Saturday, November 16, 2013

श्री गुरुगीता अध्याय-8


 श्री गुरुगीता अध्याय-8

‘‘तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पित मनोबुद्धि र्मामेवैैष्यस्य संशयम्।। 8-7

‘‘इसलिए सब समय में ;निरन्तरद्ध मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर इसी प्रकार मेरे में अर्पण किए हुए मन-बुद्धि से युक्त हुए निःसंदेह मेरे को ही प्राप्त होगा।

अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्य युक्तस्य योगिनः 8-14

‘‘भगवान कृष्ण यहां अर्जुन से कह रहे है- जो पुरुष मेरे में अनन्य चित्त से स्थित हुआ सदा ही निरन्तर मेरे को स्मरण करता है उस निरन्तर मेरे में स्थित हुए योगी के लिए मैं सुलभ हूँ।
तू सब समय में मेरा स्मरण भी कर और युद्ध भी कर... सामान्यतः यह माना जाता है कि इसमें कठिनाई है, हम दो कार्य एक साथ कैसे कर सकते हैं?
यह सही है कि चित्त का स्वभाव ऐसा है कि वह एक बार में एक जगह ठहर पाताहै, दूसरी पर आते ही मन पहली जगह से हट जाता है। इसलिए कहा जाता है, व्यक्ति बहु-चित्त वान है। इस श्लोक की अनेक व्याख्याएँ हुई हैं।यह भी कहा है कि परमात्मा का स्मरण  किसी नाम को दोहराना है। पर यह भी सदा नहीं हो सकता। तब यह कहा जाता है कि भगवान कृष्ण जिस स्मरण की बात कर रहे हैं, ... वह और है। मैं अपने भीतर अनुभव रखूं, कि सब जगह परमात्मा है। जो भी दृश्य जगत है, सब में सब जगह परमात्मा है। यह बोध यह अवेयरनेस बनी रहे, अगर यह बोध बना रहे, तो हम काम भी कर सकते हैं तथा स्मरण भी बनाए रख सकते हैं।
पूज्य स्वामीजी को यह श्लोक प्रिय था। उनकी एकान्त साधन प्रणाली का यह आधार था, ... वे कहा करते थे... बोध रखना, ... क्या क्रिया है, ... क्या दो क्रियाएं एक साथ हो सकती है। भीतर अवेयरनेस रहे, सब परमात्मा का है, सब जगह परमात्मा है, आप कार्य भी करते रहे क्या यह व्यवहारिक है? प्रयोग करके देखे? यहाँ जोर युद्ध करने पर है,पीछे है मुझे निरन्तर स्मरण करते हुए।

वे कहते थे, दो मंजिल का मकान है, ऊपर कोई रहता है, नीचे सांकल बजी, वह नीचे आया, ... बात की, ... फिर वह तत्कार ऊपर चला जाता है, वह नीचे ही नहीं रह जाता है। यह जुड़ना दो प्रकार का है। हम निरन्तर बाहर ही जुड़े रहंे, भटकते रहंे, या जुड़े भीतर से रहंे, बाहर भी आते-जाते रहें।
मन, एक बात से दूसरी में, दूसरी से तीसरी में, तीसरी से चौथी में, निरन्तर चक्राकार घूमता रहता है। जब कहा जाता है, वर्तमान में रहो, तब क्या होता है, जहां क्रिया होती है, मन पूरी तरह उस क्रिया के साथ जुड़ता है, तथा क्रिया के समाप्त होने पर वह तत्काल दूसरी क्रिया में न जाकर वापिस अपने मूल स्थान पर लौट आता है। जैसे हाथ की हर अंगुली कलाई से जुड़ी है। वह सीधा एक से दूसरी पर, दूसरी से तीसरी पर न जाकर, भीतर आता है, फिर आवश्यकता होने पर बाहर जाना है।
वह जहां रहता है वह वर्तमान है। दो विचारों के बीच में जो गैप है, वह वर्तमान है। जहां भूत नहीं है, भविष्य नहीं है। स्मृति नहीं है, कल्पना नहीं है। वहां वर्तमान है। इसमें रहना, अंतर्मुखी होना है।
शरीर तो हमेशा वर्तमान में रहता है, पर मन नहीं। मन को उसके साथ निरन्तर रखना ही स्वाभाविक अवस्था है। यही वह सतत निरन्तर स्मरण है। सम्यक स्मृति है, जिसकी यह चर्चा है।
मन का ही परिष्कृत रूप बुद्धि है। मन एक साथ दो जगह जा सकता है। रसना, स्वाद भी ले सकती है, बोल भी सकती है। अन्य इन्द्रियां एक साथ एक काम कर सकती है। वह मन की शक्ति है। मन और बुद्धि को युक्त करना है। भीतर द्वन्द्व न हो, दुविधा न हो, तब असंशय प्राप्त होता है।
‘थिंक वन्स डिसाइड वन्स, नेवर हेव ए सैकन्ड थॉट, स्वामीजी इस वाक्य का प्रयोग करते थे। वर्तमान में रहने से, ... जहां संशय समाप्त हो जाता है। वहां द्वन्द्व भी नहीं होता, एक ही उत्तर भीतर से आता है। जब व्यक्ति अंतर्मुखी होता है तब उसे स्वयं इस बात का उत्तर मिलता है कि जीवन का उद्देश्य क्या है? वह क्यों आया है? उसे क्या करना है, नहीं तो बाहर भटकते रहो, ... जो भी समाने आया है, वह सब करते रहो, और अंतर्मुखी तभी होता है, तब वह स्वाभाविक अवस्था में रहना शुरू करता है। इसे साधना भी नहीं कह सकते, क्योंकि यहां क्रिया नहीं है। यह तो स्वाभाविक अवस्था है। यहां कार्य तो होना है, जो भी कार्य प्रकृति ने सौंपा है... पर मन जब पूरी तरह इस क्रिया के साथ रहता है, तब स्वाभाविक रूप से उस क्रिया की समाप्ति पर वह अपने मुकाम पर, मूल स्थान पर लौट आता है, वह भीतर से जुड़ा है। इसका अनुभव उसे होता है।
पुनः मां स्मरति नित्यशः के साथ भगवान कृष्ण ने ‘अनन्य चेताः सततं के साथ इस सहजावस्था को संकेतित किया है।
पहली बात तो है उसका अनन्य चित्त है। इसके पूर्व श्लोक क्रमांक 13 में प्रणव साधना की बात है।

‘‘जो पुरुष ऊं ऐसे (इस) एक अक्षर रूप ब्रह्म को उच्चारण करता हुआ और उसके अर्थ स्वरूप मेरे को चिन्तन करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है, वह पुरुष परम गति को प्राप्त होता है।
”एक ओंकार सत नाम “ बहुमूल्य पद है। प्रणव क्या है? क्या मात्र घ्वनियों का मेल है?
‘परम गति.... अंतिम पड़ाव, ... जहां फिर गति नहीं है, ... पर इसके पूर्व जिसने प्रणव के तीन पाद जागृत, स्वप्न विचारणा तीनों में जिसने एक्य का अनुभव पा लिया है। यह अंतर्मुखी यात्रा है,ब्रह्यनिष्ठ गुरु अपरिहार्य हैं। फिर प्राप्त होती है, आत्मकृपा, स्वामीजी कहा करते थे, ”ऊर्ध्वकुंभक प्राणायाम “ योग के रास्ते से आता है, पर जहॉं मन स्थिर होकर अंतर्मुखी होता है, वह यह यहॉं सहज घट जाता है। तब प्रणव फलित होता है।

अनुभव होता है हृदय से। पर हमने बुद्धि से ही अनुभव करना सीख लिया है। मन और बुद्धि जब मुक्त हो जाते हैं, तब बहुचित्त में से चित्त पर हम आते हैं हम बहु चित्त हैं,, ... निरन्तर वर्तमान में रहने से,  मन इन्द्रियों से सिकुड़ जाता है। तब विषय जो इन्द्रियों से पहले है। वहां से भी मन स्वतः हट जाता है, गीता के बारहवे श्लोक में कहा गया है-

सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुद्ध  च।
मूर्ध्न्याधायात्म्नः प्राणमास्थितो योगधारणाम।।12

 सब इन्द्रियों को रोककर अर्थात् इन्द्रियों को विषयों से हटाकर, ,मन को हृदेश में स्थिर करके और अपने प्राण को मस्तिष्क में स्थापन करके योगधारण में स्थिर हुआ-... तब मन और प्राण की स्वाभाविक युति होती है। यही योग है।
जहां मन मस्तिष्क में रहता है, वहीं प्राण जिसकी ऊर्ध्वाकार गति है, वह मस्तिष्क में स्थापन होता है, दोनों गतियां जब एक होती है, ... तब योग में प्रवेश होता है।
तब मन या उर्जा भीतर की ओर लौटती है। तब स्वाभाविक रूप से ‘प्रणव’ में प्रवेश होता है। जो नाद है। अनाहत ध्वनि है। हृदय का द्वार खुलता है। वहां अनुभव में प्रवेश होता है। मन हृदय में आकर ठहर जाता है। जब तक मस्तिष्क में है, तब तक बहिर्मुखी है, ... विचारों में प्रवाह में है। ... पर अन्तर्मुखी होता है। तब उसे भाव की प्राप्ति होती है। उसे हृदय की पहचान मिलती है। यह हृदय वह नहीं है, जिसे बायलोजिकल हार्ट कहते हैं। यहां अनुभव होता है, जिसे प्रेम कहा जाता है, उसकी प्राप्ति होती है। ‘भाव’ में देखना तथा बुद्धि में जागना दोनों अलग-अलग है।

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