24 अमृत पथ विश्वास
स्वामीजी कह रहे थेः-
”एक ही सवाल को बार-बार पूछते हो क्यों, ...
जो यात्रा है, उस पर तुम्हारा विश्वास नहीं है। हर बात को हर परिस्थिति को खकोल- खकोलकर देखते हो, चैन नहीं लेने देते, इतना सोचते हो, इतनी कल्पना कर लेते हो कि, ... वो सत्तू वाली कहानी बताई थी। उसने एक घड़ा सत्तू रख लिया, मेहनत से बच गया, लगा सोचने क्या करेगा? इसका, झपकी लग गई। सपने में उसने सत्तू बेचा, भुनाया हुआ, फिर और बनाया, ... उसे बेचा, ... और धन कमाया, ... फिर विवाह कर लिया, ... फिर बच्चा हुआ, .. एक दिन बच्चे से किसी बात पर नाराज हो गया, ... गुस्से में लात चलाई, घड़े के लगी, घड़ा टूट गया, ... यही हालत है, ... इतना क्यों सोचते हों...?
यही मन की दुर्बलता है, ... मन की गति मन की कमजोरी है। ... विश्वास स्वयं के प्रति होना चाहिए, वह आप में नहीं है।
चाहते हो, आत्मविश्वास रहे, ... उसके लिए यह अभ्यास है।
जो आपने माना है, ... उस पर विश्वास सौ टका होना चाहिए। मैंने पहले भी बताया था कि जो लोग कुछ नहीं जानते हैं, कम पढ़े लिखे होते हैं, जो धूनी रमाए बैठे हैं, वो कुछ कह देते हैं, ... वैसा हो जाता है, उनकी मान्यता बढ़ती जाती है, क्यों?
उनका जो भी माना गया है, उस पर विश्वास सौ टका होता है, वो ज्यादा सवाल-जवाब करते ही नहीं हैं। आप जितना सोचोगे, उना ही आपका मन कमजोर होता जाएगा। संकल्प तो उठा नहीं, विकल्प पचास आ जावेंगे। यह जो मन है, जो निरंतर कतर-बतर करता है रहता है, इससे पूछो, ... इसने कहीं लाभ भी दिया है, ... इसके पास सारी दुर्बलताओं का लेखा-जोखा रहता है, ... इसके उठते ही जो विचार आता हे, उसे देखों, ... शांत भाव से देखो। नहीं दिखता है, जिसने विचार उठाया है, ... जो उठा है, उसे देखो, इससे क्या होगा, देखने वाला जो है, वह ताकत ले लेगा। जो दिख रहा है वह धीरे धीरे दर्पण से हटता चला जाएगा। वह आता तो बहाने के लिए है, पर आपको उसके साथ बहना नहीं है। उसका आदर नहीं होते ही, बहना भी कम होने लगेगा।
इसके लिए व्यवहार में भी परिवर्तन लाओ,
इतने साल हो गए हैं, समझाते-समझाते, पर मुझे तो कोई परिवर्तन दिखाई नहीं पड़ता। पुरुषार्थ है, लगन है, बस,...
पर होता क्या है, यहां बैठे हैं, चार लोग आए है, आप बातों में उलझ गए हैं। क्या कहना है, क्या नहीं कहना है, कुछ पता नहीं। अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए जिसे बता रहे थे, ... उन्हें बताने से क्या फायदा ,जो कुछ समझना चाहते ही नहीं है, उनसे फालतू सिर खपाने से क्या लाभ है? हर व्यक्ति की योग्यता अलग-अलग होती है।यहां लोग अखबार पढ़कर बहस करने आते हैं। उसमें उलझने से अपनी शक्ति ही घटती है। कभी सोचा है, किता अनर्गल बोलते चले जाते हैं।
जो वो कहते हैं, सुन लो, बहस की कोई जरूरत नहीं है।
लोग काम बताते हैं, बिना मतलब के तो कोई नहीं आता है।
उसे सुन लो, हो सकता है, रास्ता बता दो, इशारा कर दो, उसके भाग्य में होगा, प्रकृति की इच्छा होगी, हो जाएगा।
यही तो होना है, हो जाएगा, नहीं होगा, कुछ और हो जाएगा, पर आप अनावश्यक उसमें पूरी ताकत लगा देते हो, क्यों? अपनी प्रशंसा सुनने के लिए क्या फायदा?
...
आपका प्रयास, सुझाव, संकल्प, निश्चित मात्रा है। प्रकृति की इच्छा से और उसके पूर्व संकल्पों पर पुरुषार्थ से उसे फल की प्राप्ति होगी, ... पर आप उसमें भी अटक जाते हैं, प्रकृति की इच्छा से ही आप करते हैं, करन भी चाहिए, हानि-लाभ होगा या नहीं, उस पर छोड़ देना चाहिए।
यही नहीं होता है,
आपको पता है यह कार्य विवेक विरोधी है, फिर भी करते हो, क्यों?
वह कार्य कभी भी नहीं करना चाहिए जिसे कर नहीं सकते, ... नहीं करना चाहिए, ... पर हम करते हैं, रुचि से करते हैं।
जो भी कार्य हमें प्राप्त हुआ है, उसके लिए परिस्थिति को वैसा ही होना था, ... ऐसा क्यों होता है, ... यह एक प्राकृतिक विधान है। हमें हर परिस्थिति में कर्तव्य परायण होना है। भागना नहीं है। परिस्थिति का सदुपयोग करना है, वह मात्र होता है, उस परिस्थिति के अनुसार जो भी कार्य निर्धारित हुआ है उसमें अपने मन को पूरी तरह शांत उत्तेजना रहित लगा देने से।
हम कितना यह कर पाते हैं। सोचो। उस दिन बताया था, ... पहले नगर में एक अस्पताल होता था, तीन-चार डॉक्टर बस! आज डॉक्टर भी सैकड़ों होते हैं, कई-कई अस्पताल खुले हुए हैं। बीमारियां भी नई नई आती जा रही है। पहले इनका नाम भी नहीं सुना था।
क्यों?
कभी विचार किया है।
प्रकृति, जगन्नाथ है, देती है, तो लेने वाले के दो हाथ होते हैं, कितना लेगा।
पर उसके तो हजारों हाथ हैं। अपने विराट स्वरूप में भगवान ने यही तो बताया है, वहाँ हजारों हाथों से छीन लिया जाता है।
मन जब तक चंचल रहेगा, मलिन रहेगा, ... अनावश्यक विचारणा में और भी विध्वंसात्मक बना रहेगा, जब तक कि जो माना गया है, उस पर दृढ़ विश्वास नहीं होता है।
विश्वास की कमी, मन को चंचल बना देती है।
विश्वास एक बार आने के बाद जाता नहीं है। वह और गहरा होता है। पहले गुरु-शिष्य संबंध जो होते थे, ... उनके बीच में यही संबंध था। जो अटूट था, वैसा आज नहीं है।
आज तो कोई बात मानने वाला ही नहीं है। इस कान से सुनी दूसरे कान से निकाल दी। जो मतलब की बात हुई, ... जिससे आपकी आवश्यकताओं की पूर्ति हुई उन्हें स्वीकार किया, जो नहीं जॅची, यहीं छोड़ दी।
यहां कोई सुनने और समझने नहीं आता, सब मुझे समझाने और बताने तथा अपनी विचारधारा की पुष्टि मुझसे करने आते हैं।
जब विश्वास घना होने लगता है, तब व्यवहार में अपने आप परिवर्तन आने लगता है, उससे जो जाना गया है, उसका आदर होने लगता है। जब सच, बोलने का स्वभाव बनने लगता है,, पहले बोला कभी नहीं था... पर अब जब वह स्वभाव का अंग बनने लग जाता है, भाषा में गलत व गंदा बोलना कम होने लगता है। पहले परिवर्तन भाषा में दिखाई पड़ता हैं,... फिर व्यवहार में आता है। तब दोष कम होने लगते हैं।“
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