है। जहां तक विकार है। वे द्वन्द्व के भीतर ही हैं। लेकिन जो साक्षी हैं, दृष्टा हैं, वह बाहर जा सकता है।
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाक्ष्च यतयःसंशितव्रताः।।4-28
दूसरे ईश्वर अर्पण बुद्धि से द्रव्य लगााने वाले हैं।वैसे ही कई पुरुष स्वधर्म पालनरूप तपयज्ञ को करने वरले हैं।कई अष्टांगयोगरूप योग को करने वाले हैं। दूसरे अहिंसा तीक्ष्ण व्रतों से युक्त, ,यत्नशील पुरुष भगवान के नाम का जप, तथा भगवत प्रप्ति विषयक ग्रन्थों का अध्ययनरूप ज्ञानयज्ञ करने वाले हैं।
भगवत् प्राप्ति विषयक शास्त्रों का अध्ययन रूप ज्ञान यज्ञ करने वाले हैं।
स्वाध्याय यज्ञ- स्व और अध्ययन। स्वयं का अध्ययन। स्वाध्याय का अर्थ है। रमण महर्षि की यही साधना थी। वे कहा करते थे- ‘अपने आपको जानो।’ दूसरा कोई हमारे बारे में नहीं जान सकता। हमारा व्यवहार भी बुद्धि से संचालित होता है। वहां बाहर जो भी है, एक पर्दा होता है। हम ही अपने आपको जान सकते हैं।
सच है, हम भी कभी अपने भीतर नहीं जाते। डर लगता है। तत्काल मन दूसरों को बीच में ले आता है। दृश्य का चिन्तन प्रारंभ हो जाता है। हम दूसरों से अपने बारे में जानना चाहते हैं। उनके द्वारा दिए गए निष्कर्षों को सामने लाते हैं। बहुत ही कठिन होता है, अपने आपको अकेले में ले जाना, और फिर भीतर की सीढ़ियां उतरना।
अपने बारे में अपनी सही पहचान ही, आत्मविश्वास पैदा करती है। मुझ पता है मैं क्या हूं, क्या मेरे दोष हैं, क्या गुण हैं? दुनिया मेरे बारे में कुछ भी सोचती रहे, कहती रहे, मैं कहीं भी प्रतिक्रिया में नहीं हूं। न मैं प्रतिकर्म में हूं, न निषिद्ध कर्म में हूं, ... मैं मात्र अकर्म में हूं। स्वाभाविक अवस्था में हूं।
पर होता इसके विपरीत है। मैं भी अपने बारे में जो बाहर से जाना गया है। उतना ही जान पाता हूं। स्वाध्याय का अर्थ है, दर्पण के सामने में ही हूं। दूसरों ने मेरे बारे में क्या सोचा है, सोच रखा है, यह मेरे लिए व्यर्थ है, ... मेरी पहचान है, ... जहां मैंने अपने ऊपर पत्थर रख रखा है, वह है दमन का, ... मैं तो मात्र कठपुतली हूं, नचाने वाला मेरा संग्रह है, संस्कार है। उसे मैं नहीं जानता, अगर भूले-भटके, ... स्वप्न में भी वह विचारणा आती है, तो मैं उसे सीधे नहीं देख पाता, ... तुरंत दबाने का प्रयास करता हूं। जाना मेरे भीतर क्रोध बचपन से ही दबा पड़ा था, ... सांप की तरह वह मौके ब मौके फन लेकर खड़ा हो जाता था। जाना, मैं ही क्रोध हूं। भीतर भय था, ... हर नई आने वाली परिस्थिति से भय। पूज्य स्वामीजी ने पत्र में लिखा था- ‘तुम्हारे भीतर आत्मविश्वास की अत्यधिक कमी है, भविष्य में ऐसा नहीं होगा, “... मैं नहीं जान पाया, ... वे भीतर तक दबी राख को हटा रहे थे।
स्वाध्याय का दूसरा कदम अपने आपको, अपने आप में खोलते जाना है। जाना, अपने आपको अकेले में ले आना ही ध्यान में उतरने की पहली तैयारी होती है। क्योंकि हम सुबह से शाम तक जहां बाहर दूसरों के साथ होते हैं, वही सपनों को भी दूसरों को साथ ले आते हैं। अकेलापन, ... एकान्त, जहां भीतर भीड़ नहीं हो। सिर्फ आप हैं, ... तब भीतर का कपाट खुलता है। वहां मेरा भय था, ... क्रोध था, दमित, एक ठोस रूप ले चुका था।
... यह जानना ही, सीधा साक्षात्कार ही, प्रगति का पथ होता है। हम जिसे छोड़ना चाहते हैं, वह स्वतः छूटता जाता है। यह परिवर्तन बाहर तक आ जाता है। हमारी जो छवि बाहर हमने दिखा रखी है, वह भी टूटने लगती है। सहज स्वाभाविक अवस्था में हम आ जाते हैं।
भीतर मन जो हमेशा सक्रिय रहता है, ... वहां अब विचार के उठते ही, उसके संग जाने की, साहचर्य देने की आदत पर विराम भी लगना शुरू होता है। तब भीतर जो अकेलापन है,वह सघन होने लगता है। जैसे गर्मी में कंबल ओढ़ रखा हो, तो पसीने में शरीर नहा जाता है, उसी प्रकार भीतर स्वाध्याय की गर्मी होती है। बाहर के अनावश्यक बोझे अपने आप उतरने लग जाते हैं।
जाना, अपने विकारों को लेकर सत्य के सामने नहीं जाया जा सकता है। विचार ही विकार हैं। विचार झड़ने लगते है, तो विकार भी गिरने लगते हैं। स्वाध्याय ही वह पथ है, ... जो बाहर दिखाई नहीं पड़ता, पर सीधा भीतर की यात्रा पर ले जाता है। यहां जानना ही प्याज के छिलकों का उतरते जाना है।
इसी श्लोक में स्वाध्याय यज्ञ के साथ पूरक विधि आई है। ‘ईश्वर-पथ’ ... स्मरण बना रहे। स्वाध्याय- परमात्म ज्ञान विषयक ग्रन्थों का अध्ययन भी है। परन्तु भगवान ने जिस विधायी विधि का संकेत दिया है, ... वह परमात्मा के प्रति निरंतर स्मरण का भाव। जीवन का उद्देश्य- ‘परमात्मा की महान शक्ति का इसी जीवन में अनुभव प्राप्त करना है, ... यही सुमिरन है। ‘वह’ है। इस्लाम में पांच बार नमाज़ की जाती है। भले ही पांच मिनट की हो। पर उसकी याद का अहसास हमेशा बना रहे।
तपोयज्ञाः
स्वधर्म पालनरूप तप यज्ञ करने वाले हैं।
‘स्वधर्म का सत्य क्या है? मुझे क्या करना है? यह सवाल जन्म से उत्तेजना देता रहा। ज्योतिषी से यही पूछते हैं, ... सफलता कहाँ मिलेगी, ... प्रायः अनुसरण में जीवन चला जाता है। पीछे मुड़कर देखों तो यही पता लगता है, ... बाहर की दुनिया में भले ही सफलता मिली हो, पर भीतर अशांति है, एक खीझ हैं।
... तो जाना.... कहीं गाड़ी पटरी से नीचे उतर गई है। जब प्राध्यापक था, तब एक ही शौक था खूब पढ़ा जाए, ... पर तब सामाजिक, आर्थिक दबाव तंग करने लगे, प्रशासनिक सेवा में आ गया। पर वहां प्राप्त सफलताओं के बीच, जिम्मेदारी पूरी होने के साथ ही फिर भी भीतर अशांति बढ़ती रही, ... तब जाना, कहीं स्वधर्म के पथ से रास्ता विलग हो गया है। छूट गया है।
क्योंकि हर यात्रा की उपलब्धि आनंद है। संतोष है। वह जीवन में नहीं है, तो जीवन व्यर्थ है।
जाना, ... जो हो गया है, वह होना ही था। वह भी अनेक जन्मों का संकल्प था, ... सब अपने आप होता गया। पर अब जब जिम्मेदारियां पूरी हो गई है, ... तब अशांति क्यों? तनाव क्यों? अब तो पुनः सही रास्ते पर आया जा सकता है। जाना तब स्वधर्म की खोज केन्द्रस्थ हुई।
स्वामीजी कहा करते थे, जिस कार्य को करने में शांति मिलेे, संतोष मिले, भीतर प्रसन्नता का भाव उठे, ... वही रास्ता है। दूसरों की देखा-देखी मत करो। अपनी आवश्यकता को खुद समझो, सामर्थ्य प्रकृति ने सोंपा है। जो कार्य पूरा होना है, अपने आप होगा, नहीं होना है तो भीतर से प्रेरणा आती है। पर हम अनसुना कर जाते हैं। दूसरे कहते हैं- आपने पूरा प्रयास नहीं किया। थका डालते हैं। इससे हताशा आती है। स्वधर्म की पहचान अपने आप होती है।
जाना, ... अनुभव हुआ। जब अपने घर की तरफ आया, ‘‘लौटकर आया आज मैं द्वार पर, ...तो भीतर सब के प्रति अनुग्रह का भाव जगा। भीतर एक प्रेम जगा। समग्रता में स्वीकारने का भाव जगा।
अपि चेदसि पापेम्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः।
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं संतरिष्यसि।।4-36
”यदि तू पापियों से भी अधिक पाप करने वाला है, तो निसंदेह ज्ञान रूपी नौका से तू पार हो जाएगा, जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधन को जलाकर राख कर देती है, उसी प्रकार ज्ञानाग्नि, संपूर्ण कर्मों को भस्म कर देती है।
स्वामीजी के यहां, किसी व्यक्ति के ,किसी प्रकार के, किसी के बाह्य आचरण को लेकर कोई चर्चा नहीं हो पाती थी, ... कई बार उनके नीतिगत व्यवहार को लेकर लोग आलोचना भी करते थे। पर उनके पास एक ही उत्तर रहता था- बस मौन। वे नैतिक दृष्टि से किसी के व्यवहार की आलोचना नहीं करते थे, ... हां ज्ञान की एक झलक, अंधेरे को, अज्ञान को हटा देती है। वह उसे रास्ते पर जाने को कहते थे, संस्कार जो भीतर संग्रह है, वह कोई वस्तु नहीं है, मात्र स्पंदन है, ... कर्म भाव रूप में ही जमा होते हैं। जो जमा होने का आधार होता है, वही उनके विसर्जन का भी बन सकता है। यह संग्रह जमा होता रहता है, अज्ञान से। ज्ञान का आगमन, अज्ञान का तिरोभाव है।
ज्ञान से संस्कार निर्मिति क्षय होती हैं। अज्ञान जो संस्कार का जनक है, उसके समाप्त होते हैं, यह प्रक्रिया रूक जाती है। अज्ञान ही संग्रहित करता जाता है। फिर कल्पना के सहारे से हर स्पंदन, विचार में तथा विचार से कर्म में ढलता जाता है। नई-नई कामनाएं पैदा होती जाती है। अज्ञान की स्मृति तथा अज्ञान की कल्पना, दोनों के बीच का सेतु वर्तमान है, वह यहां खो जाता है। जब आप वर्तमान में रहने लगते हैं, तब यह पुल पर होता हुआ प्रवाह रूक जाता है। वर्तमान, निरन्तर भविष्य को अतीत में बदलता जाता है। यहां अगर साक्षी भाव जग गया, ... तो वह प्रवाह रूक जाता है। यह तत्क्षण होता है। भगवान ने कहा है- ‘क्षिप्रं भवति धर्मात्मा’। ज्ञान के प्रकाश में अंधेरा अपने आप सरक जाता है। जहां अंधेरा है, वहां भय है, वहां मोह है, वहां अज्ञान है। जहां ज्ञान है, वहां मैं भाव चला जाता है। वहां अहंकार चला जाता है। वहां संस्कार बनने की प्रक्रिया अपने आप रूक जाती है।
‘स्वामीजी कहा करते थे- ज्ञानी भी कर्म करता है, पर वह नहीं करता हुआ भी करता है, उस पर दायित्व नहीं होता, प्रकृति उसे यंत्र की तरह चलाती है। वहां अहंकार नहीं होता।
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति
नायं लोको ऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः। 4-40
”संशययुक्त पुरुष के लिए न तो सुख है न यह लोक है न परलोक अर्थात यह लोक और परलोक दोनों ही उसके लिए नष्ट हो जाते हैं।“
भगवान कह रहे हैं- संशय से भरा हुआ व्यक्तित्व विनाश को प्राप्त हो जाता है। संशय पैदा होता है, मन में। एक दुविधा सी बनी रहती है। अनिर्णय। द्वन्द। निर्णय सही किया या गलत। संशय आत्मा में नहीं हो सकता। वह तो मन में ही होता है, लेकिन जो मन के ही धरातल पर है, मन में ही उलझा हुआ है, जिसकी यात्रा बहिर्मुखता में है, वह आत्मा शब्द का प्रयोग तो कर सकता है, पर वह उसे जानता ही नहीं है। आत्मानुभव उसका है ही नहीं। वह मन को ही ”माम“ मानता है। अहंकार ही उसका स्वरूप हो जाता है।
भगवान कह रहे हैं, ऐसा व्यक्ति मन को ही आत्मा मानने वाला विनाश को प्राप्त होता है। क्योंकि मन, संशयात्मक है, कोई निश्चय नहीं। कांपता हुआ हाथ। वहां आत्मविश्वास अपने आप गिर जाता है। अनिर्णय बना रहता है। दूसरा ही धकेलता है।
मेरा स्वयं का ‘मन’ ऐसा ही है। यह जाना। एक बात पर ठहरता नहीं। निर्णय होने के बाद भी विकल्प खुला रहता। पूज्य स्वामी जी का पत्र बार-बार पढ़ता रहा- ‘आत्मविश्वास की अत्यधिक कमी है, क्यों? भीतर मन निरंतर द्वन्द में रहता है। संशय ग्रस्त है। उन्होंने कहा था, एक बार सोचो बार-बार नहीं, निर्णय लो, ... पर आप्त वाक्य आचरण में नहीं आ पाया था। बार-बार कांपते हाथ से लोटा उठाता, ... लोटा गिर जाता। प्रयोग किया, ... भीतर के कंपन को जानने का प्रयास किया, ... हाथ थिर हुआ, ... तब जाना, भीतर की स्थिरता आते ही, मन का यह या वह में निरन्तर भटकाव रूक जाता है। निर्णय हो गया, जो होगा, देखा जाएगा। सीना खोलकर सामना करेंगे, बस।
जाना, स्वयं की असफलताओं, तथा दुःखों के बीच जाना, चित जब संशय में भर जाता है, तब विनाश ही प्राप्त हुआ। शुरू-शुरू में निर्णय गलत भी हुए, ... पर उससे आत्मविश्वास डिगा नहीं। मैं ही जिम्मेदार हूं, यह बोध ताकत दे गया।
स्वामी जी कहा करते थे, ... किसी भी व्यक्ति का पतन मात्र उसके अनिर्णय से होने लगता है।यही कार्पण्य दोष है। कुछ करेगा, ...तो सही होगा या गलत, ... दोनों ही स्थितियों में उसकी शक्ति क्रियारत रहेगी। पर अकर्मण्य का तो कोई भविष्य ही नहीं होता है।
संशय से भरे चित्त की सबसे बड़ी कठिनाई, वह स्वयं होता है। अवसर आता है। जीवन में अवसर एक या दो ही आते हैं। पर संशयग्रस्त तब सोचता ही रह जाता है, अवसर उसे ही छोड़कर चल देता है।
तस्मादज्ञानसंभूत हृत्स्थं ज्ञानसिनात्मनः
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत।।4-42
हृदय में स्थित इस अपने संशय को ज्ञान रूप तलवार द्वारा छेदन करके- भगवान, इस संशय से मुक्ति का उपाय बता रहे हैं-
‘समत्व बुद्धि रूप योग को पाकर-संशय को ज्ञानरूपी तलवार से काट डाल।
संशयात्मा विनाश्यति, ... जो संशयग्रस्त है, उसका विनाश होता है। फिर अपनी इस अनिर्णय की स्थिति से कैसे बाहर आ जाए। पहले आदत हो गई थी- ताले को लगाकर, दुबारा जांचता था, कहीं खुला तो नहीं रह गया। अपने ऊपर भरोसा नहीं आ पाया था। चाबी कार की कार में ही रह गई, ... बाहर गेट बंद कर दिया। लॉक हो गई। कर्म और मन की युति नहीं थी। सब मानो यांत्रिक होता हो। स्वामीजी ने टोका था- बोले जहां शरीर हो वहां मन को रखो, बस इतनी सी साधना है। अनावश्यक सोचना बंद करो, आदत तुम्हारी है, ... तुम आदतों के गुलाम नहीं हो। जिसे तुमने बनाया है, तुम उसे हटा सकते हो। संकल्प लो बस।
समता का अर्थ है- जहां द्वैत गया। यह या वह गया। यहां आत्मकृपा उपजती है। आत्मविश्वास घना होता है। एक तटस्थता भीतर आती है। जिसे आप साक्षी भी कह सकते हैं। वहां सजगता पैदा हो जाती है।
बुद्धि जब शत-प्रतिशत शुद्ध हो जाती है, तब विवेक जगता है। विवेक का जागरण मात्र उसका आदर होता है। वह आकर जब मार्ग प्रशस्त करता है, वहां सामर्थ्य का सदुपयोग होना शुरू हो जाता है।
बुद्धि समता को तभी प्राप्त होती है, जब वह ‘निश्चयात्मक’ होती है। उसका डांवाडोल होना रुक जाता है, न वह पाप में है न पुण्य में, न सत में, न असत में, द्वन्द्व से पार चला जाता है, वहां मात्र साक्षी बचा रहता है।
... तब विवेक जगता है। पूज्य स्वामी जी कहा करते थे- ‘बिनु सत्संग विवेक न होई, ... सत्संग, ... निरन्तर स्वाध्याय से प्राप्त उपलब्धि है, जब हम अपने ‘स्व’ से जुड़ जाते हैं। पराश्रय पूरा चला जाता है। वहीं आत्मकृपा है। यह विवेक एक तलवार है। वही संशय को काट देता है। क्योंकि वहां बुद्धिस्थिर होते हुए विवेक में ढल गई है। उसका डांवाडोल रहना छूट गया है। वही ज्ञान की तलवार है। जब बुद्धि शत-प्रतिशत शुद्ध होती है तब वह विवेक में ढल जाती है। तब ज्ञान का उदय होता है, जहां बुद्धि डांवाडोल होती है, वहां अज्ञान उपजता है।
संभवतः तीस साल तक मैं बस सवाल ही पूछता रहा।
संभवत, एक सिद्ध गुरु के पास रहकर, ... नदी पर घाट के पत्थर की तरह भीगता हुआ भी सूखा ही रह गया।
वे कहा करते थे- एक ही बात को बार-बार क्यों पूछते हो?
क्या, संशयग्रस्त मन था, ... बुद्धि डांवाडोल थी। यह विश्वास ही नहीं था, कि जाना किधर है, ... ‘परधर्म’ का लोभ, उसका अनुसरण, स्वधर्म से वंचित करता जा रहा था, ... प्रश्न भी मात्र जिज्ञासा पूर्ति के लिए थे, ...” पर आज जब, लौटकर आया आज में द्वार पर, खड़ा-खड़ा पूछता, कि बाहर ही रहू, या भीतर चलूं,“ ... तो संशयग्रस्त मन फिर टोकता है, ... रोकता है, ... तब श्री भगवान की गीता, फिर द्वार पर आकर यही कहती है जो भगवान ने अर्जुन से कहा- ‘‘संशय को ज्ञान रूप तलवार से काट डाल, काट डाल, अब बाहर को प्रणाम कह, जिधर मुंह किया था उधर पीठ कर, जहां पहले पीठ थी, उधर मुंह कर ले, बस, ... जाना कहीं नहीं है। रास्ता वहीं है। बस दिशा ही बदलनी है। तू चल तो सही।
सांख्य निष्ठा का अर्थ है, वह तुम्हारे पास ही है, कहीं बाहर जाना नहीं है। उसके लिए कोई प्रयास नहीं करना है। यह बात तर्क से समझ में नहीं आती। हम बचपन से कुछ ना कुछ करते ही रहना चाहते हैं। मेरा हर सवाल यही खत्म होता था, ‘हमें क्या करना है? स्वामीजी ने न सत्संग करा रहे थे, न ध्यान सिखा रहे थे, ... वे अप्रयत्न समझाने की चेष्टा कर रहे थे। यहां भीतर तक संग्रह जमा था। बहुत पढ़ा था, सूचनाएं असंख्य थीं, ...इसका अहंकार था। बिना कुछ किए क्या कुछ पाया जा सकता है। स्वामीजी कहा करते थे- पाना क्या है? यह सवाल ही गलत है। जिसे पाना है, वह तुम्हारी स्वाभाविक अवस्था है, जिसे सहजावस्था भी कहा जा सकता है।
हम पूछते थे, ”आपको कुछ परिवर्तन दिखाई देता है?“
वे हॅंस कर रह जाते थे, ”अभी तो बहुत संग्रह जमा है।“
हम उनसे चाहते क्या हैं, यह भी नहीं पता था, बस एक विश्वास था , वे हमारे साथ हैं, हमारा अशुभ नहीं होगा?एक प्रकार का लोभ था, शॉर्टकट भयमुक्त होने का।
वे यही कहते थे, ‘‘करने की क्या जरूरत है, सिर्फ जानना ही पर्याप्त है। जानते ही सब हो जाता है। शरीर के द्वारा की गई कोई विधि वहां तक नहीं ले जाती। गुरु भी, ईश्वर भी, जो जाना या माना जाता है, वह माया में ही है। वह तो परिवर्तनशील है। केवल सत्य ही सत्य को प्रकट कर सकता है।’’
फिर क्या किया जाए?
स्वामीजी का एक ही उत्तर रहता था। ”वर्तमान में रहने का अधिक से अधिक प्रयास रखा जाए, बस बहुत छोटी सी विधि है।“
‘सांख्य कहता है- जो कुछ भी किया जाता है, वह बाहर होता है, बहिर्मुखता में है, हम जिसे खोज रहे हैैंं, वह भीतर है। वह तो अंतर्मुखी होकर ही पाया जा सकता है, ... भीतर जाने का रास्ता बहुत विरल है, ... वहां कर्म नहीं पहुंचता। वहां अकर्म का सहारा लेना होता है। जहां क्रिया में अहंकार होता है, वहां कर्म बनता है, जहां अहंकार रहित क्रिया है, वहां अकर्म घटता है।
... स्वामीजी कहा करते थे- तेरी इच्छा पूरी हो, जो हो रहा है, उसे होने देना है। सहजावस्था में जहां भी जो घट रहा है, वहां प्रतिक्रिया न हो, प्रायः हम प्रतिक्रिया को ही क्रिया जानते हैं। चाहे दुःख आ रहा है या सुख, दोनों ही स्वीकार है। जो भी घट रहा है, उसके लिए हम राजी हैं। यह कहना सरल हे। बाहर जो घट रहा है, उसे सीरियल की तरह देखते रहो, कोई प्रतिक्रिया नहीं हो। पर क्या हम क्रिया नहीं करेंगे? क्रिया के लिए आप स्वतंत्र हैं, जहॉं क्रिया के साथ मन रहा वहॉं क्रिया स्वतः निर्दोष हो जाती है। परन्तु हम हमेशा प्रतिक्रिया में ही तो रहते हें। क्योंकि हमारा मन वहॉं अत्यधिक सक्रिय रहता है। लगातार विचारणा का दबाग बना रहता है।
‘वीतरागभयक्रोधा मन्मया भामुपाश्रिताः।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मावमागताः।। 4-10
‘राग भय और क्रोध से रहित, अनन्य भाव से मेरे में स्थित वाले, मेरे शरण हुए बहुत से पुरुष, ज्ञान रूप तप से पवित्र हुए मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं।
‘राग-चित्त पर पड़ी हुआ वासना की छाप है, ... विराग होना है, राग के विपरीत विराग होता है, वीतराग... राग से, विराग से दोनों से पार हुआ। उसकी अपनी कोई स्वतंत्र इच्छा नहीं है, जो भी नाटक में रोल मिला है, वह उसे बढ़िया करेगा। उसका कोई चयन नहीं है। आसक्त, विरक्त, तीसरा है अनासक्त। वीतराग का अर्थ हुआ, जो कहीं बंधा हुआ नहीं है। राग को तो भूल जाते हैं, पर विराग का दंश हटाए नहीं हटता है। वह छाया की तरह ग्रहण लगा देता है। यहां तक द्वन्द रहता है। पर जहां वीतरागता है, वहां वह इस द्वन्द से बाहर है। भगवान यहां कह रहे हैं- जो वीतराग हो जाता है, जो मेरे-तेरे के भाव से उठ जाता है, वह मेरे स्वरूप को प्राप्त हो जाता है।
भगवान का स्वरूप है, विराट, ... वह उसी विराट में समा जाता है। पूज्य स्वामी जी कहा करते थे- बाह्यमन का अंतर्मन में लय हो जाता है, अंतर्मन विराट के समीप है। वह उसी में है, ... वह उसी का अंश हो जाता है, तभी उस महान शक्ति का पता लगता है। यही ज्ञान है। वह पलायन में नहीं है। वह काष्ठवत नहीं है।
‘अनन्य भाव से मेरे में स्थिति वाले जो मुझ से अपने आपको भिन्न नहीं मानते। कहाजाता है, ”तेरा तुझको सौंपत क्या लागे मेरा,“ यहॉं जो मेरा था वही तेरा होगया है। यहां संकल्प जो जगा था, उसका भी समर्पण हो जाता है, वहीं अनन्य भाव है, ...मात्र श्रद्धा शेष रह जाती है। ”बीन भी हूॅं तुम्हारी रागिनी भी हूॅं। शरणागति वहीं तक है, जहां दूसरा भी है। पर यहां तो दूसरे का पूरा अभाव हो गया है।
जब तक बाह्य मन सक्रिय रहता है, अहंकार रहता है। मैं बचा रहता है। उसका ‘अंतर्मन’ में लय होना ही समर्पण है। बाह्यमन बहुत उपाय तलाश करता है। वह किसी न किसी बहाने बाहर भटकाता रहता है। उसका अहंकार बाह्य का सहारा पाकर ही खड़ा होता है। भगवान ने इसी श्लोक में- विधि को स्पष्ट भी किया है- साधना, किस प्रकार की हो, जहां ज्ञान का आधार तो हो, पर अहंकार का नहीं।
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।। 4-11
हे, अर्जुन! जो मेरे को जैसे भजते हैं, मैं (भी) उनको वैसे ही भजता हूं। इस रहस्य को जानकर ही बुद्धिमान मनुष्य गण सब प्रकार से मेरे मार्ग का अनुसरण वर्तते हैं-
पूज्य स्वामी जी का यह प्रिय श्लोक था। वे कहा करते थे- ‘ज्ञानी कुछ नहीं करता, पर नहीं करते हुए भी करता है। प्रकृति उसके सारे प्रबन्ध को स्वयं संभाल लेती है। उनके साथ रहकर जाना था, ... मानो अदृश्य सदैव पथ प्रदर्शित कर रहा हो।
... जैसा हम होते हैं, वैसे ही अनुगूंज हमारे पास आती महसूस होती है, इसे बुद्धि के आधार पर स्पष्ट नहीं किया जा सकता है, ... पर वही होता है, घटता है, जैसी आवाज हम में होती है, वैसी ही अनुगूंज हमारे पास आ जाती है, जो चित्र हम बनाते जाते हैं, ... एक कोई महान दर्पण है, ... वह सारी गतिविधियों को वापिस भेजता चला जाता है। हम एक भला कदम आगे बढ़ाते हैं, दूसरी तरफ से उतने ही कदम हमारी तरफ बढ़ते हैं। यही स्थिति अमंगल भावना की भी है। हम जैसा बोते जा रहे हैं, वैसी ही फसल तैयार होती जा रही है।
भगवान कह रहे हैं- जो जिस रूप में मुझे भजता है, मैं भी उसको वैसे ही भजता हूं। स्वामीजी इसे प्राकृतिक विधान कहा करते थे- वे कहा करते थे- प्रकृति में कहीं भी गलत नहीं है, हमें पता नहीं है, ... हमारी अज्ञानता है, बस, लेकिन वहां अन्याय नहीं होता है।
कई महिनों से मैं अशांत था, ... क्यों, पता नहीं, ... संभवतः सभी के प्रति जो भी परिचित रहे, एक अजीब प्रकार की नाराजगी मन में आती रही। स्वामीजी कहा करते थे- मन फिरकनी की तरह है, ... बाह्य का बल लगा वह घूमती जाती है, ... उसके घूमने से विचार पैदा होते हैं, ... विचारों से फिरकनी घूमती जाती है, उसे बल मिलता जाता है, .पर बाह्यका बल हटते ही फिरकनी गिर जाती हैै।.. पर तब यह वाक्य मात्र सूचना ही दे रहा था।
अचानक जब भीतर मुड़ा, अपने आपको देखा, तो पाया, नकारात्मकता का दबाव इतना बढ़ गया है कि बस मन घूमता ही रहता है, वह भी दूसरों के द्वारा आहत किए गए क्षणों के बोझ से।
तब अचानक यह श्लोक सुनाई पड़ा, ... एक अनुगूंज स्वप्न में हुयी।
जो मेरे को जैसे भजते हैं, मैं भी उनको वैसे ही भजता हूं। ... भगवान भजते हैं, वह तो सब जगह है, ... बाहर-भीतर, ... मैं जिसको जिस रूप में देख रहा हूं, वह भी मुझे उसी रूप में देख रहा है। ‘प्रेम न हाट बिकाय, ... मेेरे भीतर का प्रेम का स्रोत सूखता चला गया था। मेरे भीतर वही तो सुनाई पड़ रहा है, जो मैं बाहर देख रहा हूं। मेरा ही सोचा हुआ, मेरा ही देखा हुआ, मेरा ही जाना हुआ, ... सब दिशाओं से मेरेे ही पास तो लौट रहा है।
यह आत्म स्वीकृति गहरी थी।
विराट कोई अवधारणा नहीं है। वह तो सत्य है, जीवन्त। दोष मेरा ही था। मैं मात्र सूचनाओं का संग्रह ही करता रहा। मेरे चेहरे से मेरी प्रसन्नता भी चली गई। एक खिन्नता ही व्याप्त हो गई। मैं मात्र जिन्दगी में जो घटियापन था, उसे ही स्याही सोख्ते की तरह संजोता रहा। प्रकृति ने बार-बार बुलाया ,वहाँ की रमणीयता में भी नहीं खोपाया, मात्र अपने मन में व्याप्त होती लहरों की अनुगूंज ही सुनता रहा। और हर बार हर लहर के साथ तैरता रहा। उसे सातत्य देता रहा। मैं और लहर दोनों एकरस हो गए। मैं ही कंकड़ फेंकता, लहर उठती, उसके साथ दूर तक चला जाता। जब बाहर के हर संवेदन के प्रति तटस्थ होता चला गया। तब जाना- ‘स्मृति पाप क्यों है? भगवान के वचन, अचानक उतरे, भीतर तक उतरते चले गए, मैं उसको वैसे ही भजता हूं।
भजन, हृदय से होता है, वह भी नहीं है। जहां हर लहर के प्रति संग नहीं रहना होता। एक तटस्थता आने लगती है। वहीं दृष्टा भाव है। वह जब जगता है, तब पता लगता है, बाहर कहीं खूंटियां नहीं है। खूंटियां भीतर ही है।
... अब यह जानना मात्र सूचना नहीं थी। यह शास्त्र वचन नहीं रहा। यह मेरा अपना सच था, ... दुःख पाया, क्योंकि बाहर दुःख भेजता रहा। दूसरों के प्रति उपेक्षा रखी, ... वही दुख ही वापिस लौटकर मेरे पास आया। डाक की तरह, रचना जैसे लौटती है। प्रकाशन योग्य नहीं समझी गई।
प्रेम आता ही कैसे, ... दिया कहां था? जो हम देते हैं, ... हमारे पास तो दो हाथ है, पर विराट के करोड़ों हाथ है। हम कितना देंगे, ... क्या दे सकते हैं, पर जब वह विराट लौटाता है, तब यह सचमुच पता नहीं था। वह कई गुना होकर लौटता है।
स्वामीजी कहते थे- हमें प्रकृति के कार्य में सहयोग करना है। प्रकृति ने हरेक को उसकी योग्यता के अनुसार सामर्थ्य देकर भेजा है। यहां उपभोग नहीं, दुरपयोग नहीं, सदुपयोग होना है। जब हम प्रकृति को कुछ सोंपते हैं, ... प्रकृति उदार है, वह नहीं रखती है, वह तो कई गुना लौटा देती है।
आइने में देखता था, ... मेरा चेहरा ही सख्त हो गया है। शरीर में दर्द आ गया है। भीतर क्रोध है। बाहर सबके प्रति क्रोध का भाव उपजता है, अहंकार किसी को अपने पास ठहरने नहीं देता। जाना जो भीतर धुंवा उठ रहा था, वही बाहर भी जा रहा था। जो जब लौटता है, विषाक्त, जहां प्रेम नहीं, मात्र एक उपेक्षा, तब भी यह यहीं जाना कि यह तो मेरा ही धन था, जो बाद में मय ब्याज लौटा है।
बचपन में, मैं आश्वस्त था, न तो इतना ज्ञान था, न ज्यादा सूचनाओं का संग्रह था। बस, जो कुछ कहना है, बाहर परमात्मा है या नहीं पता नहीं, ... पर वह है सुनता है, उससे कह दिया, ... शायद यही प्रार्थना रही होगी, ... बैठा रहता था, ... इतना आश्वस्त था कि मेरे पास उत्तर आएगा। कई बार मंदिर जाता था, ... दूर बैठ जाता था, ... अगर ऊपर का फूल नीचे दाएं गिर गया तो मेरी बात सुनी गई है, अन्यथा नहीं, ... देखता था, ... कई बार फूल उसी आधार पर नीचे आ जाता था, ... बाद में देखता था, जो चाहा था वैसा घट गया, ... क्यों? तब मुझे मेरी प्रार्थना पर भरोसा था। बचपन में घर से दूर था, ... एक संवाद था। जो कहना है, उसे परम परमात्मा से कह दो। धीरे-धीरे, बुद्धि बढ़ती गई, प्रार्थना भी छूट गई। सचमुच वह अनुभूति भी विदा हो गई। भीतर बस एक जला हुआ विषाक्त मन रह गया। जहां बस धुंवा ही उठता था।
जब मन शांत होने लगता है, ... तब उपजता है, उत्तर भीतर से आ रहा है। मैंने लगाई अर्जी, जैसी दाता की मर्जी, ... यही पूर्वाभास है। यह होना है या नहीं, ... स्वतः बोध होने लग जाता है। पर उसके लिए धैर्य चाहिए, ... अपार, भीतर की हर गंदगी के प्रति तीव्र अनुभवन, ... सफाई पूरी हो, कहीं भी वह ठहर जाए, अब उसके प्रति कोई आग्रह नहीं, बस एक तटस्थता, प्राप्त विवेक का आदर, जो गलत माना जा रहा था, ... उसे रोकने में सहायक है, ... वरना कुम्हार के चाक की तरह नए-नए बर्तन हर क्षण बनते चले जा रहे हैं।
न मां कर्माणि लिम्पति न मे कर्मफले स्पृहा।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते।। 4.14
भगवान ने यहां अपने बारे में कहा है- कर्मों के फलों में मेरी कोई स्पृहा नहीं है, इसलिए मेरे को कर्म लिपायमान नहीं करते।
-कर्मों के फल में स्पृहा नहीं है। आकांक्षा ही नहीं है। फल की आकांक्षा हो तो खेल भी कर्म बन जाता है। स्वामीजी कहा करते थे- यहां पाने को कुछ भी नहीं है, ... बस जो अनावश्यक है, उसका छूटता जाना है, परमात्मा ने यह सृष्टि क्यों रची, बस एक खेल है, इससे अधिक नहीं, यह अनादि है, ... चल रहा है, जिस दिन खेल रुक जाएगा, सृष्टि ही रुक जाएगी। परमात्मा जो बस रच रहा है। जो भी रचा हुआ है, वहां वहीं है।
स्वामीजी जब कहते थे- ‘वर्तमान में रहो, तब हम सुन लेते थे। पर रहे तो भविष्य में ही। घूम-फिर कर सवाल अपने भविष्य के सुख का ही पूछते थे। जाना, मात्र सुन लेते थे, ... पर रहते तो भविष्य में ही, या फिर भूत में।
बड़ा मजा है, भविष्य में जिया नहीं जाना। शरीर तो वर्तमान में रहता है पर मन सपनों में खोया रहता है। फल हमेशा कल में आता है। कर्म हमेशा वर्तमान में ही होता है।
पर अगर आज मैंने दुःख को रचा है, तो कल वही हाथ में आएगा। इस सत्य पर विश्वास नहीं था।
हम यही सोचते हैं, ज्योतिषी के पास जाते हैं, वह कहता है आज जो खाली पन है, वह कल भर जाएगा, वह अंगूठी देता है, वह सपने देता है। हम यह भूल जाते हैं। जो आज खाली है, उदास है, वह मात्र सपनों में ही कल अपनी आकांक्षा की पूर्ति देख रहा है। कल जब हिसाब लगेगा तो बस एक बड़ा खालीपन ही हाथ में आएगा।
आज के साथ जीना ही साधना है, ‘कल के साथ जीना मात्र सपनों में होता है। ‘वर्तमान’ ही बहुमूल्य है, भगवान कहते हैं- ‘मेरे भीतर कल की कोई स्पृहा नहीं है।
‘स्वामीजी“, ने चूड़ाला आख्यान पर एक साधना परक वृतांत लिखा था। नाम रखा था- अनंत यात्रा, ... परमात्मा भी क्षणजीवी है। हर क्षण में वह है। अपनी संपूर्ण गहराई के साथ, ... वही क्षण अनंत है। एक क्षण भी अनंत के द्वार खोल देता है। यह यात्रा, ... बाहर नहीं जाती है। जब मन ठहरता है, उसे बाहर जाने का रास्ता नहीं मिलता, तब वह अनंत की ओर मुड़ जाता है। यहीं अंतर्मुखता है। यहां पर बस वर्तमान है, कहीं कोई , कल नहीं है। कोई अगला क्षण नहीं है। अगला हर क्षण, कल में किसी आकांक्षा को लेकर उपजता है।
भगवान कह रहे हैं- जो इस बात को समझ लेता है, वह मेरे स्वरूप को समझ लेता है। वह भी मेरे स्वरूप को पा लेता है।
अनंत का मार्ग क्या है? फल की कोई लालसा नहीं। कोई आकांक्षा नहीं। जो कर रहे हैं, ... बस वही है। कर्म ही पर्याप्त है, ... कर्म बस एक खेल बन जाए।
‘वर्तमान’ क्या है, ... एक तेजी से फिसलता क्षण, जहां भविष्य हर पल भूत में बदल जाता है। हम उसे पकड़ नहीं पाते, ... उसका साक्षी होना कठिन है। परमात्मा का वर्तमान अनंत है, पर हमारा, ... हमें इसी क्षण में हो रहे कार्य को ही साथ लेकर वर्तमान में रहना सीखना होगा। क्रिया तो है, पर उसके साथ कोई चिन्तन नहीं है। कोई फलाकांक्षा नहीं। कोई स्पृहा नहीं। जो भविष्य की ओर ले जाती है, वह स्थगित, तब मात्र वर्तमान बच जाता है। वहां कर्म तो है, ... पर मन वहां निष्क्रिय है, और जो शक्ति कर्म करा रही है, वह सजग है, ... भीतर का कोलाहल ही भविष्य की ओर झांकने को निरंतर धकेलता रहता है।
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणोे गतिः।।4.17
कर्म की गति अगाध है, ...
भगवान ने इसके पूर्व कहा है, कर्म क्या है, अकर्म क्या है, ऐसे इस विषय में बुद्धिमान पुरुष भी मोहित होता है।
जहां हम प्रतिक्रिया में होते हैं, दूसरे से संबोधित होते हैं, वहां त्मंबजपवद होता है। वह प्रतिकर्म है। कर्म वही होता है, जो दूसरे को केन्द्र में रखकर नहीं किया जाता है। यहां स्वामित्व अपना है। असमर्थता अकर्म नहीं है। अकर्म है- जहां भीतर का कर्ता मात्र साक्षी है। उसका अहंकार तिरोहित हो गया है। कर्म सहजावस्था है। दूसरे की प्रतिक्रिया में नहीं है। निषिद्ध कर्म वे हैं, जो करने योग्य नहीं है।
कौन है, जो, जो भी मिल जाए, जो चाहना है, वह पूरी हो जाए फिर भी असंतुष्ट रहता है कुछ ना कुछ मांग बनी रहती है? क्या मैं तो वह नहीं हूॅं?
पूज्य स्वामीजी कहा करते थे- ‘मैं कितना तुम्हें संतुष्ट करने की चेष्टा करूं पर मांग तो कभी किसी की पूरी होती नहीं है, रोज नई मांग कौने में उठ खड़ी होती है।
जो मिले, उससे संतुष्ट हो जाए, कोई नई लहर नहीं,... तो चित्त ही विदा हो जाताहै। चित्त का स्वभाव है नई-नई मांग पैदा करते रहना। मिलते ही किसी दूसरी मांग को खड़ा कर देना। चित्त तो सदा से ही असंतुष्ट है, ... असंतोष के साथ ही मन खड़ा होता है। संतोष के आते ही चित्त विदा हो जाता है। होना यही चाहिए मांग कम से होती जाए, जो पूरी हो रही है, वहां संतोष हो, जो पूरी होने वाली नहीं है, उनका पता अपने आप लग जाता है, उन्हें छूट जाने दें। जहां अपेक्षा है, वहां असंतोष है। जो मिल गया, वही बहुत है। पर होता विपरीत है, जो नहीं मिला है, उसके लिए मन भटकता रहता है, जो मिल गया है, उसको देखने की भी फुरसत नहीं होती है।
भगवान कहते हैं- जो मिल जाए उसमें जो संतुष्ट है, तथा द्वन्द से पार है जो , द्वन्द से पार होना कठिन है। यह मन का स्वभाव है। वह दो काम एक साथ कर सकता है। वह स्वयं दुश्मन को खड़ा कर सकता है, उसके साथ तर्क- वितर्क कर सकता है। वह उसकी भाषा भी बना सकता है, उसे भी तर्क दे सकता है। खुद का बचाव भी कर सकता है। यही द्वन्द है।
मेरे पांव में दर्द था। घर से बाहर खड़ा था एक नीम हकीम आ गया। वह दर्द की दवा के लिए कह रहा था। उत्सुकता जगी। उसने पांव देखा। बोला, पिंडली में खून जमा है। आप कहो तो देख ले। दर्द बहुत था, ... दिखा दिया, ... उसने एक यंत्र निकाला, ... फिर एक पैकेट जिसमें ‘स्टरलाइज नीडिल थी, ... हल्का सा पंच किया, ... पंप लगाया, जब हटाया तो वहां पर खून की बूंदें आ गईं थी, ... उसने, कंेची से, उन बूंदों को हटाया, ... मक्खन की तरह कुछ वहां था, ... बोला, यह जमा हो गया है, निकाल दिया है।
पाया, दर्द वहां नहीं था, ... पांव जो भारी था, ... हल्का हो गया था। पर मैं उसे धन्यवाद भी नहीं दे पाया। तत्काल मन ने कहा, यह कोई गड़बड़ तो नहीं हो गई, ... कुछ और बीमारी हो गई तो, मन ने जो किया था उसका दूसरा हिस्सा पूरी ताकत से खड़ा हो गया था। वह कह रहा था- टिटनेस का इंजेक्शन लगवा लंे, ... अगर आप पूरा पंच करवालेंगे, ... तो फिर कभी दर्द नहीं होगा, पर मन अब पूरी तरह से जो हुआ उसके विरोध में आ चुका था, ... टिटनेस का इंजेक्शन लगवा लिया। वह दूसरे दिन भी आया। दर्द कैसा है, वह बार-बार पूछता रहा। पर मन अब उसके विरोध में जा चुका था।
जाना मन कभी भी एक तरफ सौ टका खड़ा नहीं होता। एक हिस्सा निरन्तर दूसरे के विरोध में खड़ा रहता है। यही द्वन्द्व है। जाना मैं हमेशा दो रास्तों पर चलता रहा हूं, एक मन होना चाहता हूॅं, मुश्किल यही है, वह जो दूसरा है, वह और मजबूत हो जाता है।
भगवान कहते हैं- ‘
यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते।ं4.--22
”अपने आप जो कुछ प्राप्त हो उसमें ही संतुष्ट रहने वाला,हर्षादि द्वंद्वों से अतीत हुआ, ईर्ष्या से रहित,सिद्धि और असिद्धि में समत्व भाव वाला पुरुष कर्मों को करके भी नहीं देखता है।“
द्वन्द्वातीत, द्वन्द्व से बाहर, जो दो, के बाहर होता है, वही कर्म के बंधन से मुक्त होता है।
स्वामीजी कहा करते थे- थिंक वन्स डीसाइड वन्स, नेवर हेव ए सैकन्ड थॉट...
....एक बार सोचो, निर्णय करो, ... फिर दुबारा मत सोचो। पर जाना, निर्णय के बाद भी विचारणा का वेग तेजी से आता है। आक्रमण सा हो जाता है। निर्णय करने वाला मन, अपने बचाव में हारता, टूटता सा रहता है। तो फिर मन तो द्वन्द्व से बाहर नहीं आ सकता, ... फिर जो मन से बाहर है, जो मन को भी जानता है, वही हो सकता है। जहां तक विकार है। वे द्वन्द्व के भीतर ही हैं। लेकिन जो साक्षी हैं, दृष्टा हैं, वह बाहर जा सकता है।
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाक्ष्च यतयःसंशितव्रताः।।4-28
दूसरे ईश्वर अर्पण बुद्धि से द्रव्य लगााने वाले हैं।वैसे ही कई पुरुष स्वधर्म पालनरूप तपयज्ञ को करने वरले हैं।कई अष्टांगयोगरूप योग को करने वाले हैं। दूसरे अहिंसा तीक्ष्ण व्रतों से युक्त, ,यत्नशील पुरुष भगवान के नाम का जप, तथा भगवत प्रप्ति विषयक ग्रन्थों का अध्ययनरूप ज्ञानयज्ञ करने वाले हैं।
भगवत् प्राप्ति विषयक शास्त्रों का अध्ययन रूप ज्ञान यज्ञ करने वाले हैं।
स्वाध्याय यज्ञ- स्व और अध्ययन। स्वयं का अध्ययन। स्वाध्याय का अर्थ है। रमण महर्षि की यही साधना थी। वे कहा करते थे- ‘अपने आपको जानो।’ दूसरा कोई हमारे बारे में नहीं जान सकता। हमारा व्यवहार भी बुद्धि से संचालित होता है। वहां बाहर जो भी है, एक पर्दा होता है। हम ही अपने आपको जान सकते हैं।
सच है, हम भी कभी अपने भीतर नहीं जाते। डर लगता है। तत्काल मन दूसरों को बीच में ले आता है। दृश्य का चिन्तन प्रारंभ हो जाता है। हम दूसरों से अपने बारे में जानना चाहते हैं। उनके द्वारा दिए गए निष्कर्षों को सामने लाते हैं। बहुत ही कठिन होता है, अपने आपको अकेले में ले जाना, और फिर भीतर की सीढ़ियां उतरना।
अपने बारे में अपनी सही पहचान ही, आत्मविश्वास पैदा करती है। मुझ पता है मैं क्या हूं, क्या मेरे दोष हैं, क्या गुण हैं? दुनिया मेरे बारे में कुछ भी सोचती रहे, कहती रहे, मैं कहीं भी प्रतिक्रिया में नहीं हूं। न मैं प्रतिकर्म में हूं, न निषिद्ध कर्म में हूं, ... मैं मात्र अकर्म में हूं। स्वाभाविक अवस्था में हूं।
पर होता इसके विपरीत है। मैं भी अपने बारे में जो बाहर से जाना गया है। उतना ही जान पाता हूं। स्वाध्याय का अर्थ है, दर्पण के सामने में ही हूं। दूसरों ने मेरे बारे में क्या सोचा है, सोच रखा है, यह मेरे लिए व्यर्थ है, ... मेरी पहचान है, ... जहां मैंने अपने ऊपर पत्थर रख रखा है, वह है दमन का, ... मैं तो मात्र कठपुतली हूं, नचाने वाला मेरा संग्रह है, संस्कार है। उसे मैं नहीं जानता, अगर भूले-भटके, ... स्वप्न में भी वह विचारणा आती है, तो मैं उसे सीधे नहीं देख पाता, ... तुरंत दबाने का प्रयास करता हूं। जाना मेरे भीतर क्रोध बचपन से ही दबा पड़ा था, ... सांप की तरह वह मौके ब मौके फन लेकर खड़ा हो जाता था। जाना, मैं ही क्रोध हूं। भीतर भय था, ... हर नई आने वाली परिस्थिति से भय। पूज्य स्वामीजी ने पत्र में लिखा था- ‘तुम्हारे भीतर आत्मविश्वास की अत्यधिक कमी है, भविष्य में ऐसा नहीं होगा, “... मैं नहीं जान पाया, ... वे भीतर तक दबी राख को हटा रहे थे।
स्वाध्याय का दूसरा कदम अपने आपको, अपने आप में खोलते जाना है। जाना, अपने आपको अकेले में ले आना ही ध्यान में उतरने की पहली तैयारी होती है। क्योंकि हम सुबह से शाम तक जहां बाहर दूसरों के साथ होते हैं, वही सपनों को भी दूसरों को साथ ले आते हैं। अकेलापन, ... एकान्त, जहां भीतर भीड़ नहीं हो। सिर्फ आप हैं, ... तब भीतर का कपाट खुलता है। वहां मेरा भय था, ... क्रोध था, दमित, एक ठोस रूप ले चुका था।
... यह जानना ही, सीधा साक्षात्कार ही, प्रगति का पथ होता है। हम जिसे छोड़ना चाहते हैं, वह स्वतः छूटता जाता है। यह परिवर्तन बाहर तक आ जाता है। हमारी जो छवि बाहर हमने दिखा रखी है, वह भी टूटने लगती है। सहज स्वाभाविक अवस्था में हम आ जाते हैं।
भीतर मन जो हमेशा सक्रिय रहता है, ... वहां अब विचार के उठते ही, उसके संग जाने की, साहचर्य देने की आदत पर विराम भी लगना शुरू होता है। तब भीतर जो अकेलापन है,वह सघन होने लगता है। जैसे गर्मी में कंबल ओढ़ रखा हो, तो पसीने में शरीर नहा जाता है, उसी प्रकार भीतर स्वाध्याय की गर्मी होती है। बाहर के अनावश्यक बोझे अपने आप उतरने लग जाते हैं।
जाना, अपने विकारों को लेकर सत्य के सामने नहीं जाया जा सकता है। विचार ही विकार हैं। विचार झड़ने लगते है, तो विकार भी गिरने लगते हैं। स्वाध्याय ही वह पथ है, ... जो बाहर दिखाई नहीं पड़ता, पर सीधा भीतर की यात्रा पर ले जाता है। यहां जानना ही प्याज के छिलकों का उतरते जाना है।
इसी श्लोक में स्वाध्याय यज्ञ के साथ पूरक विधि आई है। ‘ईश्वर-पथ’ ... स्मरण बना रहे। स्वाध्याय- परमात्म ज्ञान विषयक ग्रन्थों का अध्ययन भी है। परन्तु भगवान ने जिस विधायी विधि का संकेत दिया है, ... वह परमात्मा के प्रति निरंतर स्मरण का भाव। जीवन का उद्देश्य- ‘परमात्मा की महान शक्ति का इसी जीवन में अनुभव प्राप्त करना है, ... यही सुमिरन है। ‘वह’ है। इस्लाम में पांच बार नमाज़ की जाती है। भले ही पांच मिनट की हो। पर उसकी याद का अहसास हमेशा बना रहे।
तपोयज्ञाः
स्वधर्म पालनरूप तप यज्ञ करने वाले हैं।
‘स्वधर्म का सत्य क्या है? मुझे क्या करना है? यह सवाल जन्म से उत्तेजना देता रहा। ज्योतिषी से यही पूछते हैं, ... सफलता कहाँ मिलेगी, ... प्रायः अनुसरण में जीवन चला जाता है। पीछे मुड़कर देखों तो यही पता लगता है, ... बाहर की दुनिया में भले ही सफलता मिली हो, पर भीतर अशांति है, एक खीझ हैं।
... तो जाना.... कहीं गाड़ी पटरी से नीचे उतर गई है। जब प्राध्यापक था, तब एक ही शौक था खूब पढ़ा जाए, ... पर तब सामाजिक, आर्थिक दबाव तंग करने लगे, प्रशासनिक सेवा में आ गया। पर वहां प्राप्त सफलताओं के बीच, जिम्मेदारी पूरी होने के साथ ही फिर भी भीतर अशांति बढ़ती रही, ... तब जाना, कहीं स्वधर्म के पथ से रास्ता विलग हो गया है। छूट गया है।
क्योंकि हर यात्रा की उपलब्धि आनंद है। संतोष है। वह जीवन में नहीं है, तो जीवन व्यर्थ है।
जाना, ... जो हो गया है, वह होना ही था। वह भी अनेक जन्मों का संकल्प था, ... सब अपने आप होता गया। पर अब जब जिम्मेदारियां पूरी हो गई है, ... तब अशांति क्यों? तनाव क्यों? अब तो पुनः सही रास्ते पर आया जा सकता है। जाना तब स्वधर्म की खोज केन्द्रस्थ हुई।
स्वामीजी कहा करते थे, जिस कार्य को करने में शांति मिलेे, संतोष मिले, भीतर प्रसन्नता का भाव उठे, ... वही रास्ता है। दूसरों की देखा-देखी मत करो। अपनी आवश्यकता को खुद समझो, सामर्थ्य प्रकृति ने सोंपा है। जो कार्य पूरा होना है, अपने आप होगा, नहीं होना है तो भीतर से प्रेरणा आती है। पर हम अनसुना कर जाते हैं। दूसरे कहते हैं- आपने पूरा प्रयास नहीं किया। थका डालते हैं। इससे हताशा आती है। स्वधर्म की पहचान अपने आप होती है।
जाना, ... अनुभव हुआ। जब अपने घर की तरफ आया, ‘‘लौटकर आया आज मैं द्वार पर, ...तो भीतर सब के प्रति अनुग्रह का भाव जगा। भीतर एक प्रेम जगा। समग्रता में स्वीकारने का भाव जगा।
अपि चेदसि पापेम्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः।
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं संतरिष्यसि।।4-36
”यदि तू पापियों से भी अधिक पाप करने वाला है, तो निसंदेह ज्ञान रूपी नौका से तू पार हो जाएगा, जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधन को जलाकर राख कर देती है, उसी प्रकार ज्ञानाग्नि, संपूर्ण कर्मों को भस्म कर देती है।
स्वामीजी के यहां, किसी व्यक्ति के ,किसी प्रकार के, किसी के बाह्य आचरण को लेकर कोई चर्चा नहीं हो पाती थी, ... कई बार उनके नीतिगत व्यवहार को लेकर लोग आलोचना भी करते थे। पर उनके पास एक ही उत्तर रहता था- बस मौन। वे नैतिक दृष्टि से किसी के व्यवहार की आलोचना नहीं करते थे, ... हां ज्ञान की एक झलक, अंधेरे को, अज्ञान को हटा देती है। वह उसे रास्ते पर जाने को कहते थे, संस्कार जो भीतर संग्रह है, वह कोई वस्तु नहीं है, मात्र स्पंदन है, ... कर्म भाव रूप में ही जमा होते हैं। जो जमा होने का आधार होता है, वही उनके विसर्जन का भी बन सकता है। यह संग्रह जमा होता रहता है, अज्ञान से। ज्ञान का आगमन, अज्ञान का तिरोभाव है।
ज्ञान से संस्कार निर्मिति क्षय होती हैं। अज्ञान जो संस्कार का जनक है, उसके समाप्त होते हैं, यह प्रक्रिया रूक जाती है। अज्ञान ही संग्रहित करता जाता है। फिर कल्पना के सहारे से हर स्पंदन, विचार में तथा विचार से कर्म में ढलता जाता है। नई-नई कामनाएं पैदा होती जाती है। अज्ञान की स्मृति तथा अज्ञान की कल्पना, दोनों के बीच का सेतु वर्तमान है, वह यहां खो जाता है। जब आप वर्तमान में रहने लगते हैं, तब यह पुल पर होता हुआ प्रवाह रूक जाता है। वर्तमान, निरन्तर भविष्य को अतीत में बदलता जाता है। यहां अगर साक्षी भाव जग गया, ... तो वह प्रवाह रूक जाता है। यह तत्क्षण होता है। भगवान ने कहा है- ‘क्षिप्रं भवति धर्मात्मा’। ज्ञान के प्रकाश में अंधेरा अपने आप सरक जाता है। जहां अंधेरा है, वहां भय है, वहां मोह है, वहां अज्ञान है। जहां ज्ञान है, वहां मैं भाव चला जाता है। वहां अहंकार चला जाता है। वहां संस्कार बनने की प्रक्रिया अपने आप रूक जाती है।
‘स्वामीजी कहा करते थे- ज्ञानी भी कर्म करता है, पर वह नहीं करता हुआ भी करता है, उस पर दायित्व नहीं होता, प्रकृति उसे यंत्र की तरह चलाती है। वहां अहंकार नहीं होता।
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति
नायं लोको ऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः। 4-40
”संशययुक्त पुरुष के लिए न तो सुख है न यह लोक है न परलोक अर्थात यह लोक और परलोक दोनों ही उसके लिए नष्ट हो जाते हैं।“
भगवान कह रहे हैं- संशय से भरा हुआ व्यक्तित्व विनाश को प्राप्त हो जाता है। संशय पैदा होता है, मन में। एक दुविधा सी बनी रहती है। अनिर्णय। द्वन्द। निर्णय सही किया या गलत। संशय आत्मा में नहीं हो सकता। वह तो मन में ही होता है, लेकिन जो मन के ही धरातल पर है, मन में ही उलझा हुआ है, जिसकी यात्रा बहिर्मुखता में है, वह आत्मा शब्द का प्रयोग तो कर सकता है, पर वह उसे जानता ही नहीं है। आत्मानुभव उसका है ही नहीं। वह मन को ही ”माम“ मानता है। अहंकार ही उसका स्वरूप हो जाता है।
भगवान कह रहे हैं, ऐसा व्यक्ति मन को ही आत्मा मानने वाला विनाश को प्राप्त होता है। क्योंकि मन, संशयात्मक है, कोई निश्चय नहीं। कांपता हुआ हाथ। वहां आत्मविश्वास अपने आप गिर जाता है। अनिर्णय बना रहता है। दूसरा ही धकेलता है।
मेरा स्वयं का ‘मन’ ऐसा ही है। यह जाना। एक बात पर ठहरता नहीं। निर्णय होने के बाद भी विकल्प खुला रहता। पूज्य स्वामी जी का पत्र बार-बार पढ़ता रहा- ‘आत्मविश्वास की अत्यधिक कमी है, क्यों? भीतर मन निरंतर द्वन्द में रहता है। संशय ग्रस्त है। उन्होंने कहा था, एक बार सोचो बार-बार नहीं, निर्णय लो, ... पर आप्त वाक्य आचरण में नहीं आ पाया था। बार-बार कांपते हाथ से लोटा उठाता, ... लोटा गिर जाता। प्रयोग किया, ... भीतर के कंपन को जानने का प्रयास किया, ... हाथ थिर हुआ, ... तब जाना, भीतर की स्थिरता आते ही, मन का यह या वह में निरन्तर भटकाव रूक जाता है। निर्णय हो गया, जो होगा, देखा जाएगा। सीना खोलकर सामना करेंगे, बस।
जाना, स्वयं की असफलताओं, तथा दुःखों के बीच जाना, चित जब संशय में भर जाता है, तब विनाश ही प्राप्त हुआ। शुरू-शुरू में निर्णय गलत भी हुए, ... पर उससे आत्मविश्वास डिगा नहीं। मैं ही जिम्मेदार हूं, यह बोध ताकत दे गया।
स्वामी जी कहा करते थे, ... किसी भी व्यक्ति का पतन मात्र उसके अनिर्णय से होने लगता है।यही कार्पण्य दोष है। कुछ करेगा, ...तो सही होगा या गलत, ... दोनों ही स्थितियों में उसकी शक्ति क्रियारत रहेगी। पर अकर्मण्य का तो कोई भविष्य ही नहीं होता है।
संशय से भरे चित्त की सबसे बड़ी कठिनाई, वह स्वयं होता है। अवसर आता है। जीवन में अवसर एक या दो ही आते हैं। पर संशयग्रस्त तब सोचता ही रह जाता है, अवसर उसे ही छोड़कर चल देता है।
तस्मादज्ञानसंभूत हृत्स्थं ज्ञानसिनात्मनः
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत।।4-42
हृदय में स्थित इस अपने संशय को ज्ञान रूप तलवार द्वारा छेदन करके- भगवान, इस संशय से मुक्ति का उपाय बता रहे हैं-
‘समत्व बुद्धि रूप योग को पाकर-संशय को ज्ञानरूपी तलवार से काट डाल।
संशयात्मा विनाश्यति, ... जो संशयग्रस्त है, उसका विनाश होता है। फिर अपनी इस अनिर्णय की स्थिति से कैसे बाहर आ जाए। पहले आदत हो गई थी- ताले को लगाकर, दुबारा जांचता था, कहीं खुला तो नहीं रह गया। अपने ऊपर भरोसा नहीं आ पाया था। चाबी कार की कार में ही रह गई, ... बाहर गेट बंद कर दिया। लॉक हो गई। कर्म और मन की युति नहीं थी। सब मानो यांत्रिक होता हो। स्वामीजी ने टोका था- बोले जहां शरीर हो वहां मन को रखो, बस इतनी सी साधना है। अनावश्यक सोचना बंद करो, आदत तुम्हारी है, ... तुम आदतों के गुलाम नहीं हो। जिसे तुमने बनाया है, तुम उसे हटा सकते हो। संकल्प लो बस।
समता का अर्थ है- जहां द्वैत गया। यह या वह गया। यहां आत्मकृपा उपजती है। आत्मविश्वास घना होता है। एक तटस्थता भीतर आती है। जिसे आप साक्षी भी कह सकते हैं। वहां सजगता पैदा हो जाती है।
बुद्धि जब शत-प्रतिशत शुद्ध हो जाती है, तब विवेक जगता है। विवेक का जागरण मात्र उसका आदर होता है। वह आकर जब मार्ग प्रशस्त करता है, वहां सामर्थ्य का सदुपयोग होना शुरू हो जाता है।
बुद्धि समता को तभी प्राप्त होती है, जब वह ‘निश्चयात्मक’ होती है। उसका डांवाडोल होना रुक जाता है, न वह पाप में है न पुण्य में, न सत में, न असत में, द्वन्द्व से पार चला जाता है, वहां मात्र साक्षी बचा रहता है।
... तब विवेक जगता है। पूज्य स्वामी जी कहा करते थे- ‘बिनु सत्संग विवेक न होई, ... सत्संग, ... निरन्तर स्वाध्याय से प्राप्त उपलब्धि है, जब हम अपने ‘स्व’ से जुड़ जाते हैं। पराश्रय पूरा चला जाता है। वहीं आत्मकृपा है। यह विवेक एक तलवार है। वही संशय को काट देता है। क्योंकि वहां बुद्धिस्थिर होते हुए विवेक में ढल गई है। उसका डांवाडोल रहना छूट गया है। वही ज्ञान की तलवार है। जब बुद्धि शत-प्रतिशत शुद्ध होती है तब वह विवेक में ढल जाती है। तब ज्ञान का उदय होता है, जहां बुद्धि डांवाडोल होती है, वहां अज्ञान उपजता है।
संभवतः तीस साल तक मैं बस सवाल ही पूछता रहा।
संभवत, एक सिद्ध गुरु के पास रहकर, ... नदी पर घाट के पत्थर की तरह भीगता हुआ भी सूखा ही रह गया।
वे कहा करते थे- एक ही बात को बार-बार क्यों पूछते हो?
क्या, संशयग्रस्त मन था, ... बुद्धि डांवाडोल थी। यह विश्वास ही नहीं था, कि जाना किधर है, ... ‘परधर्म’ का लोभ, उसका अनुसरण, स्वधर्म से वंचित करता जा रहा था, ... प्रश्न भी मात्र जिज्ञासा पूर्ति के लिए थे, ...” पर आज जब, लौटकर आया आज में द्वार पर, खड़ा-खड़ा पूछता, कि बाहर ही रहू, या भीतर चलूं,“ ... तो संशयग्रस्त मन फिर टोकता है, ... रोकता है, ... तब श्री भगवान की गीता, फिर द्वार पर आकर यही कहती है जो भगवान ने अर्जुन से कहा- ‘‘संशय को ज्ञान रूप तलवार से काट डाल, काट डाल, अब बाहर को प्रणाम कह, जिधर मुंह किया था उधर पीठ कर, जहां पहले पीठ थी, उधर मुंह कर ले, बस, ... जाना कहीं नहीं है। रास्ता वहीं है। बस दिशा ही बदलनी है। तू चल तो सही।
No comments:
Post a Comment