Friday, November 8, 2013

श्री गुरु गीता तीसरा अध्याय


श्री गुरु गीता तीसरा अध्याय



लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ।
ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्।ं3
दो ही प्रकार की निष्ठा है, समभाव में स्थिति एक ही है, इसे दो प्रकार से पाया जा सकता है।
ज्ञान योग से- कर्मयोग से। सांख्य व योग।
सांख्य की निष्ठा है- सत्य ,सिर्फ ज्ञान से ही पाया जा सकता है। कुछ और करना जरूरी नहीं है। श्रम की, साधना की कोई जरूरत नहीं है। क्योंकि जो भी खोया है, वहां केवल  उसकी विस्मृति हो गई है। करने का कोई प्रश्न ही नहीं है।
योग- की मान्यता है, बिना किए कुछ भी नहीं हो सकेगा। योग का कहना है, अज्ञान को हटाने के लिए श्रम करना होगा, ... यहां अंधेरा है, दिया जलाया, वह गया, ... पर यहां दूसरी बात है, आदमी कर्म की शृंखला से बंधा हुआ है, स्वतंत्रता पाने के लिए उसे जंजीरों को हटाना होगा, चाहे जंजीरे, लोहे की हों या सोने की हों।
इसी प्रकार पुरुष भी दो ही प्रकार के हैं।बहिर्मुखी और अंतर्मुख्ीी
‘क्षर- नाशवान संसार, अक्षर-अविनाशी स्वरूप।
संसार की प्राप्ति में सम रहना, कर्मयोग है। क्षर से विमुख होकर, अक्षर में स्थित. होना ज्ञान योग है। परन्तु यह भी माना गया, क्षर और अक्षर से अन्य उत्तम पुरुष भी है, जो परमात्मा के नाम से जाना जाता है। वह क्षर से अतीत है, अक्षर से उत्तम है। वह पुरुषोत्तम है। वह विराट है।  ऐसे परमात्मा की शरण में जाना-शरणागति है। कबीरजी ने समझाना चाहा,”बूॅंद समानी समुद में यह तत कहो न जाइ“, यह तीसरी अवस्था है, यह भी बाद में आई।
... सांख्य निष्ठा और योग निष्ठा- दोनों साधकों की निष्ठा है। जहां दोनों में संसार है, और मैं हॅ्रूं, इसका अनुभव होता ैहैै। परन्तु भक्तियोग में है- भगवान है। उन्हें मानकर  वह अपने आपको समर्पित कर देना होता है। सांख्य तथा योग में विवेक साधन तत्व है, ... उसकी प्राप्ति ही साध्य से अभिन्न करवाती है, परन्तु भक्तियोग में श्रद्धा की प्रमुखता है। मानना ही समर्पण का आधार है।

जानना भी सन्देह रहित होता जाता है, जो जाना गया है, वह ज्ञान का आधार बनता है। सत्य से ही सत्य को प्रकट किया जा सकता है, ... जो भी माना गया है, ... वह जानने के आलोक में सत्यापित होता है, यह मानना, शत-प्रतिशत सन्देह रहित होता है। सांख्य व योग-साधन साध्य है, पर भक्तियोग भगवान और उनकी कृपा पर निर्भर है। जैसे चुंबक के पास आने पर लोहे के कण अपने आप खिंचने लगते हैं। वे चुंबक केगुण भी लेलेते हैं, वही अवस्था यहॉं है,स्वामीजी कहा करते थे, भक्ति ओढ़ने की चादर नहीं है। यह तो सौ टका अपने आपको खो देना है।
‘मनुष्य न तो कर्मों का आरम्भ किये बिना निष्कर्मता को प्राप्त होता है, न कर्मों के त्याग मात्र से सिद्धि को प्राप्त होता है। साधक के लिए कर्म करना स्वाभाविक है। निष्काम भाव से कर्म करने पर ही कर्मयोग की सिद्धि प्राप्त होती है। प्रयत्ल ही कर्मयोग का साधन है। प्रयत्न किए बिना कोई रह नहीं सकता।
... मनुष्य के अंतःकरण में कर्म करने का वेग रहता है, वह ध्यान से अपने अंतःकरण का अवलोकन करे, ... हर विचार उसे कर्म करने के लिए प्रेरित करता है, क्या करना है, क्या नहीं करना है, यही उसकी दुविधा है, बिना किए वह एक क्षण भी ठहर नहीं पाता है।

उसे इस वेग को शांत करना है, ... यह स्वाभाविक अवस्था है। यह वेग साधक के लिए, कामना का त्याग करके, ... कर्तव्य कर्म करने से होता है। कामना अंतःकरण से उठती है, अगर कामना कर्म के साथ रहेगी, ... तो यह वेग आगे और आगे ढकेलता रहेगा। कामना तभी निःशेष होती है, जब वर्तमान में रहकर कर्म किया जाए। मन को पूरी तरह कर्म के साथ रखा जावे, कामना आगे-पीछे के चिन्तन में ही विद्यमान रहती है।

कर्मयोग का आचरण करने वाला मनुष्य, कर्मों को करते हुए भी निष्कर्मता को प्राप्त होता है।

... हम जो भी करते हैं, हमारी कामना पहले आती है, सही या गलत इसकी चिन्ता नहीं है, तर्क से उसे न्यायोचित बनाने का आग्रह पीछे आता है। ज्ञान की निष्ठा का आधार, प्राप्त जीवन में विवेक का आदर है। जहां विवेक का आदर होता है, वहां जो गलत है, वह अपने आप छूटने लग जाता है। तर्क गिर जाता है, अपने आप को जस्टीफाई करने की आदत छूट जाती है। तब स्वाभाविक रूप से ‘सामर्थ्य’ का सदुपयोग होने लगता है।

क्या सांख्य की निष्ठा में कर्म का अभाव हो जाता है? क्या ज्ञानी के लिए कर्म की आवश्यकता नहीं है? स्वामीजी कहा करते थे- ‘अभिनय ऐसे करो जैसे वास्तविक हो, और जीवन ऐसे जीयो जैसे अभिनय कर रहे हो, ... वे परमहंस के जीवन से ‘घोष’ प्रसंग को सुनाते थे। किस प्रकार ईश्वरचन्द विद्यासागर ने ‘घोष’ के अभिनय से क्रोधित होकर अपना जूता फेंक दिया।घोष ने सिर झुकाकर ग्रहण किया था कि यह मेरे अभिनय का पुरुस्कार है। ज्ञानी के लिए कर्म सहज हो जाता है। वह मात्र निमित्त रह जाता है, उसका कर्ता भाव चला जाता है, उसके लिए कृत्य लीला बन जाता है।

ये दो निष्ठाएं सहज और स्वाभाविक है।
दर्शन में, सांख्य व योग को एक ही साथ रखा जाता है। जीवन जीने की कला यही है। दोनो ही जीवन में आवश्यक हैं। वर्तमानमें रहने पर दोनो ही निष्ठाएॅं एक साथ सध जाती हैं।
मनुष्य का चित्त दो विभिन्न प्रकारों से देखा जाता है, वह बर्हिमुखी है, या अंतर्मुखी है। चाहे योग से आवे या सांख्य से, ... स्वाभाविक अवस्था में उसे अंतर्मुखी होना पड़ता है। इसीलिए, दोनों में वास्तविक विरोध न होते हुए भी, साधक की प्राप्त स्थिति के आधार पर दोनों ही प्रकार के मार्ग जो हैं, वे एक दूसरे के विपरीत नहीं हैं।। एक बाहर जाकर भीतर लौटता है, वहां कुछ ना कुछ करना है, करना होता है। दूसरा सीधा अंतर्मुखी होता है।

बहिर्मुखी व्यक्ति जो है, जो कर्मयोगी है, ... उसके लिए ‘निष्कर्मता’ पाने के लिए ‘एकाग्रता सहायक होगी। अन्तर्मुखी व्यक्ति के लिए ध्यान सहायक होगा। धर्म- जिसे उसने धारण किया है, जो उसकी धारणाा है, ... यहां बहिर्मुखी व्यक्ति एकाग्रता को साधन रूप में पाकर, निष्कर्मता को प्राप्त होगा, ... अन्तर्मुखी व्यक्ति ध्यान के उपाय से ‘विवेक को प्राप्त होगा’, ... छूटना दोनों ही साधनों का लक्ष्य है, जो अस्वाभाविक है, वह अपने आप छूटता चला जाता है।
... स्वामीजी कहा करते थे, मनुष्य, मिश्रित होता है, प्रकृति के तीनों गुण उसमें है, ..कहीं. कुछ ज्यादा है, तथा कहीं कुछ कम है। हर मनुष्य दूसरे मनुष्य से अलग होता है। एक ही औषध हर रोग के लिए नहीं होती है। साधन का चुनाव, हर व्यक्ति अपना वरण है, ... यही उसकी पहली पहचान है। दूसरे के बारे में जानने का प्रयास मत करो, अपने आपको जानो, तब अपनी स्वाभाविक मांग का पता लगता है।
सभी मार्गों पर एक साथ नहीं चला जाता। आजकल जैसे परीक्षा में सफलता पाने के लिए  पासबुक’ लिखी जाती है। उसी प्रकार सरलीकृकृत साधनाएं चल पड़ी हैं। जो न तो खुद कहीं पहुंचे हैं, परन्तु सबको एक साथ सब कुछ देना चाहते हैं, ... रास्ते अलग-अलग होते हैं, पर पहुंचते एक ही मुकाम पर हैं, यह सच है। पर चयन तो एक ही रास्ते का करना होगा। थोड़ा इसका लिया, थोड़ा उसका लिया, ... कहीं के नहीं रह गए।
‘गीता का महत्त्व यही है इसमें सभी प्रकार के व्यक्तियों के लिए सभी प्रकार के मार्गों की विवेचना मिलती है, ... कहीं तुलना नहीं है, ... भगवान ने जहां भी जिस मार्ग की बात कही है, उसे उसकी पूर्णता पर विकसित किया है, ... व्याख्याकारों ने अपने-अपने ढंग से अपनी बात को पूरी गीता पर लागू कर दिया है।
जब साधक ध्यान में उतरता है, ... विवेक का आश्रय लेता है, ... तब बाहर का छूटना शुरू होता है, ... वह भीतर की दुनिया में प्रवेश पाता है, ... विचारों की संख्या कम होते-होते, विकार भी गिरने शुरू हो जाते हैं। चित्त सरोवर पर लहरें उठने जब बंद होती है, ... तब वह पाता है, खालीपन, एक स्पेस, ... विचार और विचार के बीच का अंतराल बढ़ता चला जाता है, ... नेति-नेति यहां वह जिस उपलब्धि को पाता है, वहां शांत मन, निर्विकारता में है। शून्य है।
... कर्मयोगी, का आधार, ... कर्म को निष्कर्मता में ढालते हुए, ... मन की स्थिरता को प्राप्त करना होता है। अहंकार का गलन सेवा में होता है। वह संपूर्ण सामर्थ्य का सदुपयोग सेवा में कर रहा है, जगत की प्रासंगिकता उसके लिए दूसरी है, वह भोग के लिए न होकर योग के लिए कर रहा है, ... यहां वह जिस उपलब्धि को पाता है वह ‘पूर्णता’ है।
... वह बाहर के साथ एक होकर, एक ही तत्व को सब जगह पाता है। ‘सियाराम मय सब जग जानी, ... यह योग की उपलब्धि है।
पहुंचना एक ही जगह है, ... पाना सत्य ही है। पर मार्ग अलग हैं, एक को दूसरे से मिला देने से, कोई ‘शॉर्टकट नहीं मिलता है। हॉं दोनो मार्ग एक दूसरे के पूरक हैं, एकाग्रता और ध्यान का अंत सजगता में होता हैं। दरअसल जो सजग है, वही भक्त है, भक्ति किसी दूसरे की नहीं होती।
भगवान ने यहां जिस मार्ग की ओर संकेत किया है, वह महत्वपूर्ण है-
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्य  पुरुषोऽश्नुते।
न च संन्यसनादेव सिद्धि  समधिगच्छति।ं4।

‘कर्मों के न करने पर निष्कर्म प्राप्त नहीं होता है, नहीं कर्मों के त्यागने से सिद्धिकी प्राप्ति होती है।
‘निष्क्रियता, निष्कर्म नहीं है। कर्तारहित कर्म ही निष्कर्म बनता है, कर्म तो होगा ही उससे बच पाना कठिन है, पर कर्ता रहित होना संभव है। भगवान जिस सूत्र पर बल दे रहे हैं, वह असंभव नहीं है। प्रकृति करवा रही है, उसकी इच्छा पूरी हो, ... लीला है, अनेक आप्त वचन हो सकते हैं, ... पर मैं कर रहा हूं, इस कर्तापन से बचा जा सकता है, ... दुनिया अपनी रफ्तार से चल रही है, ... हम मात्र निमित्त हो सकते हैं। प्रकृति हमें अपने हाथ का यंत्र बना सकती है, ... उसी की ओर से एक अनंत वेग आता है हम तो मात्र इस ‘वेग’ में बहते दिखाई पड़ते हैं। जो कुछ भी हो रहा है, एक नियत क्रम में है, ... यह बोध रहे, यही तुम्हें बस करना है, तेरे द्वारा हो रहा है, तू करने वाला नहीं है, फिर कर्म ‘निष्कर्म’ में बदल जाता है।

न हि कश्चित्क्षणमपि  जातुतिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः।ं5।
‘परवशता’ कर्म करने में है। बिना कर्म किए कोई एक क्षण भी रह ही नहीं सकता है।
कर्म, जीवन जीने की अपरिहार्यता है। कर्म को बदलने की चेष्टा व्यर्थ है। हांॅ-कर्ता का रूपांतरण हो सकता है। हम भीतर जैसे है, वह वास्तविकता है। हम भीतर गलत होते तो हमारा कर्म भी गलत होगा, ... कर्म का आधार, ‘मैं’ है, यह मेरा है, ... इस मैं का ‘‘माम’’ में रूपांतरण, साधना है।
सारा श्रम इस ‘मैं’ और ‘मेरे“ को घना करने में जाता है। कर्मयोगी का यह ‘’मैं गिरता है, सेवा से, सांख्य योगी का ध्यान से। जो इस ‘मेरे’ को सहारा देते हैं वे मित्र है, जो इस ‘मेरे’ का विरोध करते हैं, वे शत्रु होते हैं। जब यह मेरा विदा होता है, तब सब गिर जाता है, ... तब कर्म ‘‘‘दाई विल बी डन’’’ की तरह बदल जाता है।

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्
इन्द्रियार्थान्विमूढसत्मा  मिथ्याचारः स उच्यते।।6।

परन्तु जो व्यक्ति इन्द्रियों को हठ से रोककर, इन्द्रिय भोगों का मन से चिन्तन करता है, वह मूढ़ है, पहले भी दूसरे अध्याय में भगवान ने कहा है-‘भीतर से रस’’ का विसर्जन ही साधना का सार है। हठयोग के आधार पर जो इन्द्रियों पर बलात दमन रखा जाता है। उसे श्रेयस्कर नहीं माना है। ...क्रिया और कर्म का बुनियादी भेद, ... क्रिया के साथ कर्ता के जुड़ते ही कर्म बनता है, ... अहंकार क्रिया के साथ जुड़ते ही उसे  वह कर्म बना देता है। जिसका भोग स्वाभाविक है, ... गहराई से विचार करे, तो हमारी सारी क्रियाएं कर्म ही है। निद्रा में स्वप्न भी, कर्म ही है। वहां जीवेषणा कृत्य करवाती है।
 श्वास हम लेते हैं, या वह स्वाभाविक है, रुक जाए तो शरीर ही गिर जाए, ... यह जो निसर्ग है, ... यह किसका है, ... उसे ही हम परमात्मा कहते हैं। बाह्यमन जुड़ता है, अंतर्मन से अंतर्मन निरंतर विराट से जुड़ा रहता है, वहां से निरंतर चैतन्य का प्रवाह आता है। वह अंतर्मन पर संचित ‘संस्कार पंुज को धक्का देता रहता है, ... यही सृजन का रहस्य है। ... वहां मात्र सृजनशीलता है, जो निरंतर सृजनरत है। एक क्षण भी रुक जाए तो सृष्टि समाप्त हो जाए।
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन।
कर्मेन्द्रियैः कर्मज्ञोगमसक्तः स विशिष्यते।।7।
- जो मनुष्य मन से इन्द्रियों पर नियंत्रण करके आसक्ति रहित होकर समस्त इन्द्रियों के द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है- वही श्रेष्ठ है।
भगवान कहते हैं, वही श्रेष्ठ है, जो इन्द्रियों से लड़ता नहीं है, बल्कि मन को ही रूपांतरित कर लेता है वह इन्द्रियों को मारता नहीं है। अपने आपको देखा- लगा वासना, ... तृष्णा आगे-आगे जाती है, पीछे-पीछे इन्द्रियां जाती है। मन, इन्द्रियों के माध्यम से ही तो भोगता है। इस तरफ विषयासक्त मन है, उसके-पीछे इन्द्रियां है। सामने स्थूल इन्द्रियां दिखाई पड़ती है।
भगवान कहते हैं, मन ही मूल कारण है, उसका रूपांतरण ही श्रेष्ठ है।
पर इन्द्रियां का संयमन कैसे हो?  रास्ता जो बताया गया है,, दमन किया जाए। इन्द्रियां जो मांॅगती हैं, उससे उन्हें वंचित करें, इनसे उपद्रव होता है। एक दूसरे प्रकार के पाखंड का जन्म होता है।
‘सिद्धान्ततः यहां यह कहा जाता है कि मन से इन्द्रियों को वश में करने का तात्पर्य है कि विवेकवती बुद्धि के द्वारा मन और इन्द्रियों का स्वयं से कोई संबंध नहीं है, ऐसा अनुभव करना, ... आसक्ति रहित होकर कर्म करना ही साधन है, जो यह संयम देता है।
. प्रश्न था ,क्या.. यह एक सामान्य चिन्तन परक अवधारणा नहीं है?
व्यवहारिक सत्य है- वासना एक छाया सी, ... भीतर प्रवेश करती है, वह दिखाई नहीं पड़ती है पर इन्द्रियां उसके अनुसरण में चल देती है। मन को भी हम नहीं जानते हैं, हां उसके क्रियाकलापों से उसका अनुभव होता है, कोई शक्ति हमारे भीतर है।
हां, कभी-कभी, हमारे भीतर हमारी ही शक्ति उपजती है, ... वह भी हमारे भीतर है, वह हमारे मन को भी देखती है, ... हमारी वासना की उठने वाली लहर को भी देखती है, ... वह विवेक के कोने से उठती है, वही हमारा अंतःकरण है। यह मनोवैज्ञानिक अचेतन मन नहीं है। इस अंतःकरण में जहां बुद्धि भी शुद्ध हो जाती है, ... वहां यह उपजता है। यह हमारा संकल्प है, ... संकल्प कोई दमन नहीं होता है, यह हमारी स्वाभाविक अवस्था है। यह हमारे अपने होने का बोध है।
... संकल्प के उठते ही, ... बाहर से जो लहर दस्तक देती है, वह रुक जाती है। दुबारा उठती है उसकी तीव्रता कम हो जाती है। आपकी ताकत ही शरीर की कमजोरी है। आपकी कमजोरी, शरीर का दबाव है, ... इस अनुभव को हम कर सकते हैं।
स्वामीजी कहा करते थे- सामान्य मनुष्य शरीर की शक्ति से कार्य करता है, उससे बेहतर बुद्धिमान मनुष्य बुद्धि से कार्य करता है, ... तथा आत्मवान, संकल्प से कार्य करता है। जिस व्यक्ति के पास यह संकल्प है, वह श्रेष्ठ है।
तभी वह अवस्था आती है, मन से इन्द्रियों का नियमन हो जाता है, इन्द्रियों का अपना स्वतंत्र आग्रह नहीं होता है, उनको जहां लगाना चाहे, वहां वे लग जाती है, और जहां से उनको हटाना चाहे, हट जाती है। सामान्यतः हम इन्द्रियों के अनुशासन में रहते हैं, इसलिए हम शरीर से अधिक का अनुभव नहीं पाते, ... आत्म अनुभवन संकल्प की यात्रा है।
साधन यात्रा में यह महत्वपूर्ण उपसंपदा है।
हम जिसे मन कहते हैं, ... वह साधारणतया हमारी कामनाओं का, आकांक्षाओं का समूह ही होता है ऐसा हम मानते हैं। हम आइने में अपने शरीर को देखते हैं। चित्त के दर्पण पर अपने आप को देखें। वहां मात्र विचारों का, विकारों का समूह है। वही हमारा मन है। यह मन जिस भी इन्द्रिय के साथ लगता है, ... वह बाहर चला जाता है। इन्द्रियां द्वार है, इस द्वार से भीतर भी आया जाता है।
द्वार पर यह चौकीदार, मन, ... मन का दूसरा हिस्सा रहता है। जब यह एकाग्रता से दो का एक होता है। जब यह साधारणतया अवलोकन में, यह देखता है, दूसरा बाहर जाता है। धीरे-धीरे बाहर जाने वाला रुक जाता है। तब यह एक सजगता में ढल जाता है।
पहले चरण में इस ‘एकमन’ को पाना होता है, ... फिर यह एक मन, ... अंतर्मुखी होकर, अंतर्मन में समर्पित हो सकता है, ... वासनाओं तथा आकांक्षाओं का समूह एकदम समर्पित नहीं हो सकता।
... इसका प्रारंभ हो सकता है-
...
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः।।8।

 तू शास्त्र विधि से नियत किये हुए कर्तव्य-कर्म कर, क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है, कर्म न करने से तेरा शरीर निर्वाह भी सिद्ध नहीं होगा।
कर्म न करने से कर्म करना श्रेष्ठ है, जो करना है, उसे होशपूर्वक करना है। पूज्य स्वामीजी का आप्त वचन है- ‘जो भी क्रिया हो मन को पूर्ण रूपेण वहीं रखना चाहिए, किंचित मात्र भी विपरीत नहीं जाने देना चाहिए।’
जो अनिवार्य है, वह होशपूर्वक हो।
शास्त्र सम्मत स्वधर्म, ... शास्त्र सम्मत, ... जो परम्परागत दाय है, जो जाना गया है, जो आधार है, वह स्वधर्म जो प्राप्त हुआ है।
... संकल्प, विधायी कदम है। सकारात्मक शक्ति है। दमन में, ... मन ने पैदा किया है, मन ही उसे दबा रहा है, एक संघर्ष है, वहां उसे दोनों तरफ से रस आ रहा है। वही पैदा करता है, वही दबाता भी है।
पर संकल्प, विधायी क्षण है। नई शक्ति उस सजगता में पैदा होती है। यह आकांक्षाओं, और कामनाओं का पंुज नहीं है। वह एक किरण की तरह होता है।
भगवान कृकृष्ण इसी बात को आगे समझाते हुए कहते हैं-
‘‘बंधन के भय से भी कर्मों का त्याग करना योग्य नहीं है, ... कर्तव्य पालन के लिए किए जाने वाले कर्मों से अन्यत्र कर्मों में लगा हुआ यह म नुष्य बंधता है।;3-9द्ध
- जो आदमी कर्मों के बंधन से बचने के लिए भागता है, ... वह उल्टे कर्मों के बंधन से बंध जाएगा। पलायन व्यर्थ है, भागना व्यर्थ है। कर्म से कोई अगर बंधन से छूटने के लिए भागता है तो व्यर्थ है। कर्म में कोई बंधन नहीं है। कर्म मेरा है। यही बंधन है। भगवान कृष्ण कह रहे हैं- पलायन व्यर्थ है,कर्म में कोई बंधन नहीं है। कर्म मेरा है, यही बंधन है।
यज्ञ का सामान्य अर्थ, कर्तव्य पालन से लिया जाता है। कर्तव्य पालन की आधारभूमि अनासक्ति है। जहां आसक्ति है, वहीं बंधन है, ... यज्ञ-कर्म का ही पर्याय है, पर कर्म वह अन्य प्रकार है। जहां वह कर्ता नहीं है। वह निमित्त मात्र है। यहां वह मात्र इस खेल में, एक खिलाड़ी रह गया है। बंधता वही है, जहां अहंकार होता है। जहां खँूटा ही उखड़ गया, ... वहां बांधने वाला भी नहीं होता है। जहां कर्म परमात्मा का है। यह बोध बांधता नहीं है, यह कोई मौखिक मान्यता नहीं है। यह पूरे मन से उठती है।तब यज्ञ कर्म हो जाता है।

परमात्मा कहाँ है?
सृष्टि तो दिखाई पड़ती है, सृष्टा उसी में ही कहीं पीछे छिया है। गीता यहां कहती है प्रजापति ब्रह्मा ने सबको रचा- वह रचना तो आज भी वैसे ही हो रही है, हर क्षण विराम नहीं आया, ...परमात्मा मात्र सृजन है, ... सृजनात्मकता है, ... फिर हम कैसे अपने आपको बचा सकते हैं?
कर्म तो करना है, यज्ञ रूप स्वधर्म को पाना है, ... बस करते जाना है, करने वाला भी पता नहीं लगे, ... फिर धीरे-धीरे ‘वह’ ‘‘जो  है’ै, वही करने वाला बन जाता है। जब अंतर्मन इस देह का स्वामित्व संभाल लेता है। बाह्यमन का अंतर्मन में लय ही अंतर्मुखता की उपसंपदा है। यह सधे। पर यहां पलायन नहीं। भागना नहीं।
स्वामीजी कहा करते थे- कर्मयोगी बनो। संकल्प जगे, ... फिर संकल्प भी खो जाता है, ‘दाई विल वी डन’ , ... जैसी तेरी मर्जी, ... पर हाथ अब ‘उसके’ हाथ हो जाते हैं। भगवान कृष्ण यही कह रहे हैं, कर्म से मत भाग, कर्म को ही यज्ञ बना ले। जहां तेरी इच्छा पूरी हो, सब तेरा है, ... कोई और नहीं कोई गैर नहीं, यह भावना दृढ़ हो जाती है, वहां बंधन स्वतः बिखरते जाते हैं।
श्रेयः परम वाप्स्यथ (3-11)
‘तुम परम कल्याण को प्राप्त होओगे- भगवान ककृष्ण का यह आप्त आशीर्वाद है।
... सृष्टि के प्रारंभ में, ... प्रजापति ने कहा था, ‘... तुम लोग कर्तव्य के द्वारा सबकी वृद्धि करो यह यज्ञ तुम लोगों की इच्छित कामनाओं को पूरा करने वाला होवे, ... तुम देवताओं को उन्नत करो देवता तुम्हे उन्नत करे, ... इस प्रकार एक दूसरे को उन्नत करते हुए तुम परम कल्याण को प्राप्त होओगे।’

.. यह आप्त वचन है, साधारणतया यह माने जाने लगा है कि यह अतिश्योक्ति है तथा इसी प्रकार कर्मकांडी लोग देवी-देवताओं के नाम यज्ञ करके, यजमानों की कामनाओं को भी प्रज्ज्वलित करते रहते हैं।
... गीता के तीसरे अध्याय के , 10 और 11 श्लोक एक साथ एक क्रम में है। यहां सहज स्वाभाविक गणित है, ... जहां तक परमात्मा के सृजनकर्ता होने का प्रश्न है, ... वहां यह सृष्टि किसी विशेष कारण से सृजित नहीं हुई है, ... यह हो गई है। सहज स्वाभाविक क्रम है, ... भारतीय अवतार वाद की परिकल्पना में इसे सहज क्रम में समझाया गया है। पूज्य स्वामीजी इस अवतारवाद का आधार इसी सहज विकास क्रम के रूप में लेते थे।
... परमात्मा का यह सृजन अहंकार रहित है। वहां मैं पन नहीं है। परमात्मा है, वहां महान ऊर्जा है, गति है, गति के कारण ही सृजन भी है, विनाश भी है, ...वहां मात्र सृजनात्मकता है, ... यज्ञ शब्द महत्वपूर्ण है। परमात्मा के हाथों से दिया गया कर्म, ... यहां मेरा कुछ भी नहीं है, ... कर्म तो होगा, पर अब उसकी प्रेरणा का स्रोत उसका अहंकार नहीं है। जब वह अपने लिए कुछ भी नहीं करता, तब वह बंधन में भी नहीं बंधता।
यहां दूसरा वाक्य इसी के साथ जुड़ा है, जब हम शुभ कार्य में अपनी अहंता को छोड़कर, संलग्न होते हैं, तब हमें प्रकृति की महान शक्ति का सहारा अपने आप प्राप्त होता है, ... वे शक्तियां ही देवता है। जब अशुभ कर्म करते हैं, ... तब तमोगुणी शक्तियां साथ हो लेती है, ... परमात्मा के हाथों से उसके संकल्प से जब कार्य प्रारंभ होता है तब प्राकृतिक विधान से, अलौकिक शक्तियों का सहयोग अपने आप प्राप्त होने लगता है। यह कोई अतिश्योक्ति नहीं है। तब वह परम कल्याण को प्राप्त होता है।
पचन्व्यात्म कारणात् (3-13)
पापी लोग अपने शरीर पोषण के लिए ही पकाते है। वे तो पाप को ही खाते हैं।
पुनः भगवान कृष्ण ने ‘यज्ञ’ विधान को केन्द्र में रखकर, जीवन जीने की कला पर संकेत किया है।
यज्ञ द्वारा बुलाए हुए देवता लोग तुम्हारे लिए बिना मांगे ही प्रिय भोगों को देंगे। उनके द्वारा दिए हुए भोगों को जो पुरुष इनके लिए बिना लिए ही भोगता है वह निश्चय चोर है-
यज्ञ से शेष बचे हुए अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से छूटते हैं और जो पापी लोग, अपने शरीर पोषण के लिए ही पकाते हैं, वे तो पाप को ही खाते हैं-
पहली बात स्पष्ट है- यज्ञ रूपी कर्म से दिव्य शक्तियां जो चाहिए, ... जो अपरिहार्य है, वे सब दे देती है।
... दिव्य शक्तियां, ... परमात्म भाव है, उसके लिए अपना हृदय खोलना पड़ता है। स्वामीजी कहते थे- तब प्रकृति स्वयं योग-क्षेम वहन कर लेती है। कुछ नहीं करना पड़ता। सब अपने आप हो जाता है। जहां करने का बोझ है, वहां अहंकार है। प्रकृति स्वयं मार्गदर्शन करती है, ... व्यवस्था अपने आप होती जाती है। हममें अपने प्रति आत्मविश्वास की अत्यधिक कमी है।

... हां, मांगना नहीं चाहिए, ... जो मांगता है, वह छोटा होता है। स्वामीजी ने बचपन में एक वृद्ध साहित्यकार जो किताब छपवाने बंबई आए थे, उनकी सेवा की थी। उन्होंने कहा था, ... मांगो क्या चाहते हो? वो समझे कुछ रुपये मांगेंगे। स्वामीजी ने कहा था- ‘याचक नहीं बनूं, पिता विहीन, मातृ सुख से वंचित, छोटे बालक की तब यह भावना थी। वे कहा करते थे- ‘प्रार्थना- याचना नहीं होती। ... कभी मांगना मत।“
‘क्यों हम जब मांगते हैं, हम बहुत छोटे हो जाते हैं, अपनी ही नजरों में नीचे गिर जाते हैं। ... एक भय हमें जकड़ लेता है, ईश्वर है, हमारा भरोसा है, तो जो हमें मिलना है, अपने आप स्वाभाविक क्रम में प्राकृतिक विधान से प्राप्त होगा। ... यज्ञ परमात्मा को समर्पित जो कर्म है, ... वहां वह अकेला नहीं होता। समस्त शुभ उसके साथ हो जाता है।
... भगवान कह रहे हैं- देवता लोग तुम्हारे लिए बिना मांगे ही प्रिय भोगों को दे देंगे, ... बिना मांगे ही। भगवान के इतने बड़े आश्वासन के बाद भी हम याचक बने रहते हैं। मात्र स्वाहा-स्वाहा को यज्ञ मान बैठे हैं।

‘प्रकृति के जो साधन, ... साधारणजन के कार्य आते हैं, उन्हें पोषण देते हैं, उसे व्यर्थ में अपने को समर्पित करके, अपनी अहंकार की तुष्टि पाना ‘यज्ञ’ नहीं है। यज्ञ परमात्म भाव से उन्हें समर्पित किया गया कर्तव्य कर्म है, ... जब यह भावना होती है। तब देवता बिना मांगे, ... प्रिय भोग दे देते हैं।
... स्वामी जी कहा करते थे, ... जब हम गलत होते हैं, तभी मांगते है, ... जानते हैं हममें कमी है, तब हम आश्रय की तलाश में भटकते हैं। अगर हम सही है, तो प्रकृति या तो हमारी आवश्यकता की पूर्ति कर देगी, ... या हमें बता देगी कि हमारा संकल्प पूरा होने वाला नहीं है, ... प्राकृतिक विधान के विपरीत है। भगवान यहां यही कह रहे हैं- बिना मांगे, ... यज्ञ रूपी कर्म में जो संलग्न होता है, उसे दिव्य शक्तियां बिना मांगे दे जाती है।
... इसी साधन सूत्र में भगवान, ... इस सिद्धि को बनाए रखने के लिए स्पष्ट करते है- जो मिला है, दैवी शक्तियों ने दिया है, उसे बांटो, ... वह मात्र तुम्हारा ही नहीं है। जितना हम बांटते हैं, उतना ही वह बढ़ता जाता है, जितना सिकोडे़गे वह सड़ने लगेगा। ... भगवान कह रहे हैैं जो बांटता नहीं है, वह चोर है। प्राप्त सामर्थ्य को अपने ही तक सीमित कर लेना, मात्र अपने लिए ही उपभोग करना, यह चोर का कर्म है। ... तुमने बांटना नहीं सीखा, तो तुम अपने ही दुश्मन हो, ... तुम्हें और मिल सकता था, तुम्हारी कृपणता से वह द्वार बंद हो गया है।
‘‘... यहां भगवान कह रहे हैं- जो पहले बांट देता है, ... फिर जो बचता है, उसे अपना भाग मान लेता है वह श्रेष्ठ पुरुष है, यहां अधिकार दूसरे को दिया जाता है। जो पहले का कर्तव्य होता है, वह दूसरे का अधिकार अपने आप बनता है। आज व्यवस्था दूषित हो गई है। हम अधिकार, अपना हिस्सा पहले चाहते हैं, या तो बांटना नहीं चाहते, या जो किसी काम का नहीं है, वह देना चाहते हैं।
और जो मात्र अपने पोषण के लिए अपने स्वार्थ के लिए ही जीवित हैं, ... वे पापी हैं, वे पाप को ही खाते हैं। जिस मनुष्य में स्वार्थ बुद्धिजितनी ज्यादा होती है, उसके कर्म भी उतने ही दूषित होते हैं। यहां भगवान ने अपने लिए कर्म करने वालों की निन्दा भी की है। अपने लिए, स्वार्थ बुद्धिसे किए गए कर्मों से वह इतना पाप संग्रह कर लेता है कि वह कटता ही नहीं है।

पुनः यज्ञ की प्रतिष्ठा में कहा गया है-
अन्नाÚवन्ति भूूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुभ्दवः।ं14।

संपूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न वर्षा से होती है। वर्षा यज्ञ से होती है। यज्ञ कर्मों से निष्पन्न होता है।
कर्मों को तू वेद से उत्पन्न जान, वेद को अक्षर ब्रह्म से प्रकट हुआ, इसीलिए यह सर्वव्यापी परमात्मा यज्ञ ;कर्तव्य-कर्म में प्रतिपादित है।
स्वामीजी ने अपने अंतिम प्रवचन में, ‘पर्यावरणीय संकट पर प्रकाश डाला था। वे इस पर्यावरण के संकट को आध्यात्मिक धरातल पर व्याख्या कर रहे थे। उनका कहना था, ‘आज का सबसे बड़ा संकट इस प्रदूषण का है-
भारतीय मनीषा ने, प्रकृति के साथ साहचर्य रखा है।” आत्मवत सर्वभूतेषु सर्वभूतेषु हितै रतः“, की भावना है। यहां प्रकृति के साथ जीना, एक कला है। उनके आश्रम में जब वे बाहर से आते थे, पशु-पक्षी सभी मानो उनके आने की सूचना पा चुके हो।
... वे कहा करते थे, हम अलग कहां है, यह संपत्ति परमात्मा की है, कोई उसे अपना मानकर एक जगह संग्रहित कर लेता है, ... तो वह अपराधी है, इसी प्रकार प्रकृति और हमारा साहचर्य है। एक ही परिवार है।
... अन्न भी हमारी चेतना का एक अनिवार्य अंग है, वह मात्र पदार्थ ही नहीं है। उसी से चेतना स्वरूप ग्रहण करती है। अन्न भी जीवंत है। अन्न से प्राण तत्व का गहरा संबंध है। अन्न आता है, वृष्टि से, और यह वर्षा कहां से आती है? ... शास्त्र कहते हैं, वर्षा का और हमारी भावनाओं का, कृत्य का भी गहरा संबंध है। जब पाप बढ़ता है। तब अकाल आता है। ... प्रकृति और मनुष्य के बीच आंतरिक संबंध है। उसी का नाम पर्यावरण है। यह मात्र पेड़ काटना, ... या शोर या प्रकाश का प्रदूषण ही नहीं है। यहां यह एक आंतरिक संगति है। हम सब परस्पर जुड़े हुए हैं। यही ब्रह्म का एकात्म शरीर है। कहीं कोई पृथकता नहीं है।

‘यज्ञ का अर्थ है, ... कर्तव्य कर्म से हुआ जीवन, परमात्मा को समर्पित जीवन, ... जब ऐसा जीवन जिया जाता है, तब प्रकृति भी अपनी ओर से जो स्वाभाविक मांग है उसे पूरा करती है।
... ऐसा कर्म, भगवान कर रहे हैं, ऐसे कर्म को तू ‘वेद’ से उत्पन्न जान। .... और इससे आगे बढ़कर कहा गया है- वेद अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न हुआ है। इससे यह सर्वव्यापी परमात्मा सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित है।
‘ऐसे कर्म को तू वेद से उत्पन्न जान। वेद का अर्थ है ज्ञान। एक तो कर्म वह है जो ज्ञान से उत्पन्न हुआ है। दूसरा कर्म वह है जो अज्ञान से उत्पन्न हुआ है। अज्ञान से उत्पन्न हुआ कर्म वह है, जहां कर्ता व अहंकार दौनो मौजूद हैं। जहां मैं कर रहा हूं। यह भाव बना रहता है, जहां अज्ञान है, वहां अहंकार होता है जिस कर्म से संताप पैदा हो, दुःख पैदा हो, वह अज्ञान से पैदा कर्म है। ... जहां अहंकार मिटा, ... वहां खालीपन रह जाता है, ... विचार जहां है, वहां अहंकार है, ... वहां विकार है, ... जहां विचार गिरा, वहां कर्ता गिर गया, वहां मात्र कर्म ही रह जाता है। वही ज्ञान है। वही परमात्म भाव है।

एवं प्रवर्तितं चक्र्रं नानुवर्तयतीह  यः।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति।ं16।

मोघं पार्थ स जीवति- वह व्यर्थ ही जीवन जीता है
जीवन किस प्रकार जिया जाए, वहां उसके लिए प्राप्त परिस्थिति का सदुपयोग एक आधार है, ‘स्वधर्म शब्द में यह अभिप्रेत है। भगवान कृष्ण ने ‘चातुवर्ण’ की स्थापना पर बल दिया है। आज की परिस्थिति में जहां शब्दों का अवमूल्यन हो चुका है, वहां पांच हजार वर्ष पूर्व ‘वर्णर्’ शब्द से क्या अभिप्रेत था, कहना सहज नहीं है, वर्ण स्वाभाविक संस्कार धर्मिता है, जो लेकर मनुष्य पैदा होता है, ... प्रकृति में दो पत्तियां भी एक जैसी नहीं होती हैं, प्राप्त सामर्थ्य के आधार पर ही ‘चतुर्वण’ की योजना थी, ... यह एक दूसरे से श्रेय या अश्रेय रूप नहीं था, ... एक समान आधार पर विकसित होने की योजना थी, ... इसी आधार पर ‘स्वधर्म’ की स्थापना भी, उसका मूल्य था।
इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए भगवान ने श्लोक 16, 17, 18 में ‘सृष्टिचक्र’ के आधार पर आश्रम व्यवस्था पर संकेत किया है, साधक के लिए इसका निर्वहन प्राकृतिक विधान के अनुसार है, यह योजना भी उसके विकास के लिए ही है।
जो इस प्रकार नहीं चलता है, वह इन्द्रियों के द्वारा भोगों में रमण करने वाला अघायु (पापमय जीवन जीने वाला) मनुष्य संसार में व्यर्थ ही जीता है।
... जैसे रथ के पहिए का छोटा सा अंश भी टूट जाने पर, रथ में सवार व्यक्ति पीड़ित हो जाते हैं। उसी प्रकार समष्टि सृष्टि चक्र है, सभी संबंधित है, व्यष्टि और समष्टि पृथक नहीं है।
ऐसा मनुष्य जो अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता है, वह व्यर्थ ही जीता है। इससे पूर्व भगवान ने इस प्रकार के मनुष्य को- ‘‘वह चोर ही है, ... वह पाप का ही खाता है और यहां अघायु कहा हैं।

तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमोप्नोति पूरुषः।19।

इससे तू अनासक्त हुआ निरंतर कर्तव्य कर्म कर-
इसलिए तू कर्म से मत भाग, पाप मय कर्म भी मत कर, यज्ञ ;कर्तव्य कर्म से प्रेरितद्ध परमात्मा को समर्पित करते हुए, कर्म कर।
वह कर्म किस प्रकार हो सकता है। पूज्य स्वामीजी कहा करते थे-‘निरंतर वर्तमान में रहो, ... यही एक मात्र साधन मैंने साठ वर्ष से अधिक की साधना से पाया है। वर्तमान में जो भी कर्म हो, मन को पूर्णरूपेण वहीं रखने का प्रयास करो। किंचित मात्र भी विपरीत मत जाने दो।
कर्म हम दो प्रकार से करना जानते हैं-
‘आसक्ति’ या ‘विरक्ति’ या तो चिपक जाएंगे या छोड़ भागेंगे। या मुंह उस तरफ करेंगे या मुंह फेर लेंगे। अनासक्त तीसरा अर्थ है। स्वामीजी कहा करते थे- ‘दर्पण की तरह हो जाओ, ... सामने व्यक्ति आया, प्रतिबिम्ब बना, वह गया, बिम्ब गया। दर्पण कुछ भी भीतर नहीं ले जाता। अनासक्त दोनों तरफ जाता है। जा सकता है। परन्तु बंधता कहीं भी नहीं है। ‘कमल दल वत’, स्वामीजी कहा करते थे- कीचड़ में कमल की तरह।

लोग स्वामीजी को रूपये भेंट करते थे, वे न तो ग्रहण करते थे न ही अस्वीकार करते थे। सौ का नोट है या दस रूपये का, कुछ पता नहीं, कई बार तो देख भी नहीं पाते थे- लोग रूपया भेंट कर चले जाते थे, ... उन्होंने जेब में रखा। जब सब गए, तुरंत कुरता उतारा और जेब खाली कर दी, ... जहां जाना है भेज दिया, दे दिया, ... झोला व जेब वैसे ही खाली। दोनों तरफ उपेक्षा, व किसी से अपेक्षा नहीं। यह उनके साथ रहकर ही सीखा। न राग न विराग, वीतराग। न किसी प्रकार का आकर्षण न विकर्षण, बस मात्र स्वाभाविक अवस्था। वे इसे दर्पण से तुलना करते थे।
स्वामीजी के पौराणिक पात्रों में प्रिय पात्र जनक थे। वे राजा जनक की अनेक कहानियां सुनाते थे- उनका एक पांव आग पर रखा रहता था, दूसरे पर सुंदर महिलाएं मालिश करती थीं, न वह सुख में थे, न दुख में, ... अनासक्ति योग उनके पास था। शुक्र देव भी उनसे ही ज्ञान लेने गए थे।
भगवान यहां कह रहे हैं, ... जो अनासक्त है, ... उसके भीतर मौलिक परिवर्तन स्वाभाविक रूप से हो जाता है। वहां स्वयं प्रकृति अपनी संपूर्ण सुंदरता से उसके भीतर अभिव्यक्त हो जाती है। उसका कर्म लोकमंगल को समर्पित हो जाता है। यहां बलपूर्वक ‘सेवा’ नहीं होती। आचरण ही सेवामय हो जाता है। इसलिए हमें चाहिए, ... हमारा जीवन अनासक्त हो, हम अनासक्ति में प्रवेश करे। निरंतर वर्तमान में रहने से, यह अनासक्ति स्वाभाविक रूप से प्राप्त होती है। जनक ने कहीं भी पलायन का संदेश नहीं दिया है।
... संकेत यही है कि वास्तविक कर्म वहीं शुरू होता है, जिस दिन वह दूसरों के लिए शुरू होता है। स्वामीजी ने इसीलिए एक ही बात बार-बार कही है कि निरंतर वर्तमान में रहो, और शरीर सेवा कार्य में लगा दो। हम अपने परिवार के लिए काम करते हैं, ईमानदारी से देखे, कर्तव्य कर्म करते हैं, या व्यापारी की तरह अपने फर्ज को नियोजित करते हैं?

जहां प्रेम होता है, वहां मात्र दिया जाता है। लिया नहीं, अपने आपको निःशेष कर देना ही प्रेम है। परन्तु यहां तो मोल-तोल लगा रहता है। स्वामीजी कहा करते थे- अपने लिए जीना कोई जीना है, इस उम्र में जब मुझसे चला भी नहीं जाता, ... फिर भी जाता हूँ, ... अपनी हर सांस दूसरों के लिए है, ... मुझे अपने लिए क्या करना है? पर जानता हूं जब तक प्रकृति कराना चाहेगी, मुझे करते ही रहना है।
... जो अपने लिए जीता है, उसका जीवन उसके लिए ही बोझा हो जाता है। जब वह पूरा भर गया है, ... या पूरा खाली हो गया है, ... बात एक ही है, कहीं से पकड़ो, ... तब वह निर्भार हो जाता है, भीतर का रस उसकी जड़ों को सिंचन करने लगता है, यह रस परमात्मा के यहां से फूटता है, नई कौंपले आती है।
भगवान श्लोक 26 से 30 तक पुनः ज्ञानी के लक्षणों को समझाते हैं।
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते।। 28।
गुण विभाग और कर्म विभाग के तत्व को जानने वाला ज्ञानी पुरुष संपूर्ण गुण गुणों में ही बर्त्तते हैं ऐसा मानकर आसक्त नहीं होता है।
ज्ञानी पुरुष कभी भी किसी के मार्ग पर अतिक्रमण नहीं करता, उसकी मान्यताओं को नहीं तोड़ता है। अपने आपको आरोपित नहीं करता। ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम अर्थात् कर्मों में अश्रद्धा उत्पन्न न करे। किन्तु स्वयं परमात्मा के स्वरूप में स्थित हुआ सब कर्मों को अच्छी प्रकार करता हुआ, वैसा ही करावेे-
- स्वामीजी कहा करते थे- सामान्य जन हमारी बातों को बहुत ध्यान से देखता है। उसके मन में अश्रद्धा न आवे। वह कर्म से विरत न हो, इसका ध्यान रखो। सच तो यह है कि ज्ञानी के लिए, बहुत से सामान्य व्यक्तियों के रूचि के क्रियाकलाप व्यर्थ हो चुके हैं, वह स्वयं बोध के स्तर पर उठ चुका है, ... परन्तु लोक जहां वह रह रहा है, उसे उसकी मान्यताओं का ध्यान रखना है।
स्वामी जी को देखा है, वह पूछने पर ही उत्तर देते थे। सामान्य जन उनसे सामान्य जीवन के सवाल, उलझनें, परिवार की समस्याओं को लेकर आते थे, वे कभी भी कहीं आध्यात्म की चर्चा भी नहीं करते थे।
कई बार तो लोग बस उनके पास, कुटिया में बैठकर चले जाते थे। न वे पूछते थे- ‘क्यों आए? न वे कुछ कह पाते थे।
‘यही समझाते थे- ‘कभी किसी की भावना का मजाक मत बनाना, ... तुम कुछ कहना चाहते हो, जब तक वह न पूछे, उसकी जिज्ञासा न जगे, ... चुप रहना। हर जगह छाता लेकर जाना जरूरी नहीं है।

... तुम किसी को गलत कहकर, उससे गलत से हटा सकते हो, पर उसे सही पथ पर नहीं ला सकते, जब तक वह नहीं चाहे। अनासक्त को किसी कर्म की आवश्यकता नहीं है, पर वह छोड़ देगा तो जो आसक्ति में वे भी उसके अनुसरण में छोड़ बैठे तो ज्यादा अहित होगा। तथाकथित सन्यासियों ने अहित ज्यादा ही किया है।
गुणा गुणेषु वर्तन्ते
... भगवान कृकृष्ण ने इसी अध्याय में जीवन यात्रा पर कि- क्यों कैसे घटता है, सूक्ष्म विवेचन किया है-
‘संपूर्ण कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा किए हुए हैं, ... अहंकार से मोहित हुए अंतःकरण वाला पुरुष मैं कर्त्ता हूं ऐसे मान लेता है-
... प्रकृति के गुण, ... प्रकृति गुणमयी है। यह दैवी है। यही देने वाली है। मनुष्य मानता है मैं करता हूं, उसका कर्ताभाव बना रहता है, ... कभी कर्म से अलग होकर देखंे, ... पता लगता है उसको ऐसा ही घटना था, ... ऐसा ही घटा है, हम मात्र दर्शक रह गए हैं। प्रकृति करवाती है, ... हम जब उसकी धारा में नहीं होते, प्रतिकूल जाना चाहते हैं, धारा एक कोने में उठाकर फेंक देती है।

स्वामीजी कहा करते थे, ... निरन्तर वर्तमान में रहने से, धीरे-धीरे सामान्य भविष्य का ज्ञान होने लगता है, ... यह कार्य होगा या नहीं, भीतर से अंतःप्रेरणा आ जाती है। स्वप्न मार्गदर्शक होने लगते हैं। प्रकृति के ऊपर सब भार सौंप कर निरंतर कर्मरत रहो। जो कार्य वर्तमान में आया है, पूरी तरह उसमें डूब जाओ, ... वही तुम्हें सोंपा गया है।
ज्ञानी वही है, जो इस अहंभाव से हट गया है कि वह कर रहा है। वह जानता है उससेे कराया जा रहा है, वह तो अदृश्य के हाथाांें एक यंत्र है।
‘‘गुण-विभाग और ‘कर्म-विभाग’ को जानने वाला ज्ञानी पुरुष संपूर्ण गुण गुणों में ही वर्तते हैं, ऐसा मानकर आसक्त नहीं होता-
- प्रकृति गुणमयी है। सत, रज, तम गुण प्रकृति जन्य है। इन तीनों गुण का कार्य होने से प्रकृति त्रिगुणामयी है। शरीर, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, प्राणी पदार्थ सब गुणमय है। यही गुण विभाग कहलाता है, इनसे होने वाली क्रिया कर्म विभाग कहलाती है।
गुणों की सत्ता, संस्कार में है। वे ही व्यक्ति को व्यक्ति के बीच की दूरी को बना देते हैं। ये गुण और कर्म निरंतर परिवर्तनशील है, जो चीज आज है, वह कल नहीं रहेगी, ... जो प्रकृति की इस निरंतर परिवर्तनशील गति को जान लेता है, वह ज्ञानी है। वह जानता है, गुण ही गुणों में विकसित हो रहे हैं।
जीने का यह भी एक तरीका है, ... ‘मैं’ अब केन्द्र में नहीं रहा। मेरी अधिकारिता गई, ... मैं यह जान गया हूं, मैं मात्र एक तरंग हूं,ँ ... विराट के महासमुद्र से उठी हुई लहर है, ... उसकी इच्छा ही मेरी स्वतंत्रता है, ...
जो व्यक्ति यह जान लेता है, जीवन गुणों के हिसाब से बह रहा है, विकसित हो रहा है, ... और कर्म भी उसी आधार प्रकट हो रहा है, ... वह जो जान लेता है, वही अनासक्ति में प्रवेश कर जाता है।
‘गुणों की सत्ता’, व्यवहारिक सत्य है, ‘गुण ही व्यक्ति  जीवन में संग्रहित करता है, इन्द्रियां जो भी विषय भोगती है, नहीं भोग पाती है उसका प्रभाव मन ग्रहण कर लेता है तथा वह ‘छाप’ भीतर संग्रहित होती चली जाती है, जिसे संस्कार कहा जाता है। विराट की महाशक्ति से तरंगित होकर, आधार पाकर, वह संस्कार गुणों का पंुज, ... निरंतर प्रवाहित होता है, ...
 बाहर से भीतर, भीतर से बाहर निरंतर कर्म प्रवाह बहता है,यह कोई वस्तु नहीं है,मात्र भाव हैं ..., पूरा जीवन ही निकल गया, भीतर जाने का रास्ता ही नहीं मिला, मन एक दीवार की तरह जो बाहर से तरंग उठी , उसे हजारों लहरों में  वापिस भेज देता है, खुद ही पिता है, खुद ही पुत्र बन जाता है। वही पैदा करता है, वही भटकाता है। और जो भीतर से कंपन उठा, उसे तरंग बनाकर मस्तिष्क तक निरंतर भेज रहा है। जीभ तो मानो उसी की दास है। जाना रास्ता बहुत ही सूक्ष्म है, संकरा है। अचानक ही वह ठहरेगा, वह तो गति है, विचार तो उसकी पहचान है। क्षण के क्षणांश में ही दीवार अचानक एक सूराख दे जाती है। मन ही विपरीत होजाता है। वह क्षण ही वर्त्तमान है। वर्तमान ही वह कला है, जहां वह इन गुणों के प्रभाव से बच पाता है। वह दृष्टा हो जाता है। अनासक्ति में प्रवेश कर जाता है।
तब उसका ‘मैं’ पन छूटने लगता है, ... वह जान जाता है, वह एक प्रवाह में तिनके की तरह है, ... वह कर्ता से स्वयं कर्म बनकर प्रवेश पाना चाहता है।

‘मयि  सर्वाणि कर्माणि संन्यास्याध्यात्म चेतसा।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगत ज्वर।।30।

तू विवेकवती बुद्धि के द्वारा सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्मों को मेरे अर्पण करके, कामना, ममता और संतापरहित होकर यद्ध( कर-
विगत ज्वर, सब प्रकार के भय को छोड़कर, सब प्रकार के कंपन को छोड़कर मुझमें समर्पित होकर
स्वामीजी ने बार-बार, इस ‘गीता के’ ‘माम’ पर ध्यान दिलाया है। ‘माम’ भगवान कृष्ण यहां नहीं हैं। यहां ‘माम’ जो विराट, परमात्मा यहां वह सब जगह है। ... वह परमात्मा है, ... जब ज्ञानी, ... उस ‘मैं’ को जान लेता है, जहां उसका ‘अहंकार’, उसका बाह्यमन, अंतर्मुखी होता हुआ अंतर्मन में डूब जाता हैै, तब ‘माम’ का बोध होता है, वह ‘माम’ परमात्मानुभव है।
... संकल्प ही समर्पण होता है, संकल्प तक आते-आते विगत ज्वर( आलस्य रहितद्ध) अनिर्णय की स्थिति, से छूटना होता है।
 ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते त्रेऽपि कर्मभिः।।31।
‘ जो कोई भी मनुष्य दोष बुद्धि से रहित और श्रद्धा से युक्त सदा ही मेरे इस मत के अनुसार वर्तते हैं, वे पुरुष संपूर्ण कर्मों से छूट जाते हैं-
- यहां भगवान कह रहे हैं - जो मैंने कहा है- श्रद्धापूर्वक हृदय से अंगीकार करके जो जीता है और कर्म करता है, वह समस्त कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाता है।
- जो मैंने कहा है- भगवान ने ‘माम’ शब्द का पुनः प्रयोग किया है। ‘माम यहां ब्रह्मनिष्ठ गुरु है, जिन्होंने अनासक्त भाव से उस परमात्म भाव को अपने भीतर जाना है, ...वे मार्गदर्शन कर रहे हैं।
परन्तु हम हमेशा संदेह साथ रखते हैं, श्रद्धा विश्वास नहीं है। विश्वास सदा अंधा होता है। कहीं कोने में संदेह छुपा रहता है। वह न तो अपना जाना होता है, मात्र औपचारिक माना होता है, ... भीतर किसी प्रकार का अविश्वास न रह जाए।
शत-प्रतिशत खाली हो जाए। संदेह रहित इस अवस्था में श्रद्धा उपजती है। स्वामीजी ने इसे आत्मकृपा है। यह दूसरे से नहीं आती। अपने भीतर से पैदा होती है। यहां विश्वास किसके प्रति है, यह पता नहीं है, पर अविश्वास कहीं नहीं है, बस वह है, यही श्रद्धा है। यहां सोच खत्म हो जाता है। सोच वहीं तक जाता है, जहां तक आप पक्ष-विपक्ष में उतरते हैं, यहां विचार ही गिर जाता है, जो तर्क से पार शेष बचती है, वह श्रद्धा है।
भगवान ने यहां ‘श्रद्धा’ पर बल दिया है।
बुद्धि जब शत-प्रतिशत शुद्ध होती है, तब विवेक जगता है। तब मन अंतर्मुखी होता हुआ, अपने मूल निवास स्थान की ओर  आना चाहता है, तब अचानक वह हृदय पर आकर ठहरता है, यहां पर आकर सारे विकार छूट जाते हैं।
यह हृदय है, यह बायलोजिकल हृदय नहीं है, यह आंतरिक जगह है, जहां जो शक्ति पैदा होती है, उसका नाम प्रेम है, वह दूसरों को अनुभव होता है, उसके पास  स्वयं मंे आत्मकृपा होती है। सघन आत्मविश्वास होता है। इसीलिए ही कहा जाता है कि ज्ञान मस्तिष्क की संपदा है, ध्यान हृदय की।
वह स्वाश्रय में स्थित रह जाता है।
... विवेक में, विचार शुद्ध रह जाता है। विवेक का जब आदर होता है, साधक विवेकी में ढल जाता है, वहां पतन की गुंजाइश नहीं होती है।  प्राप्त जीवन में विवेक का अनादर ही पतन की ओर लेजाता है। विवेक अलौकिक है, जहां तक विचार है, वहां तक या तो आसक्ति है, या विरक्ति है, जहां दोनों की अपेक्षा है, समभाव है, वहां अनासक्ति है, ... अनासक्ति जब निरंतरता में ढलती है, तब अंतर्मुखता प्राप्त होती है, ... तब विवेक में प्रवेश होता है।
... इस विवेकी का अगला पडाव जहॉं होता है, मात्र उसके भीतर श्रद्धा रह जाती है। एक तरलता, एक एक्य का भाव, ... यहां पर आकर जिसे छूटना होता है, वह छूटता चला जाता है। ‘‘मैं ’’,भाव वहां तक साथ जाता है, जहां तक यह बोध रहता है, मैं कर रहा हूं। जहां बस ‘वह’ रह जाता है। स्वामीजी के शब्दों में प्रकृति सब कराती है, उसी का योग-क्षेम रहता है, करना तो है, पर वह करवाए जाती है, ... यहां हो रहा है, किया नहीं जा रहा है, वहां जो शेष बचता है, वह श्रद्धा रहती है। जहां विवेक है, वहां बुद्धिचातुर्य नहीं रहता, वहां अपने आपको न्यायोचित ठहराने का आग्रह नहीं होता, ... जहां विवेक भी छूट जाता है, वहां श्रद्धा रह जाती है, श्रद्धा उस विराट तक पहुंचने की साधन है, ... श्रद्धा उस विराट की महान शक्ति भी है, ... इसकी पहचान भीतर साधक में आनंद भाव है, ... दूसरों में  उसका आकर्षण है, ... एक चुम्बक की तरह, ... प्रकृति का गुरुत्वाकर्षण, ... वहां अपने आप उपस्थित हो जाता है। क्या यही भक्ति नहीं है?
पुनः भगवान इस तीसरे अध्याय के समापन के समय, अर्जुन के माध्यम से संपूर्ण साधना क्रम को परिभाषित कर रहे हैं-
इन्द्रियस्येन्द्रिस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थ्तिौ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपथिनौ।।34
इसीलिए सभी इन्द्रियों के भोगों में स्थित जो राग-द्वेष है। उन दोनों के वश में नहीं होवे क्योंकि इसके वे दोनों ही शत्रु हैं।
जो राग से भी परे हैं, द्वेष से भी परे हैं, जीवन जो है, वह द्वन्द में है, सुख-दुख, लाभ-हानि, यश-अपयश, जीवन-मरण दोनों साथ आते हैं। एक आगे है, तो दूसरा पीछे है। हम चाहते हैं, जो शुभ है वह जीवन में रहे, अशुभ न हो, ... पर यह संभव नहीं है। अशुभ की कल्पना ही भयभीत कर देती है।
... अर्जुन क्या करे? ज्ञानी क्या करे? ... भगवान कह रहे हैं, ... तू दोनों के वश में मत आना, ... एक के साथ ही मत रहना, ... दोनों को एक जैसा स्वीकार कर ले। यह बात दूसरे अध्याय में आई है। दुख में अनुद्विग्न मत होना। सुख की लालसा में स्पृहा नहीं हो। ज्ञानी दोनों को ही स्वीकार कर लेता है। यही ज्ञान है। वह एक से चिपटता नहीं है। एक को बचाना नहीं चाहता। जो हो रहा है, प्रकृति के गुणों के आधार पर हो रहा है। वह मात्र साक्षी है। गवाह है कि ऐसा घट गया। जीवन में दोनों ही आते हैं। वह किसी एक की स्पृहा में नहीं रहता। यही उपेक्षा, यही वीतरागता है, यही वर्तमान में रहना है, जो है, जैसा है, स्वीकार है, वह आलस्य में नहीं है, प्रमाद में नहीं है। पलायन में नहीं है, निरंतर कर्मरत है, वह अनासक्त है।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्म निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।।35।
अच्छी प्रकार आचरण किए हुए दूसरे के धर्म से गुण रहित अपना धर्म अति उत्तम है अपने धर्म में मरना भी कल्याणकारक है। दूसरे का धर्म भय देने वाला है।
गीता का यह श्लोक, सर्वाधिक चर्चित, व विवादास्पद रहा है। पूज्य स्वामीजी कहा करते थे, ... स्वधर्म की खोज अपने अस्तित्व की खोज है। रमण महर्षि का यह आप्त साधन सूत्र था;मैं कौन हूं? ... यह मैं की खोज ही स्वधर्म तक लाती है।
... हम जो जन्म से पाते हैं, जिस परिवार में हमारा जन्म होता है, उसकी मान्यताएं हमारी हो जाती है। हम उस धर्म को अपना मान लेते हैं। कट्टर धार्मिक हो जाते हैं। दूसरे के धर्म से विद्वेष तक करते हैं।
परन्तु हमारे यहां माना गया है, प्रत्येक व्यक्ति दूसरे से अलग है, उसकी निजता है, उसके विकास का, कार्य करने का, अपना तरीका है, वह अपनी निजता में जीना चाहता है, वही उसका सुख है, जब वह उससे हट जाता है, तब दुखी होता है।
... स्वधर्म का मतलब है, उसकी आन्तरिक प्रकृति क्या है, वह उसकी अपनी संस्कार पंूजी पर निर्भर होती है। उसका अपना मूल स्वभाव है, स्वामीजी कहा करते थे- आध्यात्मिक जीवन की उपलब्धि, स्वाभाविक अवस्था को पाना हैं, स्वधर्म, ... व्यक्ति की उसकी अंतः प्रकृति है, ... एक बीज का भंडार है, ... जो कि अपनी स्वाभाविक स्थिति को चाहता है, ... वहां आने पर उसे शांति मिलती है, ... संतोष प्राप्त होता है, उसका जो सामर्थ्य है, ... यहां उसका पूरा प्राकट्य होता है।
... परन्तु होता इसके विपरीत है। समाज में अनुकरण, भेड़चाल कभी भी अपने आप से जुड़ने का मौका नहीं देती। सामाजिक व्यवस्था, बाहर ही बाहर भटकाती है। बाहर का आकर्षण, प्रेय का और श्रेय का बहुत जबर्दस्त होता है। हम परधर्म को ओढ़ते ही रहते हैं।
मुझे ही नहीं पता था, मुझे क्या करना है, ... मैं प्राप्त बुद्धि का प्रयोग कर अपना रास्ता तलाश करता रहा। प्रकृति ने कभी बाधाएं हटाई, तो कभी बाधाएं खड़ी कर दी, ... जो चाहते थे, वह नहीं मिला। स्वामी विवेकानंद, परधर्म की तलाश में थे, मामूली सी भी नौकरी नहीं मिली, प्रकृति ने परमहंस के सानिध्य में ले गई।उनका जो सामर्थ्य था, जो बीज था। उसका विकास दूसरी दिशा में हुआ, ... वह उनके स्वधर्म की प्राप्ति थी।

हर प्राणी का अपना स्वभाव है, जब यह उसे प्राप्त होता है। तब वह अपने स्वधर्म से जुड़ जाता है।
भगवान यहां कह रहे है- जो तेरा धर्म हो पहले उसकी खोज कर, दूसरे के गुणसहित धर्म से भी अपना  गुण रहित धर्म अति उत्तम है। तू पता लगा, तेरा सामर्थ्य क्या है? तू क्या हो सकता है, संभावना क्या है, फिर उसी के लिए प्रयास कर, ... तेरा संतोष तुझे तेरे लिए स्वाभाविक मांग पूरी करेगा, वह तेरी तुष्टि होगी।
परधर्म से बचना होगा, ... भले ही वहां तत्काल सफलता मिले, धन मिले, यश मिले, पर वह भयावह है, वह आत्मा को खोकर मिलती है। पराश्रय नर्क है। दूसरे को आदर्श मानकर उस जैसा बनने की ललक, परधर्म है, भगवान कह रहे हैं- यह भयावह है। स्वामीजी कहा करते थे-” मैंने कभी किसी को शिष्य नहीं बनाया,( इससे मिलने वाले बहुत खुश होते थे)  मैं नहीं चाहता आप मेरी नकल करंे, पर आपकी मुझ पर श्रद्धा है, मेरी बातें सही मानते हैं, तो एक बार प्रयोग करें, सही लगे आगे बढं़े, नहीं तो छोड़ दें।“ पर आगे की बात जब सधती है तब शिष्यत्च अपने आप उतर जाता है। इस पर विश्वास आना ही कठिन था। हम आगे  की बात सुनकर भी अज्ञानी बने रहे।
 हर व्यक्ति की साधना का पथ उसका अपना है, उसे बनाना है, यह उसकी मांग के अनुसार होगा, दूसरे का अनुकरण भयावह है। स्वधर्म का रास्ता आपको बनाना है, परधर्म का रास्ता बना-बनाया मिलता है, हम स्वधर्म खो बैठे हैं। हमारे शब्द भी दूसरों के हैं। कपड़ों तक में नकल है। हमारी अपनी मौलिकता खो गई है। स्वधर्म की वापसी, प्रसाद की प्राप्ति है, दिव्य प्रसाद, जिसे अंतःकरण की प्रसन्नता भी कहते हैं।

अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः।ं 36।
अर्जुन पूछ रहा है--हे कृष्ण फिर यह पुरुष बलात्कार से लगाए हुए के सदृश न चाहता हुआ भी किससे प्रेरित हुआ पाप का आचरण करता है
यह मनुष्य किसकी प्रेरणा से पाप कर्म करता है। हम नहीं चाहते हैं, फिर भी गलत हमसे हो जाता है। हम प्रायश्चित, पश्चाताप की आग में झुलसते रहते हैं।
भगवान ने अर्जुन की इस जिज्ञासा के समाधान में कहा है, ‘रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है। यह बहुत खाने वाला, महापापी है, इस विषय में तू इसको वेरी जान।
राग से काम उत्पन्न होता है, और काम से राग बढ़ता है। सांसारिक पदार्थों को सुखदायी मानने से राग पैदा होता है, ... इससे अंतःकरण में उनका महत्व दृढ़ हो जाता है, फिर इन्हीं पदार्थों को संग्रह करने की इच्छा तीव्र होती है। पुनः कामना पैदा होने से राग दृढ़ होता जाता है, ... यह एक चक्र है, इससे निवृति नहीं होती है, ... मेरा मनचाहा हो, ... यही काम है। आज यही सिखाया जाता है, ... तीव्र इच्छा करो, ... तुम उसे पा सकते हो, ... आकाश भी छोटा है, ... जाओ, ... पदार्थों की इच्छा, सुख की इच्छा, आसक्ति यह सब काम के ही रूप हैं।
... पाप कर्म, ... जाना, अनुभव किया, कामना के वशीभूत होकर ही होता है, ... विवेक यहां घूमिल हो जाता है, बुद्धि भी तमस में डूबा जाती है, मन, इंन्द्रियों के अनुशासन में चला जाता है, ... इन्द्रियां, आदत की गुलामी में चली जाती है, ... पाप और पापी दोनों एक रूप हो जाते हैं। काम में बाधा होने पर क्रोध होता है, ... कामना ही पापों का मूल है। कामना की पूर्ति पर लोभ होता है, बाधा होने पर क्रोध होता है, ... बाधा पहुंचाने वाला बलशाली होता है तो भय होता है।

... बहुत सोचा, जब कामना ही नहीं होगी तो संसार का कार्य चलना रूक नहीं जाएगा? क्या कामना करने से ही पेट भर जाता है, उसके लिए श्रम होता है, क्रिया करनी होती है, संसार का कार्य, वस्तुओं तथा क्रियाओं से चलता है, कामना से नहीं। कर्म बाहर होते हैं। कामना भीतर चलाती रहती है। अनावश्यक धक्का देती है। जो वस्तु कर्म के अधीन है, वह कामना से कैसे प्राप्त हो सकती है? कामना न चाहते हुए भी दुख आता है, रोग आता है, शोक आता है, ... अनुकूलता भी कर्मों का फल है, चाहे वे वर्तमान के हों या अतीत के हो।

... क्या कामना से छूटा जा सकता है? एक कामना हटती है, पूरी होती है, दूसरी आ जाती है। वह निरंतर बनी नहीं रती, एक मिटती है, दूसरी आ जाती है, ... उपाय यही है, नयी कम होने लग जावें, तो पुरानी अपने आप पूरी होकर मिटती चली जाती है।
‘कामना का जन्म’ अंतःकरण में होता है, यह उसका सहज स्वभाव है, ... वे सरोवर पर उठने वाली तरंगें है, निरंतर उठ रही है, ... स्वामीजी कहा करते थे, ... यहां मन का बर्फ हो जाना है, ... बर्फ में तरंगे नहीं उठती, ... कामना को उठते ही देखें।
(1) जो कामना पूरी हो सकती है, शरीर की, परिवार की आवश्यकता की पूर्ति के लिए है, उसे पूरा करो।
े (2) जो कामना भले ही दूसरों की हो, आपके द्वारा करने का सामर्थ्य है उसे पूरा कर दें।
 (3) जो आप करना चाहते हैं, सामर्थ्य नहीं है, उसे प्रकृति पर छोड़ दे, ... स्वाभाविक क्रम में पूरा होता है, नहीं तो अच्छा है, तेरी इच्छा पूरी हो, उसे परमात्मा पर छोड़ना बेहतर है।
... भगवान ने इससे पूर्व स्पष्ट कहा है- गुणा गुणेषु वर्तन्ते, ... गुण ही गुणों का विकास करते हैं। प्रकृति गुणमयी है। यह देने वाली है। इसके पार जाना अत्यंत कठिन है। प्रकृति के तीन गुण है, सत, रज, तम। आधुनिक विज्ञान  ने भी पदार्थ के खंड-खंड करते हुए इन तीन गुणों को इलेक्ट्रॉन, प्रोटोन, न्यूट्रोन रूप में चिन्हित किया है। तम आधार है। स्थिरता का तत्व है। स्थैतिक ऊर्जा है। सब कुछ इसी पर टिका है। यह अवरोधक शक्ति है। दूसरी शक्ति रज है, जो गति है, तमस रोकता है, रजस गति देता है। यही शिव और ब्रह्मा है। तीसरी शक्ति सत है, यह दोनों शक्तियों के बीच संतुलन रखती है।
... भगवान कह रहे हैं- यहां जो भी घट रहा है, ... मेरी माया है, जो गुणमयी है। वह इन तीनों शक्तियों का खेल है। सब कुछ इनके द्वारा ही हो रहा है।
... अर्जुन का सवाल है, हम नहीं चाहते हैं, फिर भी पाप कर्म क्यों हो जाता हैं? हमसे कौन करवा लेता है।
... भगवान इसी प्रश्न का उत्तर दे रहे हैं- प्रत्येक गुण की अपनी शक्ति है, इसका उपयोग अनुकूल और प्रतिकूल हो सकता है। क्रोध तमोगुणी कहा जाता है। यह भी एक शक्ति है। इसके विपरीत प्रेम की शक्ति है, तथा विवेक की शक्ति है... जब हम नकारात्मक शक्तियों का सहारा लेते हैं, हम अपने जीवन नर्क बुला लेते हैं। जब हम विधायी शक्तियों के साथ होते हैं, घर हमारा स्वर्ग हो जाता है। ... जहां दोनों शक्तियों के पार जाने की संभावना बनती है, जहां निर्विकारता होती है वहां हम दोनों ही विकारों से बाहर हो जाते हैं। विकार का अर्थ है- विकसित होने का भाव, जो दोनों शक्तियों को संतुलित कर लेता है, वही ‘पार’ हो सकता है।

मैंने अपने आपको देखा, ... क्रोध स्वभाव ही बन गया था। ... पाया मन ही क्रोध को पकड़ लेता है। जहां भी मौका मिले, ... थोड़ी सी भी जगह मिले, मन तुरंत उधर झुक जाता था। सौ में से निन्यानवे यही काम हुआ, एक गलत था, मन वहीं अटक जाता था। तब जाना, मन की भी पकड़ने की आदत हो गई थी। कोई भी विकार हमारे बिना पकड़े टिक नहीं पाता है। हम ही उसे पकड़कर ताकत देते हैं। बार-बार उसी का चिन्तन करने से वह मजबूत होता जाता है।
... भीतर जहां से यह तरंग उठती है, शब्द बनने से पहले, हृदय में हलचल होती है। कंठ पर दबाव पड़ता है, अगर रोक लिया तो चेहरा तो तनता है, पर लहर भीतर लौट जाती है, परन्तु अगर मध्यमा के पार बैखरी पर आकर शब्द मिल गए तो फिर अपना नियंत्रण नहीं होता है। हर लहर की अपनी सीमा है, वह प्रारंभ में हर स्पंदन की तरह होता है, ... हम ही उसे ताकत देते हैं, उस स्पंदन को तरंग, तरंग से प्रवाह, तथा नदी बना देते हैं। मैंने जाना, ... मैं ही उसे भीतर भीतर सहयोग देता था, ... मेरे सहयोग से ही वह ‘स्पंदन’ तरंग बन रहा था। मेरी पहचान, क्रोधी की हो गई थी, ... मैं अपना मूल स्वभाव खो बैठा था। यह स्पंदन भीतर से उठता है, ... जहां जाने-अनजाने अनेक भोगों की छाप हम संचित करते चले जाते हैं। वही संस्कार है। जहां भुक्त-अभुक्त असंख्य वासनाओं के बीज आड़े-तिरछे संग्रहित हैं। इसलिए यह भी पता नहीं चलता कि भीतर कौन सा प्रवाह चल रहा है। हम मात्र कठपुतली की तरह इस प्रवाह में डूबते-तिरते रहते हैं।

ये स्पंदन, गति हमसे ही पाते हैं, हमारा ही सहयोग इन्हें नदी की तीव्र धारा में बदल देता है। भगवान यहां बार-बार यही समझा रहे है। तुम ही विकारों में उतरने के डूबने के जिम्मेदार हो। यह प्रकृति का नियम है। दैवी ह्येेषा गुणमयी, ... अगर हम इन नियमों को समझ लेते हैं। अपने ज्ञान का हिस्सा बनाते हैं, तो हम वर्तमान को उपलब्ध होने लगते हैं, ... हम विवेकी होते हैं। लेकिन अगर हम निरंतर आसक्ति को अपने भीतर पालते जाते हैं, ... कामनाओं के दास बने रहते हैं तब हमारा संग्रह बलवती होता चला जाता है। और यह संग्रह निरंतर उठने वाली प्रकृति की महाशक्ति से जो गुणमयी है, आघात पाकर, ... मन को उत्प्रेरित करता रहता है। हम बार-बार वही करते चले जाते हैं, जिसके लिए हम कहते हैं, ... हमसे कोई अदृश्य शक्ति यह सब करवा रही है।
‘संस्कार’ बहुत बड़ा बीज भंडार है, जहां हम निरंतर संग्रह करते चले जाते हैं। यह भी नहीं जानते कि वह वृक्ष कितना बड़ा बन जाएगा, ... शक्तियां भीतर है, वे अनुकूल वातावरण मिलते ही बीज से वृक्ष बनने की प्रक्रिया में सहयोग करती है।
भगवान कृष्ण का साधकों यही सूत्र है कि- ‘ये जो तीन गुण हैं, इनको जो साध लेता है, ... संतुलन पा लेता है, वही इनसे पार जा सकता है, यह दुरत्या है। अत्यधिक कठिन तो है, पर असंभव नहीं है। यह ‘माम’ शब्द ‘परमात्मा’ का सूचक है। जिसके समस्त कृत्य निष्काम भाव से होने लग गए हैं। जिसने जीवन का इनका संतुलन पाया है वही ‘नट’की तरह रस्सी से पार चला जाता है, अन्यथा पतन होना स्वाभाविक है।


धूमेनाव्रियते वर्यथादर्शो मलेन च।
यथोल्बेनोवृतो गर्भस्तथा  तेनेदमावृतम्।ं38
जैसे धुएं से अग्नि और मैल से दर्पण ढक जाता है, वैसे ही ज्ञान,  इस ”काम“ से ढका हुआ है।
अग्नि तो है, पर धुंए ने ढंक रखा है। दर्पण तो है पर धूल में उसकी शक्ति खो गई है, ज्ञान सभी के पास है। जो अज्ञानी है, उसके भीतर भी ज्ञान है, पर वह इस काम के प्रभाव से अनभिज्ञ है। भगवान यहां कह रहे हैं- जैसे धुंवा आग को घेर लेता है, उसी प्रकार वासना मन को घेरे हुए हैं- वासना ही वस्त्र का वह गीलापन है जो धूल के कणों का आकर्षित करताहै, वह गीलापन है, जो धुंआ उठाता है। वासना पैदा होती है, ... यह मुझे चाहिए, ... यह मेरे पास नहीं है। आज मिल जाए, कल फिर दूसरी चाहिए, ... यह वह आग है, बुझती नहीं है, यह हमेशा जहां से उठती है, वहां खालीपन छोड़ देती है। इसका पूरा झुकाव जो नहीं है, वहां है, इसलिए जो है, जो हमेशा प्राप्त है उस पर ध्यान आने ही नहीं देती है, आत्मा सदा वर्तमान में है। वासना कल में है। शरीर हमेशा वर्तमान में है, मन भी उसी के साथ रहे। यही साधन तत्व है।

सुमिरन, स्मरण है आत्मा का, ... जब यह सधता है, तब वासना से विस्मरण होना शुरू होता है, ... ध्यान का अर्थ होता है, जो है वहां रहंे, पर ध्यान हमेशा जहां वासना जाती है, वहां चला जाता है। तब घर की वापसी नहीं होती। भटकाव बढ़ता जाता है। ध्यान जहां शरीर है, जहां कर्म है, वहीं मन है, वहीं ध्यान है। वर्तमान में रहना उपलब्ध हो जाता है।
भगवान कह रहे है, जैसे धुंवे से आग छिप जाती है, वैसे ही वासना हमारे भीतर ज्ञान को ढक लेती है, जहां धुंवा है, वहां आग भी है, ... ज्ञान हमारे ही भीतर है, हमें कहीं जाना नहीं है, बस यह जो वासना का धुंवा छाया हुआ है, इसे हटाते रहना है। दूसरा उदाहरण दर्पण का दिया है, दर्पण के सामने कितने भी लोग आए वह किसी की छाप अपने भीतर नहीं ले जाता है, पर हम जो भी भोग होते हैं, उसकी छाप संग्रहित करते चले जाते हैं। यही बीज, हमारा संस्कार बनता चला जाता है। ... यह बनता है, चिन्तन से। अगर मन क्रिया के साथ ही सौ टका रहे तो फिर विषय का चिन्तन नहीं होता। स्मृति उपेक्षित हो जाती है। दर्पण की धूल हमारी वासना की परत है। जो उसकी क्षमता को ढक लेती है।
... वासना की धूल से, ... भीतर की छाप भी उभर नहीं पाती है, ...धूल हटे तो जो है, जो भीतर का शुद्धतम स्वरूप है, उसका प्रतिबिम्ब उजागर हो, पर हो नहीं पाता है।
वासना- दृश्य का चिन्तन है। यह पराधीनता सौंपता है। पराधीनता ही पाप है। वासना हमेशा याचक बनाती है। गुलामी सौंपती है।
गीता के तीसरे अध्याय के ये श्लोक, साधन सूत्र हैं पूज्य स्वामीजी ने इन श्लोकों को समझाते हुए, मनुष्य की जो विवेक हीनता है, ... उस पर गहराई से संकेत किया है।
... इस काम के द्वारा मनुष्य का ज्ञान ;(विवेक) ढका हुआ है, ... इन्द्रियां, मन और बुद्धि  इसकेे वास स्थान कहे जाते हैं। यह काम इनके द्वारा ही ज्ञान को आच्छादित करके इस जीवात्वा को मोहित करता है।

तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ।
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञान नाशनम्।ं41।
तू, इन इन्द्रियों को वश में करके, ज्ञान और विज्ञान को नाश करने वाले इस (काम) पापी को निश्चयपूर्वक मार।
... काम का निवास स्थान कहाँ है, भगवान कृष्ण कह रहे है, वह पदार्थों में, इन्द्रियों में, मन में, बुद्धि में, अहंकार में, दिखाई पड़ता है। ये काम के वास स्थान कहलाए जाते हैं।
... चेतन तत्व का इस जड़ तत्व से जो समन्वय है, जो तादात्म्य है, वहां काम है, ... काम भुुक्त-अभुुक्त वासना बीजों के रूप में संस्कार केन्द्र में रहता है। वह अंतर्मन के समीप है, अंतर्मन पर उसी की धूल है, ... वही इस आत्म तत्व पर छाया हुआ धुवंे का गुबार हैं। यही ‘मैं पन’ हैं। माना हुआ संबंध है, ... यहीं कामना रहती है। इसी से प्रकृति की गुणात्मक शक्ति के द्वारा समस्त कार्य होेते हैं। कामना ही बंधन है। इसी कामना के कारण जो वह नहीं करना चाहता है, वह कर बैठता है।

... इस कामना की पूर्ति में बाधा पहुंचने पर क्रोध होता है, बाधा न पहुंचे कामना पूर्ति हो जाती है, तो फिर लोभ पैदा होता है, लोभ से मोह पैदा होता है।
... कामना पैदा क्यों होती है, जाना, ... मैं अपनी आदत से बहुत कुछ करता रहा, आदतें ही नियंत्रित करती है, वे ही चलाती है। वे ही प्रभावशाली है। आदत से ही इन्द्रियाँ जुड़कर शासक बन जाती है। तत्काल मन भी उसमें लग जाता है। बिना मन की सहायता से इन्द्रिय भोग नहीं कर सकती है। जब इन्द्रिय के साथ मन लग जाता है, तब सही गलत को सही करने के लिए बुद्धि भी उसमें लग जाती है। इस तरह कामना प्रभाव डालती है, बुद्धि के नीचे गिरने से विवेकहीनता अपने आप आ जाती है।
भगवान कृष्ण कह रहे हैं, इन्द्रियां, मन यही काम के वासना के वास स्थान है, ... यहीं से प्रवाह उठता है, जो बहाकर ले जाता है। तू पहले इन पर नियंत्रण पा। ‘मार’ शब्द का अर्थ, इन्द्रियों से असहयोग तक हो गया, गलत अर्थ निकल गया। यहां स्पष्ट है कि नियंत्रण पाना है। यहां इन्द्रियां तो सीढ़ी है, जो द्वार है, उसका सदुपयोग होना है। प्रवाह नीचे भी जाता है, दूसरा प्रवाह है, विषय इन्द्रियों में डूब जाए, इन्द्रियां मन में डूब जाए, इन्द्रिया बुद्धि में, बुद्धि विवेक में, तब चेतना का रूपांतरण प्रारंभ हो जाता है।

स्वामीजी कहा करते थे- मालिक और नौकर का संबंध याद रखना। जहां मालिक सो जाता है वहां सेवक ही अपने आपको मालिक बताता है, बस मालिक का जगना, होश में आना ही पर्याय है, ... हमने विषयासक्त होकर, इन्द्रियों को मालिक बना दिया है, ... उसका नाश नहीं करना है, मन तो उर्जा है, उसका कभी नाश नहीं हो सकता, हां उसकी गति परिवर्तित हो सकती है।
... जो निरंतर वर्तमान में है, वह निर्विकारता में होता हुआ भी कर्मरत रहता है। ... उसकी इन्द्रियों का नाश नहीं होता, ... वे भी रहती हैं। उनकी  संवेदनशीलता  जीवन्त होती है, ... परन्तु वे उसकी आज्ञा में रहती है।
स्वामीजी के पास रहकर जाना था, ‘ग्यारह बजे के आसपास भोजन नहीं आया तो वे भोजन करना भी भूल जाते थे, ... याद ही नहीं आती थी, ... थाली में से बस एक रोटी, थोड़ा चावल, दाल ली, बस,  न मिठाई न फल, ... लेते ही नहीं थे। थाली में से बाहर निकाल कर रख देते थे। सामने व्यक्ति आया है, ... पर संबंध टूटा हुआ है, ... आंखें देखती है, ... पर पहचान नहीं है, वह दो-तीन बार बोलता है, शब्द भीतर जाते हैं, तब अचानक संबंध जुड़ते ही संवाद शुरू हो जाता है।

‘यह भी एक स्थिति है, जीवन्त है। जहां विषय इन्द्रियों में डूब जाते हैं। इन्द्रियां मन में डूब जाती है, मन बुद्धि में, बुद्धि विवेक में, विलीन हो जाती है। स्वामीजी की भाषा में, यहां प्रकृति स्वयं कार्य व्यवहार संभाल लेती है। सवाल पूछा भीतर से रेडीमेड आन्सर आता है। सोचना नहीं पड़ता। जाना... यह शास्त्रगत व्याख्या नहीं है, ... ऐसा भी जीवन जिया जाता है, जहां आचरण ही धर्म की, शास्त्र की व्याख्या कर देता है, ... भगवान जो कह रहे हैं, वह श्रद्धा के भीतर ही मोती की तरह उपजता है।
‘भगवान कृष्ण यहां कह रहे हैं-
‘शरीर अथवा विषयों से,  इन्द्रियां परे हैं, इन्द्रियों से विषयों का ज्ञान होता है, विषयों से इन्द्रियों का नहीं, इन्द्रियां मन को नहीं जानती, मन इन्द्रियों से परे हैं। इन्द्रियांे की पहचान मन से होती है। मन बुद्धि को नहीं जानता, ... बुद्धि मन से परे है। बुद्धिका स्वामी अहंकार है। मैं कहता हूं, यह मेरी बुद्धिहै, यह मैंने जाना है। बुद्धि भी यंत्र है, स्वामी अहंकार है। यह अहंकार है, इसका निवास संस्कार में है, इसका एक छोर जड़ है, दूसरा चेतन है। बाह्यमन जहां संसार को छूता है वहीं अंतर्मन विराट को छूता है, इस संस्कार में ही काम का निवास है। इस अहंकार के कारण से, ... उसके साथ तादात्म्य कर लेने के कारण से जो चेतन है वह भी अपने आपको भोक्ता मान लेता है, चेतन ही सुखी-दुखी होता है।
... गीता में भगवान ने दूसरे अध्याय में कहा है- यही वह रस है, जिसकी निवृति उस परम के साक्षात्कार से होती है। यही स्वामीजी का संकेत सूत्र- बाह्यमन का अंतर्मन में विलीन होना है। इससे, उसके पूर्व संस्कार निःशेष हो जाते हैं। काम बीज दग्ध हो जाता है। भुने हुए बीज की तरह उसकी अंकुरण क्षमता खो जाती है।
जो जाग्रत है, वहां बुद्धि से मन नियंत्रित रहता है, मन से इन्द्रियां नियंत्रित रहती है। आवश्यकता होने पर ही विषयों से संबंध जुड़ता है। संबंध जुड़ता है चिंतन से, जहां चिंतन नहीं होता है, ... सामान्य स्थिति में इन्द्रियां चलाती है, उन्हें विषय निरंतर खींचते रहते हैं। आज का बाजार, निरंतर प्रचार से विषयों की ओर खींचता रहता है। विषयों की मानकर, बुद्धि उसकी तरफ दौड़ रही है।

एवं बुद्धेः परं बुद्घ्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना।
जहि शत्रंु महाबाहो काम रूपं दुरासदम।ं43।

अपनी शक्ति को समझकर दुर्जय काम रूप शत्रु को मार।
यह तीसरे अध्याय के अंतिम श्लोक की आज्ञा है- बुद्धि से परे अपनी आत्मा को जानकर, बुद्धि के द्वारा मन को वश में करके दुर्जय कामरूप शत्रु को मार।
अपनी शक्ति परमात्मा की ही शक्ति है, मन से इन्द्रियों को वश में कर, बुद्धि से मन को वश में कर, बुद्धि को विवेक के हाथों सौंप दे, बुद्धि जब शत-प्रतिशत विकार रहित हो जाती है, तब वह विवेक में ढल जाती है। विवेक परमात्मा की पहली किरण है, तब तू इस दुर्जय वासना के बाहर आ जाएगा।
पूज्य स्वामीजी ने, ... अनंत यात्रा में कुंभ से नीलकंठ को कहलाया है, ... तुम्हारे विवेक जाग्रत हो जाए, यही मेरा लक्ष्य है। शायद इसके बाद मेरा यह शरीर रहे भी या नहीं, महत्वपूर्ण है।
गुरु के जीवन की उपसंपदा, शिष्य को विवेक की प्राप्ति कराना है, जहां विवेकी जगता है वहां गुरु शिष्य में लीन हो जाता है। गुरु ज्ञान ही है, वहां गुरु जगता है।
... यह यात्रा भीतर की है, दो ही प्रवाह है, या तो हम बाहर जाएं, विषयों के अधीन अपने आपको सौंप दे, ... या भीतर आएं परमात्मा के हाथों अपने आपको सौंपे।
इन्द्रियां बलवती है, ... पर बहुत गहराई में जाने के बाद जाना, ... इन्द्रियां आदत की गुलाम होती है। जर्दा खाने वाला कहीं भी हो, जहां उसने दूसरे को हथेली पर चूना मसलते देखा, उसका हाथ उसकी तरफ अपने आप मुड़ जाता है। इन्द्रियों की अपनी सत्ता नहीं है या तो मन के हिसाब से चलो, या आदत के अनुसार, विषय के आकर्षण में। दो ही रास्ते हैं।
जब हम इन्द्रियों के अधीन हो जाते हैं,तब मन स्वाभाविक रूप से नीचे उतर जाता है। यहां मन की हुकूमत नहीं है, वह इन्द्रियों के अधीन कार्य करता है। जब अड़चन आती है, कोई गलत कहता है, तब बु(ि भी नीचे आकर न्यायोचित ठहराती है। यह एक प्रवाह है।

हां, जब वर्तमान में होते हैं, सजग होते हैं।

भीतर उठते ही वासना के, बाह्य के किसी आकर्षण से उठे दबाव में मन को नहीं रहने दें, ध्यान जाता है। बुद्धि तत्काल वहां आ जाती है, वहीं सजगता है, तरंग जो उठी है, आदत वश है, इन्द्रियों के दबाव से है तो वापिस लौट जाती है, ... क्योंकि बुद्धि का स्पर्श पाते ही मन जो ताश के महल खड़े करता है कल्पना पैदा करता है, अनावश्यक विचारणा का प्रवाह पैदा करता है, उसकी यह अपनी शक्ति है पर वह निर्णय नहीं कर सकता। निर्णय बुद्धिकरती है। विचार वह करती है। विचारणा का प्रवाह मन पैदा करता है। वहां कल्पनाएं होती है। बुद्धि के पास आते ही, जब मन की निगरानी शुरू हो जाती है। यह काम घंटे दो घंटे का नहीं है। पूज्य स्वामीजी कहा करते थे- कॉन्सटेन्ट अवेयरनेस। यह तो चौबीस घंटे का है। मन का ऊर्ध्वगमन तभी संभव है, जब निगरानी लगातार हो, सतत हो, तब मन की गति कम होने लगती है। पर मन की शक्ति बढ़ती है। तब इन्द्रियां स्वाभाविक रूप से मन के नियंत्रण में आ जाती है। विवेक का आदर करने से, बुद्धि विवेक में परिणित हो जाती है। विवेक अलौकिक है।

बुद्धि भी सतोगुणी है, रजोगुणी है, तमोगुणी है। निरंतर ध्यान से सजगता से स्वाभाविक रूप से बुद्धि भी शुद्ध होने लगती है। पहले बूंद का मटमैलापन कम होता है, फिर वह ज्योतित पारदर्शी हो जाती है, तब जाकर सागर में लय होता है। यह विवेक की प्राप्ति है। पूज्य स्वामीजी कहा करते थे- यहां बाह्यमन जब इन्द्रियों से अपने आपको सिकोड़ लेता है, तब वह अन्तर्मुखी होकर भीतर की ओर मुड़ जाता है। मन तो गति है, वह रुक गई तो शरीर का नाश हो जाएगा,  मन का नाश नहीं होता, उसकी गति परिवर्त्रित हो जाती है। तब वह अपने मूल स्थान नाभि की ओर आता है, जहँां अंतर्मन है, बाह्यमन अंतर्मन में लय हो जाता है। बाहर तो कुछ नहीं बदलता, वैसा ही रहता है, पर भीतर चेतना का ऊर्ध्वगमन हो जाता है। मौलिक रूपान्तरण जो हम चाहते हैं।


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