अमृत पथ
- यात्रा 8
अमृत पथ की अगली कड़ी यहॉ, दी जारही है। सत्संग तथा ध्यान शिविर को लेकर अनेक प्रश्न उठते रहते हैं, यहॉं उनकी अर्थवत्ता पर विचार किया गया है।
स्वामीजी से बार-बार सत्संग शिविर आयोजित करने के लिए कहा जाता था,इसी संदर्भ में उन्होंने एकबार कहा थाः-
मैंने कोई सत्संग शिविर नहीं चलाया, ... लोग आते थे, मुझे समझातेे थे, ... आप मुझसे जुड़े है, मेरे विचारों से जुड़े है, .. आपके मन को इससे लाभ होता है, .. आप आते हैं, आपका आना स्वाभाविक है।
मैं तो कुछ नहीं करता, ... जो होता है, स्वाभाविक होता है, ... और जो होता है, वह आपको ही पता है, ... हाँ यहां में शांत हूं, कोई उत्तेतना नहीं है, कुछ करना नहीं है, ... उस शांति में आप आते हैं, ... आपको शांति मिलती है, .. बस। पर प्रवचन देकर, ... एक निर्धारित क्रम बनाकर रखना, कहना ज्यादती है। इससे मैंने तो कोई लाभ होता देखा नहीं, अहंकार ही बढ़ता है।
सन्यास भले ही हिमालय पर लिया, ... पर मेरा वहां मन नहीं लगा, ... प्रकृति यहां ले आई, यहां आकर, कार्य किया, तब तो यह इलाका बहुत पिछड़ा था, एक बस चलती थी, पैदल ही आता-जाता था, ... सत्य हिमालय पर ही नहीं मिलता, वह तो हर जगह प्राप्त हो सकता है।
हम क्या चाहते हैं, हम ही निश्चित नहीं है।
जो सबका कारण है, जोे शरीर, मन, बुद्धि, सबसे परे है, ... उसे क्या हम एक स्थान, एक व्यक्ति, एक वातावरण का सहारा लेकर पा सकते हैं?
जो स्वयं नाशवान है,... आप उसका लेते हैं। व्यक्ति से जुड़ते हैं, या विवेक से। आपके पास भी विवेक है, पर उसका आदर न होने से वह सुप्त है,... गुरु देह नहीं, साक्षात विवेक होते हैं?... जहा देह पूजा है, वहां विवेक अनुपस्थित है। अनंत यात्रा में कुंभका कथन है- नीलकंठ से-‘अब तुम्हारा विवेक जागृत हुआ है, हो सकता है, इसके बाद मेरा शरीर भी नहीं रहे’, गुरु का कार्य शिष्य का विवेक जगाना है, पर आज तो अपहरण ही होना रह गया है।
वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति, सभी परिवर्तनशील है, इनका आश्रय मत लो, तुमने चाहा था, ... तुम्हे कब आत्म ज्ञान होगा, ... जब तुम्हारा कर्तव्य कर्म पूरा होगा और तुम्हे अपने होने का अहसास जगेगा, ... विवेक ही सत्-असत् का भेद करता है, ... बस तुम्हे उसका आदर करना है, ... विवेक विरोधी कार्यों को छोड़ते जाना है, ... सामर्थ्य से परे के कार्यों को भले ही वह सही हों, तुम करना चाहते हो, पर तुम्हारी पहुँच से बाहर के हो, उन्हें छोड़ दो। जो कर सकते हो, उन्हें तुरंत करो, ‘क्षिप्रं भवति धर्मात्मां’,...
स्वतः कार्य की पूर्णता पर शांति उपलब्ध होने लगेगी।
विचार करो-
गुरु, आश्रम, चातुर्मास, सत्संग, शिविर, साधना, क्या ये सब मनोरंजन के साधन होकर नहीं रह गए। लोग कहते हैं, सिनेमा देखने जाएं उससे तो अच्छा है, सत्संग में जाकर प्रवचन सुन आएं।
महत्वपूर्ण बात है, आप चाहते क्या हैं?
अगर आपके जीवन का उद्देश्य मात्र मनोरंजन करना है, तो ठीक है, यहां लोग आते हैं, गृहस्थी की परेशानियों से दुखी हैं, सलाह मांगने आते हैं। आप गृहस्थ हैं, समस्या आपकी है, ... आप सुलझाते क्यों नहीं, क्यों उसे दीर्घकाल तक बनाए रखते हैं, जो दिखता है वह नहीं देखते, जो देखना चाहते हैं, वैसा देखते हैं, मुझसे तो मात्र सहमति लेने आते हो। मैं भी तो शरीर हूं, मैं तो कहीं नहीं गया, ... फिर आप में इतने आत्मविश्वास की क्यों कमी है? कि आप जरा सी परेशानी हुई, यहां भाग आते हैं? मन जब शांत होकर,... जो भी कार्य उपस्थित है, उसमें उत्तेजना रहित लग जाता है, ... तब स्वतः आत्मविश्वास की प्राप्ति होती है।
लेकिन आप, ... जिस पर विश्वास रख सकते हैं, ... कहते हैं, आप का ईश्वर पर दृढ़ विश्वास है, ... उसके द्वारा सौंपे गए कार्य पर पूरा मन नहीं लगाते, जो अप्राप्त है, उसके चिंतन में डूबे रहते हैं, वह कब मिलेगा, पूछने आते हैं, मैं कहता हूं, विचार करो, समझाता हूं, जो प्राप्त हुआ है, उस काम को तो पूरा करो, ... वहां तो मन नहीं लगता, दूसरे का काम, ... उसका चिंतन लगातार बना रहता है।
हमारा दूसरे पर, जो भी हो, जो नित्य नहीं है... परिवर्तनशील है उस पर विश्वास करना क्या उचित है?
दूसरे के साथ आपका संबंध आत्मीयता का हो, ‘आत्मवत सर्व भूतेष’ू, की भावना सदा बनी रहे, ... पर दूसरा सुख देगा,... दुख देगा, मानना व सोचना व्यर्थ है।
हाँ, जो जीवन मिला है, वह महत्वपूर्ण है।
मैंने कहा था- जीवन जीना भी एक कला है, यह सीखी जा सकती है।
जीवन एक पथिक की तरह जीयो। घूमा, फिरा चल दिए, न बांधा, न बंधे,। लोग आते हैं, बताते हैं वे आजकल आध्यात्मिक जीवन जी रहे हैं, सुबह से शाम तक नियमित क्रम में मंदिर जाते हैं, ग्रन्थ पढ़ते हैं, टी.वी. पर धार्मिक चैनल देखते हैं, वे आध्यात्मिक जीवन जी रहे हैं।
कहते हैं, जो कार्य कर रहे हैं, व्यवसाय या नौकरी कर रहे हैं, ...रुपया कमाने की सोच रहे हैं, वे भौतिकवादी हैं। परन्तु वे इस प्रकार के जीवन को छोड़ आए हैं।
जब तक देह है, संसार तो रहेगा ही।
संसार सेे ही देह की सभी आवश्यकताएं पूरी होती है, भौतिकवादी का मतलब है, जो कामना पूर्ति के लिए ही प्रयास करता है, ... फिर कामना का अंत होता नहीं, ... अनावश्यक और आवश्यक का अंतर धीरेे-धीरेे मिटता जाता है, वहां बस कामना पूर्ति ही साध्य रह जाती है, उसे भौतिकवादी कहते हैं। पर जो विवेक की रोशनी में कामना निवृति के मार्ग पर चलता है, वह आध्यात्मिक है, उसका सवाल, ... अपने भीतर की कामनाओं का धीरे-धीरे छोड़ने का होता है।
सन्यासी का मुंडित होना, भगवा पहनना, साधुओं का दिगम्बर हो जाना ये बस प्रतीक हैं। जितने शीष पर केश हैं, उतनी ही कामनाएँ हैं, ... पर आज गृहस्थों की अपेक्षा सन्यासियों की चाहत ज्यादा बढ़ती जा रही है। क्या वे आघ्यात्मिक हैं?
भई! कहीं मत जाओ, जहां भी बाह्य का सहारा लोगे, जब तक वह शक्ति रहेगी फिरकनी घूमती रहेगी। बल हटा फिरनी रुक गई, यही सिद्धांत है। बाह्य से मात्र उद्वीपन होता है, जो घटेगा भीतर ही घटेगा, ... बाहर उसकी गूंज हो, नहीं भी हो, क्या फर्क पड़ता है।
आप जैसे भी है, जहां भी है, अपनी राह पर चलते रहो।
कहाँ जाना है, प्रकृति ने तय कर रखा है,
भूत था जो वह घट गया, उसका परिणाम आज है, वर्तमान है, उससे ही कल का रास्ता जाएगा।
‘कर्त्तुम, अकर्त्तुम’, अन्यथा कर्त्तुम, कुछ भी घट सकता है, तुम्हें मात्र वर्तमान में रहना है। हर स्थान, हर समय, हर घडी उस महान प्रकृति ने दी है। न वहां शुभ है, न अशुभ।
शुभ और अशुभ की परिकल्पना यह जो पाखंड चल पड़ा है, इसने कितना नुकसान पहुंचाया है, यह सब बाद में पैदा हुआ हैं। मैंने पहले भी कहा है, मन फिरकनी की तरह है, बाह्य का बल लगाओ तेजी से घूमती जाती है, बल के हटते ही रुक जाती है। ऐसा मन धीरे-धीरे रुग्ण होता जाता हैं उसी में निराशाआती हैं एक बार बाहर का सहारा लिया, उसकी आदत होती जाती हैं यही दासता है, वहां स्वतंत्रता नहीं मिलती। इससे बचो, मन को स्वतः उत्साहित रखना सीखो। याद रखना उत्साह उसी को मिलता है, जो उत्साहित रहता है। जो प्रसन्न है, वहीं प्रसन्नता रहती है। उत्साह कोई बाजार में मिलने वाली वस्तु नहीं है। यह तुम्हारा कर्म के प्रति निष्ठा है, लगन है। यह स्वतः होनी चाहिए।
तुम्हारा कार्य है, जहां भी हो, वहीं रहो, तुम्हे कहीं भागने की जरूरत नहीं है, दूसरा कोई तुम्हे न तो आनंदित कर सकता है, न ही उत्साहित। साधारण सा सूत्र है, जो कभी हार स्वीकार नहीं करता, वही विजयी होता है। तुम्हें तो मात्र निरंतर कर्तव्य पथ पर कर्मरत रहना है, जो तुमने जाना है, वही विवेक का मार्गदर्शन है। उसका आदर करो उसे आचरण में लाओ, व्यवहार में आते ही, पूर्व में गलत कर्मों का बोझ भी कम होने लगता है, जैसे आग में पुराना काट.-कबाड़, सब जल जाता है, उसी प्रकार विवेक की अग्नि असत् के प्रभाव को उसके दोषों के प्रभाव को भी जलाकर राख करने में समर्थ है। यही साधना है, यही सत्संग है, जो शांति और शक्ति देनों में समर्थ है।
- यात्रा 8
अमृत पथ की अगली कड़ी यहॉ, दी जारही है। सत्संग तथा ध्यान शिविर को लेकर अनेक प्रश्न उठते रहते हैं, यहॉं उनकी अर्थवत्ता पर विचार किया गया है।
स्वामीजी से बार-बार सत्संग शिविर आयोजित करने के लिए कहा जाता था,इसी संदर्भ में उन्होंने एकबार कहा थाः-
मैंने कोई सत्संग शिविर नहीं चलाया, ... लोग आते थे, मुझे समझातेे थे, ... आप मुझसे जुड़े है, मेरे विचारों से जुड़े है, .. आपके मन को इससे लाभ होता है, .. आप आते हैं, आपका आना स्वाभाविक है।
मैं तो कुछ नहीं करता, ... जो होता है, स्वाभाविक होता है, ... और जो होता है, वह आपको ही पता है, ... हाँ यहां में शांत हूं, कोई उत्तेतना नहीं है, कुछ करना नहीं है, ... उस शांति में आप आते हैं, ... आपको शांति मिलती है, .. बस। पर प्रवचन देकर, ... एक निर्धारित क्रम बनाकर रखना, कहना ज्यादती है। इससे मैंने तो कोई लाभ होता देखा नहीं, अहंकार ही बढ़ता है।
सन्यास भले ही हिमालय पर लिया, ... पर मेरा वहां मन नहीं लगा, ... प्रकृति यहां ले आई, यहां आकर, कार्य किया, तब तो यह इलाका बहुत पिछड़ा था, एक बस चलती थी, पैदल ही आता-जाता था, ... सत्य हिमालय पर ही नहीं मिलता, वह तो हर जगह प्राप्त हो सकता है।
हम क्या चाहते हैं, हम ही निश्चित नहीं है।
जो सबका कारण है, जोे शरीर, मन, बुद्धि, सबसे परे है, ... उसे क्या हम एक स्थान, एक व्यक्ति, एक वातावरण का सहारा लेकर पा सकते हैं?
जो स्वयं नाशवान है,... आप उसका लेते हैं। व्यक्ति से जुड़ते हैं, या विवेक से। आपके पास भी विवेक है, पर उसका आदर न होने से वह सुप्त है,... गुरु देह नहीं, साक्षात विवेक होते हैं?... जहा देह पूजा है, वहां विवेक अनुपस्थित है। अनंत यात्रा में कुंभका कथन है- नीलकंठ से-‘अब तुम्हारा विवेक जागृत हुआ है, हो सकता है, इसके बाद मेरा शरीर भी नहीं रहे’, गुरु का कार्य शिष्य का विवेक जगाना है, पर आज तो अपहरण ही होना रह गया है।
वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति, सभी परिवर्तनशील है, इनका आश्रय मत लो, तुमने चाहा था, ... तुम्हे कब आत्म ज्ञान होगा, ... जब तुम्हारा कर्तव्य कर्म पूरा होगा और तुम्हे अपने होने का अहसास जगेगा, ... विवेक ही सत्-असत् का भेद करता है, ... बस तुम्हे उसका आदर करना है, ... विवेक विरोधी कार्यों को छोड़ते जाना है, ... सामर्थ्य से परे के कार्यों को भले ही वह सही हों, तुम करना चाहते हो, पर तुम्हारी पहुँच से बाहर के हो, उन्हें छोड़ दो। जो कर सकते हो, उन्हें तुरंत करो, ‘क्षिप्रं भवति धर्मात्मां’,...
स्वतः कार्य की पूर्णता पर शांति उपलब्ध होने लगेगी।
विचार करो-
गुरु, आश्रम, चातुर्मास, सत्संग, शिविर, साधना, क्या ये सब मनोरंजन के साधन होकर नहीं रह गए। लोग कहते हैं, सिनेमा देखने जाएं उससे तो अच्छा है, सत्संग में जाकर प्रवचन सुन आएं।
महत्वपूर्ण बात है, आप चाहते क्या हैं?
अगर आपके जीवन का उद्देश्य मात्र मनोरंजन करना है, तो ठीक है, यहां लोग आते हैं, गृहस्थी की परेशानियों से दुखी हैं, सलाह मांगने आते हैं। आप गृहस्थ हैं, समस्या आपकी है, ... आप सुलझाते क्यों नहीं, क्यों उसे दीर्घकाल तक बनाए रखते हैं, जो दिखता है वह नहीं देखते, जो देखना चाहते हैं, वैसा देखते हैं, मुझसे तो मात्र सहमति लेने आते हो। मैं भी तो शरीर हूं, मैं तो कहीं नहीं गया, ... फिर आप में इतने आत्मविश्वास की क्यों कमी है? कि आप जरा सी परेशानी हुई, यहां भाग आते हैं? मन जब शांत होकर,... जो भी कार्य उपस्थित है, उसमें उत्तेजना रहित लग जाता है, ... तब स्वतः आत्मविश्वास की प्राप्ति होती है।
लेकिन आप, ... जिस पर विश्वास रख सकते हैं, ... कहते हैं, आप का ईश्वर पर दृढ़ विश्वास है, ... उसके द्वारा सौंपे गए कार्य पर पूरा मन नहीं लगाते, जो अप्राप्त है, उसके चिंतन में डूबे रहते हैं, वह कब मिलेगा, पूछने आते हैं, मैं कहता हूं, विचार करो, समझाता हूं, जो प्राप्त हुआ है, उस काम को तो पूरा करो, ... वहां तो मन नहीं लगता, दूसरे का काम, ... उसका चिंतन लगातार बना रहता है।
हमारा दूसरे पर, जो भी हो, जो नित्य नहीं है... परिवर्तनशील है उस पर विश्वास करना क्या उचित है?
दूसरे के साथ आपका संबंध आत्मीयता का हो, ‘आत्मवत सर्व भूतेष’ू, की भावना सदा बनी रहे, ... पर दूसरा सुख देगा,... दुख देगा, मानना व सोचना व्यर्थ है।
हाँ, जो जीवन मिला है, वह महत्वपूर्ण है।
मैंने कहा था- जीवन जीना भी एक कला है, यह सीखी जा सकती है।
जीवन एक पथिक की तरह जीयो। घूमा, फिरा चल दिए, न बांधा, न बंधे,। लोग आते हैं, बताते हैं वे आजकल आध्यात्मिक जीवन जी रहे हैं, सुबह से शाम तक नियमित क्रम में मंदिर जाते हैं, ग्रन्थ पढ़ते हैं, टी.वी. पर धार्मिक चैनल देखते हैं, वे आध्यात्मिक जीवन जी रहे हैं।
कहते हैं, जो कार्य कर रहे हैं, व्यवसाय या नौकरी कर रहे हैं, ...रुपया कमाने की सोच रहे हैं, वे भौतिकवादी हैं। परन्तु वे इस प्रकार के जीवन को छोड़ आए हैं।
जब तक देह है, संसार तो रहेगा ही।
संसार सेे ही देह की सभी आवश्यकताएं पूरी होती है, भौतिकवादी का मतलब है, जो कामना पूर्ति के लिए ही प्रयास करता है, ... फिर कामना का अंत होता नहीं, ... अनावश्यक और आवश्यक का अंतर धीरेे-धीरेे मिटता जाता है, वहां बस कामना पूर्ति ही साध्य रह जाती है, उसे भौतिकवादी कहते हैं। पर जो विवेक की रोशनी में कामना निवृति के मार्ग पर चलता है, वह आध्यात्मिक है, उसका सवाल, ... अपने भीतर की कामनाओं का धीरे-धीरे छोड़ने का होता है।
सन्यासी का मुंडित होना, भगवा पहनना, साधुओं का दिगम्बर हो जाना ये बस प्रतीक हैं। जितने शीष पर केश हैं, उतनी ही कामनाएँ हैं, ... पर आज गृहस्थों की अपेक्षा सन्यासियों की चाहत ज्यादा बढ़ती जा रही है। क्या वे आघ्यात्मिक हैं?
भई! कहीं मत जाओ, जहां भी बाह्य का सहारा लोगे, जब तक वह शक्ति रहेगी फिरकनी घूमती रहेगी। बल हटा फिरनी रुक गई, यही सिद्धांत है। बाह्य से मात्र उद्वीपन होता है, जो घटेगा भीतर ही घटेगा, ... बाहर उसकी गूंज हो, नहीं भी हो, क्या फर्क पड़ता है।
आप जैसे भी है, जहां भी है, अपनी राह पर चलते रहो।
कहाँ जाना है, प्रकृति ने तय कर रखा है,
भूत था जो वह घट गया, उसका परिणाम आज है, वर्तमान है, उससे ही कल का रास्ता जाएगा।
‘कर्त्तुम, अकर्त्तुम’, अन्यथा कर्त्तुम, कुछ भी घट सकता है, तुम्हें मात्र वर्तमान में रहना है। हर स्थान, हर समय, हर घडी उस महान प्रकृति ने दी है। न वहां शुभ है, न अशुभ।
शुभ और अशुभ की परिकल्पना यह जो पाखंड चल पड़ा है, इसने कितना नुकसान पहुंचाया है, यह सब बाद में पैदा हुआ हैं। मैंने पहले भी कहा है, मन फिरकनी की तरह है, बाह्य का बल लगाओ तेजी से घूमती जाती है, बल के हटते ही रुक जाती है। ऐसा मन धीरे-धीरे रुग्ण होता जाता हैं उसी में निराशाआती हैं एक बार बाहर का सहारा लिया, उसकी आदत होती जाती हैं यही दासता है, वहां स्वतंत्रता नहीं मिलती। इससे बचो, मन को स्वतः उत्साहित रखना सीखो। याद रखना उत्साह उसी को मिलता है, जो उत्साहित रहता है। जो प्रसन्न है, वहीं प्रसन्नता रहती है। उत्साह कोई बाजार में मिलने वाली वस्तु नहीं है। यह तुम्हारा कर्म के प्रति निष्ठा है, लगन है। यह स्वतः होनी चाहिए।
तुम्हारा कार्य है, जहां भी हो, वहीं रहो, तुम्हे कहीं भागने की जरूरत नहीं है, दूसरा कोई तुम्हे न तो आनंदित कर सकता है, न ही उत्साहित। साधारण सा सूत्र है, जो कभी हार स्वीकार नहीं करता, वही विजयी होता है। तुम्हें तो मात्र निरंतर कर्तव्य पथ पर कर्मरत रहना है, जो तुमने जाना है, वही विवेक का मार्गदर्शन है। उसका आदर करो उसे आचरण में लाओ, व्यवहार में आते ही, पूर्व में गलत कर्मों का बोझ भी कम होने लगता है, जैसे आग में पुराना काट.-कबाड़, सब जल जाता है, उसी प्रकार विवेक की अग्नि असत् के प्रभाव को उसके दोषों के प्रभाव को भी जलाकर राख करने में समर्थ है। यही साधना है, यही सत्संग है, जो शांति और शक्ति देनों में समर्थ है।
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