13 अमृतपथ
साधना सूत्र
समय-समय पर स्वामीजी के साथहुए वार्त्तालाप का संक्षेप यहाँ प्रस्तुत हैः-
”बाहर की सब क्रियाऐं, यथावत चलती रहेंगी,
पर उनके कारण मन अपने स्थान से नहीं हटेगा
न सुख को सुख
न दुख का दुख
और मन एक रस बना दिया-
कुंती ने भगवान से कहा था-
हमेशा दुख बना रहे तो हममें तुम्हारी स्मृति बनी रहेगी।
क्योंकि दुख में जो गति है वह सुख में नहीं है।“
”मन हमेशा सुख की चाहना करता है।
जैसे सुख में रस बढ़ जाता है
वह सबको भूल जाता है
अहंकार बढ़ता जाता है
वह महान शक्ति से दूर होता जाता है।
इसके लिए एकमात्र उपाय है
वह भीतर से जुड़ा रहे- एक रस
जो हो रहा है, होता रहे। उससे विचलित नहीं होता है।“
”.हम उसके लिए जो प्रयास करते हैं
हमारी विधि ठीक नहीं है
जड़ों से जुड़ना, मतलब यह है
मन को स्वाभाविक स्थिति में लाना
वहां विचार नहीं उठता है, स्वाभाविक स्थिति में,
परन्तु इंद्रियॉं खींचती रहती है।
यह भटकाव बाहर से अधिक आता है
उस में भी सूक्ष्म से सूक्ष्म विचार कैसे पैदा होते हैैंं
क्या होता है।इसका पता आपको तब तक नहीं लगेगा
जब तक आपका मन अंर्तमन के पास नहीं पहुंचेगा।
क्यों
कैसे,कहॉं सेे,यह समझने के लिए मन को थोड़ा नीचे उतारना पड़ेगा
प्रयास करना है,
वही
विचार आते ही हटाते जाओ
एक समय ऐसा भी आएगा, मन बिल्कुल ही शांत रहेगा
कोई विचार नहीं आएगा
मन उसी स्थिति में लंबे समय तक रहने के बाद,तब मन की आदत बन जाएगी।
मन को स्वयं उससे हटाना है।
हमारे प्रयास सब उपरी हैं।“
”बच्चे को देखा है,
कहना नहीं मानता है
समझाते हैं,फिर भी कहना नहीं मानता है
पर जब वह स्वयं सोचे मुझे करना है
तब वह जो करता है,
वह दूसरे के समझाने से नहीं हो सकता है।
तुकाराम का अभंग है
‘‘तेरा, तुम्हारे पास ही है
पर तुम जगह भूल गए हो’।’
”जो कुछ हमें करना है
अंदर से,बाहर से नहीं
वह भक्ति के नाम से आध्यात्म के नाम सेे जो प्रपंच करते हो उनकी कोई आवश्यकता नहीं,
विश्वास तो दृढ़ हुआ नहीं
करते हें क्यों
सांसारिक आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाए
यह भगवत प्राप्ति के लिए तो कोई करता नहीं।
जैसे ‘‘रामकृष्ण’’ ने किया
सब प्रकार के मोह छोड़कर परमात्मा के प्राप्ति के लिए किया।
यहॉं किसी न किसी इच्छा पूर्ति के लिए करते हैं।
जब तक भौतिकता की प्राप्ति के लिए उत्सुकता है
तब तक खींचतानी चलती रहेगी।“
ब्रह्मनिष्ठ गुरु
अंत होने के बाद वापस कुछ नहीं बचता,संसार का कोई अंत नहीं है।
शरीर का अंत है,परन्तु शरीर के अंत के बाद क्या होता है,जिस महान शक्ति के द्वारा हमको पैदा किया है,जो शक्ति संचालन करती है,वह हट जाती है।
परन्तु महान शक्ति ने पैदा किया है,भले ही यह माया है।
उस महान शक्ति का कोई उद्देश्य है,उद्देश्य की पूर्ति के लिए जब तक जीवित है,तब तक जीवित है,हमारे सारे कार्य यथावत चलते रहने चाहिए।
हमने हमारे मन को धीरे धीरे निरन्तर नीचे लाना शुरू किया,धीरे धीरे अंतर्मन तक लाने की कोशिश की,तब भीतर पता लगता है कि जीवन का क्या उद्देश्य है?
क्या करना है?है तो यहाँ सब नाटक ,पर हमारा पार्ट भी तो है।
हमें अपना पार्ट अदा करना है,पर याद रखना है।
मैं राजा भी हूं,पर यहां राजा का कार्य क्या है?नाटक के लिए नाटक का पार्ट करते हैं तो इसमें आत्मसंतोष होगा।
मन, अंतर्मन में लीन हो जाएगा, यह अंतिम अवस्था है।
पर्दा गिर गया,नाटक समाप्त हो गया।“
”कुंभ ने नीलकंठ से कहा था
मेेरे जीवन का उद्देश्य तुम्हारा मार्गदर्शन करना है
जो ब्रह्मचारी गुरु हैं
वह भौतिक चक्कर में नहीं पड़ता
वह केवल मार्ग दर्शन करता है,
हो सकता है, उसके बाद मेरा शरीर भी नहीं रहे।’
वो है
जो अंगुली से इशारा करदे वह है
और फिर शिष्य का कर्त्तव्य है कि वह आज्ञा का पालन करते रहे।
मैंने जो कहा है, लिखा है, वहां ब्समंत कहा है, संदेह की जगह नहीं रखी ह।ै
सुनने वाले भूल जाते हैं। शंका करते हैं।
मेरे मन में कोई विचार नहीं है।
प्रश्न पूछा है, उसके पहले उत्तर आ जाता है
कोई दुविधा नहीं है।“
”मन का ( भ्रकुटि में है
शेष नीचे है
जो मन यहां है, उसका केवल कार्य भौतिक सृष्टि में अपना कार्य करना है।
इस मन के साथ विकार हैं।
विकार इसे प्रभावित करते हैं,
इसको यदि इसके साथ जोड़ दिया जाए
तो विकार प्रभावित नहीं करते।
प्रकृति की इच्छानुसार कार्य अपने आप चलता है।
इसीलिए इसको नीचे लाना है।
और कोई उपाय नहीं है
इसका कार्य मात्र ंबजपदह है
ंबजपदह कर रहे हैं।
जो पार्ट दिया हैै, वह कर रहे हैं,
तब न सुख होता है न दुख
जब तक मन यहां ऊपर रहेगा
सुख भी होगा, दुख भी होगा
नीचे आकर
अखंड शांति है,
जो होना है, हो रहा है।“
साधना सूत्र
समय-समय पर स्वामीजी के साथहुए वार्त्तालाप का संक्षेप यहाँ प्रस्तुत हैः-
”बाहर की सब क्रियाऐं, यथावत चलती रहेंगी,
पर उनके कारण मन अपने स्थान से नहीं हटेगा
न सुख को सुख
न दुख का दुख
और मन एक रस बना दिया-
कुंती ने भगवान से कहा था-
हमेशा दुख बना रहे तो हममें तुम्हारी स्मृति बनी रहेगी।
क्योंकि दुख में जो गति है वह सुख में नहीं है।“
”मन हमेशा सुख की चाहना करता है।
जैसे सुख में रस बढ़ जाता है
वह सबको भूल जाता है
अहंकार बढ़ता जाता है
वह महान शक्ति से दूर होता जाता है।
इसके लिए एकमात्र उपाय है
वह भीतर से जुड़ा रहे- एक रस
जो हो रहा है, होता रहे। उससे विचलित नहीं होता है।“
”.हम उसके लिए जो प्रयास करते हैं
हमारी विधि ठीक नहीं है
जड़ों से जुड़ना, मतलब यह है
मन को स्वाभाविक स्थिति में लाना
वहां विचार नहीं उठता है, स्वाभाविक स्थिति में,
परन्तु इंद्रियॉं खींचती रहती है।
यह भटकाव बाहर से अधिक आता है
उस में भी सूक्ष्म से सूक्ष्म विचार कैसे पैदा होते हैैंं
क्या होता है।इसका पता आपको तब तक नहीं लगेगा
जब तक आपका मन अंर्तमन के पास नहीं पहुंचेगा।
क्यों
कैसे,कहॉं सेे,यह समझने के लिए मन को थोड़ा नीचे उतारना पड़ेगा
प्रयास करना है,
वही
विचार आते ही हटाते जाओ
एक समय ऐसा भी आएगा, मन बिल्कुल ही शांत रहेगा
कोई विचार नहीं आएगा
मन उसी स्थिति में लंबे समय तक रहने के बाद,तब मन की आदत बन जाएगी।
मन को स्वयं उससे हटाना है।
हमारे प्रयास सब उपरी हैं।“
”बच्चे को देखा है,
कहना नहीं मानता है
समझाते हैं,फिर भी कहना नहीं मानता है
पर जब वह स्वयं सोचे मुझे करना है
तब वह जो करता है,
वह दूसरे के समझाने से नहीं हो सकता है।
तुकाराम का अभंग है
‘‘तेरा, तुम्हारे पास ही है
पर तुम जगह भूल गए हो’।’
”जो कुछ हमें करना है
अंदर से,बाहर से नहीं
वह भक्ति के नाम से आध्यात्म के नाम सेे जो प्रपंच करते हो उनकी कोई आवश्यकता नहीं,
विश्वास तो दृढ़ हुआ नहीं
करते हें क्यों
सांसारिक आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाए
यह भगवत प्राप्ति के लिए तो कोई करता नहीं।
जैसे ‘‘रामकृष्ण’’ ने किया
सब प्रकार के मोह छोड़कर परमात्मा के प्राप्ति के लिए किया।
यहॉं किसी न किसी इच्छा पूर्ति के लिए करते हैं।
जब तक भौतिकता की प्राप्ति के लिए उत्सुकता है
तब तक खींचतानी चलती रहेगी।“
ब्रह्मनिष्ठ गुरु
अंत होने के बाद वापस कुछ नहीं बचता,संसार का कोई अंत नहीं है।
शरीर का अंत है,परन्तु शरीर के अंत के बाद क्या होता है,जिस महान शक्ति के द्वारा हमको पैदा किया है,जो शक्ति संचालन करती है,वह हट जाती है।
परन्तु महान शक्ति ने पैदा किया है,भले ही यह माया है।
उस महान शक्ति का कोई उद्देश्य है,उद्देश्य की पूर्ति के लिए जब तक जीवित है,तब तक जीवित है,हमारे सारे कार्य यथावत चलते रहने चाहिए।
हमने हमारे मन को धीरे धीरे निरन्तर नीचे लाना शुरू किया,धीरे धीरे अंतर्मन तक लाने की कोशिश की,तब भीतर पता लगता है कि जीवन का क्या उद्देश्य है?
क्या करना है?है तो यहाँ सब नाटक ,पर हमारा पार्ट भी तो है।
हमें अपना पार्ट अदा करना है,पर याद रखना है।
मैं राजा भी हूं,पर यहां राजा का कार्य क्या है?नाटक के लिए नाटक का पार्ट करते हैं तो इसमें आत्मसंतोष होगा।
मन, अंतर्मन में लीन हो जाएगा, यह अंतिम अवस्था है।
पर्दा गिर गया,नाटक समाप्त हो गया।“
”कुंभ ने नीलकंठ से कहा था
मेेरे जीवन का उद्देश्य तुम्हारा मार्गदर्शन करना है
जो ब्रह्मचारी गुरु हैं
वह भौतिक चक्कर में नहीं पड़ता
वह केवल मार्ग दर्शन करता है,
हो सकता है, उसके बाद मेरा शरीर भी नहीं रहे।’
वो है
जो अंगुली से इशारा करदे वह है
और फिर शिष्य का कर्त्तव्य है कि वह आज्ञा का पालन करते रहे।
मैंने जो कहा है, लिखा है, वहां ब्समंत कहा है, संदेह की जगह नहीं रखी ह।ै
सुनने वाले भूल जाते हैं। शंका करते हैं।
मेरे मन में कोई विचार नहीं है।
प्रश्न पूछा है, उसके पहले उत्तर आ जाता है
कोई दुविधा नहीं है।“
”मन का ( भ्रकुटि में है
शेष नीचे है
जो मन यहां है, उसका केवल कार्य भौतिक सृष्टि में अपना कार्य करना है।
इस मन के साथ विकार हैं।
विकार इसे प्रभावित करते हैं,
इसको यदि इसके साथ जोड़ दिया जाए
तो विकार प्रभावित नहीं करते।
प्रकृति की इच्छानुसार कार्य अपने आप चलता है।
इसीलिए इसको नीचे लाना है।
और कोई उपाय नहीं है
इसका कार्य मात्र ंबजपदह है
ंबजपदह कर रहे हैं।
जो पार्ट दिया हैै, वह कर रहे हैं,
तब न सुख होता है न दुख
जब तक मन यहां ऊपर रहेगा
सुख भी होगा, दुख भी होगा
नीचे आकर
अखंड शांति है,
जो होना है, हो रहा है।“
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