श्री गुरु गीता चौदहवां अध्याय
‘नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति।
गुणेम्यश्च परं वेत्ति मद्धावं सोऽधिगच्छति।। 14-19
‘जिस काल में द्रष्टा तीनों गुणों के सिवाय अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता है अर्थात् गुण ही गुणों में वर्तते हैं ऐसा देखता है और तीनों गुणों से अति परे सच्चिदानंद घन स्वरूप मुझ परमात्मा को तत्व से जानता है उस काल में वह पुरुष मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।’
यह अध्याय गीता के गुणात्रय विभाग के नाम से जाना जाता है। भगवान कृष्ण ने इस अध्याय के प्रारंभ में कहा है-
‘मेरी महत ब्रह्म रूप प्रकृति अर्थात् त्रिगुणमयी माया संपूर्ण भूतों की योनि है, अर्थात् गर्भाधान स्थान है और मैं उस योनि में चेतन रूप बीज को स्थापन करता हूं उस जड़चेतन के संयोग से सब भूतों की उत्पत्ति होती है।’
हमारा शरीर दो तत्वों का जोड़ है। प्रकृति और परमात्मा। पदार्थ की चेतन, माया, प्रकृति, ... पदार्थ है। परमात्मा चेतन तत्व है। मृत्यु में दोनों तत्वों का वियोग हो जाता है। पदार्थ और चेतना के बीच में माया है। माया वासना ही है। जो ज्ञानी है, ... वह ज्ञान के माध्यम से जान पाता है कि संयोग है। द्रष्टा व दृश्य का अलगाव तभी अनुभव होता है, जो अनुभव में है, वह ज्ञानी है। माया जहां ब्रह्म से जुड़ी होने के कारण, .उसकी शक्ति है।.उसकी गति है।., वहीं वह पदार्थों से जुडी होकर, वही ब्रह्मयोनि है। सबका वही कारण है। ‘माया’ का अर्थ है जो दिखाई पड़ती है, पर है नहीं। परमात्मा... जो है पर दिखाई नहीं पड़ता। जो बुद्धि से परे हैं। जगत जो नहीं है, पर इन्द्रियां प्रत्यक्ष है, वह निरंतर परिवर्तनशील है। संबंध जोड़ती है, माया, ... जो दिखाई तो पड़ती है, पर है नहीं वह भासती है। जब संबंध टूटता है तब द्रष्टा व दृश्य दोनों अलग हो जाते हैं।
यह जो माया है, यह गुणमयी है। त्रिगुणमयी है। सत्व गुण, रजोगुण तथा तमोगुण ऐसे यह प्रकृति से उत्पन्न हुए तीनों गुण उस अविनाशी जीवात्मा को शरीर से बांधते हैं। प्रकृति तीन तत्वों का मेल है। सत्, रज, तम। रज-गति है। तम-स्थिति है, सत-संतुलन है।
जिस काल में द्रष्टा तीनों गुणों के सिवाय अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता है- अर्थात् गुण ही गुणों में वर्तते है। यही साधना की निष्पत्ति है। मेरे ही तीन गुण समस्त कर्म कर रहे हैं। सारा उत्तरदायित्व मुझ पर ही आ जाता है। पहले मै। प्रमाद में था- जानता था, मैं कर रहा हूं, पर अब द्रष्टा हो गया हूं, देखता हूं, गुण ही समस्त कार्य कर रहे हैं, गुण ही करवा रहे हैं-
गुण का निवास कहा है? स्वामीजी कहते थे- गुण नाभि में है- वहीं संस्कार है। प्रकृति की उठने वाली लहरें वहां निरंतर संघात करती है- लहरों के तेज स्पंदन से बाह्य मन जो जुड़ा हुआ है, वह इन्द्रियों से जुड़कर बहिर्मुखता को प्राप्त हो जाता है।
गुण बाहर वस्तु में नहीं है। दूसरा कोई जिम्मेदार नहीं है। वह आपके भीतर उछाला मारता है। लोभ आपके भीतर है, काम आपके भीतर है। मन और छः रिपु जन्म के साथ आते हैं। वे धीरे-धीरे विकसित होते चले जाते हैं।
स्वामीजी कहते थे- दो ही तत्व हैं। यह सांख्य की दृष्टि है। पुरुष और प्रकृति। पुरुष, ब्रह्म हैं। वह तो चेतना है। शक्ति एक ही है। वह शरीर में मन और प्राण दोनों में विभाजित हो जाती है। प्राण की गति ऊर्ध्वाकार है, मन की चक्राकार। देह-मन-प्राण की संघटना का आधार प्रकृति है। प्रकृति-- जीव की नाभि पर अनवरत लहरें उठती है। वहीं गुण है, ... वे मन को प्रभावित करते हैं। मन इन्द्रियों से जुड़कर विषयों की ओर लालायित हो जाता है। चित की वृतियों का निरोध यहां दमन नहीं है। इन लहरों के धक्कों से प्रभावित नहीं होना है। विचलित नहीं होना है। अधिक से अधिक वर्तमान में रहने से यह स्थिति आती है। लहरें तो उठेंगी, ... वृत्तियां रूकती नहीं है, ... निरोध उनसे अप्रभावित रहने की क्षमता का बढ़ता जाना है। बाहर तो प्रयत्न होंगे। संसार में रहना है, वहां प्रयत्न करना होगा, ... पर जहां साधना है, वहां अप्रयत्न है। वहां मात्र रहना है। इसके लिए कोई विधि नहीं है। मात्र वर्तमान में रहना है। यह मानसिक है। अंतर्मुखता की प्राप्ति पर फिर यह भी वहीं रहता। स्वाभाविक स्थिति में रहना होता है। लेकिन संसार में रहना है, काम भी करना है, परिवार है, नौकरी है, उसे छोड़ना नहीं है। वहां प्रयत्न की आवश्यकता होती है। परन्तु जो अंतर्मुखी है, उसे भीतर मार्गदर्शन प्राप्त होने लगता है। क्या करना है, क्या नहीं करना है। वह विचलित नहीं होता है। वहां हताशा नहीं होती है।
जब हम भीतर से जुड़ते हैं, यह अहसास घनीभूत होने लगता है। तब गुण ही गुणों को वर्तते हैं, ... यह अनुभव में आने लगता है। बाहर की ओर दोषरोपण नहीं होता है, तब इन गुणों के पार, ... जो बुद्धिगम्य नहीं है, ... उस परमात्व तत्व में प्रवेश होता है।
हम इन गुणों के जाल को अपना समझ लेते हैं। वह स्वाभाविक है। वह सहज हो रहा है, ... अप्रभावित होने की क्षमता पाना ही साधन तत्व है। सारा खेल स्वतः हो रहा है, ... प्रकृति का उत्प्रेरण है। आप मात्र इस लीला के साक्षी हैं, गवाह हो जाते हैं, ... तभी कर्मों के जाल से आप बाहर आ पाते हैं। जब तक एकत्व है, जुड़ाव है। आप ही कर्म हो जाते हैं। उससे दूरी हो तभी बाहर आ पाना संभव हो पाता है।
दूर की वस्तु को ही सही देखा व समझा जाता है। कर्म का बंधन नहीं होता है। कर्ता का बंधन होता है। बंधन चिन्तन से बनता है। चिन्तन, मात्र क्रिया के साथ पूरी तरह मन को रखने से छूटने लग जाता है।
... मात्र अवलोकन से अन्तर्मुखता की यात्रा बहुत छोटी है। जहां करना छूटता जाता है, मात्र देखना होता जाना है।
‘‘उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते।
गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेते। 23
जो साक्षी के सदृश स्थित हुआ गुणों के द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता है और गुण ही गुणों को वर्तते हैं, ऐसा समझता हुआ जो परमात्मा में एकीभाव से स्थित रहता है, उस स्थिति से चलायमान नहीं होता है।
समदुःख सुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मका´्चनः
तुल्य प्रियाप्रियो धीरस्तुल्य निन्दात्मसंस्तुतिः।। 24
निरन्तर आत्मभाव में स्थित हुआ दुःख सुख को समान समझने वाला है तथा मिट्टी पत्थर और सुवर्ण मंे समान भाव वाला और धैर्यवान है तथा जो प्रिय और अप्रिय को बराबर समझता है तथा अपनी निन्दा स्तुति में भी समान भाव वाला है।’
मां च योऽव्यमिचारेण भक्तियोगेन सेवते।
स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते।। 26
जो पुरुष अव्यभिचारी भक्ति रूप योग के द्वारा मेरे को निरन्तर भजता है।वह इन तीनों गुणों को अच्छी प्रकार उल्लंघन करके सच्च्दिानन्द ब्रह्म में एकीभाव होने के लिए योग्य होता है।
-भगवान कृष्ण यहां साधन तत्व को स्पष्ट करते हुए कह रहे हैं- साधक जब यह समझकर, अपनी समझ का हिस्सा बना लेता है कि गुण ही गुणों का विस्तार है तब वह साक्षी होने लगता है। न प्रवृति में, न निवृति में , वह कहीं भी आत्मीयता नहीं लाता। वह कहीं भी एक्य का अनुभव नहीं करता। अहंकार उसका छूट जाता है। स्वामीजी कहते थे-‘मेरे भीतर से आवाज हुई, ठीक है, ... तो हो गया, ... नहीं तो चुप रहा, ... तटस्थता आ गई। मैंने जानबूझकर नहीं बोला, ... हो जाएगा, ... बस, होना था, ... इसलिए हो गया। मेरा कहीं संकल्प नहीं गया। न तो यह आकांक्षा रही कि होना है या यह आकांक्षा रही कि नहीं होना। प्रकृति का कार्य है, वह कोई रोक दे- यह किसी इन्सान के बस का नहीं है। वह मात्र साक्षी होकर इस खेल को, एक सीरियल की तरह देखता रहता है। यही वह अवस्था है जहां गुण ही गुणों को वर्तते हैं, समझा जा सकता है।
‘न निन्दे न वन्दे, ... कोई चुनाव नहीं होता, ... उसे घटना था, वह वैसा ही घट रहा है। जब यह तटस्थता भीतर उतने लगती है, तब चलायमान होने से बचा जा सकता है। भीतर जो भी वृत्ति की लहर उठे, अगर कंपन हो, वहां तत्क्षण असहयोग हो, नहीं बहना है। चलायमान होने से बचा जा सकता है।
इसी स्थिति को कहा जाता है- ‘कमल दलवत’, ... वह कीचड़ में तो रहेगा पर इस स्थिति की, निंदा व प्रशंसा से दूर है। वह ऊपर उठा हुआ है। उसे पानी स्पर्श नहीं कर पाता है। वह प्रतिक्रिया में नहीं है। वह मात्र क्रिया में है। मान-अपमान में सम है। उसके भीतर आचरण की प्रामाणिकता है, उससे उत्पन्न पवित्रता है, प्रसन्नता है। वहां खिन्नता नहीं है।
इस स्थिति में शरीर रहेगा। वह इन तीनों गुणों से प्रकाशित है। ज्ञानी और सामान्य जन में यही भेद है। सामान्यजन गुणों के प्रभाव में बहता है। ज्ञानी गुणातीत है, वह जानता है, ... आवश्यकतानुसार प्रवृत्त होता है। अन्यथा नहीं। वह जानता है, वह कुछ नहीं कर रहा है, जो हो रहा है प्रकृ्रति करवा रही है, उसे उसके कार्य में सहयोग देना है।
सूत्र है- जो निरन्तर आत्मभाव में स्थित है- यही सुमिरन है। स्मरण है। कॉन्सटेन्ट अवेयरनेस है। वह अप्रमाद में है। वह सजगता में है। जरा सी भी मन को जगह मिली, ... वहां विचारणा का वेग आ जाता है। क्रिया में मन को पूरा लगा दो, ... पूरा मन स्वतः विसर्जित होने लग जाता है। जहां यह विस्मरण है, वही स्मरण है।
और जो पुरुष अव्यभिचारी भक्ति रूप योग द्वारा मेरे को भजता है- निरंतर भजता है-
व्याभिचार- जहां अनेक विकल्प मौजूद हैं। जहां हूं, वहां संतुष्ट नहीं हूं। विभाजित मन जहां है। विभक्त- जो बंटा हुआ है। भक्त- जहां जोड़ है, जो है वह पूरा है। अव्यभिचारी भक्ति जहां एक रसता है। एक ही धारा है। एक ही गंतव्य है। परन्तु हमारा मन अनेक दिशाओं में जाता है। तभी इतने देवी-देवता आए। सामान्यतः हम एक साथ कम से कम दो काम कर सकते हैं। दो का एक होना ही, एकाग्रता है। मन हमारा एक साथ अनेक धाराओं में बहता है। यही द्वन्द है। हम सोचते कुछ और है, चाहते कुछ और हैं, करते हुछ और हैं। व्याभिचारी ही मन है। जहां अव्यभिचारी है, वहां अमन रह जाता है। तब यात्रा अंतर्मुखी हो जाती है। जहां व्याभिचारी मन है, वहां असंतोष है।
कोई भी कृत्य पूरा नहीं हो पाता है, ... पूरा होने के पहले ही दूसरा विकल्प उसे पकड़ लेता है। आधा-अधूरा वह रह जाता है। जब कृत्य समग्रता में होता है। वहां सफलता मिलती है। वही पूर्णता आती है। वही आनंद है। वहां असंतोष नहीं है।
जाना- बाधाएं हम खड़ी करते हैं, ... हम एक रास्ते पर नहीं चलते, अनेक विकल्प ले आते हैं। शक्ति पूरी तरह नहीं बनती। न लगा पाते हैं। कुनकुने पानी की तरह खोलते हैं, जहां कुछ भी नहीं पकता। फिर दोष दूसरों को देते हैं। जहां अव्यभिचारी मन की धारा है, वहीं राधा है। वहां मन जब एकोन्मुख हो जाता है, तब अचानक उसकी गति बदल जाती है।
अव्यभिचारी प्रेम के द्वारा मुझको निरन्तर भजता है-
भजन, ... वाल्मिकी उल्टा नाम जपते-जपते ब्रह्म समान हो गए थे, ... बाहर-भीतर एक राम ही शेष रह गया था, ... जहां सारे द्वन्द खो जाते हैं, मात्र एक लय शेष रह जाती है, ... स्वामीजी इसे ही कान्सटेन्ट अवेयरनेस कहा करते थे- यह भीतर का भाव है, जो अनवरत बना रहता है। यह स्वभाव बन जाता है, बाहर मन गया, ... कार्य पूरा होते ही, वह भीतर लौट आता है। यही सहज है। यही स्वाभाविक है।
परमहंस पनिहारिन का उदाहरण दिया करते थे, बाते करती हुई चल रही है, पर उसका मन निरंतर मटकी पर सजग है, भाव-दशा में चित की धारा सहज बिना प्रयत्न के बहती है। भजन में बाहर और भीतर चित की दशा एक लय में बहती है।
‘नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति।
गुणेम्यश्च परं वेत्ति मद्धावं सोऽधिगच्छति।। 14-19
‘जिस काल में द्रष्टा तीनों गुणों के सिवाय अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता है अर्थात् गुण ही गुणों में वर्तते हैं ऐसा देखता है और तीनों गुणों से अति परे सच्चिदानंद घन स्वरूप मुझ परमात्मा को तत्व से जानता है उस काल में वह पुरुष मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।’
यह अध्याय गीता के गुणात्रय विभाग के नाम से जाना जाता है। भगवान कृष्ण ने इस अध्याय के प्रारंभ में कहा है-
‘मेरी महत ब्रह्म रूप प्रकृति अर्थात् त्रिगुणमयी माया संपूर्ण भूतों की योनि है, अर्थात् गर्भाधान स्थान है और मैं उस योनि में चेतन रूप बीज को स्थापन करता हूं उस जड़चेतन के संयोग से सब भूतों की उत्पत्ति होती है।’
हमारा शरीर दो तत्वों का जोड़ है। प्रकृति और परमात्मा। पदार्थ की चेतन, माया, प्रकृति, ... पदार्थ है। परमात्मा चेतन तत्व है। मृत्यु में दोनों तत्वों का वियोग हो जाता है। पदार्थ और चेतना के बीच में माया है। माया वासना ही है। जो ज्ञानी है, ... वह ज्ञान के माध्यम से जान पाता है कि संयोग है। द्रष्टा व दृश्य का अलगाव तभी अनुभव होता है, जो अनुभव में है, वह ज्ञानी है। माया जहां ब्रह्म से जुड़ी होने के कारण, .उसकी शक्ति है।.उसकी गति है।., वहीं वह पदार्थों से जुडी होकर, वही ब्रह्मयोनि है। सबका वही कारण है। ‘माया’ का अर्थ है जो दिखाई पड़ती है, पर है नहीं। परमात्मा... जो है पर दिखाई नहीं पड़ता। जो बुद्धि से परे हैं। जगत जो नहीं है, पर इन्द्रियां प्रत्यक्ष है, वह निरंतर परिवर्तनशील है। संबंध जोड़ती है, माया, ... जो दिखाई तो पड़ती है, पर है नहीं वह भासती है। जब संबंध टूटता है तब द्रष्टा व दृश्य दोनों अलग हो जाते हैं।
यह जो माया है, यह गुणमयी है। त्रिगुणमयी है। सत्व गुण, रजोगुण तथा तमोगुण ऐसे यह प्रकृति से उत्पन्न हुए तीनों गुण उस अविनाशी जीवात्मा को शरीर से बांधते हैं। प्रकृति तीन तत्वों का मेल है। सत्, रज, तम। रज-गति है। तम-स्थिति है, सत-संतुलन है।
जिस काल में द्रष्टा तीनों गुणों के सिवाय अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता है- अर्थात् गुण ही गुणों में वर्तते है। यही साधना की निष्पत्ति है। मेरे ही तीन गुण समस्त कर्म कर रहे हैं। सारा उत्तरदायित्व मुझ पर ही आ जाता है। पहले मै। प्रमाद में था- जानता था, मैं कर रहा हूं, पर अब द्रष्टा हो गया हूं, देखता हूं, गुण ही समस्त कार्य कर रहे हैं, गुण ही करवा रहे हैं-
गुण का निवास कहा है? स्वामीजी कहते थे- गुण नाभि में है- वहीं संस्कार है। प्रकृति की उठने वाली लहरें वहां निरंतर संघात करती है- लहरों के तेज स्पंदन से बाह्य मन जो जुड़ा हुआ है, वह इन्द्रियों से जुड़कर बहिर्मुखता को प्राप्त हो जाता है।
गुण बाहर वस्तु में नहीं है। दूसरा कोई जिम्मेदार नहीं है। वह आपके भीतर उछाला मारता है। लोभ आपके भीतर है, काम आपके भीतर है। मन और छः रिपु जन्म के साथ आते हैं। वे धीरे-धीरे विकसित होते चले जाते हैं।
स्वामीजी कहते थे- दो ही तत्व हैं। यह सांख्य की दृष्टि है। पुरुष और प्रकृति। पुरुष, ब्रह्म हैं। वह तो चेतना है। शक्ति एक ही है। वह शरीर में मन और प्राण दोनों में विभाजित हो जाती है। प्राण की गति ऊर्ध्वाकार है, मन की चक्राकार। देह-मन-प्राण की संघटना का आधार प्रकृति है। प्रकृति-- जीव की नाभि पर अनवरत लहरें उठती है। वहीं गुण है, ... वे मन को प्रभावित करते हैं। मन इन्द्रियों से जुड़कर विषयों की ओर लालायित हो जाता है। चित की वृतियों का निरोध यहां दमन नहीं है। इन लहरों के धक्कों से प्रभावित नहीं होना है। विचलित नहीं होना है। अधिक से अधिक वर्तमान में रहने से यह स्थिति आती है। लहरें तो उठेंगी, ... वृत्तियां रूकती नहीं है, ... निरोध उनसे अप्रभावित रहने की क्षमता का बढ़ता जाना है। बाहर तो प्रयत्न होंगे। संसार में रहना है, वहां प्रयत्न करना होगा, ... पर जहां साधना है, वहां अप्रयत्न है। वहां मात्र रहना है। इसके लिए कोई विधि नहीं है। मात्र वर्तमान में रहना है। यह मानसिक है। अंतर्मुखता की प्राप्ति पर फिर यह भी वहीं रहता। स्वाभाविक स्थिति में रहना होता है। लेकिन संसार में रहना है, काम भी करना है, परिवार है, नौकरी है, उसे छोड़ना नहीं है। वहां प्रयत्न की आवश्यकता होती है। परन्तु जो अंतर्मुखी है, उसे भीतर मार्गदर्शन प्राप्त होने लगता है। क्या करना है, क्या नहीं करना है। वह विचलित नहीं होता है। वहां हताशा नहीं होती है।
जब हम भीतर से जुड़ते हैं, यह अहसास घनीभूत होने लगता है। तब गुण ही गुणों को वर्तते हैं, ... यह अनुभव में आने लगता है। बाहर की ओर दोषरोपण नहीं होता है, तब इन गुणों के पार, ... जो बुद्धिगम्य नहीं है, ... उस परमात्व तत्व में प्रवेश होता है।
हम इन गुणों के जाल को अपना समझ लेते हैं। वह स्वाभाविक है। वह सहज हो रहा है, ... अप्रभावित होने की क्षमता पाना ही साधन तत्व है। सारा खेल स्वतः हो रहा है, ... प्रकृति का उत्प्रेरण है। आप मात्र इस लीला के साक्षी हैं, गवाह हो जाते हैं, ... तभी कर्मों के जाल से आप बाहर आ पाते हैं। जब तक एकत्व है, जुड़ाव है। आप ही कर्म हो जाते हैं। उससे दूरी हो तभी बाहर आ पाना संभव हो पाता है।
दूर की वस्तु को ही सही देखा व समझा जाता है। कर्म का बंधन नहीं होता है। कर्ता का बंधन होता है। बंधन चिन्तन से बनता है। चिन्तन, मात्र क्रिया के साथ पूरी तरह मन को रखने से छूटने लग जाता है।
... मात्र अवलोकन से अन्तर्मुखता की यात्रा बहुत छोटी है। जहां करना छूटता जाता है, मात्र देखना होता जाना है।
‘‘उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते।
गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेते। 23
जो साक्षी के सदृश स्थित हुआ गुणों के द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता है और गुण ही गुणों को वर्तते हैं, ऐसा समझता हुआ जो परमात्मा में एकीभाव से स्थित रहता है, उस स्थिति से चलायमान नहीं होता है।
समदुःख सुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मका´्चनः
तुल्य प्रियाप्रियो धीरस्तुल्य निन्दात्मसंस्तुतिः।। 24
निरन्तर आत्मभाव में स्थित हुआ दुःख सुख को समान समझने वाला है तथा मिट्टी पत्थर और सुवर्ण मंे समान भाव वाला और धैर्यवान है तथा जो प्रिय और अप्रिय को बराबर समझता है तथा अपनी निन्दा स्तुति में भी समान भाव वाला है।’
मां च योऽव्यमिचारेण भक्तियोगेन सेवते।
स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते।। 26
जो पुरुष अव्यभिचारी भक्ति रूप योग के द्वारा मेरे को निरन्तर भजता है।वह इन तीनों गुणों को अच्छी प्रकार उल्लंघन करके सच्च्दिानन्द ब्रह्म में एकीभाव होने के लिए योग्य होता है।
-भगवान कृष्ण यहां साधन तत्व को स्पष्ट करते हुए कह रहे हैं- साधक जब यह समझकर, अपनी समझ का हिस्सा बना लेता है कि गुण ही गुणों का विस्तार है तब वह साक्षी होने लगता है। न प्रवृति में, न निवृति में , वह कहीं भी आत्मीयता नहीं लाता। वह कहीं भी एक्य का अनुभव नहीं करता। अहंकार उसका छूट जाता है। स्वामीजी कहते थे-‘मेरे भीतर से आवाज हुई, ठीक है, ... तो हो गया, ... नहीं तो चुप रहा, ... तटस्थता आ गई। मैंने जानबूझकर नहीं बोला, ... हो जाएगा, ... बस, होना था, ... इसलिए हो गया। मेरा कहीं संकल्प नहीं गया। न तो यह आकांक्षा रही कि होना है या यह आकांक्षा रही कि नहीं होना। प्रकृति का कार्य है, वह कोई रोक दे- यह किसी इन्सान के बस का नहीं है। वह मात्र साक्षी होकर इस खेल को, एक सीरियल की तरह देखता रहता है। यही वह अवस्था है जहां गुण ही गुणों को वर्तते हैं, समझा जा सकता है।
‘न निन्दे न वन्दे, ... कोई चुनाव नहीं होता, ... उसे घटना था, वह वैसा ही घट रहा है। जब यह तटस्थता भीतर उतने लगती है, तब चलायमान होने से बचा जा सकता है। भीतर जो भी वृत्ति की लहर उठे, अगर कंपन हो, वहां तत्क्षण असहयोग हो, नहीं बहना है। चलायमान होने से बचा जा सकता है।
इसी स्थिति को कहा जाता है- ‘कमल दलवत’, ... वह कीचड़ में तो रहेगा पर इस स्थिति की, निंदा व प्रशंसा से दूर है। वह ऊपर उठा हुआ है। उसे पानी स्पर्श नहीं कर पाता है। वह प्रतिक्रिया में नहीं है। वह मात्र क्रिया में है। मान-अपमान में सम है। उसके भीतर आचरण की प्रामाणिकता है, उससे उत्पन्न पवित्रता है, प्रसन्नता है। वहां खिन्नता नहीं है।
इस स्थिति में शरीर रहेगा। वह इन तीनों गुणों से प्रकाशित है। ज्ञानी और सामान्य जन में यही भेद है। सामान्यजन गुणों के प्रभाव में बहता है। ज्ञानी गुणातीत है, वह जानता है, ... आवश्यकतानुसार प्रवृत्त होता है। अन्यथा नहीं। वह जानता है, वह कुछ नहीं कर रहा है, जो हो रहा है प्रकृ्रति करवा रही है, उसे उसके कार्य में सहयोग देना है।
सूत्र है- जो निरन्तर आत्मभाव में स्थित है- यही सुमिरन है। स्मरण है। कॉन्सटेन्ट अवेयरनेस है। वह अप्रमाद में है। वह सजगता में है। जरा सी भी मन को जगह मिली, ... वहां विचारणा का वेग आ जाता है। क्रिया में मन को पूरा लगा दो, ... पूरा मन स्वतः विसर्जित होने लग जाता है। जहां यह विस्मरण है, वही स्मरण है।
और जो पुरुष अव्यभिचारी भक्ति रूप योग द्वारा मेरे को भजता है- निरंतर भजता है-
व्याभिचार- जहां अनेक विकल्प मौजूद हैं। जहां हूं, वहां संतुष्ट नहीं हूं। विभाजित मन जहां है। विभक्त- जो बंटा हुआ है। भक्त- जहां जोड़ है, जो है वह पूरा है। अव्यभिचारी भक्ति जहां एक रसता है। एक ही धारा है। एक ही गंतव्य है। परन्तु हमारा मन अनेक दिशाओं में जाता है। तभी इतने देवी-देवता आए। सामान्यतः हम एक साथ कम से कम दो काम कर सकते हैं। दो का एक होना ही, एकाग्रता है। मन हमारा एक साथ अनेक धाराओं में बहता है। यही द्वन्द है। हम सोचते कुछ और है, चाहते कुछ और हैं, करते हुछ और हैं। व्याभिचारी ही मन है। जहां अव्यभिचारी है, वहां अमन रह जाता है। तब यात्रा अंतर्मुखी हो जाती है। जहां व्याभिचारी मन है, वहां असंतोष है।
कोई भी कृत्य पूरा नहीं हो पाता है, ... पूरा होने के पहले ही दूसरा विकल्प उसे पकड़ लेता है। आधा-अधूरा वह रह जाता है। जब कृत्य समग्रता में होता है। वहां सफलता मिलती है। वही पूर्णता आती है। वही आनंद है। वहां असंतोष नहीं है।
जाना- बाधाएं हम खड़ी करते हैं, ... हम एक रास्ते पर नहीं चलते, अनेक विकल्प ले आते हैं। शक्ति पूरी तरह नहीं बनती। न लगा पाते हैं। कुनकुने पानी की तरह खोलते हैं, जहां कुछ भी नहीं पकता। फिर दोष दूसरों को देते हैं। जहां अव्यभिचारी मन की धारा है, वहीं राधा है। वहां मन जब एकोन्मुख हो जाता है, तब अचानक उसकी गति बदल जाती है।
अव्यभिचारी प्रेम के द्वारा मुझको निरन्तर भजता है-
भजन, ... वाल्मिकी उल्टा नाम जपते-जपते ब्रह्म समान हो गए थे, ... बाहर-भीतर एक राम ही शेष रह गया था, ... जहां सारे द्वन्द खो जाते हैं, मात्र एक लय शेष रह जाती है, ... स्वामीजी इसे ही कान्सटेन्ट अवेयरनेस कहा करते थे- यह भीतर का भाव है, जो अनवरत बना रहता है। यह स्वभाव बन जाता है, बाहर मन गया, ... कार्य पूरा होते ही, वह भीतर लौट आता है। यही सहज है। यही स्वाभाविक है।
परमहंस पनिहारिन का उदाहरण दिया करते थे, बाते करती हुई चल रही है, पर उसका मन निरंतर मटकी पर सजग है, भाव-दशा में चित की धारा सहज बिना प्रयत्न के बहती है। भजन में बाहर और भीतर चित की दशा एक लय में बहती है।
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