अमृत पथ 10
आज इस आलेख में हम साधना की चर्चा कर रहे हैं।
साधना
प्रश्न था साधक किस प्रक्रिया का पालन करे?
स्वामीजी कह रहे थे-
‘किसी का भी मन नहीं दुखाना चाहिए, रास्ते सभी अच्छे हैैं, फिर सबकी परिस्थ्ािित, और योग्यता अलग-अलग है, दो पत्तियाँ भी प्रकृति में एक सी नहीं होतीं, फिर एक जैसी व्यवस्था सबके लिए कैसे ला सकते हो? यही बड़ी गलती हो गई है। हम अपने शास्त्रों को सही दूसरे को गलत बताते हैं, उनकी मान्यताओं के परिवर्तन की कामना करते हैं।
यहां इसलिए मैंने कोई पद्दति नहीं बताई, कहा जो तुम करते हो करते रहो, तुम्हे छोड़ने की जरूरत नहीं है। तुम्हारी लगन सच्ची होनी चाहिए।
इसलिए बहिर्मुखी सत्संग नहीं हो सकता है। हाँ मनोरंजन व सद् चर्चा इसमें अवश्य होती है। क्योंकि सबकी मान्यताएं, रुचियॉं अलग - अलग हैैं, हम व्यक्ति विशेष की सहायता कर सकते हैं। उसका मार्गदर्शन हो सकता है। पर सबको एक लाठी से नहीं हॉका जा सकता, ... यह उनको देखना है।, ... हमें नहीं, ... यहां प्रकृति में सबको खुली छूट है, एक वक्त ऐसा आता है, रास्ता बंद जाता है, तब वापिस लौटना होता है। इससे निराशा आ जाती है।
कर्मकांड भी साधना है, सीढ़ी है, पर कब तक उस पर ठहरे रहोगे, आगे जाना भी होगा। कर्मकांड का अर्थ होता है क्रिया तो होरही है पर उसमें मन नहीं है।जब क्रिया और मन एक होजाता है वहॉं उपासना बन जाती है।हमेशा वहां खड़े नहीं रह सकते, वह भी छूट जाएगा।... भक्ति की एक सीढ़ी है, जब वह छूटती है तब निःसंकल्पता में प्रवेश होता है। ... वहां ज्ञान है। ज्ञान है, संसार हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकता है। जो महान शक्ति है उसके प्रति जो जिज्ञासा शुरू में होती है, वह बाद में धीरे-धीरे रुचि में, फिर स्वभाव में बदल जाती है। रह जाती है, मात्र सजगता... रहना तो फिर भी पड़ेगा, कोई चमत्कार होने वाला नहीं है। बस इस रहने में और उस रहने में भेेद यह हो जाता है,ै, यहाँ सभी कार्य तो वही होंगे, पर शांति होगी, प्रेम होगा।
इसीलिए किसी की भी मान्यता पर अविश्वास मत करो, ...
प्रारंभ में मंदिर, और मूर्तिपूजा ही साधक को मिलती है। यह वह जगह होती है, जहां जाकर उसकी भावना दृढ़ हो जाती है। उसे अपनी मलिनता का बोध हो जाता है।
वह वहां क्यों जाता है, इसका उसे पता नहीं रहता, उसे अच्छा लगता है, वह चाहता है। मंदिर कोई पत्थर, ईंटों का भवन नहीं होता। घोंसला तो चिड़िया भी बनाती है, पर यहां उसके भीतर संस्कार है जो जोर मार रहे हैं; वह भगवान को कहीं देखना चाहता है। लोग घरों पर इसी लिए मंदिर बनाते हैं, पूजा करते हैं।
पहले इन सबकी जरूरत होती है, कोई लक्ष्य है, तो उसे इसे हटाना नहीं चाहिए। बाद में जो छूटना है, वह अपने आप छूट जाता है।
पहले बाह्य पूजा होती है, अभिषेक होता है, षेाड़षोेपचार होता है, विधि विधान से होती है। बाद में धीरे -धीरे मानसिक पूजा रह जाती है।फिर एक दिन आता है, वह भी छूट जाती है। मंत्र भी पहले स्थूल जपा जाता है, फिर धीरे-धीरे मानसिक जप रह जाता है। यह सब एक प्रक्रिया है, ... जो हर परंपरा में मिलती है।
हजारों साल से इस प्रकार से मनुष्य यह रास्ता खोजता आया है। मैंने कभी भी, कहीं भी, किसी की अवहेलना करने को नहीं कहा। चर्च का भी विधान है, मस्जिद का भी है, ... सब जगह अपनी- अपनी परंपरा है, उसमें जब साधक जाता है तो उसका मन कुछ देरके लिए शांति पाता है, सार यही है। वह कुछ देर स्मृति के दबाब से हट जाता है। घर में महिलाएॅं, तुलसी केे आगे दिया जलाकर, उस महाशक्ति का सहारा पा लेतीं थीं।यह सब भावना और लगन पर टिका हुआ है।
मंदिर यहां के लोगों के लिए इसी तरह की जगह थी।, जहां वे गए अपनी व्यथा सुना आए, ... पुराने लोगों ने बहुत काम किया है, तरह- तरह के उपाय बताए। दक्षिण में कितने बड़े विष्णु के मंदिर हैं,ं, विष्णु जितने बड़े हैं, उनके मंदिर उतने ही बड़े हैं। मस्जिद, पूरी खुली होती है। मंदिर ढका होता है।यह सब अपना- अपना सोच था। आज के मंदिरों में वह बात नहीं रही। सब पैसे कमाने का तरीका बन गया। मंदिर वह हैै, जहां जाते ही लगे, यह जगह शांत है, यहां जो विचार उठता है, उस सवाल का उत्तर आता है। क्यों? वहां साधकों का मन शांत हुआ है। पुराने मंदिर जागृत है, वे चैतन्य है आनंद है। मंदिर कोई भवन नहीं होता, मूर्ति तो जयपुर मंे बनती है। फिर होता क्या है, ... तुम्हारी भावना, तुम्हारी शक्ति उसे चैतन्य कर देती है। हरिद्वार गए थे, वहां क्या देखा, इतने मंदिर हैं, ... वहां पूजा भी अब मशीन से होने लगी है, सब यांत्रिक। .
साधक के लिए आवश्यक है, उसकी मान्यता दृढ़ हो। और उसकी लगन हो,। हमें कभी भी किसी की मान्यता पर दबाब नहीं डालना चाहिए, इसीलिए ,मान्यताओं के परिवर्तन के लिए कभी मैंने नहीं कहा।
आज इस आलेख में हम साधना की चर्चा कर रहे हैं।
साधना
प्रश्न था साधक किस प्रक्रिया का पालन करे?
स्वामीजी कह रहे थे-
‘किसी का भी मन नहीं दुखाना चाहिए, रास्ते सभी अच्छे हैैं, फिर सबकी परिस्थ्ािित, और योग्यता अलग-अलग है, दो पत्तियाँ भी प्रकृति में एक सी नहीं होतीं, फिर एक जैसी व्यवस्था सबके लिए कैसे ला सकते हो? यही बड़ी गलती हो गई है। हम अपने शास्त्रों को सही दूसरे को गलत बताते हैं, उनकी मान्यताओं के परिवर्तन की कामना करते हैं।
यहां इसलिए मैंने कोई पद्दति नहीं बताई, कहा जो तुम करते हो करते रहो, तुम्हे छोड़ने की जरूरत नहीं है। तुम्हारी लगन सच्ची होनी चाहिए।
इसलिए बहिर्मुखी सत्संग नहीं हो सकता है। हाँ मनोरंजन व सद् चर्चा इसमें अवश्य होती है। क्योंकि सबकी मान्यताएं, रुचियॉं अलग - अलग हैैं, हम व्यक्ति विशेष की सहायता कर सकते हैं। उसका मार्गदर्शन हो सकता है। पर सबको एक लाठी से नहीं हॉका जा सकता, ... यह उनको देखना है।, ... हमें नहीं, ... यहां प्रकृति में सबको खुली छूट है, एक वक्त ऐसा आता है, रास्ता बंद जाता है, तब वापिस लौटना होता है। इससे निराशा आ जाती है।
कर्मकांड भी साधना है, सीढ़ी है, पर कब तक उस पर ठहरे रहोगे, आगे जाना भी होगा। कर्मकांड का अर्थ होता है क्रिया तो होरही है पर उसमें मन नहीं है।जब क्रिया और मन एक होजाता है वहॉं उपासना बन जाती है।हमेशा वहां खड़े नहीं रह सकते, वह भी छूट जाएगा।... भक्ति की एक सीढ़ी है, जब वह छूटती है तब निःसंकल्पता में प्रवेश होता है। ... वहां ज्ञान है। ज्ञान है, संसार हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकता है। जो महान शक्ति है उसके प्रति जो जिज्ञासा शुरू में होती है, वह बाद में धीरे-धीरे रुचि में, फिर स्वभाव में बदल जाती है। रह जाती है, मात्र सजगता... रहना तो फिर भी पड़ेगा, कोई चमत्कार होने वाला नहीं है। बस इस रहने में और उस रहने में भेेद यह हो जाता है,ै, यहाँ सभी कार्य तो वही होंगे, पर शांति होगी, प्रेम होगा।
इसीलिए किसी की भी मान्यता पर अविश्वास मत करो, ...
प्रारंभ में मंदिर, और मूर्तिपूजा ही साधक को मिलती है। यह वह जगह होती है, जहां जाकर उसकी भावना दृढ़ हो जाती है। उसे अपनी मलिनता का बोध हो जाता है।
वह वहां क्यों जाता है, इसका उसे पता नहीं रहता, उसे अच्छा लगता है, वह चाहता है। मंदिर कोई पत्थर, ईंटों का भवन नहीं होता। घोंसला तो चिड़िया भी बनाती है, पर यहां उसके भीतर संस्कार है जो जोर मार रहे हैं; वह भगवान को कहीं देखना चाहता है। लोग घरों पर इसी लिए मंदिर बनाते हैं, पूजा करते हैं।
पहले इन सबकी जरूरत होती है, कोई लक्ष्य है, तो उसे इसे हटाना नहीं चाहिए। बाद में जो छूटना है, वह अपने आप छूट जाता है।
पहले बाह्य पूजा होती है, अभिषेक होता है, षेाड़षोेपचार होता है, विधि विधान से होती है। बाद में धीरे -धीरे मानसिक पूजा रह जाती है।फिर एक दिन आता है, वह भी छूट जाती है। मंत्र भी पहले स्थूल जपा जाता है, फिर धीरे-धीरे मानसिक जप रह जाता है। यह सब एक प्रक्रिया है, ... जो हर परंपरा में मिलती है।
हजारों साल से इस प्रकार से मनुष्य यह रास्ता खोजता आया है। मैंने कभी भी, कहीं भी, किसी की अवहेलना करने को नहीं कहा। चर्च का भी विधान है, मस्जिद का भी है, ... सब जगह अपनी- अपनी परंपरा है, उसमें जब साधक जाता है तो उसका मन कुछ देरके लिए शांति पाता है, सार यही है। वह कुछ देर स्मृति के दबाब से हट जाता है। घर में महिलाएॅं, तुलसी केे आगे दिया जलाकर, उस महाशक्ति का सहारा पा लेतीं थीं।यह सब भावना और लगन पर टिका हुआ है।
मंदिर यहां के लोगों के लिए इसी तरह की जगह थी।, जहां वे गए अपनी व्यथा सुना आए, ... पुराने लोगों ने बहुत काम किया है, तरह- तरह के उपाय बताए। दक्षिण में कितने बड़े विष्णु के मंदिर हैं,ं, विष्णु जितने बड़े हैं, उनके मंदिर उतने ही बड़े हैं। मस्जिद, पूरी खुली होती है। मंदिर ढका होता है।यह सब अपना- अपना सोच था। आज के मंदिरों में वह बात नहीं रही। सब पैसे कमाने का तरीका बन गया। मंदिर वह हैै, जहां जाते ही लगे, यह जगह शांत है, यहां जो विचार उठता है, उस सवाल का उत्तर आता है। क्यों? वहां साधकों का मन शांत हुआ है। पुराने मंदिर जागृत है, वे चैतन्य है आनंद है। मंदिर कोई भवन नहीं होता, मूर्ति तो जयपुर मंे बनती है। फिर होता क्या है, ... तुम्हारी भावना, तुम्हारी शक्ति उसे चैतन्य कर देती है। हरिद्वार गए थे, वहां क्या देखा, इतने मंदिर हैं, ... वहां पूजा भी अब मशीन से होने लगी है, सब यांत्रिक। .
साधक के लिए आवश्यक है, उसकी मान्यता दृढ़ हो। और उसकी लगन हो,। हमें कभी भी किसी की मान्यता पर दबाब नहीं डालना चाहिए, इसीलिए ,मान्यताओं के परिवर्तन के लिए कभी मैंने नहीं कहा।
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