Thursday, November 28, 2013

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Wednesday, November 27, 2013

श्री गुरु गीता अठारहवां अध्याय

श्री गुरु गीता अठारहवां अध्याय


‘‘स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धि लभते नरः।
स्वकर्मनिरतः सिद्धि यथा विन्दति तच्छृणु।। 45

अपने-अपने स्वाभाविक कर्म में लगा हुआ मनुष्य भगवत प्राप्ति रूप परम सिद्धि को प्राप्त होता है। परन्तु जिस प्रकार से अपने स्वाभाविक कर्म में लगा हुआ मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त होता है, उस विधि को तू मेरे से सुन।

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
‘‘स्वकर्मणा तमभ्यर्च्थ सि(ि विच्दति मानवः 46

 जिस परमात्मा से सर्व भूतों की उत्पत्ति हुई है।जिससे यह सर्व जगत व्याप्त है।उस परमेश्वर को अपने स्वाभाविक कर्म द्वारा पूजकर मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त होता है।

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः पर धर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वभावनियतं  कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।।47
अच्छी प्रकार आचरण किए हुए दूसरे के धर्म से गुण रहित भी अपना धर्म श्रेय है। क्योंकि स्वभाव से नियत किए हुए स्वधर्म रूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को प्राप्त नहीं होता है।
स्वधर्म और स्वकर्म दोनों में अन्तर है। स्वधर्म- हमारे भीतर की अनुगूंज है। हमारा मौलिक स्वभाव है। मन का स्वभाव शांति है। अन्तर्मुखी व्यक्तित्व शांत है, वहीं ज्ञान है, वहीं  शक्ति है। यह मेरी निजता है। यह मेरा स्वभाव है, यहां जो गुणधर्म शेष बच जाता है, वह स्वधर्म है।
कर्म है, वह बाहर है, धर्म है वह भीतर है। कर्म, धर्म तक यात्रा करता है। जो कर्म का विभाजन है, उसे भगवान ृकृष्ण ने गीता में वर्ण के आधार पर विभाजित किया है। हर वर्ण की स्वाभाविक विशेषता है। उसकी यात्रा का प्रस्थान बिन्दु है। लक्ष्य एक ही है, पर साधन सामग्री में भिन्नता है। रूचि में भिन्नता है, ... यह भिन्नता उसका स्वाभाविक गुण कर्म है। यह उसका स्वकर्म है, उस कर्म में पूरी तरह से अपने आपको लगा देना ही साधन तत्व है। जहां मन पूरा लगा, ... वहां वह अमन होने लगता है। अन्तर्यात्रा उपलब्ध हो जाती है। यहां भगवान कह रहे हैं अपने हीस्वकर्म में पूरी तरह उतरने से स्वधर्म की प्राप्ति हो जाती है।

अपने-अपने स्वाभाविक कर्म में लगा हुआ मनुष्य भगवत्प्राप्ति रूप परम सिद्धि को प्राप्त होता है।
यहां भगवान कह रहे हैं, जो जीवन प्राप्त हुआ है, वहां हर क्रिया पूज्य है कहीं अलग हटकर पूजा की विधि नहीं है। हर क्रिया, हर कर्म परमात्मा के द्वार तक जाता है। कर्म ही यहां पूजा की सामग्री है, वही वंदना है।
कर्मों को बदलने की चेष्ठा व्यर्थ है, इस नाटक में जो भी रोल मिला है वह खूबसूरती से हो जाए, कोई कमी न रहे। मन पूरा उसी में डूब जाए। यही अहसास है, हर कर्म में उसी परमात्मा का संगीत है। इसीलिए अच्छी प्रकार आचरण किए हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित अपना धर्म श्रेष्ठ है। क्योंकि- स्वभाव से नियत किए हुए स्वधर्म रूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को प्राप्त नहीं होता है।
हम जो भी कर्म कर रहे हैं, जो जीवन प्राप्त हुआ है, वे हमारे संस्कारों की छाया है। वे हमारा ही अर्जन है। हमने ही उन्हें मांगा है। वे हमारी ही मांग है। ... वे पूरा होने के लिए ही आए हैं। वहां मन को पूरा लगा देना है। आधा-अधूरा नहीं, दूसरे को देखकर कोई अतिरिक्त मांग नहीं, ... तब और भी कष्ट आएगा, ... वह स्वभाव के प्रतिकूल आएगा। अपने स्वाभाविक कर्म और आचरण को आधार मानते हुए उस कर्म को नियत मानते हुए पूरा मन वहां लगा देना चाहिए। छूटना होगा, ... स्वाभाविक क्रम में छूटता चला जाएगा। यही ‘दाता’ की मर्जी है।
दुख का बड़ा कारण प्राप्त सामर्थ्य का दुरुपयोग है। ”आकाश ही सीमा है, कहकर हम दूसरे को पूरा सोख लेते हैं। हम अपनी सीमा के बाहर कार्य करते हैं, धन व यश कमाने की लालसा में चले जाते हैं। जब लौटते हैं तो कई बार इतनी देर होजाती है कि अपने आपको ही खो देते हैं।

‘‘तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।। 62

हे भारत सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही अनन्य शरण को प्राप्त हो, उस परमात्मा की कृपा से ही परम शान्ति को और सनातन परमधाम को प्राप्त होगा।
मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी उसका अहंकार है। उसका ‘मैं’ भाव है। उसके सामने परम गुरु भी आ जाएं ,खुद परमात्मा भी सामने आजाए, पर उनके प्रति उसमें श्रद्धा-विश्वास नहीं होता। परन्तु जब वे चले जाते हैं। तब हर पल उनकी याद सताती है। पूज्य स्वामीजी जब तक रहे। वर्षों उनसे प्रश्न पूछते रहे, ... अपने आप में आश्वस्त रहे कि महान सिद्ध संत से हमारा जुड़ाव है, ... पर उनके बार-बार कहने पर भी प्रयोग में नहीं गए। मात्र शब्द ग्रहण करते रहे। क्यों? श्रद्धा-विश्वास दोनों ही नहीं रहा था। न अपने प्रति न दूसरे के प्रति। शास्त्र कहते हैं, जिनसे अधिक परिचय होता है, उनकी अवज्ञा होती है। यह मन की स्वाभाविक आदत है। कभी भी पुत्र के मन में पिता के प्रति, पत्नी में पति के प्रति, बुद्धिमान मंे गुरु के प्रति आदर नहीं होता। क्यों? अर्जुन जो कृष्ण के इतने समीप था, उसने भी गीता पूरी सुनने के बाद, और तो और विराट स्वरूप के दर्शन के बाद , दुबारा कृष्ण से ही महाभारत की समाप्ति के बाद गीता सुनाने का कहा था। वह  तो कृष्ण को ही सारथी बनाकर लाया है।
भगवान सामने है, अर्जुन का रथ हांक रहे हैं, ... परन्तु अर्जुन के भीतर कहीं शरणागति नहीं है। वह प्रश्न पर प्रश्न पूछे जा रहा है, तब भगवान कह रहे हैं- तू परमेश्वर की अनन्य शरण में जा- ”वह सबके हृदय में स्थित हैं।“कृष्ण ने अपने आपको कहीं परमेश्वर नही कहा।
स्वामीजी कहते थे- क्रिया बाहर होती है, मन भीतर है। वह भीतर से प्रेरणा लेता है, वृत्तियां भीतर से उछाला करती हैं। उसे प्रेरणा भीतर से मिलती है। बाहर रहते हुए भी ,वह तो तूही है, तेरे पास है।  संत कबीर ने कहा है, जिस घट भीतर बाग बगीचे , वहीं है सिरजन हारा भजन सभी सुनते हैं, पर विश्वास किसको होता है? भीतर संबंध निरन्तर जुड़ा रहे, ... यही साधन है। वह बाहर ही बाहर न भटकता रहे। तब शांति व शक्ति दोनों मिलती है।

‘सर्व भावेन- निरन्तर वर्तमान में रहने से, यह स्थिति आती है। चिन्तन न होने से वृत्तियों तथा विषयों का संबंध टूट जाता है। तब स्वाभाविक अवस्था में मन शांत होने लगता है।

‘‘मन्मना भव मÚक्तोे मद्याजी मां नमस्कुरू।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसिमे। 65

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहंत्वासर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामिमा शुचः।। 66

तू केवल मुझ परमात्मा में ही अनन्य प्रेम से नित्य निरन्तर अचल मन वाला हो और मुझ परमेश्वर को ही अतिशय श्रद्धा-भक्ति सहित निरन्तर भजने वाला हो तथा मन, वाणी और शरीर द्वारा सर्वस्व अर्पण करके मेरा पूजन करने वाला हो, सबके आश्रय स्वरूप वासुदेव को नमस्कार, ऐसा करने से तू मेरे को ही प्राप्त होगा, यह मैं तेरे लिए सत्य प्रतिज्ञा करता हूं, क्योंकि तू मेरा प्रिय सखा है।

सर्व धर्मों को अर्थात् संपूर्ण कर्मों के आश्रय को त्यागकर केवल एक मुझ एक सच्चिदानंदघन वासुदेव परमात्मा की ही अनन्य शरण को प्राप्त हो, मैं तेरे को संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूंगा, ... शोक मत कर।
यहां साधन का प्रारंभ है। संदेह का परित्याग। जहां अहंकार होता है, वहां संदेह रहता है। जहां हृदय है, वहां भाव है, वहां समर्पण है।
‘अनन्य श्रद्धा है। अहंकार , शक्ति को तोड़ता है। विभाजित करता रहता है। जहां भक्त है। वहां बंटवारा नहीं है। मन जब अंतर्मुखी होता है। वहां समर्पण जन्मता है। जब तक बहिर्मुखता होता है, वहां तक अहंकार है।  संदेह है। भटकाव है।
हम कौन से मार्ग से आ रहे हैं, यह सोचना व्यर्थ है। समर्पण का मार्ग अलग नहीं है। जहां बहिर्मुखता है, वहां मार्ग है। वहां अहंकार है। वहां संदेह है। जहां अतंर्मुखता है, वहां धारा-राधा बन जाती है। वहां बस समर्पण शेष रहता है।
 श्रद्धा बहिर्मुखता पर रोक लगाती  है। जहां विचारणा होती है। वहां विकल्प होते हैं। विचार तो तभी होता है, जहां विचारणा नहीं रहती। विचारणा का अंतिम छोर विचार है, जब विचार गिर जाता है, वहां निर्विकल्पता होती है। वहां निश्चयात्मकता होती है। वहां निर्णय होता है।
समर्पण वहीं होता है, जहां ‘मैं’ नहीं रहता। जहां कर्ता खो जाता है जहां समर्पण पूरा होता है, वहां पाप भी गिर जाता है। क्योंकि विचार ही तो पाप है।

और तब गीता का समाहार  , आज के युवक की इस स्वीकारोक्ति के साथ होता है।गीता वृद्धों का कोई अरण्य गान नहीं है, नहीं यह मृत्यु पर गाया जाने वाला शोकगीत है, यह आज के संघर्षशील युवक के लिए ,उस रास्ते को बताती है, जिस पर चलकर वह , शांति , शक्ति तथा वैभव पा सकता है, जो आज उसकी मॉंग हैं

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धात्वत्प्रसादान्मयाच्युज
स्थितोऽस्मि गत सन्देहः करिष्ये वचनं तब।ं 73।

अर्जुन का कथन है आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट होगया है, मुझे स्मृति की प्राप्ति हुई है। मेरा संशय दूर हुआ है। मैं आपकी आज्ञा का पालन करूॅंगा।
गीता राम-रसायन है, यह आधुनिक मनुष्य की समस्याओं को एक मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देख रही है। भारतीय समाज का पतन इसीलिए हुआ कि कि हमने  बुद्ध और शंकराचार्य के बीच के समय में हजार वर्ष के बीच गीता को विस्मृत ही कर दिया था। पूज्य स्वामीजी की साधना पद्धति गीता पर आधारित थी। वे मनुष्य के लिए प्रयत्न और पुरुषार्थ दोनो को आवश्यक मानते थे। संसार में सफलता प्रयत्न से मिलती है, प्रकृति ने जो भी कार्य सौंपा है, उसे उत्कृष्टता से करना शरीर का उद्देश्य है। जीवन का उद्देश्य इसी जीवन में परमात्मा की महान शक्ति का ज्ञान प्राप्त करना है। पुरुषार्थ इसीलिए ही  है। उसके लिए  सुबह और शाम को वे निर्विचारता के अभ्यास के लिए कहते थे। निरन्तर वर्तमान में रहना उनकी साधना रही, अंर्तुमुखता प्राप्त करो, यही उनका आप्त वचन था। वे याचक वृत्ति के विरुद्ध रहे। एक नया मनुष्य जो सुखी है, शांत है, और शक्तिशाली है, वही साधक है , वे अर्जुन को इसी लक्ष्य की प्र्राप्ति में देखते थे।

गीता के आधार पर प्रयत्न और पुरुषार्थ की इस एकीकृत  साधन प्रणाली से उस नए मनुष्य का आगमन संभव है, जो विवेक को गुरु मानकर उसके आलोक में अपना पथ तय करेगा। इस मनुष्य के पास गहरा आत्मविश्वास होगा, संतोष होगा , प्रसन्नता होगी, जो पलायनवादी दृष्टि से दूर , इस आधुनिक समाज मंे अपने महत्वपूर्ण  योगदान से रेखांकित होगा। अर्जुन को मोह दूर होना, उसकीसंशयात्मा का दूर होना , निर्णय की ओर बढ़ना , आज की दुनिया में हर हारे हुए मनुष्य के लिए नई जिन्दगी की शुरुआत है।

क्या गीता को हम पलायनवादी दृष्टि से विवेचित कर सकते हैं?
संजय के ही शब्द  ही मत्वपूर्ण हैं, उसी ने ही गीता को ध्ृातराष्ट्र के वाक्य के साथ शुरु किया था। वही अंत में कह रहा है-
‘यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम।। 67

जहां योगेश्वर श्रीकृष्ण है वहां गांडीवधारी अर्जुन है  ,वहीं पर श्री, विजय, विभूति अचल नीति है, ऐसा मेरा मत है।
‘यह संजय की सीख है। जो उसने धृतराष्ट्र को गीता सुनाकर पाई है। गीता का अभिप्राय, गीता का सार, ... इस एक श्लोक में आया है।
यहां गीता का समापन है।
पूर्व में भगवान कृष्ण ने कहा-
‘तस्मात सर्वेषुकालेषु माम अनुस्मर युद्ध च’
... मेरा स्मरण वह भी निरन्तर तथा युद्ध भी हो, ... कर्म भी हो? यहां संजय  यही कह रहा है-
जहां भगवान योगेश्वर श्री कृष्ण है, ... तथा गांडीव धारी अर्जुन है। भगवान- योगेश्वर है, तथा अर्जुन धर्नुधारी हैं। वही पर ही श्री, विजय, विभूति, अचल नीति है।
भगवान बुद्ध ने, चार आर्य सत्य बताकर मनुष्य मात्र की दुःख से मुक्ति का उपाय निर्देशित किया था। मनुष्य की वास्तविक मांग यही है, वह शांति व सुख पाए। सुख की संपूर्ण व्याख्या, श्री, विजय, विभूति में है, ... यह किस प्रकार संभव हो?हमारा  भी यहॉं वही मत है, जो संजय का मत है, जहां भगवान योगेश्वर कृष्ण हैं तथा गांडीवधारी अर्जुन है। वही ंयह संभव है।

निरन्तर वर्तमान में रहना ही वह विधि है, जिससे यह संभव है। जो अतर्मुखी है, ... वह निरन्तर वर्तमान में है, वह बाहर से भी जुड़ा है, वहां कर्मठता है। शक्तियां भी हैं, परन्तु वह भीतर से जुड़ा रहकर, प्रेरणा लेकर, जहां शांत है, वही पर शक्ति संपन्न भी है। यहां मनुष्य के कर्म त्याग की बात नहीं है। यह वह अवस्था है कि वह अतिरिक्त संपदा जिसे सन्यास कहा जाता है, उससे सन्निहित है, वह गृहस्थ के कर्म कौशल से भी जुड़ा है।
वही वास्तविक स्थितिप्रज्ञ है। जो स्थितिप्रज्ञ है। उसके भीतर योगेश्वर की कृपा की उपस्थिति है। जो प्रत्येक प्राणी के हृदय में है। वह शांत है। उसका मन उसके अधीन है। इन्द्रियां मन के अधीन है। वृत्तियां उठती है, पर तितिक्षा से उनके वेग को सहन करता हुआ, अविचलित है।

पर साथ ही वह कर्मठ है, प्रेरणा से प्राप्त स्वकर्म व स्वधर्म का पालन करता है, वह कुशलता से प्राप्त कर्म को निष्काम भाव से करता हुआ, प्रकृति के कार्य में सहयोग करता है।
मनुष्य प्रयत्न और पुरुषार्थ की शक्ति लेकर पैदा हुआ है। वह सांसारिक ज्ञान और संासारिक सम्पदाओं की खोज में पूरी आयु गंवा देता है। बाह्य की संपदाओं की सीमा है। यह जीवन यात्रा का एक पड़ाव है। उसे अपने को बेहतर बनाते हुए,अपनी चेतना को ऊर्ध्वगामी रखना है। सुख, शांति और शक्ति उस परम के समीप समर्पण से ही मिलती है। जहॉं वह ”मम“ की दासता को छोड़कर अपने ”माम“ से जुड़ जाता है।

यह वह अद्भुत कीमिया है, जहां वह भक्त है, वहीं वह योगी है, वहीं वह स्थितिप्रज्ञ है, ... गीता का यह सार तत्व श्री गुरु गीता है।
 जहां संसार से पलायन नहीं, वरन जगत की इस लीला में सक्रिय सहयोग देते हुए परम शांति पाने की प्रयोग धर्मिता है।पूज्य स्वामीजी के द्वारा दिए गए श्री गीता के संदेश को यहाँ पुनः यहाँ प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।उनके साथ लगभग तीस वर्षोका सानिध्य रहा, उन्होंने स्वतंत्र कोई आध्यात्मिक ग्रंथ नहीं लिखा, समय-समय पर प्रवचनों में, आपने  जिन श्लोकों पर  प्रकाश डाला था तथा जिन्हें पढ़ने ,मनन करने के लिए निर्देश दिए थे, वर्षोतक वे अंतःकरण में पुष्पित व पल्लवित होते रहे, अमरीका प्रवास में मेरे  छोटेपुत्र ने मुझसे गीता पर अपने मित्रों के साथ चर्चा की थी , तब अचानक ही यह  विचार स्वतः ही उपज गया था।  उसे ही मैंने इस कृति का पहला प्रारूप भेजा भी था। वह तो आज दुनिया में नहीं हे। पर उससे और उसके मित्रों केसाथ बीते हुए क्षण इस कृति के माध्यम से उसे ही समर्पित हैं वे ही यहाँ पर विवेचित किए गए हैं।

Monday, November 25, 2013

श्री गुरु गीता सतरहवां अध्याय

श्री गुरु गीता सतरहवां अध्याय


‘‘सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्द्धः स एव सः।। 17-3

हे भारत सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके अन्तःकरण के अनुरुप होती है तथा यह पुरुष श्रद्धामय है इसलिए जो पुरुष जैसी श्रद्धा वाला है वह स्वयम् वही है। अर्थात् जैसा जिसकी श्रद्धा है वैसा ही उसका स्वरूप है।

यो यच्छ्र्र स एव सः जो मनुष्य जैसी श्रद्धा वाला है, वैसी ही उसकी निष्ठा होगी और उसके अनुसार ही उसकी गति होगी। उसका प्रत्येक भाव और क्रिया अन्तःकरण की श्रद्धा के अनुसार ही होगी।

जहां सत का प्राधान्य है, वहीं पर वर्तमान में रहना अनुभव में प्रवेश कराता है। अक्रिया, ... जहां करना न करना पूर्ण हो, ... करना तो काम है, ... पर कर्ता गौण हो गया है। यहां मन पूरी तरह डूब जाता है। मन पूरा चला जाता है। जहां मन पूरा गया, वहीं बहिर्मुखता कम हो जाती है। अक्रिया में अहंकार खो जाता है। वहां जो कर्म है, न उसका चिन्तन बनता है, न योग बनता है। यह बहुत ही सूक्ष्म क्रिया है।
पर जहां रज का प्राधान्य है, वहां क्रिया की मांग होती है, ... लगता है बिना किए कुछ होने वाला नहीं है। मैं हमेशा साधन की मांग करता था, ... तलाश करता था, ... स्वामीजी जो कह रहे थे- शब्द तो आ रहे थे, ... पर उनका अर्थ खो गया था। रजोगुण- कुछ न कुछ करने में भरोसा रखता है। बिना किए चैन नहीं मिलता। ... वहां ध्यान का अर्थ ही कुछ न कुछ करना होता है।
जहां तमस है, ...वहां कुछ भी न करने का आग्रह है। पर एक भरोसा है, गुरु करेंगे, ... भगवान करेंगे, ... बस। वह दूसरे पर सब छोड़ने को तुरंत राजी हो जाता है। गुरुडम प्रायः तामसी लोग फैलाते हैं। उन्हें गुरु और गुरुडम रास आते हैं।
मनुष्य की श्रद्धा उनके अंतःकरण के अनुरूप होती है- अंतःकरण की पहचान श्रद्धा की पहचान है। तीनों गुण कहीं पर भी समान मात्रा में नहीं होते। प्रकृति का स्वभाव है, हर व्यक्ति की अपनी पृथक पहचान। कहीं कुछ ज्यादा है, कहीं कुछ कम। अपनी श्रद्धा को पहचानना ही, अपने आपको जानने का मार्ग है। उसी अनुरूप कार्य करने से सफलता की संभावना बनती है।
यह सतरवां अध्याय साधन पक्ष की आधारशिला है-

भगवान कृष्ण कह रहे हैं-
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः।
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः।। 4
‘सात्विक पुरुष तो देवों को पूजते हैं और राजस यक्ष और राक्षसों को तथा अन्य तामस मनुष्य है, वे प्रेत और भूत गणों को पूजते हैं।

गुणों के आधार पर मनुष्यों का विभाजन है, ... तो तामस है, उसकी पहचान प्रमाद है, आलस्य है, जड़ता है। रजोगुण का आधार गति है, विस्तार है, तथा सतोगुण दोनों का संतुलन है। भोजन, यज्ञ, तप, रस भी इन तीनों प्रवृत्तियों का पृथक-पृथक होता है। शरीर का तप, वाणी का तप, तथा मन का तप यह भी तीन प्रकार का है। यह भी गुणों के आधार पर तीन प्रकार का है।
यह गुणों का विभाजन, मनुष्य की बर्हिजगत की यात्रा पर ‘सत पथ’ की ओर आने को संकेतित करता है। जो तामसी है, उनका अगला विकास राजसी में होना है, तथा इसके बाद ‘वे सात्विक’ होंगे। ‘क्या सात्विक, पलायन का पर्याय है।
 स्वामीजी पश्चिम के दो शब्द एक्ट्रोवर्ट तथा इन्ट्रोवर्ट को स्वीकार नहीं करते थे, ... बहिर्मुखी वह है जो बाहर ही बाहर भटकता है, परन्तु अंतर्मुखी वह है जो भीतर का मार्ग पा लेता है, ... वह मन का मूल निवास जहां है, वहां है, वहॉं मन नियंत्रण में है, वह तो गति है, उर्जा है, परन्तु बाहर जाना न जाना अब विवेकाधीन है। ‘अंतर्मुखीः मन की भीतरी यात्रा का गवाह है। यहां मन इन्द्रियों से सिकुड़ता हुआ। विषयों को छोड़ता हुआ भीतर आता है, बुद्धि का आधार संकल्प-विकल्प है। बुद्धि जब निश्चयात्मक होती है। तब अनावश्यक चिन्तन गिर जाता है। तब मन अंतर्मुखी होता है। तब उसे हृदय की प्राप्ति होती है। विचारणा, विचार में तथा विचार भाव में रूपांतरित हो जाता है। अंतर्मुखी कटा हुआ, पलायनवादी, आत्महीन नहीं होता है। ‘भगवान कृष्ण कह रहे हैं- ‘माम अनुस्सर युद्ध च’ व युद्ध भी करता है, संघर्षरत है तथा वह निरन्तर स्मरण में भी है, वह है, वह अपने मूल स्रोत से जुड़ा हुआ है। उसे उसका अहसास है।

पूज्य स्वामीजी कहते थे- मन की शांति तो भांग पीकर भी आ जाती है। वह तमस है। पर शांत मन,  साधना की, उसकी प्राप्ति है। मनुष्य के जीवन का उद्देश्य सुख व शांति प्राप्त होना है। जगत भी उतना ही सत्य है, जितना कि ब्रह्म है। जगत ही ईश्वर की साकार उपस्थिति है। उसकी सेवा, उसके प्रति कर्तव्य कर्म की भावना, पूजा है। जो बाहर साध पाता है वही भीतर भी साध पाता है, ... जो बाहर के संबंध तोड़कर मात्र भीतर ही रहना चाहता है, वह अंतर्मुखी नहीं है।
अंतर्मुखी तो शक्ति का भंडार है, जहां शांति है, वही शक्ति है। शक्ति इस जीवन में हमारे कार्य व्यवहार सही चले, हम सुखी हो, शांत हों। स्वयं शांति से जीएं दूसरों को जीने दे, ... यह अंतर्मुखी की पहचान है। गलती यही हुई है। हमारे शास्त्रों के अधूरे अध्ययन से यह हुआ है। गीता में भगवान कृष्ण ने इसी संतुलन को रूपायित किया है। पर हमने उनका अधूरा ही संदेश ग्रहण किया है। जो याचक है, वही दीन है, वह भिखारी है।

स्वामीजी कहते थे- मैंने सन्यास लेकर पहला संकल्प यही लिया था कि मैं भीख नहीं लूंगा। प्रारंभ में कठिनाई आई, तब गुरुजी ने अपने भोजन से एक दो चपाती देना शुरू कर दिया था। यही कारण है कि मेरा भोजन अल्प से अल्प होता चला गया। सन्यास लेकर गुरुकुल चलाया, पहले काम किया, सेवा की फिर अन्न ग्रहण किया।’’
यही संतुलन, सुख व शांति का पाना गीता का संदेश है।

स्वामीजी कहते थे- यह तो अंतर्मुखता है, यह निरन्तर वर्तमान में रहने से प्राप्त होती है, यह जो मनोवैज्ञानिक बंटवारा, बहिर्मुखी व अंतर्मुखता होता है, वह यहां नहीं है। उन्होंने जो बाहर से चुप रहता है, उसे भी  बहिर्मुखी कहा है। जो बाहर से संबंध छोड़ देता है, उसे भी कहा है। बहिर्मुखी वही है जो भीतर आना ही नहीं चाहता। वह बाहर एक काम से दूसरे में, दूसरे से तीसरे में। उसका मन बाहर ही बाहर भटकता रहता है। अंतर्मुखी वह है, जो भीतर का रास्ता भी जानता है, वहीं रहता है, पर जब बाहर जाना होता है, उतनी गति व शक्ति के साथ बाहर जाता है। वही काम पूरा हुआ, मन स्वाभाविक रूप से, सहजता में भीतर चला आता है। वह बाहर नहीं भटकता।

यह संतुलन ही, वर्तमान में रहकर पाया जाता है। यही अब तक नहीं हो पाया है। या तो बाहर ही उलझे रहे, या बाहर का दरवाजा बंदकर बस भीतर मुड़ गए। इससे जीवन असंतुलित हो गया। जो जीवन की इन दोनों धाराओं पर सम्यक रहताहै, ... वही अंतर्मुखी है। संसार तो रहेगा। हम नौकरी भी करेंगे, ... धंधा भी होगा, परिवार भी होगा, सही कार्य सुचारू रूप से करने हैं। यही जीवन जीने की कला है।
अंतर्मुखी व्यक्ति शांत है। पर अत्यधिक सक्रिय भी। वह याचक नहीं है। वह दाता होता है। वह परमात्मा की महान शक्ति से जुड़ा होता हुआ भी सामान्य जीवन परन्तु अद्वितीय जीता है। वह विशेष नहीं है। उसके जीवन में असामान्यता नहीं है। वह सामान्य है। सहज है। सरल है। स्वाभाविक है।

विज्ञान, टैक्नोलॉजी, ... प्रबन्धन, वहां सबका सदुपयोग है, ... यह मनुष्य को सुख देने के लिए है, ... मनुष्य सुखी व शांत जीवन जीता है, यही सार तत्व है। यहां द्वन्द्व नहीं है। यह जो कहा जाता है कि मनुष्य को दो में से एक चुनना है, यह असंगत है। भगवान कृष्ण ने इस व्यक्तित्व के लिए -‘स्थितिप्रज्ञ’ शब्द कहा है। वह दोनों तरफ सहजता से जाता है।
यहां छोड़ना कुछ भी नहीं है। जिसे छूटना होता है, स्वतः होता है। रात स्वप्न में देखा, ... कहीं गया हूं, ... वहां बहुत बढ़िया भोजन रखा है, ... पाया झुकाव उधर है, पाया स्वाद भी है, तथा क्रोध भी है। जब आप भीतर मुड़ते हैं, ...तब बाहर जो अप्रिय घटता है, रुक सकता है। उसकी सीधी पहचान होती है।
संसार को अवास्तविक कहकर, मात्र बुद्धि विलास बहुत हुआ है। पूज्य स्वामीजी कहते थे- यह भी उतना ही सच है, ... सच मानकर ही जाना जाता है, ... तभी वर्तमान में रहा जाता है। जिस दिन यह स्वप्नवत लगता है, ... यानी निरन्तर परिवर्तनशील व गतिशील, तब वास्तविक रहना होता है। यह अनुभवजन्य सत्य है। परन्तु इन्द्रिय जन्य ज्ञान पर कल्पना व विचार से थोपा हुआ आदर्श अव्यवहारिक है। रहना ही यहां महत्वपूर्ण है।  यहां ब्रह्म और माया दोनों ही स्वीकार हैं। माया, ... जो है नहीं, जो भासती है, पर प्रारंभ में माया को अस्वीकार नहीं किया जा सकता है।माया ब्रह्म की ही शक्ति है।

जो तथाकथित ब्रह्मवादी हैं, वे शास्त्रों की दुहाई देकर यही समझाते है। बाहर जो है, वह भ्रम है, माया है। संसार माया है। संसार जो माया है उसे ही समझाते हैं, कि वह माया है। जब वह माया है, स्वयं माया है, तब कौन किसको छोड़कर कहां जा सकता है? नास्तिक कहता है, ... भीतर कुछ नहीं है। पदार्थ में स्वतः गति आती है, वही चेतना है। दोनों ने एक-एक आधार पकड़ लिया है। भगवान कृष्ण ने दोनों को यथावत स्वीकार किया है। पूरी गीता एक तरफ नहीं झुकती है।
पूज्य स्वामीजी कहते थे-‘गीता के इसी संतुलन का नाम ‘स्थितिप्रज्ञ’ है। यह कोई काल्पनिक व्यवस्था नहीं है। वरन् यह इस संतुलन को पाकर जीने की कला है।
हमने हमारे यहां जिस सन्यास को परिभाषित किया, उससे महान आत्माएं तो पैदा हुई, पर साथ ही समाज अकर्मण्यता में डूब गया। साधना के नाम पर पलायन, तथा आलस्य छाता गया। समाज में तमोगुण व्याप्त हो गया। भारत की हजार वर्ष की दासता में इन धर्म ग्रन्थों का बहुत बड़ा सहयोग रहा है। बाहर दासता, गुलामी, गरीबी, बढ़ती गई। बहुत बड़े जन समुदाय को धर्म के नाम पर काहिली में डालने का उपक्रम इन धार्मिक भाषा तथा धर्मग्रन्थों ने किया।
इस बाहर-भीतर को स्वामीजी कहते थे- आप मकान की दूसरी मंजिल पर रहते हैं, नीचे कोई आया, आप गए बात की, फिर ऊपर आ गए, ... अब अगर इस वार्ता का आप चिन्तन करते रहे, तो आप ऊपर शरीर से होते हुए भी नीचे ही रह रहे हैं। बस इसी कला को समझना है। तभी बाहर और भीतर का सधता है। जो बहिर्मुखी है वह निरंतर बाहर ही बाहर रहता है। उससे बाहर की समृति आती है। वह सुख देती है। उसे भीतर की शांति से जोड़ना है। तब समृति न तनाव देती है, न हताशा, ... वरन जीवन को सत्पथ सौंपती है, उसे शक्ति सम्पन्न बनाती है। हम बाहर की अवलेलना कर उसे छोटा मानकर, हेय मानकर नहीं रह सकते। हमें दोनों को ही एक साथ स्वीकारना होगा। गृहस्थ और सन्यास एक दूसरे के पूरक हैं। यह मन की अवस्था है। देह की नहीं। मात्र कपड़ा रंगने तथा घर- क्रियात्मक जीवन छोड़ने से मन की निर्विचारता नहीं आती।
... जिन्होंने दो मानकर अलगाव किया है, वह मात्र बुद्धि के आधार पर वितंडावाद ही है। दो है नहीं, सांख्य का कथन है, ‘पुरुष और प्रकृकृति, ... दो होते हुए भी एक है। हम शरीर को आत्मा से अलग नहीं कर सकते। दोनों को जोड़ने वाली शक्ति मन है। मन ही दोनों जगह जाता है। जहां स्वस्थ मन है, ... शक्तिशाली मन है, नियंत्रित मन है। वहां बाहर का भी सघता है, भीतर का भी सघता है। बाहर जाते समय किसी प्रकार की पाप ग्रन्थि नहीं बनती। भीतर आते समय किसी प्रकार की विशिष्टता का बोध नहीं होता।
गीता ने इस व्यक्तित्व निरुपण को इस अध्याय में आहार से जोड़ा है। सम्यक आहार। तामसी, राजसी तथा सात्विक आहार। तप, दान सभी को परिभाषित किया है। यहां भीतर तक आने की एक सुव्यवस्थित प्रक्रिया है। यही संतुलन पाना पूर्णता है। यहां दो में विभाजन नहीं है। सन्यासी और गृहस्थ दोनों एक साथ हो जाना होता है। यही आत्मकृपा है। यहां भीख नहीं मांगनी है। पराश्रय नहीं है, ... यह सघता है, ... वर्तमान में रहने से, अन्तर्मुखी होने से।
.... जो बाधा है, वह मन का चिन्तन है। बस बाहर शरीर रहे, वहीं मन हो, यह संतुलन सधता जाता है।

Sunday, November 24, 2013

श्री गुरु गीता पंद्रहवां अध्याय


ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
छन्दांसियस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित। ।‘1
‘जिसका मूल ऊपर की ओर तथा शाखाएं नीचे की ओर, उस संसार रूप पीपल के वृक्ष को अविनाशी कहते हैं, तथा जिसके पत्ते वेद कहे गए हैं, उस संसार रूप वृक्ष को जो मूल सहित तत्व से जानता है, वह वेद के तात्पर्य को जानने वाला है।’

यह साधन सूत्र है। संसार का फैलाव नीचे की ओर है, ... वह मूल से बाहर ले जाता है, तीनों गुण लताआंेें की तरह है, फूल पत्ते वहीं है, ... तत्व से जानना, ... मूल को जानना, घर वापसी है। साधन- ‘बटुक’ को सौंपता है। ‘अनंतयात्रा’ में स्वामीजी ने कहा है- ‘चूड़ाला नीलकंठ को बटुक बनाकर ले जाती है। यज्ञोपवीत बटुक का है। यह मात्र संकेत है। जो बालक है- उसका अंतःकरण शुद्ध होता है। पवित्रता, प्रसन्नता, प्रामाणिकता का वहां आधार है।

... तत्व को वही जान पाता है, ... जहां चित्त की शुद्धि है। वापसी है। ‘यही अन्तर्यात्रा है। वापिस लौटना है। मन इन्द्रियों के सिकुड़कर अंदर की ओर लौटता है। यहां धारा राधा में बदल जाती है।
यही ‘मूल’ सहित तत्व को जानना है। वृक्ष का फैलाव नीचे है, ... अश्वत्य का वृक्ष है। शाखा-प्रशाखाएं अनंत होती चली जाती है। फैलाव ही फैलाव है। जितना बाहर संसार में जाएंगे, ... उलझाव है। यहां तो लौटना है। वापसी है।

यतन्तोयोगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्।
यतन्तोऽप्यकृकृतात्मामानो नैनं पश्यन्त्य चेतसः।।11

 योगीजन  भी  अपने हृदय में स्थित हुए यत्न करते हुए ही तत्त्व से जानते हैं, और  जिन्होंने अपने अन्तःकरण को शुद्ध नहीं किया है ऐसे अज्ञानी जन तो यत्न करते हुए भी इस आत्मा को नहीं जानते हैं।
... प्रयत्न अपरिहार्य है, ... वैराग्य साधन है। जहां राग है, ... वहां उसका असहयोग रहता है। राग वस्तु में नहीं मन में है। चिन्तन में है। चिन्तन स्वतः कम होने लगता है, निरंतर वर्तमान में रहने से। विराग अपने आप आने लगता है।
भगवान कृष्ण यहां महत्वपूर्ण संकेत कर रहे हैं-
योगी जन भी अपने हृदय में स्थित हुए इस आत्मा को यत्न करते हुए ही तत्व से जानते हैं और जिन्होंने अपने अंतःकरण को शुद्ध नहीं किया है ऐसे अज्ञानीजन तो यत्न करते हुए भी इस आत्मा को नहीं जानते हैं-
क्या प्रयास करना आवश्यक है? पानी खौलता है, ... तब भाप बनती है, रूपांतरण तभी होता है, परन्तु कुनकुना पानी खौल नहीं पाता है। प्रयत्न की एक आवश्यकता है। प्रयत्न यही है, निरन्तर ध्यान रहे, मन वर्तमान में रहे, ... बस इससे अधिक नहीं, ... जहां भी हो, जो भी काम हो, मन पूरा उसी में रहे।
परन्तु एकाग्रता की अपनी सीमा है, शक्ति यहां प्राप्त होती है, परन्तु चित्त शुद्ध नहीं है तो यह शक्ति उतनी ही तीव्रता से विदा हो जाती है। पतन हो जाता है। चित्त की शुद्धि अपरिहार्य है। एकाग्रता जहां तमस है, वहां जल्दी आती है। तमोगुण में अधिक शक्ति उत्पन्न होती है। बुरा आदमी अहंकारी होता है, उसमें लगन तीव्रता के साथ रहती है। स्वामीजी कहा करते थे- ‘गांव का भोपा जो बोलता है, वह सच हो जाता है क्यों? उसने मन को सौ टका एक ही तरह से ढाल लिया है। उससे पीछे ताकत होती है।“

परन्तु शक्ति व शांति वहीं रहती है, जहां चित की शुद्धता है। पात्र वहीं निर्मल रहता है। जहां आचरण में प्रामाणिकता आती है, वहां पवित्रता आती है, वहां प्रसन्नता रहती हैं वहां निर्मलता आती है, ... अहंकार नहीं रहता। प्रकृति ही सारे कार्य व्यवहार संभाल लेती है।
शक्ति मानसिक होती है। एकाग्रता की शक्ति मानसिक है। मन एकाग्र हुआ है, ... जब मन और प्राण की युति होती है, ... तब यह और बढ़ जाती है, ... परन्तु इसके आगे का विकास तभी होता है, जब मन का विसर्जन हो जाता है, मन-अंतर्मन में लय होता है। जब हृदय खुलता है, वहीं वास्तविक आधार है, जहां चित्त की शुद्धि होती है। जहां शांति है, शक्ति है, संतोष है।

 इस एकाग्रता से जो शक्ति होती है, प्राप्त होती है, ... वह निरपेक्ष है। उसका कहीं भी प्रयोग हो सकता है। जहां अशुद्ध अंतःकरण होता है, वहां शक्ति मानसिक एकाग्रता से प्राप्त होती है। वहां शक्ति आती है। उसमें तीव्रता है, परन्तु वह टिक नहीं पाती है, अशुद्धियां उसे पतन की ओर ले जाती है। यह वासना से प्रेरित होती है।

शास्त्र पढ़कर, सुनकर जो जाना गया है, जाना जाता है, वह मात्र परिधि पर रह जाता है। गुरुतत्व जहां है, वहां प्रवेश द्वार है। समर्थ गुरु पहले साधक के भीतर की सफाई करवाते हैं। चित्त शुद्धि, करुणा, प्रेम मुदिता, उपेक्षा, तितिक्षा, यहाँं भीतर के द्वार खुलने की अनंत प्रतीक्षा की यहां दस्तक होती है। स्वामीजी कहते थे- जिज्ञासा है, मात्र कौतुहल रहता है, लोग आते हैं, पूछते चले जाते हैं। भगवान ने गीता में कहा है- बहुत कम लोग तत्व से जानना चाहते हैं। मैं पचास साल के अधिक समय से प्रयोग करता रहा, ... किससे कहता, सबका ताले की चाबी पर संकेत होता है, पर गुरु गुच्छा संभाल कर रखते हैं। जानते हैं, मात्र एकाग्रता अहित भी करती है। छापेखाने में जो परम गोपनीय था, उसे खोल तो दिया, पर उससे अहित अधिक हो गया। तैयारी के अभाव में कम वाट के बल्ब में तेज वोल्टेज आ जाता है। तो बल्ब फ्यूज होने का खतरा हो जाता है। वही अधिक हो गया है।



Saturday, November 23, 2013

श्री गुरु गीता चौदहवां अध्याय

श्री गुरु गीता  चौदहवां अध्याय
‘नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति।
गुणेम्यश्च परं वेत्ति मद्धावं सोऽधिगच्छति।। 14-19

‘जिस काल में द्रष्टा तीनों गुणों के सिवाय अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता है अर्थात् गुण ही गुणों में वर्तते हैं ऐसा देखता है और तीनों गुणों से अति परे सच्चिदानंद घन स्वरूप मुझ परमात्मा को तत्व से जानता है उस काल में वह पुरुष मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।’
यह अध्याय गीता के गुणात्रय विभाग के नाम से जाना जाता है। भगवान कृष्ण ने इस अध्याय के प्रारंभ में कहा है-
‘मेरी महत ब्रह्म रूप प्रकृति अर्थात् त्रिगुणमयी माया संपूर्ण भूतों की योनि है, अर्थात् गर्भाधान स्थान है और मैं उस योनि में चेतन रूप बीज को स्थापन करता हूं उस जड़चेतन के संयोग से सब भूतों की उत्पत्ति होती है।’
हमारा शरीर दो तत्वों का जोड़ है। प्रकृति और परमात्मा। पदार्थ की चेतन, माया, प्रकृति, ... पदार्थ है। परमात्मा चेतन तत्व है। मृत्यु में दोनों तत्वों का वियोग हो जाता है। पदार्थ और चेतना के बीच में माया है। माया वासना ही है। जो ज्ञानी है, ... वह ज्ञान के माध्यम से जान पाता है कि संयोग है। द्रष्टा व दृश्य का अलगाव तभी अनुभव होता है, जो अनुभव में है, वह ज्ञानी है। माया जहां ब्रह्म से जुड़ी होने के कारण, .उसकी शक्ति है।.उसकी गति है।., वहीं वह पदार्थों से जुडी होकर, वही ब्रह्मयोनि है। सबका वही कारण है। ‘माया’ का अर्थ है जो दिखाई पड़ती है, पर है नहीं। परमात्मा... जो है पर दिखाई नहीं पड़ता। जो बुद्धि से परे हैं। जगत जो नहीं है, पर इन्द्रियां प्रत्यक्ष है, वह निरंतर परिवर्तनशील है। संबंध जोड़ती है, माया, ... जो दिखाई तो पड़ती है, पर है नहीं वह भासती है। जब संबंध टूटता है तब द्रष्टा व दृश्य दोनों अलग हो जाते हैं।

यह जो माया है, यह गुणमयी है। त्रिगुणमयी है। सत्व गुण, रजोगुण तथा तमोगुण ऐसे यह प्रकृति से उत्पन्न हुए तीनों गुण उस अविनाशी जीवात्मा को शरीर से बांधते हैं। प्रकृति तीन तत्वों का मेल है। सत्, रज, तम। रज-गति है। तम-स्थिति है, सत-संतुलन है।

जिस काल में द्रष्टा तीनों गुणों के सिवाय अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता है- अर्थात् गुण ही गुणों में वर्तते है। यही साधना की निष्पत्ति है। मेरे ही तीन गुण समस्त कर्म कर रहे हैं। सारा उत्तरदायित्व मुझ पर ही आ जाता है। पहले मै। प्रमाद में था- जानता था, मैं कर रहा हूं, पर अब द्रष्टा हो गया हूं, देखता हूं, गुण ही समस्त कार्य कर रहे हैं, गुण ही करवा रहे हैं-
गुण का निवास कहा है? स्वामीजी कहते थे- गुण नाभि में है- वहीं संस्कार है। प्रकृति की उठने वाली लहरें वहां निरंतर संघात करती है- लहरों के तेज स्पंदन से बाह्य मन जो जुड़ा हुआ है, वह इन्द्रियों से जुड़कर बहिर्मुखता को प्राप्त हो जाता है।
गुण बाहर वस्तु में नहीं है। दूसरा कोई जिम्मेदार नहीं है। वह आपके भीतर उछाला मारता है। लोभ आपके भीतर है, काम आपके भीतर है। मन और छः रिपु जन्म के साथ आते हैं। वे धीरे-धीरे विकसित होते चले जाते हैं।
स्वामीजी कहते थे- दो ही तत्व हैं। यह सांख्य की दृष्टि है। पुरुष और प्रकृति। पुरुष, ब्रह्म हैं। वह तो चेतना है।  शक्ति एक ही है। वह शरीर में मन और प्राण दोनों में विभाजित हो जाती है। प्राण की गति ऊर्ध्वाकार है, मन की चक्राकार। देह-मन-प्राण की संघटना का आधार प्रकृति है। प्रकृति-- जीव की नाभि पर अनवरत लहरें उठती है। वहीं गुण है, ... वे मन को प्रभावित करते हैं। मन इन्द्रियों से जुड़कर विषयों की ओर लालायित हो जाता है। चित की वृतियों का निरोध यहां दमन नहीं है। इन लहरों के धक्कों से प्रभावित नहीं होना है। विचलित नहीं होना है। अधिक से अधिक वर्तमान में रहने से यह स्थिति आती है। लहरें तो उठेंगी, ... वृत्तियां रूकती नहीं है, ... निरोध उनसे अप्रभावित रहने की क्षमता का बढ़ता जाना है। बाहर तो प्रयत्न होंगे। संसार में रहना है, वहां प्रयत्न करना होगा, ... पर जहां साधना है, वहां अप्रयत्न है। वहां मात्र रहना है। इसके लिए कोई विधि नहीं है। मात्र वर्तमान में रहना है। यह मानसिक है। अंतर्मुखता की प्राप्ति पर फिर यह भी वहीं रहता। स्वाभाविक स्थिति में रहना होता है। लेकिन संसार में रहना है, काम भी करना है, परिवार है, नौकरी है, उसे छोड़ना नहीं है। वहां प्रयत्न की आवश्यकता होती है। परन्तु जो अंतर्मुखी है, उसे भीतर मार्गदर्शन प्राप्त होने लगता है। क्या करना है, क्या नहीं करना है। वह विचलित नहीं होता है। वहां हताशा नहीं होती है।

जब हम भीतर से जुड़ते हैं, यह अहसास घनीभूत होने लगता है। तब गुण ही गुणों को वर्तते हैं, ... यह अनुभव में आने लगता है। बाहर की ओर दोषरोपण नहीं होता है, तब इन गुणों के पार, ... जो बुद्धिगम्य नहीं है, ... उस परमात्व तत्व में प्रवेश होता है।

हम इन गुणों के जाल को अपना समझ लेते हैं। वह स्वाभाविक है। वह सहज हो रहा है, ... अप्रभावित होने की क्षमता पाना ही साधन तत्व है। सारा खेल स्वतः हो रहा है, ... प्रकृति का उत्प्रेरण है। आप मात्र इस लीला के साक्षी हैं, गवाह हो जाते हैं, ... तभी कर्मों के जाल से आप बाहर आ पाते हैं। जब तक एकत्व है, जुड़ाव है। आप ही कर्म हो जाते हैं। उससे दूरी हो तभी बाहर आ पाना संभव हो पाता है।

दूर की वस्तु को ही सही देखा व समझा जाता है। कर्म का बंधन नहीं होता है। कर्ता का बंधन होता है। बंधन चिन्तन से बनता है। चिन्तन, मात्र क्रिया के साथ पूरी तरह मन को रखने से छूटने लग जाता है।
... मात्र अवलोकन से अन्तर्मुखता की यात्रा बहुत छोटी है। जहां करना छूटता जाता है, मात्र देखना होता जाना है।

‘‘उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते।
गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेते। 23

जो साक्षी के सदृश स्थित हुआ गुणों के द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता है और गुण ही गुणों को वर्तते हैं, ऐसा समझता हुआ जो परमात्मा में एकीभाव से स्थित रहता है, उस स्थिति से चलायमान नहीं होता है।

समदुःख सुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मका´्चनः
तुल्य प्रियाप्रियो धीरस्तुल्य निन्दात्मसंस्तुतिः।। 24

निरन्तर आत्मभाव में स्थित हुआ दुःख सुख को समान समझने वाला है तथा मिट्टी पत्थर और सुवर्ण मंे समान भाव वाला और धैर्यवान है तथा जो प्रिय और अप्रिय को बराबर समझता है तथा अपनी निन्दा स्तुति में भी समान भाव वाला है।’

मां च योऽव्यमिचारेण भक्तियोगेन सेवते।
स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय  कल्पते।। 26
जो पुरुष अव्यभिचारी भक्ति रूप योग के द्वारा मेरे को निरन्तर भजता है।वह इन तीनों गुणों को अच्छी प्रकार उल्लंघन करके सच्च्दिानन्द ब्रह्म में एकीभाव होने के लिए योग्य होता है।
-भगवान कृष्ण यहां साधन तत्व को स्पष्ट करते हुए कह रहे हैं- साधक जब यह समझकर, अपनी समझ का हिस्सा बना लेता है कि गुण ही गुणों का विस्तार है तब वह साक्षी होने लगता है। न प्रवृति में, न निवृति में , वह कहीं भी आत्मीयता नहीं लाता। वह कहीं भी एक्य का अनुभव नहीं करता। अहंकार उसका छूट जाता है। स्वामीजी कहते थे-‘मेरे भीतर से आवाज हुई, ठीक है, ... तो हो गया, ... नहीं तो चुप रहा, ... तटस्थता आ गई। मैंने जानबूझकर नहीं बोला, ... हो जाएगा, ... बस, होना था, ... इसलिए हो गया। मेरा कहीं संकल्प नहीं गया। न तो यह आकांक्षा रही कि होना है या यह आकांक्षा रही कि नहीं होना। प्रकृति का कार्य है, वह कोई रोक दे- यह किसी इन्सान के बस का नहीं है। वह मात्र साक्षी होकर इस खेल को, एक सीरियल की तरह देखता रहता है। यही वह अवस्था है जहां गुण ही गुणों को वर्तते हैं, समझा जा सकता है।

‘न निन्दे न वन्दे, ... कोई चुनाव नहीं होता, ... उसे घटना था, वह वैसा ही घट रहा है। जब यह तटस्थता भीतर उतने लगती है, तब चलायमान होने से बचा जा सकता है। भीतर जो भी वृत्ति की लहर उठे,  अगर कंपन हो, वहां तत्क्षण असहयोग हो, नहीं बहना है। चलायमान होने से बचा जा सकता है।

इसी स्थिति को कहा जाता है- ‘कमल दलवत’, ... वह कीचड़ में तो रहेगा पर इस स्थिति की, निंदा व प्रशंसा से दूर है। वह ऊपर उठा हुआ है। उसे पानी स्पर्श नहीं कर पाता है। वह प्रतिक्रिया में नहीं है। वह मात्र क्रिया में है। मान-अपमान में सम है। उसके भीतर आचरण की प्रामाणिकता है, उससे उत्पन्न पवित्रता है, प्रसन्नता है। वहां खिन्नता नहीं है।

इस स्थिति में शरीर रहेगा। वह इन तीनों गुणों से प्रकाशित है। ज्ञानी और सामान्य जन में यही भेद है। सामान्यजन गुणों के प्रभाव में बहता है। ज्ञानी गुणातीत है, वह जानता है, ... आवश्यकतानुसार प्रवृत्त होता है। अन्यथा नहीं। वह जानता है, वह कुछ नहीं कर रहा है, जो हो रहा है प्रकृ्रति करवा रही है, उसे उसके कार्य में सहयोग देना है।

सूत्र है- जो निरन्तर आत्मभाव में स्थित है- यही सुमिरन है। स्मरण है। कॉन्सटेन्ट अवेयरनेस है। वह अप्रमाद में है। वह सजगता में है। जरा सी भी मन को जगह मिली, ... वहां विचारणा का वेग आ जाता है। क्रिया में मन को पूरा लगा दो, ... पूरा मन स्वतः विसर्जित होने लग जाता है। जहां यह विस्मरण है, वही स्मरण है।
और जो पुरुष अव्यभिचारी भक्ति रूप योग द्वारा मेरे को भजता है- निरंतर भजता है-

व्याभिचार- जहां अनेक विकल्प मौजूद हैं। जहां हूं, वहां संतुष्ट नहीं हूं। विभाजित मन जहां है। विभक्त- जो बंटा हुआ है। भक्त- जहां जोड़ है, जो है वह पूरा है। अव्यभिचारी भक्ति जहां एक रसता है। एक ही धारा है। एक ही गंतव्य है। परन्तु हमारा मन अनेक दिशाओं में जाता है। तभी इतने देवी-देवता आए।  सामान्यतः हम एक साथ कम से कम दो काम कर सकते हैं। दो का एक होना ही, एकाग्रता है। मन हमारा एक साथ अनेक धाराओं में बहता है। यही द्वन्द है। हम सोचते कुछ और है, चाहते कुछ और हैं, करते हुछ और हैं। व्याभिचारी ही मन है। जहां अव्यभिचारी है, वहां अमन रह जाता है। तब यात्रा अंतर्मुखी हो जाती है। जहां व्याभिचारी मन है, वहां असंतोष है।

कोई भी कृत्य पूरा नहीं हो पाता है, ... पूरा होने के पहले ही दूसरा विकल्प उसे पकड़ लेता है। आधा-अधूरा वह रह जाता है। जब कृत्य समग्रता में होता है। वहां सफलता मिलती है। वही पूर्णता आती है। वही आनंद है। वहां असंतोष नहीं है।
जाना- बाधाएं हम खड़ी करते हैं, ... हम एक रास्ते पर नहीं चलते, अनेक विकल्प ले आते हैं। शक्ति पूरी तरह नहीं बनती। न लगा पाते हैं। कुनकुने पानी की तरह खोलते हैं, जहां कुछ भी नहीं पकता। फिर दोष दूसरों को देते हैं। जहां अव्यभिचारी मन की धारा है, वहीं राधा है। वहां मन जब एकोन्मुख हो जाता है, तब अचानक उसकी गति बदल जाती है।
अव्यभिचारी प्रेम के द्वारा मुझको निरन्तर भजता है-
भजन, ... वाल्मिकी उल्टा नाम जपते-जपते ब्रह्म समान हो गए थे, ... बाहर-भीतर एक राम ही शेष रह गया था, ... जहां सारे द्वन्द खो जाते हैं, मात्र एक लय शेष रह जाती है, ... स्वामीजी इसे ही कान्सटेन्ट अवेयरनेस कहा करते थे- यह भीतर का भाव है, जो अनवरत बना रहता है। यह स्वभाव बन जाता है, बाहर मन गया, ... कार्य पूरा होते ही, वह भीतर लौट आता है। यही सहज है। यही स्वाभाविक है।
परमहंस पनिहारिन का उदाहरण दिया करते थे, बाते करती हुई चल रही है, पर उसका मन निरंतर मटकी पर सजग है, भाव-दशा में चित की धारा सहज बिना प्रयत्न के बहती है। भजन में बाहर और भीतर चित की दशा एक लय में बहती है।




Tuesday, November 19, 2013

shree guru geeta 13

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Monday, November 18, 2013

श्री गुरु गीता दसवां अध्याय

श्री गुरु गीता दसवां अध्याय
बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः
सुखं दुःखं भवो ऽभावो भयं चाभयमेव च।10/4

”निश्चय करने की शक्ति एवं तत्व ज्ञान और अमूढ़ता, क्षमा, सत्य तथा इन्द्रियों को वश में करना और मन का निग्रह तथा सुख दुःख उत्पत्ति और प्रलय एवं भय और अभय भी मेरे से ही होते हैं।“

निश्चय करने की शक्ति- मन ही निरंतर विचारणा में रहता है, ... वही निश्चित कर पाता है, परन्तु जहां भी वह कुछ निश्चित करता है, वहीं उसके विरूद्धभी वही तर्क खड़ा कर देता है। जिसे दुविधा कहा जाता है, वह यही मन है। जाना जहां तक मन है, मन का प्रभाव है, वह कुछ भी निश्चित नहीं होने देता है।
मन का पूरा जोर इसी पर रहता है कि कुछ भी निश्चित नहीं हो पाए, ... वही हमेशा अनिश्चय को खड़ा करता रहता है। वही विकल्प है। उसके पास अनिश्चय को बनाए रखने की बहुत बड़ी ताकत है।
पूज्य स्वामीजी ने कहा है, ‘मन को पूर्ण रूपेण एकाग्र रखते हुए किंचित मात्र भी विपरीत नहीं होने देना चाहिए। जाना, ... यह अत्यंत ही कठिन साधन सौपा है। जहां मन पूरा जाता है, पूरा लगता है, वहां मन ही खो जाता है, ... मन हमेशा दो काम एक साथ करता है। वह प्रेम भी करता है, घृणा भी, ... जिसका हिस्सा ज्यादा होता है, वह वैसा ही घट जाता है। वह दोनों ओर की यात्रा पर एक साथ जाता है। भगवान बुद्ध ने कहा था- ‘मध्यममार्ग’ जहां अतियां नहीं हो, ... वहां मन स्वतः खो जाता है, ... स्वामीजी की भाषा में वह नीचे उतरना शुरू हो जाता है। वह अन्तर्मुखी होने लग जाता है।
सच में हम जहां भी होते हैं, ... आधे-अधूरे होते हैं। पूरे मन से रह नहीं पाते। जहां पूरे मन से होते हैं। वहां मन ही समाप्त हो जाता है। मन एक साथ दो इन्द्रियों के साथ जा सकता है, ... हम खाना खाते हुए रेडियो पर गाना भी सुन सकते हैं। एक साथ दो विचारों पर चल सकते हैं। मन दोनों ही विचारधाराओं को तर्क देकर खड़ा कर सकता है। यह विकसित रहना ही मन का स्वभाव है।
मैंने अपना अध्ययन किया, पाया, मैं अपने मन पर नियंत्रण पाने का प्रयास वर्षों से करता आया हूं, पर हर बार पराजित ही होता आया हूं। एक झटके  के साथ दूसरा प्रवाह आता है, और वह सब कुछ घट जाता है जो सोचा भी नहीं था, ... क्यों? मन की इस प्रक्रिया को समझ नहीं पाया था, ... जाना नहीं था, ... जानकर आदर नहीं दे पाया था, ... मन तो हमेशा अनिर्णय  की स्थिति बनाए रखना चाहता है। भगवान कृष्ण कह रहे हैं, जहां निश्चय करने की शक्ति है, वहां मैं हूं। वहां यह विभाजित मन नहीं रहता है, वहां फिर भीतर द्वन्द्व नहीं रहता। अपने आपसे मैं जो निरन्तर लड़ता रहा हूं, ... निरंतर यह नहीं रहता।
स्वामीजी ने वर्षों पहले कहा था- ‘‘मन को पूर्ण रूपेण एकाग्र रखते हुए किंचित मात्र भी विपरीत नहीं होने देना चाहिए, ... वे बहुत सहजता से स्वाभाविक अवस्था में रहने का संकेत कर रहे थे। पर हम जो क्रिया पूछने गए थे, ... जो साधना के लिए कोई गुरुतर गंभीर उपाय पूछना चाह रहे थे, ... वहां संतुष्ट नहीं हो पाए थे। स्वामीजी, ने  ‘अनंत यात्रा में इस प्रक्रिया को समझाया भी था, ... पर शब्दों से जुड़ नहीं पाए। वे कहते रहे- प्रयोग करो- करके देखो, ... पर आदर था, ... पर विश्वास नहीं था।
 जाना पूरा मन कभी भी किसी भी क्रिया के साथ नहीं जाता, ... वह एक हिस्सा बचाकर रखता है, जानता है, पूरा मन गया, वहा वह खो जाता है, वहां वह विसर्जित हो जाता है।
अपने आपको देखा- पाया, मैं जहां से चला था, आज भी वहीं का वहीं हूं। मात्र देह में परिवर्तन आया है, पर भीतर मैं वही का वहीं हूं। वही विभाजित मन है। हर क्रिया के साथ आधा जाता है, आधा खड़ा खड़ा देखता है, रोकता है, कभी बताता है, तर्क विपरीत लाता है। जहां आधे से अधिक चला जाता है, वहां क्रिया घट जाती है। इसीलिए हर क्रिया के बाद संतोष नहीं आता, संताप आता है।
जाना, पूरे मन से कोई निर्णय नहीं ले पाया, ... इसीलिए स्मृतियों का दबाव निरन्तर बना रहा। जहां दुविधा होती है, वहां भय होता है। भविष्य में भय ही अधिक रहता है। जहां क्रिया में पूरा मन चला जाता है, वहां उसकी कोई स्मृति ही नहीं रहती है।
भगवान कृष्ण कह रहे हैं- जहां निश्चय करने की शक्ति है, वहां मैं हूं।
सच है, शब्दार्थ में समझना सरल है, पर मैं जानते हुए भी जानने का आदर नहीं कर पाया। जाना, ...यह भरोसा अवश्य है,  जिस दिन पूर्ण निश्चय हो पाएगा, उस दिन मन पूरी तरह एकाग्रता में रहेगा, वहां मन विसर्जित हो जाएगा, जो परम है, वही तब प्रारब्ध होगा।
 वर्तमान में रहना ही एकमात्र मार्ग है, यह पथ विहीन मार्ग है। जहां तक स्मृति है, मन है जहां तक कल्पना है, मन है। मात्र वर्तमान में, ... मन अनुपस्थित है। मन का अर्थ है, कांपती चेतना, ... जहां विचलन है, ... जहां मात्र निश्चयात्मकता है, ... वहां मन नहीं रहता। पूज्य स्वामीजी कहते थे- मैं ध्यान नहीं सिखाता। यह तो स्वाभाविक अवस्था है, ... सहजावस्था है। यहां मन नहीं रहता। गलती हमारी यही रही, उनकी बातों पर भरोसा ही नहीं था, घ्यान ही तो मन की औषधि है। घ्यान में ही तो मन अपनी सब विषमताओं के साथ खो जाता है। घ्यान सचमुच सिखाया नहीं जाता। यही तो वह प्रसाद है, गीता के दूसरे अध्याय में जिसकी वर्णना है।
 जहां मन में कोई द्वन्द्व नहीं रहता, ... शांत अवस्था प्राप्त हो जाती है, हर समता में ... कहीं विषमता नहीं होती, ... वहां बुद्धि स्थिर होती है, निश्चयात्मकता प्राप्त होती है। स्वामीजी कहा करते थे ‘थिंक वन्स डिसाइड वन्स नेवर हेव ए सैकण्ड थॉट’, ... तब  हम इसका भाषायी अर्थ तो जान लेते थे, ... पर इसके रहस्य से दूर रह जाते थे, ... जहां यह निश्चयात्मकता आती है, वहीं अंतर्मुखता का द्वार खुल जाता है।

एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति  तत्त्वतः
सो ऽविकम्पेन योगेन युज्यजे नात्र संशय।। 10-7
और योग शक्ति को जो तत्व से जानता है वह पुरुष निश्चल ध्यान योग द्वारा मेरे में ही एकाकी भाव से स्थित होता है।
भगवान कृष्ण ने कहा है- जो मेरी योग शक्ति को तत्व से जानता है-
हम हमारी साधना से परिचित है, ... हम ‘योगवित होना चाहते हैं, योग माने जुड़ना- मन और प्राण की युति को योग कहा जाता है। योग- परमात्मा से जुड़ना, योगी की शक्ति होती है। यहां भगवान कृष्ण कह रहे हैं- परमात्मा की योग शक्ति- जिसके द्वारा  वह परमात्मा, विराट सामान्य से जुड़ जाता है।
यहां भगवान कृष्ण कह रहे है- मेरी योग शक्ति को, ईश्वर स्वयं भक्त तक पहुंच जाता है। स्वामीजी कहा करते थे- प्रकृति स्वयं कार्यभार संम्भाल लेती है- ... जितना हम आगे बढ़ते है, ... उतनी वहां से भी पहल होनी शुरू हो जाती है। भक्त कहते हैं, ... प्रभु की कृकृपा, ... प्रभु स्वयं भक्त से मिलने को कदम बढ़ा लेते हैं। परमात्मा की इस योग शक्ति को जो तत्व से जानता है, ... शक्ति एक ही है, जो व्यक्ति में है, वही समष्टि में है, वहां व्याप्त है, जो स्वयं की आत्मकृकृपा को प्राप्त होता है, वही ‘परमात्मा की कृपा को पा लेता है।संत कबीर ने यहीं कहा है-
हेरत-हेरत हे सखी कबिरा रहा हेराय
समुद समानी बुंद में यह तत कहा न जाए।

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च।।10-20
हे अर्जुन मैं सब भूतों के हृदय में स्थित सबका आत्मा हूं, तथा संपूर्ण भूतों का आदि, मध्य और अन्त भी मैं ही हूं।
भारतीय जीवन दृष्टि का यह सूचक है। जहां भलाई है वहां बुराई भी है। सब मैं, मैं ही हूं। हृदय, यहां बायलोजिकल हार्ट नहीं है। स्वामीजी कहा करते थे- मन जब अंतर्मुखी होता है, तब वह बाहर इन्द्रियों से सिकुड़ना प्रारंभ कर देता है। बाहर जब उसकी गति अवरुद्ध हो जाती है, तब वह अंदर आता है, ... वह मस्तिष्क से नीचे उतरता हुआ अपने मूल स्थान नाभि तक आता है, पर वहां ठहर पाना कठिन है, वह हृदय पर आकर ठहर जाता है। मस्तिष्क से हृदय तक की यात्रा विचार की भाव तक यात्रा है। विचार में जहां विस्तार है, वहां भाव में गहनता है। भाव, हृदय में उपजता है। जब मन एकाग्रता को प्राप्त होता है, तब स्वाभाविक रूप से बुद्धि शुद्धहोने लगती है, जब बुद्धि शत-प्रतिशत शुद्ध होती है, तब वह विवेक में ढल जाती है, ... तब हृदय की मुक्तावस्था प्राप्त होती है। यही अद्वैत तत्व है। जहां तक बुद्धि की सीमा है, द्वैत है। विवेक की प्राप्ति ही अद्वैत तत्व की प्राप्ति है।
दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम्।।
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्। 10/38
दमन करने वालों की दमन शक्ति मैं ही हूं।जीतने की इच्छा वालों की नीति हूं।गोपनीयों में अर्थात् गुप्त रखने योग्य भावों में मौन हूं, तथा ज्ञानवानों का तत्व ज्ञान मैं ही हूं।
गुप्त रखने योग्य भावों में मौन हूं। जहां मौन है, वहां वाक् का दबाव नहीं है। मौन स्वतः गुप्त है, ... पर भगवान कृष्ण यहां कह रहे हैं, ... उस मौन में भी जो गुप्त है।
... स्वामीजी कहा करते थे, वहां अन्तर्मुखी है। वह विचार को तो छोड ही देता है, अपनी निर्विचारता को भी गुप्त रखता है। दूसरे को अहसास भी नहीं होने देता कि वह मौन है। भीतर वाक् पश्यंति के द्वार पर ही रुक गई है। प्रभावहीन हो गई है।
दूसरे को बताने की भी इच्छा वहां नहीं रही है। मौन-बैखरी के स्तर पर नहीं होता, वहां तो जो भीतर है वह निरन्तर कंपता है, हम अपने आपसे ही बात करते रहते हैं। सपनों में भी हम अपने आपसे बतियाते हैं। मौन, ... सब शून्य में विसर्जित हो गया है। यह परम गोपनीय मौन है।
भगवान कृष्ण कह रहे हैं, वहां मैं हूं।
जहां तक मन है, दूसरे को प्रभावित करना है, दूसरे से प्रभावित होना है, वहां विचार है वहां मौन मैं प्रवेश नहीं हो सकता है। मौन में प्रवेश होते ही, मन मिट जाता है। मन मिटना नहीं चाहता। वह छोटे बच्चे की तरह दरवाजे पर धक्का देता चला जाता है, ... वह जो दूसरा है, वह नाना रूप धर के आना चाहता है। स्मृति और कल्पनाएं मौन में प्रवेश  करने के लिए अनेक रास्ते तलाश करती है। हमारी आदत निरन्तर अपने आपसे बतियाने की रहती है। मौन है, भीतर का यह आंतरिक संवाद शून्य में विसर्जित हो गया है। न अतीत का दबाव बचा न कल्पना का सम्मोहन, ... उस शांत झील में जहां कोई कंपन नहीं, उस परम ज्योति में जहां लौ पर कोई कंपन नहीं। वायु नहीं है, पर ज्योति है, पर कंपन नहीं है। वह परम मौन है। यही अंतर्मुखता में प्रवेश होता है। मन जब अंतर्मुखी होता है, तब मौन में प्रवेश होता है। रास्ता एक ही है, निरन्तर वर्तमान में रहने का अभ्यास, ...
वर्तमान में रहना सधता है, जब किसी भी क्रिया के साथ पूरी समग्रता के साथ, पूरे मन के साथ रहा जाए। पूरा मन, ... जहां पूरा मन रहता है वहां स्वाभाविक रूप से मन का लय होना, ... मन का विसर्जित होना शुरू हो जाता है। हम एक क्रिया से दूसरी पर, दूसरी से तीसरी पर, तीसरी से चौथी पर भटकते चले जाते हैं। पर जहां पूरी तरह रहना होता है, वहां क्रिया की समाप्ति के साथ मन अपने मुकाम पर भीतर चला आता है, वहां से दूसरी पर जाता है। पहली अवस्था में मन परिधि पर हमेशा भटकता रहता है, इसी अवस्था मंे मन परिधि से केन्द्र पर तथा केन्द्र से परिधि पर जाता है। उसका केन्द्र बदल जाता है। वह भीतर रहना सीख जाता है। वहीं वर्तमान है। यही मन की स्वाभाविक अवस्था है। सहजावस्था है। यहीं अंतर्मुखता है, ... यही मौन उपलब्ध होता है।
भगवान कृष्ण कहते हैं- ‘परम गोपनीयों में, मैं मौन हूं।’
ज्ञानवानों का तत्व ज्ञान मैं ही हूं-
तत्वज्ञान पुस्तकीय ज्ञान नहीं है, ... तत्व ज्ञान अनुभव जन्य ज्ञान है। ज्ञान के तीन स्तर है, इन्द्रिय जन्य ज्ञान, बुद्धिजन्य ज्ञान तथा अनुभव जन्य ज्ञान। तत्व ज्ञान अनुभव जन्य ज्ञान है, निजि अनुभव।दर्शनशास्त्र के बहुत बड़े विद्वान ने ‘अद्वैत दर्शन पर महत्वपूर्ण पुस्तक लिखी थी। स्वामीजी को भेंट की थी, ... स्वामीजी ने पूछा था-‘इसमें आपका स्वयं का क्या है? वे उत्तर नहीं दे पाए थे। लगा मानो उन्होंने हम सबसे पूछा हो। मैं भी चुप था। मेरे पास मेरा कोई अनुभव नहीं था। मात्र बुद्धिजन्य संग्रह ही था। उसको सहेजकर रखने की प्रकट करने की लालसा थी। पर मेरी अपनी खोज नहीं  थी। जाना अज्ञान जितना नहीं भटकाता, उतना ओढ़ा हुआ ज्ञान भटकाता है। एक मित्र की पुस्तक की बात हो रही थी- ‘तत्वज्ञान’ स्वामीजी ने धीरे से पूछा‘- क्या यहां संग्रह से अधिक कुछ है? शास्त्र की बाते हैं, जिन्हें वे अधिक जानते हैं, इसके पीछे सूक्ष्म अहंकार छिपा होता है। एक मित्र आए थे- बोले ‘योग पर पुस्तक लिख रहा हूं, काफी सामग्री संग्रहित कर ली है, आपके पास कुछ और है क्या? स्वामीजी ने सुना- ‘बोले’ योग तो  स्वयं करना है, सुना हुआ तो दूसरे का है।

जाना- मेरी भी हालत कुछ ऐसी ही है, मेेरे पास अपना स्वयं का कुछ भी नहीं है।
जो कुछ है, ओढ़ा हुआ है। शब्द प्रमाण हैं। स्वामीजी कहते थे- मैं कहता हूं, इसीलिए सही है, यही सोचना गलत है, आप प्रयोग करे,ं ... वह सही लगे, आगे बढ़े, अन्यथा छोड़ दे। प्रकृति में नित्य नए विचार आएंगे, ... कुछ ठहरेंगे, कुछ छूटते चले जाएंगे। उन्हीं को पत्थर की लकीर मानकर दोहराते रहो, यह उचित नहीं है।
उधार का ज्ञान, ज्ञान नहीं होता, अपना ज्ञान ही ज्ञान है। जाना, दूसरों के अनुभव जो शब्द में आए थे, उनका ही संग्रह होता गया, वे स्मृति में चले गए, ... जब भी बोला, वे कूदकर बाहर आते रहे, ... यह मुगालता रहा, मैं जानता हूं। भीतर दो आदमी हो गए। एक कहता है, मैं जानता हूं। मेरा जाना गया है, ... दूसरा कहता यह गलत है, यह मेरा अपना नहीं है। स्मृति का संग्रह ज्ञान नहीं होता।
प्रामाणिकता जीवन में तभी आती है, ... जब अनुभव होना शुरू होता है। तब आंतरिक जीवन में क्रांति होनी शुरू होती है, उससे पवित्रता आती है। जहां पवित्रता होती है, वहां प्रसन्नता होती है।
बहुत कठिनाई आई, बहुत पीड़ा हुई, जब जाना, जब भीतर से आवाज आई, ... मैं नहीं जानता, ... यह मेरा जाना नहीं है। उस अज्ञानता में अंधेरा नहीं था, ... पाया एक गहरी शांति भीतर उतनी शुरू हुई हैं। छù अहंकार जिसे पाल-पोसकर बड़ा कर रहा था, वह भीतर की शांत तपन से पिघलना शुरू हो गया है। सरलता तभी आती है जब बोध स्वयं से उपजता है। सच स्मृति पाप है, ज्ञान नहीं है, कल्पना, दुष्कर्म है,  और तभी सुना , विचार ही पाप है, यह हमेशा दूसरे को लेकर ही शुरू होता है। जब दूसरा गिरेगा तभी तो अपने घर की वापसी होगी। तब जो मौन प्राप्त होने लगता है, ... वहीं अनुभव जन्यता है। जहां तक स्मृति का दबाव है, ... वहां तक झूठा ज्ञान है, दूसरों की जूठन है, माथे पर लदा बोझा है। पर जहां निजी अनुभव में प्रवेश होता है, ... स्वयं का साक्षात्कार होता है, ... वहीं तत्व ज्ञान है।
भगवान कृकृष्ण यहां कह रहे हैं- जो स्वयं में स्वयं से जाना गया है, वही मैं हूं। निजी अनुभव ही परमात्मा है। यहां ज्ञान जानकारियों का संग्रह नहीं है। ज्ञान ज्ञानी का निजी अनुभव है, वही उसकी पहचान है।

अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां   च नारद।
गन्धर्वाणां चित्ररथः‘‘सिद्धानां कपिलो मुनिः 10ः26
 सब वृक्षों में पीपल का वृक्ष, देव ,षियों में नारद मुनि,गन्धर्वों में चित्ररथ,भगवान कृष्ण कह रहे हैं- सिद्धो में कपिल मुनि मैं हूं। कपिल मुनि सत्य के प्रवर्तक हैं। वर्तमान में रहना सत्य की निष्ठा है। सांख्य का कहना है यहां करना कुछ नहीं है, बस जो विस्मृति हो गई है, उसको हट जाना है। संसार की ओर मुंह है, परमात्मा की ओर पीठ है, बस यही विस्मृति है, ... बस थोड़ा घूम जाना है, ... जिधर मुंह है उधर पीठ का हो जाना है। द्वार तो एक ही है।
योग का कहना है- तुम्हें करना है। योग के आचार्य पतंजलि हैं। यहां करना है। भगवान कृष्ण ने ‘‘निष्काम कर्मयोग’’ का भी संकेत दिया है। संभवतः जिस प्रकार के योग- यानी विधियां हो सकती है, सब गीता में समाहित है। फिर भगवान का यह कहना कि सिद्धों में मैं कपिल मुनि हूं, एक विरोध को लाता है। दर्शन में सांख्य-योग को एक ही निष्ठा में रखा जाता है। ये दो मार्ग है। विधियां है। अद्वैत दर्शन की विधि में सांख्य- योग को लेता है। योग में शरीर का सहारा है, शरीर से मन, मन से बुद्धि तथा बुद्धि से विवेक यात्रा है।
पतंजलि की भाषा में प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि है। सांख्य में शरीर का सहारा नहीं है। मात्र जो विस्मृति है, मूर्च्छा है, उसका हट जाना विधि है। वर्तमान में रहना, अप्रमाद है। यहां सुमिरन है। कॉन्सटेन्ट अवेयरनेस है। पूज्य स्वामीजी कहा करते थे-
श्मििवतजे ंतम तमुनपतमक जव ादवू जींज दव मििवतज पे तमुनपतमकश् पर प्रयत्न करने के बाद ही अप्रयत्न में प्रवेश होता है। करना, और करना, ... न करने की ओर ले जाता है। करना, लाजमी है। भगवान बुद्ध की उपलब्धि भी ‘सांख्य’ की है, पर वे पहुंचे वहां योग के द्वारा ही है। स्वामीजी कहते थे- ‘प्रारंभ में सारे प्रयास किए, परन्तु अपने साठ साल से अधिक प्रयोगशीलता के बाद जाना, रास्ता एक ही है, निरन्तर वर्तमान में रहना।
-जगत में जो भी जाना है, पाया जाता है, करके ही पाया जाता है, वहां प्रयत्न आवश्यक है। उसके लिए चलना जरूरी है। गति जरूरी है। परन्तु अन्तर्यात्रा न करने से मिलती है। वहां करना छूट जाता है। जहां करना होता है, वह शरीर से होता है, पर न करना, प्रारंभ मन से होता है, बाद में मन भी छूट जाता है।
‘वर्तमान में रहना’- जब कहा जाता है। तब एक ही वाक्य में कहा जाए तो जहां शरीर है, वहीं मन रहे, यह स्वाभाविक अवस्था है। पर जब मन वहीं रहना शुरू कर देता है, तब इस स्वाभाविक अवस्था में मन की भी उपयोगिता खो जाती है। यही सांख्य की विधि है। योग- मन को शरीर के साथ रखने की विधि है। समाधि का सारतत्व यही है कि जहां शरीर है वहीं मन रहे। वहां निरोध, मन की वृत्तियों का असहयोग होना शुरू हो जाता है। झील शांत हो जाती है। कंपन नहीं होता। परन्तु शरीर तो फिर भी क्रियारत रहेगा। क्रिया नहीं है तो शरीर शव हो जाएगा। पर मन, अमन की अवस्था में भी शरीर के साथ रहेगा। अंतर्मुखी अवस्था में अंतर्मन सारे कार्य व्यवहार संभाल लेता है।



Saturday, November 16, 2013

श्री गुरुगीता अध्याय 9

श्री गुरुगीता  अध्याय 9

इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यन सूयवे।
ज्ञानं विज्ञान सहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।। 9-1
”तुझ दोष दृष्टि से रहित भक्त के लिए इस परम गोपनीय ज्ञान को रहस्य के सहित कहूंगा कि जिसको जानकर तू दुःखरूप संसार से मुक्त हो जाएगा।“
दोष दृष्टि से रहित। गीता के आठ अध्याय ‘अंतर्यात्रा’ के प्रस्थान बिन्दु हैं। मन जो है, अब बाहर की ओर से इन्द्रियों से सिकुड़ता हुआ, भीतर की ओर मुड़ता है। अब बाहर का आकर्षण नहीं रहता। बाहर जो है, ... मात्र या तो भूत में है या भविष्य में है। ‘वर्तमान’ में मात्र उसका उपयोग है, बस। यहां पर आकर दृष्टि जो है, ... वह भी अब भीतर की ओर मुड़ती है। बुद्धि भी स्वतः शुद्ध होने लगती है।

जीवन को देखने की दो दृष्टियां हैं। एक नकारात्मक है, एक विधायक है। जगत हम वैसा ही दिखाई पड़ता है, जैसा हम देखते हैं। भगवान कह रहे हैं- ‘‘दोष दृष्टि रहित, ... हम प्राय वही देखते हैं, जो हम देखना चाहते हैं, हम जहां बुराई देखना चाहते हैं वहां हमें बुरे के अलावा कुछ भी दिखाई नहीं पड़ेगा। जहां संदेह है, वहां जो भी कहा जा रहा है, व्यर्थ है। कान उसे सुनेंगे ही नहीं। वह विपरीत ही सोचेगा, वही देखेगा।
स्वामीजी कहा करते थे- ‘संदेह रहित सुनो, ... अभी कुछ कहा नहीं, ... प्रश्न उठ खड़ा हुआ। ... भीतर जो है, जो दृष्टि है, ... उसे देखा, ... वह क्या देखना चाहती है, क्या सुनना चाहती है।’

पर जाना, ... भीतर गहराई में अश्रद्धा की परत थी, ... एक सहज संवेदनजन्य आधार भूमि का अभाव था। गुरु के समीप तभी जाना होता है, ... जब सारे संदेह गिर जाएं, ... दोनों तल एक रस हो जाए, ... वहां मात्र अनकहा भी कहा हो जाता है। ... यह तभी होता है जब हृदय की आंख से देखा जाता है, ... हृदय जब खुलता है। मन जब बुद्धि के धरातल को छोड़ता है, ... तब वह बुद्धिहीन नहीं होता है। तब वह हृदय के धरातल पर उतरता है। यही भगवान ने कहा है- ‘दोष दृष्टि से रहत भक्त। जो दोष दृष्टि से रहित हैं, वही भक्त हैं। भक्ति, हृदय की उपसंपदा है।
भक्त, ... जो अब तोड़ने वाली दृष्टि से दूर हो चुका है। जो जोड़ने के रहस्य को जान गया है। भक्ति, ... शुद्ध बुद्धि के बाद आती है। बुद्धि की शुद्धता का अर्थ यही है कि वह अब जान गया है, सभी संदेहों के पार वह हो चुका है। वह अब बुद्धि का दासत्व ग्रहण करके गलत नहीं कर सकता।

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योग क्षेमं वहाम्यहम्।।9.22

जो ‘अनन्यभाव से मेरे में स्थिति हुए भक्त जन मुझ परमेश्वर को निरन्तर चिन्तन करते हुए निष्काम भाव से भजते हैं उन नित्य एकीभाव से मेरे में स्थिति वाले पुरुषों का योगक्षेम मैं स्वयं प्राप्त कर देता हूं।’
‘अनन्या तथा निष्काम भाव से- उपासना- जहां उसके समीप आसन है, बस। भीतर कोई कामना नहीं है, ... जहां वासना है, वहां दूसरा साथ है। उपासना में जहां शरीर है वहीं मन है। वहीं वर्तमान है। ‘‘चाह गई चिन्ता गई, मनुवा बेपरवाह- जिसको कुछ नहीं चाहिए वही शहंशाह।’’ निष्काम साधना का मतलब है- यहां किसी प्रकार का ‘चाह’ नहीं है।
‘इसके पूर्व शब्द आया है- ‘अनन्या, ... जैसी तेरी मर्जी। भक्ति की भाषा में - केवल भगवान की ही शरण में जाना। उन्हीं का चिन्तन, उन्हीं की उपासना, उन्हें ही प्राप्त करना है। ऐसा दृढ़ भाव। उनके अलावा दूसरा कोई नहीं है।
स्वामीजी कहते थे- अनन्या, ... निष्कामता, ... मात्र वर्तमान में ही उपलब्ध होती है। यही एक मात्र साधन है और साध्य है। जरा सी भी कर्म में अपूर्णता हो, समता चली जाती है। निरन्तर जो वर्तमान में है। वहाँ  मन है, पर नियंत्रण में है,शांत है।परन्तु जहाँ... जहां विचारणा है, जड़ता है, चिन्तन शुरू हो जाता है, ... ध्यान शब्द का वे प्रयोग नहीं करते थे- न धर्म शब्द का। ध्यान का वास्तविक अर्थ है, निर्विचारता, ... जहां मन स्वयं विलीन हो जाता है। मन विचारों का जोड़ है। निर्विचारता में मन, अन्तर्मन हो जाता है। वहां विचार की विवेक में परिणिति हो जाती है। वहां निष्कामता प्रकट होती है।धर्म जन्म के साथ व्यक्ति को मिलता है,वे धारणाएँ जिनका उसे पालन करना होता है।
परन्तु आध्यात्म ,अपनी मूल उर्जा के साथ, अपने अस्त्तित्व के साथ जुड़ने की विधि है।यह जुड़ाव निरन्तरता में है।
निरन्तर, ... जैसे पानी की बूंदें गिरती है। एक धारा की तरह। रुक गई तो बूंद है नहीं तो धारा है, ... कॉन्सटेन्ट, ... यही बनी रहे। जाग्रत, स्वप्न, विचारणा, तीनों अवस्थाओं में एक्य रहे। यह ‘एक्य’ पाया जा सकता है। ‘निरन्तर’ वर्तमान में रहने से। वहीं परमात्म भाव में प्रवेश द्वार है। निर्विचारता ही द्वार है। इन्द्रियां मन के लिए बहिर्जगत में जाने का द्वार है। ‘अन्तर्यात्रा’ में मन इन्द्रियों से सिकुड़ लेता है, तब वह बाहर रास्ता नहीं मिलने पर, उसकी गति विपरीत हो जाती है, वह भीतर चला जाता है।
‘भगवान कृष्ण यहां कहते हैं- उस साधक का योग क्षेम ”मेैं “संभाल लेता हूं। अप्राप्त वस्तु का मिल जाना ”योग“ है, तथा उसको बनाए रखना ”क्षेम“ है। इसीलिए हम ईश्वर की ओर जाते हैं। सारे कर्मकांड का आधार यही है। यहां भगवान कह रहे हैं जो अनन्य भाव से, निष्कामता से निरन्तर मुझे भजता है, उसके योग क्षेम को मैं वहन करता हूं।
पूज्य स्वामीजी का यह प्रिय श्लोक था, ... यही उनकी साधना पद्धति का आधार था। उनके पास रहकर जाना, ... अनन्य, निष्कामता, निरन्तर भजन तथा योग क्षेम किस प्रकार वहन हो जाता है। मानो प्रकृति स्वयं उनकी हर आवश्यकता की पूर्ति कर देती थी। उनकी कुटिया में मानो ‘कल्पवृक्ष’ उग आया हो। वहां किसी प्रकार का अभाव नहीं था, ... वे जहां भी जाते थे, ... उनकी उपस्थिति मात्र से जो संभाव्य था, ... वह घट जाता था।
भगवान ने गीता से इसी अध्याय के 18वें श्लोक में ‘स्थान विधानं बीजमव्यमम्’ में ‘जिस सबका आधार विधान और अविनाशी कारण मैं ही हंू,इस रहस्य को स्पष्ट किया है-

गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत।
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानंबीजमव्ययम्।।18

प्राप्त होने योग्य तथा भरण करने वाला सबका स्वामी , शुभा- शुभ देखने वाला सबका वास स्थान,शरण लेने योग्य,तथा प्रति उपकार न चाहकर हित करने वाला सबका आधार और निधान और अविनाशी कारण मैं ही हूँ।
 पर संकेत दिया है, ... यहां ब्रह्मनिष्ठ गुरु की उपस्थिति, उस उत्प्रेरक की तरह हो जाती है, जो कुछ न करते हुए भी करता है। उसका वहां मन नहीं है, ... पर क्रियाएं अपने आप घटती है। उस शांत उर्जा का अनुभव जो भी यहां आता था, उसे होता था। वर्तमान में रहना, उस परम -गुह्य विद्या का सूत्र है, जिसे भगवान ने इस श्लोक में संकेत दिया है।‘योग, ... भक्त की पूर्णता है। उसके भीतर सारे द्वंद्व चले गए हैं। भक्ति की भाषा में परमात्मा की प्राप्ति है। साधारण भाषा में साधक की शारीरिक मानसिक, बौद्धिक, संपूर्ण आवश्यकताओं की पूर्ति है, क्षेम, उन्हें बनाए रखना है।
प्रायः हमारा चिन्तन भविष्य को लेकर होता है। बुढ़ापे में बीमारी व मृत्यु को लेकर उठता है। ‘हारे को हरिनाम’ तभी कहा जाता है।
‘भगवान यहां कह रहे हैं- ‘अनन्या, ... कोई दूसरा नहीं, ... मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरा न कोई, ... निष्काम भाव से, ... निरन्तर भजना। यहां निष्कामता, दूसरा पड़ाव है। तथा तीसरा है, निरन्तर...। स्वामीजी कहते थे- साधना, घंटे-दो घंटे बैठ गए ध्यान लगाया, ... पूजा करी, यह नहीं है। यह तो निरन्तर है। चौबीस घंटे। वर्तमान में रहा जाए। हर कर्म, हर क्रिया पूजा हो जाती है। मन, बाहर गया फिर भीतर आ गया, ... यह नहीं चौबीस घंटे बाहर ही बाहर भटकता रहा। यह स्वाभाविक अवस्था है। मन की स्वाभाविक अवस्था ‘शान्ति है। हमने उसे अशांत बना रखा है। जिन पांच कोशो की चर्चा होती है, अस्तित्व है, चेतना है, मन है, ध्यान है याने निविर्चारता है, ... जहां बुद्धि, शुद्ध होकर, विवेक में परिणित हो जाती है। फिर स्वाभाविक अवस्था है, ... परमात्मा है। पार होने की कला, मात्र वर्तमान में रहना है। इससे न तो मन का दमन होता है, न शरीर के प्रति अवज्ञा रहती है, न इन्द्रियों पर बलात दमन रहता है, मन स्वाभाविक रूप से अन्तर्मुखी होने लग जाता है। तब स्वयं प्रकृति, जो ब्रह्म की क्रियाशीलता है। जो परा है, वह साधक की आवश्यकताओं की पूर्ति अपने आप कर देती है। परन्तु होता इसके विपरीत है।

हम पहली तीन बातों पर भरोसा नहीं लाते, ... बस भगवान के नाम पर ‘मांग, बढ़ाए जाते हैं। भगवान यहां कह रहे हैं- ‘जो मुझ पर छोड़ता है, उसे मैं सम्हाल लेता हूं। जो खुद अपने आप पर भरोसा करता है, उसे सम्हालना पड़ता है। रास्ता एक ही है- दूसरा नहीं, जो भी काम हो, चाहे छोटा या बड़ा, मन को पूरी तरह उसमें लगा देना चाहिए- किंचित मात्र भी विपरीत भाव नहीं आना चाहिए, ... जरा सी भी जगह मिली, मन चिन्तन में चला जाता है। जहां अपूर्णता है, वहां निष्कामता चली जाती है, बहिर्मुखता यथावत बनी रहती है।
उसशुद्ध बुद्धि निष्काम प्रेमीभक्त का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआवह उपहार मैं प्रीतिसहित ग्रहण करता हूॅं।

भगवान कृष्ण ने यहां दो संकेत दिए हैं। हम भगवान को रोज याद करते हैं, ... सेवा करते हैं, मूर्ति को स्नान कराते हैं, भोग लगाते हैं, जो ध्यान मार्ग है, वे ध्यान में अमन होने का अभ्यास करते हैं।
भगवान कह रहे हैं, शुद्ध बुद्धि वाले, उस तल्लीन हुए अंतःकरण वाले, उस निष्काम प्रेमी, के उपहार को प्रीतिपूर्वक ग्रहण करता हूं।

स्वामीजी कहा करते थे- बुद्धि जब शत प्रतिशत शुद्ध होती है, तब विवेक की प्राप्ति होती है। शुद्ध बुद्धि का तात्पर्य, बुद्धि में अच्छे विचार हों, यह माना जाता है। लेकिन बुद्धि तब तक शुद्ध नहीं हो सकती, जब तक विचार हों। विचार ही विकार हैं।
सुबह-सुबह, दरवाजे पर एक आदमी कुत्ता लेकर आता था। दोनों के बीच में जंजीर थी। कभी कुत्ता, मालिक के इशारे पर चलता था, पर अचानक जंजीर छूट गई, आगे-आगे कुत्ता था, पीछे वह था। जाना, चाहे विचार आप पर हावी हांे, या आप विचार आपके अधीन हो, जंजीर हमेशा रहेगी। जहां विचार की नोक बाहर की ओर होती है। वह बाहर उलझता है, भागता है, भटकता है, यह बहिर्मुखता है। जाना विचार ही पाप है। पर जो चुप है। मौन है, वह बाहर से शांत दिखाई पड़ता है, पर भीतर उलझता है। उसका भीतर द्वन्द्व चलता रहता है। वह दुविधाग्रस्त रहता है। संशयात्मक विनश्यति, दोनों अवस्थाएं दोषपूर्ण हैं। चाहे विचार तमोगुणी हो, या सतोगुणी, ... विचार विकार ही हैं।

... हां, शुद्ध बुद्धि तीसरी स्थिति है, जब यांे कहे, निर्विकारता आ गई है। विकार ही नहीं रहे। विचार का अर्थ है, विकसित होने का भाव। जहां विचार ही नहीं रहता है। उस स्थिति का नाम है, शुद्ध बुद्धि। न कोई बांधने वाला है, न बंधने वाला। वहां मात्र भक्त बच जाता है। प्रेमी भक्त। निष्काम प्रेमी। वहां कामना के लिए कोई जगह नहीं है। कामना सदा भविष्य में रहती है। वर्तमान में न तो भूत का दबाव है न भविष्य का।
‘निष्काम प्रेमी तक पहुंचने का मार्ग है, ... जहां बुद्धि शुद्ध होती है, वहां हृदय भी शुद्ध होने लगता है। हृदय बायलोजिकल हृदय नहीं है। यह हृदय वह है जहां प्रेम उपजता है। बुद्धि का आधार है, चिंतन की ताकत है, बुद्धि अनुभव नहीं कर सकती। बुद्धि विश्लेषण करती है। वह तोड़ती चली जाती है। पर हृदय अनुभव करता है। यह हृदय की ताकत है। वहां संश्लेषण होता है। पूर्णता रहती है। अनुभव को विभाजित नहीं किया जा सकता है।
बुद्धि अशुद्ध होती है, विचारणा सेे हृदय अशुद्ध होता है, परदोष दर्शन तथा आत्मप्रशंसा से। जब बुद्धि और हृदय शुद्ध होते हैं, तब भक्त का जन्म होता है। वहां ‘विभक्त’ खो जाता है। भगवान कृष्ण ने यहां स्पष्ट कहा है- शुद्ध बुद्धि हो, तथा निष्काम प्रेमी हो, उसकी हर भेंटमें स्वीकार कर लेता हूं।
‘निष्काम प्रेमी’- जहां कर्तापन पूरा खो जाता है। मात्र कर्म मात्र रह जाता है। हमने लगाई अर्जी जैसी दाता की मर्जी, ... अपना कोई आग्रह नहीं, दुराग्रह नहीं।
.....भीतर कोई कामना नहीं, ... तब भीतर जो उत्पन्न होता है, वह आनंद है। उसका बाहर प्रतिफलन प्रेम है। प्रेम एक शक्ति है, एक आकर्षण है। जहां मात्र खिंचाव है। यह तभी पैदा होता है, जब भीतर का कर्ताभाव खो जाता है। तब उस साधक की भेंट भगवान प्रीतिपूर्वक ग्रहण कर लेते हैं।

समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्।29
मै ंसब भूतों में समभाव में व्यापक हूँ, न कोई मेरा प्रिय है न अप्रिय,परन्तु जो भक्त मेरे को प्रेम से भजते हैं, वे मेरे में ,मैं भी उनमें प्रत्यक्ष हूँ। गीता की सार्वभौमिकता यही है। यहाँ ज्ञान सबके लिए है।परन्तु जो भक्त मेरे को प्रेम से भजते हैं,,वहाँ मैं अधिक प्रत्यक्ष हूँ।मुझे भजना।वर्त्तमान में रहने की यही उपसंपदा है।यही वास्तविक शक्तिसूत्र है।
क्या यह अधिकार मात्र किसी एक धर्म विशेष का है? क्या गीता मात्र एक पलायनवादी ग्रन्थ है? या गीता आधुनिक मानव के सृजन व उत्थान की महान योजना है?
मेरे को भजना का निहितार्थ ही अन्तर्यात्रा का प्रस्थान बिन्दु है।यही ं वर्त्तमान में रहने के सूत्र निहित हैं।

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यसितो हि सः। 9-30
क्षिप्रं भवति धर्माता शश्वच्छान्तिं निगच्छति
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति।। 9-31

‘‘यदि कोई अतिशय, दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरा भक्त हुआ मेरे को निरन्तर भजता है वह साधु ही मानने योग्य है क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है।
इसीलिए वह शीघ्र ही धर्माता हो जाता है और सदा रहने वाली परम शान्ति को प्राप्त होता है, हे अर्जुन तू निश्चयपूर्वक सत्य जान कि मेरा भक्त नष्ट नहीं होता। जो एक बार मुझे जान लेता है, वह फिर कभी दूर नहीं जाता।
इसके पूर्व श्लोक संख्या 9-29 में भगवान ने कहा है-
‘‘मैं सब भूतों में समभाव से व्यापक हूं, न कोई मेरा अप्रिय है न प्रिय है परन्तु जो भक्त मेरे को प्रेम से भजते हैं, वे मेरे में और मैं भी उनमें प्रकट हूं।
‘जो भक्त मेरे को प्रेम से भजते हैं- इसके बाद भगवान कृष्ण कह रहे हैं अतिशय दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरा भक्त हुआ, ... मेरे को निरन्तर भजता है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है, ... वह साधु मानने योग्य है। वह साधक धर्माता हो जाता है, वह परम शांति को प्राप्त होता है, मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता है, ... वहां मैं प्रकट होता हूं।
बूंद जब सागर में मिलती है, तो वह सागर ही हो जाती है। मनुष्य के भीतर ‘दिव्यता के अवतरण के यहां सूत्र हैं। पूज्य स्वामी जी इन श्लोकों को एक साथ रखकर कहा करते थे।
... अतिशय दुराचारी भी, ... प्रायः हम सदाचारी को ही परमात्मा के द्वार पर देखना चाहते हैं। परन्तु यहां भगवान, अतीत से वर्तमान तक की यात्रा को समेट रहे हैं। अतिशय दुराचारी वह कल था, ... परन्तु वह यथार्थ दृढ़ निश्चय वाला है, वह भी अनन्य भाव से निरन्तर भजता है, तो वह साधु मानने योग्य है, वह धर्मात्मा हो जाता है, परम शांति को प्राप्त होता है, वहां मैं प्रकट होता हूं।
... क्षिप्रं भवति धर्मात्मा, ... अतिशय दुराचारी भी जो दृढ़ निश्चय वाला है, वह दुष्कर्म से छूट नहीं सकता,  जो भौतिकवादी हैं, उन्हें प्रबल बौद्धिक शक्ति भी प्राप्त हो जाती है। जिससे कालांतर में उनका पतन भी हो जाता है। परन्तु वह अगर ‘अनन्य भाव से मेरा भक्त है, निरन्तर भजता है तो वह साधु मानने योग्य है।
यहां पर महत्वपूर्ण शब्द यथार्थ निश्चयवाला है, ... संकल्प हमारे बनते नहीं है, आधा-अधूरा मन रहता है।  हम लोटे की तरह लुढ़कते रहते हैं। पहली बात हमारा मन जो पचास जगह पर जाता है, वह इन्द्रियों से सिमटे, विषयों से सिमटे, उसकी बहिर्मुखता रुके, वह एक दृढ़ निश्चय वाला बने। कांपते हाथ से पात्र पकड़ा नहीं जाता। जब यह निश्चय दृढ़ होता है, ... तब संकल्प बनता है।
... यह संकल्प विधायी बने। नकारात्मक नहीं। तब यह संकल्प जहां अनन्य भाव से परमात्मा के स्मरण में आता है, होता है, तब ‘अन्तर्मुखता जन्मती है। ‘यथार्थ निश्चय, ... वह है उसके प्रति समर्पण, ... जो है उसका समग्र विचार। कहीं असंतोष नहीं, कोई कंपन नहीं। जहां मन-प्राण की युति होती है, वहीं योग है। ‘योगवत’, पूरी शक्ति के साथ वहाँ हो। तब जिसे छूटना होता है, उसका छूटना शुरू हो जाता है। जो निरन्तर वर्तमान में है, ... वहां स्वतः दुराचरण छूटता चला जाता है। अंतर्मन में प्रवेश तभी होता है, जहां मटमैली बूंद निर्मल हो जाती है। निर्मलता पाने के लिए बाह्य उपचार की कोई जरूरत नहीं है।

चाहे सफलता या असफलता पूरे प्राण-पण के साथ कामना। ”तान तितिशस्व भारतः,“, सहन करने की शक्ति अपने आप बढ़ती जाती है।
‘संकल्पवान होने के लिए सभी कहते हैं। नियम है, जो काम आप कर सकते हैं, कर दंे। जो काम आपकी शक्ति के बाहर है, उचित है, सही है, उसे ईश्वर पर छोड़ दें ।जो काम आप उचित नहीं मानते हैं, उन्हें तुरंत छोड़ दें।

 जो भी काम है उस पर पूरे मन को ले आवें, ... पूरी तरह लेश मात्र भी विचारणा को आने को जगह नहीं, ... शक्ति अपने आप पैदा होती है, आप संकल्प में प्रवेश करने लग जाते हैं। संकल्प याने एक ही निश्चयात्मक विचार, ... जहां विचारणा का कोई आदर नहीं है। तब ज्ीपदा वदबम ंदक कमबपकम वदबम दमअमत ींअम ं ेमबवदक जीवनहीज  का आदर स्वतः होने लगता है। तथा विचारणा-विचार में तथा विचार संकल्प में ढल जाता है।
... यह जो दृढ़ निश्चय वाला है, अनन्य भाव से जो मुझे स्मरण करता है- यहां अनन्य भाव, महत्वपूर्ण है। निष्ठा भीतर से आती है बाहर की ओर जाती है,, वहां श्र(ा उपजती है। निष्ठा दूसरे के प्रति होती है, श्र(ा स्वयं से होकर, स्वयं में  प्राप्त होती है। भाव अनन्य है। कोई दूसरा नहीं है। वहां निरन्तर रहना है। यह स्वाभाविक अवस्था है। सहजावस्था है। निरन्तर वर्तमान में रहना है। वहीं परमात्मा का प्रवेश द्वार है। यहां चेतना की धारा अन्तर्मुखी है। वह बाहर जाता हुआ भी, कार्य करता हुआ भी, निरन्तर भीतर से जुड़ा है, उसका उसे अहसास है, वही प्रेम है।
वहीं धर्म उपजता है, उसे ही धर्म की प्राप्ति होती है। वही धर्मात्मा होता है। धर्म ही उसका स्वभाव बन जाता है। वही सदा रहने वाली शांति को प्राप्त होता है। वही दिव्यता का अवतरण हो जाता है। विराट की वहां उपस्थिति है।
स्वामीजी के साथ रहकर जाना था, ... गीता के शब्द, अपने भीतर जिस अर्थ को ध्वनित करते हैं , उनका  वहां गुंजायमान था। वहीं धर्म जन्मता है। वहीं सागर की उपस्थिति का अहसास होता है। जहां नदी शांत होकर विलीन हो गई है। बुद्धि भाषा के अनेक अर्थ खोल सकती है, परन्तु जहां सदगुरु स्वयं उपस्थित हों, जहां शब्द स्वयं मूर्त होकर उदाहरण दे रहे हो, वहां अर्थ स्वतः भीतर तक वर्षा की बूंदों की तरह रिसता चला जाता है।

मन्मना भव मÚक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामे वैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः।। 9-34

तू मुझ परमात्मा में ही अनन्य प्रेम से अचल मन वाला हो, मुझ परमेश्वर को ही निरन्तर भजने वाला हो, मेरा पूजन करने वाला हो, मेरे को नमस्कार कर, इस प्रकार मेरे शरण हुआ तू आत्मा को मेरे में एकीभाव करके मेरे को ही प्राप्त होगा-
मद्भक्तः- मेरा भक्त होजा। मन्मनाभव- मेरे में मन वाला हो जा। मद्याजी- मेरा पूजन करने वाला हो। मां- नमस्कुरु- मेरे को नमस्कार कर।
मामे वैष्यसि- मेरे को प्राप्त होगा। युक्त्वैव मात्मानं- अपने आपको मेरे में लगाकर। मत्परायण- मेरे साथ अभिन्नता हो (मेरे में एकीभाव करके)।
स्वामीजी एक वाक्य में कहा करते थे- जो मैं भीतर हूं, उससे निरन्तर जुड़े रहो। इसके पूर्व के श्लोक में कहा गया है- ‘‘तू सुख रहित और क्षण भंगुर इस लोक को पाकर निरन्तर मेरा ही भजन कर।
क्षण-भंगुर , यहां कुछ भी स्थाई नहीं है, हर वस्तु प्रतिपल बदल रही है। हमारी देह, हमारा मन, हमारे विचार यहां कुछ भी स्थाई नहीं है। तब क्या किया जाए, कैसे रहा जाए? स्वामीजी कहते थे- ज्ञान सहित रहना, यह जो प्राकृतिक विधान है, ... उसको समझकर जीना, ... जीवन के नियमों को जानकर जीना, जीने की कला है, जीवन जीने के लिए मिला है। यहां भगवान कह रहे हैं, तू निरंतर मेरा भजन कर। कॉन्सटेन्ट अवेयरनेस। सतत सजगता। यह प्राप्त होती है, निरन्तर वर्तमान में रहने से। वर्तमान क्या है? यह समझ से परे , रहने की कला है, क्रिया के साथ रहना, वर्तमान में रहने की की आंशिक सूचना है, यह मात्र विधि है, बस। पर जो भीतर ‘माम’ है, उससे जुड़े रहने का अहसास। बाहर रहते हुए भी भीतर से जुड़े रहने का अहसास। यह प्राप्त होता है, ‘अंतर्मुखता’ से। अंतर्मुखता प्राप्त होती है, निरन्तर वर्तमान में रहने से। यह स्वाभाविक अवस्था है। स्वामीजी इसे ‘सहजावस्था’ भी कहते थे। यहां निराशा नहीं है। यहां पलायन नहीं है। वरन् अत्यधिक सक्रियता है, शांति है। नियंत्रित मन है, जो अंतर्मन में विलीन हो चुका है, बुद्धि ,शुद्ध है, हृदय पवित्र है। वहां दिव्यता के प्राकट्य की संभावना होती है।  वह जो मैं भीतर हूं जो ‘माम’ निरंतर उसके साथ जुड़ाव की अनुभूति हो। अनुभूति हृदय करता है। यह बुद्धि के पार है। ध्यान- निरंतर वर्तमान में रहने की स्थिति है।विचार ही  विकार हैं। निर्विचारता ही निर्विकारता की कंुजी है। जहां हृदय भी पवित्र होने लग जाता है। यह अवस्था प्राप्त होती है- ‘‘माम अनुस्मर युद्ध च’’  ...निरन्तर सजगता में रहने से। यहीं शांति में प्रवेश द्वार है।