अमृत पथ 16
लगन
स्वामीजी ने ”लगन“ की महत्ता बताते हुए कहा थाः-
”कृष्ण, बुद्ध, महावीर, मुहम्मद, बड़े लोग हैं, युग पुरुष हैं, उन्होंने अपनी अपनी तरह से सत्य को जाना, उस अनुभव को अपने समय की भाषा में कहा, अपने तरीके से कहा, इसीलिए अंतर होगा। सत्य तो एक है पर उसको कहने का ढंग अलग ही होगा, बाद में जानने वाले उस एक तरीके को ही सत्य मानते हैं, ... यही विवाद का विषय बन जाता है और किसे समझाओ, अहंकार में डूबते है, लड़ते हैं, । बहुत खून खराबा हुआ है। हमारा रास्ता ठीक है, आपका गलत है। नहीं मानेंगे, इतिहास इन समस्याओं से भरा हुआ है।
कृष्ण कहीं नहीं गए, उनकी साधना कहीं दिखाई नहीं पड़ती। वो जहां है वहीं सिद्ध हैं, ... गीता का दूसरा अध्याय तथा कुछ श्लोक जो इधर उधर हैं, तुम्हें बताए है, वे ही सार है, बाकी सब तो बाद का जोड़ लगता गया है, ... ।
पर उनको भी उस काल में कितनेे लोग समझ पाए, अर्जुन, भीष्म, विदुर, उनके भई बलराम भी नहीं, क्यों, जहां शक्ति का प्राकट्य होता हैै, वहां प्रकृति सबसे पहले अवरोध खड़े कर देती है,। वह रास्ता छिप जाता है। कृष्ण का अनुभव, उनका ज्ञान,हमारे सामने है, हजारों साल होगए, हमने उन्हें पूर्णावतार कहा है। राम को तो भी मर्यादा निभानी थी, पर उन्हें नहीं। जब जो उचित लगा कर दिया या हो गया, वे उसके पार हैं। वे मात्र वर्तमान है, उन्हें कोई नहीं बांध पाया, वे मुक्त हैं, वे जहां है वहीं से अपनी बात कहने में समर्थ हैं, चाहे युद्ध का मैदान हो!, या वृन्दावन में महारास होे,।
महावीर को सारी परंपरा से गुजरना पड़ा,। लोग साधना को तभी समझ पाने में सफल थे, जब वे किसी को सभी साधनाएं करते हुए देखें। महावीर पूरे रास्ते से चले। बुद्ध ने उपनिषद का रास्ता पकड़ा, उनकी पद्दति उपनिषद से प्रभावित रही। मुहम्मद के सामने अपना समाज था, यहां की तरह वहां का समाज इतना विकसित भी नहीं था, इतनी बड़ी कोई परंपरा भीनहीं थी। सामाजिक रूढ़ियां बहुत थीं, वहां जो रास्ता बना, वह अलग ढंग का था, यही हाल ईसाई धर्म का रहा, वहां भी बहुत बड़े-बड़े संत हुए हैं।
प्रकृति कभी किसी को पूर्ण नहीं बनाती, कुछ न कुछ अधूरापन रह जाता है, ... इसलिए हर महपुरुष अपने मार्ग चलता हुआ मंजिल की तरफ इशारा तो करता हैै, पहुंचा भी देता है। पर यहां सब तेजी से बदल रहा है, जो आज है सत्य है, वह कल गलत मालूम पड़ता है। धारणाएं तेजी से बदल रही हैं।
बहुत बड़ा वैचारिक परिवर्तन हो रहा है। हम पीछे मुड़कर कब तक चलेंगे, चलना आगे ही है।
सबने अपनी अपनी तरफ से आदमी की बेहतरी के लिए प्रयास किया हैं। रास्ता बताया, इशारा दिया, कितना हम समझ पाए, कितना हम चले यह अलग बात है। और तो और जो लिखा गया है,ै, वह तो बहुत बाद का है, सैकड़ों साल बाद का है, ... हमने जो अपनी बुद्धि से सोचा वह भी जुड़ गया है, यह याद रखना होगा।
इसीलिए किसी दूसरे के रास्ते की बुराई करना, चर्चा करना उचित नहीं है। उसे आप चलने दीजिए, यहां मैंने कोई एक रास्ता नहीं बताया, ... यह नहीं कहा, यह गलत है। अनंतयात्रा में चूड़ाला यही कती है कि कर्मकांड प्रधान साधनाएं मौलिक परिवर्तन नहीं कर सकती हैं। उनकी व्यर्थता का बोध तभी होता है, ... जब वो करली जाती हैं। तभी अंतर्मुखता प्राप्त होती है।
यहां जो करना होता है, मन के द्वारा होता है, मन से ही है।वहां शारीरिक प्रयोगों की जरूरत भी होती है। पर साधकों पहले यहीं से ही आना होता है। फिर जितना उसका विकास होता जाता है, वह उतना विवेक का आदर कर, ... बुद्धि चातुर्य से बचता जाता है। ... यह अवस्था सभी ने बतायी है, ... फिर हम कैसे कह सकते हैं कि यही मौलिक है। यही एक मात्र पथ है। पहाड़ तक आने के लिए अनेक रास्ते हो सकते हैं, पर चढ़ाई के समय एक ही पगडंडी रह जाती है,... और चोटी तो एक ही है। अंत का अनुभव जिसको भी हुआ, ... वह उनका सत्य था, और उन्होंने उस समय की भाषा में, उस उसय की समझ में कहा, अंतर तो होगा ही। तुम, अंतर में क्यों पड़ते हो, व्यर्थ समय गंवाना है। जहां से भी हो, शुरू करो और चलो, लगन ही यहां साधना है।
लगन
स्वामीजी ने ”लगन“ की महत्ता बताते हुए कहा थाः-
”कृष्ण, बुद्ध, महावीर, मुहम्मद, बड़े लोग हैं, युग पुरुष हैं, उन्होंने अपनी अपनी तरह से सत्य को जाना, उस अनुभव को अपने समय की भाषा में कहा, अपने तरीके से कहा, इसीलिए अंतर होगा। सत्य तो एक है पर उसको कहने का ढंग अलग ही होगा, बाद में जानने वाले उस एक तरीके को ही सत्य मानते हैं, ... यही विवाद का विषय बन जाता है और किसे समझाओ, अहंकार में डूबते है, लड़ते हैं, । बहुत खून खराबा हुआ है। हमारा रास्ता ठीक है, आपका गलत है। नहीं मानेंगे, इतिहास इन समस्याओं से भरा हुआ है।
कृष्ण कहीं नहीं गए, उनकी साधना कहीं दिखाई नहीं पड़ती। वो जहां है वहीं सिद्ध हैं, ... गीता का दूसरा अध्याय तथा कुछ श्लोक जो इधर उधर हैं, तुम्हें बताए है, वे ही सार है, बाकी सब तो बाद का जोड़ लगता गया है, ... ।
पर उनको भी उस काल में कितनेे लोग समझ पाए, अर्जुन, भीष्म, विदुर, उनके भई बलराम भी नहीं, क्यों, जहां शक्ति का प्राकट्य होता हैै, वहां प्रकृति सबसे पहले अवरोध खड़े कर देती है,। वह रास्ता छिप जाता है। कृष्ण का अनुभव, उनका ज्ञान,हमारे सामने है, हजारों साल होगए, हमने उन्हें पूर्णावतार कहा है। राम को तो भी मर्यादा निभानी थी, पर उन्हें नहीं। जब जो उचित लगा कर दिया या हो गया, वे उसके पार हैं। वे मात्र वर्तमान है, उन्हें कोई नहीं बांध पाया, वे मुक्त हैं, वे जहां है वहीं से अपनी बात कहने में समर्थ हैं, चाहे युद्ध का मैदान हो!, या वृन्दावन में महारास होे,।
महावीर को सारी परंपरा से गुजरना पड़ा,। लोग साधना को तभी समझ पाने में सफल थे, जब वे किसी को सभी साधनाएं करते हुए देखें। महावीर पूरे रास्ते से चले। बुद्ध ने उपनिषद का रास्ता पकड़ा, उनकी पद्दति उपनिषद से प्रभावित रही। मुहम्मद के सामने अपना समाज था, यहां की तरह वहां का समाज इतना विकसित भी नहीं था, इतनी बड़ी कोई परंपरा भीनहीं थी। सामाजिक रूढ़ियां बहुत थीं, वहां जो रास्ता बना, वह अलग ढंग का था, यही हाल ईसाई धर्म का रहा, वहां भी बहुत बड़े-बड़े संत हुए हैं।
प्रकृति कभी किसी को पूर्ण नहीं बनाती, कुछ न कुछ अधूरापन रह जाता है, ... इसलिए हर महपुरुष अपने मार्ग चलता हुआ मंजिल की तरफ इशारा तो करता हैै, पहुंचा भी देता है। पर यहां सब तेजी से बदल रहा है, जो आज है सत्य है, वह कल गलत मालूम पड़ता है। धारणाएं तेजी से बदल रही हैं।
बहुत बड़ा वैचारिक परिवर्तन हो रहा है। हम पीछे मुड़कर कब तक चलेंगे, चलना आगे ही है।
सबने अपनी अपनी तरफ से आदमी की बेहतरी के लिए प्रयास किया हैं। रास्ता बताया, इशारा दिया, कितना हम समझ पाए, कितना हम चले यह अलग बात है। और तो और जो लिखा गया है,ै, वह तो बहुत बाद का है, सैकड़ों साल बाद का है, ... हमने जो अपनी बुद्धि से सोचा वह भी जुड़ गया है, यह याद रखना होगा।
इसीलिए किसी दूसरे के रास्ते की बुराई करना, चर्चा करना उचित नहीं है। उसे आप चलने दीजिए, यहां मैंने कोई एक रास्ता नहीं बताया, ... यह नहीं कहा, यह गलत है। अनंतयात्रा में चूड़ाला यही कती है कि कर्मकांड प्रधान साधनाएं मौलिक परिवर्तन नहीं कर सकती हैं। उनकी व्यर्थता का बोध तभी होता है, ... जब वो करली जाती हैं। तभी अंतर्मुखता प्राप्त होती है।
यहां जो करना होता है, मन के द्वारा होता है, मन से ही है।वहां शारीरिक प्रयोगों की जरूरत भी होती है। पर साधकों पहले यहीं से ही आना होता है। फिर जितना उसका विकास होता जाता है, वह उतना विवेक का आदर कर, ... बुद्धि चातुर्य से बचता जाता है। ... यह अवस्था सभी ने बतायी है, ... फिर हम कैसे कह सकते हैं कि यही मौलिक है। यही एक मात्र पथ है। पहाड़ तक आने के लिए अनेक रास्ते हो सकते हैं, पर चढ़ाई के समय एक ही पगडंडी रह जाती है,... और चोटी तो एक ही है। अंत का अनुभव जिसको भी हुआ, ... वह उनका सत्य था, और उन्होंने उस समय की भाषा में, उस उसय की समझ में कहा, अंतर तो होगा ही। तुम, अंतर में क्यों पड़ते हो, व्यर्थ समय गंवाना है। जहां से भी हो, शुरू करो और चलो, लगन ही यहां साधना है।
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