Sunday, October 27, 2013

25 अमृत पथ साधना सार

25 अमृत पथ साधना सार


”बचपन में एक ही बात चाही थी, ... जब घर पर अतिथि आए थे तब ग्रीष्मावकाश था, वे लेखक थे, उनकी किताब बंबई में छप रही थी। उन्हें कुछ दिन रूकना था, ... सब लोगों का गांव जाने का कार्यक्रम था, ... मैं ही रूक गया था, ... उन्होंने मुझसे पूछा था, ... मांगों क्या चाहते हो? तब मैंने कहा था- मैं याचक नहीं बनू, जब सन्यास लेने का इरादा मैंने इंजीनियर साहब को बताया था, ... तब उन्होंने भी सवाल किया था, खर्च कैसे चलेगा? मैंने कहा था, ... सन्यास लेकर कार्य करूंगा पर याचक नहीं बनूंगा।“

”हमारा आज स्वरूप क्या हो गया है।
हम याचक बनकर रह गए हैं।
बचपन से मांगना सिखाते हैं, सारी उम्र मांगते रहते हैं।
परमात्मा अनंत हाथों में देता है।
हमारे दो ही हाथ हैं
पर जब वह लेता है, उसके अनंत हाथ है,...
यहां लगभग दो करोड़ लोग होंगे, ... जो पूरी तरह से भगवान की दुकान खोले बैठे हैं, ... सबसे बड़ा व्यापार आज भगवान का ही हो रहा है। हर गांव में दस-पांच आदमी है, जो भगवान की दुकान चलाते हैं। बड़े शहर में सैकड़ों मंदिर-मस्जिद होंगे, ... हजारों का काम यही है, ... जब इन सबसे ही पेट भर जाता है, तब काम करने की क्या जरूरत ह?“.

”हम हजार साल से रास्ता तलाश कर रहे हैं, ... हममें मौलिक परिवर्तन नहीं होता। उपनिषदों की चर्चा करते हैं, कबीर व तुलसी की साखी व दोहे हमारी जबान पर रहते हैं, पर धर्म व उपदेश दूसरों को देते हैं, हमारे आचरण में नहीं हैं। क्योंकि हम धर्म के विक्रेता है, धर्म बेचते हैं, पर हमारा स्वयं उस पर विश्वास ही नहीं है।यदि यह हमको अच्छा लगता, हमें प्रिय होता, तो हमें इसके प्रति आत्मीयता होती, हमारा धर्माचरण होता, हममें परिवर्तन आता?“

”धर्म का यहां फुलटाइम व्यापार है, सुबह से शाम तक की बिक्री है। अब आप ही सोचंे, घर का काम हम कितने मन से करते हैं, ... घर को तो हमने नरक बना रखा है। हमारी मान्यता है यह तो बोझा है, कब उतरे कब हम, आध्यात्मिक लाभ लें।
आध्यात्मिक लाभ के लिए हम सुबह-शाम मंदिर हो आते हैं। ... तीर्थ कर आते हैं। थोड़ा बहुत दान-पुण्य कर देते हैं। महात्माओं के पास जाकर उनके प्रवचन सुन आते हैं। महात्मा भी जानते हैं, कि कुछ होने वाला नहीं है। ये लोग उनकी तड़क- भड़क देखकर आए हैं। भारी प्रचार में खर्चा हुआ है, और उनका काम कथा के माध्यम से उनका मनोरंजन करना है। वे भी कथा-कहानी, संगीत, गायन, वादन से यह कार्य निपुणता से कर रहे हैं। जिन मूल्यों की वे बात कर रहे हैं, वो तो स्वयं उनके पास नहीं है। तंबू भी उनका है, प्रसाद भी उनका है, किताबें उनकी है, कैसट उनके हैं, एकबड़ा व्यापार चल रहा है। फिर आप पूछते हैं कि उनका प्रभाव क्यों नहीं है? गांधी ने अपनी धोती का आधा टुकड़ा फाड़कर औरत को तन ढ़कने को दे दिया था, जो सोचा वह किया, उनका हर कर्म सेवा मय था।“

”कर्म का संबंध सदा दूसरे से होता है।
जो भी क्रिया है, वहां आपका मन निरंतर लगा रहे, ... लेश मात्र भी विपरीत नहीं जाने दिया जाए, ... यही सतर्कता, सजगता में ढल जाती है। ग्रंथ पढ़ना, ... घर में खाना बनाने से श्रेष्ठ नहीं है। दोनों ही कर्म बराबर के हैं।
हां, मन भटकता रहे तो वह कर्म प्रदूषित हो जाता है। यही वास्तविक क्रिया योग है। आपकी रुचि ध्यान में है, ... तो ध्यान में मन को कहीं मत जाने दो, ... दृष्टा बनो। साक्षी भाव जब सघन होता जाएगा, ध्यान सध जाएगा, पर इसके लिए बाहर जाकर उपद्रव करने की, ध्यान सीखने व सिखाने की क्या जरूरत है। यह बहिर्मुखी क्रियाएं हैं, जो मात्र अहंकार दिखाने के लिए होती है।
क्रिया जब योग से जुड़ जाती है, तब सेवा होती है। सेवा से जहां अहंकार कम होता है, वहीं हमारे भीतर ‘सर्व भूतेषु हिते रतः’ की भावना के जगने से प्रेम की स्वाभाविक वृद्धि होने लगती है।
अभी मैंने कहा था, ज्ञान जो है, इसका संबंध अपने आप से है, जो आपने जाना है, वह आपका ज्ञान है, पर ज्ञान को आदर न होने से जाना हुआ विस्मृत होने लग जाता है।
जब जो जाना गया है, वह आचरण में आने लगता है, तो विवेक की स्वाभाविक प्राप्ति होने लगती है। और विवेक का आदर होने से, स्वाभाविक शांति प्राप्त होती है। यहां विवेक विरोधी कर्म अपने आप छूटने लग जाते हैं। कल तक आप जिन कार्यों में रुचि ले रहे थे। अब उनसे स्वाभाविक अरुचि हो जाती है। यहां छोड़ना कुछ भी नहीं है, जिस छूटना है, वह सहज होने लग जाता है। ओर आपको प्राप्त होता है आत्मविश्वास, ... आप की अन्तर्यात्रा प्रारंभ हो जाती है, ... आप अपने आपसे जुड़ने लग जाते हैं, जो आपके भीतर प्रमाद था, अंधकार था, वह स्वतः हटने लग जाता है। यही तो आंतरिक सत्संग हैं, ... यही ध्यान है। निर्विचारता में रहना ही ध्यान है। ... इसके लिए क्या आपको कहीं बाहर भटकने की जरूरत है?

मौलिक परिवर्तन, हम सब चाहतेे हैं।
सबसे पहले दुनिया में, समाज में, परिवार में, और सबसे कम अपने भीतर
अपना आंतरिक विकास हम नहीं चाहते।
कभी अपनी तरफ झांकते नहीं है, ... बुराई दिखती है तो ढ़क्कन लगा देते हैं, परिस्थितियों को दोष देते हैं, अपने आपको न्यायोचित ठहराने का प्रयास करते हैं।
पर पहला परिवर्तन तो स्वयं से ही होगा-
जिससे किसी को हानि पहुंचती है, वह कार्य हम ना करें।
अपना कार्य करें, बेहतर से बेहतर करें,
पर हम दूसरे का कार्य खराब करने का प्रयास नहीं करंे, यही ‘महारास’ की परंपरा है। परमात्मा सभी प्राणियों में सृजन रत है, वहां नृत्य हो रहा है, ... जीवन आनंद रूप है, हम स्वयं डांडिया करे, आनंद मग्न हों पर दूसरे की गति, उसकी लय हमारे कारण से खराब न हो, इसका ध्यान रहे, यही ध्यान है।
ध्यान, आंख मींचकर एकांत में बैठना नहीं है।
यहां ध्यान निरंतर रहने वाली शांत सजगता है।
यह तभी संभव है जब हम बुराई करना छोड़ दें, और अगर समर्थ हैं, समय है, तो दूसरों की भलाई करें। पर बुराई करना छोड़ना तो हमारे बस की बात है।
इससे क्या होगा?
आपका अधिकांश समय तो दूसरों की बुराई तथा अपनी प्रशंसा में चला जाता है।उसमें आपको भी रस आता है, दूसरों को भी। पर कभी आपने विचारा है, जो मनुष्य बुराई करना छोड़ देता है, वह संसार के लिए उपयोगी हो जाता है। और अगर वह संसार की भलाई करने लग जाता है, तो संसार उसे सम्मान देने लग जाता है।
आप अपने चित्त से यह आदत दूर कर लें, बुराई न करना ही परिवार की, संसार की, सबसे बड़ी सेवा है।
पर यही नहीं होता है-

मौलिक परिवर्तन आपसे ही शुरू होगा, आपके परिवार से शुरू होगा, आप इस नियम को सदा ध्यान रखंे कि, की गई बुराई हजार गुना वापिस होकर लौटती है, ... बुराई छोड़ना ही सेवा का मार्ग है, जिससे प्रेम प्राप्त होता है। हमंे समाज को अपनी खुराक नहीं बनाना है, समाज हमारे भोग की सामग्री नहीं है। हम सभी इसी दृष्टिकोण के हो जाएंगे, तब समाज कैसे सुधरेगा, ... आज धार्मिक उपदेशक भी समाज को अपनी खुराक बना रहे हैं। समाज को शब्ददेते हैं। धन लेते हैं, प्रमाद सौंपते हैं। पुरुषार्थ छीनते हैं, क्योंकि कर्म की बात करते ही, प्रश्न खड़ा हो जाता है कि वे स्वयं कर्म क्यों नहीं करते? जब यह माया है,तो वे इस माया से अपनी उदरपूर्ति ही नहीं, रईसों की तरह दैनिक दिनचर्या की मांग क्यों रखते हैं?ैइसका उत्तर उनके पास नहीं है? सच तो यह है, हम सब समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए है, हमें समाज की जरूरत को अपने सामर्थ्य से अधिक से अधिक पूरा करने का प्रयास करना चाहिए। यही वास्तविक सच्चा पथ है, जो हमें आत्मविश्वास सौंपता है, और जहां हमारा रूपांतरण संभव है।

1 comment:

Unknown said...

bahut hi marmik aur upyogi hai.