Saturday, October 5, 2013

11 अनुभव 2

11 अनुभव 2

स्वामीजी अस्वस्थ थे,शाम के समय वे मिलने वालों के प्रश््रनों के उत्तर दिया करते थे, यहाँ उन संवादों का सार संक्षेप हैः-

”हाँ, जो करना था, वह तो बहुत पहले हो चुका था... कई बार विचार उठा कि जो करना था, ... वह तो हो चुका, शरीर को क्यों रखा जाए , क्या प्रयोजन है?

 बहुत पहले आपको बताया था ,
स्वप्न आया था , मैं समुद्र के किनारे खड़ा हँू, ... और सोच रहा हूं,
रामतीर्थ की तरह इहलीला समाप्त करें,
मैं समुद्र में चलने लगा, धीरे-धीरे बढ़ता रहा, ... कमर तक पानी आ गया,
... मैं आगे बढ़ता रहा, गले तक आ गया,...
तभी अचानक लगा किसी ने धक्का दिया...
पाया मैं बड़ी सी नाव के पास खड़ा हूं। सिपाही ने मुझेपकड़ लिया है, वह कह रहा है, क्या मरने चले थे...
तब लगा कि अभी वक्त नहीं आया है,रहना है..।
.
तब इस सेवा प्रतिष्ठान का कार्य प्रारम्भ किया, ... सेवा क्या है,
बड़े वृक्ष के नीचे जो आ जाएगा, उसे छाया देनी है, उसने पूछा ,सुना
हो सकता है, संकेत  कर दिया, ... शारीरिक सेवा तो इस उम्र में कहां हो सकती है, हाँ, मानसिक सेवा सुबह से रात तक चल ही रही है।.

फिर पता ही नहीं चलता, .. कब कौन आया था, क्या सोच रहा था, वही आकर बताता है, कि वह कुछ सोचकर पहले आया था, ... उसका कार्य हो गया, ... वह यह बताने आया है।
मैं तो कुछ करता नहीं, ... मुझे मालूम भी नहीं होता, जो होना है वही होना है, अपने आप हो जाता है, उसके संकल्पों को दिशा मिल जाती है। यहां तो कुछ है ही नहीं, क्या करना है, यह भी नहीं है।“

प्रश्न था क्या यह करुणा है?
यह शब्द भी गलत है। जहॉं कोई दूसरा है, वह आपसे छोटा है, उसके लिए कुछ किया करुणा है। यहॉं दूसरा रहा ही नहीं। जो होना है, अपने आ हो जाता है। आप आनंद में हैं, आपके और उसके बीच का संबंध मात्र प्रेम है।

हम सभी चुप थे, पर भीतर से आशंकित भी, पर स्वामीजी निर्लिप्त , शांत उठकर बैठ गए थे।

”एक ही सवाल को कितनी बार आपने पूछा है, - बात तो एक ही है,
आप घुमा फिरा कर बार बार पूछते हो,
मन का जो अनावश्यक भटकाव  है, निरंतर विचारणा में जो लगा रहता है, वह रूक जाए, यही साधना है।
आज जो भी आता है, वह बर्हिमुखी है, उसका मन चंचल भी है, विकारी भी है, उसे अपने ऊपर विश्वास भी नहीं है, न ही वह कुछ करना चाहता है, वह चाहता है, उसे आशीर्वाद मिल जाए, और वह जागृत हो जाए, उसकी मनोकामना पूरी हो जाए, .. लाभ और लोभ दोनों प्राप्त हो।“

”पूरे देश में एक करोड़ से ऊपर लोग होंगे, जो आध्यात्म की  दुकानें खोलकर बैठे हैं। किताबों में कहानियां है, वो सुना देते हैं, ... सुना रहे हैं, संगीत से सुनाते हैं, मनोरंजन हो रहा है। साधना मनोरंजन नहीं है। वह पहले कहानी उस पंडित की भी सुनाई थी ने, जो भागवत बांचते थे, राजा को सुनाने गए थे। राजा ने कहा पंडित जी फिर आना अभी आप में कुछ कमी है।उन्हें बुरा लगा, घर गए,दुबारा कठोर अभ्यास किया।, .. फिर दुबारा गए, राजा ने फिर वही कहा, अंत मंे पंडित जी घर छोड़कर जंगल में चले गए। वहां जाकर तैयारी करेंगे। फिर आकर राजा को सुनाएंगे। परन्तु वे आए ही नहीं, फिर राजा उनकी खोज में गया। पंडित जी मिले, राजा ने कहा- वह कथा सुनने आया है। तब पंडित जी हंसे, बोले राजा अब कथा ही नहीं रही, न सुनने वाला रहा, न सुनाने वाला रहा है।

 सार, अंतर्मुखता की प्राप्ति का होना है। वह होती है, निरंतरता वर्तमान में रहने से। पर यही नहीं होता। आज सभी बाहिर्मुखी हैं। जो  बात खुद कह रहे हैं, वह उनके आचरण में नहीं है। उनका उस पर ही विश्वास नहीं है। अर्थ है, तो पालन करो, ... आचरण में लाओ, ... फिर तुम्हे कहीं भागने की जरूरत नहीं होगी। ‘सियाराम मय सब जग जानी, करहुं प्रणाम जोरी जुग पानी,’ सब जगह वही है, तब मात्र सेवा ही शेष रह जाती है। अपने पॉंव छुआने का,, रोली लगाने का, मालाएं पहनने का,, ये जो स्वांग भरा जाता है, इसकी भी जरूरत नहीं रहती।“

हम बाहर बैठे थे, पांव में जो घाव था उसकी ड्रेसिंग हो चुकी थी, ... बाहर हल्की धूप थी।

स्वामीजी कह रहे थे,”जब नमक का पुतला सागर की गहराई नापने गया, तो खुद ही गलकर एकाकार हो गया,...
वहां जाकर, कौन आया है, बताने, वहां क्या शेष बचता है,

पर इस अवस्था में जब देहांत होता है, तब?प्रश्न था।
”जो सबका होता है, वही होगा, मिट्टी मिट्टी में मिल जाएगी, बस एक बूंद समुद्र में मिल गई, तब क्या होगा, वह रही है कहां है, जो बताएगी, ।“...

”हाँ,, जब संस्कार  ही नहीं बचा है, ... तब सब खाली हो गया तब..तो यह संभव है,.पर साधारण पुरुष का क्या अंत होगा? प्रश्न था।

”साधारण, असाधारण क्या, ... जो पैदा होता है, ... वह मरता है, ... शरीर पंच महाभूतों से बना है, वह उनमें मिल जाता है। संस्कार जो है, वह शेष रहता है, गुण संस्कार  में है, ... मन तो गति है। वही सूक्ष्म शरीर है, ..वह तो रहेगा, ... अनुकूल वातावरण मिलने पर जैसे बरसात में न जाने कितने कीट पतंगे, वनस्पतियां उत्पन्न हो जाती है,... वह जन्म ले लेता है, ... न भी ले,... जैसा उसका संस्कार है, ... मनुष्य जीवन का उद्देश्य, अंतर्मुखता प्राप्त होने पर ही  उसे पता लगता है, ... बहिर्मुखी तो भटकता रहता है। यही माया है।

हां, सब यहीं है, कुछ भी खाली नहीं है। एक आलपिन की नौक पर सैकड़ों संस्कार रह सकते हैं। मात्र बबूला,,... एक हवा, ... शरीर तो है नहीं, वह तो संस्कार को आकर मिलता है।

क्रिया के लिए इन्द्रियां चाहिए, ... बिना इन्द्रियों के सब व्यर्थ है। मनुष्य जीवन भी इसीलिए सर्वश्रेष्ठ कहा है। पशुओं के पास मस्तिष्क नहीं है। सोच-समझ नहीं है। प्रयास वे नहीं कर सकते। और जो मूक शरीर है, उसे भी गति के लिए, विकास के लिए शक्ति चाहिए, जो उसके पास नहीं है।
बहस में पड़ना बेकार है।“



”तुम्हारा रास्ता ठीक है, या गलत है, इस सोच में पड़ना बेकार है।
जो रास्ता तुम्हे मिला है। उस पर चलो,
मैंने कोई रास्ता नहीं बताया, ... तुम चलोगे, और लगन सच्ची है, तो तुम अंतर्मुखी हो जाओगे, ... यह सच है।
यहीं आकर सारे रास्ते अपनी पहचान खो देते हैं।
अतः इस भूल भुलैया में पड़ना बेकार है,
इसीलिए मैंने कभी रास्तों की चर्चा ही नहीं की।
एक ही बात बताई,
सुबह बिस्तर से उठने से पहले और रात को सोते समय, ... थोड़ा अभ्यास नियमित करो और अभ्यास भी क्या, ... अपने विचारों को कम करने का प्रयास करो, ... रास्ता मात्र अवलोकन का है, ... इसमें धीरे-धीरे विचार और विचार के बीच में जो अन्तर है, वह अनुभव होगा। धीरे धीरे बढ़ता जाएगा, ... उस अवस्था में नींद भी आ जाए तो अच्छा  है, हो सकता है, शुरू में सपने बढ़ जाएॅं, ... पर घबराओ मत, ... यहीं अंतर्मुखता की चाबी है।“
अनंतयात्रा में कहा है, ”कभी अतीत में झांकने का प्रयास मत करना, कभी भविष्य को जानने का प्रयास मत करना।
वर्तमान में रहने की यही कला है, स्मृति पाप है, हमेशा यह बोध बना रहे। सजगता यह रहे। जो भी क्षण है, जहॉं जो क्रिया है, मन पूरी तरह वहीं रहे। जो कल होने वाला है, उसकेलिए लखिा है, ”कर्तुम, अकर्तुम , अन्यथा कर्तुम कुछ भी घट सकता है। सब प्रकृति र छोड़दो, अनावश्यक विचारण अपने आप छूट जाती है।

”साधना जीवन और जगत को काटकर नहीं हो सकती। मैंने कभी भी अलग से बैठकर, आँख भींचने को नहीं कहा। ये जो ध्यान सिखाते हैं, समाज और जीवन से काटकर बात करते हैं। सभी दिशाएं अच्छी हैं, सारे कमरे अच्छेे हैं, जीवन और जगत में जो तनाव रहित, शांत मन से जो भी क्रिया हो अधिक से अधिक मन को वहीं रखने का प्रयास करना चाहिए, यही सुमिरन है। पर क्या कर रहे हैं, घर से भाग रहे हैं, कहीं अलग जगह ले जाते हैं, कहते हैं यहां साधना शिविर है। एक उलझन पैदा करते हैं। हर व्यक्ति , हर परिवार उलझता जाता है। जितने आदर्श घड़ोगेे उतना ही पाखंड बनेगा। व्यक्ति  का आत्मविश्वास टूट जाता है।“

”पुराना, ... जब प्रकृति ने ही नहीं रखा...
तुम क्यों पीछे पड़ते हो।
यहां सब बदलता है। नित नई विचार धारा आती है। नहीं हो तो प्रकृति अपना कार्य करना बंद कर दे। यहां जो आज है, कल नहीं रहेगा, जो कल था वह आज कहां है?
इसीलिए किसी एक बात पर चिपककर बैठ जाना उचित नहीं है।
पुराने तरीके आज काम नहीं आ सकते। हम जो पुराने ग्रन्थों को, लीक पकड़कर परिपाटी की तरह पढते चले आ रहे हैं, वहां सवाल करना चाहिए, इससे कुछ फायदा भी हो रहा है, क्या..?
जो छूटता है, छूट जाने दो, ...
जो तुम्हारा अनुभव बनेगा, वह सच्चा होगा, वह तुम्हारा है। सनातन धर्म का मतलब होता है, जो सदा है, ... कल भी था, आज भी है, कल भी रहेगा, इसीलिए रास्ते को लेकर चलना उस पर बहस करना अब बेकार है। बाहर तो मात्र बहिर्मुखता है, ...उसके बाहर आना है। फिर जो है, सदा से है,उसकी अनभूति होने लगेगी, ... वहीं शांति है,, वहीं शक्ति भी है। समय के साथ भाषा बदल जाती है, कहने का तरीका बदल जाता है ।पर जोे कहा जाता है, ... जो शब्दों से भी परे हैं, वह महत्वपूर्ण है।

 गीता के दूसरे अध्याय में स्थितप्रज्ञ के जो लक्षण है, वे अंतर्मुखी व्यक्ति के है।, ... वहां पर सब रास्ते आकर मिल जाते हैं, ...  वह सदा से है,। वह अनभूति है, व्याख्या नहीं है।शब्द बताते हैं कि ऐसा हो सकता है।“

”धर्म की चर्चा मैंने भी की है, क्योंकि वह तो रास्ता है, अध्यात्म उससे परे है, वह छत पर आने की सूचना है। वहां आकर फिर बाहर और भीतर आने की स्वतंत्रता रहती है। मैं तो जो भी आता है सवाल पूछता है, उससे यही कहता हूं, तुम जो कर रहे हो उस पर विश्वास लाओ, करो,, सोचो मत, चलो, उसे व्यवहार में लाओ गलत होगा, अपने ..आप छूट जाएगा, प्रकृति अपने आप में सही बड़ी मार्गदर्शक है। अंतप्रेरणा अपने आप बता देती है। क्या सही  है?, क्या गलत है? गलत छूट जाएगा। पर चलो तो सही। तुम्हारा धर्म, तुम्हारी मान्यताएॅं , सही हैं या गलत यह चर्चा का विषय नहीं है। मैं किसी की मान्यता को बदलने  के पक्ष में नहीं हूं। बलपूर्वक या अन्य किसी प्रकार से यह कार्य नहीं करना चाहिए।“


”अन्तर्मुखी अवस्था में संस्कार खुलना शुरू होता है।
यही वास्तविक साधना है, पात्र का ढक्कन सा खुल जाता है, एक प्रवाह है, उसके खुलते ही, जहां पर यात्रा बंद की थी, वह मुकाम आ जाता है। जो जाना गया है, वह सब भीतर  है, बस वहां पत्थर रखा हुआ ह।, ... वर्तमान में रहने से क्या होता है, बाहर का भटकाव बंद होते  ही मन अंतर्मुखी होने लगता है।

पहले बताया था न, अंतर्मन, मन का ही हिस्सा है।, जो विराट से जुड़ा होता है, विराट अत्यंत शक्तिशाली है, वहॉं संबंध जुड़ते ही सब प्रकट हो जाता है, वही ज्ञान है।
तब वास्तविक यात्रा शुरू हो जाती हैं,े यही अध्यात्म है। अध्यात्म कोई ओढ़ने की चादर नहीं हैं, जब ये स्मृतियां खुलती है, एक साथ प्रवाह सा खुल जाता है, साधक बेचेन हो जाता है। यहीं तितिक्षा है, वेग को सहन करो, तभी वास्तविक प्रगति होती है।“

”अनंत यात्रा’ एक उपन्यास ही नहीं  है।
पता लगाओ, नीलकंठ कौन है?, उसकी यात्रा, साधक की यात्रा है, इन्हीं सारे सवालों का जवाब एक साथ यहां दिया हैं,
मैंने कुछ भी नहीं छिपाया है,
यह जो सत्य है, उसकी ही खोज, नीलकंठ की है,, तो शिखिघ्वज की भी है। मुझे किसको बताना था, यह भी साफ ही था
अंत प्रेरणा उठी, और मैंने लिख कर तुम्हे भेज दिया। जो भी कागज मिला उस पर लिखकर तुम्हे भेज देता। एक साथ तो लिखा  नहीं, पहले वाला भी मेरे पास नहीं था। तुमने जोड़कर किताब बना दी। अच्छा हुआ पर देखना, उसमें जो प्रवाह है, ... एक साथ बैठकर,, ... एक जगह बैठकर मैंने नहीं लिखा, ... सब स्वाभाविक है।“

”इसीलिए मेरे पास भीड़ नहीं थी। ... जो भाषा बनाता। मुझे किसे समझाना था, ... सामने कोई था नहीं। तुम्हारे आने के बाद तुमने सवाल पूछने शुरु किए। उसके पहले साठ साल तक कोई इस संबंध में पूछने नहीं आया। नहीं चर्चा की। मैं चुप रहा। गुरुकुल चलता था, ... उसी के संबंध में बात होती थी। कभी कोई कुएं में पानी आजाएगा, शादी होजाएगी, यह बात पूछता। जब गुरुकुल में शुरू-शुरू में आया था, तब गीता पर प्रवचन दिया। मोहन जी भी यहीं गुरुकुल में पढ़ाते थे, ... पर कभी आध्यात्मिक चर्चा उनके साथ नहीं हुई। श्री राम शर्मा भी आए, सत्यमित्रानंद जी भी आए, ... वे धर्म प्रचारक थे। ।  आपसे मिलने के बाद सिलसिला शुरू हुआ। मेरे सामने, मेरा उद्देश्य था, ... मैंने पाया। आज आप देखते हैं, मैं घंटों बैठा रहता हूं, पता भी नहीं रहता, क्या समय हुआ है, आप पानी के लिए पूछते हैं, ... तब दुबारा पूछने पर कनेक्शन जुड़ता है, ... हाथ उठता है, ... प्यास भी तभी अनुभव होती है। फिर बताओ, शब्द और भाषा कहां से आती। जो सत्य है,... वह जब व्यक्त होगा, कम से कम शब्दों में ही होगा। जहां वह भी है, मात्र उसकी वर्णना है, व्याख्या है, वहॉ। घंटों चर्चा करते रहो, कोई फर्क पढ़ने वाला नहीं है।“



”हां, मेरी कोई इच्छा ही नहीं थी।
 आपको बताया था बचपन में कि एक बार वो बड़े लेखक घर आए थे, मैंने उनकी सेवा की, तब उन्होंने कहा था, कुछ मांगों तब मैंने कहा था, कि किसी के सामने हाथ नहीं पसारुॅंे।. वही बात मैंने इंजीनियर साहब को बताई थी। इसीलिए संन्यास लेकर गुरुकुल खोला था। वही एक मात्र संकल्प था।

”मुझे कहां जाना है, ... क्या पता...
शरीर जब छूट जाए, तब गिद्धों के लिए डाल  देना, ... शायद उनके काम आ जाए, प्रकृति में हर वस्तु काम में आनी चाहिए।

‘यह आप क्या कह रहे हैं?’प्रश्न उठ खड़ा हुआ था।

”क्यों, मिट्टी का क्या, ... मिट्टी तो मिट्टी में मिल जाएगी।
फिर क्या बचेगा, ... बूंद के समुद्र में मिलने के बाद पूछने वाला भी नहीं मिलता।
 अंगुली से छाती पर दिखाते हुए यहां कुछ भी शेष नहीं रहा। कुछ भीनहीं। सब क्षय हो गया।“ (मुस्कराते हैं)

”जिनके संस्कार शेष रह जाते हैं, वे लौटते हैं। आना पड़ता है। नहीं भी आओ, जन्म कोई साधारण चीज नहीं है। संस्कार भटकाते हैं। यही क्रम है। सिलसिला है, जो जारी है। आज नहीं कल, विज्ञान  इधर भी हाथ बढ़ाएगा,
कुछ नहीं बस एक सपना होता है।
सपने में हम उठ जाते हैं, छूते हैं, यह मेरे हाथ है, पॉंव है। वहां कोहनी है। यह संस्कार भी एक सपना है।“

”वहां स्वप्न  है, बस एक गहरी नींद है। इंद्रिया है, नहीं, ... जो कह सके, ... व्यक्त कर सकें... स्वप्न हमेशा सच लगते हैं, टूटने के बाद पता लगता है, यह तो सपना था। वहां मात्र एक स्वप्न रहता है। उतना यथार्थ। स्वप्न में दुख कितना गहरा लगता है। राजा जनक को स्वप्न आया था, वे स्वप्न में भिखारी है, दाने -दाने के लिए मोहताज हैं।, उन्होंने जगते ही सवाल पूछा था,... यह सत्य है या वह सत्य हैै। तब अष्टावक्रजी ने उत्तर दिया, ... राजन दोनों ही सत्य हैं।

इस स्वप्न में भी दुख  होता है, सुख होता है, उतना ही यथार्थ लगता है, पर व्यक्त करने के लिए देह नहीं होती।
इस चर्चा में पड़ना बेकार है, सच यह है कि मनुष्य देह बहुत ही बहुमूल्य है। यह हमें हमारे संस्कार को शुद्ध करने के लिए मिलती है। यह जो संग्रह है जो स्मृतियां है, उन्हें खाली करना है,  इसके लिए मिलता है।। इसको ठीक से समझा नहीं जाता है। संग्रह कम हो, यही साधना है। संग्रह जो है, विचारों को पैदा करता है, विचार ही विकार है। विचार कम होंगे, संग्रह कम होता जाता है।

जो पुराना है वह खत्म हो ,नया संग्रह नहीं बने, यही वर्त्तमान में रहने की कला है।“

”सभी धर्म आत्मा की चर्चा करते हैं। आत्मज्ञान, आत्मानुभव, ... यह क्या है?
शरीर तो दिखाई पड़ता है, स्थूल है।
मन को देखा है क्या?
शास्त्र कहते हैं, मन विकारी है, सतोगुणी है, रजोगुणी है, तमोगुणी है, ... मन को तो किसी ने देखा नहीं है।
उसके क्रियाकलापों को हम जानते हैं, उसको देखकर ही हम मन की व्याख्या करते हैं।
मन एक गति है।
मात्र गति जो कल्पना करती है, स्मृति रखती है,
और प्राण भी गति है,
शरीर में आते ही गति दो रूपों में बंट जाती है। मन चक्राकार गतिे हैं, प्राण सीधी गति हैं, यह नाभि से मस्तिष्क तक है, ऊर्ध्वाकार। योग, वास्तविक अर्थ में दोनों दोनों गतियों का एक हो जाना है। शक्ति, प्राण में है, वही सृजन का कार्य करती है, उसी से पोषण होता है। विकास उसी से होता है। श्वास प्राण नहीं है।

सूक्ष्म शरीर में, यह गति संस्कार सहित रहती है, संस्कार का धरती पर नया जन्म लेना, और देह का छोड़कर जाना सब उसी पर निर्भर करता है।
तो जब हम मन को ही नहीं जानते, तब आत्मा पर चर्चा कैसे कर सकते हैं। गीता में बहुत समझाया है, ... पर वह जो मन से परे है, वहां मात्र अनुभव तो होगा, वर्णन नहीं।“

”अनंतयात्रा’ में वर्णना है, ... विराट का उल्लेख हुआ है। विराट का अनुभव होता है। गीता में भी आया है। वह मात्र अनुभव है। स्थिरता और गति का जो विरोधाभास है, वह मात्र शाब्दिक रह जाता है। वह है सदा है, जो इन्द्रियों से परे है, मन से पीछे,  वहां मात्र कल्पना से चित्रित किया जा सकता है। पदार्थ का सूक्ष्मतम कण जो होता है, वहां भी वैज्ञानिक रहते हैं, वह कण भी है, तरंग ही।

मैंने पहले भी कहा था, तरंगों के बारे में, ... लहरें टकराती हैं।, , वे विकार साथ लाती है, नाभि से टकराते ही, जहां संस्कार रहता है, मन मस्तिष्क से उसे जोड़ देता है। हमें इन लहरों के वेग को बर्दाश्त करना है। जैसे टी.वी. पर लहरंे टकराकर चित्र व भाषा दोनों देती हैं ,वही हमारी दशा है, हम भी वैसे ही प्रभावित होते हैं।

”तो फिर जब जहां शरीर का प्रयोजन नहीं रहा है। ध्यान और मन वहॉं कुछ नहीं रहता। अनुभव भी मानसिक होते हैं।वहॉं मन होता तो है। पर निष्क्रिय।जब जरुरत हुई वह आता है ,बात गई वह वापिस अपनी जगह पर चला जाता है।एक अवेयरनेस रहती है। जब बाहर आना हुआ कांशियसनेस हो जाती है। सब ऑटोमेटिक होता रहता है। यहॉं प्रयास कुछ भी नहीं होता। जब कोई सामने आता है ,वह कुछ बोलता है,फिर वह  दुबारा कुछ कहता है ,तब सम्बन्ध अपने आप जुड़ जाता है।तब ऑंखें उसे पहचान लेती हैं ,कान सुन लेते हैं। कुछ कहना है तो अंदर से प्रेरणा होती है। नहीं तो सीरियल की तरह चित्र आते रहते हैं जाते रहते हैं।“


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