Saturday, October 19, 2013

अमृत पथ 17 यात्रा 2

अमृत पथ 17 यात्रा 2



प्रश्नः- क्या जीव की यात्रा अनवरत हैः-

स्मृतियां ही यात्रा कराती हैं। वे ही गर्भ  की तलाश करती हैं, ... फिर वहां जन्म हो जाता है,
ज्ञानी का भी  अगर कुछ शेष रह जाता है, ... उसे भी आना पड़ जाता है। पर यहां बीवपबम रह जाती है, ... वह चाहे तो आए, ... अन्यथा नहीं। जहां कामना है, वहां बंधन रह जाता है। कामना की डोर खींचती है वह खिंचता चला आता है। ये जन्म मजूबूरियों से होते हैं, आना ही होगा, ... ज्ञानी अपनी इच्छा से या प्रकृति की इच्छा से आता है, कुछ कार्य होगा जो पूरा करना होगा।

मुझे बचपन से ही मन की स्थिरता का पता लग गया था। कई बार बहुत देर तक मन, ... ठहर जाता था, ... अन्तर्मुखी अवस्था हो जाती थी, पर इस बारे में पता नहीं था। फिर इंजीनियर साबह से मिलना हुआ, उन्होंने समझाया, ... परंपरागत साधनाए की थीं, ... पर यही सब पता लगता गया  कि यही मंजिल नहीं है।,...
यह चक्र है, चलता रहता है, जब शरीर छूटता है, ... मिट्टी मिट्टी में मिल जाती है, संस्कार भटकता है, ... वहां इन्द्रिय तो है नहीं, ... अनुभव क्या होगा, ... एक भटकाव है।

पहले बताया था न, ... कुटिया में रात को, ... एक बीम सी गुजर जाती थी, आत्माएं झुंड में रहती है, जो ज्यादा शक्तिशाली होती है, वह चमकती है, तेज, र्स्फुलिंग की तरह, उसके पास एक घेरा बन जाता है। हां, गलत भी होती है, उन्हें अपने कर्म भोगने होते हैं, वहां समय नहीं है, ... समय तो शरीर को अनुभव होता है, स्वप्न में समय कहां चला जाता है, वहां स्थान भी नहीं होता है। योगवशिष्ठ में कहानियां आती है, पढ़ी होगी, यहां मात्र स्वप्न होता है, वहां एक युग बीत जाता है।

वहां शक्ति नहीं होती है, अनुभव वहां भी है, सूक्ष्म देह रहती है, ... ज्ञानी को जन्म की स्वतंत्रता है, और मृत्यु की भी, ... वह इच्छा मृत्यु प्राप्त कर लेता है, भीष्म पितामह की कहानी सुनी होगी।

जो ज्ञानी है, वहां संबंध वासना का नहीं रहता, कामना का नहीं रहता, मात्र करुणा का रहता है, गृहस्थ के लिए कर्तव्य पालन, तुम्हें बस दे देना है, लेना  नहीं है,

जो लेता है, वह याचक है, याचक का हर काम अहंकार में होता है, जहां गृहस्थ हो या संन्यासी, ... मैंने कहा था न, जब संन्यास लिया तब पहला संकल्प यही लिया था, ... भिक्षा नहीं लूंगा, जब हरिद्वार में गुरुजी ने भेजा तो मैंने मना कर दिया, ... भिक्षा नहीं, यही कारण था जब बकानी आया, ... तो छात्रों को पढ़ाना शुरू कर दिया, ... गुरुकुल चलाया, काम किया, अठारह- अठररह घंटे  मैंने काम किया, ... कोई सन्यासी काम नहीं करता, ... पर क्यों ,संकल्प था भीख नहीं लेनी।

पहले के ऋषि भिक्षा को जाते थे, तो  कुछ देकर आते थे, ... वे वचन शास्त्र बन गए, उनके पास करुणा  थी।

कई बार ऐसा होता है, शक्ति आई, ज्ञान आया पर उसका उपयोग नहीं हो पाता है, आयु या तो क्षीण हो जाती है या वृद्धावथा आ जाती है, ... प्रकृति का अपना नियम है...
तब भांडा फूटने के बाद भी, संकल्प शेष रह जाता है, तो आना पड़ता है यही गुरु-भेद है, गुरु बनते नहीं है, चार किताब पढ़कर गुरु नहीं बना जाता, .. ब्रह्मनिष्ठ गुरु की जो परंपरा है, वह सदा से चली आई है।

यहां गुरु की पढ़ाई नहीं होती, ... वह तो स्वतः आता है, पूर्व का ज्ञान, ... उसकी संपदा का जब शिष्यों का मार्गदर्शन करना चाहती है, तो उसे आना पड़ता है, यहां शिष्य गुरु को तलाश नहीं करते, गुरु स्वयं शिष्य को ढूंढ़ता है, ... जो कार्य अधूरा रह गया था उसे पूरा करना होता है।
हाँ,
तब साधना के दिन थे,... गुरुकुल सरकार को सौंप दिया था, जो प्रयोग करने थे, उसका समय आ गया था, ...
यहां बस एकांत था, ... लाईट भी नहीं थी लालटेन थी। लाइट तो आपके आने के बाद आई।

”हां, तब एक सांप भी यहां आया करता था,“
‘‘हां, दरवाजे पर बैठा रहता था।’’
(स्वामी जी हंसे)
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..तभी प्रयोग हुए थे, ... खुशबू जो आपने पूछी थी,, अगरबत्ती मैंने तो कभी प्रयोग में नहीं लाई, जब लोग आते थे, यही कहते थे। अगरबत्तियां महक रही है।
मैं कहता, जाओ देखो कौन लगा गया हे, वो कहते हैं यहां अगरबत्तियां तो है नहीं,...
मैं क्या कहता...
जब परकाया प्रवेश का प्रयोग किया था, उसके बारे में अनंतयात्रा में लिखा है, खतरनाक होता है। ये सूक्ष्म शरीर के प्रयोग हैं,ै, ये भी तभी किए थे।

 मन की प्राण की युति ही योग है। मन में स्मृति है, पर शक्ति प्राण में है। बिना प्राण की शक्ति के मन काम नहीं कर सकता है। पर इसके पूर्व, निरंतर निर्विकारता में रहने का अभ्यास होना चाहिए। यह अवस्था जब निरंतर होने लगती है तब बाह्य स्मृतियों का दबाब भी हटने लग जाता है।
तब जन्म और मृत्यु का रहस्य खुलता है।

महाभारत,... मैंने महाभारत के दृश्य यहां मैदान में देखे थे।, ... विजन आते थे, ... न जाने कहां- कहा,ॅं हजारों साल की यात्रा यह मन कर लेता है, सब खुलता है,  तब निर्विचरता में प्रवेश होता है।
जो है, जो  था, सब का खुल जाना है,। चित्त की शुद्धि का यही रहस्य है। चित्त, संस्कारों के साथ ही तो आता जाता है। एक आलपिन की नोक पर हजारों आत्माएं रह सकती है। मन सहित आत्मा ही जीवात्मा है। यही आवागमन कारण है। यही बंधन है। यहीं मुक्ति का रहस्य है।

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