Wednesday, October 30, 2013

श्री गुंरु गीताका दूसरा अध्याय

आदरणीय महानुभाव
श्री गुंरु गीताका यह दूसरा अध्याय आज आपकी सेवा में प्रस्तुत हैं।पूज्य स्वामीजी गीता के श्लोकों का आधार बनाकर साधकों के प्रश्नों की समस्याओं का समाधान बताया करते थे। लगभग अट्ठाईस साल का आपका सानिध्य मिला। आप ब्रह्मनिष्ठ गुरु थे, गीता आपकी दृष्टि में शांति, सुख , शक्ति , तथा आधुनिक जीवन की समस्याओं को सुलझााने वाला अद्भुद ग्रंथ है।
उसी दृष्टि को यहॉं निरूपित किया गया हे।


दूसरा अध्याय
क्लैब्यं मा स्म गमःपार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
श्रुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप।।3।।

क्लैव्यं मा स्म गम,... श्रुद्रं हृदय दौर्बल्यं...
गीता में संपूर्ण योजना- व्यथित मन को,दुविधाग्रस्तमन को, संप्रेषित है। अर्जुन योद्धा है,... उसकी मन की यह दुविधा क्यों हुयी,... विद्वानों ने बहुत विवेचना की है। उसके भीतर की ममता,... उसके भीतर के द्वन्द्व को, जो उसके सतोगुणी व्यक्तित्व पर अचानक तमस की छाया के आने से पैदा हुआ,... ममता,... गुरुजनों को लेकर है,... दूसरे कोई और होते तो तो वह लड़ जाता,... पर अचानक ममता,... परिजनों का वध,... उस द्वन्द्व को खड़ा कर देता है, जो आज के मानव मन की समस्या है,।
...
कृष्ण उस व्यथित मन से जो गांडीव रखकर, रथ के पिछवाड़े बैठ गया है,... पसीने में नहा गया है, उसका आत्मविश्वास खो गया है,...उसे मार्ग बताते हैं।
आज चाहे, ममता  की अपूर्णता पर,  उत्साह जनक प्रतिफल के प्राप्त न होने पर उत्पन्न व्यथा हो, , परिस्थितियों की प्रतिकूलता हो, अपमान का भय हो, मनुष्य का मन पराजय की आकांक्षा से या कर्म की व्यर्थता से ऊबकर किसी अरण्य की शरण में जाना चाहता है।संगीत सुनने का नशा, डिस्को में बढ़ती भीड़,तरह-तरह के नशे,बाबाओं के प्रवचन की भीड़ यह सब पलायन ही है। अजीब प्रकार का पोलापन हमारे भीतर व्याप्त है, हम बहुत देर तक कठिन परिस्थितियों का सामना नहीं कर सकते। वह धैर्य हमारे भीतर नहीं है। कहीं न हीं हम युघिष्ठिर के संस्कारों से ग्रसित हैं। सतत प्रयत्न हमारे जीवन का मूल्यवान नहीं बन पाया। हारे को हरिनाम हमें प्रिय लगा है।

यह दुविधा हजारों वर्ष बाद भी आज वैसी ही है,.
..
कृष्ण कहते हैं- हे, अर्जुन नपुंसकता को मत प्राप्त हो,... शास्त्र ने मनुष्य को ‘पुरुष’ शब्द की संज्ञा दी है। पुरुष वही है, जो पुरुषार्थ करे,... और मनुष्य वही है, जिसके पास मन-नाम की शक्ति है। अर्जुन की मूल समस्या, उसकी दुविधा है, वह वृहत्तम जीवन मूल्य से जहां यह युद्ध-मानवता की रक्षार्थ या मूल्यों की रक्षार्थ था, वहां वह अचानक अपनी ‘वैयक्तिक’ समस्या से उत्क्रांत हो उठता है। उसके सारे तर्क,... समष्टिगत मूल्यों से हटकर नितांत व्यक्तिगत आग्रह-दुराग्रह तक सीमित हो जाते हैं। व्यक्ति की आज भी यही समस्या है,... वह अपने लिए तथा समाज या परिवार के हित के बीच सामंजस्य नहीं पा रहा है। इस पराजित मन को, दुविधाग्रस्त मन को,... जो वास्तव में आत्मविश्वासी मन है,... जगाने के लिए एक धक्के़े की जरूरत थी,... राख में दबे अंगारे को उठाने की ताकत, इस एक शब्द में है- नपुंसकता को प्राप्त मत हो,... हृदय की दुर्बलता ही आज की सबसे बड़ी समस्या है।

गीता के इस अध्याय को”सांख्य योग की संज्ञा दी गई है। अध्याय में दो विपरीत परम्पराओं को देखकर भ्रम बहुत फैला है। मनुष्य तो एक ही है। उसकी उर्जा का आधार भी एक ही है। फिर विषमता कहाँ है?

जहाँ पुरुषार्थ है, वहीँ सांख्य है। पुरुषार्थ मूल तत्व की ओर ले जाता है। ”सोर्स“, जो कारण है। जो आत्म है, आत्म कोई नपुंसक शक्ति नहीं है। उसे पाना ही स्वधर्म है,और प्रयत्न योग है। विषय , इन्द्रियों और मन के संबंध से निश्चित लक्ष्य की प्राप्ति प्रयत्न से ही प्राप्त होती है। संसार में सफलता प्रयत्न से ही मिलेेगी। यही कर्म योग है। तिलक महाराज ने प्रयत्न को योग का मार्ग मानकर अपना महान ग्रंथ लिखा है। ज्ञानेश्वरी पुरुषार्थ के मार्ग का ग्रन्थ है।  जीवन में दोनो ही पथ अपरिहार्य है। यही वैदिक पथ है। दोनो ही मार्ग अविरोधी हैं। हम जिस मनुष्य की कल्पना गीता के आधार पर कर रहे हैं, वह वीतरागी नहीं है, वह कृष्ण के पथ का है, जहाँ सांख्य भी है, योग भी है, कर्म भी है, जगत अपनी संपूर्ण क्रूरताओं के साथ है, परन्तु वह सामना भी कर रहा है, और विजय भी प्राप्त कर रहा है,  और दूसरों को दिला भी रहा है। उसके अधरें पर बांसुरी भी है, तो गीता  का शंखनाद भी है।

आज की इस दुनिया में जहाँ अनिर्णय ही जीवन का आधार बन गया है। ज्योतिषियों की भीड़, बाबाओं की जमात, इसी दुर्बलता के कारण पोषण पाते हैं। न तो यह हमारी जीवन शैली हे, न हमारा धर्म है, न हमारी संस्कृति हैं

गीता, यहां प्रयत्न को रेखांकित करते हुए ‘कर्मयोग’ का आधार तलाश कर रही है।

‘उतिष्ठ’,... उठो, जागो, अनावश्यक विचारणा का परित्याग करो,... ‘सोचो,... खूब सोचो,... पर विचार जो दृढ़ हो जाए उस पर कायम रहो, उस पर बार-बार मत सोचो,... तभी हृदय की दुर्बलता कम होती है। हम किसी भी प्रकार की साधना करें, अगर हमारा आत्मविश्वास दृढ़ नहीं होता है,... तो वह साधना व्यर्थ है। आज की सबसे बड़ी समस्या, मानव की यही दुविधा है,... वह अनावश्यक विचारणा के दबाव में रहता है, सही निर्णय नहीं ले पाता है। निर्णय हमेशा बुद्धिकी स्थिरता में होता है। विवेक के आलोक में होता है। गीता उस राह पर चलने के लिए संकेत करती है।

कार्पण्य दोषो पहत स्वभावः
पृच्छामि तवां धर्मसंमूढचेताः ।7
”मेरा स्वभाव कृपणता दोष से दूषित हो गया है,... कायरता रूप दोष करके उपह्त स्वभाव वाला अर्थात् मेरी बुद्धि पर जड़ता छा गयी है, जिससे में अपने कर्तव्य के बारे में मूढ़ हो गया हूं।“

... यह कार्पण्य दोष,... अत्यधिक विचारणा से ग्रस्त मनुष्य पर आ जाता है। उसकी निर्णय क्षमता चली जाती है। वह दिग्भ्रमित हो जाता है। क्या करना है, क्या नहीं करना है? वह तय नहीं कर पाता है। यह कायरता दोष नहीं है। ... कायर व्यक्ति के पास तो एक रास्ता होता है, भाग जाए। समर्पण कर दे। जो है वही भाग्य है। मान लो। तुम्हारी जन्म पत्री में काल सर्प दोष है, फलां- फला, उपाय करो, तुम पर कृपा नहीं हो रही है, यह उपाय करो, लूट का बाजार चल पड़ा है,यह कायरों का मार्ग है। हजार साल की गुलामी से पैदा हुई दीनता है। गीता का प्रारम्भ ”लोभ“ को रेखांकित करते हुए हुआ हे। लोभ से दूषित चित्त ही आम भारतीय की पहचान है। भारत की गुलामी का कारण लोभ और मित्र द्रोह ही है। इस दोष से आम भारतीय आज भी ग्रसित है। गीता का प्रारम्भ ही अद्भुद है।

दूसरी हमारी एक और पहचान है, हम बहुत बड़े विद्वान है यही हम मानकर चलते हैं।
 उसकी पहचान है, जहां चुनौती तो है,... सामना करने का सामर्थ्य भी है,... पर उत्साहहीनता है। उसका कारण सम्मोह, भय, ममता, करुणा, कुछ भी हो सकता है? हम इसकी पहचान हमारी उस मनोवृत्ति से कर सकते हैं, जिसकी पहचान हम आतंकवादियों के साथ सद्व्यवहार कर बताते हैं। हम वर्षों तक कानून की स्वयं पालना नहीं कर सकतेे हैं। इसके लिए हमें दुःख भी नहीं है। क्यों कि यह हमारा स्वभाव है।

आज समाज इसी ‘कार्पण्प्य दोष’ से ग्रसित है। जानते हैं, समाने अमंगल हो रहा है, अशुभ हो रहा है, परन्तु व्यक्तिगत स्वार्थ से बुद्धि इतनी जड़ हो गई है कि विकल्प सूझता ही नहीं है। प्राप्त विवेक का अनादर ही , यही कार्पण्य दोष है। दिग्भ्रमित हो जाना,... यह भय से भी होता है,., झूठी प्रतिष्ठा को मूल्य मानकर भी होता है। इसीलिए यहाँ लोक ने भगवान राम को आदर तो दिया, पर पूर्ण अवतार कृष्ण को ही माना है, गीता यहाँ हमारे मूल स्वभाव पर सीधा आघात कर रही है। स्पष्ट है, यहाँ अर्जुन भयभीत नहीं है। वह मोहग्रस्त है। अपनी झूठी प्रतिष्ठा के सम्मेाहन में है।

... आज समाज भी मोहग्रस्त है, सुख लोलुपता में है, वह छोटे-छोटे स्वार्थों की पूर्ति को ही बहुत बड़ा मान रहा है,... उसे दूर का नहीं दिखाई पड़ता है। यह दोष अहंकारी की विशेषता है। मध्यकाल में यह दोष राजनैतिक पराभव का कारण बना।
यही कार्पण्प्य दोष है। बुद्धि पर जड़ता छा गई है। विचार ही कुंठित हो गया है। ... अनावश्यक विचारणा का दबाव है। इलेक्ट्रोनिक मीडिया  हर मनुष्य की निर्णय क्षमता को प्रभावित कर रहा है। उसका मस्तिष्क एक कचरा पात्र बन गया है। यह कायरता पहीं है, यह सामर्थ्य होते हुए भी अविवेक के आदर की प्रवृत्ति है।
... यह कहने से पूर्व की घटना है-
अर्जुन ने श्री कृष्ण से कहा था-
सेनयोरुभयोर्मध्यं रथं स्थापय मेऽअच्युत ।।1. 21 ।

”हे कृष्ण मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिए-“
.. मेरा रथ - शब्द महत्वपूर्ण है। उसके लिए यहां कृष्ण मात्र सारथी है,... वह अपने अहंकार में है-
परन्तु वही अर्जुन जब दुविधाग्रस्त हो जाता है,... तब कहता है-

मैं आपका शिष्य हूं- आपकी शरण में हूं, मेरे लिए जो भी कल्याणकारी हो वह मुझे स्पष्ट रूप से बताइए-
... गीता की यह भूमिका है...यह संवाद चिंतनीय है। मनुष्य स्वभाव से दिग्भ्रमित है। क्या करना है,... क्या यह नहीं, वह अपना  निर्णय  बुद्धिचातुर्य से करता है। यही दुख का कारण है। वह हर प्राप्त परिस्थिति का दुरुपयोग करता है। विवेक का अनादर करता है।बुद्धि चातुर्य शब्द महत्वपूर्ण है। इसकी सही पहचान अनिवार्य्र है। जहाँ हम अपने गलत कार्य को गलत जानते हुए भी तर्क के आधार पर न्यायोचित ठहराने का प्रयास करते हैं। आप टी.वी चैनल्स इस प्रवृत्ति को देख सकते हैं।
गीता का संदेश- प्राप्त परिस्थिति का सदुपयोग तथा विवेक का आदर है। विवेक का आदर ही बुद्धि के शत-प्रतिशत शुद्ध होने पर उसे विवेकी बनाता है। विवेकी ही स्थितिप्रज्ञ है। यही सांख्य सोग की उपसंपदा है। सामर्थ्य का सदुपयोग प्रयत्न में सफलता सौंपता है।  यही कर्मयोग की उपलब्धि है, यही ज्ञान योग की संपदा है। यही भक्ति की परिकाष्ठाहै।


अशोच्यानन्वशाोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।11।

यहां से श्री कृष्ण,... एक शिक्षक, एक गुरु,... एक अधिष्ठाता  की तरह अपना कथन प्रारंभ करते हैं-
प्रायः हमारी दुविधा यही है कि हम दुखी होते हैं, शोकमग्न होते हैं। परन्तु अपने आपको न्यायोचित ठहराने के लिए बड़ी-बड़ी बातें करते हैं।

शोक होने के लिए- पहली बात तो यह है कि उससे जुड़ाव होना आवश्यक है। यह वस्तु मेरी है, यह व्यक्ति मेरा है,... इससे अलगाव हो गया है, यही दुख है। जो मेरा है, उससे ममता, आसक्ति, कामना हो जाती है। वह इच्छा पूर्ति नहीं करता है तो उससे ही दुख होता है, क्रोध आता है, पर जो अपना नहीं है, उसके प्रति कोई भाव जन्मता ही नहीं है।

... अब सवाल होता है जिससे प्रियता है, ममता है, उसके प्रति हमारा क्या लगाव हो? ... क्या आसक्ति उचित है?

गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पंडिता।।11।
”पंडितजन, जिनके प्राण चले गए हैं उनके लिए और जिनके प्राण नहीं गए है उनके लिए शोक नहीं करते हैं।“

संसार में कहा जाता है, दो ही बाते हैं, सत और असत। सत का कभी अभाव नहीं होता तथा असत हमेशा परिवर्तनशील होता है। शरीर और शरीरी। देह और देही। क्षर और अक्षर। शरीर तो विनाशशील है, पर जो शरीर में रहता है, उसका विनाश नहीं होता है इसीलिए जो अविनाशी है, उसके लिए शोक करना व्यर्थ है, तथा जो विनाशी है, परिवर्तनशील है वहां यह परिवर्तन स्वभाववश है।

- इसे हम यों समझ सकते हैं- जीवन में अच्छी-बुरी अनेक परिस्थितियां आती हैं, हानि-लाभ, मान-अपमान निरंतर आता है,... यह हमारे बूते का नहीं है। यह तो हमको स्वभाववश मिलता है। प्रारब्धवश है। कोई भी परिस्थिति नित्य नहीं है, वह सदैव परिवर्तनशील है। अतः उसका सामना करना ही सार है। सामना मात्र वर्तमान में रहकर ही हो सकता है। शोक हमेशा अतीत को लेकर होता है। जो गया सो गया। हमारे जीवन की अनेक समस्याओं का समाधान यही है। हम प्रायः जो चला गया है, लौटकर नहीं आता है, उसका बार-बार चिन्तन कर, अपने वर्तमान को ही कलुषित करते रहते हैं। वर्तमान को ही विषाक्त बना देते हैं। सृजनात्मकता का ह्रास हो जाता है। प्रबंधन की क्षमता हमेशा वर्तमान में ही परिलक्षित होती है। साथ ही आज जो सामने कठिनाइयां आ रही हैं, परिस्थितियां विषम है, वे भी भयभीत नहीं कर सकती। क्योंकि यह बोध रहता है कि यह विनाशशील है, परिवर्तनशील है। आज है कल नहीं रहेगी। सामना करने की शक्ति बढ़ती है।   आत्मधात का संकल्प अत्यधिक दुःख में भी गिर जाता है। पलायन का गीत नहीं उभरता। भीषण दुःख है, जिसकी कल्पना भी नहीं होसकती, वह चुपचाप आकर आत्मा को गीले कपड़े की तरह निचोड़ जाता है, तभी कृष्ण के शब्द कांपते कदमों के संबल बन जाते हैं।
 गीता- कर्मयोग का ग्रन्थ है। यहां पलायन का गीत नहीं है। आज के समय की चुनौतियों का यहां सामना करने का स्पष्ट निर्देश हमें प्राप्त होता है।

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्ण-सुख दुःखदा।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्ति तिक्षस्व भारत।।14।

”इन्द्रियों के जो विषय, मन-बुद्धि, इन्द्रियों और बाह्य विषयों के संपर्क से ही शीत-उष्ण, अनुकूल और प्रतिकूल, प्रिय-अप्रिय, सुख-दुख के अनुभव होते हैं। ये आते-जाते हैं। ये अस्थिर तथा अनित्य है, तुम इन्हें सहन करो, विचलित मत हो।

मात्रा-स्पर्शः, जिनसे माप-तोल होता है, जिनसे ज्ञान होता है। उन ज्ञान के साधन इन्द्रियों, मन, बुद्धि, अंतःकरण का नाम मात्रा दिया गया है। इन्द्रियों और अंतःकरण से जिनका संयोग होता है, उनका नाम स्पर्श है। इन्द्रियों तथा अंतःकरण हम जिन बाह्य पदार्थों का ज्ञान होता है, वे मात्रा स्पर्श है।

शीतोष्ण सुख दुःख कार्य है। पदार्थों में सुख-दुख देने की शक्ति नहीं है। वह तो हमारे संबंध जोड़ देने पर होती है।
आगमा पायिनः, ये ठहरने वाले नहीं है, आने-जाने वाले हैं। अनित्य हैं, मात्र पदार्थ ही अनित्य नहीं है, जिनसे उनका ज्ञान होता है, इन्द्रियां और अंतःकरण भी अनित्य है। वे भी परिवर्तनशील है।

इन्द्रियों और बाह्य पदार्थ से यदि सुख मिलता है, तो उसके प्रति राग होता है। यदि दुःख मिलता है तो उसके प्रति द्वेष होता है। सारा जीवन इसी तरह राग-द्वेष से प्रभावित रहता है। तनावपूर्ण बना रहता है। यहां पर यह कहा गया है कि विषय तो रहेंगे,... ज्ञान के साधन भी रहेंगे,... परन्तु जो करना है, वह यही है कि विषयों के प्रति अंतःकरण में जो राग-द्वेष होते हैं, उनसे अप्रभावित रहा जाए। इन्द्रियों द्वारा विषय भोग तो होगा, उससे सुख, दुख भी होगा, हम इन्द्रियों को विषय भोग से दूर नहीं रख सकते,... उन्हें रोकना असंभव है,... परन्तु विषयों के प्रति राग-द्वेष से प्रेरित होकर,... विवेक न खो जाए। ....अंतःकरण में राग-द्वेष का विकार होना ही दोषी है।

मात्रा स्पर्श में भी निर्विकार रहना ही उनको सहना है। इसी को तितिक्षा कहा है। ... यह किस प्रकार संभव है-
यह पूज्य स्वामीजी का यह प्रिय श्लोक था। यही  उनकी साधन प्रणाली थी।
यह मात्र एक चिन्तन का या, मनन योग्य सूत्र  ही नहीं है।पूरी साधन प्रणाली है। तितिक्षा सहन करना ही नहीं है। जब हम किसी अप्रिय बात को बर्दाश्त करते हैं, तो उसकी छाप हमारे अंतःकरण में अंकित हो जाती है। वही संस्कार रूप में बदल जाती है। यह निरंतर घटता रहता है। हम जहां भी होते हैं, जो भी छोटी से छोटी घटना हमारे सम्मुख होती है, उसका प्रभाव हमारे मन के द्वारा, चिंतन के द्वारा हमारे अंतःकरण में जमा होता रहता है। वह संस्कार रूप में, बीज रूप में इकट्ठा होता रहता है। जब भी अनुकूल वातावरण उसे मिलता है, वह अंकुरित हो जाता है। अचानक मनोकाश पर काली बदली छा जाती है। प्रश्न यह उठता है, इसे बीज बनने से कैसे रोका जाए।
पूज्य स्वामी कहा करते थे, दो बाते हैं, भीतर से जो संग्रह जमा है, संस्कार है वहां निरंतर ब्रह्माण्ड की अनंत लहरों से आघात होते रहते हैं। वहां अंतर्मन है। वह बहुत शक्तिशाली है, वहां भीतर का संग्रह जो जमा है, वह उफान खाकर ऊपर आ जाता है, मस्तिष्क उससे प्रभावित हो जाता है,... हमें यहां बर्फ हो जाना है। बर्फ पर लहरें नहीं बनती, चित्त की वृत्तियां निरंतर उठती रहती है। एक क्षण भी नहीं ठहरतीं। जाग्रत में विचारणा है,... निद्रा में स्वप्न आते रहते हैं। निरंतर विचारणा का ही प्रभाव रहता है। यही तो राग-द्वेष है। राग जो प्रिय प्रभाव अंकित हो गया है। तथा बाहर के जो संवेग हैं,... वे भी निरंतर मात्रा-स्पर्श होने से निरंतर अंतःकरण पर प्रभाव डालते रहते हैं। दोनों तरफ से निरंतर जैसे समुद्र टकरा रहा हो। इन दोनों वेगों को ही सहन करना,... तितिक्षा है।
 भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के प्रारंभ में ही इस साधना सार की ओर संकेत किया है। अधिकांश ने यह शंका की है कि गीता के दूसरे अध्याय में 11 से 13 तथा 16 से 30 तक के श्लोकों में जहां देह और देही  की चर्चा्र है, वहाँ बीच में यह श्लोक कैसे आगया है।देह और देही के बीच  का संबंध ही मात्रा स्पर्श है।

... इन वेगों को किस प्रकार सहन किया जाए कि यह संस्कार रूप में राग-द्वेष में परिणित न हो,... मात्र वर्तमान में रहने से ही यह सध सकता है,... यह अनासक्ति या निर्विचारता मात्र चिन्तन के धरातल पर नहीं है। यह विचारणा का विषय नहीं है। ... वर्तमान में रहने का यहां तात्पर्य है कि कर्म के साथ पूरी संलग्नता हो; मन लेश मात्र भी विपरीत नहीं जाने देना चाहिए, मन विपरीत जाता है, चिन्तन करने से। हम देखते हैं, पर इन्द्रियां जहां वस्तु को देख रही है, वहां भी हम सोचते रहते हैं। हम सुनते हैं वहां भी सोचते रहते हैं। इन्द्रियां और मन की एकता नहीं रहती। मन, एक साथ दो काम कर सकता है। हम खाना खाते हुए गाना भी सुन सकते हैं।

... मन को एक ही जगह पर ले आना, एकाग्रता कहा जाता है। पर तितिक्षा उन क्रियाओं, अवस्थाओं में निर्विकारता का पाना है। यहां इन्द्रियां, मन, बुद्धि एकीकृकृत हो जाती है। तब क्रिया के साथ अंतर्मन लग पाता है। जो स्वाभाविक अवस्था कहलाती है। यह निर्विकार भाव ही वर्तमान में रहना है। यहां क्रिया तो हो रही है परन्तु उसके साथ चिन्तन नहीं चल रहा है। वह पहले हो सकता है,... बाद में क्रिया की पूर्णता पर हो सकता है, परन्तु क्रिया के साथ मन का भटकाव नहीं होता है।
...
 जब विचार होता है,... तब विचार ही होता है।अन्यथा मन तो रहेगा पर संबंध टूटा रहेगा।
यही वर्तमान में रहने की पहली सीढ़ी है।

भगवान ने गीता के प्रारंभ में ही साधन सूत्र दिया है। कार्पण्प्य दोष, मूढ़ता, हृदय दौर्बल्यम,... आदि जो भी आज के मनुष्य की दुर्बलता है, उसके दुख का कारण है, उसका समाधान इस सूत्र में है,यह मात्र एक चिन्तन प्रधान अवधारणा ही नहीं है। यही वास्तविक साधन सूत्र है।

पूज्य स्वामीजी की साधना प्रणाली का यही आधार रहा है।

इन दोनों प्रवाहों का प्रभाव कैसे कम किया जाए, यही मूल समस्या है। भीतर की हलचल भी अशांत कर जाती है, बाहर का धक्का भी जोरों से लगता है। अंतःकरण निरंतर विकारी बना रहता है। राग-द्वेष का संग्रह ही संस्कार है। वर्तमान में रहने की कला का अभ्यास निरंतर ‘सजगता’ में है, अवेयरनेस, वह भी ‘कॉन्सटेन्ट’,... निरंतर जैसे, नल से पानी की धार गिरती है। एक क्षण भी रूक गयी तो वह बूंद बन जाती है। यही वास्तविक ध्यान है। ध्यान सजगता है। यही क्रिया योग है। यहां मात्र चिन्तन परक कोई अवधारणा नहीं है। भीतर का स्पंदन उठा,... मात्र लहरें है, लहरों को शब्द तक आने से पूर्व, विचार की शक्ल में आना होता है, वहां सजगता रही, आने वाला विचार रुक जाएगा, उसके पीछे आने वाला कुछ दूरी पर ठहर जाएगा।

... वहां निरंतर ध्यान रहे, सजगता बनी रहे,... एक खालीपन,  निविचारता आने लगती है। यही पानी का बर्फ हो जाना होता है। बाहर घटना घटी, तुरंत प्रतिक्रिया होती है। टेलीविजन से आ रहे चैनल्स ने मस्तिष्क को कचरा पात्र बना दिया है। संवेग ही संवेग हैं, संग्रह कम होने के स्थान पर जमा होता जाता है। इसे कैसे कम किया जाए। यह कोई घंटेभर  आंख मींचकर एकाग्रता से कम होने वाला नहीं है। यह सध जाए, संबंध तो रहेगा, पर संग्रह जमा नहीं होगा, यह संभव हो जाता है-तितिक्षा से, इस वेग को सहन किया जाए। यहां सहन करना, अप्रभावित होने की क्षमता है। पता है,  यह अनित्य है, निरन्तर परिवर्तनशील है, मार्ग में मिल गया,  पथिक है, चाहे अनुकूल हो या प्रतिकूल, इसके प्रभाव को भीतर नहीं जाने देना है। यह भीतर जाता है, चिन्तन से, उस पर बार-बार सोचने से मात्र क्रिया हो, मन पूरी तरह क्रिया के साथ हो, पर प्रतिक्रिया नहीं हो। विचारणा का दबाव नहीं हो, उसी अवस्था में क्रिया, क्रिया- योग हो जाती है। यहां जीवन और जगत से पलायन नहीं है। इन्द्रियों द्वारा विषयों का संपर्क रोका जाना संभव नहीं है, यह तो स्वाभाविक है। पर उसके द्वारा निरंतर उत्पन्न इस राग-द्वेष के संग्रह को रोका जा सकता है। वह मात्र वर्तमान में रहने से ही संभव है, और इसका साधन है, निरंतर सजगता; कॉन्सटेन्ट अवेयरनेस द्धबनी रहे। तब हम साधन सूत्र को समझ सकते हैं, क्रिया में ला सकते हैं।

भगवान ने दूसरे अध्याय में,... देह और देही के इन ग्यारह से तीस तक श्लोकों के बीच में इस साधन सूत्र को इसीलिए पिरोया है, ताकि आगे जाकर इससे प्राप्त स्थिति, ‘स्थितिप्रज्ञता’ पर वे कह पाएं, ‘स्थितिप्रज्ञता’, साध्य है, वर्तमान में रहना, साधन सामग्री है, जो असाम्प्रदायिक, अजातीय, सार्वभौमिक, सार्वकालिक है। हजारों वर्ष बाद भी यह सूत्र आज की दुनिया के लिए भी उतना ही प्रभावी है, जितना ‘अर्जुन’ के लिए था, जिसने भगवान कृष्ण की शरण में आकर, ‘कार्पण्प्य दोष’ से मुक्ति का उपाय चाहा था।

और महत्वपूर्ण बात यह वैराग्य का पथ नहीं है, यह इसी जीवन में प्रयत्न और पुरुषार्थ की गहरी समझ  है  जो जीवन में विवेक के आदर से प्राप्त होती है, और हम उसे पाने के लिए अधिकारी हैं।

Monday, October 28, 2013

shree Guru geeta1


Jh xq# xhrk

vkt ls ge bl CykWx ds tfj, iwT; Lokehth }kjk fn, x, xhrk ds izopuks ] vkilh ckrphr ds vk/kkj ij muds }kjk fn, x, xhrk ij vk/;kfRed ladsrksa dks izLrqr dj jgs gSaA ;g foospuk Li’V :Ik ls fdlh laiznk; fo”ks’k ds fy, ugha gSA iwT; Lokehth vk/kqfud dky ds os lar Fks] tks lc izdkj dh lhekvksa ls eqDr lgt vk/;kfRed Kku lHkh fd fy, vkthou ful`r djrs jgsA


             
Jh xq# xhrk

/keZ{ks=s dq#{ks=s leosrk ;q;qRlo%A
ekedk% ik.MokÜpSo  fdedqoZr lat;A 1A

ekedk ik.Mok ÜpSo

esjs vkSj ik.Mq ds iq=ksa us D;k fd;k] --- xhrk dk izkjaHk /k`rjk"Vª ds bl iz'u ls gksrk gS] --- esjs vkSj ik.Mq ds] --- tcfd ik.Moksa ds eu esa ;g foHkktu  gh ugha Fkk] os /k`rjk"Vª dks gh viuk iwoZt ekudj] vkKk ekurs jgs FksAij ;g  }s"k& /k`rjk"Vª ds eu esa Fkk ;gh foHkktu gh lagkj dk eq[; dkj.k  cukA

ekedk%] 'kCn egRiiw.kZ gS] gekjs thou dk izkjEHk ;gha ls gh 'kq# gksrk gSA ;g esjk gS] blls cM+k vkSj dVq lR; thou dk nwljk ugha gS fd thou ds var esa cq<+kis esa ge viuh gh larku ls lcls vf/kd nq[k ikrs gSaA ;gh 'kCn vkSj blls tqM+h Hkkouk gh thou dh ;k=k dks ifjpkfyr djrh gSA
--- ;gh vizse] dyg rFkk Lo;a ds O;fDrRo foHkktu dk dkj.k curk gSA

;|I;srs u i';fUr yksHkksigr psrl% A
dqy{k;d`ra nks"ka fe=nksgs p ikrde~AA38A

yksHkksigr psrl%
yksHk ds dkj.k ftudk foosd&fopkj yqIr gks x;k gS] ,sls ;s nq;ksZ/ku vkfn]  dqy dk uk'k djus okys nks"k dks vkSj fe=ksa ds lkFk }s"k djus ls gksus okys iki dks ugha ns[krs&

--- tks fey x;k og de gS] --- vkSj vkSj fey tk, bldk gh uke yksHk gS] --- bl yksHk ls gh foosd 'kfDr yqIr gks tkrh gSA ns[kk tk, rks gj thou dh n'kk vkSj fn'kk dks ;gh fodkj fu/kkZfjr djrk gSA
--- euq"; la;ksx dk ftruk lq[k ysrk gS] fo;ksx dk Hkh mruk gh nq[k mls Hkksxuk iM+rk gSA

igys oLrqvksa dk vHkko tks gksrk gS] og bruk nq[knk;h ugha gksrk ftruk oLrqvksa dk la;ksx gksdj] fo;ksx gksrk gS]  --- oLrqvksa dk la;ksx Hkh izkjC/kkuqlkj gksrk gS] LFkkbZ ugha gS] fo;ksx rks gksuk gh gS] ijUrq yksHk mls lkrO; iznku djrk gSA tks chp esa oLrqvksa ls lq[k izrhr gksrk gS] og yksHk ds dkj.k ls gh gSA ^eksg* Hkh cU/ku t:j gSA eksg ds dkj.k gh lacaf/k;ksa ls lq[k izrhr gksrk gSA

igys lpeqp vHkko Fkk] ij mldh O;Fkk ugha FkhA ij vkus ds ckn ] mlls izkIr lq[k feyk] og fVdk Hkh ] ;gh yxk] ;g Hkko cuk jgsxkA ij vc tks vHkko vk;k] og Hkhrj rd rksM+ x;kA
--- oSj] --- oSjHkko vR;ar gh nq[knk;h gSA Hkksxdj rks nq[k ls ikj gqvk tkrk gS ij oSj dh vfXu rks tUe&tUekUrj rd lkFk tkrh gSA
--- euq"; dh n`f"V tc rd nwljksa ds nks"k n'kZu esa jgrh gS] rc rd mls viuk nks"k fn[kkbZ gh ugha iM+rk gS] --- nwljksa dk nks"k ns[kuk Hkh] --- cM+k nks"k gksrk gS] blls vius Hkhrj ^vgadkj* iSnk gksrk gSA
fe=nzksgs p ikrde~
iki&iq.;
nku&lsok vkSj cgqewY; 'kCnksa ij ppkZ gks jgh FkhA
Lokeh th us dgk& Le`fr iki gS] iz'u ;gka iSnk gks x;k FkkA og iki D;ksa gS\
& nks gh ckrsa gksaxh] ;k rks rqe vius esa jguk pkgksxs] --- ;k ckgj HkVdrs jgksxsA rqeus nku fd;k] rqEgkjs Hkhrj vgadkj txk] --- rqeus lsok esa le; fn;k] --- vgadkj txk] --- rqe fQj Hkhrj ls ckgj pys x,A ckgj dh vuar;k=k gS] --- ?kwers jgks] --- ek= ckSf)d ftKklk,a gSa] --- lek/kku ugha gSA ;g tks ckgj HkVdkrk gS] --- ;gh iki gSA Le`fr ,d iy Hkh orZeku esa ugha jgus nsrhA gj {k.k ckgj ys tkrh gSA bl dy ls ml dy esa nkSM+krh jgrh gSA lkjk nks"k laxzg ;gha jgrk gSA vfHkeku Hkh ;ha Bgjrk gSA tks rqEgkjs ^Lo* ls] rqEgkjs vius ^gksus ls*] rqEgkjs ^vkRe* ls rqEgs nwj ys tk, ogh ^iki* gSA

^iq.; gS] tks rqEgsa rqEgkjh futrk ds ikl yk,] rqEgsa rqEgkjs ^Lo* ds ikl yk,] rqEgsa rqEgkjk ^vkRe* dk vglkl djk,A ogka orZeku gSA ogk ek= ßgksukÞ gSA cl] jguk gSA blhfy, dgk Fkk& Le`fr iki gSA jkx&}s"k dk laxzg ogha jgrk gSA eu dk eqdke ogha gSA ogka og Bgjuk vf/kd pkgrk gSA ,d {k.k Hkh ge viuh Le`fr;ksa ls ckgj ugha vkuk pkgrs gSaA cq<+kik D;k gSA ^Le`fr;ksa ds Vkiw* esa fuokl djuk gSA ^cVqd* dk eryc gksrk gS] tks ek= ßorZekuÞ esa gSA fur uwru] u;k] vcks/k f'k'kq] ftlds fy, dHkh xksj[k us dgk Fkk] ßvk/kh jkr dks ckyd cksYkkÞ  cVqd gks; rks ln~xq# ik;ks]] --- ogh lk/kd dk eu gksuk pkfg,A dksey ]lg`n; euA cw<+k eu rks cl vrhr dk  otu

n`'; dk fpUru gh iki gS
;g lp gS] ygjsa] lkxj vkSj gok ds la;ksx ls curh gSA tkuk Fkk] 'kCn gh czã gSA ^cs[kjh* okd dh igyh voLFkk gS] ogka ekSu jgk tk ldrk gS] yksx dgrs  gSa] ekSu esa gSa] ijUrq LysV ij fy[kdj ckrsa djrs jgrs gSaA  os lEeku pkgrs gSa] crkrs gSa ] ekSu esa gSa] mldh Hkh dher gS] ij Hkhrj daB ds ikl vkdj] ] e/;ek ds njokts ij ]fopkj.kk dk lzksr cgrk jgrk gS] ,d iy Hkh fojke ugha vkrk gSA D;ksafd os lksprs jgrs gSa] lkspuk gh mudh fof'k"Vrk gSA

tkuk] /;ku fdlh fo"k; ;k oLrq ;k :i ij ,dkxzrk ugha gS] ;g rks ek= fufoZ"k; gks tkuk gksrk gSA ij D;k ;g laHko gS\ vuqHko crkrk gS] --- ,d laosx ckgj ls vkrk gS] --- og [khapdj ys tkrk gS] tc ckgj ls ugha vkrk gS] rc Hkhrj dk vukj lqyx mBrk gS] ygjsa gh ygjsa /kDdk ekjrh gSA cgkdj ys tkrh gSaA

dy mUgksaus fdlh iafMr ls iwNk Fkk] ?kj esa 'kksd gS] D;k os /;ku yxk ldrs gSa\ iafMr pkSadk 'kksd esa /;ku! Okg pqi jg x;kA
loky Fkk] D;k /;ku Hkh iwNdj yxk;k tk ldrk gS\
/;ku gh rks thou thus dh dyk gS] D;k ;g fdlh ls lh[kk tk ldrk gS\
;gh rks fpÙk gS] --- ;g ygjksa dk vky; gS] Hkhrj ls ekuks dksbZ /kDdk ns jgk gSA
dgk x;k gS] --- ;gka dk lk/ku] cQZ gks tkuk gS] dksbZ rjax gh ugha mBsA tgka ljksoj gS] ty gS] ogka ok;q vkdj ygjsa mBk nsxhA ijUrq cQZ esa rjaxs ugha vkrhaA
vkSj ckgj ds osx dks lgu djus ds fy,] Hkhrj pêku gks tkuk gS] ygjsa vk,¡] vkSj Vdjk&Vdjkdj ykSV tkoasA
ij tkuk] ;g fl)kUr ds :i esa] fof/k ds :i esa rks lgh gS] ij iz;ksx ds Lrj ij] dfBu gSA
ijUrq ;g rks thus dyk gS] jgus dh dyk gS] xhrk ds 'yksd rks ] ladsr gSa] ;g iyk;u dh O;k[;k ugha gSA
bl m}sxe; lalkj esa viuk Js"Bre ikus dk ekxZ gSA
tgk¡ Hkh 'kksd gksrk gS] iafMr xhrk IkkB ds fy, cqyk, tkrs gSa] tks thou dk laxhr gS] mls ejus ds ckn lquk;k tkuk gekjs ;gk¡ dh nq%[kn dYiuk gSA

   ;g thou dk igyk dne gS] bls fo"kkn &;ksx dgk x;k gSA
vkSj izkjEHk esa gh ßiki dh O;k[;k vkxbZ gS] iki ls cpsa] fe=ksa ds izfr nzksg ls cpsaA
;g nzksg Hkhrj dh iwath gS] tks tek gksrh jgrh gSA lc tkurs gSa] ij nwj dSls gks] ;gh og dYe"k gS] tks /k`rjk"Vª ds dk;ksZa  dks dkj.k lksai nsrk gSA
lar dchj us dgk Fkk]ßy[kr& y[kr yf[k iM+s dVs te Qan gSA bl laxzg dks tkuuk] ij blds lkFk cguk ugha ;g Hkh ,d dyk gS]
gka] tgka Hkh gks]a ogha ij tks fopkj mB jgk gS] ek= ns[kas] voyksdu 'kq) gks] ge cgas ugha] ek= ns[ks]a rks ;g osx de gksus yxrk gSA Hkhrj nks"kn'kZu dk laxzg tks tek gS] og de gksus yx tkrk gSA

;gh og oSj gS] tks fo"kkn dk dkj.k gSA
;g oSj gS] bldh vkx 'kkar ugha gksrh gSA
ek= ns[krs jgks] ns[krs jgks] blds lkFk cgks er] --- ;g BaMh gksus yxrh gSA


Sunday, October 27, 2013

25 अमृत पथ साधना सार

25 अमृत पथ साधना सार


”बचपन में एक ही बात चाही थी, ... जब घर पर अतिथि आए थे तब ग्रीष्मावकाश था, वे लेखक थे, उनकी किताब बंबई में छप रही थी। उन्हें कुछ दिन रूकना था, ... सब लोगों का गांव जाने का कार्यक्रम था, ... मैं ही रूक गया था, ... उन्होंने मुझसे पूछा था, ... मांगों क्या चाहते हो? तब मैंने कहा था- मैं याचक नहीं बनू, जब सन्यास लेने का इरादा मैंने इंजीनियर साहब को बताया था, ... तब उन्होंने भी सवाल किया था, खर्च कैसे चलेगा? मैंने कहा था, ... सन्यास लेकर कार्य करूंगा पर याचक नहीं बनूंगा।“

”हमारा आज स्वरूप क्या हो गया है।
हम याचक बनकर रह गए हैं।
बचपन से मांगना सिखाते हैं, सारी उम्र मांगते रहते हैं।
परमात्मा अनंत हाथों में देता है।
हमारे दो ही हाथ हैं
पर जब वह लेता है, उसके अनंत हाथ है,...
यहां लगभग दो करोड़ लोग होंगे, ... जो पूरी तरह से भगवान की दुकान खोले बैठे हैं, ... सबसे बड़ा व्यापार आज भगवान का ही हो रहा है। हर गांव में दस-पांच आदमी है, जो भगवान की दुकान चलाते हैं। बड़े शहर में सैकड़ों मंदिर-मस्जिद होंगे, ... हजारों का काम यही है, ... जब इन सबसे ही पेट भर जाता है, तब काम करने की क्या जरूरत ह?“.

”हम हजार साल से रास्ता तलाश कर रहे हैं, ... हममें मौलिक परिवर्तन नहीं होता। उपनिषदों की चर्चा करते हैं, कबीर व तुलसी की साखी व दोहे हमारी जबान पर रहते हैं, पर धर्म व उपदेश दूसरों को देते हैं, हमारे आचरण में नहीं हैं। क्योंकि हम धर्म के विक्रेता है, धर्म बेचते हैं, पर हमारा स्वयं उस पर विश्वास ही नहीं है।यदि यह हमको अच्छा लगता, हमें प्रिय होता, तो हमें इसके प्रति आत्मीयता होती, हमारा धर्माचरण होता, हममें परिवर्तन आता?“

”धर्म का यहां फुलटाइम व्यापार है, सुबह से शाम तक की बिक्री है। अब आप ही सोचंे, घर का काम हम कितने मन से करते हैं, ... घर को तो हमने नरक बना रखा है। हमारी मान्यता है यह तो बोझा है, कब उतरे कब हम, आध्यात्मिक लाभ लें।
आध्यात्मिक लाभ के लिए हम सुबह-शाम मंदिर हो आते हैं। ... तीर्थ कर आते हैं। थोड़ा बहुत दान-पुण्य कर देते हैं। महात्माओं के पास जाकर उनके प्रवचन सुन आते हैं। महात्मा भी जानते हैं, कि कुछ होने वाला नहीं है। ये लोग उनकी तड़क- भड़क देखकर आए हैं। भारी प्रचार में खर्चा हुआ है, और उनका काम कथा के माध्यम से उनका मनोरंजन करना है। वे भी कथा-कहानी, संगीत, गायन, वादन से यह कार्य निपुणता से कर रहे हैं। जिन मूल्यों की वे बात कर रहे हैं, वो तो स्वयं उनके पास नहीं है। तंबू भी उनका है, प्रसाद भी उनका है, किताबें उनकी है, कैसट उनके हैं, एकबड़ा व्यापार चल रहा है। फिर आप पूछते हैं कि उनका प्रभाव क्यों नहीं है? गांधी ने अपनी धोती का आधा टुकड़ा फाड़कर औरत को तन ढ़कने को दे दिया था, जो सोचा वह किया, उनका हर कर्म सेवा मय था।“

”कर्म का संबंध सदा दूसरे से होता है।
जो भी क्रिया है, वहां आपका मन निरंतर लगा रहे, ... लेश मात्र भी विपरीत नहीं जाने दिया जाए, ... यही सतर्कता, सजगता में ढल जाती है। ग्रंथ पढ़ना, ... घर में खाना बनाने से श्रेष्ठ नहीं है। दोनों ही कर्म बराबर के हैं।
हां, मन भटकता रहे तो वह कर्म प्रदूषित हो जाता है। यही वास्तविक क्रिया योग है। आपकी रुचि ध्यान में है, ... तो ध्यान में मन को कहीं मत जाने दो, ... दृष्टा बनो। साक्षी भाव जब सघन होता जाएगा, ध्यान सध जाएगा, पर इसके लिए बाहर जाकर उपद्रव करने की, ध्यान सीखने व सिखाने की क्या जरूरत है। यह बहिर्मुखी क्रियाएं हैं, जो मात्र अहंकार दिखाने के लिए होती है।
क्रिया जब योग से जुड़ जाती है, तब सेवा होती है। सेवा से जहां अहंकार कम होता है, वहीं हमारे भीतर ‘सर्व भूतेषु हिते रतः’ की भावना के जगने से प्रेम की स्वाभाविक वृद्धि होने लगती है।
अभी मैंने कहा था, ज्ञान जो है, इसका संबंध अपने आप से है, जो आपने जाना है, वह आपका ज्ञान है, पर ज्ञान को आदर न होने से जाना हुआ विस्मृत होने लग जाता है।
जब जो जाना गया है, वह आचरण में आने लगता है, तो विवेक की स्वाभाविक प्राप्ति होने लगती है। और विवेक का आदर होने से, स्वाभाविक शांति प्राप्त होती है। यहां विवेक विरोधी कर्म अपने आप छूटने लग जाते हैं। कल तक आप जिन कार्यों में रुचि ले रहे थे। अब उनसे स्वाभाविक अरुचि हो जाती है। यहां छोड़ना कुछ भी नहीं है, जिस छूटना है, वह सहज होने लग जाता है। ओर आपको प्राप्त होता है आत्मविश्वास, ... आप की अन्तर्यात्रा प्रारंभ हो जाती है, ... आप अपने आपसे जुड़ने लग जाते हैं, जो आपके भीतर प्रमाद था, अंधकार था, वह स्वतः हटने लग जाता है। यही तो आंतरिक सत्संग हैं, ... यही ध्यान है। निर्विचारता में रहना ही ध्यान है। ... इसके लिए क्या आपको कहीं बाहर भटकने की जरूरत है?

मौलिक परिवर्तन, हम सब चाहतेे हैं।
सबसे पहले दुनिया में, समाज में, परिवार में, और सबसे कम अपने भीतर
अपना आंतरिक विकास हम नहीं चाहते।
कभी अपनी तरफ झांकते नहीं है, ... बुराई दिखती है तो ढ़क्कन लगा देते हैं, परिस्थितियों को दोष देते हैं, अपने आपको न्यायोचित ठहराने का प्रयास करते हैं।
पर पहला परिवर्तन तो स्वयं से ही होगा-
जिससे किसी को हानि पहुंचती है, वह कार्य हम ना करें।
अपना कार्य करें, बेहतर से बेहतर करें,
पर हम दूसरे का कार्य खराब करने का प्रयास नहीं करंे, यही ‘महारास’ की परंपरा है। परमात्मा सभी प्राणियों में सृजन रत है, वहां नृत्य हो रहा है, ... जीवन आनंद रूप है, हम स्वयं डांडिया करे, आनंद मग्न हों पर दूसरे की गति, उसकी लय हमारे कारण से खराब न हो, इसका ध्यान रहे, यही ध्यान है।
ध्यान, आंख मींचकर एकांत में बैठना नहीं है।
यहां ध्यान निरंतर रहने वाली शांत सजगता है।
यह तभी संभव है जब हम बुराई करना छोड़ दें, और अगर समर्थ हैं, समय है, तो दूसरों की भलाई करें। पर बुराई करना छोड़ना तो हमारे बस की बात है।
इससे क्या होगा?
आपका अधिकांश समय तो दूसरों की बुराई तथा अपनी प्रशंसा में चला जाता है।उसमें आपको भी रस आता है, दूसरों को भी। पर कभी आपने विचारा है, जो मनुष्य बुराई करना छोड़ देता है, वह संसार के लिए उपयोगी हो जाता है। और अगर वह संसार की भलाई करने लग जाता है, तो संसार उसे सम्मान देने लग जाता है।
आप अपने चित्त से यह आदत दूर कर लें, बुराई न करना ही परिवार की, संसार की, सबसे बड़ी सेवा है।
पर यही नहीं होता है-

मौलिक परिवर्तन आपसे ही शुरू होगा, आपके परिवार से शुरू होगा, आप इस नियम को सदा ध्यान रखंे कि, की गई बुराई हजार गुना वापिस होकर लौटती है, ... बुराई छोड़ना ही सेवा का मार्ग है, जिससे प्रेम प्राप्त होता है। हमंे समाज को अपनी खुराक नहीं बनाना है, समाज हमारे भोग की सामग्री नहीं है। हम सभी इसी दृष्टिकोण के हो जाएंगे, तब समाज कैसे सुधरेगा, ... आज धार्मिक उपदेशक भी समाज को अपनी खुराक बना रहे हैं। समाज को शब्ददेते हैं। धन लेते हैं, प्रमाद सौंपते हैं। पुरुषार्थ छीनते हैं, क्योंकि कर्म की बात करते ही, प्रश्न खड़ा हो जाता है कि वे स्वयं कर्म क्यों नहीं करते? जब यह माया है,तो वे इस माया से अपनी उदरपूर्ति ही नहीं, रईसों की तरह दैनिक दिनचर्या की मांग क्यों रखते हैं?ैइसका उत्तर उनके पास नहीं है? सच तो यह है, हम सब समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए है, हमें समाज की जरूरत को अपने सामर्थ्य से अधिक से अधिक पूरा करने का प्रयास करना चाहिए। यही वास्तविक सच्चा पथ है, जो हमें आत्मविश्वास सौंपता है, और जहां हमारा रूपांतरण संभव है।

Saturday, October 26, 2013

24 अमृत पथ विश्वास


24  अमृत पथ विश्वास


स्वामीजी कह रहे थेः-

”एक ही सवाल को बार-बार पूछते हो क्यों, ...
जो यात्रा है, उस पर तुम्हारा विश्वास नहीं है। हर बात को हर परिस्थिति को खकोल- खकोलकर देखते हो, चैन नहीं लेने देते, इतना सोचते हो, इतनी कल्पना कर लेते हो कि, ... वो सत्तू वाली कहानी बताई थी। उसने एक घड़ा सत्तू रख लिया, मेहनत से बच गया, लगा सोचने क्या करेगा? इसका, झपकी लग गई। सपने में उसने सत्तू बेचा, भुनाया हुआ, फिर और बनाया, ... उसे बेचा, ... और धन कमाया, ... फिर विवाह कर लिया, ... फिर बच्चा हुआ, .. एक दिन बच्चे से किसी बात पर नाराज हो गया, ... गुस्से में लात चलाई, घड़े के लगी, घड़ा टूट गया, ... यही हालत है, ... इतना क्यों सोचते हों...?

यही मन की दुर्बलता है, ... मन की गति मन की कमजोरी है। ... विश्वास स्वयं के प्रति होना चाहिए, वह आप में नहीं है।
चाहते हो, आत्मविश्वास रहे, ... उसके लिए यह अभ्यास है।

जो आपने माना है, ... उस पर विश्वास सौ टका होना चाहिए। मैंने पहले भी बताया था कि जो लोग कुछ नहीं जानते हैं, कम पढ़े लिखे होते हैं, जो धूनी रमाए बैठे हैं, वो कुछ कह देते हैं, ... वैसा हो जाता है, उनकी मान्यता बढ़ती जाती है, क्यों?

उनका जो भी माना गया है, उस पर विश्वास सौ टका होता है, वो ज्यादा सवाल-जवाब करते ही नहीं हैं। आप जितना सोचोगे, उना ही आपका मन कमजोर होता जाएगा। संकल्प तो उठा नहीं, विकल्प पचास आ जावेंगे। यह जो मन है, जो निरंतर कतर-बतर करता है रहता है, इससे पूछो, ... इसने कहीं लाभ भी दिया है, ... इसके पास सारी दुर्बलताओं का लेखा-जोखा रहता है, ... इसके उठते ही जो विचार आता हे, उसे देखों, ... शांत भाव से देखो। नहीं दिखता है, जिसने विचार उठाया है, ... जो उठा है, उसे देखो, इससे क्या होगा, देखने वाला जो है, वह ताकत ले लेगा। जो दिख रहा है वह धीरे धीरे दर्पण से हटता चला जाएगा। वह आता तो बहाने के लिए है, पर आपको उसके साथ बहना नहीं है। उसका आदर नहीं होते ही, बहना भी कम होने लगेगा।

इसके लिए व्यवहार में भी परिवर्तन लाओ,
इतने साल हो गए हैं, समझाते-समझाते, पर मुझे तो कोई परिवर्तन दिखाई नहीं पड़ता। पुरुषार्थ है, लगन है, बस,...

पर होता क्या है, यहां बैठे हैं, चार लोग आए है, आप बातों में उलझ गए हैं। क्या कहना है, क्या नहीं कहना है, कुछ पता नहीं। अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए  जिसे बता रहे थे, ... उन्हें बताने से क्या फायदा ,जो कुछ समझना चाहते ही नहीं है, उनसे फालतू सिर खपाने से क्या लाभ है? हर व्यक्ति की योग्यता अलग-अलग होती है।यहां लोग अखबार पढ़कर बहस करने आते हैं। उसमें उलझने से अपनी शक्ति ही घटती है। कभी सोचा है, किता अनर्गल बोलते चले जाते हैं।

जो वो कहते हैं, सुन लो, बहस की कोई जरूरत नहीं है।
लोग काम बताते हैं, बिना मतलब के तो कोई नहीं आता है।
उसे सुन लो, हो सकता है, रास्ता बता दो, इशारा कर दो, उसके भाग्य में होगा, प्रकृति की इच्छा होगी, हो जाएगा।

यही तो होना है, हो जाएगा, नहीं होगा, कुछ और हो जाएगा, पर आप अनावश्यक उसमें पूरी ताकत लगा देते हो, क्यों? अपनी प्रशंसा सुनने के लिए क्या फायदा?
...
आपका प्रयास, सुझाव, संकल्प, निश्चित मात्रा है। प्रकृति की इच्छा से और उसके पूर्व संकल्पों पर पुरुषार्थ से उसे फल की प्राप्ति होगी, ... पर  आप उसमें भी अटक जाते हैं, प्रकृति की इच्छा से ही आप  करते हैं, करन भी  चाहिए, हानि-लाभ होगा या नहीं, उस पर छोड़ देना चाहिए।

यही नहीं होता है,
आपको पता है यह कार्य विवेक विरोधी है, फिर भी करते हो, क्यों?
वह कार्य कभी भी नहीं करना चाहिए जिसे कर नहीं सकते, ... नहीं करना चाहिए, ... पर हम करते हैं, रुचि से करते हैं।

जो भी कार्य हमें प्राप्त हुआ है, उसके लिए परिस्थिति को वैसा ही होना था, ... ऐसा क्यों होता है, ... यह एक प्राकृतिक विधान है। हमें हर परिस्थिति में कर्तव्य परायण होना है। भागना नहीं है। परिस्थिति का सदुपयोग करना है, वह मात्र होता है, उस परिस्थिति के अनुसार जो भी कार्य निर्धारित हुआ है उसमें अपने मन को पूरी तरह शांत उत्तेजना रहित लगा देने से।

हम कितना यह कर पाते हैं। सोचो। उस दिन बताया था, ... पहले नगर में एक अस्पताल होता था, तीन-चार डॉक्टर बस! आज डॉक्टर भी सैकड़ों होते हैं, कई-कई अस्पताल खुले हुए हैं। बीमारियां भी नई नई आती जा रही है। पहले इनका नाम भी नहीं सुना था।

क्यों?
कभी विचार किया है।
प्रकृति, जगन्नाथ है, देती है, तो लेने वाले के दो हाथ होते हैं, कितना लेगा।
पर उसके तो हजारों हाथ हैं।  अपने विराट स्वरूप में भगवान ने यही तो बताया है,  वहाँ हजारों हाथों  से छीन लिया जाता है।

मन जब तक चंचल रहेगा, मलिन रहेगा, ... अनावश्यक विचारणा में और  भी विध्वंसात्मक बना रहेगा, जब तक कि जो माना गया है, उस पर दृढ़ विश्वास नहीं होता है।
विश्वास की कमी, मन को चंचल बना देती है।
विश्वास एक बार आने के बाद जाता नहीं है। वह और गहरा होता है। पहले गुरु-शिष्य संबंध जो होते थे, ... उनके बीच में यही संबंध था। जो अटूट था, वैसा आज नहीं है।

आज तो कोई बात मानने वाला ही नहीं है। इस कान से सुनी दूसरे कान से निकाल दी। जो मतलब की बात हुई, ... जिससे आपकी आवश्यकताओं की पूर्ति हुई उन्हें स्वीकार किया, जो नहीं जॅची, यहीं छोड़ दी।
यहां कोई सुनने और समझने नहीं आता, सब मुझे समझाने और बताने तथा अपनी विचारधारा की पुष्टि मुझसे करने आते हैं।

जब विश्वास घना होने लगता है, तब व्यवहार में अपने आप परिवर्तन आने लगता है, उससे जो जाना गया है, उसका आदर होने लगता है।  जब सच, बोलने का स्वभाव बनने लगता है,, पहले बोला कभी नहीं था... पर  अब जब  वह स्वभाव का अंग बनने लग जाता है, भाषा में गलत व गंदा बोलना कम होने लगता है। पहले परिवर्तन भाषा में दिखाई पड़ता हैं,... फिर व्यवहार में  आता है। तब दोष कम होने लगते हैं।“

Friday, October 25, 2013

23 Smriti AmritPath

23  ve`r iFk Le`fr vkSj vo/kkj.kk

ßeSaus igys Hkh dgk Fkk]
;g 'kjhj ,dkRe gS]s ,d bdkbZ gSA ,d bap ukfM+;ka tks jDr ys tkrh gS ogka pksV yx tk, rks iwjs 'kjhj ij izHkko gksrk gS] --- gtkjksa thfor dksf'kdk,a ogka ej tkrh gSa] --- 'kjhj ,d bdkbZ gSA uk[kwu esa pksV yx tk, rks flj esa nnZ gks tkrk gSA mtkZZ tks gS] xksy ?ksjs esa cgrh gSA

lw;Z dk izHkko gj izk.kh] i'kq&i{kh ij iM+rk gSA [ksr esa iMs+ cht mlh dh jks'kuh esa mx vkrs gSaA i'kq] i{kh] --- ;g laiw.kZ okrkoj.k ,d bdkbZ esa xqaFkk gqvk gSA ,d dk izHkko nwljs ij iM+rk gSA thou vkSj txr ls ge dgha ij Hkh vyx ugha gS] u gha vyx gksdj jg ldrs gSaA ;gh i;kZoj.k gSA vkt tks ladV gS] ge viuh vyx bdkbZ ekudj lkspus yxs gSaA
;gh nq[k dk dkj.k gS] --- izÑfr esa dqN Hkh O;FkZ ugha cuk;k gS] --- gekjh le> lhfer gS] cl bruk ghA

Hkxoku Ñ".k us vtqZu dks tks fojkV Lo:i dk n'kZu djk;k Fkk] --- og D;k gS] --- lkjk czãkaM ,d ekyk esa xqaFkk gqvk gS] gekjh ;g ekU;rk gS fd ge vyx gS] fo'ks"k gS] --- ;gh xyr gSA
lalkj vktdk ugha gS] vkt  dk tks bfrgkl gS] tks gesa crk;k tkrk gSA og nks&rhu gtkj lky iqjkuk gSA --- fryd egkjkt us osnksa dh x.kuk dj] mlesas  T;ksfr"k laca/kh lwpuk ds vk/kkj ij]gtkjksa lky iqjkuk mUgsa crk;kAgekjs T;ksfr"k z xzUFk Hkh  u tkus fdrus laoRljksa dh dYiuk djrs gSaa Aa] usfr]]] usfr]] ;g /kjrh u tkus fdruh ckj mtM+h cuh gS] -- dksbZ fglkc ughaA ,slk ugha gS tks vkt gS] igys ugha Fkk] --- vkSj tks ;gka gS ]og dgha ugha gS] --- gekjk Kku lhfer gSa] ge ns[k ugha ikrs gSaA

eu tc vareqZ[kh gksus yxrk gS] --- fujarj orZeku esa jgus ls]--- rc vpkud og efLr"d ds chp f[kldrk gqvk] ;g rks vkKkpdz dgykrk gS] tks nksuksa Hk`dqfV;ksasa ds chp esa gS] ogh vkrk gS] --- ogka tks vuqHko gS] --- og egRoiw.kZ gSA bls ghs rhljh vka[k dgrs gSaA bl txr ds ckgj ns[kus  dh 'kfDr ;gka vkrh gSA fojkV dk vuqHko ;gha gksrk gSA
vuar;k=k esa dgk gS]& tks rhuksa voLFkkvksa esa jgus dk vuqHko djus yxrk gS] --- tkxzr] LoIu] fopkj.kk] esas ;Fkkor jgus yx tkrk gS] --- ;gh lk/ku dk lkj gS] --- djuk dqN Hkh ugha gS] --- ftruk gks lds] orZeku esa jgus dk gS& tc  gesa viuh xyrh irk yx tkrh gS] vkSj bldk rhoz vglkl gksus yxrk gSArHkh ifjoÙkZu dh dkeuk mBrh gSA  rHkh nks"k gesa rax djrk gS]

rc gesa mlds izfr vklfDr ugha j[kuh pkfg,A gksrk D;k gS ge tkus&vutkus esa viuh xyfr;ksa ls I;kj djrs gSaA muds izfr jkx j[krs gSaAdgrs gSa]ß esjh rks ;g vknr gh gks xbZ gS] vc ;g 'kjhj ds lkFk gh tk,xh]Þ --- ;g mudk okD; cu trk gS] fQj nks"k dgka ls nwj gksxk]--- mUgsa crkvks rks vkx ccwyk gks tk,axs vkSj pkgrs gSa] Hk; jfgr thou gks] ---lq[kh thou gks dSls\

nwljs dh xyrh fn[kkbZ nsrs gh ge mls rqjar crkus dks rRij gks tkrs gSaA pkgs iRuh gks] iq= gks] ekuks ;gh gekjk eq[; dke gSA D;k lpeqp ge vius lkFk ogh O;ogkj djrs gSa] tks ge nwljksa dks mudh xyrh djus ij nsrs gSaA ge vius vkidks rks cqf) pkrq;Z ls lgh Bgjkus dk iz;kl djrs gSa] vkSj nwljs ds nks"k ikus ij mUgsa Qkalh rd ij yVdkus dks rS;kj gks dj nsrs gSaA ;gh lcls cM+h Hkwy gSA vius izfr tc foosd ds vkyksd esa Hkwy fn[kkbZ iM+rh gks] rks mls Lohdkj dj NksM+us dk iz;kl djuk pkfg,A

igyk dke rks Lohdkj djus ds lkFk 'kq: gks tkrk gS nwljk mldh Hkhrj vLohÑfr ls] --- og Hkwy gVuh 'kq: gks tkrh gSA ;gh vius lkFk fd;k gqvk U;k; gksrk gSA D;ksafd  U;k; ogh gS] ftlls u rks fgalk gksrh gS u gha dksbZ ikiA vkt dh U;k; ikfydkvksa dks ns[kdj U;k;& vU;k; dh ifjHkk"kk ugha gks ldrh gSA U;k;] izkÑfrd fo/kku gSA lwjt dk izdk'k lcdks cjkcj feyrk gS] lc txg /kwi gksrh gSA o`{k lHkh ds fy, Qy nsrk gSA izÑfr dk iwjk fo/kku U;k; ij vk/kkfjr gSA ogka fdlh izdkj dk jkx&}s"k ugha gksrk gSA

vc vkidks djuk D;k gS]---
vki nwljs ds vkrs gh] mlds cksyus ls igys] mlds ckjs esa rks /kkj.kk cuk j[kh gS mls Åij ys vkrs gSa] --- vkidh Hkk"kk cny tkrh gS] O;ogkj xyr gks tkrk gSA tks gks x;k lks gks x;k] orZeku esa og ftl izdkj izdV gqvk gS] ogh egRoiw.kZ gSA gj ?kVuk] gj oLrq] gj ifjfLFkfr tc Hkh vkrh gS] ekSfyd vkrh gS] Lora= vkrh gS] mldk iqjkus ls vf/kd xBtksM+ ugh gksrk] xyrh ;gh gksrh gS fd ge iwokZxzgksa ds vk/kkj ij fu.kZ; djuss yx tkrs gSasA

nks"kh lkeus vkrk gS] mlds izfr iqu% ogh Hkk"kk] --- D;ksa fd;k] geus rks ,slk ugha fd;k] okn fookn gksus yxrk gSA ijUrq cnys esa mlds lkFk ln~O;ogkj fd;k] --- rks ykHk fdldk gksxk] --- dHkh bl ckr dks lkspk gSA D;k blls vkidk Mjiksdiu lkeus vk,xk] --- ;k vki NksVs gks tk,axsA ln~ O;ogkj] vPNh Hkk"kk rks vkidk ln~xq.k gS] ftls vki nwljs ds Hkhrj ns[kuk pkg jgs gSaA fQj vkids Hkhrj og vk ik, rks csgrj gh gSA
rks ,d ykHk rks vkids ln~O;ogkj] fopkj izfrfØ;k djus ls ;g gksxk fd vkidh Hkk"kk O;ogkj larqfyr gksxkA vki ruko esa ugha gksaxsA

vc lkspks] --- mlus cqjk O;ogkj D;ksa fd;k\]---
vki ls rks mldk ifjp; ugha Fkk]--- dksbZ iqjkuh nq'euh ugha FkhA fQj Hkh mlus xyr dke fd;k] --- pyks iqjkuh yM+kbZ Fkh] --- mlus nksgjkbZ] --- fQj vk;k xyr O;ogkj dj x;kA
bls lkspk]s
dgha uk dgha gels Hkh rks xyrh gqbZ gSA vxj xyrh u gksrh rks og esjs lkFk fdlh izdkj dh cqjkbZ D;ksa djrk]---
esjs }kjk laca/k tksM+us ls gh rks] --- ;g fLFkfr mRiUu gqbZ gSA ;g Hkh fopkj djus ;ksX; gS og D;ksa feyk]--- ;gh ,d izkÑfrd fo/kku gS] --- tks izHkkoh gSA izÑfr ds dksbZ Hkh dk;Z vdkj.k ugha gS] Hkys gh ge vkt mls ugha tkurs gks] --- Hkwy ls ge mlls vk'kk j[k cSBs Fks] --- iRuh gks] iq= gks] --- lHkh fj'rs gesa eqfDr fnykus ds fy, gSaA gekjs ladYi ls gesa izkIr gksrs gSa] --- ;s gekjk gh Hkksxk gqvk] pkgk gqvk Hkksx gS] tks gesa feyk gSA vkSj buds izfr ,d gh laca/k j[kuk gksrk gS og gS drZO; ijk;.krk dk] --- ij ;gh ugha gksrk] -- ge buds fy, fur izfrfnu vk'kk dk lapkj djrs jgrs gSaA ;g laca/k izse ds LFkku ij] lsok ds LFkku ij] drZO; ikyu ds LFkku ij] --- dkeuk dk gks tkrk gSA dkeuk iwfrZ esa ck/kk feyrs gh fo{kksHk iSnk gks tkrk gSA

lp rks ;g gS fd gj izdkj dk laca/k tks izkÑfrd fo/kku ls feyk gS] --- feyrk gS] mlesa laca/kksa esa rVLFkrk j[kuh gSA rVLFkrk iyk;u ugha gS] vuknj ugha gSA ;gka fiz;rk rks gS] ij jkx ugha gSA dksbZ ykHk&yksHk dk lkSnk ugha gSA fdlh ls fdlh izdkj dh vk'kk ugha gS] laca/kksa esa tc dkeuk vk tkrh gS] ykHk&yksHk dk nokc vk tkrk gS] --- ogha fLFkfr;ka fcxM+us yxrh gSA
--- xaHhjrk ls bl rF; ij fopkj djuk pkfg,A
vkius ml fnu iwNk Fkk vk/;kRe dh vafre voLFkk D;k gSA --- eSaus dgk Fkk&^izse*]--- izse dh igpku Lo;a dks gksrh gS] ogka fujarj cuh jgus okyh 'kkafr gksrh gSA ftls vkuan dgk tk ldrk gS] dksbZ ?kV c<+ ugha rFkk lHkh ds izfr fiz;rk] --- dksbZ vk'kk ugha gSA D;k pkfg,] izÑfr izkÑfrd fo/kku ls iwoZ ladYi ds vk/kkj ij ftUgsa iwjk gksuk gS fu;kstu Lor% djrh gSA ijUrq gekjk ml ij fo'okl gh ugha gSA ;gh nSU; vkSj ijkt; dk dkj.k gSA ge gj fdlh ls rks yM+dj thr ugha ldrs] ij viuh xyrh dks igpku dj mls nwj dj ldrs gSaA nwljk tks Hkh gS] og u rks gesa lq[k nsus esa leFkZ gS] u nq[k nsus esa leFkZ gS] ;gh  ugha ekuuk Hkwy gSA

gksrk D;k gS] --- vkius ns[kk gS] vkrs gh ckr 'kq: djus ds fy, lcls igys tks vkrk gS] iz.kke djrk gS] fQj tks ugha gS] ;gka dk ;k mlds ?kj dk] lekt dk] mlh dh cqjkbZ ysdj cSB tkrk gSA firk vkrs gSa] os vius csVksa dk nq[k crkrs gSa] --- csVk vkrk gS] mldks mldk firk gh lcls [kjkc yxrk gS oks nksuksa eq>s gh crkus vkrs gSa] --- eSa ,d vPNk Jksrk gwa]--- os ;gka vkdj viuh ckr dgdj gYdk gks tkrs gSaA --- gksVy esa ns[kk gS] ckgj ftruk lkQ lq/kjk gksrk gS] ihNs mruh gh xanxh jgrh gS] lkjk dwM+k dpjk ihNs Mkydj] gksVy ckgj ls ltk jgrk gSA --- yksx eq>s Hkh ;gh ekurs gSa] --- eq>ls iwNrs gh ugha gS] --- HkbZ! eq>s D;ksa lquk jgs gksA --- eSaus vkidk D;k fcxkM+k gS] --- ij gS] Hkjs gq, vkrs gSa] mUgsa yxrk gS] eq>s lqukus ls mUgsa jkgr feyrh gSA
D;ksa] --- ge nwljksa ds }kjk vius ckjs esa rFkk vU; ds ckjs esa dgh xbZ ckr ij rqjar Hkjkslk dj ysrs gSaA tjk lk Hkh ugha lksprs bldk lp D;k gSA vkSj og gels D;ksa dg jgk gSA
fdlh dh lquh gqbZ] dgh xbZ ckr ij Hkjkslk dj fdlh dks cqjk eku ysuk mfpr ugha gS] --- mlls tks eu esa gS og Hkh nwf"kr gks tkrk gSA
,d ckr vkSj gS] gj ifjfLFkfr vius vki esa uohu gksrh gSA tks u;k ?kVrk gS] rks og tks gks pqdk gS] ?kV pqdk gS] mlds fodkl esa gSA ij og  ?kVuk loZFkk uohu gksrh gS fQj tks ?kV pqdk gS mlds vk/kkj ij mls ges'kk ds fy, cqjk eky ysuk] mldh cqjkbZ dk fparu djuk mfpr ugha gSA

blls D;k gksxk] mldk uke ysrs gh] xqLlk vk tk,xk] HkbZ D;ksa og rks ogka gS ughaA mlus nks lky igys] N% eghus igys dksbZ O;ogkj fd;k tks vkidks xyr yxk] --- vkt og vk;k gS] ;k mldk ftdz vk;k gS] vkt rks O;ogkj xyr gS gh ugha] ij mldk uke vkrs gh Hkhrj ls ?k`.kk ;k Øks/k dk Tokj vkrk gS] vki cg tkrs gSa] vkx ccwyk gks tkrs gSa] D;k ;g mfpr gS\

vc izkÑfrd U;k; ls fopkj djks] tks Hkh ge djrs gSa] ogh rks ykSVdj vkrk gSA ;g eku yks geus dksbZ xyrh dh gksxh] mldk gh og Qy Fkk] --- mlds gj O;ogkj ds ihNs gekjh dksbZ xyrh gks rks irk djks] [kkstks fey tk, rks ladYi yks] xyrh nqckjk ugha gksxh] --- vkt ge Hkyk O;ogkj j[ksaxs rks dy ogh ykSV& ykSVdj vk,xk] cqjkbZ dk izfrdkj cqjkbZ ugha gS] --- gj rjg ls fopkj djks] HkykbZ gh gS] ;gh gekjs fy, mfpr gSA
cqjkbZ dh igpku tc gksrh gS] --- rc foosd dh vfXu ls tks ladYi ?kuk gksrk gS] mlesa mls gVkus dk lkeF;Z vk tkrk gSA ijUrq tc mls Le`fr esa jkx ds vk/kkj ij] U;k;ksfpr Bgjkrs gq, LFkkfir dj fy;k tkrk gS] rc og cqjkbZ ckj ckj izdV gksus yxrh gSA ge jkst dgrs gSa] eq> esa ;g cqjkbZ gS] eSa NksM+uk pkgrk gwa¡ ij NwVrh ugha gSA D;ksa]---
mlds izfr gekjh vkReh;rk Le`fr esa clh jgrh gS] blls mldh ckj ckj iqujko`fÙk gksrh jgrh gSA

vr% tc Hkh gesa viuh xyrh fn[kkbZ iM+s]--- ml ij xaHkhjrk ls fopkj djks]--- vius vkidks ikih Bgjkdj] --- ghu Hkkouk ds xrZ esa tkuss dh dksbZ t:jr ugha gSA Le`fr esa mldk tks izHkko cu tkrk gS] og ygjksa ds /kDds [kkdj Hkhrj laxzg ls Lor% mQku [kkdj Åij Vdjkrk jgsxkA bl {k.k lko/kku jgus dh t:jr gS] gesa cguk ugha gSA ogha ltxrk jgsA mls foosd dk lgkjk ysdj u nqgjkus dk rhoz ladYi djuk pkfg,A
;gka LFkkbZ dqN Hkh ugha gSA tks vkt gS dy ugha jgsxk] lc cnyrk jgrk gS] fQj blesa LFkkf;Ro Hkh dgka rd jgsxkA tgka vkt cM+ss Hkou gS] ogka dy [kaMgj fn[kkbZ iM+rk gS] ;g izÑfr dk fu;e gSA blhfy, dgha Hkh fdlh dky esa] fdlh O;fDr esa ]fdlh oLrq esa] lHkh esa cqjkbZ ugha gksrhA u gh og lnk Hkyk gksrk gSA ;gka izÑfr esa lc ifjorZu'khy gSA gesa ek= tks orZeku esa ifjfLFkfr gS] oLrq gS] ] fopkj feyk gS] mldk lnqi;ksx djuk pkfg,A
blhfy, igys Hkh dbZ ckj dgk gS] fdlh ds ckjs esa fdlh izdkj dk iwokZxzg j[kuk nq"deZ gSA xyr gSA fdlh ds izfr fdlh Hkh izdkj dh vo/kkj.kk j[kuk] xyr gSA

blh rjg vius izfr Hkh U;k; djuk pkfg,A --- viuh tgka vkREk iz'kalk ls cpuk pkfg,] ogha vius Hkhrj nks"k fn[kkbZ iM+us ij] vius dks nks"kh gh ekurs jguk mfpr ugha gSA nks"k dh Lohd`fr]] og nks"k Fkk] --- esjk deZ xyr Fkk] --- ;g LohÑfr ftruh xgjh gksrh tkrh gS] funksZ"krk O;ogkj esa vius vki vkus yxrh gSA dh xbZ Hkwy] Hkfo"; esa ugha gksxh] --- ;g ladYi tc ge vius Hkhrj xgjkbZ ls ysrs gSa] orZeku esa gh ge xyrh ds cks> ls eqDr gks tkrs gSaA

blhfy,] vius Hkhrj ;k nwljksa ds Hkhrj] dHkh Hkh LFkkbZ :i ls nks"kkjksi.k dj iq[rk ugha gksuk nsuk pkfg,A mlls og izokg fujarj cuk jgrk gS vkSj ge nks"k eqDr ugha jg ikrs gSaA vius ckjs esa vkSj nwljksa ds ckjs esa ge tks vo/kkj.kk cuk dj j[krs gSa] mudk dksbZ vkSfpR; ugha gSA u gh mudk Lora= vfLrRo gSA vkSj ftudk dksbZ Lora= vfLrRo gh ugha gS] mls Lohdkj djuk] ekuuk] vknj djuk D;k mfpr gS\ gesa xaHkhjrk ls lkspuk pkfg,A vkids ;gka tks Hkh vkrk gS]mls vkus nsa  ns[ksaxs vkius mlds ckjs esa igys tks /kkj.kk  cuk j[kh gS] og mHkjdj Åij vk tkrh gSA vki vius O;ogkj dks fu/kkZfjr dj ysrs gSaA ;kaf=d cuk nsrs gSaA dHkh iz;ksx djas]--- iwoZ /kkj.kk ds osx dks ogu djas] vius O;ogkj dks larqfyr vkSj LoPN :i esa djs] dksbZ iwokZxzg u jgs] vki viuk gh ugha nwljs dk Hkh O;ogkj cnyus esa leFkZ gksus yxsaxsA ifjokj esa jgus dk ;gh rjhdk gSA --- ij ge bls Hkwy x, gSaA

Thursday, October 24, 2013

22 कर्म


22      कर्म

जीवन का उद्देश्य क्या है? प्रश्न था।
स्वामीजी कह रहे थेः-
आपने ‘साधन यात्रा’ लिखी,... अच्छी है, और भी किताबें लिखीं पर कभी जाना कि आपका ‘साध्य’ क्या है?

साधक को सबसे पहले यह पता होना चाहिए कि उसने जो रूप अपना निर्धारित किया है, उसका दायित्व क्या है? साधु का भेष धारण करते ही उसका उत्तरदायित्व आ जाता है। गलती यही होती है, लोग भेष तो धारण कर लेते हैं, पर उसके अनुकूल उनका व्यवहार नहीं होता है।

सबसे पहले यही जानना चाहिए।
आप साधक हैं, बहुत अच्छी बात है।
साधन क्या है, और उसके प्रति आपका दायित्व क्या है?
महर्षि पतंजलि ने, योग सूत्र में जो  क्रम बनाया है, उसमें ‘यम और नियम’ उस साधक के  लिए जो योगवित होना चाहता है, उसके दायित्व सौंपे हैं।
इसी तरह आपने कहा है- ‘शांत जीवन’ आपका साध्य है। आप जीवन में शांति चाहते हैं, ... पर इस साध्य के प्रति आपका क्या प्रयास है? और क्या उत्तरदायित्व है, यह पता करो।

आपने सुबह प्रार्थना की, फिर पूजा की, ग्रन्थ पढ़े, किसी मंदिर या आश्रम मंे हो आए, ... और दिनचर्या समाप्त हो गई,... क्या यही साधना है?

जो भी बाह्य का साधन है, आपने जो बाहर का सहारा लिया है, वह आपको दासता देगा। बहिर्मुखता सौंपेगा। जो हमसे अलग है, हमसे दूर है, हमारा ही नहीं है, निरंतर परिवर्तनशील है,उसका सहारा सहायक नहीं है। यह देह है या जगत है, दोनों एक दूसरे के प्रतिरूप हैं, दूसरा सहारा जो भी है, वह शांति नहीं देगा। आप कितने भंडारे कर आए, कितने जप-तप कर आएं, शांति प्राप्त नहीं होगी।

जो आपके पास है, जिससे आपका नित्य संबंध जुड़ा रहता है, उसका अनुभव ही वास्तविक खोज है। बुद्ध ने साधक को प्राण साधना सौंपी। हम श्वास से निरंतर जुड़े रहते हैं, जीवन और श्वास एक ही है। श्वास का अनुभव करो, वह उस सत्ता तक पहुंचाएगी, जो चैतन्य है।

चित्त आपने कहा मलिन रहता है, ... उसको अशुद्धि आपने ही सौंपी है। जो आपका ही नहीं है, अपने लिए नहीं है, उसका आप पर प्रभाव बढ़ता जाता है,।. यह जो संसार है, इसके प्रति आपका जो संबंध है, मोह, लोभ और कामना का है। यही बाह्य का प्रभाव है। जो निरंतर पराश्रय सौंपता है।
जब आप नहीं थे, तब भी आपका अस्तित्व था,... आप बालक थे आपका अस्तित्व था, ... विवाह पूर्व भी आप थे, ... पत्नी आई, बच्चे हुए। आपकी देह, ... आज भी आप हैं।

आपके भीतर कौन रहता है?
देह ही तो रहती है, जगत के संबंध रहते हैं।
लेकिन जो निरंतर अपरिवर्तनशील आपके भीतर सब कुछ का भोक्ता भी है, और दृष्टा भी है, वह आपने देखा है?
जब आप बालक थे, तब भी था
और आज भी है,
वही आपका ‘आप’ है, जो निरंतर आपके साथ है।
और उसके पाने के लिए किसी बाह्य उपाय की आवश्यकता नहीं है
वही आपका साध्य है-
वह प्राप्त होता है, आत्मकृपा से, स्वाश्रय से-
जगत यथावत रहेगा,
देह यथावत रहेगी,
न कुछ छोड़ना है न भागना है,
निरंतर वर्तमान में रहने से कर्त्ता निष्काम होता चला जाता है।
उस प्राप्त निर्लिप्तता में ही शांति है, ... वहीं अस्तित्वानुभूति है,
यही तो साध्य है-
तब भेष की चिंता छोड़ो, ... वस्त्र मत बदलो, भीतर जो अशुद्धि तुमने अनुभव की है, उसको बाहर को भगाओ।
... निरंतर वर्तमान में रहने से, मन की मलिनता स्वतः कम होती चली जाती है।

Wednesday, October 23, 2013

amrit path 21 seva

ve`r iFk 21  lsok



lsok 'kjhj ls Hkh gksrh gS] /ku ls Hkh]
ij lcls cM+h lsok] viuh cqjkbZ dk tkuuk gS] --- tkudj mls NksM+ nsuk gS] og lcls cM+h lsok gksrh gSA
cqjkbZ dks Hkhrj er j[kks]---
fn[k xbZ gSS rks gVkvksA vke dh Vksdjh esa ,d vke Hkh lM+k gksxk rks /khjs&/khjs lkjh Vksdjh ds vke [kjkc gks tk,saxsA
oks tks 99 vke gS] feydj Hkh ,d vke dks vPNk ugha dj ldrs] O;fDrRo esa ,d cqjkbZ Hkh vk xbZ gS] vkius Hkhrj tek dj j[kh gS] og vkidh lkjh vPNkb;ksa dks lekIr dj tkosxhA


fQj vki tks Hkh dk;Z djsaxs] og iznwf"kr gh gksxkA
vki lk/kd gSa] --- fopkjsa] --- ,d Hkh cqjkbZ tks vki vius Hkhrj ikrs gSa vkSj vki mls tkurs gSa] vius Hkhrj fNikdj u j[ks] mls rqjar NksM+ ns] --- ladYi bruk xgjk ys tkosa fd og vkidks iqu% vkdf"kZr ugha djsA
viuh tkuh gqbZ vkSj NksM+h xbZ cqjkbZ dh LohÑfr gh /;ku gSA /;ku dk vFkZ gksrk gS vki VkWpZ ysdj va/ksjs esa mrjs gS] tgka Hkh jks'kuh xbZ] ogka dk fgLlk mtkys esa gks tkrk gS] rc Hkhrj dk izdk'k Lo;a izHkkfor gksus yxrk gSA

izdk'k dh fdruh Hkh dYiuk djks] izdk'k ugha txsxkA
og rks rqEgkjs Hkhrj xanxh ls
mlds gVrs gh og Lo;a izdkf'kr gks tkrk gSA
vki dh ekU;rk gksrh gS
;g lc esjk gS]--- vkSj eq>s ;g Hkh pkfg,] og Hkh pkfg,] vki viuh ;ksX;rk dk vf/kdre mi;ksx vkSj& vkSj Hkh pkfg,A bl laxzg esa yxk nsrs gSaA

tks Hkh ;ksX;rk vkidks feyh gS] og rks ijekRek dh nsu gS] pyks ijekRek dks ugha ekuk] izÑfr dh nsu gS] tc rd vki mldk lnqi;ksx ugha djsaxs]--- vkidh leL;kvksa dk gy ugha fudy ik,xkA blhfy, vkidks iz;Ru vius vki ls djuk gSA ;gka nwljksa dks mins'k nsuk] muds fy, O;k[;ku nsuk lkj ugha gSA

bZekunkj vkidks gksuk gSA
U;k;fiz; vkidks gksuk gSA

vki Lo;a pkgrs gSa] lekt ls csbZekuh nwj gks] Hkz"Vkpkj feVs] ij vki Lo;a vius izfr fdrus bZekunkj gS] ;g irk djsa] viuh xyrh gks rks mls lkgliwoZd Lohdkj djsa] vkSj mls nwj djus dk iz;kl djsA

vkidks tks lkeF;Z feyk gS] og lnqi;ksx ds fy, gSA
fdrus vf/kdkjh gS] tks jkT; us mudks lkeF;Z o Lora=rk lkSaih gS] mldk mi;ksx jkT;fgr esa djrs gSa\
os vf/kd ls vf/kd /ku dekus esa] tehu [kjhnus esa] ljdkjh lEifRr o lqfo/kkvksa dk iz;ksx vius fy, djus esa djrs gSa] fQj os pkgrs gSa fd mudk rFkk muds ifjokj dk fodkl gks] dY;k.k gksA
D;k eafnjksa esa tkdj ekFkk Vsdus ls] lar&egkRekvksa dks HkasV nsdj] vk'khokZn ysus ls mudk dY;k.k gks tkosxkA

gksrk ;g gS fd ,d lM+k vke]--Hkjh gq;h Vksdjh dks Hkh [kjkc dj nsrk gSA
;gh dkj.k gS fd Hkys yksx Hkh vc vizklafxd gksrs tk jgs gSaA


ftruk lekt dks ugha] mruk larksa dks viuh cqjkb;ksa ls cpuk gSA tc vki viuh ;ksX;rk dk vf/kd ls vf/kd lnqi;ksx djrs gSa] rc vkids iq#"kkFkZ dh {kerk Hkh c<+rh gSA vkidh dk;Zdq'kyrk vius vki c<+us yx tkrh gS]--- vkyL; gh lcls cM+k O;fDr dk nq'eu gSA
,d fdlku ds nks csVs gSa] ,d rks firk dk uke ysrk gS] mudh rLohj ij ekyk p<+krk gS jgrk gS] nwljk mUgsa ueLdkj dj dke ij pyk tkrk gSA 'kke dks [ksr ls vkrk gS] fQj firk dks iz.kke djrk gS] crkb, firk vius fdl iq= dks I;kj djsxkA
ijekRek dh lPph iwtk rks ije iq#"kkFkZ gSA ijekRek us euq"; nsg dk;Z djus ds fy, lkSaih gS] mldk lnqi;ksx tc vkidh vko';drkvksa dh iwfrZ gks tk, rc lkeF;Z dk lnqi;ksx lsok gSA

ijUrq vki ckgj dk rks D;k vius Hkhrj ds vuq'kklu dks Hkh ugha ekurs gSaA izkIr Lok/khurk dk nq#i;ksx lcls cM+h xyrh gS] ogh iki gSA bldh ltk lcdks feyrh gSA Lok/khurk vkidks lnqi;ksx ds fy, feyh gSA ij vki vius dks LoPNUnrk esa ys tkrs gSaA vkt lekt esa ;gh gks jgk gSA

vki] vius vkidks ns[ksa&] D;k vki ifjfLFkfr ds vkfJr rks ugha gS] vki  vius in ls gVrs gh fdrus O;kdqy gks x,] ;gka Hkkxs pys vk,] D;kas]\ ifjokj dh leL;k,a¡ gSa] os viuk lek/kku lkFk ykrh gSA ij muds fy, vki vf/kd ijs'kku ugha gS] vkidk vgadkj VwVrk gS] lqfo/kk,a de gks tkrh gS] vki muls ijs'kku gSaA

lp rks ;g gS fd tc vki viuh vko';drkvksa dh iwfrZ ds fy, lalkj ds vkfJr gks tkrs gSa] ifjfLFkfr;ksa ds vkfJr gks tkrs gSa] rc vki ijkJ; esa MwV tkrs gSaA ijk/khurk esa ys'k ek= Hkh lq[k ugha gSA
Hkkstu cukus okyk ugha vk;k] --- ckbZ ugha vkbZ] --- vkt ykbV ugha vkbZ] --- vki cSpsu gSaA ;g lc D;k gS\ vki vius Åij ys'k ek= Hkh fVds gq, ugha gSa\
dgka¡ gS vkidk vkRefo'okl\ vkiesa vkRefo'okl dh vR;f/kd deh gSA fQj dSls fodkl gksxk\
ifjfLFkfr;ka¡ vuqdwy gksa ;k izfrdwy]
oLrq dh izkfIr gksrh gS vFkok ugha
voLFkk fiz; gS vFkok vfiz;
vkidks gj fLFkfr esa mÙkstuk jfgr] 'kkar jgrs gq, vkReor loZHkwrs"kq loZHkwrs"kq fgrsjr% dh Hkkouk ls dk;Z djuk pkfg,A

ifjfLFkfr;ksa ds vkfJr gks tkus ij] gekjs Hkhrj ghurk vk tkrh gS] ge xqyke gks tkrs gSaA D;ksa] ge tjk lk Hkh d"V >syus ds vknh ugha jgs] D;k ,sls le; esa vkidh Lora=rk lqjf{kr jg ldrh gS\

blhfy,] ;g er ns[kks] nwljksa us vkids lkFk D;k fd;k] mUgksaus tks ml le; Js"B Fkk] ogha fd;k gksxk] ij vkius mlesa ls tks Hkh [kjkc Fkk] vfiz; Fkk] mldks lgstdj vius Hkhrj j[k fy;k gS]--- ckj ckj mls ;kn dj] vius vkidks v'kkar dj ysrs gksA ;kn j[kuk gS rks ;g ;kn j[ksa] nwljksa  us gekjs fy, D;k midkj fd;kA] --- ijekRek dHkh Hkh vkids uketi] dhrZu] xzUFkkas ds i<+us ls izlUu ugha gksrs] ftruk mudh l`f"V dh] izk.khtxr dh lsok ls  izlUu gksrs gSaA

ftruk Hkh vki funksZ"k gksrs tkrs gSaA viuh xyfr;ksa dks tkudj mUgs nwj gVkus dk iz;Ru djrs tkrs gSa] mruh gh vkids Hkhrj drZO; ijk;.krk c<+rh tkrh gSA vkSj tks O;fDr drZO; ijk;.k gksrk gS] mldk ifjokj lq[kh o izlUu jgrk gSA D;k ;g vki ugha pkgrs gSa\ Hkxoku f'ko dk ifjokj bldk mnkgj.k gS] Lo;a f'ko] ikoZrh th] x.ks'k th] dkfrZds;  lHkh dh iwtk gksrh gSA nsorkvksa esa bruk lq[kh o izfl) ifjokj vkSj dksbZ nwljk ugha gSA