Wednesday, October 23, 2013

20 योग

20    योग

स्वामीजी कह रहे थेः-
”शारीरिक क्रियाएं योग नहीं हैं।
व्यायाम करते रहना चाहिए, इससे शरीर सबल होता है। शरीर ही अगर दुर्बल हो गया तो साधन कौन करेगा।

योग की उपलब्धि परिश्रम से नहीं होती।
यहां श्रम नहीं, विश्राम होता है,
उसकी प्राप्ति के लिए सभी समर्थ हैं।
मैंने पहले भी कहा- मन और प्राण की युति ही योग है।
योग से आप उससे जुड़ जाते हैं, ... जिसे अपना अपना मानते हैं,
अभी आप संसार से प्रतिपल जुड़े हुए हैं। यह योग-संयोग है, या वियोग भी हर पल रहता है,
मकान, देह, आजीविका, वस्तु, कहीं से भी आप जुडं़े, सब विनाशशील है,

पर आपका अस्तित्व सनातन है,
उससे अभिन्न होते ही, फिर वियोग नहीं होता
हम अपने स्वरूप में स्थित हो जाते हैं
ज्ञाता, ज्ञेय, ज्ञान की त्रिपुटी एक हो जाती है।
जब तक भोग  की रुचि रहेगी, योग नहीं होगा।
भोग की मांग बढ़ती जाएगी, आप योग से दूर होते चले जाएंगे।

आपके भीतर योग की मांग बढ़नी चाहिए।
तब क्या होता है।
विषय जो आपको बाहर खींच रहे थे, अपनी सत्ता के कमजोर पड़ते ही, इन्द्रियों में डूब जाते हैं, इन्द्रियां स्वतः मन में डूबती है, ... मन स्थिर होगा, बुद्धि में स्थित हो जाता है, ... समत्वं योग उच्यते, ... समता प्राप्त होना ही है। भई! करना यहां कुछ भी नहीं है।
येाग कोई शारीरिक क्रिया नहीं है,
निर्विकल्पता में ही मन और प्राण की युति संभव है।

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