Wednesday, November 13, 2013

गीता सार - छठा अध्याय


गीता सार - छठा अध्याय

अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।
स संन्यासी च योगी च न निरर्ग्नि चाक्र्रियः।। (6-1)
‘जो पुरुष कर्म फल को न चाहता हुआ, करने योग्य कर्म करता है वह सन्यासी और योगी है। केवल अग्नि को त्यागने वाला तथा क्रियाओं को त्यागने वाला सन्यासी नहीं है-
पूज्य स्वामीजी ने अपनी साधना को स्वाभाविक अवस्था में रहना कहा है, ... उन्होंने सभी प्रकार के बाह्य दबावों को, पद्धतियों को हटाते हुए  सहज जीवन, शांत जीवन जीने का संकेत दिया था। हम साधन तलाश करना चाह रहे थे, ... पर वहां बाह्य किसी प्रकार के प्रयत्न का आदर नहीं था,। ... छठे अध्याय के कुछ श्लोकों का वे प्रायः सहारा लेकर समझाया करते थे-
अनाश्रित- न चाहता हुआ। कर्म के फल को न चाहता हुआ, ... अनासक्त परन्तु कर्तव्य कर्म में संयुक्त, ... जुड़ा हुआ, ... वही योगी है।

यहां छोड़ने पर बल नहीं है, छूट जाने पर बल है। सारा जोर- अनाश्रित पर है, ... कर्म फल को न चाहता हुआ, ... कर्म से जुड़ा हुआ है। जब तक शरीर है, कर्म तो होगा, ... आलसी व अकर्मण्य होकर बैठ जाना, जीवन नहीं है। परन्तु भीतर से जो आसक्ति है, ... जो फलाकांक्षा है, उसका छूटते जाना है।
लोग पूछते हैं, ... जब फल की आकांक्षा नहीं है, तो कर्म क्यों किया जाए? फल की प्राप्ति नहीं होती है। स्वामीजी कहा करते थे- ‘तुम्हारा कर्म करने में अधिकार है, ... उसे पूरी तन्मयता से करो, आनंद भाव से करो।’
... छूटता और पकड़ता मन है। ... जंगल में भी गए, वहां भी साथ विक्षुब्ध चित्त गया, वहां भी दुख है। वहां भी इच्छा साथ चली जाती है। अनाश्रित जहां कोई सहारा नहीं रहा, ... कोई आश्रय नहीं रहा। जहां इच्छाएं ही गिर जाती हैं। तेरी मर्जी- बस इतना ही। हां, जब इच्छा छूट जाती है, ... गिर जाती है, ... तब पतझड़ के पत्तों की तरह वृक्ष पर नई कौंपले आनी शुरू हो जाती है, मौलिक परिवर्तन वहीं से शुरू होने लगता है। ... फिर जो करने योग्य कर्म है, वही होने लग जाता है।स्वामीजी के शब्दों में- ‘तब अन्तर्मन कार्य व्यवहार संभाल लेता है, सहज स्वाभाविक जीवन में हम प्रवेश कर जाते हैं। गलत कार्य अब होता ही नहीं, ... होगा या नहीं भीतर से प्रेरणा स्वतः आ जाती है। करने योग्य कर्म वहीं होता है, जो बिना इच्छा के होता है, वह कभी गलत नहीं होता है।
भगवान कह रहे हैं, जो फलाकांक्षा से रहित है, कर्म मुक्त है, वही सन्यासी है, योगी है, जहां सारी इच्छाएं गिर र्गइं, वहां मन भी स्वतः विसर्जित हो जाता है। मन, समस्त इच्छाओं का जोड़ ही है।
यहां भगवान कह रहे हैं- इच्छाएं चली जाएंगी, ... फलाकांक्षा नहीं रही, पर कर्म फिर भी होते हैं। क्या कर्म इच्छाओं का स्वाभाविक परिणाम नहीं है? क्या कर्म इच्छाओं से नहीं होते हैं? यहां जो कहा गया है, वह महत्वपूर्ण हैं- कर्म जीवन की शक्ति से होते हैं।
... स्वामीजी कहा करते थे - विराट से निरंतर जुड़े रहने से उससे उठने वाली लहरें निरंतर मनुष्य के नाभि स्थान को स्पंदित करती रहती है, वहां अंतर्मन है, वहीं संस्कार है- वहां निरंतर उठने वाली तरंगों के प्रभाव से बाह्य मन निरन्तर चलायमान होता रहता है- यह प्रभाव, जीवन के स्वभाव की स्फुरणा है, ... वहां शक्ति है, ... जहां विराट की शक्ति का संवेदन है, वहां कर्म का होना स्वाभाविक है। पर अब जो फलाकांक्षा से रहित है, जिसकी सभी कामनाएं गिर गई है, जहां मन विसर्जित हो गया है, वहां इन्द्रियां अंतर्मन से जुड़कर, ... उस परम की प्रेरणा को कर्तव्य कर्म में बदलती रहती है। जब सारी कामनाएं गिर जाती है, ... तब जाना, ... वहाँ उर्जा शुरू में ही संग्रहित होने लग जाती है। तब जो करने योग्य है, जिसे स्वामीजी कहा करते थे- वह नहीं करता, ... प्रकृति करवाती है। ‘दाई विल वी डन’, यह संकेत वहां उभरता है।
सन्यासी- ‘अग्नि’ को छोड़ देते हैं। न यज्ञ न तप,  नहीं, भोजन के लिए अग्नि का सहारा। मात्र भिक्षा। पर भीतर का राग नहीं छूटता है। जिसका राग नहीं छूटा वह सन्यासी नहीं है।
न अक्रिय- यहां अकर्मण्यता का, पलायन का मूल्य नहीं है। क्रियाओं का त्याग नहीं, ... फलाकांक्षा का त्याग, ... राग का त्याग अपरिहार्य हैं।

यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव।
न ह्यसंन्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्चन।। 2।।
जिसको संन्यास ऐसा कहते हैं उसी को तू योग जान,
क्योंकि संकल्पों को न त्यागने वाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता-
- जहां इच्छा होती है, उसमें जिसके साथ प्रगाढ़ता आ जाती है, चिपकाव बढ़ जाता है, वही संकल्प पैदा हो जाता है। संकल्प है- कामना को पूरा करने की दृढ़ता। भगवान यहां कह रहे हैं- जो संकल्प भी छोड़ देता है, वही योगी है।
 इच्छाएं अनवरत पैदा होती रहती है, जो दृढ़ हो जाती है, वह संकल्प बन जाती है, जिसके साथ हमारा मन जुड़ जाता है, मन एक उर्जा है, इच्छा के साथ जुड़ते ही अहंकार वहां आ जाता है। तब संकल्प पैदा हो जाता है।
व्यवहार में हम पाते हैं। संकल्पवान होने के लिए कहा जाता है।

प्रयत्न बिना संकल्प के नहीं होता, पुरुषार्थ संकल्प त्याग के साथ खड़ा होता है। यह विपरीत स्वभाव नहीं है। आप हमेशा कर्म करते नहीं रह सकते। विश्राम भी आवश्यक है। यही सधना ,साधन है। मन अब आपके नियंत्रण में है। वह शांत है, भीतर कोई हलचल नहीं है, पर ज्योंही संकल्प उठा, मन उसके साथ चला गया, कार्य हुआ, मन वापिस अपने मुकाम पर आगया। मन जहॉं गया था, वहीं अटका नहीं रहता। यही बात समझने की है।
पर यहां वही कहा जा रहा है- ‘संकल्पों के त्याग के बिना कोई योगी नहीं हो सकता है। संकल्पों को छोड़ दें। बाह्य मन जो निरंतर बाहर घूमता रहता है, निरन्तर एक न एक इच्छा पैदा करता रहता है। जिस इच्छा का बार-बार चिंतन होता है, वह संकल्प में ढलनी शुरू हो जाती है।
संकल्प छोड़ने का मतलब हुआ, ... यहां प्रकृति की आज्ञा पर चलना, जो हो रहा है, वही स्वीकार है। मालिक की रजा में मेरी रजा है। समर्पण।
पहले सूत्र में आया था- अनाश्रित फलाकांक्षा का त्याग, ... निष्काम कर्म करते रहो- फिर कहा गया है- संकल्प रहित, ... कोई चुनाव नहीं, जो भी आ रहा है, ... फल प्राप्त हो रहा है, सब स्वीकार है, तब जो मिट जाता है, जो खो जाता है, वही दुर्लभ है। यह कोई अलग-अलग कथन नहीं हैं।
पूज्य स्वामीजी के शब्दों में यहां बाह्यमन अंतर्मन में विलीन हो जाताहै, ... यहां बूंद, समुद्र में खो जाती है। पर यही नहीं हो पाता है- ‘फलाकांक्षा से रहित होना, तथा संकल्पों का भी छूटते जाना, ... सधता नहीं है। बाहर का दबाव अपने आपको बचाए रखने के लिए प्रेरित करता है। संकल्प वहीं बनता है, ... जिस इच्छा का बार-बार चिन्तन होने से वह इतनी दृढ़ हो गई है कि उसने अहंकार से एकरुपता पा ली है।
... जाना, ... अपने भीतर जाना, ... जो मान्यता अपनी बना रखी है, वहां से निरन्तर एक प्रवाह सा बना रहता है, ... स्फुरणाएं पैदा होती रहती है, ... दो-तीन बार उसे बार-बार सोचा, वह ठहर जाती है। वही संकल्प बनने लग जाता है। इस स्फुरणा को संगति मन देता है, ... वह इसे ठहराए रखता है, ... वह अगर यह न करे तो स्फुरणा शून्य में विलीन हो जाती है।
 संकल्पों के त्याग से पूर्व, उसकी निर्मिति से पहचान हो जाए तो विचार के उठते ही उसके साथ जो मन संगति देने लगता है, उसे तत्क्षण रोक दिया जाए। यह सदैव हो पाता है निरंतर सजगता से, तब अवलोकन होना प्रारंभ हो जाता है। हर स्फुरणा संकल्प बनने से रुकने लग जाती है, ... यहां जो स्फुरणा के उठते ही उसमें प्रियता, न अप्रियता का भाव , जो पैदा होता है, वह अहंकार से, हमारी अपनी मानी हुयी मान्यताओं से होता है, ... वह उसे एक ठोस रूप देने लग जाता है।
पूज्य स्वामीजी ने इस फलाकांक्षा से मुक्त होने की सहज क्रिया बतलाई है। उन्होंने ‘अन्तर्यात्रा’ में कहा है- जीवन के सभी कार्यों में, अपने मन को पूर्णरूपेण एकाग्र रखते हुए किंचित मात्र भी विपरीत नहीं होने देना चाहिए।“ तब यह आप्त वाक्य मात्र सूचना मात्र ही रह गया था। जाना- जब कर्म पूरा होता है, जहां विचार का लेशमात्र भी उस पर दबाव नहीं होता। तब मात्र वर्तमान उपलब्ध होना शुरू हो जाता है।
तब जिसे छूटना होता है, वह स्वतः छूटता चला जाता है।
जो भी कार्य हो, छोटे से छोटा हो, उसे पूरी समग्रता में किया जाए। वे कहा करते थे- आप चाय पीते हैं, उतनी ही देर आप मात्र चाय   ही पीएं, कोई ख्याल नहीं आने पाए, ... आप कुछ दिन में पाएंगे, ... आपके भीतर कुछ नया होने लग गया है। फलाकांक्षा अपने आप जाने लग गई है। जहां असावधानी होती है वहीं विचार प्रवेश कर जाता हैं।  विचार ही पाप है। विचार हमेशा दूसरे का ही होता है।जहां पूर्णता है, समग्रता है, ... जहां वर्तमान है, वहां मात्र कर्म है, वहां फलाकांक्षा को प्रवेश नहीं मिलता है। वहां संकल्प अपने आप गिरने लग जाते हैं।
 यह ‘आज’ ही हमें उपलब्ध है, इस आज को अभी में, समग्रता में जीना ही वर्तमान में प्रवेश है। पर हमारी आदते हैं, स्वभाव है, हम हमेशा कल के लिए टालते चले जाते हैं।
स्वामीजी गीता के इन दो श्लोकों की प्रायः चर्चा करते हुए वर्तमान में रहने की उपसंपदा सौंपते रहते थे। पर न जाने क्यों, ... शब्द पास तक तो आते थे, ... पर प्रयोगशीलता में नहीं जाने देते थे। .... जाना... जीवन जीने की कला यहीं आकर सीखी जाती है। सोचो कम, चिन्तन  कम करो, बस कर्म, निरन्तर कर्मरत रहना ही, फलाकांक्षा का त्याग व संकल्पों से निःसंकल्पता की ओर ले जाता है।
उपरोक्त विवेचन क्या आचरण में आ सकता है, या यह एक परिकल्पना ही है। पूज्य स्वामीजी कहते थे- हम यहां बैठे हैं, चार घंटे से बातें कर रहे हैं?  बाहर  नहीं गए।तो क्या हम नहीं हैं? हम शरीर से जहाँ होते हैं वहाँ हम मन से नहीं हो पाते।जहाँशरीर हो, वही मन हो, तब जो एक्य स्थापित होता है, वहां मन निरंतर बाहर परिधि पर एक बात से दूसरी में, दूसरी से तीसरी में, इस प्रकार भ्रमण नहीं कर पाता है। वह एक बात से जुड़ा, ... वहां जो भी कार्य होना था, फिर वापिस अपनी जगह, पर अपने मूल निवास पर लौट आता है, ... वहां से फिर दूसरी जगह पर जाएगा, यही स्वाभाविक अवस्था है। जब यह प्राप्त होती है, तब मन का भटकाव समाप्त हो जाता है।
जहां वह लौटता है, वापिस आता है, वह वर्तमान है, वहीं अंतर्मुखता है, वही भीतर की यात्रा का प्रवेश द्वार है।

यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते
सर्वसंकल्प संन्यासी योगारुढ़स्तदाच्यते- 6/4
”जिस काल में न तो इन्द्रियों के भोगों में आसक्त होता है, न कर्मों में ही आसक्ति होता है, उस काल में सर्व संकल्पों का त्यागी पुरुष योगारुढ़ कहा जाता है-“
इसका अगला श्लोक- गीता के छठे अध्याय की आधार भूमि  है, वहां लक्ष्य तक पहुंचना है। पर साधन की चर्चा यहां पर है-
इन्द्रियों के भोगों में स्वाभाविक रूचि है। आश्रम में एक संत आए हुए थे, ... बताया गया था वे मधुमेह से पीड़ित है। साथ ही मीठा खाने के बेहद शौकीन भी है। सन्यासी हैं, पर स्वाद में बेहद रुचि है।तब साधारणजन की क्या स्थिति होगी? वह कैसे इन्द्रियों के दबाव से बाहर आ सकता है।
- इन्द्रियां तृप्त होती हैं, मन की सहायता से। मन जब इन्द्रियों से जुड़ जाता है, तब इन्द्रियां भोग को प्राप्त होती है। सामान्यतः हम यही मानते हैं, शरीर इन्द्रियों का ही एक जोड़ है। इन्द्रियों के बिना शरीर रह भी नहीं सकता है। भगवान यहां कह रहे हैं। अपने उद्धार के लिए जो प्रयास है, होना है, वह यही है कि इन्द्रियों की आसक्ति से पार पाया जाए।
वर्तमान में जब रहा जाता है, तब जिस एक इन्द्रिय के साथ मन रहता है, तब अन्य इन्द्रियां उपेक्षित हो जाती है। यह एक स्वाभाविक स्थिति है कि मन एक साथ दो काम कर सकता है। आप कान से गाना भी सुन सकते हैं, और भोजन भी ले सकते हैं। पहली अवस्था यही है कि आप मन को एक ही कार्य में ले आएँ। एक ही इन्द्रिय के साथ वह रहे।
दूसरा प्रयास, ... जब भी इन्द्रिय अपना दबाव बनाए, तब वहां सतर्कता रहे, ... क्या यह मांग स्वाभाविक है। इन्द्रिय मांग रही है या मन। प्रायः हम उस आदत के साथ एकरूप हो जाते हैं। हमारी मांग इन्द्रिय की मांग बन जाती है। मुझे भूख लगी है या शरीर को भूख लगी है, ... पूज्य स्वामीजी को वर्षों भोजन करते हुए देखा था- एक ग्रास भी वे अधिक नहीं लेते थे। जितना शरीर ने मांगा उतना दे दिया। वे अपनी ओर से एक कण भी अधिक नहीं देते थे। साथ ही वह एक रोटी की भी बेहद तल्लीनता के साथ ग्रहण करते थे, ... मिठाई, फल, सब थाली से बाहर निकाल देते थे।
देखा, अपने आपको देखा, ... हम भोजन करते समय, स्वयं भोजन की इन्द्रिय हो जाते हैं। मुझे भूल लगी है, ... यह क्या बताता है, मेरी मांग और शरीर की मांग अलग हो जाती है। जाना, मैं भोजन नहीं कर रहा हूं, ... भोजन मुझे खींचता चला जा रहा है। दूसरा आग्रह करता है, पेट मना भी करता है, पर फिर लिया जाता है।
जाना, भोजन मन को स्पर्श नहीं करता है, वह पदार्थ है। मन चेतना है। पर मन भोजन के साथ, रसना के साथ एक रूप को जाता है। वही इन्द्रिय बन जाता है।
स्वामीजी को ग्यारह बजे के आसपास भोजन कराया जाता था, ... ज्यादा समय हो जाता तो उन्हे ंभोजन की याद भी नहीं रहती थी। जाना, भूख तो शरीर को लगती है। हमें तो बस पता लगता है, शरीर दो  एक बार कहता है, पर उत्तर नहीं मिलता तो वह भूख भी विदा हो जाती है। लेकिन जब शरीर और मन एक हो जाता है, तब जाना इन्द्रिय की सत्ता बहुत प्रबल हो जाती है।
स्वामीजी कहा करते थे- प्रयोग करो, अनुभव करो, आप शरीर ही नहीं है, उसके बाद भी हैं। जो इन्द्रियों की आसक्ति से मुक्त होता है, वही यह जान पाता है कि वह इनसे परे भी है।
मात्र आत्मा-आत्मा कहने से आत्म ज्ञान नहीं होता है। हम मन को भी नहीं जानते हैं। मात्र उसके क्रियाकलाप को जान पाते हैं। उसके आधार पर कहते हैं कि यह मन है।
सबसे बलवान इन्द्रिय रसना है, जिह्वा है। यह एक साथ दो काम करती है, ... यहां वाणी यंत्र भी है और स्वाद भी है।
अगर बोलते समय सतर्कता रही, ... तो संकल्प लौटने लगते हैं, वे मात्र कामना रूप रह जाते हैं, वहां सतर्कता रही, तो वे बस बिखरने लगते हैं।
यही स्थिति स्वाद की है, यहां सतर्कता बढ़ते ही, ... इन्द्रिय अपना रस खोने लग जाती हैं।
मात्र यह कहते रहना- मैं इन्द्रिय नहीं हूं, इन्द्रिय नहीं हूं। इसमें इन्द्रियों की दासता कम नहीं होती हैे। जहां एक ही इन्द्रिय के साथ मन को पूरी तरह से लगाया जाता है वहां फलाकांक्षा को प्रवेश करने की जगह नहीं मिलती। फलाकांक्षा भविष्य में पैदा होती है। पूर्ण कर्म में, अन्य इन्द्रियां की सत्ता कम होने लगती है। तब इन्द्रियों पर उसकी मांग पर सतर्कता रही, तो फिर प्रमाद में खोया नहीं जाता है।
तब जब भूख लगेगी, तभी आप खाएंगे, ... तभी भोजन करेंगे, सही तरीके से करेंगे। जिसका भोजन पर नियंत्रण हो जाता है। उसका शरीर की हर इन्द्रिय पर नियंत्रण आने लगता है। भोजन का कामवासना से गहरा संबंध है। भूख स्वाभाविक मांग है, भोजन में रुचि वासना से आती है। जब स्वाभाविक भूख की पूर्ति होने लगती है, तब वासना क्षीण होने लगती है। इन्द्रियां रहेंगी, उनकी स्वाभाविक मांग पूरी होगी, परन्तु अनावश्यक चिन्तन के नहीं होने से, इन्द्रियों का दासत्व क्षीण होता चला जाएगा। ... जब इन्द्रियां मन के नियंत्रण में आती है, तब मन स्वाभाविक रूप से बुद्धि के नियंत्रण में आ जाता है, तब गलत कार्य छूटने शुरू हो जाते हैं? जो सहज स्वाभाविक कर्म है, वे आपे आप पूरे होने लग जाते हैं।
यहां बार-बार यही प्रश्न उठ खड़ा होता है कि यह चिन्तन किस प्रकार रोका जावे, ... यह मन की आदत सी हो गई है, ... कोई भी बात आई, वह उससे जुड़ा, ... यहां चिन्तन अनिवार्य बन जाता है। शुभ का चिन्तन कम होता है, अप्रिय का अधिक। मन की यह आदत है कि वह अपनी गलतियों को, भीतर के भय को, विकार को स्वयं खड़ा कर देता है, फिर वह उसके साथ लग जाता है, ... मन का दूसरा छोर बेबस हो जाता है।
स्वामीजी कह रहे थे- यह तो आदत है, पर वर्तमान में रहने से यह आदत धीरे-धीरे कम होती चली जाती है। चिन्तन को चिन्तन से मत हटाना, ... यहां आकर माला जपी, कहीं पर मन को एकाग्र किया तो वह थोड़ी देर को हट जाएगा, फिर तेजी से आएगा, ... क्योंकि मन बहुत शक्तिशाी है, उसने उसे खड़ा किया है, हां, निरन्तर वर्तमान में रहने से, यह कम हो सकता है।कल्पना को अगर सहयोग नहीं मिला तो वह गिर जाती है, वह फैल नहीं पाती है।

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्मात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।। 6/5
अपने आपसे अपना उद्वार करे, अपना पतन  न करे, क्योंकि आप ही अपना मित्र हैं, और आप ही अपना शत्रु हैं, दूसरा कोई शत्रु-मित्र नहीं है।
पूज्य स्वामीजी की जीवन यात्रा में यह उनका आप्त श्लोक रहा था, वे प्रायः इस श्लोक की व्याख्या किया करते थे। यहां संपूर्ण उत्तरदायित्व व्यक्ति पर स्वयं बताया है। बाहर न कोई अपना मित्र है, न शत्रु है, व्यक्ति स्वयं अपने आपको उर्ध्वगमन पर ला सकता है, वह स्वयं ही अपना पतन भी करा सकता है।
व्यक्ति को यह स्वतत्रता उसके जन्म के साथ उसे प्राप्त है। हम वह जो कुछ करते हैं जिससे दुख प्राप्त होता है, तो हम अपने मित्र नहीं है। हम ही अपने लिए दुःख के बीज बोते हैं। प्रकृति का नियम है, जैसा हम बोते हैं, वैसा ही हमें प्राप्त होता हैं। मात्र कामना से, आकांक्षा से अच्छे फल प्राप्त नहीं होते हैं, जैसा हम बोते हैं, वही हम पाते हैं।
 हम... हमारा मन निरंतर दुख की बुनावट करता है, जो भी अप्रिय है,, उसे पकड़ लेता है। हम स्वयं अपना दुख निर्मित करते हैं। हम स्वयं अपने दुश्मन हो जाते हैं, फिर इस पर पीड़ा का विस्तार होता जाता है, हम एक-दूसरे को दुःख देने का प्रयास करते हैं।
भगवान यहां स्पष्ट करते हैं- क्योंकि आप ही अपने मित्र है, ... आप ही अपनी शांति, सुख, सौहार्द के जिम्मेदार हैं, यह आप पर निर्भर करता है कि आप किस प्रकार का जीवन चाहते हैं।
स्वामीजी कहा करते थे- आप जो भी आता है, ... उसके बोलने के पहले उसकी छवि अपने भीतर बना लेते हैं, ... क्या यह उचित है? पहले आप अपने भीतर घृणा का बीज बोते हैं, फिर उसका बाहर फैलाव करते जाते हैं।
स्वामीजी ने कहा था- प्रभामंडल सबका होता है, ... जो लोग सकारात्मक हैं, शुभ में है, उनके पास जो ‘ओरा’ होता है, वह हमें भी हमारे शुभ को बाहर लाने में सहायक होता है, पर जो नकारात्मक है, उनका ओरा हमारे भीतर की गलत सोच को सतह पर ले आता है। दूसरों को तो नहीं पर हम अपने आपको संभाल सकते हैं। अपने भीतर हमेशा सकारात्मक सोच रहे, मंगल की भावना रहे। कोई भी व्यक्ति आपके सामने आए, हमेशा उसका भला ही सोचंे, ... उससे आपका ही भला होगा, ... तुम्हारे भीतर से मंगल की भावना जो उठेगी, वह लौटकर तुम्हारे ही पास आएगी, ... घृणा पैदा करोगी, वह तुम्हारे ही पास लौटेगी।
अपना मित्र वही है जो अपने चारों ओर शुभ से भरा हुआ है, जो सबके लिए मंगल से भरा होता है। उसके भीतर फिर अमंगल ठहर नहीं पाता है। वहां दुख का वरण नहीं होता है। वह स्वयं का मित्र हो जाता है। देह के साथ, मन की मित्रता, ... मन के साथ आत्मा की मित्रता, ... अपने द्वारा ही अपना उद्धार हो सकता है।
अपना मित्र होने की पहली शर्त, अपने आपसे प्रेम करना है, जो अपने आपसे प्रेम करता है, वह गलत कृत्य नहीं कर सकता। वह सदा शुभ के साथ खड़ा होता है, जो अशुभ है, अमंगल है, उसे वह छोड़ता जाता है।
इसी कथन का विस्तार अगले श्लोक में है-
‘‘उस जीवात्मा का तो वह आप ही मित्र है जिस जीवात्मा द्वारा मन और इन्द्रियों सहित शरीर जीता हुआ है और जिसके द्वारा मन और इन्द्रियों सहित शरीर नहीं जीता गया है उसका वह आप ही शत्रु है। शत्रु के सदृश शत्रुता में वर्तता है।
स्वामी जी के सामने, एक सज्जन बैठे थे, बहुत देर से उनके पांव हिल रहे थे, ... स्वामीजी ने पूछा, कोई तकलीफ है क्या? वे चौंके- बोले नहीं तो, ... फिर आपके पांव क्यों हिल रहे हैं, ... आप स्थिर बैठ ही नहीं पा रहे हैं क्यों?
जाना, इन्द्रियां भी एक दूसरे के विरुद्ध कार्य करती रहती है, ... हम दोनों के साथ चल देते हैं। शरीर कहता है, पेट भर गया, मन नहीं मानता, वह कहता है, स्वाद अच्छा है, हम उसकी भी मान लेते हैं।
जाना, ... बाहर-भीतर कहीं एकरसता नहीं है। सोचते कुछ और हैं, कहते कुछ और हैं। मन भी भीतर से बंटा हुआ है, ... बुद्धि भी नीचे आकर, ... जो भी सही या गलत कृत्य है, उसका न्यायोचित ठहराने में संलग्न हो जाती है, ... यह स्थिति अपने आपसे शत्रुता की है। भगवान कृष्ण कह रहे हैं- जो अपनी इन्द्रियों और शरीर का मालिक है वही स्वामी है, लेकिन जिसे अपनी इन्द्रियों पर कोई स्वामित्व नहीं है, जो उनकी दासता में है, ... वह अपना ही शत्रु है। जहां इन्द्रियां मन के अधीन हो जाती है, मन बुद्धि के अधीन हो जाता है, वहां स्वयं का स्वामित्व आ जाता है। वहां शक्ति पैदा हो जाती है। वहां मंगल घटित हो जाता है। हां, इन्द्रियां जब सबल हांे, तभी स्वामित्व पाया जाना शुभ होता है, इन्द्रियों के निर्बल हो जाने पर, ... यह कहना कि वे हमारे अधीन है, अपने आपको धोखा देना होता है।

इन्द्रियों पर स्वामित्व तभी आता है, जब आप अपने आपको इन्द्रिय से अलग मानते हैं। तब आप इन्द्रिय और उसकी मांग को देख पाने में समर्थ होते हैं, जहां मन पूर्णता से किसी भी इन्द्रिय के साथ जाता है, ... जहां कोई विकल्प नहीं रहता( वहां दूसरी इन्द्रियां स्वतः उपेक्षित होने लग जाती है) इन्द्रियों के पास भी अपनी शक्ति है, ... शरीर विज्ञान में उन्हें हारमोन्स कहा जाता है। आप विचार करते हैं, ... क्रोध में है, पिटूटियरी ग्लांड अचानक हारमोन्स पैदा कर देती है, आपके खून मे वे मिल जाते हैं, आप और उत्तेजित हो जाते हैं, आप क्रोध में होते हैं, और रस भीतर पैदा होने लगता है, ... यही इन्द्रियों की शक्ति है, इस पर नियंत्रण जो उससे परे है, उससे शक्तिशाली है, उसके द्वारा पाया जा सकता है, जब इन्द्रियां मन की अधीनता स्वीकार लेती है, तब वे शांत हो जाती है। मन को बुद्धि से नियंत्रण में लाना होता है।

योगी यु´्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः।
एकाकी यतचितात्मा निराशीरपरिग्रहः 6/10

जिसका मन और इन्द्रियों सहित शरीर जीता हुआ है, ऐसा वासना रहित और संग्रह रहित योगी अकेला ही एकांत स्थान में स्थित हुआ निरन्तर आत्मा को परमेश्वर के ध्यान में लगावे-
एकाकी - एकांत में, ... स्वामी जी कहा करते थे- एकांत स्वयं के भीतर होना चाहिए, ... जहां सब प्रकार की विचारणा गिर जाती है। कोई दूसरा साथ नहीं हो। बाहर के जिस एकांत की बात होती है, वहां मन में पचासों स्मृतियां साथ रहती है। भीतर निर्विचारता रहे। वहां अब दूसरे की कोई जरूरत नहीं है। वहीं पर आत्म कृपा होती है। दूसरा नहीं है, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना दूसरे की कोई जरूरत ही नहीं रही है।
ध्यान की चर्चा इस श्लोक में आई है।
इसके पूर्व कहा है, वह निराशी है- आशा रहित, भीतर वासना की लौ भी मिट गई है। साथ ही उसका चित अपरिग्रही है। अपरिग्रह का सरल अर्थ होता है, संग्रह नहीं करना। कोई सामान नहीं, परन्तु उसके साथ है अपरिग्रही चित्त, ... जहां जो वस्तुएं भी है- उनके प्रति कोई ममत्व नहीं है।

शास्त्र के वचन, ... सिद्धावस्था की व्याख्या करते हैं। पूज्य स्वामीजी के पास रहकर जाना था- शब्द वहां अपने आप अपना अर्थ खोल देते हैं। संपत्ति मात्र एक थैला, जिसमें एक जोड़ी कपड़ा, दो चश्मे बस, पूरी संपत्ति, पूरा आश्रम सरकार को सोंप दिया था। वह भी महाप्रयाण के तीस वर्ष पहले, सरकार ने कुटिया उनके लिए छोड़ दी थी। भोजन, गांव से किसी गृहस्थ के यहां से आ जाता था, ... जो भी भेंट आती, वस्तु व धन व तुरंत ही कहीं किसी की सहायता को चला जाता था। अपरिग्रही चित्त, मात्र वस्तुओं का कम होता जाता नहीं है, वहां तो वस्तुओं के प्रति किसी प्रकार की अधिकारी भावना ही चली जाती है। वहां वस्तुओं का संग्रह तो कम है, मात्र उपयोगिता है, उनमें कोई रस नहीं रहता।

एकाकी- हमेशा लगा करता था, ... वे यहां बैठे हुए भी नहीं है। जब दो-तीन बार बोला जाता था, तब संबंध जुड़ पाता था, ... परन्तु वहां कोई नहीं, वे वहां शांत रहते थे, घंटों उन्हें बरामदे में बैठा देखा है। कहीं कोई बाह्य शारीरिक चेष्टा नहीं।
... स्वामीजी कहा करते थे- ध्यान सिखाया नहीं जाता, वे मौन सत्संग की चर्चा करते थे, ... आओ चुप बैठ जाओ। ध्यान कहीं लगाया नहीं जाता। वे जहां थे, वहीं आत्मसात हो जाते थे, ... एक रस, वहां कोई विभाजन नहीं था।
यु´्जनेवं सदात्मानं योगी नियत मानसः
शान्तिं निर्वाण परमां मत्संस्थामधिगच्छति।। 6ः15
निरन्तर परमेश्वर के स्वरूप में लगाता हुआ स्वाधीन मन वाला, ... परम शान्ति को प्राप्त होता है। निरन्तर,..... लगातार।
 जैसे पानी की धार गिरती है, रुक जाती है तो बूंद बन जाती है। ‘‘कान्सटेन्ट अवेयरनेस, ... निरंतर, ... यहां ध्यान घंटे दो घंटे की कोई विधि नहीं है। यह तो निरन्तर रहने वाली अवस्था है। जो इस प्रकार निरंतर स्मरण में है, वह परम शांति को प्राप्त होता है।

इससे पूर्व भगवान कृष्ण ने योगी के लिए, एकाकी अपरिग्रही चित, प्रशान्तात्मा (सही प्रकार से शांत) तथा भय रहित होने का संकेत दिया है। भय सबसे अंत में आता है। अंतिम भय मृत्यु  का होता है। साधारण भय इसी की छायाएं हैं। स्वामीजी कहा करते थे- शान्ति तो भांग पीकर भी आ जाती है। सही प्रकार से शांत, स्वाभाविक अवस्था है।
यहां भीतर की अशांति को दबाना नहीं है। उसे दबाकर बाहर शांत होने का प्रदर्शन नहीं करना है। सच्ची शांति, ... अपने भीतर की अशांति को सही रूप से पहचानने से आती है। तब अशान्ति भी अपने आपको निरुद्देश्य पाकर हट जाती है।
अपनी आत्मा से ही अपना उद्धार होना है, ... अशांत मन की पहचान पहली सीढ़ी है, ... तब हम वास्तविक रूप से अपनी अशांति को जान पाते हैं, ... जानना ही उससे हटना है, उसका टूट जाना है। अशांति का कारण हमको ही पता है, ... वह बहुत नीचे मन की गहराइयों में छिपा रहता है, ... ध्यान अपने भीतर की सफाई है। भीतर से संग्रह को उलीचते जाने की कला है। तभी शांत मन, ... सतत स्मरण में खो जाता है। साधक के लिए आवश्यक है, वह इस यात्रा में पूरी लगन व समझ के साथ प्रवेश करे।
युक्ताहार विहाररस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु
युक्तस्वप्नाबोधस्य योगी भवति दुःखहा।।17
दुःखों का नाश करने वाला योग तो यथा योग्य आहार और विहार करने वाले का, कर्मों में यथा योग्य चेष्टा करने वाले का तथा यथा योग्य सोने और जागने वाले का ही सिद्ध होता है।
स्वामीजी के साथ रहकर इस श्लोक को जाना था, ... आहार इतना सीमित तथा इतना आवश्यक कि एक ग्रास तक ज्यादा नहीं था। शरीर की जितनी जरूरत भी, बस उतना ही, मुक्त प्रयास, जितना आवश्यक था, उतने ही शब्द, ... उतनी ही शारीरिक चेष्टा, बस एक नींद सोते थे। रात की न्यूज सुनी, ... ट्रांजिस्टर बंद किया, सो गए, सुबह तीन बजे जग जाते थे, ... इतना संयमित जीवन वहीं देखा था। भाष्य लिखना सरल है, हजारों पृष्ठ लिख डालो, पर  किसी का आचरण ही भाष्य बन जावे यह अत्यधिक कठिन है।

यह उनका प्रिय श्लोक था, ‘भोजन इतना कि जो शरीर की मांग को पूरा करे, मन की मांग तो बहुत है, वह तो हमशा ज्यादती करता है, ... हर व्यक्ति को उसकी मांग का पता है, ज्यादती वहीं होती है। नींद सबकी अलग-अलग है। बुढ़ापे में नींद स्वतः कम होती जाती है।
जितनी आवश्यक होती है, उतनी नींद आती है, ... ‘युक्ताहार विहारस्य’ एक सही सोच तथा सही व्यवहार की ओर संकेत करता है। स्वास्थ्य तथा स्वस्थ रहने की कुंजी यहां मिल जाती है। ‘युक्त चेष्टस्य कर्मसु’ जितना बल लगाना हो, उतना ही, संपूर्ण उर्जा को एक साथ किसी कर्म में लगा देने से, ... बाद में थकान, तनाव तथा असंतोष आता है। यह सीखना, अपने आप आता है, किस कार्य में कितना बल व समय देना है, यही सम्यक बोध साधना को योगी बनाने में सहायक होता है।
समत्व योग, ... जीवन में समता या संतुलन का आधार है। हर प्रकार की अति यहां वर्जित है। बाधा डालती है। पुरुष जो पुर का स्वामी है। नगर का राजा है। यह शरीर सात करोड़ जीव कोशों से बना है। एक भी कोश में विकार आता है, शरीर बीमार हो जाता है। जहां शरीर की सूक्ष्मतम इकाई यह कोष है, वहीं ‘प्राण’ उस महान उर्जा की सूक्ष्मतम इकाई है। ‘प्राण’ शरीर का पोषण करने वाली शक्ति है। एक शक्ति मन हैं। शरीर में आकर शक्ति दो भागों में विभाजित हो जाती है। प्राण पोषण करती है, मन- शरीर और चेतना के बीच रहकर, ... दोनों का संयोग करती है। कल्पना, स्मृति, विचारणा, उसकी पहचान है।
साधक के लिए योगी होने के लिए पहली आवश्यकता, उसे इस ज्ञान की है।
‘युक्ताहार विहारस्य’ आहार संयम जहां आया, वहां पहला चरण पूरा होता है।
स्वामीजी कहा करते थे- अन्न के सूक्ष्मातिसूक्ष्म कणों से प्राण पोषण पाता है, ... उसी से मन की निर्मिति है, ... यह अत्यधिक महत्वपूर्ण है, ... आहार अपनी मेहनत की कमाई का हो, ... उसे बनाने वाला पवित्र हो, ... तथा उसका ग्रहण शुद्ध मन से किया जाए, ... साधना में आहार ग्रहण पर बहुत बल है। यहां भोजन को, प्रसाद रूप में ग्रहण किया जाता है।
आहार-शरीर के पोषण के लिए है, मन के रंजन के लिए नहीं। मन की तृप्ति के लिए नहीं है। तब आहार-युक्त हो जाता है। उचित हो जाता है।
‘विहार- भी युक्त हो, सम्यक हो। हम स्वयं जानते हैं कि हमारे लिए क्या उचित है? उस रूप में जीवन जीना चाहिए। सामर्थ्य का सदुपयोग- विहार को उचित बनाता है। नियम हमारे लिए है, हमने बनाए हैं, ... जो हमें सुखद है, उचित है, विवेक सम्मत है, उसका पालन होना चाहिए।
‘युक्त चेष्टस्य कर्मसु-
कर्मों में यथा योग्य चेष्टा करने वाला। आज कहा जाता है, आप सब कुछ कर सकते हैं, अनंत संभावनाएं हैं, ... हर व्यक्ति दौड़ रहा है, ... वह चाहता है, दिन और रात काम करने के लिए छोटे पड़ गए हैं। काश पूरा दिन अड़तालीस घन्टे का होता।
रहीम दास कह गए थे- जहां सुई काम करती है, वहां तलवार का क्या काम है? पर आज छोटे से छोटा काम भी हो, पूरी ताकत लगा दी जाती है। एक तनाव सा व्याप्त हो जाता है।
... दूसरी बात क्या करना है, क्या नहीं करना है, यही भूल गए हैं। अंधानुकरण है, बस किए चले जाते हैं। पूज्य स्वामीजी सही शब्द को प्रयोग में लाते थे। सही वही है, जिसकी सबसे पहचान है। पर बुद्धिचातुर्य का सहारा लेकर हर गलत को सही बनाते चले जाते हैं। धन कमाना है, पर उसके लिए नीति-अनीति खोकर, सब कुछ दांव पर लगाए चले जाते हैं। कर्मों में सम्यक चेष्टा- जो किया जाना है, जा सकता है, वह कर देना चाहिए। इसका निर्णय स्व विवेक ही करता है, उसका आदर होने से, प्राप्त सामर्थ्य का सदुपयोग स्वतः होना है।
मैंने जब यह जाना, .कुछसमझ.. पाया, तब लगा बहुत कुछ समय व्यर्थ में ही  चला गया। ‘पांव’ में दर्द था, ... जाना खटाई से बढ़ जाता है, पर स्वाद में खटाई छूटती नहीं थी। शब्द भीतर तक गए, ... हलचल मची, ... स्वाद ही चला गया। छोड़ा कुछ नहीं, जिसे छूटना था वह स्वतः होता चला गया।

कहां जाना है, क्यों जाना है, ... एक आदत सी हो जाती है। अपने एकांत में होने में डर लगता है, ... धीरे-धीरे विहार युक्त होने लगता है। जहां आवश्यक है, वहीं रहना है। भाषा तभी संयत होने लगती है। विचारणा पर अंकुश लगता है। बहिर्मुखता की खंूटियां बाहर है, ... मन बार-बार एक न एक खूंटी को पकड़ना चाहता है। पर जहां आवश्यक है वहीं रुका जावे, जो अनावश्यक है, वह अपने आप भीतर से गिरना शुरू हो जाता है।
... कर्म में युक्तता, ... जाना, बहुत कुछ किया उसकी कोई आवश्यकता नहीं थी। क्यों किया? खुद को ही पता नहीं था। संभवतः अंधानुकरण तो था ही, भीतर लोभ भी था, यश की कामना थी ....।  स्वामीजी कहा करते थे- ‘प्याज के छिलके उतारते जाओ, अंत में क्या शेष रह जाता है, जानो, सच, जीवन में जो भी बहुत कुछ किया, ... शायद तब उसकी भी करने की कोई जरूरत नहीं थी। यही बोध, ... गीता के इस महान संकेत की ओर ले जाता है- ‘‘युक्त चेष्टस्य कर्मसु’ जीवन में करना तो है जब तक शरीर है, तब तक कर्म तो होंगे। पर क्या करना है, कितना करना है, यही सम्यक बोध है? कितना कहां जरूरी है, बस वहां उतना ही, ... यही बोध वर्तमान में लाने में सहायक होता है।
यह सही है कि मनुष्य इसी जीवन में अपने ही द्वारा अपने मूल स्त्रोत तक पहुंच सकता है, और वह अपने कर्मोंसे निम्न योनियों तक पुनः पहुंच सकता है। सारा जीवन , और उसकी शिक्षा उसे बस बाहर ही भटकने का मार्ग सोंपते हैं। जब वापसी होती है तब उसके पास अपना कुछ भी नहीं रहता।
स्वामीजी ने कहा है- जो भी कर्म वर्तमान में है, वहां मन को पूरी तरह से लगा दो- किंचित मात्र भी विपरीत में नहीं जाने देना चाहिए, जहां जरा सी भी जगह हुयी, ... वहां मन तुरंत विचारणा में चला जाएगा। वहां आकांक्षा आ जाएगी। फलाकांक्षा प्रवेश कर जाएगी। वहां कल्पना- भय में ले जाएगी। जहां कर्म पूरा नहीं होता है, ... वहां वह अधूरापन स्मृति में टंग जाएगा, ... उसके फल को भुगतना पड़ता है। वह स्मृति में आकर संस्कार बन जाता है। वह खाना खाते समय, मंदिर में, पूजा में, ध्यान में आता है। जहां वहीं पूरा कर दिया, वहीं छोड़ दिया, चिंतन नहीं रहा, न होगा तब न तो उसका भोग बनता है, न स्मृति आती है। वहां उसका बोझा नहीं बनता।
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्ध योगसेवया
यत्र चैवात्मनात्मानं  पश्यन्नात्मनि तुष्यति।ं 6-20

जिस अवस्था में योग के अभ्यास से निरुद्ध  हुआ चित्त उपराम हो जाता है। और जिस अवस्था में शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि के द्वारा परमात्मा को साक्षात करता हुआ परमात्मा में ही संतुष्ट रहता है।
चित्त का प्रवाह संसार की ओर ही होता है, हमारी भावना भी है, संसार से हमें सुख प्राप्त होता है, यह एक कल्पना ही नहीं है, संसार में हम अपने सुख का आधार पाते हैं। बड़े-बड़े महात्मा भी जहां इस श्लोक की व्याख्या में ‘योग से उपरामता’ पाने की स्थिति को बताते हैं, वहां वे भी ‘योग’ से संपत्ति तथा यश एकत्र करने की कामना रखते हैं। योग की चर्चा करते-कराते अरबों का व्यवसाय खड़ा कर देते हैं।
पूज्य स्वामीजी कोे देखा था, ... ‘वे कहा करते थे- ब्रह्मनिष्ठ गुरु का होना आवश्यक है, जिसकी निष्ठा मात्र ब्रह्म में हो, साथ ही वह श्रोत्रिय भी हो, वह दूसरों का बता भी सके- मार्ग दिखा सके। ‘ब्रह्मनिष्ठ’ मात्र अवधारणा नहीं होती वह अनुभवन से प्राप्त होती है।
स्वामीजी कहा करते थे- संसार सुख मय है, ... परमात्मा ने प्राणी को यहां सुख पाने भेजा है, वह अपनी मूढ़ता में दुख की तरफ दौड़ता है। जीवन का उद्देश्य इसी जीवन में स्थाई सुख व शांति पाना है। बुद्ध ने जब जगत की दुःख की चर्चा की, ... तब उन्होंने ‘दुख से मुक्ति का उपाय तलाशा, ... दुःख से छुटकारा होता है, ... तब दुःख व सुख से परे जब साधक पाता है, वहां शांति है, स्थाई सुख है। दुख का वरण वहां भी नहीं है। जीवन जीने की कला यही है कि हम परमात्मा की इस सृष्टि में जो उन्होंने दिया है, उसका सदुपयोग करें तथा प्रकृति के कार्य में अपना सहयोग दें।

‘योग की परम अवस्था में उपरामता स्वाभाविक रूप से आती है। जिस संसार की और पहले मुख सदा रहता है, वहां अंतर्मुखता की प्राप्ति पर पीठ हो जाती है। वृत्तियां जहां धकेलती रहती थीं, वहां वे धक्का तो देती है, ... पर वे टकरा-टकराकर लौट जाती है। जहां मन दिन-रात भटकता रहता था, ... वहां नहीं जाता।
उपरामता- मन का नाश नहीं है। यहां मन स्वतः नियंत्रण में आ जाता है। मन, बुद्धि में डूब जाता है। इन्द्रियां मन में डूब जाती है।
निरोध- दमन नहीं है। स्वामीजी कहा करते थे- ‘गहरी समझ जब वृतियों के प्रति होती है, तब वृतियां प्रभावित नहीं कर पातीं। यहां मन का बर्फ हो जाना कहा जाता है। वहां अब लहरे ही नहीं उठतीं, ... तथा बाहर के संवेगों के लिए मन का पत्थर हो जाना कहा जाता है, शिला से, ... लहरें टकरा-टकराकर लौट जावे, ... यह निरु( अवस्था है। लहरें तो उठेंगी, पर तितिक्षा रहेगी। अप्रभावित होने की क्षमता बढ़ती जाती है।

सामान्यतः विषय बाहर होते हैं, इन्द्रियां को वे खींचते है, ... व्यक्ति अपने आपको इन्द्रिय ही मान लेता है। चेतना का धर्म है, वह पदार्थ के साथ मिलकर, पदार्थ की भावना में रंग जाती है। हमें वही सत्य दिखाई पड़ता है। तब इन्द्रियां बाहर खींचती है। जो भी वृति उठती है, मन उसी इन्द्रिय के साथ चला जाता है, मन एक उर्जा है, बुद्धि भी उसमें डूब जाती है, ... विषयों से तृप्ति नहीं मिलती, ... एक के बाद दूसरा विषय आता है, ... चेतना भी उसी इन्द्रिय की भावना में चली जाती है। उसी रंग में रंग जाती है।
लेकिन जो योगी हैं, वह सबसे पहले जब अंतर्यात्रा पर आता है, तो वह विषयों की पराधीनता से हटता है। इन्द्रियां तो रहेगी, बाहर विषय भी होंगे, ... मन भी रहेगा, पर मन अब जिस इन्द्रिय के साथ जाना होगा, ... जाएगा, नहीं  तो लौटकर अपने स्थान पर आ जाएगा। परिधि पर भटकने की आदत कम हो जाती है। यह पहली सीढ़ी है। इसे यों समझा जाए। हथेली पर चार अंगुलियां एक अंगूठा है। चाहे तो एक से दो- दो से तीन, जाया जा सकता है। या पहली अंगुली से नीचे कलाई पर आया जाए फिर दूसरी अंगुली पर जाया जाए, ... मन इस प्रकार भ्रमण कर सकता है। वह जो कलाई पर आता है, ... वह उसका मूल स्थान है। वही वर्तमान है। वही क्षण और क्षण के बीच का, विचार और विचार के बीच का वह अंतराल है जिसे अवलोकन के बाद, साक्षी रूप में पाया जाता है।

‘यं लब्धा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते।। 6/22
परमेश्वर की प्राप्तिरूप जिस लाभ को प्राप्त होकर उससे अधिक दूसरा कुछ भी लाभ नहीं मानता है और भगवत्प्राप्ति रूप जिस अवस्था में स्थित हुआ योगी बड़े भारी दुख में भी चलायमान नहीं होता है।
 जिसे इसी जीवन में परमात्मा की महान शक्ति का साक्षात्कार हो जाता है, उसके लिए फिर सभी कुछ नगण्य है। वह परम को पाकर फिर और कुछ पाने की आकांक्षा से रहित हो जाता है, ... साथ ही सुख व दुःख के प्रति उसकी कोई स्पृहा नहीं होती। फिर उसका पतन नहीं होता। संसार में उसके लिए कोई आकर्षण नहीं रहता। बड़े से बड़ा दुःख भी उसे विचलित नहीं कर पाता।
ये शब्द मात्र शब्द ही रह जाते- पूज्य स्वामीजी से अगर इतने वर्ष का सानिध्य नहीं होता। संसार के प्रति उनमें किसी प्रकार का आकर्षण नहीं था।
वर्षों पैदल ही चलते थे, साधारण बस में सफ़र करते रहे। अपने लिए कभी किसी विशेष सुविधा नहीं मांगी। बड़े से बड़े संकटों में भी शांति से सामना करते रहे।
दुख इसीलिए कष्टकारी होता है कि वह हमें बहुत लंबा लगता है, भले ही आज का सुख कल दुख में चला जाए पर हम सुख की लालसा में दौड़ते हैं। साधारण दुख तो हम रोज भोगते हैं पर भय हमेशा, ... असाधारण दुख के आगमन का होता है। उसकी कल्पना ही कंपन दे जाती है।
परन्तु जो योगी हैं, जो अन्तर्मुखता को प्राप्त हैं, ... वह बाहर के थपेड़ों को उसी तरह बर्दाश्त करता है, जैसे लहरें तट से टकरा-टकराकर लौट जाती है। तट आनंद तट हैं। यह हमारा स्वभाव है, हमारे भीतर का दुःख ही बाहर से दुःख को बुलाता है। हम नहीं बुलाते, नहीं पकडं़े तो दुख लौट जाता है। स्वामीजी कहा करते थे, बचपन में पिता नहीं रहे, उनकी स्मृति भी नहीं है, युवावस्था में मां चली गई, ... परिवार में कोई नहीं था, ... जब मैं यह पा सकता हूंँ तो आप क्यों नहीं, आपको तो सभी सुविधाएं हैं। जहां भीतर आनंद रहता है, वहां उसकी पहचान मात्र प्रेम हैं। वहां कितनी भी विपरीत परिस्थितियां आ जाएं, वे उसे हिला नहीं पाती।
शास्त्र का वचन है, ... पानी से पानी मिलता है, कीच से कीच, समाज में मैत्री होती है। जहां भीतर दुःख है, वही दुःख को अपने पास खींचता है। योगी के भीतर अहर्निश आनंद भाव तरंगित रहता है, वह चारों तरफ से आनंद को अपने पास बुलाता है।
स्वामीजी कहा करते थे- पाना है तो आत्मकृकृपा पाओ, जिसे आत्मकृपा मिल गई है उसके लिए फिर किसी और कुछ को पाना व्यर्थ है, बाहर की ओर उसकी आंख उठती ही नहीं है। जिसे परमात्मा ने वरण कर लिया है, अपना मान लिया है, वह उसकी निगाहों से कभी ओझल नहीं होता, ... प्रकृति उसके कार्यों को पूरा कर देती है, ... क्या मान क्या अपमान सब महत्वहीन हो जाते हैं, ... ‘‘‘हैं चाकर रघुवीर के पटव लिखी दरबार’,’’ ।
यतो यतो निरति मनंचलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत।।6/26
यह स्थिर न रहने वाला चंचल मन जिस जिस कारण से सांसारिक पदार्थों में विचरता है उस उससे रोककर परमात्मा में ही निरोध करे-
- मन तो चंचल है, यह उसका स्वभाव है। उसके स्वभाव को, जो उसकी प्रकृति है। बदला नहीं जा सकता। चंचलता न हो तो वह इन्द्रियों से प्राप्त सूचना को बुद्धि के पास नहीं ले जा पाए, ... वह पत्थर हो जाए, ... नाश हो जाए तो शरीर ही नाश हो जावेगा।
स्वामीजी को देखा, ... घंटों शांत रहते थे, ... चुप, लगता ही नहीं था कि वे यहां है भी, ... पर जब कोई सामने आया, ... उसने दो तीन बार कुछ कहा- संबंध जुड़ जाता था। कहते थे यहां सब डिस- कनेक्ट रहता है, संबंध टूटा सा रहता है। ऐसा नहीं है। इन्द्रियों में दोष है, वृत्तियां भी रहेगी, ...पर वे प्रभावित नहीं कर पाती है। मन नियंत्रण में आ जाता है। स्विच आन किया लाइट जल गई, ऑफ किया बंद हो गई, प्रकाश तो था।
मन से लड़ना, क्या कोई उससे लड़कर उसके पार जा सकता है। मन को सहयोग में लेना होता है। जब मन अंतर्मुखी होता है, वही परमात्मा तक ले जाता है। जब वह बहिर्मुखी होता है, संसार में ले जाता है।
मन जब बाहर का भटकाव छोड़ता है, तब सबसे पहले वह इन्द्रियों से सिकुड़ता है, ... विषय इन्द्रियों से परे हैं, ... मन एक गति है, वह स्थिर नहीं हो सकता है। तब अचानक उसकी गति भीतर की ओर हो जाती है, वह अब भीतर भी जाताहै, बाहर भी जा सकता है। जहां भीतर वह रहता है, ... वही उसका मूल निवास स्थान है, ... वही परम धाम है। मन यहां नियंत्रण में रहता है। स्वामीजी के साथ रहकर जाना है, ... वे शास्त्र की अपने आचरण से व्याख्या कर रहे थे। उनके समीप बैठते ही शब्द अपने आप अर्थ खोल जाते थे।
भगवान ने यहां कहा है, मन तो चंचल है, पर उसका निरोध हो सकता है, जब मन किसी इन्द्रिय के साथ जाता है, तब हम उस इन्द्रिय के साथ अपने आपको जोड़ देते हैं। उससे एकरूप हो जाते हैं, तभी मन दौड़ता है,  वह उधर गति करता है। पर अगर हम उस इन्द्रिय के साथ नहीं गए, साक्षी हो गए। तो वह विषय और इन्द्रिय के बीच का संबंध टूट जाएगा। यह संबंध मन बनाता है। हमारे संबंध से, हमारे जुड़ने से, हमारे एसोशिएट होने से वृत्ति को ताकत मिलती है, हम दूर हो गए, हमने उसका आदर नहीं किया तो वह अपने आप विसर्जित हो जाती है, ... यही मात्र जगना कहा जाता है। यही सतर्कता है।
यु´्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगत कल्मषः।
सुखेन ब्रह्मसंपर्शमत्यन्तं  सुखमश्नुते।। 6-28
पाप रहित योगी इस प्रकार निरन्तर आत्मा को परमात्मा में लगाता हुआ परम आनंद को अनुभव करता है।
... स्वामी जी कहा करते थे- ‘स्मृति पाप है, यह ‘वर्तमान में नहीं रहने देती। भगवान ने गीता में कहा है ‘जो पाप से रहित है और जिसका रजोगुण शांत हो गया है जहां रजोगुण का आधिक्य है, वहां पाप पैदा होता है। मन त्रिगुणात्मक है, उसमें सतोगुण भी है, रजोगुण भी है तथा तमोगुण भी है। तमोगुण स्थैतिक उर्जा है, रजोगुण-गत्यात्मक उर्जा है, ... तथा सतोगुण स्वभाव है, जहां तमोगुण का आधिक्य है, वहा आलस्य है, ठहराव है, रजोगुण में गति है, चंचलता है, जहां तम व रज में संतुलन प्राप्त होता है।
वही, ‘युक्ताहार विहारस्य’, ... वहां ‘संतुलन सत‘ को जन्म को देता है। वहां सभी गुणों का संतुलन प्राप्त होता है, जहां रजोगुण का आधिक्य होता है, ... वहीं पाप में प्रवेश होता है।
‘‘जो पाप से रहित है, वही परमात्मा की ओर झांक पाता है, ... उसके जीवन में परमात्मा को पाने की इच्छा जागृत होती है, और जो पापी है, वह पदार्थ की ओर झुका रहता है। संसार में उसके लिए आकर्षण रहता है।
स्वामीजी कहा करते थे- संसार तो जब तक शरीर है, रहेगा, ... उससे बाहर कहां जा सकता है? पर निरंतर संसार का चिन्तन ही करते रहंे, यह गलत है। संसार उपयोग के लिए है। उपभोग के लिए नहीं। जितनी आवश्यकता हो उतना लें, प्रकृति हर प्राणी की आवश्यकता की पूर्ति करती है। बिना पदार्थ में, संसार में डूबे हुए, आत्मा को परमात्मा की ओर ले जाना, अंतर्मुखी होना ही जीवन जीने की कला है।
मैंने जाना, मैं सोचता हूं, फलां चीज र्ले आउँ, वह इच्छी है, ... यह विचार ही मुझे बाँध लेता है। वस्तु तो रखी है, विचार नहीं हो तो वह स्पर्श भी नहीं कर पाती। जाना वस्तु की मुझसे प्रीत नहीं है। मेरी वस्तुओं से प्रीत है, मैं विचार करके ही बंध जाता हूं।
... विचार से मेरे भीतर जो एक चिपकाव पैदा होता है, वह संबंध जोड़ लेता है। पदार्थ का चेतना से कोई सीधा संबंध जुड़ता नहीं, ... हां चेतना में उठता विचार संबंध जोड़ता रहता है।
विचार का जन्म स्मृति से होता है। स्मृति के पास शक्ति है, वह एक हल्के आघात से अनंत विचारणा की लहर पैदा कर सकती है। निरन्तर वर्तमान में रहने से, स्मृति से असहयोग होना शुरू हो जाता है। विचार के उठते ही  अगर उसे सहयोग मिलता है, तब वह बहुत दूर तक चला जाता है।
असहयोग मिलते ही उसकी गति मंद पड़ जाती है, ... वह निःशेष हो जाता है।

‘यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति। 6-30
जो पुरुष संपूर्ण भूतों में मुझको देखता है और सबको मुझमें देखता है उसके लिए मैं अदृश्य नहीं होता हूं और वह मेरे लिए अदृश्य नहीं होता है-
यह स्वामीजी का प्रिय श्लोक था। वे कहा करते थे - ‘हमारे दो हाथ हैं, परमात्मा जब देता है, तब दो हाथ से आप कितना ले पाते है, ... पर जब वह लेता है, उसके तो अनंत हाथ हैं, ... कभी विचार किया है। वह अदृश्य है, उसके लिए जो संसार में डूबे हुए हैं। सही गलत किए जाते हैं, ... तुम किससे छिपा रहे हो, किसे दुःख दे रहे हो, ... वह भी परमात्मा है, ... यह कोई वैचारिक अवधारणा नहीं है। यही प्राकृतिक विधान है।
परमात्मा को जब तुमने देखना शुरू किया, ... पाओगे, वह सब जगह से तुम्हें देखता है। .... स्वामीजी कहा करते थे- ‘तब प्रकृति सारे कार्य व्यवहार संभाल लेती है, ... जो संभाव्य है वही घटना शुरू हो जाता है। न होना है, अपने आप पता लग जाता है। उनके पूरे जीवन की घटित घटनाएं बताती है कि अदृश्य मानो संचालित कर रहा हो। यह तभी घटता है, तब साधक, संसार की ओर पीठ करके, परमात्मा की तरफ अपना ध्यान देना शुरू करता है। तभी वह देखना शुरू कर सकता है। बड़े-बड़े संत, ज्ञानी, चर्चा परमात्मा की करते हैं, पर उनका सारा ध्यान सोच संसार की तरफ रहता है। तब शब्द ऊपर से निकल जाते हैं। पूज्य स्वामीजी को वर्षों देखा, ... लगता था, मानो ये शब्द जागृत हो गए हांे, ... ‘‘उसके लिए मैं अदृश्य नहीं होता हूं वह मेरे लिए अदृश्य नहीं होता है।’’
यह साधना की परमावस्था है, ... संसार की ओर पीठ करना, इन्द्रियों की सत्ता से बाहर आने के बाद शुरू होता है। मन इन्द्रियों से सिकुड़ लेता है, ... उसे बाहर भटकने की जगह नहीं मिलती, ... तब वह रुकता है और चूंकि वह गति है, तब उसकी गति भीतर की ओर हो जाती है। भीतर धाम परमात्मा का है। ‘चालां वाही देस’ यह भीतर कहा करती थीं ... वहां जाने की तैयारी है।

‘‘असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्मते।। 6-35
इससे पूर्व, अर्जुन ने कहा था- यह मन बड़ा चंचल है, मैं इसे वश में करना वायु की तरह अति दुष्कर मानता हूं।
तब श्री भगवान कृष्ण ने कहा- ‘‘अभ्यास अर्थात् स्थिति के लिए बारम्बार यत्न करने से और वैराग्य से वश में होता है।
‘‘अभ्यास है, जो सुना गया है उसे मात्र मनोरंजन के लिए या जिज्ञासा के लिए नहीं रखा जावे, वरन् प्रयोग में लाया जावे। प्रयोग ही परिवर्तन लाता है। अभ्यास का आधार है, जो प्राप्त है उसे बदला जा सकता है, परिवर्तन लाया जा सकता है। मन बहिर्मुखी है, उसे अन्तर्मुखी बनाया जा सकता है। वह अवधारणाओं से बंधा है। स्वामीजी कहा करते थे- ‘अवधारणा दुष्कर्म है, ... जब तक कंडीशनिंग रहती है, मन बंधा रहता है। वही संस्कार है। वही स्वभाव बन जाता है। बदलाव इसी जगह पर होता है। निरंतर वर्तमान में रहने से, कंडीशनिंग बर्फ़ की तरह पिघलने लगती है। अनावश्यक विचारणा का जन्म स्मृति तथा अवधारणा के सहयोग से होता है, अभ्यास उसे निर्मूल करने की तैयारी है।

पर अभ्यास क्यों? अभ्यास क्यों किया जाए, सच मंे हम कुछ पाने के लिए ही तो अभ्यास करते हैं। आज के ‘योग प्रवर्तक’ यही करते हैं, कुछ करोगे तो पाओगे- वहां योग सरलीकृत होकर स्वास्थ्य लाभ का आधार बन गया है। पर यहां गीता में अभ्यास वैराग्य के साथ आया है।
‘विराग, राग के प्रतिकूल यात्रा है। राग संसार के प्रति होता है, जब तक संसार में आशापूर्ति की संभावना है, वैराग्य नहीं आता। पूज्य स्वामीजी कहा करते थे- ‘वैराग्य का अर्थ सन्यास ग्रहण मान लिया है, यहां तो अधिकांश सन्यासियों में ‘राग’ गर्दन तक भरा मिलता है, ... फिर विराग क्या है? सिर्फ वाणी में वैराग्य है।
इस वैराग्य को पाने के लिए, संसार का परित्याग करना मार्ग नहीं है, राग का फैलाव हमेशा आने वाले ‘कल’ में होता है। ‘मन की शक्ति है’ कल्पना, राग कल्पना के साथ आगे बढ़ता है। ‘त्याग, वास्तविक त्याग स्मृतियों का है। स्वामीजी कहा करते थे- वही तो आपकी संपत्ति है, जो साथ जाती है, उससे असहयोग उसको छोड़ते जाना ही त्याग है, ... निरन्तर वर्तमान में रहने से, यह त्याग स्वतः होने लगता है। जहां स्मृतियां छूटती है, वहीं अनावश्यक विचारणा का हस्तक्षेप कम होने लगता है। वैराग्य जगत के आकर्षण से वितृष्णा नहीं है। जगत तो जब तक शरीर है, तब तक रहेगा, ... तब मात्र जो उपयोग है, वही होगा। उससे एकाकी भाव में स्थिति होगी, ‘अपरिग्रही वृत्ति होगी, ... परन्तु भटकाव कम होता चला जाएगा।’
‘‘कल, ... हमेशा नई कामना के साथ आता है, वहां कल्पना होती है, यह होगा, वह होगा, ... पर जहां राग है, वहां कल मनोहारी है, जहां विराग है, वहां कल आज का ही विस्तार है, ... जो आज में है, वही कल है, वहां स्वाभाविक रूप से कल्पना का दबाव निःशेष होता जाना है। तब ‘संतोष’ स्वतः उपजता है। यहां पलायन नहीं है। जीवन की व्यर्थता का बोध नहीं है, वरन् जो उपलब्ध है, उसे सारगर्भित बनाते हुए जीने की आकांक्षा है, तब जो गति है, वह अंतर्मुखी हो जाती है। अंतर्मुखता ही ‘विराग’ है। जो चित की धारा बाहर जाती है, वह ‘राग’ है, जो भीतर लौटती है, वह विराग है। इस भावना को प्रगाढ़ता देते हुए मन को भीतर, निरन्तर भीतर लाने का प्रयास ‘अभ्यास’ कहलाता है। अभ्यास इस वैराग्य को, इस अन्तर्मुखता को बनाए रखता है, इसे दृढ़ता देता है।

पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं  तात गच्छति।ं40

उस पुरुष का नतो इस लोक में न उस लोक में न परलोक में ही नाश होता है।कोई भी शुभ कर्म करने वाला दुर्गति को प्राप्त नहीं होता है।
अर्जुन का प्रश्न था,आधे मन से ईश्वर की ओर बढ़ा पुरुष, जो कभी संसार की ओर बढ़ता है कभी ईश्वर की तरफ क्या वह बादलों की तरह नष्ट तो नहीं होता है?
इस प्रश्न का उत्तर ‘ईशावास्योपनिषद में भी आया है।
जो अविद्याा के उपासक है,वे अंधकार में जाते हैं,पर जो मात्र विद्या के उपासक हैं वे उससे गहन अंधकार में जाते हैं। भगवान यहाँ उस प्राकृतिक विधान को स्पष्ट कर रहे हैं जहाँ कुछ भी नष्ट नहीं होता है, हम जैसा बोते हैं, वैसा ही प्राप्त होता है।यह अनादि क्रम है। यह व्यवस्था है।प्राणी जगत में जो विभिन्नता है ,उसका यही आधार है।प्राणी जगत में अधोगति तथा ऊर्घ्वगमन का यही आधार है।


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