Thursday, November 14, 2013

श्री गुरु गीता सातवां अध्याय

श्री गुरु गीता सातवां अध्याय



मयासक्तमनाः पार्थ योगं युं्जन्मदाश्रयः।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यस् ितच्छृणु।7.1
मेरे में अनन्य भाव से मन वाला,मेरे परायण योग में लगा हुआ,मुझको ,‘जिस प्रकार संशय रहित जानेगा-उसको सुन।
गुरु के पास, ... ब्रम्ह्मनिष्ठ गुरु के पास, ... समीप जाने की अपनी विधि है, ... संशय रहित। स्वाश्रय, भगवान कृष्ण ने गीता के सातवें अध्याय के प्रारंभ में साधना के लिए तीन महत्वपूर्ण संकेत दिए हैं।

‘मेरे में अनन्य भाव से मन वाला, तथा संशय रहित होकर जानना। ये दोनों ही संकेत मैंने पाया, मुझसे बहुत दूर चले गए थे। पराश्रय के बाद निराश्रय तथा उसके बाद प्राप्त होता है, स्वाश्रय। स्वामीजी कहा करते थे’ गीता का केन्द्रीय तत्व ‘माम’ है, ‘माम’ भगवान कृष्ण नहीं है, जिस आधार पर उनकी पूजा, अर्चना, तथा समर्पण सिखाने की बात होती है, वह गीता का अपना मनमाना अर्थ निकालकर समझाया गया है।

‘अनन्य भाव, ... जो प्राप्त हुआ है, हो रहा है, उसके प्रति स्वीकृति का भाव है, ... हर स्थिति में जो भी प्राप्त हो रहा है, उसके प्रति खिन्नता का भाव नहीं है। यहां सीधा तौर पर स्वयं पर  ही भार आता है, तब स्वयं कृपा में प्रवेश होता है। वहां फिर संशय नहीं रहता। भगवान कृष्ण कह रहे हैं, जो अनन्य भाव से प्रेम करता है, वहां बस प्रेम ही रह जाता है। भगवान कृष्ण जिस ‘मैं’ की ओर संकेत कर रहे हैं, ... उसे समझना आवश्यक है। मेरे ‘मैं’ और भगवान के इस ‘मैं’ में भेद है। यह भेद ‘मम’ और ‘माम’ है। ‘माम’ जो अस्तित्व है, जो आत्मा है, जो विराट है, जो परमात्मा है। जो महाशक्ति है। ‘मैं, जो इस देह में ‘अहंकार’ की छोटी सी इकाई है। असंशय निष्ठा- जहां किसी प्रकार का संदेह नहीं है, जहां दूसरा है ही नहीं, ... अगर कोई भूल हुई है, तो स्वयं से हुई है। जाना, संदेह जहां होता है, वहां किसी पर भी निष्ठा नहीं हो सकती, ... और तो और संदेही स्वयं के प्रति भी किसी भी प्रकार की श्रद्धा नहीं रख पाता है।

शास्त्र इसीलिए बहुमूल्य होकर भी ग्रन्थ मात्र रह जाते हैं, कि वहां उन शब्दों के प्रति हमारी निष्ठा नहीं है। स्वामीजी कहा करते थे- ‘एक ही बात को बार-बार क्यों पूछते हों? संदेह है तो छोड़ दो, ... पर कम से कम प्रयोग तो करो। पर सच  यही है कि  न तो प्रयोग किया न संदेह छोड़ पाए। अनन्य निष्ठा कहां से पैदा होती।

न तो संशय छोड़ा जा सकता है, न ही कहीं अनन्य निष्ठा आती है। वे ही व्यक्ति हर सत्संग में पहुंच जाते हैं, हर गुरु के पास हो आते हैं, ... यही उनकी सूचनात्मक उपलब्धि रहती है। वे गर्व से बतलाते  हैं,वहाँ- वहॉं हो आए हैं।

भगवान कृष्ण मात्र एक ही शर्त रख रहे हैं- ‘तू मुझे संशय रहित होकर सुन। जाना इतना विश्वास स्वयं विेवेकानंदजी का अपने ऊपर नहीं था, पर जब जिज्ञासुओं ने संशय रहित होकर, अनन्य भाव से अमरीका में उन्हें सुना तब से उनके शब्द सबद बनकर अभी  भी गंुजायमान  हैं।  गुरु के प्रति अटूट निष्ठा ने उनके भीतर  अनन्य भाव, स्वाश्रय तथा संशय रहित जीने की कला सौंप दी थी।

मनुष्याणां सहस्त्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मांवेत्ति तत्त्वतः।। 7-3

हजारों मनुष्यों में कोई ही मनुष्य मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करता है और उन यत्न करने वाले योगियों में भी कोई ही पुरुष मेरे पारायण हुआ मेरे को तत्व से जानता है।’

जहां तक जिज्ञासा, के लिए मनोरंजन के लिए, कामना पूर्ति के लिए परमात्मा की शरण में जाना होता है, यह साधना नहीं हे। यही संकेत  यहॉ महत्वपूर्ण है। घाणी के बैल की तरह आंख पर पट्टी बांधे हुए जीवन बीत जाता है। जीवन का उद्देश्य क्या है? यह अंतर्मुखी होने के बाद ही पता लगता है, जब घर का दरवाजा दिखाई पड़ता है, ... फिर बाहर ही भटकने की इच्छा नहीं होती, ... हां जब तक घर का दरवाजा नहीं दिखता तब तक अंधेरे में टल्ला मारना ही साध्य रहता है। भगवान ने कहा है, ... कोई ही मनुष्य जानने का, प्राप्त करने का प्रयास करता है, ... कोई ही पुरुष अनन्य भाव में रत, तत्व को जान पाता है, क्यों?
सामान्यतः अशांति से शांति, दुख से स्थाई सुख, ... साधनों की वृद्धि, स्वास्थ्य, यही जीवन का उद्देश्य रहता है। पुरुष अपना पुरुषार्थ इसी को प्राप्त करने मेंमानता है। स्वामीजी कहा करते थे- ‘मोक्ष की चर्चा बहुत होचुकी है,उसे हटा  दो, पर सामान्य जीवन में शक्ति, शांति व संतोष पाना मनुष्य का अधिकार है, वह इसके लिए स्वतंत्र है।’’

मैंने अपने आपको देखा, ... समझने का प्रयास किया, मेरे भीतर संस्कार वश जिज्ञासा थी, पिता धार्मिक थे, सुबह-शाम पूजा करते थे। धार्मिक ग्रन्थों का पारायण करते थे।
परिवार में नित्य पूजा होती थी, बचपन के संस्कार ही आगे विकसित होते गए। देवी-देवताओं की पूजा की, मंत्र-पाठ किया, ... पूज्य स्वामी जी जब मिले, तब आध्यात्म में प्रवेश हुआ। पर स्वामीजी कितना कहते रहे, ... बाहर ही भटकाव रहा। गहराई से प्रयोग करने की लगन नहीं जगी। गुरु भी मिल गए थे, पर भौतिक कामनाएॅं ही भटकाती रहीं। बस रेत के बोरे ही संचित हो पाए। जो हल्की हवा के झोंके से समय के पहले ही बिखर गए।
क्यों? जो मिला हुआ है, उस पर ध्यान कम जाता है, पर जो नहीं मिला है, उधर ध्यान जाता है, पद प्रतिष्ठा, धन, इसका प्रभाव था, ... मन इधर अधिक गया। जाना, जो ‘है’ उसकी चिन्ता नहीं रहती, जो नहीं है, उधर ध्यान बार-बार जाता है।

... स्वामीजी पूछते थे, अब क्या कमी है? तब उनके प्रश्न की गंभीरता भीतर तक छू नहीं पाती थी। क्योंकि मन का स्वभाव है, जो नहीं है उधर जल्दी पहुंच जाता है। जो मिला है, उसका सुख, आनंद नहीं ले पाते।

जाना, यही घर लौटने की पहली सीढ़ी है। जो मिला है, उसका सुख लेना है। भीतर से विधायी सोच को जगाना है। जिसने प्रीत करी वह याद रहे, ...जिससे नहीं रही, वह छूट जावे। पर होता विपरीत था, ... अभाव का संग्रह अधिक होता गया। व्यक्तित्व ही नकारात्मक बनता चला गया।

जाना, जो है, सब प्रभु की कृपा है। दिन-रात अनुग्रहित रहना है, बस। अपने आप प्रसन्नता आती गई, ... खिन्नता जाती गई। ‘स्वाद’ भीतर तक उतर गया। ‘रस’  बाहर कही नहीं भीतर है। हम बाहर तलाश करते-करते नीरस हो गए हैं।
स्वामीजी कहा करते थे- आध्यात्मिक यात्रा की उपलब्धि कोई है तो उसे संतोष की प्राप्ति होती है। संतोष- हारे का हरिनाम नहीं है। वरन् जो मिला है। उसमें प्रमुदित होने का भाव है। जब विधायी सोच बनता है, ... तब साधक की जो उर्जा बनती है, उसके बहने का, क्षरित होने का मार्ग बंद हो जाता है। संतोष विधायी सोच को पैदा करता है। तांत्रिक नकारात्मक उर्जा से भर जाते हैं। उनका पतन भी उतनी ही तीव्रता से होता है। नकारात्मक मन हमेशा जो नहीं है उसकी खोज में रहता है। विधायी मन ही द्वार मिलते ही प्रवेश पाने में सफल होता है। ‘मैंने लगाई अर्जी, जैसी दाता की मर्जी, बस। यह मन अपने अहंकार को छोड़ने में सफल हो जाता है। यह बहुत ही सूक्ष्म है। यह मान्यता को लेकर आता है। आत्मप्रशंसा से बचाव तथा ‘परनिन्दा से अलगाव यहां साधक की सहायता करती है।
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्तिते।।7-14

‘‘क्योंकि यह अलौकिक अर्थात् अति अद्भुद त्रिगुणमयी मेरी योगमाया बड़ी दुस्तर है परन्तु जो पुरुष मेरे को ही निरन्तर भजते हैं वे इस माया का उल्लंघन कर जाते हैं अर्थात संसार से तर जाते हैं।

स्वामी जी कहा करते थे- ‘दैवी’ देने वाली है, सब कुछ इसी से प्राप्त होता है, ... यह गुणमयी है, यह तमोगुणी भी है, रजोगुणी भी है, सतोगुणी भी है। तमोगुणी है बड़े बड़े विनाशकारी कार्य भी करवा सकती है। रजोगुणी है, सारा विकास असाधारण कृत्य करा सकती है, ... सतोगुणी है, परमार्थ पर ला सकती है। पर इसके पार कौन जाएगा। जो ‘इस माम’ की शरण में आता है। जो ‘निरन्तर’ मेरे को भजता है।
निरन्तर कॉन्सटेन्ट? तो क्या रात-दिन जप किया जाए, अखंड रामायण होती रहे? भजने का अर्थ है, निरन्तर वर्तमान में रहना। ‘वर्तमान  में रहना ही  ‘माम’ की अनन्यता की कुंजी है। भूत और भविष्य में ही संसार निवास करता है। परमात्मा का प्रवेश द्वार,,  परमात्मा में प्रवेश द्वार , वर्तमान में है, निर्विचारता में है। यही निरन्तर भजना है। जब दिन रात इसी प्रकार भजा जाता है, ... तो चैतन्य धारा विराट की ओर बहने लग जाती है। यही इस अखंड रामायण का सार है।
‘क्या हम कर्म नहीं करेंगे? करेंगे, पर मन अब जहां क्रिया होगी, तब पूरी तरह क्रिया के साथ होगा। पूर्ण रूपेण, जरा सा भी अवकाश रहा, तो स्मृति और कल्पना का दबाव रहेगा? फलाकांक्षा प्रवेश कर जाएगी। स्वामीजी कहा करते थे- मन को पूर्णरूपेण एकाग्र करते हुए किंचित मात्र भी विपरीत नहीं होने देना चाहिए।
इसके पूर्व इसी प्रसंग में भगवान ने कहा है- मेरी प्रकृति अष्ट मूर्ति है- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, तथा मन, बुद्धि, अहंकार में विभक्त है। यह अपरा है। व्यक्ति की बनावट व बुनावट का यह आधार है। पंच महाभूतों से हमारा शरीर बनता है। मुख्य तत्व अग्नि है। अग्नि ही तीन रूपों में, पृथ्वी, जल, वायु में प्रकट होती है, यहां प्रकट होती है, वह आकाश तत्व है। ... आकाश में, समय व स्थान दोनों समाहित है। मन हमारे भीतर जो मनन शक्ति है। ... जिसके माध्यम से इन्द्रियां विषयों से जुड़कर ज्ञान लाती है। बुद्धि इसी मन का परिष्कृत रूप है। जहां चिन्तन भी है। बुद्धि से पीछे, अहंकार रहता है।
साधक को सबसे पहले, अपने शरीर बोध से ऊपर उठना होता है। जब वह मन के धरातल पर आता है, तब उसे मन व उसकी क्रियाओं से परिचय मिलता है। विचारणा, कल्पना, स्मृति, मन की पहचान बताती है। मन पर नियंत्रण रहे। वह संयमन में हो, ... यहां से साधना प्रारंभ होती है। यही मन रजोगुणी है, सतोगुणी है तथा तमोगुणी भी है, बुद्धि भी इसी प्रकार है। इस आठ तत्वों के पार, ‘अंतर्मुखता का द्वार मिलता है। आठवां पड़ाव अहंकार का होता है, ... यह पार होना कठिन है। दुरत्या है। अत्यधिक सूक्ष्म है, जहां भी विचार है, वहां अहंकार है। यह मैं जब टूटता है, तब ‘माम’ में प्रवेश मिलता है। ‘माम की शरण में’ निरन्तर माम का भजना, परमात्मा का भजना कैसे संभव हो?
इसी क्रम में भगवान ने कहा है-
इस अपरा प्रकृति से भिन्न मेरी जीवरूपा परा प्रकृति को जान, जिसके द्वारा यह जगत् धारण किया जाता है।
... स्वामीजी कहा करते थे- कागज की दो परतें होती है, एक ऊपर एक नीचे, कागज तो एक ही है। इसी प्रकार बाह्य और अंतर्मन को समझा जाए। वह अंतर्मन है, यह विराट से निरन्तर जुड़ा रहने के कारण अत्यधिक शक्तिशाली है। यह जो परा है, जिसके द्वारा यह जगत धारण किया जाता है। मन जब बाह्य भटकाव से हट जाता है। निरन्तर वर्तमान में रहने का अभ्यस्त हो जाता है, तब मन का स्वाभाविक रूप से अन्तर्मन में लय हो जाता है। परा उस पार। वही जो सबको धारण करने वाली है। ... योग.... वर्तमान में रहने की कला है, ... जहां मन जब अंतर्मुखी होता है, तो उसकी ‘प्राण’ से युति होती है। यही योग है। शक्ति जो बाहर दो रूपों में विभाजित थी, वह अब एक हो जाती है, एक होकर वह अब तेजी से भीतर मुड़ती है, ... यही परा है। भाषा के स्तर पर बैखरी, मध्यमा, पश्यंति के पास ‘परा’ है।
‘उस पर जाने का मार्ग- शरीर से नहीं मन से नहीं, मन तो मात्र विचारों का जोड़ है। बुद्धि से नहीं, बुद्धि जब शत प्रतिशत शुद्ध हो जाती है, तब विवेक की प्राप्ति होती है, तब अहंकार सिकुड़ने लगता है, तब अहंकार से परे, उस अपरा के पार, विवेक की किरण से, वह द्वार खुलता है। विवेक ही चाबी है। यह अलौकिक है। तब निरन्तर वर्तमान में रहने से उस माम का स्मरण होता है। यही सुमिरन है। यही पार जाने की कुंजी मिलती है।


































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