श्री गुरुगीता अध्याय 9
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यन सूयवे।
ज्ञानं विज्ञान सहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।। 9-1
”तुझ दोष दृष्टि से रहित भक्त के लिए इस परम गोपनीय ज्ञान को रहस्य के सहित कहूंगा कि जिसको जानकर तू दुःखरूप संसार से मुक्त हो जाएगा।“
दोष दृष्टि से रहित। गीता के आठ अध्याय ‘अंतर्यात्रा’ के प्रस्थान बिन्दु हैं। मन जो है, अब बाहर की ओर से इन्द्रियों से सिकुड़ता हुआ, भीतर की ओर मुड़ता है। अब बाहर का आकर्षण नहीं रहता। बाहर जो है, ... मात्र या तो भूत में है या भविष्य में है। ‘वर्तमान’ में मात्र उसका उपयोग है, बस। यहां पर आकर दृष्टि जो है, ... वह भी अब भीतर की ओर मुड़ती है। बुद्धि भी स्वतः शुद्ध होने लगती है।
जीवन को देखने की दो दृष्टियां हैं। एक नकारात्मक है, एक विधायक है। जगत हम वैसा ही दिखाई पड़ता है, जैसा हम देखते हैं। भगवान कह रहे हैं- ‘‘दोष दृष्टि रहित, ... हम प्राय वही देखते हैं, जो हम देखना चाहते हैं, हम जहां बुराई देखना चाहते हैं वहां हमें बुरे के अलावा कुछ भी दिखाई नहीं पड़ेगा। जहां संदेह है, वहां जो भी कहा जा रहा है, व्यर्थ है। कान उसे सुनेंगे ही नहीं। वह विपरीत ही सोचेगा, वही देखेगा।
स्वामीजी कहा करते थे- ‘संदेह रहित सुनो, ... अभी कुछ कहा नहीं, ... प्रश्न उठ खड़ा हुआ। ... भीतर जो है, जो दृष्टि है, ... उसे देखा, ... वह क्या देखना चाहती है, क्या सुनना चाहती है।’
पर जाना, ... भीतर गहराई में अश्रद्धा की परत थी, ... एक सहज संवेदनजन्य आधार भूमि का अभाव था। गुरु के समीप तभी जाना होता है, ... जब सारे संदेह गिर जाएं, ... दोनों तल एक रस हो जाए, ... वहां मात्र अनकहा भी कहा हो जाता है। ... यह तभी होता है जब हृदय की आंख से देखा जाता है, ... हृदय जब खुलता है। मन जब बुद्धि के धरातल को छोड़ता है, ... तब वह बुद्धिहीन नहीं होता है। तब वह हृदय के धरातल पर उतरता है। यही भगवान ने कहा है- ‘दोष दृष्टि से रहत भक्त। जो दोष दृष्टि से रहित हैं, वही भक्त हैं। भक्ति, हृदय की उपसंपदा है।
भक्त, ... जो अब तोड़ने वाली दृष्टि से दूर हो चुका है। जो जोड़ने के रहस्य को जान गया है। भक्ति, ... शुद्ध बुद्धि के बाद आती है। बुद्धि की शुद्धता का अर्थ यही है कि वह अब जान गया है, सभी संदेहों के पार वह हो चुका है। वह अब बुद्धि का दासत्व ग्रहण करके गलत नहीं कर सकता।
‘
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योग क्षेमं वहाम्यहम्।।9.22
जो ‘अनन्यभाव से मेरे में स्थिति हुए भक्त जन मुझ परमेश्वर को निरन्तर चिन्तन करते हुए निष्काम भाव से भजते हैं उन नित्य एकीभाव से मेरे में स्थिति वाले पुरुषों का योगक्षेम मैं स्वयं प्राप्त कर देता हूं।’
‘अनन्या तथा निष्काम भाव से- उपासना- जहां उसके समीप आसन है, बस। भीतर कोई कामना नहीं है, ... जहां वासना है, वहां दूसरा साथ है। उपासना में जहां शरीर है वहीं मन है। वहीं वर्तमान है। ‘‘चाह गई चिन्ता गई, मनुवा बेपरवाह- जिसको कुछ नहीं चाहिए वही शहंशाह।’’ निष्काम साधना का मतलब है- यहां किसी प्रकार का ‘चाह’ नहीं है।
‘इसके पूर्व शब्द आया है- ‘अनन्या, ... जैसी तेरी मर्जी। भक्ति की भाषा में - केवल भगवान की ही शरण में जाना। उन्हीं का चिन्तन, उन्हीं की उपासना, उन्हें ही प्राप्त करना है। ऐसा दृढ़ भाव। उनके अलावा दूसरा कोई नहीं है।
स्वामीजी कहते थे- अनन्या, ... निष्कामता, ... मात्र वर्तमान में ही उपलब्ध होती है। यही एक मात्र साधन है और साध्य है। जरा सी भी कर्म में अपूर्णता हो, समता चली जाती है। निरन्तर जो वर्तमान में है। वहाँ मन है, पर नियंत्रण में है,शांत है।परन्तु जहाँ... जहां विचारणा है, जड़ता है, चिन्तन शुरू हो जाता है, ... ध्यान शब्द का वे प्रयोग नहीं करते थे- न धर्म शब्द का। ध्यान का वास्तविक अर्थ है, निर्विचारता, ... जहां मन स्वयं विलीन हो जाता है। मन विचारों का जोड़ है। निर्विचारता में मन, अन्तर्मन हो जाता है। वहां विचार की विवेक में परिणिति हो जाती है। वहां निष्कामता प्रकट होती है।धर्म जन्म के साथ व्यक्ति को मिलता है,वे धारणाएँ जिनका उसे पालन करना होता है।
परन्तु आध्यात्म ,अपनी मूल उर्जा के साथ, अपने अस्त्तित्व के साथ जुड़ने की विधि है।यह जुड़ाव निरन्तरता में है।
निरन्तर, ... जैसे पानी की बूंदें गिरती है। एक धारा की तरह। रुक गई तो बूंद है नहीं तो धारा है, ... कॉन्सटेन्ट, ... यही बनी रहे। जाग्रत, स्वप्न, विचारणा, तीनों अवस्थाओं में एक्य रहे। यह ‘एक्य’ पाया जा सकता है। ‘निरन्तर’ वर्तमान में रहने से। वहीं परमात्म भाव में प्रवेश द्वार है। निर्विचारता ही द्वार है। इन्द्रियां मन के लिए बहिर्जगत में जाने का द्वार है। ‘अन्तर्यात्रा’ में मन इन्द्रियों से सिकुड़ लेता है, तब वह बाहर रास्ता नहीं मिलने पर, उसकी गति विपरीत हो जाती है, वह भीतर चला जाता है।
‘भगवान कृष्ण यहां कहते हैं- उस साधक का योग क्षेम ”मेैं “संभाल लेता हूं। अप्राप्त वस्तु का मिल जाना ”योग“ है, तथा उसको बनाए रखना ”क्षेम“ है। इसीलिए हम ईश्वर की ओर जाते हैं। सारे कर्मकांड का आधार यही है। यहां भगवान कह रहे हैं जो अनन्य भाव से, निष्कामता से निरन्तर मुझे भजता है, उसके योग क्षेम को मैं वहन करता हूं।
पूज्य स्वामीजी का यह प्रिय श्लोक था, ... यही उनकी साधना पद्धति का आधार था। उनके पास रहकर जाना, ... अनन्य, निष्कामता, निरन्तर भजन तथा योग क्षेम किस प्रकार वहन हो जाता है। मानो प्रकृति स्वयं उनकी हर आवश्यकता की पूर्ति कर देती थी। उनकी कुटिया में मानो ‘कल्पवृक्ष’ उग आया हो। वहां किसी प्रकार का अभाव नहीं था, ... वे जहां भी जाते थे, ... उनकी उपस्थिति मात्र से जो संभाव्य था, ... वह घट जाता था।
भगवान ने गीता से इसी अध्याय के 18वें श्लोक में ‘स्थान विधानं बीजमव्यमम्’ में ‘जिस सबका आधार विधान और अविनाशी कारण मैं ही हंू,इस रहस्य को स्पष्ट किया है-
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत।
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानंबीजमव्ययम्।।18
प्राप्त होने योग्य तथा भरण करने वाला सबका स्वामी , शुभा- शुभ देखने वाला सबका वास स्थान,शरण लेने योग्य,तथा प्रति उपकार न चाहकर हित करने वाला सबका आधार और निधान और अविनाशी कारण मैं ही हूँ।
पर संकेत दिया है, ... यहां ब्रह्मनिष्ठ गुरु की उपस्थिति, उस उत्प्रेरक की तरह हो जाती है, जो कुछ न करते हुए भी करता है। उसका वहां मन नहीं है, ... पर क्रियाएं अपने आप घटती है। उस शांत उर्जा का अनुभव जो भी यहां आता था, उसे होता था। वर्तमान में रहना, उस परम -गुह्य विद्या का सूत्र है, जिसे भगवान ने इस श्लोक में संकेत दिया है।‘योग, ... भक्त की पूर्णता है। उसके भीतर सारे द्वंद्व चले गए हैं। भक्ति की भाषा में परमात्मा की प्राप्ति है। साधारण भाषा में साधक की शारीरिक मानसिक, बौद्धिक, संपूर्ण आवश्यकताओं की पूर्ति है, क्षेम, उन्हें बनाए रखना है।
प्रायः हमारा चिन्तन भविष्य को लेकर होता है। बुढ़ापे में बीमारी व मृत्यु को लेकर उठता है। ‘हारे को हरिनाम’ तभी कहा जाता है।
‘भगवान यहां कह रहे हैं- ‘अनन्या, ... कोई दूसरा नहीं, ... मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरा न कोई, ... निष्काम भाव से, ... निरन्तर भजना। यहां निष्कामता, दूसरा पड़ाव है। तथा तीसरा है, निरन्तर...। स्वामीजी कहते थे- साधना, घंटे-दो घंटे बैठ गए ध्यान लगाया, ... पूजा करी, यह नहीं है। यह तो निरन्तर है। चौबीस घंटे। वर्तमान में रहा जाए। हर कर्म, हर क्रिया पूजा हो जाती है। मन, बाहर गया फिर भीतर आ गया, ... यह नहीं चौबीस घंटे बाहर ही बाहर भटकता रहा। यह स्वाभाविक अवस्था है। मन की स्वाभाविक अवस्था ‘शान्ति है। हमने उसे अशांत बना रखा है। जिन पांच कोशो की चर्चा होती है, अस्तित्व है, चेतना है, मन है, ध्यान है याने निविर्चारता है, ... जहां बुद्धि, शुद्ध होकर, विवेक में परिणित हो जाती है। फिर स्वाभाविक अवस्था है, ... परमात्मा है। पार होने की कला, मात्र वर्तमान में रहना है। इससे न तो मन का दमन होता है, न शरीर के प्रति अवज्ञा रहती है, न इन्द्रियों पर बलात दमन रहता है, मन स्वाभाविक रूप से अन्तर्मुखी होने लग जाता है। तब स्वयं प्रकृति, जो ब्रह्म की क्रियाशीलता है। जो परा है, वह साधक की आवश्यकताओं की पूर्ति अपने आप कर देती है। परन्तु होता इसके विपरीत है।
हम पहली तीन बातों पर भरोसा नहीं लाते, ... बस भगवान के नाम पर ‘मांग, बढ़ाए जाते हैं। भगवान यहां कह रहे हैं- ‘जो मुझ पर छोड़ता है, उसे मैं सम्हाल लेता हूं। जो खुद अपने आप पर भरोसा करता है, उसे सम्हालना पड़ता है। रास्ता एक ही है- दूसरा नहीं, जो भी काम हो, चाहे छोटा या बड़ा, मन को पूरी तरह उसमें लगा देना चाहिए- किंचित मात्र भी विपरीत भाव नहीं आना चाहिए, ... जरा सी भी जगह मिली, मन चिन्तन में चला जाता है। जहां अपूर्णता है, वहां निष्कामता चली जाती है, बहिर्मुखता यथावत बनी रहती है।
उसशुद्ध बुद्धि निष्काम प्रेमीभक्त का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआवह उपहार मैं प्रीतिसहित ग्रहण करता हूॅं।
भगवान कृष्ण ने यहां दो संकेत दिए हैं। हम भगवान को रोज याद करते हैं, ... सेवा करते हैं, मूर्ति को स्नान कराते हैं, भोग लगाते हैं, जो ध्यान मार्ग है, वे ध्यान में अमन होने का अभ्यास करते हैं।
भगवान कह रहे हैं, शुद्ध बुद्धि वाले, उस तल्लीन हुए अंतःकरण वाले, उस निष्काम प्रेमी, के उपहार को प्रीतिपूर्वक ग्रहण करता हूं।
स्वामीजी कहा करते थे- बुद्धि जब शत प्रतिशत शुद्ध होती है, तब विवेक की प्राप्ति होती है। शुद्ध बुद्धि का तात्पर्य, बुद्धि में अच्छे विचार हों, यह माना जाता है। लेकिन बुद्धि तब तक शुद्ध नहीं हो सकती, जब तक विचार हों। विचार ही विकार हैं।
सुबह-सुबह, दरवाजे पर एक आदमी कुत्ता लेकर आता था। दोनों के बीच में जंजीर थी। कभी कुत्ता, मालिक के इशारे पर चलता था, पर अचानक जंजीर छूट गई, आगे-आगे कुत्ता था, पीछे वह था। जाना, चाहे विचार आप पर हावी हांे, या आप विचार आपके अधीन हो, जंजीर हमेशा रहेगी। जहां विचार की नोक बाहर की ओर होती है। वह बाहर उलझता है, भागता है, भटकता है, यह बहिर्मुखता है। जाना विचार ही पाप है। पर जो चुप है। मौन है, वह बाहर से शांत दिखाई पड़ता है, पर भीतर उलझता है। उसका भीतर द्वन्द्व चलता रहता है। वह दुविधाग्रस्त रहता है। संशयात्मक विनश्यति, दोनों अवस्थाएं दोषपूर्ण हैं। चाहे विचार तमोगुणी हो, या सतोगुणी, ... विचार विकार ही हैं।
... हां, शुद्ध बुद्धि तीसरी स्थिति है, जब यांे कहे, निर्विकारता आ गई है। विकार ही नहीं रहे। विचार का अर्थ है, विकसित होने का भाव। जहां विचार ही नहीं रहता है। उस स्थिति का नाम है, शुद्ध बुद्धि। न कोई बांधने वाला है, न बंधने वाला। वहां मात्र भक्त बच जाता है। प्रेमी भक्त। निष्काम प्रेमी। वहां कामना के लिए कोई जगह नहीं है। कामना सदा भविष्य में रहती है। वर्तमान में न तो भूत का दबाव है न भविष्य का।
‘निष्काम प्रेमी तक पहुंचने का मार्ग है, ... जहां बुद्धि शुद्ध होती है, वहां हृदय भी शुद्ध होने लगता है। हृदय बायलोजिकल हृदय नहीं है। यह हृदय वह है जहां प्रेम उपजता है। बुद्धि का आधार है, चिंतन की ताकत है, बुद्धि अनुभव नहीं कर सकती। बुद्धि विश्लेषण करती है। वह तोड़ती चली जाती है। पर हृदय अनुभव करता है। यह हृदय की ताकत है। वहां संश्लेषण होता है। पूर्णता रहती है। अनुभव को विभाजित नहीं किया जा सकता है।
बुद्धि अशुद्ध होती है, विचारणा सेे हृदय अशुद्ध होता है, परदोष दर्शन तथा आत्मप्रशंसा से। जब बुद्धि और हृदय शुद्ध होते हैं, तब भक्त का जन्म होता है। वहां ‘विभक्त’ खो जाता है। भगवान कृष्ण ने यहां स्पष्ट कहा है- शुद्ध बुद्धि हो, तथा निष्काम प्रेमी हो, उसकी हर भेंटमें स्वीकार कर लेता हूं।
‘निष्काम प्रेमी’- जहां कर्तापन पूरा खो जाता है। मात्र कर्म मात्र रह जाता है। हमने लगाई अर्जी जैसी दाता की मर्जी, ... अपना कोई आग्रह नहीं, दुराग्रह नहीं।
.....भीतर कोई कामना नहीं, ... तब भीतर जो उत्पन्न होता है, वह आनंद है। उसका बाहर प्रतिफलन प्रेम है। प्रेम एक शक्ति है, एक आकर्षण है। जहां मात्र खिंचाव है। यह तभी पैदा होता है, जब भीतर का कर्ताभाव खो जाता है। तब उस साधक की भेंट भगवान प्रीतिपूर्वक ग्रहण कर लेते हैं।
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्।29
मै ंसब भूतों में समभाव में व्यापक हूँ, न कोई मेरा प्रिय है न अप्रिय,परन्तु जो भक्त मेरे को प्रेम से भजते हैं, वे मेरे में ,मैं भी उनमें प्रत्यक्ष हूँ। गीता की सार्वभौमिकता यही है। यहाँ ज्ञान सबके लिए है।परन्तु जो भक्त मेरे को प्रेम से भजते हैं,,वहाँ मैं अधिक प्रत्यक्ष हूँ।मुझे भजना।वर्त्तमान में रहने की यही उपसंपदा है।यही वास्तविक शक्तिसूत्र है।
क्या यह अधिकार मात्र किसी एक धर्म विशेष का है? क्या गीता मात्र एक पलायनवादी ग्रन्थ है? या गीता आधुनिक मानव के सृजन व उत्थान की महान योजना है?
मेरे को भजना का निहितार्थ ही अन्तर्यात्रा का प्रस्थान बिन्दु है।यही ं वर्त्तमान में रहने के सूत्र निहित हैं।
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यसितो हि सः। 9-30
क्षिप्रं भवति धर्माता शश्वच्छान्तिं निगच्छति
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति।। 9-31
‘‘यदि कोई अतिशय, दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरा भक्त हुआ मेरे को निरन्तर भजता है वह साधु ही मानने योग्य है क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है।
इसीलिए वह शीघ्र ही धर्माता हो जाता है और सदा रहने वाली परम शान्ति को प्राप्त होता है, हे अर्जुन तू निश्चयपूर्वक सत्य जान कि मेरा भक्त नष्ट नहीं होता। जो एक बार मुझे जान लेता है, वह फिर कभी दूर नहीं जाता।
इसके पूर्व श्लोक संख्या 9-29 में भगवान ने कहा है-
‘‘मैं सब भूतों में समभाव से व्यापक हूं, न कोई मेरा अप्रिय है न प्रिय है परन्तु जो भक्त मेरे को प्रेम से भजते हैं, वे मेरे में और मैं भी उनमें प्रकट हूं।
‘जो भक्त मेरे को प्रेम से भजते हैं- इसके बाद भगवान कृष्ण कह रहे हैं अतिशय दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरा भक्त हुआ, ... मेरे को निरन्तर भजता है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है, ... वह साधु मानने योग्य है। वह साधक धर्माता हो जाता है, वह परम शांति को प्राप्त होता है, मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता है, ... वहां मैं प्रकट होता हूं।
बूंद जब सागर में मिलती है, तो वह सागर ही हो जाती है। मनुष्य के भीतर ‘दिव्यता के अवतरण के यहां सूत्र हैं। पूज्य स्वामी जी इन श्लोकों को एक साथ रखकर कहा करते थे।
... अतिशय दुराचारी भी, ... प्रायः हम सदाचारी को ही परमात्मा के द्वार पर देखना चाहते हैं। परन्तु यहां भगवान, अतीत से वर्तमान तक की यात्रा को समेट रहे हैं। अतिशय दुराचारी वह कल था, ... परन्तु वह यथार्थ दृढ़ निश्चय वाला है, वह भी अनन्य भाव से निरन्तर भजता है, तो वह साधु मानने योग्य है, वह धर्मात्मा हो जाता है, परम शांति को प्राप्त होता है, वहां मैं प्रकट होता हूं।
... क्षिप्रं भवति धर्मात्मा, ... अतिशय दुराचारी भी जो दृढ़ निश्चय वाला है, वह दुष्कर्म से छूट नहीं सकता, जो भौतिकवादी हैं, उन्हें प्रबल बौद्धिक शक्ति भी प्राप्त हो जाती है। जिससे कालांतर में उनका पतन भी हो जाता है। परन्तु वह अगर ‘अनन्य भाव से मेरा भक्त है, निरन्तर भजता है तो वह साधु मानने योग्य है।
यहां पर महत्वपूर्ण शब्द यथार्थ निश्चयवाला है, ... संकल्प हमारे बनते नहीं है, आधा-अधूरा मन रहता है। हम लोटे की तरह लुढ़कते रहते हैं। पहली बात हमारा मन जो पचास जगह पर जाता है, वह इन्द्रियों से सिमटे, विषयों से सिमटे, उसकी बहिर्मुखता रुके, वह एक दृढ़ निश्चय वाला बने। कांपते हाथ से पात्र पकड़ा नहीं जाता। जब यह निश्चय दृढ़ होता है, ... तब संकल्प बनता है।
... यह संकल्प विधायी बने। नकारात्मक नहीं। तब यह संकल्प जहां अनन्य भाव से परमात्मा के स्मरण में आता है, होता है, तब ‘अन्तर्मुखता जन्मती है। ‘यथार्थ निश्चय, ... वह है उसके प्रति समर्पण, ... जो है उसका समग्र विचार। कहीं असंतोष नहीं, कोई कंपन नहीं। जहां मन-प्राण की युति होती है, वहीं योग है। ‘योगवत’, पूरी शक्ति के साथ वहाँ हो। तब जिसे छूटना होता है, उसका छूटना शुरू हो जाता है। जो निरन्तर वर्तमान में है, ... वहां स्वतः दुराचरण छूटता चला जाता है। अंतर्मन में प्रवेश तभी होता है, जहां मटमैली बूंद निर्मल हो जाती है। निर्मलता पाने के लिए बाह्य उपचार की कोई जरूरत नहीं है।
चाहे सफलता या असफलता पूरे प्राण-पण के साथ कामना। ”तान तितिशस्व भारतः,“, सहन करने की शक्ति अपने आप बढ़ती जाती है।
‘संकल्पवान होने के लिए सभी कहते हैं। नियम है, जो काम आप कर सकते हैं, कर दंे। जो काम आपकी शक्ति के बाहर है, उचित है, सही है, उसे ईश्वर पर छोड़ दें ।जो काम आप उचित नहीं मानते हैं, उन्हें तुरंत छोड़ दें।
जो भी काम है उस पर पूरे मन को ले आवें, ... पूरी तरह लेश मात्र भी विचारणा को आने को जगह नहीं, ... शक्ति अपने आप पैदा होती है, आप संकल्प में प्रवेश करने लग जाते हैं। संकल्प याने एक ही निश्चयात्मक विचार, ... जहां विचारणा का कोई आदर नहीं है। तब ज्ीपदा वदबम ंदक कमबपकम वदबम दमअमत ींअम ं ेमबवदक जीवनहीज का आदर स्वतः होने लगता है। तथा विचारणा-विचार में तथा विचार संकल्प में ढल जाता है।
... यह जो दृढ़ निश्चय वाला है, अनन्य भाव से जो मुझे स्मरण करता है- यहां अनन्य भाव, महत्वपूर्ण है। निष्ठा भीतर से आती है बाहर की ओर जाती है,, वहां श्र(ा उपजती है। निष्ठा दूसरे के प्रति होती है, श्र(ा स्वयं से होकर, स्वयं में प्राप्त होती है। भाव अनन्य है। कोई दूसरा नहीं है। वहां निरन्तर रहना है। यह स्वाभाविक अवस्था है। सहजावस्था है। निरन्तर वर्तमान में रहना है। वहीं परमात्मा का प्रवेश द्वार है। यहां चेतना की धारा अन्तर्मुखी है। वह बाहर जाता हुआ भी, कार्य करता हुआ भी, निरन्तर भीतर से जुड़ा है, उसका उसे अहसास है, वही प्रेम है।
वहीं धर्म उपजता है, उसे ही धर्म की प्राप्ति होती है। वही धर्मात्मा होता है। धर्म ही उसका स्वभाव बन जाता है। वही सदा रहने वाली शांति को प्राप्त होता है। वही दिव्यता का अवतरण हो जाता है। विराट की वहां उपस्थिति है।
स्वामीजी के साथ रहकर जाना था, ... गीता के शब्द, अपने भीतर जिस अर्थ को ध्वनित करते हैं , उनका वहां गुंजायमान था। वहीं धर्म जन्मता है। वहीं सागर की उपस्थिति का अहसास होता है। जहां नदी शांत होकर विलीन हो गई है। बुद्धि भाषा के अनेक अर्थ खोल सकती है, परन्तु जहां सदगुरु स्वयं उपस्थित हों, जहां शब्द स्वयं मूर्त होकर उदाहरण दे रहे हो, वहां अर्थ स्वतः भीतर तक वर्षा की बूंदों की तरह रिसता चला जाता है।
मन्मना भव मÚक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामे वैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः।। 9-34
तू मुझ परमात्मा में ही अनन्य प्रेम से अचल मन वाला हो, मुझ परमेश्वर को ही निरन्तर भजने वाला हो, मेरा पूजन करने वाला हो, मेरे को नमस्कार कर, इस प्रकार मेरे शरण हुआ तू आत्मा को मेरे में एकीभाव करके मेरे को ही प्राप्त होगा-
मद्भक्तः- मेरा भक्त होजा। मन्मनाभव- मेरे में मन वाला हो जा। मद्याजी- मेरा पूजन करने वाला हो। मां- नमस्कुरु- मेरे को नमस्कार कर।
मामे वैष्यसि- मेरे को प्राप्त होगा। युक्त्वैव मात्मानं- अपने आपको मेरे में लगाकर। मत्परायण- मेरे साथ अभिन्नता हो (मेरे में एकीभाव करके)।
स्वामीजी एक वाक्य में कहा करते थे- जो मैं भीतर हूं, उससे निरन्तर जुड़े रहो। इसके पूर्व के श्लोक में कहा गया है- ‘‘तू सुख रहित और क्षण भंगुर इस लोक को पाकर निरन्तर मेरा ही भजन कर।
क्षण-भंगुर , यहां कुछ भी स्थाई नहीं है, हर वस्तु प्रतिपल बदल रही है। हमारी देह, हमारा मन, हमारे विचार यहां कुछ भी स्थाई नहीं है। तब क्या किया जाए, कैसे रहा जाए? स्वामीजी कहते थे- ज्ञान सहित रहना, यह जो प्राकृतिक विधान है, ... उसको समझकर जीना, ... जीवन के नियमों को जानकर जीना, जीने की कला है, जीवन जीने के लिए मिला है। यहां भगवान कह रहे हैं, तू निरंतर मेरा भजन कर। कॉन्सटेन्ट अवेयरनेस। सतत सजगता। यह प्राप्त होती है, निरन्तर वर्तमान में रहने से। वर्तमान क्या है? यह समझ से परे , रहने की कला है, क्रिया के साथ रहना, वर्तमान में रहने की की आंशिक सूचना है, यह मात्र विधि है, बस। पर जो भीतर ‘माम’ है, उससे जुड़े रहने का अहसास। बाहर रहते हुए भी भीतर से जुड़े रहने का अहसास। यह प्राप्त होता है, ‘अंतर्मुखता’ से। अंतर्मुखता प्राप्त होती है, निरन्तर वर्तमान में रहने से। यह स्वाभाविक अवस्था है। स्वामीजी इसे ‘सहजावस्था’ भी कहते थे। यहां निराशा नहीं है। यहां पलायन नहीं है। वरन् अत्यधिक सक्रियता है, शांति है। नियंत्रित मन है, जो अंतर्मन में विलीन हो चुका है, बुद्धि ,शुद्ध है, हृदय पवित्र है। वहां दिव्यता के प्राकट्य की संभावना होती है। वह जो मैं भीतर हूं जो ‘माम’ निरंतर उसके साथ जुड़ाव की अनुभूति हो। अनुभूति हृदय करता है। यह बुद्धि के पार है। ध्यान- निरंतर वर्तमान में रहने की स्थिति है।विचार ही विकार हैं। निर्विचारता ही निर्विकारता की कंुजी है। जहां हृदय भी पवित्र होने लग जाता है। यह अवस्था प्राप्त होती है- ‘‘माम अनुस्मर युद्ध च’’ ...निरन्तर सजगता में रहने से। यहीं शांति में प्रवेश द्वार है।