अध्याय-5 गुरु गीता
शक्कोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीर विमोक्षणात्।
काम क्रोधोÚवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ।।5-23
”जो मनुष्य शरीर के नाश होने से पहले ही काम और क्रोध से उत्पन्न हुए वेग को सहन करने में समर्थ है, अर्थात् काम, क्रोध को जिसने सदा के लिए जीत लिया है, वह मनुष्य इस लोक में योगी है, और वही सुखी है।“
गीता के पांचवे अध्याय को, कर्म सन्यास कहा गया है। पूर्ववर्ती अध्यायों का समाहार यहां हुआ है। अर्जुन की शंका है कि आपने कर्म सन्यास तथा निष्काम कर्मयोग दोनों की प्रशंसा की है, मेरे लिए क्या श्रेष्ठ है, यह नहीं कहा। इसके पूर्व भगवान उसे स्वयं ही स्वधर्म की खोज हेतु प्रेरित कर आए हैं। वे अपनी ओर से उसे कोई एक निश्चित समाधान नहीं दे रहे हैं।
‘कर्म सन्यास’ कर्म का त्याग नहीं है। कर्म का जगत एक बड़ा स्वप्न का जगत है, बस एक सीरियल चल रहा है, ... इससे अधिक नहीं, ... तब कर्म छूट जाता है। जो कर्ता है वह यहां है नहीं, स्वामीजी कहा करते थे- वह न करते हुए भी करता है। शारीरिक क्रियाएं तो यथावत होंगी, ... पर मन सक्रिय तभी होगा, जब अंतःप्रेरणा उठती है। अन्यथा मन निष्क्रिय पड़ा रहता है। तब कर्म अपने आप गिर जाता है। हां, फिर भीतर से प्रेरणा अपने आप उठती है, ... विवेक कार्य करवाता है। पर अपना कोई स्वार्थ नहीं होता है। न श्रेय न प्रेय। बस प्रकृति ने चाहा तो उसके कार्य में सहयोग हो गया। बस! कोई आकांक्षा नहीं होती।
‘निष्काम कर्म में कर्म के छोड़ने व छूटने पर बल नहीं है। यहां फलाकांक्षा पर जोर नहीं है। जो भी कार्य सामने आया है, मन को पूरी तरह से वहां रखते हुए किंचित मात्र भी विपरीत नहीं होने देना चाहिए- तब जो मन भटकता है, वहां फलाकांक्षा में जाता है वह रुक जाता है। फलाकांक्षा भीतर से प्रेरणा नहीं बनती। कर्म एक खेल बन जाता है। बस करना है। करते रहना है। निष्काम कर्म कोई अवधारणा नहीं है। जीने की कला है। यहां कल के लिए स्थगन नहीं है। आज और अभी जो हो सकता है, कर देना चाहिए। इसी क्षण जीना है, वहां फल की आकांक्षा, छोड़ देनी चाहिए। आज में अभी में जीने की कुशलता आनी चाहिए। क्योंकि आज और अभी में तो कर्म है फल हमेशा भविष्य में आता है। पर जहां फलाकांक्षा पहले आ जाती है, वहां कर्म ही स्थगित होता जाता है।
इसी प्रसंग कोे स्पष्ट करते हुए भगवान ने कहा है-
ज्ञेयः स नित्य संन्यासी यो न द्वेष्टि न काति’।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते।।5-3
”जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा करता है, वह निष्काम कर्म को उपलब्ध हो जाता है।“
यहाँ हमने इस श्लोक को बाद में रखा है। काम का तात्पर्य है, आकर्षण, तथा द्वेष है, विकर्षण। सकारात्मकता तथा नकारात्मकता, एक ही धागे के दो मुंह है। हम दिनभर या तो कर्म किसी खिंचाव से करते हैं, या पलायन में करना चाहते हैं। विरोध में करते हैं, असहयोग में करते हैं। ... ये दो ही हमारे कर्म की प्रेरणा होती है। पर भगवान कहते हैं- तीसरी शक्ति भी होती है। अंतःप्रेरणा, जहां निष्कामता होती है। फलाकांक्षा नहीं होती है। यह मात्र शाब्दिक व्यायाम नहीं है।
कभी कोशिश करें, ... जब भी व्यक्ति अपने भीतर के राग को, द्वेष को जान जाता है, तब उसकी उर्जा जो रहती है, वह बाहर कीे खूंटियां उखड़ने पर सीधी भीतर उतरती है। कर्म तो वहां भी होना है। पर अब न किसी को जीतना है, न किसी को प्रभावित करना है। बस जो भी कार्य सामने आया है, ... पूरा मन उसी में डूब जाता है। प्राप्त होता है शांत मन। एक आनंद। एक भीतरी प्रसन्नता। तुम्हारा काम है, और हम कर सकते हैं, बस इतना ही बहुत है। तुम्हारी खुशी के लिए नहीं कर रहे, तुम्हारी नाराजगी की फिकर नहीं, बस महत्वपूर्ण बात यही है, हम कर सकते हैं, इसीलिए कर रहे हैं, यह भी गारंटी नहीं है, कल भी करेंगे, ताकत उसकी है, उसकी इच्छा है, इसीलिए कर पा रहे हैं। तब बोध जगता है।
... जाना, ... जहां तक भीतर राग था, ... वही तक द्वेष था। संबंधों में तनाव था। बाहर अपेक्षा बनी हुयी थी। उससे क्रोध की परत चढ़ती जाती थी। जब भीतर की दहलीज पर पांव रखा, ... तो पाया, ... जगत वही है, लोग वही हैं, पर अब कुछ बदला बदला सा है, संबंध सरल और सहज हो गए हैं। यहां कुछ भी बाह्य के प्रदर्शन के लिए नहीं होता है। न वस्त्र बदलते हैं, न वेशभूषा,पर भीतर मौलिक परिवर्तन की ओर हम बढ़ आते हैं। अब तुमसे कोई अपेक्षा नहीं है,नमस्ते नहीें कर रहे हो,बहुत अच्छी बात है, यह उपेक्षा भी नहीं है, जो बाहर घट रहा है, अब वह स्मृति का अंग नहीं बन पारहा है, चिंतन के लिए अवकाश भी नही है।
स्वामीजी कहा करते थे- जो भी कार्य हो, मन को पूर्णरूपेण वहीं ले जाओ, ... वहीं आनंद है। कोई विपरीत भावना नहीं। कर्म ही आनंद है, जिसे अभी जो कर्म है, उसमें आनंद मिल रहा है, ... उसे हर काम में आनंद प्राप्त होगा, ... वह राग-द्वेष के आकर्षण से बाहर निकल आएगा। कार्य के प्रारम्भ से लेकर अंत तक मन की एक ही अवस्था बनी रहे, यही ध्यान है। न यहां कुछ हारा जाता है न यहां कुछ जीता जाता है, बस यही ध्यान रहे। इस महारास में में हमारा नृत्य बढ़िया हो, पर दूसरे का खेल हमारे कारण से खराब नहीं हो जाए। यही ध्यान है। यह ध्यान सिखाया नही जाता, यह तो स्वयं, सीखा जाता है।
‘योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते।।7।
”वश में किया हुआ है शरीर, जितेन्द्रिय तथा विशुद्ध अतःकरण वाला,एवं संपूर्ण प्राणियों के आत्मरूप परमात्मा में एकीभाव हुआ निष्काम कर्मयोगी कर्मकरता हुआ भी लिपायमान नहीं होता।
शरीर उसी के नियंत्रण में रहता है, जिसका अंतःकरण शु( है। स्वामी जी सदैव चित्त की शु(ि पर बल देते थे। वे कहा करते थे- भीतर जितनी निर्दोषता आती है, उतनी ही आत्मा सबल होती जाती है।
अंतःकरण की अशुद्धि ... क्या है? जहां दूसरे का प्रभाव है। दृश्य का चिन्तन है, वही अंतःकरण अशुद्ध हो जाता है। दूसरे का चिन्तन, पराधीन बना देता है। हम जिसका चिन्तन करते हैं, वह स्वामी हो जाता है। हम गुलाम। जितने भीतर विचार होंगे, उसनी ही अशुद्धियां होगी। विचार ही विकार है। निर्विकारता मंें ही परम शुद्धि है।
इसी क्रम में ही भगवान ने जहां निष्काम कर्म योगी के, आचरण को परिभाषित किया है, वही अन्त में समाहार करते हुए कहा है-
जो मनुष्य शरीर के नाश होने से पहले ही काम और क्रोध से उत्पन्न हुए वेग को सहन करने में समर्थ है-
पूज्य स्वामीजी यहां तितिक्षा शब्द का प्रयोग करते थे। ‘तान तितिशस्व भारतः’ वे कहा करते थे, बड़े-बड़े योगियों के पतन होते देखे हैं। माया भ्रम भी है। माया भी शक्ति है, जो सम्मोहित कर देती है। साधारणजन, थोड़ी ऊंचाई से गिरता है, परन्तु योगी का पतन बहुत ऊंचाई से होता है। वह अंत समय तक इस अवस्था को बनाए नहीं रख पाता। शक्ति का वेग सहन करना सरल नहीं है। जब गंगाजी उतरी तो भगवान शिव को अपने मस्तक पर झेलना पड़ा। विकारों के वेग अंत समय में जब इन्द्रियां शिथिल हो जाती है, तब तेजी से उभरते हैं। बीज कितना भी भुना जावे, ... परन्तु उसकी अंकुरण क्षमता समाप्त नहीं होती है। अनुकूल, खाद, बीज, धरती, हवा पाकर फिर अंकुरित हो सकता हैं। क्योंकि तब शक्ति जो जगती है, उसके वेग को शरीर सहन नहीं कर पाता है। या तो शरीर छूट जाता है, या शरीर में विकार तेजी से उपजते हैं। जो भी दुर्बलता रह गई हो, वह उछाला मारती है।
भगवान ने यहां यही कहा है- काम और क्रोध के वेग को सहन करने में वह समर्थ है। काम की पूर्ति के लिए दूसरे का होना अनिवार्य है। दूसरा सुख देगा, वही काम है। और मेरे इस लक्ष्य में बाधा आती है, वहां क्रेाध पैदा होता है। ‘काम’ के पूरा होने पर, तृप्ति नहीं आती। विषाद आता है। कालिमा आती है, हताशा आती है, क्यों?
जब भी हमारी कोई इच्छा पूर्ति होती है, कुछ ही देर बाद पुनः कामना उठते ही व्याकुलता आ जाती है। इसके वेग से बाहर जाया जाए, जो अपने जीवन में इस वेग को सहन करने में समर्थ हैं, वही येागी है, वही सुखी हैं।
... प्रश्न है, जीवन दुखमय है, हम दुखी हैं?
भगवान कृष्ण यहां कह रहे हैं, काम से मुक्ति नहीं हो सकती, वह जीवनेच्छा है .... क्रोध भी स्वाभाविक वृत्ति है। आप वृत्तियों का नाश नहीं कर सकते। ये प्रकृति की देन है। पर हां, इनकेे वेग को सहन किया जा सकता है।
साधक के गुणों में दम, शम, जहॉं उसका इन्द्रियों पर नियंत्रण है। इन्द्रियॉं हैं , पर वे विषयों के अधीन नहीं हैं, मन नियंत्रित हे, जब उसक भीतर उपरति पैदा होती है। बाह्य की दासता कम हो जाती है। बाह्य का चिंतन कम होने से बाह्य की दासता चली जाती हे। यह एकक्रम है, तब उसके भीतर तितिक्षा पैदा होती है। दुख् और सुख के वेग को वह समान रूप से झेल लेता हे। मन कंपायमान नहीं होता। स्वामीजी कहा करते थे। भीतर बर्फ हो जाना है, ... स्पंदन उठेंगे, ... पर लहर नहीं बन पावेंगी, ... कंपन भीतर से आते हैं। अनवरत आते हैं। अंतर्मन विराट से जुड़ा है। विराट अत्यधिक शक्तिशाली है, परम है। अंतर्मन भी उतना ही शक्तिशाली है। वहीं संस्कार है। जो भाव रूप में है। अहर्निश धक्का लगते हैं। कई बार हम वह कुछ कर जाते हैं, जिसके लिए बाद में पछताते हैं कि मुझसे तो अदृश्य ने करवा लिया। हम ही वेग को सहन नहीं कर पाते हैं। दूसरा वेग बाहर आ रहा है, निरंतर। इन्द्रियां मन के द्वारा हर विषय भोग के प्रभाव को ‘छाप’ की तरह, बिम्ब की तरह भीतर भेजती रहती है। स्वामीजी कहा करते थे- यहां चट्टान की तरह होना है, लहरें आवें, टकरावें, टकरा टकराकर लौट जावें, हम बहंे नहीं। यही तितीक्षा है। जो अपने इस जीवनकाल में काम और क्रोध के इस वेग को सहन करने में समर्थ है, वही योगी है, वही सुखी है।
जीवन जीने की कला
जीवन जीने का तरीका या तो स्वामी/मालिक की तरह रहे या याचक की तरह।
स्वामी /मालिक, यह जीवन वर्तमान में ही संभव है। किसी आशा में नहीं, विचारणा का दासत्व नहीं हो, ... जहां तुम जीवन को ले जाना चाहो, ... बागडोर तुम्हारे हाथ में हो।
जो गुलाम है, दास है, ... वहां मन खींचकर ले जाता है, मन को इन्द्रियां खींचती है, इन्द्रियों को विषय खींचते हैं।
दोनों विपरीत धाराएं हैं, ... गुलाम के जीवन में विषयों की प्रमुखता रहती है, इन्द्रियां विषय में खींचकर ले जाती है, ... विवेक भी इन्द्रियों को समर्पित हो जाता है।
स्वामीजी कहा करते थे- गीता को कृष्ण की आंख से पढ़ो, ... कृष्ण की तरह बोलो, ... अर्थ बदल जाएगा, ... कभी सोचो। रथ तो एक ही है, ... प्रवाह दो है। जहां सारथी कृष्ण है, वहां अर्जुन, ... जो टेढ़ा मन है, वह सीधा होकर लौटता है, ... परन्तु अगर जहां अर्जुन सारथी हो, वहां क्या होता है, वहां कृष्ण भी अर्जुन की तरफ चल देता है, जीवन की धुरी बदल जाती है। संसार ही प्रमुख हो जाता है।
साधना क्या है, करना क्या है?
चित्त तो चंचल है, ... अर्जुन है, जो टेढ़ा है, उसे पहले सीधा करना है, इसे रोकना कठिन है, ... मन का कभी नाश नहीं हो सकता, ... हां इसकी गति की धारा बदल सकती है, ... यह जो पहले बाहर जा रहा था, ... अब इसे भीतर आना है, ... बहिर्मुखता से अंतर्मुखता की ओर, ... पर पहले इसे सीधा होना है-
भगवान बुद्ध ने कहा है- ऐसे चित्त को मेघावी पुरुष उसी प्रकार सरल, सीधा बनाता है जिस प्रकार बाण चलाने वाला बाण को।
चित्त की चंचलता, एक तथ्य है, बोध है, यह जाना गया है, जब यह जाना जाता है, बोध बनता है, अनुभवन में आता है, मात्र सूचना नहीं रहती, ... वहां जीवन के साथ जो आशाएं बांध रखी थीं, वे टूट जाती है, खालीपन अचानक साथ आ जाता है। यही जागरण है। जो जाना गया है, वह सीधा है, प्रत्यक्ष है। जहां क्षणभंगुर का उलझाव छूट जाता है, वहां जो बचता है, वह शाश्वत है, वह कहीं गया थोड़े ही था, बस क्षण भंगुर की दौड़ में उलझ गया था, दृष्टि से ओझल हो गया था।
यहां विकार दिख रहा है, उसे छिपाना नहीं, उसके साथ बहना नहीं, उसे न्यायोचित ठहराने का प्रयास नहीं, बस उसे जान लेना है, ... इससे ही सरलता अपने आप लग जाती है। अहंकार तभी पैदा होता है, जब जो है, उसे छिपाया जाता है।
जो यह जानता है, जो अपने को ही साक्षी करके, अपने आपको उघााड़ देता है, खोल देता है, कुछ भी बाकी नहीं रहता। उसे सत्य अपने आप उद्घाटित कर देता है। सत्य ही सत्य को प्रकट कर सकता है। दूसरा कोई नहीं। वही मेघावी है।
जीवन में सफलता का राज, आकांक्षा रहित हो जाना है। जिसको भी पाने की दौड़ में जाते हैं वह उतना ही दूर चला जाता है। जो होना है, वह चाह से नहीं होता है, जो हो रहा है उसी के साथ राजी हो जाओ, न भविष्य में जाना, न भूत का चिंतन करना, ... वर्तमान को स्वीकार करते जाना ही सार है।
स्वामीजी कहा करते थे, याचक नहीं बनना, ... मांगने वाला छोटा होता है, यह ठीक नहीं है, ... जब तक भिखारी बने रहोगे, ... तुम दूसरों के पीछे लगे रहोगे, तुम्हें संताप ही मिलेगा,दूसरों के पीछे जाना छोड़ दो, ... जिसे प्राकृतिक विधान से आना है, अपने आप आएगा, ... मांगने वाले का हाथ हमेशा हीन भावना देता है। मांगना छोड़ते ही व्यक्ति उसी क्षण मालिक हो जाता है। स्वामी बन जाता है।
मैंने जाना, यह मैं बरसों से सुनता रहा, ... पर जानते हुए भी नहीं जाना गया, ... मालिक बनने की कामना पैदा हो गई, ... जाना भीतर याचक है, ... और स्वामी बनने की चाह, जाना मैंने अपने भीतर विरोधाभास को पैदा किया। तथ्य है याचक ... हैं, बस मांगते ही रहे, कामना रही, छूटना चाहिए, विरोधाभास रहा। नौकरी के समय यह द्वन्द्व बना रहा। हर छोटी सी चीज के लिए मांगना जरूरत ही नहीं आदत सी बन गई। अपने ऊपर विश्वास नहीं रहा। बाहर से तो मजबूती बनी रही पर भीतर ही भीतर पोलापन भी आता गया। स्वामीजी कहते थे- भीतर ठोसपन होना चाहिए। जो याचक हैं, वह भीतर पोला रहता है।
जाना- तथ्य जो है, ... वह तभी ज्ञान बनता है जब उसे सीधा देखा जाता है, बिना अवधारणा के, उससे रत्तीभर भी हटा नहीं जाता। न भटकना, न भिन्न जाना, तब जो है, जो होना चाहिए, इस विरोधाभास की यात्रा छूट जाती है। जिसे छूटना है, वह स्वाभाविक रूप से छूटता चला जाता है।
यह जो चित्त है, जो हर पल जहां चाहे वहां झट से चला जाता है, इसका संतुलन किस प्रकार पाया जाए
शास्त्र में कहानी आती है। प्रजापति ने तीन अक्षर सौंपे थे ‘द’ ... देवताओं को, मनुष्य को, तथा राक्षसों को, तीनों के पृथक अर्थ बन गए। एक अर्थ ‘द’ से दमन भी बन गया। इन्द्रियों का दमन, संभवतः यह अर्थ बहुत बाद में प्रचलित हुआ। दमन इन्द्रियां जो द्वार है, उस द्वार से अंतर्मुखता की प्राप्ति के मार्ग पर चलना है। एक रास्ता बाहर जाता है। दूसरा भीतर आता है।
भगवान बुद्ध ने कहा है- ऐसे चित्त का दमन करना श्रेष्ठ है, दमन किया हुआ चित्त सुखदायक है-
यह दमन... रूपांतरण है, इन्द्रियां रहेंगी उनकी संवेदनशीलता समाप्त नहीं होती है, पर वे अब भीतर की यात्रा पर सहयोगी है।
इसी क्रम में भगवान बुद्ध ने कहा है-
इस चित्त को जो संयम करते हैं, वे ही ‘‘मार’’ के बंधन से मुक्त होते हैं-
चित्त जो है, ... तीनों गुणों से मिलकर बना है। भगवान कृष्ण ने गीता में इसी स्थल पर स्पष्ट निर्देशित किया है- कि यहां दमन नहीं, संतुलन पाना है। ‘‘मम माया दुरत्या,’’ ... इसको पार वही पा सकता है, ... जो इन गुणों के संतुलन को जान जाता है। तीनों ही गुण आवश्यक है। तमस आधार है। रजस गति है। सत- संतुलन है। जहां यह‘संयम’ है, ... वही इस प्रकृति के जाल को काट पाता है। सबसे गंभीर हैै, आकांक्षा, वह अंतिम समय जगती है। इस संतुलन का पाने का आधार है, उपेक्षा, ... तब मन स्वतः निष्क्रिय होकर रह जाता है। वह बहा नहीं पाता।
भगवान बुद्ध कहते हैं- जिसका चित्त अस्थिर है, जो सद्धर्भ को नहीं जानता है, जिसकी श्रद्धा डांवाडोल है, उसकी प्रज्ञा परिपूर्ण नहीं हो सकती है।
जिसका हाथ कांप रहा है, वह वस्तु को नहीं पकड़ सकता है। यही हालत मेरी थी। यह करना है, या वह करना है, मन डांवाडोल रहा। स्वामीजी कहा करते थे- पहले बहुत सारी आकांक्षाएं होगी। बहुत जगह मन जाएगा, फिर उसे एक जगह आना होता है, पर मन तो गति है, वह स्थिर नहीं हो सकता, तब वह गति अंतर्मुखी हो जाती है।
पहली स्वीकृति इस चित्त की अस्थिरता की थी। अशांत मन। उद्विग्न। तब जाना मन की शांति और शांत मन में भेद है। मन की शांति तो नींद की गोली खाकर भी आ जाती है। स्वामीजी कहते थे- भीतर बहुत संग्रह भरा पड़ा है, ... असंगत, ... जब वर्तमान में रहना शुरू होगा तब यह संग्रह बाहर भी निकलेगा, ... और धीरे-धीरे नियमित भी होता जाएगा, ... अभी तो सब सारा सामान जैसे गोदाम में भरा होता है, ऐसा पड़ा है। अस्थिरता ही मलिनता है।
यह जानना ही महत्वपूर्ण है- यह जानना अपने पास अपने भीतर ले आता है। सारी साधना का सार- निज में ही निजता से शुरू होता है। जब भीतर ज्ञान उपजता है, तब आत्मकृपा प्राप्त होती है। यही श्रद्धा है, ... जो उपसंपदा में प्राप्त होती है। भगवान बुद्ध का वचन है- जिसकी श्रद्धा डांवाडोल है उसकी प्रज्ञा परिपूर्ण नहीं हो सकती है।
भगवान बुद्ध ने आंतरिक यात्रा के पड़ाव सौंपे हैं। ‘चित्त की स्थिरता, ... मन जब स्थिर होता है, तब वह शुद्ध भी हो जाता है। चित्त की शुद्धि के लिए प्रयास मत करो, स्थिरता ही साधन है। जब यह स्थिरता बढ़ती है। तब अज्ञान तिरोहित होता है। तब बाहर का भटकाव कम होने लगता है। दासता जाती है। इसके पूर्व संतुलन प्राप्त होता है। संयम दृढ़ होता है। शरीर भी रहेगा, इन्द्रियां भी रहेगी, विषय भी रहेंगे, मन भी रहेगा, बुद्धि भी होगी, विवेक भी होगा। पर अब विवेक के नियमन में इन्द्रियां रहेगी। जब विवेकी चाहेगा, भगवान बुद्ध ने उसे मेघावी कहा है। तब मन चलेगा, वरना मन तो रहेगा, पर निष्क्रिय रहेगा। इस स्थिति को भगवान ने ज्ञान का जागरण कहा है, ... तब श्रद्धा पैदा होती है। विश्वास सदा दूसरे के प्रति होता है। श्र(ा स्वयं के प्रति होती है। यह शक्ति है। यही आत्मकृपा है। तब ‘बोध’ का प्राकट्य है। निरंतर जो भी जाना गया है, उसका आदर होता है, वह आचरण में ढलता है, हम बोध के समीप होते जाते हैं।
मैंने अपना अध्ययन किया,
मेरे भीतर क्या है, ... जो मुझे अशांत कर जाता है, ... भीतर सचमुच दासता है। .... अचानक विचार शृंखला शुरू होती है, और मैं ही विचार को ताकत दे देता हूं।
वह विचार मूर्त होकर और ताकत पाकर, ... अभिव्यक्ति की सीमा रेखा तक आ जाता है, ... शब्दों से भी बह जाता है, जहां अवरोध खड़ा किया, ... वह लौटता तो है, पर दूसरा विचार आ जाता है, बाहर इन्द्रियां है। उनसे बाहर विषय की सत्ता है।
विषय, ... बाहर है, यही दृश्य है, जिसका चिन्तन निरंतर होता रहता है, यही चिन्तन दासता सौंपता है, ... गुलाम मन इन विषयों में निरंतर भटकता रहता है.
भीतर छिपा हुआ क्रोध है, ... उसके नीचे आसक्ति है, ... उसके नीचे अहंकार है, ... जरा सी बाधा हुई, ... विचारणा फूट पड़ती है।
आप नहीं जानते हैं, प्रवाह में बहे चले जाते हैं, ... तब कठिनाई नहीं होती है। कठिनाई तभी होती है, जब भूल, यह जानते हुई कि यह गलती है, हो रही है, तब क्या किया जाए? जाना, ... सारा प्रयास भूल से बचने के लिए ही होता रहा। कहीं गलत न हो जाए, ... भीतर यही प्रतिक्षण रहा। यही कारण है, भीतर ठोसपन नहीं आ पाया, ... होना चाहिए था, मालिक की तरह रहा जाए, मन नियंत्रण में हो, संयम में हो, संतुलन में हो, ... पर मन ही प्रभावी रहा। वह खींचता पूरा अस्तित्व उसके साथ चला जाता। इसी कारण भीतर भय भी आ गया। पाया भीतर जिस मौलिक परिवर्तन की चाह थी, ... वह नहीं हो पाई। स्वामी शरणानंद जी कहा करते थे- अचाह पद, ... चाह ही नहीं हो। जाना, जीवन की दिशा सही की ओर चलने की होनी चाहिए, जो सही है, वही विवेकी है।
भूूल से बचने की तरफ जाना, अपने आपको तर्क के आधार पर न्यायोचित ठहराते रहना , नकारात्मक सोच है। सोच विधायी रहे। ईष्या से बचने पर ध्यान रहे, ध्यान प्रेम पर रहे। परनिन्दा से बचने के लिए, ध्यान आत्मप्रशंसा पर न रहे। क्रोध से बचने के लिए ध्यान, शांति पर रहे। गलतियां न हो, यह महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है सही होना शुरू हो जाए। संतुलन व्यवहार में हो। अनावश्यक उत्तेजना न हो। जो भी हो, जहां बोला जा रहा है, सुना जा रहा है, बोधपूर्वक हो, सजगता में हो, सही हो,
... जाना, अपने भीतर जाना, ... चित्त अस्थिर है, ... यह भी जाना, जैसे दीया जल रहा हो उसकी ज्योति झिलमिलाती है, तो चारों ओर प्रतिबिम्ब भी हिलते रहते हैं। भीतर ऐसा ही कंपता रहता है, मन। सुना था- ज्योति को ठहरा दो- छायाएं ठहर जाएंगी। पर कैसे? कांपता हुआ चित्त- जहां लहरें एक के बाद एक अनेक उठती जा रही है, ... वे कैसे रुके। पानी-हवा का स्पर्श पाकर लहरें उठा देता है। ... शांत सरोवर, कैसे हो?
सवाल यही था, ... होना ऐसा ही चाहिए। भीतर कंपन बंद हो जाएगा तो फिर छायाएं भी कांपती नहीं आएंगी। भीतर मन डांवाडोल है, ... विचारणा का प्रवाह निरंतरता में है, ... शास्त्र कहता है, ज्योति को ठहरा दो, ...
कंपन के उठते ही, वह विचार रूप में ढले, वहां अपना सहयोग मत दो, पर वह मन की आदत है, उसी ने खड़ा किया है, ... वह उसे ताकत देता है, ... तब जो दूसरा मन है जो दृष्टा है, उसे ताकत दो, वह देखे, इतनी तीक्षणता से देखे कि उसके ताप से वह कंपन नहीं चित्त के दर्पण पर विलीन हो जाए।
गहरी श्वास, पर तभी ध्यान... आती हुई...जाती हुई... एक पूरे वर्तुल पर ध्यान रहा तो कंपन उठने रुक जाते हैं, ... पर तीन-चार गहरी श्वास के वर्तुल के साथ ही कंपन तेजी से आने लगते हैं, ... यहां ध्यान रहे, ... सजगता रहे, ... तो भीतर की ज्योति कांपती कम हो जाती है।
... भगवान बुद्ध ने यहां किसी आरोपित कल्पना को स्वीकार नहीं किया है। उनका कहना है, जान लो, तथ्य को, यह है, जानने का उपाय है, स्थिर हो जाओ। उन्होंने ध्यान उपाय बताया है।
‘‘जिसके चित्त में राग नहीं है, और इसलिए जिसके चित्त में द्वेष नहीं है, जो पाप-पुण्य से मुक्त है, उस जाग्रत पुरुष को भय नहीं।’’
अभय- जहां भय और निर्भय दोनों खो जाते हैं।
कौन आदमी अभय को प्राप्त होता है, जिस चित्त में राग नहीं। उस चित्त में द्वेष नहीं होता।
राग-संबंध किसी से है, ऐसी आशा है सुख मिलेगा। किसी दूसरे से सुख मिलेगा दूसरी आकांक्षा है। राग भीतर कपड़े का गीलापन है, जहां धूल ठहर जाती है। ... राग वह रंग है, जो दृश्य का प्रभाव होते ही चित्त पर ठहर जाता है। द्वेष किसी दूसरे से दुख मिल रहा है, इसका अनुभव है।
जिसके चित्त में राग नहीं है- जिसने यह सोचना ही बंद कर दिया है कि किसी दूसरे से सुख मिलेगा। जो जाग गया है। जहां भी दूसरा है, उस दूसरे से सुख मिल सकता है वहां राग है।
जिसने इस सत्य को जान लिया कि दूसरे से सुख नहीं मिलेगा, उसकी दिशा तब मुड़ती है, तब बहिर्मुखता से वह अंतर्मुखी होता है। वह द्वार से भीतर की ओर लौटता है। बाहर तो सुख नहीं मिला, भीतर लौटूं। जिसने जान लिया सुख मेरा भीतर है। फिर वहां द्वेष को जगह नहीं है। अपेक्षा ही दुख का कारण है। जिनसे जितनी अपेक्षा होती है उनसे उतना ही दुख मिलता है। लेकिन अगर अपेक्षा छोड़ दी जाए तो क्या दूसरा दुख देने में समर्थ हो सकता है?
शायद मेरी गलती यही रही। दूसरों से अपेक्षा बढ़ती ही चली गई। दूसरों से मांग बढ़ती ही गई। स्वयं को खो दिया, ... दूसरों ने आकर चेतना पर अतिक्रमण कर लिया, ... उनकी ही बातें, उनके विचार, ... रात को भी सोने नहीं देते। स्वप्न भी उनके, ... असंख्य, ... जाना अपेक्षा छोड़ते ही, भीतर आत्मविश्वास लौटता है। भीतर की दूसरों से मांग कम होते ही, ... भीतर एक खालीपन सा हो जाता है। जाना- किसी से कुछ मिलता नहीं है, तब दूसरा दुख देने वाला भी चला जाता है। हम दूसरे का आश्रय यह मन ही देता है। अपेक्षा में उसको जीवंतता मिलती है। अगर सुख किसी सेे नहीं मांगा जाए तो कोई दुख भी देने में समर्थ नहीं है। तब भीतर का खालीपन आत्मविश्वास से भर जाता है। वहीं संतोष उपजता है। जो हारे का हरिनाम नहीं , वास्तविक अपना धन होता है।
भगवान बुद्ध का वचन है- मन की आकांक्षा दुष्कर है, वह कभी मरती नहीं। जीवन में संतोष नहीं आता।
अभय वहीं उपस्थित होताहै, जिसने जान लिया जो तुम्हारा है , वह तुम्हारा है, मांगने की कोई जरूरत नहीं। जो तुम्हारा ही नहीं है, कितना भी मांगो, तुम उसके मालिक नहीं हो सकते। हम परमात्मा से संसार मांगते हैं, हमारा सारा कर्मकांड हमें भिखारी बनाने में तत्पर है। जिस दिन यह दिखाई पड़ जाता है, उसी क्षण याचक खो जाता है। अभय पैदा हो जाता है।
...शास्त्र का यहां वचन है- साधक के पास एक ही हथियार है, ज्ञान का, होश का, प्रज्ञा का। उसी के साथ वासना को तिरोहित किया जा सकता है। जिससे भी लड़ना हो होश से लड़ना। भीतर यह जाना , वहॉं क्रोध है, दबा हुआ, मौका पाते ही बाहर आ जाता है, उस क्रोध को अब दबाना कोई उपाय नहीं है। क्रोध को देखना, क्रोध के प्रति जगना, होश बनाए रखना.पाया... क्रोध की जड़ तो कामना में है, चाह है, चाह की आपूर्ति में बाधा आते ही क्रोध उफन जाता है। जाना, मूर्च्छा में, बेहोशी में वृत्तियों का पसारा होता है... होश में आते ही पसारा सिमट जाता है।
...मैंने जाना, मेरे भीतर विषाद की जड़ यह क्रोध ही है। यही व्यक्तित्व बन गया है। उठते ही लहर को जाना, ... वह नदी न बन जाए, प्रपात न बन जाए, मन जो इसे सहयोग दे रहा था, उसको नहीं जाना, ... पाया क्षणिक सा कंपन ध्यान न देने पर प्रपात बन जाता है। यह बेहोशी ही, मन की चंचलता का रहस्य है। सजगता आने पर वृत्तियों सिमटने लग जाती है। इस स्थल पर ‘सजगता’ पाने के लिए-क्या किया जाए?
शास्त्र का वचन है- सबसे अधिक बुराई गलत मार्ग पर लगा हुआ चित्त करता है गलत मार्ग- स्वयं को न देखकर, शेष सब दिशाओं में भटक जाना। भीतर न खोजकर बाहर देखना, अपने घर न आकर बाहर भीख मांगना। होश, जागृति, ध्यान उसके पीछे सबसे अधिक भलाई सही मार्ग पर लगा हुआ चित्त करता है। जिसका मन हमेशा दूसरे में रहता है, वही पाप में है।
एक ही साथ खोज लेने योग्य है- अपने बोध के साथ, अपने आप को जानना। संत कबीर ने कहा था, ”आए थे हरि भजन को औटन लगे कपास“।
सजगता में अपने आपको, अपने साथ खोजना ही ध्यान है। दूसरे के साथ खोजना ही विचार है। विचार में सदा दूसरे की याद बनी रहती है। विचार बाहर की भीड़ के प्रतिबिम्ब हैं। विचार जो तुम्हारे साथ नहीं है उनको साथ मान लेने की कल्पना है, ध्यान में बिल्कुल अकेलापन है, अपने ही साथ, बस। बात सीधी सी है, जब भी हम विचार में होते हैं, हम दूसरे के साथ ही होते हैं। जब अपने साथ होते हैं, वहॉं विचार गिर जाते हैं। पाप दूसरों के साथ भटकना है।
सही मार्ग- अपनी तरफ लौटना। भीतर की तरफ लौटना। जहां विचार छूटते जाते हैं।
मैंने अपनी स्थिति पर विचार किया, अन्वेषण किया।
पाया, ... मेरी दुर्बलता जो समय हाथ में आया है, जो क्षण उपलब्ध है, उसे बस कल के लिए छोड़ता रहा। जीवन को समग्रता में जी नहीं पाया। मैं दूसरों के साथ ही चलता रहा। जो नहीं करना था ,वही किया। कर्तव्य और अकर्तव्य के बीच एक महीन सी रेखा है। हम अनुकरण में वही सब करते रहजे हैं, जिसका बाहर विरोध करते हैं। पत्नी है, संतान हैं, या तो उनकी दासता है, या संघर्ष है। अधिकांश समय उनके ही चिंतन में चला जाता है। यही वह जाला है, हम जिसे मकड़ी की तरह अपने ही थूक से बनाते हैं, अंत में उसी में उलझकर रह जाते हैं। देहांत और मृत्यु का भेद यही है। देहांत तो केवल शरीर का नाश है। संस्कार और भी सघन होकर मन के साथ रह जाते हैं। हम जिसका चिन्तन करते हैं, उसके ही गुलाम होजाते हैं। फिर उसी के बारे में ही सोचते रहते हैं।
जाना- पूज्य स्वामीजी कहा करते थे- वर्तमान में रहो। ये शब्द मात्र सूचना की तरह रहे, भीतर नहीं उतर पाए।
जाना जीवन की कला यही है। इस एक क्षण को भी कैसे जिया जाए। कैसे जीवन की समग्रता यहां आ जाए। इस एक क्षण में गहराई से उतर जाना ही, जीवन जीने कला है। यहां जो भूत और भविष्य में जो ले जाता है, वह मन है, वह विचार है, वह अनुपस्थित है। वर्तमान में रहना, इसी क्षण को पूरा जिया जाए, समग्रता में। इस एक क्षण में भी गहराई में वहीजाग्रत है, जो समग्र जीवन में है। उसे आज में, अभी में प्राप्त करना ही, जो जीवन क्षण भंगुर है, उसमें इस जीवन की वास्तविक पहचान है। ... यही जानना बोध है। क्षण में उतरना ही ध्यान है। यह समय में प्रवेश की कला है।
शक्कोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीर विमोक्षणात्।
काम क्रोधोÚवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ।।5-23
”जो मनुष्य शरीर के नाश होने से पहले ही काम और क्रोध से उत्पन्न हुए वेग को सहन करने में समर्थ है, अर्थात् काम, क्रोध को जिसने सदा के लिए जीत लिया है, वह मनुष्य इस लोक में योगी है, और वही सुखी है।“
गीता के पांचवे अध्याय को, कर्म सन्यास कहा गया है। पूर्ववर्ती अध्यायों का समाहार यहां हुआ है। अर्जुन की शंका है कि आपने कर्म सन्यास तथा निष्काम कर्मयोग दोनों की प्रशंसा की है, मेरे लिए क्या श्रेष्ठ है, यह नहीं कहा। इसके पूर्व भगवान उसे स्वयं ही स्वधर्म की खोज हेतु प्रेरित कर आए हैं। वे अपनी ओर से उसे कोई एक निश्चित समाधान नहीं दे रहे हैं।
‘कर्म सन्यास’ कर्म का त्याग नहीं है। कर्म का जगत एक बड़ा स्वप्न का जगत है, बस एक सीरियल चल रहा है, ... इससे अधिक नहीं, ... तब कर्म छूट जाता है। जो कर्ता है वह यहां है नहीं, स्वामीजी कहा करते थे- वह न करते हुए भी करता है। शारीरिक क्रियाएं तो यथावत होंगी, ... पर मन सक्रिय तभी होगा, जब अंतःप्रेरणा उठती है। अन्यथा मन निष्क्रिय पड़ा रहता है। तब कर्म अपने आप गिर जाता है। हां, फिर भीतर से प्रेरणा अपने आप उठती है, ... विवेक कार्य करवाता है। पर अपना कोई स्वार्थ नहीं होता है। न श्रेय न प्रेय। बस प्रकृति ने चाहा तो उसके कार्य में सहयोग हो गया। बस! कोई आकांक्षा नहीं होती।
‘निष्काम कर्म में कर्म के छोड़ने व छूटने पर बल नहीं है। यहां फलाकांक्षा पर जोर नहीं है। जो भी कार्य सामने आया है, मन को पूरी तरह से वहां रखते हुए किंचित मात्र भी विपरीत नहीं होने देना चाहिए- तब जो मन भटकता है, वहां फलाकांक्षा में जाता है वह रुक जाता है। फलाकांक्षा भीतर से प्रेरणा नहीं बनती। कर्म एक खेल बन जाता है। बस करना है। करते रहना है। निष्काम कर्म कोई अवधारणा नहीं है। जीने की कला है। यहां कल के लिए स्थगन नहीं है। आज और अभी जो हो सकता है, कर देना चाहिए। इसी क्षण जीना है, वहां फल की आकांक्षा, छोड़ देनी चाहिए। आज में अभी में जीने की कुशलता आनी चाहिए। क्योंकि आज और अभी में तो कर्म है फल हमेशा भविष्य में आता है। पर जहां फलाकांक्षा पहले आ जाती है, वहां कर्म ही स्थगित होता जाता है।
इसी प्रसंग कोे स्पष्ट करते हुए भगवान ने कहा है-
ज्ञेयः स नित्य संन्यासी यो न द्वेष्टि न काति’।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते।।5-3
”जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा करता है, वह निष्काम कर्म को उपलब्ध हो जाता है।“
यहाँ हमने इस श्लोक को बाद में रखा है। काम का तात्पर्य है, आकर्षण, तथा द्वेष है, विकर्षण। सकारात्मकता तथा नकारात्मकता, एक ही धागे के दो मुंह है। हम दिनभर या तो कर्म किसी खिंचाव से करते हैं, या पलायन में करना चाहते हैं। विरोध में करते हैं, असहयोग में करते हैं। ... ये दो ही हमारे कर्म की प्रेरणा होती है। पर भगवान कहते हैं- तीसरी शक्ति भी होती है। अंतःप्रेरणा, जहां निष्कामता होती है। फलाकांक्षा नहीं होती है। यह मात्र शाब्दिक व्यायाम नहीं है।
कभी कोशिश करें, ... जब भी व्यक्ति अपने भीतर के राग को, द्वेष को जान जाता है, तब उसकी उर्जा जो रहती है, वह बाहर कीे खूंटियां उखड़ने पर सीधी भीतर उतरती है। कर्म तो वहां भी होना है। पर अब न किसी को जीतना है, न किसी को प्रभावित करना है। बस जो भी कार्य सामने आया है, ... पूरा मन उसी में डूब जाता है। प्राप्त होता है शांत मन। एक आनंद। एक भीतरी प्रसन्नता। तुम्हारा काम है, और हम कर सकते हैं, बस इतना ही बहुत है। तुम्हारी खुशी के लिए नहीं कर रहे, तुम्हारी नाराजगी की फिकर नहीं, बस महत्वपूर्ण बात यही है, हम कर सकते हैं, इसीलिए कर रहे हैं, यह भी गारंटी नहीं है, कल भी करेंगे, ताकत उसकी है, उसकी इच्छा है, इसीलिए कर पा रहे हैं। तब बोध जगता है।
... जाना, ... जहां तक भीतर राग था, ... वही तक द्वेष था। संबंधों में तनाव था। बाहर अपेक्षा बनी हुयी थी। उससे क्रोध की परत चढ़ती जाती थी। जब भीतर की दहलीज पर पांव रखा, ... तो पाया, ... जगत वही है, लोग वही हैं, पर अब कुछ बदला बदला सा है, संबंध सरल और सहज हो गए हैं। यहां कुछ भी बाह्य के प्रदर्शन के लिए नहीं होता है। न वस्त्र बदलते हैं, न वेशभूषा,पर भीतर मौलिक परिवर्तन की ओर हम बढ़ आते हैं। अब तुमसे कोई अपेक्षा नहीं है,नमस्ते नहीें कर रहे हो,बहुत अच्छी बात है, यह उपेक्षा भी नहीं है, जो बाहर घट रहा है, अब वह स्मृति का अंग नहीं बन पारहा है, चिंतन के लिए अवकाश भी नही है।
स्वामीजी कहा करते थे- जो भी कार्य हो, मन को पूर्णरूपेण वहीं ले जाओ, ... वहीं आनंद है। कोई विपरीत भावना नहीं। कर्म ही आनंद है, जिसे अभी जो कर्म है, उसमें आनंद मिल रहा है, ... उसे हर काम में आनंद प्राप्त होगा, ... वह राग-द्वेष के आकर्षण से बाहर निकल आएगा। कार्य के प्रारम्भ से लेकर अंत तक मन की एक ही अवस्था बनी रहे, यही ध्यान है। न यहां कुछ हारा जाता है न यहां कुछ जीता जाता है, बस यही ध्यान रहे। इस महारास में में हमारा नृत्य बढ़िया हो, पर दूसरे का खेल हमारे कारण से खराब नहीं हो जाए। यही ध्यान है। यह ध्यान सिखाया नही जाता, यह तो स्वयं, सीखा जाता है।
‘योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते।।7।
”वश में किया हुआ है शरीर, जितेन्द्रिय तथा विशुद्ध अतःकरण वाला,एवं संपूर्ण प्राणियों के आत्मरूप परमात्मा में एकीभाव हुआ निष्काम कर्मयोगी कर्मकरता हुआ भी लिपायमान नहीं होता।
शरीर उसी के नियंत्रण में रहता है, जिसका अंतःकरण शु( है। स्वामी जी सदैव चित्त की शु(ि पर बल देते थे। वे कहा करते थे- भीतर जितनी निर्दोषता आती है, उतनी ही आत्मा सबल होती जाती है।
अंतःकरण की अशुद्धि ... क्या है? जहां दूसरे का प्रभाव है। दृश्य का चिन्तन है, वही अंतःकरण अशुद्ध हो जाता है। दूसरे का चिन्तन, पराधीन बना देता है। हम जिसका चिन्तन करते हैं, वह स्वामी हो जाता है। हम गुलाम। जितने भीतर विचार होंगे, उसनी ही अशुद्धियां होगी। विचार ही विकार है। निर्विकारता मंें ही परम शुद्धि है।
इसी क्रम में ही भगवान ने जहां निष्काम कर्म योगी के, आचरण को परिभाषित किया है, वही अन्त में समाहार करते हुए कहा है-
जो मनुष्य शरीर के नाश होने से पहले ही काम और क्रोध से उत्पन्न हुए वेग को सहन करने में समर्थ है-
पूज्य स्वामीजी यहां तितिक्षा शब्द का प्रयोग करते थे। ‘तान तितिशस्व भारतः’ वे कहा करते थे, बड़े-बड़े योगियों के पतन होते देखे हैं। माया भ्रम भी है। माया भी शक्ति है, जो सम्मोहित कर देती है। साधारणजन, थोड़ी ऊंचाई से गिरता है, परन्तु योगी का पतन बहुत ऊंचाई से होता है। वह अंत समय तक इस अवस्था को बनाए नहीं रख पाता। शक्ति का वेग सहन करना सरल नहीं है। जब गंगाजी उतरी तो भगवान शिव को अपने मस्तक पर झेलना पड़ा। विकारों के वेग अंत समय में जब इन्द्रियां शिथिल हो जाती है, तब तेजी से उभरते हैं। बीज कितना भी भुना जावे, ... परन्तु उसकी अंकुरण क्षमता समाप्त नहीं होती है। अनुकूल, खाद, बीज, धरती, हवा पाकर फिर अंकुरित हो सकता हैं। क्योंकि तब शक्ति जो जगती है, उसके वेग को शरीर सहन नहीं कर पाता है। या तो शरीर छूट जाता है, या शरीर में विकार तेजी से उपजते हैं। जो भी दुर्बलता रह गई हो, वह उछाला मारती है।
भगवान ने यहां यही कहा है- काम और क्रोध के वेग को सहन करने में वह समर्थ है। काम की पूर्ति के लिए दूसरे का होना अनिवार्य है। दूसरा सुख देगा, वही काम है। और मेरे इस लक्ष्य में बाधा आती है, वहां क्रेाध पैदा होता है। ‘काम’ के पूरा होने पर, तृप्ति नहीं आती। विषाद आता है। कालिमा आती है, हताशा आती है, क्यों?
जब भी हमारी कोई इच्छा पूर्ति होती है, कुछ ही देर बाद पुनः कामना उठते ही व्याकुलता आ जाती है। इसके वेग से बाहर जाया जाए, जो अपने जीवन में इस वेग को सहन करने में समर्थ हैं, वही येागी है, वही सुखी हैं।
... प्रश्न है, जीवन दुखमय है, हम दुखी हैं?
भगवान कृष्ण यहां कह रहे हैं, काम से मुक्ति नहीं हो सकती, वह जीवनेच्छा है .... क्रोध भी स्वाभाविक वृत्ति है। आप वृत्तियों का नाश नहीं कर सकते। ये प्रकृति की देन है। पर हां, इनकेे वेग को सहन किया जा सकता है।
साधक के गुणों में दम, शम, जहॉं उसका इन्द्रियों पर नियंत्रण है। इन्द्रियॉं हैं , पर वे विषयों के अधीन नहीं हैं, मन नियंत्रित हे, जब उसक भीतर उपरति पैदा होती है। बाह्य की दासता कम हो जाती है। बाह्य का चिंतन कम होने से बाह्य की दासता चली जाती हे। यह एकक्रम है, तब उसके भीतर तितिक्षा पैदा होती है। दुख् और सुख के वेग को वह समान रूप से झेल लेता हे। मन कंपायमान नहीं होता। स्वामीजी कहा करते थे। भीतर बर्फ हो जाना है, ... स्पंदन उठेंगे, ... पर लहर नहीं बन पावेंगी, ... कंपन भीतर से आते हैं। अनवरत आते हैं। अंतर्मन विराट से जुड़ा है। विराट अत्यधिक शक्तिशाली है, परम है। अंतर्मन भी उतना ही शक्तिशाली है। वहीं संस्कार है। जो भाव रूप में है। अहर्निश धक्का लगते हैं। कई बार हम वह कुछ कर जाते हैं, जिसके लिए बाद में पछताते हैं कि मुझसे तो अदृश्य ने करवा लिया। हम ही वेग को सहन नहीं कर पाते हैं। दूसरा वेग बाहर आ रहा है, निरंतर। इन्द्रियां मन के द्वारा हर विषय भोग के प्रभाव को ‘छाप’ की तरह, बिम्ब की तरह भीतर भेजती रहती है। स्वामीजी कहा करते थे- यहां चट्टान की तरह होना है, लहरें आवें, टकरावें, टकरा टकराकर लौट जावें, हम बहंे नहीं। यही तितीक्षा है। जो अपने इस जीवनकाल में काम और क्रोध के इस वेग को सहन करने में समर्थ है, वही योगी है, वही सुखी है।
जीवन जीने की कला
जीवन जीने का तरीका या तो स्वामी/मालिक की तरह रहे या याचक की तरह।
स्वामी /मालिक, यह जीवन वर्तमान में ही संभव है। किसी आशा में नहीं, विचारणा का दासत्व नहीं हो, ... जहां तुम जीवन को ले जाना चाहो, ... बागडोर तुम्हारे हाथ में हो।
जो गुलाम है, दास है, ... वहां मन खींचकर ले जाता है, मन को इन्द्रियां खींचती है, इन्द्रियों को विषय खींचते हैं।
दोनों विपरीत धाराएं हैं, ... गुलाम के जीवन में विषयों की प्रमुखता रहती है, इन्द्रियां विषय में खींचकर ले जाती है, ... विवेक भी इन्द्रियों को समर्पित हो जाता है।
स्वामीजी कहा करते थे- गीता को कृष्ण की आंख से पढ़ो, ... कृष्ण की तरह बोलो, ... अर्थ बदल जाएगा, ... कभी सोचो। रथ तो एक ही है, ... प्रवाह दो है। जहां सारथी कृष्ण है, वहां अर्जुन, ... जो टेढ़ा मन है, वह सीधा होकर लौटता है, ... परन्तु अगर जहां अर्जुन सारथी हो, वहां क्या होता है, वहां कृष्ण भी अर्जुन की तरफ चल देता है, जीवन की धुरी बदल जाती है। संसार ही प्रमुख हो जाता है।
साधना क्या है, करना क्या है?
चित्त तो चंचल है, ... अर्जुन है, जो टेढ़ा है, उसे पहले सीधा करना है, इसे रोकना कठिन है, ... मन का कभी नाश नहीं हो सकता, ... हां इसकी गति की धारा बदल सकती है, ... यह जो पहले बाहर जा रहा था, ... अब इसे भीतर आना है, ... बहिर्मुखता से अंतर्मुखता की ओर, ... पर पहले इसे सीधा होना है-
भगवान बुद्ध ने कहा है- ऐसे चित्त को मेघावी पुरुष उसी प्रकार सरल, सीधा बनाता है जिस प्रकार बाण चलाने वाला बाण को।
चित्त की चंचलता, एक तथ्य है, बोध है, यह जाना गया है, जब यह जाना जाता है, बोध बनता है, अनुभवन में आता है, मात्र सूचना नहीं रहती, ... वहां जीवन के साथ जो आशाएं बांध रखी थीं, वे टूट जाती है, खालीपन अचानक साथ आ जाता है। यही जागरण है। जो जाना गया है, वह सीधा है, प्रत्यक्ष है। जहां क्षणभंगुर का उलझाव छूट जाता है, वहां जो बचता है, वह शाश्वत है, वह कहीं गया थोड़े ही था, बस क्षण भंगुर की दौड़ में उलझ गया था, दृष्टि से ओझल हो गया था।
यहां विकार दिख रहा है, उसे छिपाना नहीं, उसके साथ बहना नहीं, उसे न्यायोचित ठहराने का प्रयास नहीं, बस उसे जान लेना है, ... इससे ही सरलता अपने आप लग जाती है। अहंकार तभी पैदा होता है, जब जो है, उसे छिपाया जाता है।
जो यह जानता है, जो अपने को ही साक्षी करके, अपने आपको उघााड़ देता है, खोल देता है, कुछ भी बाकी नहीं रहता। उसे सत्य अपने आप उद्घाटित कर देता है। सत्य ही सत्य को प्रकट कर सकता है। दूसरा कोई नहीं। वही मेघावी है।
जीवन में सफलता का राज, आकांक्षा रहित हो जाना है। जिसको भी पाने की दौड़ में जाते हैं वह उतना ही दूर चला जाता है। जो होना है, वह चाह से नहीं होता है, जो हो रहा है उसी के साथ राजी हो जाओ, न भविष्य में जाना, न भूत का चिंतन करना, ... वर्तमान को स्वीकार करते जाना ही सार है।
स्वामीजी कहा करते थे, याचक नहीं बनना, ... मांगने वाला छोटा होता है, यह ठीक नहीं है, ... जब तक भिखारी बने रहोगे, ... तुम दूसरों के पीछे लगे रहोगे, तुम्हें संताप ही मिलेगा,दूसरों के पीछे जाना छोड़ दो, ... जिसे प्राकृतिक विधान से आना है, अपने आप आएगा, ... मांगने वाले का हाथ हमेशा हीन भावना देता है। मांगना छोड़ते ही व्यक्ति उसी क्षण मालिक हो जाता है। स्वामी बन जाता है।
मैंने जाना, यह मैं बरसों से सुनता रहा, ... पर जानते हुए भी नहीं जाना गया, ... मालिक बनने की कामना पैदा हो गई, ... जाना भीतर याचक है, ... और स्वामी बनने की चाह, जाना मैंने अपने भीतर विरोधाभास को पैदा किया। तथ्य है याचक ... हैं, बस मांगते ही रहे, कामना रही, छूटना चाहिए, विरोधाभास रहा। नौकरी के समय यह द्वन्द्व बना रहा। हर छोटी सी चीज के लिए मांगना जरूरत ही नहीं आदत सी बन गई। अपने ऊपर विश्वास नहीं रहा। बाहर से तो मजबूती बनी रही पर भीतर ही भीतर पोलापन भी आता गया। स्वामीजी कहते थे- भीतर ठोसपन होना चाहिए। जो याचक हैं, वह भीतर पोला रहता है।
जाना- तथ्य जो है, ... वह तभी ज्ञान बनता है जब उसे सीधा देखा जाता है, बिना अवधारणा के, उससे रत्तीभर भी हटा नहीं जाता। न भटकना, न भिन्न जाना, तब जो है, जो होना चाहिए, इस विरोधाभास की यात्रा छूट जाती है। जिसे छूटना है, वह स्वाभाविक रूप से छूटता चला जाता है।
यह जो चित्त है, जो हर पल जहां चाहे वहां झट से चला जाता है, इसका संतुलन किस प्रकार पाया जाए
शास्त्र में कहानी आती है। प्रजापति ने तीन अक्षर सौंपे थे ‘द’ ... देवताओं को, मनुष्य को, तथा राक्षसों को, तीनों के पृथक अर्थ बन गए। एक अर्थ ‘द’ से दमन भी बन गया। इन्द्रियों का दमन, संभवतः यह अर्थ बहुत बाद में प्रचलित हुआ। दमन इन्द्रियां जो द्वार है, उस द्वार से अंतर्मुखता की प्राप्ति के मार्ग पर चलना है। एक रास्ता बाहर जाता है। दूसरा भीतर आता है।
भगवान बुद्ध ने कहा है- ऐसे चित्त का दमन करना श्रेष्ठ है, दमन किया हुआ चित्त सुखदायक है-
यह दमन... रूपांतरण है, इन्द्रियां रहेंगी उनकी संवेदनशीलता समाप्त नहीं होती है, पर वे अब भीतर की यात्रा पर सहयोगी है।
इसी क्रम में भगवान बुद्ध ने कहा है-
इस चित्त को जो संयम करते हैं, वे ही ‘‘मार’’ के बंधन से मुक्त होते हैं-
चित्त जो है, ... तीनों गुणों से मिलकर बना है। भगवान कृष्ण ने गीता में इसी स्थल पर स्पष्ट निर्देशित किया है- कि यहां दमन नहीं, संतुलन पाना है। ‘‘मम माया दुरत्या,’’ ... इसको पार वही पा सकता है, ... जो इन गुणों के संतुलन को जान जाता है। तीनों ही गुण आवश्यक है। तमस आधार है। रजस गति है। सत- संतुलन है। जहां यह‘संयम’ है, ... वही इस प्रकृति के जाल को काट पाता है। सबसे गंभीर हैै, आकांक्षा, वह अंतिम समय जगती है। इस संतुलन का पाने का आधार है, उपेक्षा, ... तब मन स्वतः निष्क्रिय होकर रह जाता है। वह बहा नहीं पाता।
भगवान बुद्ध कहते हैं- जिसका चित्त अस्थिर है, जो सद्धर्भ को नहीं जानता है, जिसकी श्रद्धा डांवाडोल है, उसकी प्रज्ञा परिपूर्ण नहीं हो सकती है।
जिसका हाथ कांप रहा है, वह वस्तु को नहीं पकड़ सकता है। यही हालत मेरी थी। यह करना है, या वह करना है, मन डांवाडोल रहा। स्वामीजी कहा करते थे- पहले बहुत सारी आकांक्षाएं होगी। बहुत जगह मन जाएगा, फिर उसे एक जगह आना होता है, पर मन तो गति है, वह स्थिर नहीं हो सकता, तब वह गति अंतर्मुखी हो जाती है।
पहली स्वीकृति इस चित्त की अस्थिरता की थी। अशांत मन। उद्विग्न। तब जाना मन की शांति और शांत मन में भेद है। मन की शांति तो नींद की गोली खाकर भी आ जाती है। स्वामीजी कहते थे- भीतर बहुत संग्रह भरा पड़ा है, ... असंगत, ... जब वर्तमान में रहना शुरू होगा तब यह संग्रह बाहर भी निकलेगा, ... और धीरे-धीरे नियमित भी होता जाएगा, ... अभी तो सब सारा सामान जैसे गोदाम में भरा होता है, ऐसा पड़ा है। अस्थिरता ही मलिनता है।
यह जानना ही महत्वपूर्ण है- यह जानना अपने पास अपने भीतर ले आता है। सारी साधना का सार- निज में ही निजता से शुरू होता है। जब भीतर ज्ञान उपजता है, तब आत्मकृपा प्राप्त होती है। यही श्रद्धा है, ... जो उपसंपदा में प्राप्त होती है। भगवान बुद्ध का वचन है- जिसकी श्रद्धा डांवाडोल है उसकी प्रज्ञा परिपूर्ण नहीं हो सकती है।
भगवान बुद्ध ने आंतरिक यात्रा के पड़ाव सौंपे हैं। ‘चित्त की स्थिरता, ... मन जब स्थिर होता है, तब वह शुद्ध भी हो जाता है। चित्त की शुद्धि के लिए प्रयास मत करो, स्थिरता ही साधन है। जब यह स्थिरता बढ़ती है। तब अज्ञान तिरोहित होता है। तब बाहर का भटकाव कम होने लगता है। दासता जाती है। इसके पूर्व संतुलन प्राप्त होता है। संयम दृढ़ होता है। शरीर भी रहेगा, इन्द्रियां भी रहेगी, विषय भी रहेंगे, मन भी रहेगा, बुद्धि भी होगी, विवेक भी होगा। पर अब विवेक के नियमन में इन्द्रियां रहेगी। जब विवेकी चाहेगा, भगवान बुद्ध ने उसे मेघावी कहा है। तब मन चलेगा, वरना मन तो रहेगा, पर निष्क्रिय रहेगा। इस स्थिति को भगवान ने ज्ञान का जागरण कहा है, ... तब श्रद्धा पैदा होती है। विश्वास सदा दूसरे के प्रति होता है। श्र(ा स्वयं के प्रति होती है। यह शक्ति है। यही आत्मकृपा है। तब ‘बोध’ का प्राकट्य है। निरंतर जो भी जाना गया है, उसका आदर होता है, वह आचरण में ढलता है, हम बोध के समीप होते जाते हैं।
मैंने अपना अध्ययन किया,
मेरे भीतर क्या है, ... जो मुझे अशांत कर जाता है, ... भीतर सचमुच दासता है। .... अचानक विचार शृंखला शुरू होती है, और मैं ही विचार को ताकत दे देता हूं।
वह विचार मूर्त होकर और ताकत पाकर, ... अभिव्यक्ति की सीमा रेखा तक आ जाता है, ... शब्दों से भी बह जाता है, जहां अवरोध खड़ा किया, ... वह लौटता तो है, पर दूसरा विचार आ जाता है, बाहर इन्द्रियां है। उनसे बाहर विषय की सत्ता है।
विषय, ... बाहर है, यही दृश्य है, जिसका चिन्तन निरंतर होता रहता है, यही चिन्तन दासता सौंपता है, ... गुलाम मन इन विषयों में निरंतर भटकता रहता है.
भीतर छिपा हुआ क्रोध है, ... उसके नीचे आसक्ति है, ... उसके नीचे अहंकार है, ... जरा सी बाधा हुई, ... विचारणा फूट पड़ती है।
आप नहीं जानते हैं, प्रवाह में बहे चले जाते हैं, ... तब कठिनाई नहीं होती है। कठिनाई तभी होती है, जब भूल, यह जानते हुई कि यह गलती है, हो रही है, तब क्या किया जाए? जाना, ... सारा प्रयास भूल से बचने के लिए ही होता रहा। कहीं गलत न हो जाए, ... भीतर यही प्रतिक्षण रहा। यही कारण है, भीतर ठोसपन नहीं आ पाया, ... होना चाहिए था, मालिक की तरह रहा जाए, मन नियंत्रण में हो, संयम में हो, संतुलन में हो, ... पर मन ही प्रभावी रहा। वह खींचता पूरा अस्तित्व उसके साथ चला जाता। इसी कारण भीतर भय भी आ गया। पाया भीतर जिस मौलिक परिवर्तन की चाह थी, ... वह नहीं हो पाई। स्वामी शरणानंद जी कहा करते थे- अचाह पद, ... चाह ही नहीं हो। जाना, जीवन की दिशा सही की ओर चलने की होनी चाहिए, जो सही है, वही विवेकी है।
भूूल से बचने की तरफ जाना, अपने आपको तर्क के आधार पर न्यायोचित ठहराते रहना , नकारात्मक सोच है। सोच विधायी रहे। ईष्या से बचने पर ध्यान रहे, ध्यान प्रेम पर रहे। परनिन्दा से बचने के लिए, ध्यान आत्मप्रशंसा पर न रहे। क्रोध से बचने के लिए ध्यान, शांति पर रहे। गलतियां न हो, यह महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है सही होना शुरू हो जाए। संतुलन व्यवहार में हो। अनावश्यक उत्तेजना न हो। जो भी हो, जहां बोला जा रहा है, सुना जा रहा है, बोधपूर्वक हो, सजगता में हो, सही हो,
... जाना, अपने भीतर जाना, ... चित्त अस्थिर है, ... यह भी जाना, जैसे दीया जल रहा हो उसकी ज्योति झिलमिलाती है, तो चारों ओर प्रतिबिम्ब भी हिलते रहते हैं। भीतर ऐसा ही कंपता रहता है, मन। सुना था- ज्योति को ठहरा दो- छायाएं ठहर जाएंगी। पर कैसे? कांपता हुआ चित्त- जहां लहरें एक के बाद एक अनेक उठती जा रही है, ... वे कैसे रुके। पानी-हवा का स्पर्श पाकर लहरें उठा देता है। ... शांत सरोवर, कैसे हो?
सवाल यही था, ... होना ऐसा ही चाहिए। भीतर कंपन बंद हो जाएगा तो फिर छायाएं भी कांपती नहीं आएंगी। भीतर मन डांवाडोल है, ... विचारणा का प्रवाह निरंतरता में है, ... शास्त्र कहता है, ज्योति को ठहरा दो, ...
कंपन के उठते ही, वह विचार रूप में ढले, वहां अपना सहयोग मत दो, पर वह मन की आदत है, उसी ने खड़ा किया है, ... वह उसे ताकत देता है, ... तब जो दूसरा मन है जो दृष्टा है, उसे ताकत दो, वह देखे, इतनी तीक्षणता से देखे कि उसके ताप से वह कंपन नहीं चित्त के दर्पण पर विलीन हो जाए।
गहरी श्वास, पर तभी ध्यान... आती हुई...जाती हुई... एक पूरे वर्तुल पर ध्यान रहा तो कंपन उठने रुक जाते हैं, ... पर तीन-चार गहरी श्वास के वर्तुल के साथ ही कंपन तेजी से आने लगते हैं, ... यहां ध्यान रहे, ... सजगता रहे, ... तो भीतर की ज्योति कांपती कम हो जाती है।
... भगवान बुद्ध ने यहां किसी आरोपित कल्पना को स्वीकार नहीं किया है। उनका कहना है, जान लो, तथ्य को, यह है, जानने का उपाय है, स्थिर हो जाओ। उन्होंने ध्यान उपाय बताया है।
‘‘जिसके चित्त में राग नहीं है, और इसलिए जिसके चित्त में द्वेष नहीं है, जो पाप-पुण्य से मुक्त है, उस जाग्रत पुरुष को भय नहीं।’’
अभय- जहां भय और निर्भय दोनों खो जाते हैं।
कौन आदमी अभय को प्राप्त होता है, जिस चित्त में राग नहीं। उस चित्त में द्वेष नहीं होता।
राग-संबंध किसी से है, ऐसी आशा है सुख मिलेगा। किसी दूसरे से सुख मिलेगा दूसरी आकांक्षा है। राग भीतर कपड़े का गीलापन है, जहां धूल ठहर जाती है। ... राग वह रंग है, जो दृश्य का प्रभाव होते ही चित्त पर ठहर जाता है। द्वेष किसी दूसरे से दुख मिल रहा है, इसका अनुभव है।
जिसके चित्त में राग नहीं है- जिसने यह सोचना ही बंद कर दिया है कि किसी दूसरे से सुख मिलेगा। जो जाग गया है। जहां भी दूसरा है, उस दूसरे से सुख मिल सकता है वहां राग है।
जिसने इस सत्य को जान लिया कि दूसरे से सुख नहीं मिलेगा, उसकी दिशा तब मुड़ती है, तब बहिर्मुखता से वह अंतर्मुखी होता है। वह द्वार से भीतर की ओर लौटता है। बाहर तो सुख नहीं मिला, भीतर लौटूं। जिसने जान लिया सुख मेरा भीतर है। फिर वहां द्वेष को जगह नहीं है। अपेक्षा ही दुख का कारण है। जिनसे जितनी अपेक्षा होती है उनसे उतना ही दुख मिलता है। लेकिन अगर अपेक्षा छोड़ दी जाए तो क्या दूसरा दुख देने में समर्थ हो सकता है?
शायद मेरी गलती यही रही। दूसरों से अपेक्षा बढ़ती ही चली गई। दूसरों से मांग बढ़ती ही गई। स्वयं को खो दिया, ... दूसरों ने आकर चेतना पर अतिक्रमण कर लिया, ... उनकी ही बातें, उनके विचार, ... रात को भी सोने नहीं देते। स्वप्न भी उनके, ... असंख्य, ... जाना अपेक्षा छोड़ते ही, भीतर आत्मविश्वास लौटता है। भीतर की दूसरों से मांग कम होते ही, ... भीतर एक खालीपन सा हो जाता है। जाना- किसी से कुछ मिलता नहीं है, तब दूसरा दुख देने वाला भी चला जाता है। हम दूसरे का आश्रय यह मन ही देता है। अपेक्षा में उसको जीवंतता मिलती है। अगर सुख किसी सेे नहीं मांगा जाए तो कोई दुख भी देने में समर्थ नहीं है। तब भीतर का खालीपन आत्मविश्वास से भर जाता है। वहीं संतोष उपजता है। जो हारे का हरिनाम नहीं , वास्तविक अपना धन होता है।
भगवान बुद्ध का वचन है- मन की आकांक्षा दुष्कर है, वह कभी मरती नहीं। जीवन में संतोष नहीं आता।
अभय वहीं उपस्थित होताहै, जिसने जान लिया जो तुम्हारा है , वह तुम्हारा है, मांगने की कोई जरूरत नहीं। जो तुम्हारा ही नहीं है, कितना भी मांगो, तुम उसके मालिक नहीं हो सकते। हम परमात्मा से संसार मांगते हैं, हमारा सारा कर्मकांड हमें भिखारी बनाने में तत्पर है। जिस दिन यह दिखाई पड़ जाता है, उसी क्षण याचक खो जाता है। अभय पैदा हो जाता है।
...शास्त्र का यहां वचन है- साधक के पास एक ही हथियार है, ज्ञान का, होश का, प्रज्ञा का। उसी के साथ वासना को तिरोहित किया जा सकता है। जिससे भी लड़ना हो होश से लड़ना। भीतर यह जाना , वहॉं क्रोध है, दबा हुआ, मौका पाते ही बाहर आ जाता है, उस क्रोध को अब दबाना कोई उपाय नहीं है। क्रोध को देखना, क्रोध के प्रति जगना, होश बनाए रखना.पाया... क्रोध की जड़ तो कामना में है, चाह है, चाह की आपूर्ति में बाधा आते ही क्रोध उफन जाता है। जाना, मूर्च्छा में, बेहोशी में वृत्तियों का पसारा होता है... होश में आते ही पसारा सिमट जाता है।
...मैंने जाना, मेरे भीतर विषाद की जड़ यह क्रोध ही है। यही व्यक्तित्व बन गया है। उठते ही लहर को जाना, ... वह नदी न बन जाए, प्रपात न बन जाए, मन जो इसे सहयोग दे रहा था, उसको नहीं जाना, ... पाया क्षणिक सा कंपन ध्यान न देने पर प्रपात बन जाता है। यह बेहोशी ही, मन की चंचलता का रहस्य है। सजगता आने पर वृत्तियों सिमटने लग जाती है। इस स्थल पर ‘सजगता’ पाने के लिए-क्या किया जाए?
शास्त्र का वचन है- सबसे अधिक बुराई गलत मार्ग पर लगा हुआ चित्त करता है गलत मार्ग- स्वयं को न देखकर, शेष सब दिशाओं में भटक जाना। भीतर न खोजकर बाहर देखना, अपने घर न आकर बाहर भीख मांगना। होश, जागृति, ध्यान उसके पीछे सबसे अधिक भलाई सही मार्ग पर लगा हुआ चित्त करता है। जिसका मन हमेशा दूसरे में रहता है, वही पाप में है।
एक ही साथ खोज लेने योग्य है- अपने बोध के साथ, अपने आप को जानना। संत कबीर ने कहा था, ”आए थे हरि भजन को औटन लगे कपास“।
सजगता में अपने आपको, अपने साथ खोजना ही ध्यान है। दूसरे के साथ खोजना ही विचार है। विचार में सदा दूसरे की याद बनी रहती है। विचार बाहर की भीड़ के प्रतिबिम्ब हैं। विचार जो तुम्हारे साथ नहीं है उनको साथ मान लेने की कल्पना है, ध्यान में बिल्कुल अकेलापन है, अपने ही साथ, बस। बात सीधी सी है, जब भी हम विचार में होते हैं, हम दूसरे के साथ ही होते हैं। जब अपने साथ होते हैं, वहॉं विचार गिर जाते हैं। पाप दूसरों के साथ भटकना है।
सही मार्ग- अपनी तरफ लौटना। भीतर की तरफ लौटना। जहां विचार छूटते जाते हैं।
मैंने अपनी स्थिति पर विचार किया, अन्वेषण किया।
पाया, ... मेरी दुर्बलता जो समय हाथ में आया है, जो क्षण उपलब्ध है, उसे बस कल के लिए छोड़ता रहा। जीवन को समग्रता में जी नहीं पाया। मैं दूसरों के साथ ही चलता रहा। जो नहीं करना था ,वही किया। कर्तव्य और अकर्तव्य के बीच एक महीन सी रेखा है। हम अनुकरण में वही सब करते रहजे हैं, जिसका बाहर विरोध करते हैं। पत्नी है, संतान हैं, या तो उनकी दासता है, या संघर्ष है। अधिकांश समय उनके ही चिंतन में चला जाता है। यही वह जाला है, हम जिसे मकड़ी की तरह अपने ही थूक से बनाते हैं, अंत में उसी में उलझकर रह जाते हैं। देहांत और मृत्यु का भेद यही है। देहांत तो केवल शरीर का नाश है। संस्कार और भी सघन होकर मन के साथ रह जाते हैं। हम जिसका चिन्तन करते हैं, उसके ही गुलाम होजाते हैं। फिर उसी के बारे में ही सोचते रहते हैं।
जाना- पूज्य स्वामीजी कहा करते थे- वर्तमान में रहो। ये शब्द मात्र सूचना की तरह रहे, भीतर नहीं उतर पाए।
जाना जीवन की कला यही है। इस एक क्षण को भी कैसे जिया जाए। कैसे जीवन की समग्रता यहां आ जाए। इस एक क्षण में गहराई से उतर जाना ही, जीवन जीने कला है। यहां जो भूत और भविष्य में जो ले जाता है, वह मन है, वह विचार है, वह अनुपस्थित है। वर्तमान में रहना, इसी क्षण को पूरा जिया जाए, समग्रता में। इस एक क्षण में भी गहराई में वहीजाग्रत है, जो समग्र जीवन में है। उसे आज में, अभी में प्राप्त करना ही, जो जीवन क्षण भंगुर है, उसमें इस जीवन की वास्तविक पहचान है। ... यही जानना बोध है। क्षण में उतरना ही ध्यान है। यह समय में प्रवेश की कला है।
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