Wednesday, November 27, 2013

श्री गुरु गीता अठारहवां अध्याय

श्री गुरु गीता अठारहवां अध्याय


‘‘स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धि लभते नरः।
स्वकर्मनिरतः सिद्धि यथा विन्दति तच्छृणु।। 45

अपने-अपने स्वाभाविक कर्म में लगा हुआ मनुष्य भगवत प्राप्ति रूप परम सिद्धि को प्राप्त होता है। परन्तु जिस प्रकार से अपने स्वाभाविक कर्म में लगा हुआ मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त होता है, उस विधि को तू मेरे से सुन।

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
‘‘स्वकर्मणा तमभ्यर्च्थ सि(ि विच्दति मानवः 46

 जिस परमात्मा से सर्व भूतों की उत्पत्ति हुई है।जिससे यह सर्व जगत व्याप्त है।उस परमेश्वर को अपने स्वाभाविक कर्म द्वारा पूजकर मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त होता है।

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः पर धर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वभावनियतं  कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।।47
अच्छी प्रकार आचरण किए हुए दूसरे के धर्म से गुण रहित भी अपना धर्म श्रेय है। क्योंकि स्वभाव से नियत किए हुए स्वधर्म रूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को प्राप्त नहीं होता है।
स्वधर्म और स्वकर्म दोनों में अन्तर है। स्वधर्म- हमारे भीतर की अनुगूंज है। हमारा मौलिक स्वभाव है। मन का स्वभाव शांति है। अन्तर्मुखी व्यक्तित्व शांत है, वहीं ज्ञान है, वहीं  शक्ति है। यह मेरी निजता है। यह मेरा स्वभाव है, यहां जो गुणधर्म शेष बच जाता है, वह स्वधर्म है।
कर्म है, वह बाहर है, धर्म है वह भीतर है। कर्म, धर्म तक यात्रा करता है। जो कर्म का विभाजन है, उसे भगवान ृकृष्ण ने गीता में वर्ण के आधार पर विभाजित किया है। हर वर्ण की स्वाभाविक विशेषता है। उसकी यात्रा का प्रस्थान बिन्दु है। लक्ष्य एक ही है, पर साधन सामग्री में भिन्नता है। रूचि में भिन्नता है, ... यह भिन्नता उसका स्वाभाविक गुण कर्म है। यह उसका स्वकर्म है, उस कर्म में पूरी तरह से अपने आपको लगा देना ही साधन तत्व है। जहां मन पूरा लगा, ... वहां वह अमन होने लगता है। अन्तर्यात्रा उपलब्ध हो जाती है। यहां भगवान कह रहे हैं अपने हीस्वकर्म में पूरी तरह उतरने से स्वधर्म की प्राप्ति हो जाती है।

अपने-अपने स्वाभाविक कर्म में लगा हुआ मनुष्य भगवत्प्राप्ति रूप परम सिद्धि को प्राप्त होता है।
यहां भगवान कह रहे हैं, जो जीवन प्राप्त हुआ है, वहां हर क्रिया पूज्य है कहीं अलग हटकर पूजा की विधि नहीं है। हर क्रिया, हर कर्म परमात्मा के द्वार तक जाता है। कर्म ही यहां पूजा की सामग्री है, वही वंदना है।
कर्मों को बदलने की चेष्ठा व्यर्थ है, इस नाटक में जो भी रोल मिला है वह खूबसूरती से हो जाए, कोई कमी न रहे। मन पूरा उसी में डूब जाए। यही अहसास है, हर कर्म में उसी परमात्मा का संगीत है। इसीलिए अच्छी प्रकार आचरण किए हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित अपना धर्म श्रेष्ठ है। क्योंकि- स्वभाव से नियत किए हुए स्वधर्म रूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को प्राप्त नहीं होता है।
हम जो भी कर्म कर रहे हैं, जो जीवन प्राप्त हुआ है, वे हमारे संस्कारों की छाया है। वे हमारा ही अर्जन है। हमने ही उन्हें मांगा है। वे हमारी ही मांग है। ... वे पूरा होने के लिए ही आए हैं। वहां मन को पूरा लगा देना है। आधा-अधूरा नहीं, दूसरे को देखकर कोई अतिरिक्त मांग नहीं, ... तब और भी कष्ट आएगा, ... वह स्वभाव के प्रतिकूल आएगा। अपने स्वाभाविक कर्म और आचरण को आधार मानते हुए उस कर्म को नियत मानते हुए पूरा मन वहां लगा देना चाहिए। छूटना होगा, ... स्वाभाविक क्रम में छूटता चला जाएगा। यही ‘दाता’ की मर्जी है।
दुख का बड़ा कारण प्राप्त सामर्थ्य का दुरुपयोग है। ”आकाश ही सीमा है, कहकर हम दूसरे को पूरा सोख लेते हैं। हम अपनी सीमा के बाहर कार्य करते हैं, धन व यश कमाने की लालसा में चले जाते हैं। जब लौटते हैं तो कई बार इतनी देर होजाती है कि अपने आपको ही खो देते हैं।

‘‘तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।। 62

हे भारत सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही अनन्य शरण को प्राप्त हो, उस परमात्मा की कृपा से ही परम शान्ति को और सनातन परमधाम को प्राप्त होगा।
मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी उसका अहंकार है। उसका ‘मैं’ भाव है। उसके सामने परम गुरु भी आ जाएं ,खुद परमात्मा भी सामने आजाए, पर उनके प्रति उसमें श्रद्धा-विश्वास नहीं होता। परन्तु जब वे चले जाते हैं। तब हर पल उनकी याद सताती है। पूज्य स्वामीजी जब तक रहे। वर्षों उनसे प्रश्न पूछते रहे, ... अपने आप में आश्वस्त रहे कि महान सिद्ध संत से हमारा जुड़ाव है, ... पर उनके बार-बार कहने पर भी प्रयोग में नहीं गए। मात्र शब्द ग्रहण करते रहे। क्यों? श्रद्धा-विश्वास दोनों ही नहीं रहा था। न अपने प्रति न दूसरे के प्रति। शास्त्र कहते हैं, जिनसे अधिक परिचय होता है, उनकी अवज्ञा होती है। यह मन की स्वाभाविक आदत है। कभी भी पुत्र के मन में पिता के प्रति, पत्नी में पति के प्रति, बुद्धिमान मंे गुरु के प्रति आदर नहीं होता। क्यों? अर्जुन जो कृष्ण के इतने समीप था, उसने भी गीता पूरी सुनने के बाद, और तो और विराट स्वरूप के दर्शन के बाद , दुबारा कृष्ण से ही महाभारत की समाप्ति के बाद गीता सुनाने का कहा था। वह  तो कृष्ण को ही सारथी बनाकर लाया है।
भगवान सामने है, अर्जुन का रथ हांक रहे हैं, ... परन्तु अर्जुन के भीतर कहीं शरणागति नहीं है। वह प्रश्न पर प्रश्न पूछे जा रहा है, तब भगवान कह रहे हैं- तू परमेश्वर की अनन्य शरण में जा- ”वह सबके हृदय में स्थित हैं।“कृष्ण ने अपने आपको कहीं परमेश्वर नही कहा।
स्वामीजी कहते थे- क्रिया बाहर होती है, मन भीतर है। वह भीतर से प्रेरणा लेता है, वृत्तियां भीतर से उछाला करती हैं। उसे प्रेरणा भीतर से मिलती है। बाहर रहते हुए भी ,वह तो तूही है, तेरे पास है।  संत कबीर ने कहा है, जिस घट भीतर बाग बगीचे , वहीं है सिरजन हारा भजन सभी सुनते हैं, पर विश्वास किसको होता है? भीतर संबंध निरन्तर जुड़ा रहे, ... यही साधन है। वह बाहर ही बाहर न भटकता रहे। तब शांति व शक्ति दोनों मिलती है।

‘सर्व भावेन- निरन्तर वर्तमान में रहने से, यह स्थिति आती है। चिन्तन न होने से वृत्तियों तथा विषयों का संबंध टूट जाता है। तब स्वाभाविक अवस्था में मन शांत होने लगता है।

‘‘मन्मना भव मÚक्तोे मद्याजी मां नमस्कुरू।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसिमे। 65

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहंत्वासर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामिमा शुचः।। 66

तू केवल मुझ परमात्मा में ही अनन्य प्रेम से नित्य निरन्तर अचल मन वाला हो और मुझ परमेश्वर को ही अतिशय श्रद्धा-भक्ति सहित निरन्तर भजने वाला हो तथा मन, वाणी और शरीर द्वारा सर्वस्व अर्पण करके मेरा पूजन करने वाला हो, सबके आश्रय स्वरूप वासुदेव को नमस्कार, ऐसा करने से तू मेरे को ही प्राप्त होगा, यह मैं तेरे लिए सत्य प्रतिज्ञा करता हूं, क्योंकि तू मेरा प्रिय सखा है।

सर्व धर्मों को अर्थात् संपूर्ण कर्मों के आश्रय को त्यागकर केवल एक मुझ एक सच्चिदानंदघन वासुदेव परमात्मा की ही अनन्य शरण को प्राप्त हो, मैं तेरे को संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूंगा, ... शोक मत कर।
यहां साधन का प्रारंभ है। संदेह का परित्याग। जहां अहंकार होता है, वहां संदेह रहता है। जहां हृदय है, वहां भाव है, वहां समर्पण है।
‘अनन्य श्रद्धा है। अहंकार , शक्ति को तोड़ता है। विभाजित करता रहता है। जहां भक्त है। वहां बंटवारा नहीं है। मन जब अंतर्मुखी होता है। वहां समर्पण जन्मता है। जब तक बहिर्मुखता होता है, वहां तक अहंकार है।  संदेह है। भटकाव है।
हम कौन से मार्ग से आ रहे हैं, यह सोचना व्यर्थ है। समर्पण का मार्ग अलग नहीं है। जहां बहिर्मुखता है, वहां मार्ग है। वहां अहंकार है। वहां संदेह है। जहां अतंर्मुखता है, वहां धारा-राधा बन जाती है। वहां बस समर्पण शेष रहता है।
 श्रद्धा बहिर्मुखता पर रोक लगाती  है। जहां विचारणा होती है। वहां विकल्प होते हैं। विचार तो तभी होता है, जहां विचारणा नहीं रहती। विचारणा का अंतिम छोर विचार है, जब विचार गिर जाता है, वहां निर्विकल्पता होती है। वहां निश्चयात्मकता होती है। वहां निर्णय होता है।
समर्पण वहीं होता है, जहां ‘मैं’ नहीं रहता। जहां कर्ता खो जाता है जहां समर्पण पूरा होता है, वहां पाप भी गिर जाता है। क्योंकि विचार ही तो पाप है।

और तब गीता का समाहार  , आज के युवक की इस स्वीकारोक्ति के साथ होता है।गीता वृद्धों का कोई अरण्य गान नहीं है, नहीं यह मृत्यु पर गाया जाने वाला शोकगीत है, यह आज के संघर्षशील युवक के लिए ,उस रास्ते को बताती है, जिस पर चलकर वह , शांति , शक्ति तथा वैभव पा सकता है, जो आज उसकी मॉंग हैं

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धात्वत्प्रसादान्मयाच्युज
स्थितोऽस्मि गत सन्देहः करिष्ये वचनं तब।ं 73।

अर्जुन का कथन है आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट होगया है, मुझे स्मृति की प्राप्ति हुई है। मेरा संशय दूर हुआ है। मैं आपकी आज्ञा का पालन करूॅंगा।
गीता राम-रसायन है, यह आधुनिक मनुष्य की समस्याओं को एक मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देख रही है। भारतीय समाज का पतन इसीलिए हुआ कि कि हमने  बुद्ध और शंकराचार्य के बीच के समय में हजार वर्ष के बीच गीता को विस्मृत ही कर दिया था। पूज्य स्वामीजी की साधना पद्धति गीता पर आधारित थी। वे मनुष्य के लिए प्रयत्न और पुरुषार्थ दोनो को आवश्यक मानते थे। संसार में सफलता प्रयत्न से मिलती है, प्रकृति ने जो भी कार्य सौंपा है, उसे उत्कृष्टता से करना शरीर का उद्देश्य है। जीवन का उद्देश्य इसी जीवन में परमात्मा की महान शक्ति का ज्ञान प्राप्त करना है। पुरुषार्थ इसीलिए ही  है। उसके लिए  सुबह और शाम को वे निर्विचारता के अभ्यास के लिए कहते थे। निरन्तर वर्तमान में रहना उनकी साधना रही, अंर्तुमुखता प्राप्त करो, यही उनका आप्त वचन था। वे याचक वृत्ति के विरुद्ध रहे। एक नया मनुष्य जो सुखी है, शांत है, और शक्तिशाली है, वही साधक है , वे अर्जुन को इसी लक्ष्य की प्र्राप्ति में देखते थे।

गीता के आधार पर प्रयत्न और पुरुषार्थ की इस एकीकृत  साधन प्रणाली से उस नए मनुष्य का आगमन संभव है, जो विवेक को गुरु मानकर उसके आलोक में अपना पथ तय करेगा। इस मनुष्य के पास गहरा आत्मविश्वास होगा, संतोष होगा , प्रसन्नता होगी, जो पलायनवादी दृष्टि से दूर , इस आधुनिक समाज मंे अपने महत्वपूर्ण  योगदान से रेखांकित होगा। अर्जुन को मोह दूर होना, उसकीसंशयात्मा का दूर होना , निर्णय की ओर बढ़ना , आज की दुनिया में हर हारे हुए मनुष्य के लिए नई जिन्दगी की शुरुआत है।

क्या गीता को हम पलायनवादी दृष्टि से विवेचित कर सकते हैं?
संजय के ही शब्द  ही मत्वपूर्ण हैं, उसी ने ही गीता को ध्ृातराष्ट्र के वाक्य के साथ शुरु किया था। वही अंत में कह रहा है-
‘यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम।। 67

जहां योगेश्वर श्रीकृष्ण है वहां गांडीवधारी अर्जुन है  ,वहीं पर श्री, विजय, विभूति अचल नीति है, ऐसा मेरा मत है।
‘यह संजय की सीख है। जो उसने धृतराष्ट्र को गीता सुनाकर पाई है। गीता का अभिप्राय, गीता का सार, ... इस एक श्लोक में आया है।
यहां गीता का समापन है।
पूर्व में भगवान कृष्ण ने कहा-
‘तस्मात सर्वेषुकालेषु माम अनुस्मर युद्ध च’
... मेरा स्मरण वह भी निरन्तर तथा युद्ध भी हो, ... कर्म भी हो? यहां संजय  यही कह रहा है-
जहां भगवान योगेश्वर श्री कृष्ण है, ... तथा गांडीव धारी अर्जुन है। भगवान- योगेश्वर है, तथा अर्जुन धर्नुधारी हैं। वही पर ही श्री, विजय, विभूति, अचल नीति है।
भगवान बुद्ध ने, चार आर्य सत्य बताकर मनुष्य मात्र की दुःख से मुक्ति का उपाय निर्देशित किया था। मनुष्य की वास्तविक मांग यही है, वह शांति व सुख पाए। सुख की संपूर्ण व्याख्या, श्री, विजय, विभूति में है, ... यह किस प्रकार संभव हो?हमारा  भी यहॉं वही मत है, जो संजय का मत है, जहां भगवान योगेश्वर कृष्ण हैं तथा गांडीवधारी अर्जुन है। वही ंयह संभव है।

निरन्तर वर्तमान में रहना ही वह विधि है, जिससे यह संभव है। जो अतर्मुखी है, ... वह निरन्तर वर्तमान में है, वह बाहर से भी जुड़ा है, वहां कर्मठता है। शक्तियां भी हैं, परन्तु वह भीतर से जुड़ा रहकर, प्रेरणा लेकर, जहां शांत है, वही पर शक्ति संपन्न भी है। यहां मनुष्य के कर्म त्याग की बात नहीं है। यह वह अवस्था है कि वह अतिरिक्त संपदा जिसे सन्यास कहा जाता है, उससे सन्निहित है, वह गृहस्थ के कर्म कौशल से भी जुड़ा है।
वही वास्तविक स्थितिप्रज्ञ है। जो स्थितिप्रज्ञ है। उसके भीतर योगेश्वर की कृपा की उपस्थिति है। जो प्रत्येक प्राणी के हृदय में है। वह शांत है। उसका मन उसके अधीन है। इन्द्रियां मन के अधीन है। वृत्तियां उठती है, पर तितिक्षा से उनके वेग को सहन करता हुआ, अविचलित है।

पर साथ ही वह कर्मठ है, प्रेरणा से प्राप्त स्वकर्म व स्वधर्म का पालन करता है, वह कुशलता से प्राप्त कर्म को निष्काम भाव से करता हुआ, प्रकृति के कार्य में सहयोग करता है।
मनुष्य प्रयत्न और पुरुषार्थ की शक्ति लेकर पैदा हुआ है। वह सांसारिक ज्ञान और संासारिक सम्पदाओं की खोज में पूरी आयु गंवा देता है। बाह्य की संपदाओं की सीमा है। यह जीवन यात्रा का एक पड़ाव है। उसे अपने को बेहतर बनाते हुए,अपनी चेतना को ऊर्ध्वगामी रखना है। सुख, शांति और शक्ति उस परम के समीप समर्पण से ही मिलती है। जहॉं वह ”मम“ की दासता को छोड़कर अपने ”माम“ से जुड़ जाता है।

यह वह अद्भुत कीमिया है, जहां वह भक्त है, वहीं वह योगी है, वहीं वह स्थितिप्रज्ञ है, ... गीता का यह सार तत्व श्री गुरु गीता है।
 जहां संसार से पलायन नहीं, वरन जगत की इस लीला में सक्रिय सहयोग देते हुए परम शांति पाने की प्रयोग धर्मिता है।पूज्य स्वामीजी के द्वारा दिए गए श्री गीता के संदेश को यहाँ पुनः यहाँ प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।उनके साथ लगभग तीस वर्षोका सानिध्य रहा, उन्होंने स्वतंत्र कोई आध्यात्मिक ग्रंथ नहीं लिखा, समय-समय पर प्रवचनों में, आपने  जिन श्लोकों पर  प्रकाश डाला था तथा जिन्हें पढ़ने ,मनन करने के लिए निर्देश दिए थे, वर्षोतक वे अंतःकरण में पुष्पित व पल्लवित होते रहे, अमरीका प्रवास में मेरे  छोटेपुत्र ने मुझसे गीता पर अपने मित्रों के साथ चर्चा की थी , तब अचानक ही यह  विचार स्वतः ही उपज गया था।  उसे ही मैंने इस कृति का पहला प्रारूप भेजा भी था। वह तो आज दुनिया में नहीं हे। पर उससे और उसके मित्रों केसाथ बीते हुए क्षण इस कृति के माध्यम से उसे ही समर्पित हैं वे ही यहाँ पर विवेचित किए गए हैं।

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