Wednesday, October 2, 2013

9 अनुभव

9 अनुभव


स्वामीजी साधना में प्राप्त अनुभवों की चर्चा कर रहे थे, ओंकारेश्वर घटना का वृत्तांत ”अनाम यात्री नामक कृति में भी है।

”यह ओंकारेश्वर की घटना है।
मैंने आपको कहा था न, तब भंडारी मिल में काम कर रहा था। वहीं ‘पाल ब्रन्टन की पुस्तक, ‘रमण महर्षि के बारे में पढी़ थी, जिसके बारे में पहले बताया था, ... मैंने पुस्तक पढ़कर जब रखी तक स्वप्न में वही का सारा दृश्य देख लिया था,-जब वहां गया तब रमण महर्षि वहांथे,-परउनकी अवस्था के यही अंतिम दिन थे।
बहुत कम बोलते थ.े खाना भी उनके हाथ में रखकर जब कहा जाता था तब वे इन्द्रियगत संबध्ंा जोड़ पाते थे, ... पहाडी की जब परिक्रमा की तब पाया,स्थान जैसे मैंने स्वप्नमें देखे थे, ... वैसे ही थे।मैंने इस परज्यादा विचार नहीं किया। हाँ, ओंकारेश्वर में तब पैदल चलना पड़ता था। मैं नदी के इस पार से उस पार जा रहा था, ... रास्ता बहुत संकड़ा, व पहाड़ी था। पत्थर भी उबड़-खाबड़ रखे थे, ... उतरना ही उतरना आगे उतरा व चढ़ना पड़ता था, ... रात का वक्त था। तभी अचानक प्रकाश का एक गोल घेरा दिखाई दिया, .. जो मेरे आगे आगे चल रहा थ, ... पहले तो मैं मुड़ नहीं पाया।  यह तो होता था, जब सोता था प्रकाशकी एक बीम सी आती थी, ... वह जो आज्ञा चक्र है, जहां बिंदी लगती है; वहां पर आकर ठहर जाती थी, ... और मैं गहरी नींद में सोे जाता था। पर वह प्रकाश भीतर से आकर इस प्रकार मार्गदर्शन करेगा, ... यह मुझे वहीं अनुभव हुआ।

भीतर का प्रकाश, ... बाहर अंधेरे को पता नहीं लगने देता। मेरी आँख की रोशनी बहुत कम हो चुकी है। एक आंख ग्लूकोकोमिया के बंबई आपरेशन से   चली गई हैं; पर दूसरी आँख में भी बहुत कम दिखाई देता है। पर अखबार पढ़ लेता हूं, मेरासारा काम यथावत हो जाता है।

‘तभी आप टार्च नहीं रखते...’
‘(हंसते हुए) हाँ, जरूरत नहीं पड़ती। रात को तीन बजे जगना पड़ता है। हाथ से टटोलता चला जाता हूं। बत्ती कहॉं है, स्विच कहां है,अंदाजा लग जाता है...’
या रोशनी... होती है,
‘कुछ भी मान लो,...’,उस दिन पिरामिडों की बात चल रही थी.......
स्वामी जी बोले-जिसे पिरामिड कहते हैं, अभी समझने में समय लगेगा। वहां अंधेरा था, दीया बत्ती का सबूत नहीं है। मशालों का सबूत नही ंमिला है।, ... अंदर कौनसा प्रकाश था, ...अभी इस पर खोज होनी है।।

तीर्थ जो आज है, वे धंधा बन गए हैं।
प्रश्न-आप तो चारों घाम गए, ...हिमालय भी...
 उत्तर- ‘हाँ, अमरनाथ पैदल गया था, ... उसके उसके बाद जब लौटे तब पॉव सुन्न हो गए थे, वो बता रहा था,...’
‘तीर्थ यात्रा, भावना से जुड़ी है। गंगाजल पवि़त्र करता है?  उसे ही जोे यह मानता है,
हमारा आज न तो विश्वास रहा, न निष्ठा, न श्रद्धा, ... लगन भी नहीं है, इसीलिए हम जाते हैं, जगह को छूकर  आ जाते हैं।
.हमारी मानसिक उर्जा को वहीं जाकर सहारा मिला है, ... जो दृढ विश्वास रखता है। वही अपनी बुराई में मुक्त भी हो जाता है, उसका संकल्प इतना घना हो जाता है, वह उसे मार्गदर्शन देने लग जाता है।
शक्ति तो हमारी जागृत होती है, जो पिंड में है, वही ब्रह्यांड में है।

पर विश्वास नहीं है।
एक तीर्थ, पत्थर- मिट्टी,गाारे से बना है, , वहॉं मूर्तियॉं  हैं।दूसरा तीर्थभाव लोकमें  में बसता है, हमारी मान्यता में बसता है,और जो जिस रूप में देखता है, वह उस रूप में पाता भी है, यही सार है।एक का तीर्थ  बस एक बस्ती है, एक शहर है, दूसरे का तीर्थ चिन्मय होता है। जैसे विदेशी भी यहां आकर तीर्थ में रहते हैं, उसे समझो, वही उनका जीवन  हो जाता है।परिवर्तन भीतर ही होता है,... जहां पहुंचकर हमारेे विचार शांत हो गए... शांति अनुभव हो, ... वहां हमें मार्गदर्शन भी मिलेगा, यह सच है।

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