Thursday, October 24, 2013

22 कर्म


22      कर्म

जीवन का उद्देश्य क्या है? प्रश्न था।
स्वामीजी कह रहे थेः-
आपने ‘साधन यात्रा’ लिखी,... अच्छी है, और भी किताबें लिखीं पर कभी जाना कि आपका ‘साध्य’ क्या है?

साधक को सबसे पहले यह पता होना चाहिए कि उसने जो रूप अपना निर्धारित किया है, उसका दायित्व क्या है? साधु का भेष धारण करते ही उसका उत्तरदायित्व आ जाता है। गलती यही होती है, लोग भेष तो धारण कर लेते हैं, पर उसके अनुकूल उनका व्यवहार नहीं होता है।

सबसे पहले यही जानना चाहिए।
आप साधक हैं, बहुत अच्छी बात है।
साधन क्या है, और उसके प्रति आपका दायित्व क्या है?
महर्षि पतंजलि ने, योग सूत्र में जो  क्रम बनाया है, उसमें ‘यम और नियम’ उस साधक के  लिए जो योगवित होना चाहता है, उसके दायित्व सौंपे हैं।
इसी तरह आपने कहा है- ‘शांत जीवन’ आपका साध्य है। आप जीवन में शांति चाहते हैं, ... पर इस साध्य के प्रति आपका क्या प्रयास है? और क्या उत्तरदायित्व है, यह पता करो।

आपने सुबह प्रार्थना की, फिर पूजा की, ग्रन्थ पढ़े, किसी मंदिर या आश्रम मंे हो आए, ... और दिनचर्या समाप्त हो गई,... क्या यही साधना है?

जो भी बाह्य का साधन है, आपने जो बाहर का सहारा लिया है, वह आपको दासता देगा। बहिर्मुखता सौंपेगा। जो हमसे अलग है, हमसे दूर है, हमारा ही नहीं है, निरंतर परिवर्तनशील है,उसका सहारा सहायक नहीं है। यह देह है या जगत है, दोनों एक दूसरे के प्रतिरूप हैं, दूसरा सहारा जो भी है, वह शांति नहीं देगा। आप कितने भंडारे कर आए, कितने जप-तप कर आएं, शांति प्राप्त नहीं होगी।

जो आपके पास है, जिससे आपका नित्य संबंध जुड़ा रहता है, उसका अनुभव ही वास्तविक खोज है। बुद्ध ने साधक को प्राण साधना सौंपी। हम श्वास से निरंतर जुड़े रहते हैं, जीवन और श्वास एक ही है। श्वास का अनुभव करो, वह उस सत्ता तक पहुंचाएगी, जो चैतन्य है।

चित्त आपने कहा मलिन रहता है, ... उसको अशुद्धि आपने ही सौंपी है। जो आपका ही नहीं है, अपने लिए नहीं है, उसका आप पर प्रभाव बढ़ता जाता है,।. यह जो संसार है, इसके प्रति आपका जो संबंध है, मोह, लोभ और कामना का है। यही बाह्य का प्रभाव है। जो निरंतर पराश्रय सौंपता है।
जब आप नहीं थे, तब भी आपका अस्तित्व था,... आप बालक थे आपका अस्तित्व था, ... विवाह पूर्व भी आप थे, ... पत्नी आई, बच्चे हुए। आपकी देह, ... आज भी आप हैं।

आपके भीतर कौन रहता है?
देह ही तो रहती है, जगत के संबंध रहते हैं।
लेकिन जो निरंतर अपरिवर्तनशील आपके भीतर सब कुछ का भोक्ता भी है, और दृष्टा भी है, वह आपने देखा है?
जब आप बालक थे, तब भी था
और आज भी है,
वही आपका ‘आप’ है, जो निरंतर आपके साथ है।
और उसके पाने के लिए किसी बाह्य उपाय की आवश्यकता नहीं है
वही आपका साध्य है-
वह प्राप्त होता है, आत्मकृपा से, स्वाश्रय से-
जगत यथावत रहेगा,
देह यथावत रहेगी,
न कुछ छोड़ना है न भागना है,
निरंतर वर्तमान में रहने से कर्त्ता निष्काम होता चला जाता है।
उस प्राप्त निर्लिप्तता में ही शांति है, ... वहीं अस्तित्वानुभूति है,
यही तो साध्य है-
तब भेष की चिंता छोड़ो, ... वस्त्र मत बदलो, भीतर जो अशुद्धि तुमने अनुभव की है, उसको बाहर को भगाओ।
... निरंतर वर्तमान में रहने से, मन की मलिनता स्वतः कम होती चली जाती है।

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