उदासी
तुम उदास हो
कप्तान नहीं रहे
हम उदास नहीं
खिलाड़ी ही कब रहे,
यह होना ही
होने की संभावना में
मात्र बस खोना है;
सुबह से शाम
शाम से सुबह तक
चक्की के पाटों में पिसा ही रहना है,
हवा बहती है
क्या अहसान करती है,
धूप
सबके आंगन में बराबर ही बरसती है
वर्षा सी नहीं
आधे ही खेत को खाली भी रखती हैै
दृष्य ही है सार
सच भी यही है
पर दर्शक नहीं होे तुम
दृष्टा, समय के संग
भुजाएं तनी रखना
सोने की धड़ी यह नहीं
ढपली अपनी ही यहाॅं बजनी हैै
जो जागा है
जगा है
जगने को सजग है
वही बार-बार गिरकर
जिन्दगी को जीकर रहा हेै
भले ही काला, बदसूरत
घिनोना चींटा रहा हो वह।
Friday, October 2, 2009
कविता,
उदासी
तुम उदास हो
कप्तान नहीं रहे
हम उदास नहीं
खिलाड़ी ही कब रहे,
यह होना ही
होने की संभावना में
मात्र बस खोना है;
सुबह से शाम
शाम से सुबह तक
चक्की के पाटों में पिसा ही रहना है,
हवा बहती है
क्या अहसान करती है,
धूप
सबके आंगन में बराबर ही बरसती है
वर्षा सी नहीं
आधे ही खेत को खाली भी रखती हैै
दृष्य ही है सार
सच भी यही है
पर दर्शक नहीं होे तुम
दृष्टा, समय के संग
भुजाएं तनी रखना
सोने की धड़ी यह नहीं
ढपली अपनी ही यहाॅं बजनी हैै
जो जागा है
जगा है
जगने को सजग है
वही बार-बार गिरकर
जिन्दगी को जीकर रहा हेै
भले ही काला, बदसूरत
घिनोना चींटा रहा हो वह।
तुम उदास हो
कप्तान नहीं रहे
हम उदास नहीं
खिलाड़ी ही कब रहे,
यह होना ही
होने की संभावना में
मात्र बस खोना है;
सुबह से शाम
शाम से सुबह तक
चक्की के पाटों में पिसा ही रहना है,
हवा बहती है
क्या अहसान करती है,
धूप
सबके आंगन में बराबर ही बरसती है
वर्षा सी नहीं
आधे ही खेत को खाली भी रखती हैै
दृष्य ही है सार
सच भी यही है
पर दर्शक नहीं होे तुम
दृष्टा, समय के संग
भुजाएं तनी रखना
सोने की धड़ी यह नहीं
ढपली अपनी ही यहाॅं बजनी हैै
जो जागा है
जगा है
जगने को सजग है
वही बार-बार गिरकर
जिन्दगी को जीकर रहा हेै
भले ही काला, बदसूरत
घिनोना चींटा रहा हो वह।
पूज्य स्वामीजी
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़पूज्य स्वामीजी द्वारा लिखितअनन्त यात्रा“ उपन्यास की तीसरी कड़ी प्रेषित है
सतयुग के अंतिम चरण में किसी समृद्ध देश की राजधानी में राजभवन के बाहर विशाल पथ पर दो नौजवान युवक अपने यौवन में मदमस्त हुए मस्त हाथी की सी चाल से, निरुद्देश्य इतस्त्तः भ्रमण कर रहे थे। समय वही रात्रि का दूसरा पहर रहा होगा। पथ के दोनो तरफ बनी विशाल अट्टालिकाएं चमकदार रंग तथा चित्र विचित्र रोशनी से जगमगा रही थी। प्रत्येक अट्टालिका के निचले भाग में विशाल क्रय विक्रय भण्डार, देश विदेश के सुंदर वस्त्राभूषणों से भरे पड़े थे, जो अपनी आकर्षक साज सज्जा के कारण परिजनों को बरबस अपनी ओर आकृष्ट कर रहे थे। आगन्तुक बड़ी देर तक अवाक् दृष्टि से सबकुछ देखते रहे। उनके व्यवहार से हर कोई व्यक्ति यह जान सकता था कि दोनो युवक इस देश के न होकर किसी अन्य देश के होने चाहिये।
ऐसा ही एक भण्डार जिसमें अनेक प्रकार के खाधान्न बड़े सलीके से सजाये हुए, तरह तरह के शरबत तथा अन्य पेय पदार्थों के चषक बड़े आकर्षक ढंग से सजाये हुये थे। अंदर से बाहर, बड़े ही स्वादिष्ट व्यंजनों की सुगंध पद्यात्रियों को अपनी ओर आकृष्ट कर रही थी। दोनों युवक ठिठक कर खड़े हो गये भूख और प्यास विह्नल मित्र द्वय भण्डार गृह में प्रवेश के विचार से प्रसन्नता की मुख- मुद्रा में थे। एकाएक उनकी मुख मुद्रा उद्विग्नता में बदल गई दोनो एक दूसरे को ताकते रह गये।
कारण स्पष्ट था। दोनो ही द्रव्य विहीन थे। हटो ! हटो। अकस्मात् इस आवाज से पौरजन अपने अपने स्थान पथ के किनारे अवाक् होकर खडे रहे राज भवन के विशालकाय खुले फाटक से चार सुदर्शन एवं सुसज्जित अश्वारोही जो सम्भवतः किसी राज पुरूष के अंगरक्षक से प्रतीत हो रहे थे, तेजी से अपने अश्व दौड़ाते आ रहे थे उनके पीछे पीछे एक सुदर सुसज्जित रथ था जो किसी संभ्रान्त परन्तु रोबदार राजपुरूष को ले जा रहा था, जैसे ही रथ आगे बढ़ा दोनों मित्रों के पास एक युवक जो राज्य कर्मचरी सा प्रतीत होता था, अपने साथी से कह रहा था ”मालूम होता है महा मात्य अमृतराय, रानी चूड़ाला से किसी गम्भीर विषय पर मंत्रणा करने पधारे होंगे।“
”पधारिये महाराज“, भण्डार के बाहर एक पीढ़े पर बैठ हुए सुदर्शन से किन्तु साधारण परिवेशवारी युवक ने खड़े होकर तथा हाथ जोड़कर कहा ”आपके परिवेश से भासित होता है कि आप हमारी इस विनयपुरी में अजनबी है तथा यायावर के रूप में भ्रमण हेतु निकले प्रतीत होते हैं। क्या आप हमारा आतिथ्य स्वीकार करेंगे ? मुझे अत्यन्त प्रसन्नता होगी।“ मित्रद्वय की स्वीकृति समय मुद्रा से प्रसन्न होकर वणिक पुत्र ने भोजन व्यवस्था का आदेश भृत्यों को दिया और पाद प्रक्षालन हेतु दोनों को अन्तरगृह में ले गया।
हस्त प्रक्षालन के पश्चात दोनो युवकों को उच्चासन पर बिठाकर सामने चैकियां रखी गई। फलों के मधुर रसों के चषक, अनेक प्रकार के नमकीन चावल एवं मिष्ठान तरह तरह के फलों के मिश्रित पदार्थ आदि से भरे पूरे थाल देखकर दोनों ही मित्र प्रसन्नतापूर्वक भोजन पर टूट पड़े। बुद्धिमान वणिक पुत्र को समझने में देरी नहीं लगी कि दोनों बड़े भूखे थे तथा भोजन को शीघ्र से शीघ्र उदरस्थ करना चाहते थे।
आधे से अधिक भोजन समाप्त होने पर कुछ शांति का अनुभव हुआ। ऐसा सोच वणिक ने प्रश्न किया ”महाराज“! आप किस देश के वासी हैंे, तथा इस देश में कब पधारे हैं ? यहां पधारने का प्रयोजन भी मालूम हो तो अकिंचन यथाशक्ति सहयोग प्रदान करने के लिए तैयार है। मित्र द्वय और कोई नही अपितु मैं और मेरा मित्र अर्जुनदेव ही था, प्रश्न का उत्तर हम स्वयं नही जानते थे। अतः भोजन से हाथ रोककर एक दूसरे की तरफ देखने लगे।
उत्तर ढूंढने के प्रयास में मेरा मन परमपिता परमात्मा के इस विचित्र खेल के बारे में सोचते हुए सुझाने के लिए प्रार्थना कर ही रहा था कि उस अदृश्य शक्ति ने विचित्र ढंग से हमारी सहायता की।
उत्तर देने के लिए जैसे ही मैंने मुंह खोला बड़े जोर का घंटा नाद करता हुआ एक रथ उस भण्डार गृह के बाहर स्थित हुआ और हम सबका ध्यान उसी ओर आकर्षित हो गया। परिस्थिति का वास्तविक ज्ञान होने के पूर्व ही एक बलवान सैनिक अधिकारी ने हमें भोजन समाप्त कर अपने साथ तुरंत चलने का आदेश दिया। आप समझ सकते हैं हमारी मानसिक दशा क्या हुई होगी ? किसी तरह हस्त मुख प्रक्षालन करके भी वणिक पुत्र के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना भी भूल गये और सैन्याधिकारी के साथ रथ पर आरूढ़ हो गये।
करीबन आधा घंटे की तेज दौड़ के बाद रथ ने राजपथ छोड़कर एक विशाल जंगलनुमा भूभाग में प्रवेश किया। उस स्थान पर सैनिक छोटे छोटे तंबुओं में विश्राम कर रहे थे। कुछ बाहर पहरा दे रहे थे तो कुछ नाच गाना मौज मस्ती में रंगरेलियां मनाते नजर आ रहे थे।
रथ एक विशान भवन के पास रूक गया। दो सैनिक हमारी ओर दौड़ते हुए आये और हमें उस विशाल भवन के अनेक कमरों में से घुमाते हुए एक सुसज्जित कक्ष में लाकर खड़ा कर दिया गया।
कमरे में एक छोटा अधिकारी तथा दो सहायक कर्मचारी थे। हम दोनो को प्रस्तुत किये जाने पर अधिकारी ने हमसे निम्नानुसार संवाद करना प्रारंभ किया -
”कहां से आये हो ?“
”जम्बू द्वीप से“
”राज्य ? राजधानी ?“
”?“
”नाम बताओ ?“
”नीलकंठ, अर्जुनदेव“
”पेशा ?“
”?“
”यहां किस मार्ग से तथा किस प्रयोजन से आये हो ?“
उत्तर-नदारद
”हमारे देश में ओर विशेषकर राजधानी में बिना स्वीकृति के प्रवेश निषिद्ध है। जुर्म की सजा मौत है। कल अमात्य की स्वीकृति तक काल कोठरी में बंद रहोगे।“ और हमें उस राजपुरूष ने बिना हमारी बात सुने एक काल कोठरी में बंद कर दिया। हम थके तो थे ही, ऊपर से भरपेट भोजन भी किया था, अतः बिना इस बात का ध्यान किए कि हमें कैद कर लिया गया है तत्काल गहरी निद्रा में डूब गये।
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सतयुग के अंतिम चरण में किसी समृद्ध देश की राजधानी में राजभवन के बाहर विशाल पथ पर दो नौजवान युवक अपने यौवन में मदमस्त हुए मस्त हाथी की सी चाल से, निरुद्देश्य इतस्त्तः भ्रमण कर रहे थे। समय वही रात्रि का दूसरा पहर रहा होगा। पथ के दोनो तरफ बनी विशाल अट्टालिकाएं चमकदार रंग तथा चित्र विचित्र रोशनी से जगमगा रही थी। प्रत्येक अट्टालिका के निचले भाग में विशाल क्रय विक्रय भण्डार, देश विदेश के सुंदर वस्त्राभूषणों से भरे पड़े थे, जो अपनी आकर्षक साज सज्जा के कारण परिजनों को बरबस अपनी ओर अन्नतआकृष्ट कर रहे थे। आगन्तुक बड़ी देर तक अवाक् दृष्टि से सबकुछ देखते रहे। उनके व्यवहार से हर कोई व्यक्ति यह जान सकता था कि दोनो युवक इस देश के न होकर किसी अन्य देश के होने चाहिये।
ऐसा ही एक भण्डार जिसमें अनेक प्रकार के खाधान्न बड़े सलीके से सजाये हुए, तरह तरह के शरबत तथा अन्य पेय पदार्थों के चषक बड़े आकर्षक ढंग से सजाये हुये थे। अंदर से बाहर, बड़े ही स्वादिष्ट व्यंजनों की सुगंध पद्यात्रियों को अपनी ओर आकृष्ट कर रही थी। दोनों युवक ठिठक कर खड़े हो गये भूख और प्यास विह्नल मित्र द्वय भण्डार गृह में प्रवेश के विचार से प्रसन्नता की मुख- मुद्रा में थे। एकाएक उनकी मुख मुद्रा उद्विग्नता में बदल गई दोनो एक दूसरे को ताकते रह गये।
कारण स्पष्ट था। दोनो ही द्रव्य विहीन थे। हटो ! हटो। अकस्मात् इस आवाज से पौरजन अपने अपने स्थान पथ के किनारे अवाक् होकर खडे रहे राज भवन के विशालकाय खुले फाटक से चार सुदर्शन एवं सुसज्जित अश्वारोही जो सम्भवतः किसी राज पुरूष के अंगरक्षक से प्रतीत हो रहे थे, तेजी से अपने अश्व दौड़ाते आ रहे थे उनके पीछे पीछे एक सुदर सुसज्जित रथ था जो किसी संभ्रान्त परन्तु रोबदार राजपुरूष को ले जा रहा था, जैसे ही रथ आगे बढ़ा दोनों मित्रों के पास एक युवक जो राज्य कर्मचरी सा प्रतीत होता था, अपने साथी से कह रहा था ”मालूम होता है महा मात्य अमृतराय, रानी चूड़ाला से किसी गम्भीर विषय पर मंत्रणा करने पधारे होंगे।“
”पधारिये महाराज“, भण्डार के बाहर एक पीढ़े पर बैठ हुए सुदर्शन से किन्तु साधारण परिवेशवारी युवक ने खड़े होकर तथा हाथ जोड़कर कहा ”आपके परिवेश से भासित होता है कि आप हमारी इस विनयपुरी में अजनबी है तथा यायावर के रूप में भ्रमण हेतु निकले प्रतीत होते हैं। क्या आप हमारा आतिथ्य स्वीकार करेंगे ? मुझे अत्यन्त प्रसन्नता होगी।“ मित्रद्वय की स्वीकृति समय मुद्रा से प्रसन्न होकर वणिक पुत्र ने भोजन व्यवस्था का आदेश भृत्यों को दिया और पाद प्रक्षालन हेतु दोनों को अन्तरगृह में ले गया।
हस्त प्रक्षालन के पश्चात दोनो युवकों को उच्चासन पर बिठाकर सामने चैकियां रखी गई। फलों के मधुर रसों के चषक, अनेक प्रकार के नमकीन चावल एवं मिष्ठान तरह तरह के फलों के मिश्रित पदार्थ आदि से भरे पूरे थाल देखकर दोनों ही मित्र प्रसन्नतापूर्वक भोजन पर टूट पड़े। बुद्धिमान वणिक पुत्र को समझने में देरी नहीं लगी कि दोनों बड़े भूखे थे तथा भोजन को शीघ्र से शीघ्र उदरस्थ करना चाहते थे।
आधे से अधिक भोजन समाप्त होने पर कुछ शांति का अनुभव हुआ। ऐसा सोच वणिक ने प्रश्न किया ”महाराज“! आप किस देश के वासी हैंे, तथा इस देश में कब पधारे हैं ? यहां पधारने का प्रयोजन भी मालूम हो तो अकिंचन यथाशक्ति सहयोग प्रदान करने के लिए तैयार है। मित्र द्वय और कोई नही अपितु मैं और मेरा मित्र अर्जुनदेव ही था, प्रश्न का उत्तर हम स्वयं नही जानते थे। अतः भोजन से हाथ रोककर एक दूसरे की तरफ देखने लगे।
उत्तर ढूंढने के प्रयास में मेरा मन परमपिता परमात्मा के इस विचित्र खेल के बारे में सोचते हुए सुझाने के लिए प्रार्थना कर ही रहा था कि उस अदृश्य शक्ति ने विचित्र ढंग से हमारी सहायता की।
उत्तर देने के लिए जैसे ही मैंने मुंह खोला बड़े जोर का घंटा नाद करता हुआ एक रथ उस भण्डार गृह के बाहर स्थित हुआ और हम सबका ध्यान उसी ओर आकर्षित हो गया। परिस्थिति का वास्तविक ज्ञान होने के पूर्व ही एक बलवान सैनिक अधिकारी ने हमें भोजन समाप्त कर अपने साथ तुरंत चलने का आदेश दिया। आप समझ सकते हैं हमारी मानसिक दशा क्या हुई होगी ? किसी तरह हस्त मुख प्रक्षालन करके भी वणिक पुत्र के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना भी भूल गये और सैन्याधिकारी के साथ रथ पर आरूढ़ हो गये।
करीबन आधा घंटे की तेज दौड़ के बाद रथ ने राजपथ छोड़कर एक विशाल जंगलनुमा भूभाग में प्रवेश किया। उस स्थान पर सैनिक छोटे छोटे तंबुओं में विश्राम कर रहे थे। कुछ बाहर पहरा दे रहे थे तो कुछ नाच गाना मौज मस्ती में रंगरेलियां मनाते नजर आ रहे थे।
रथ एक विशान भवन के पास रूक गया। दो सैनिक हमारी ओर दौड़ते हुए आये और हमें उस विशाल भवन के अनेक कमरों में से घुमाते हुए एक सुसज्जित कक्ष में लाकर खड़ा कर दिया गया।
कमरे में एक छोटा अधिकारी तथा दो सहायक कर्मचारी थे। हम दोनो को प्रस्तुत किये जाने पर अधिकारी ने हमसे निम्नानुसार संवाद करना प्रारंभ किया -
”कहां से आये हो ?“
”जम्बू द्वीप से“
”राज्य ? राजधानी ?“
”?“
”नाम बताओ ?“
”नीलकंठ, अर्जुनदेव“
”पेशा ?“
”?“
”यहां किस मार्ग से तथा किस प्रयोजन से आये हो ?“
उत्तर-नदारद
”हमारे देश में ओर विशेषकर राजधानी में बिना स्वीकृति के प्रवेश निषिद्ध है। जुर्म की सजा मौत है। कल अमात्य की स्वीकृति तक काल कोठरी में बंद रहोगे।“ और हमें उस राजपुरूष ने बिना हमारी बात सुने एक काल कोठरी में बंद कर दिया। हम थके तो थे ही, ऊपर से भरपेट भोजन भी किया था, अतः बिना इस बात का ध्यान किए कि हमें कैद कर लिया गया है तत्काल गहरी निद्रा में डूब गये।
Wednesday, September 30, 2009
1
बीसंवी सदी के प्रारंभ में अंग्रेजी सल्तनत का सूर्य अस्त नही हो रहा था, बल्कि उसके मध्यान्ह की प्रखरता के कारण विश्व की अधिक से अधिक जनसंख्या त्रस्त एवं क्षुब्ध थी। इसी बीच एक संभ्रान्त तथा अंगेज परस्त परिवार में मेरा जन्म हुआ। इस जमाने में ईसाई स्कूलों में अंगे्रजी माध्यम से पढ़ाई करना जहां बड़े भाग्यवानों के लिए सुरक्षित माना जाता था, वहां समाज में भी ऐसे बालक के प्रति बड़ा सम्मान प्रदर्शित किया जाता था। पितृविहिन तथा माता से अलग किया पाकर निकटतम रिश्तेदारों ने मुझे अपनाया और एक ख्याति प्राप्त स्कूल में भर्ती करके उस जमाने की अच्छी से अच्छी शिक्षा के साथ उच्च सामाजिक स्तर तथा प्रतिष्ठा का जीवन जीने के लिए श्रेष्ठतम साधनो का प्रबंध मेरे लिए किया।
परिणाम होना था वही हुआ। ईसा मसीह के लुभावने उपदेश, बाईबल की रोचक तथा मन की गहरी पकड़ करने वाली कथाएं पढ़ भाव विभोर होकर धीरे धीरे मन वचन और कर्म से ईसाइयत मेरे रोम रोम में व्याप्त हो गई। परन्तु मेरे पैनी दृष्टि वाले अभिभावकों से मेरी मानसिक स्थिति ओझल न हो सकी तथा ईसाइयत का प्रभाव कम करने के लिए समानांतर वैदिक शिक्षा एवं सनातन संस्कारों को पुनस्र्थापित करने का पूरा प्रयास किया गया। परन्तु मैं परस्पर विरोधी संस्कार एवं विचारधाराओं के पाटों में पिसता हुआ भी ऐसी विचित्र दशा को पहुंच गया जहां मेरा वास्तविक स्वरूप एक तीसरे ही रूप में प्रकट होने लगा। एक तरफ जहां मन अत्यन्त शुद्ध निर्मल व पवित्र हुआ वहीं बा्रह्म व्यवहार, मेरे अभिभावकों को नास्तिक संस्कारहीन तथा परिवार, समाज, धर्म एवं देश के प्रति असम्मानजनक भासित होने लगे।
मेरी अपनी स्थिति से मैं कभी संतुष्ट नही हुआ। इस संसार को समझने तथा देश के अनेक दारूण दुखों से ग्रसित मेरे देशवासियों के कष्टों का निवारण किस प्रकार हो, इसका उपाय किसी चमत्कारिक शक्ति से अभिप्रेरित होकर करने लगा।
अनेक धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन, नाम, जप, मंत्र जप तथा यौगिक क्रियाएं प्रकाश के स्थान पर भयानक अंधकार को और दौड़ने लगी। सभी प्रयास धीरे धीरे समाप्त प्रायः हुए। मन निराशा के गर्त में डूब गया और.............और................तब।
एक दिन एक विचित्र घटना घटी। हमारे पड़ौस में रहने वाली छः वर्षीय कमला बड़े जोर जोर से अपने पूर्व जन्म की घटनाएं कहने लगी। दस बीस कोस किसी देहात में उसका वृद्ध पति आज भी मौजूद था। चार लड़के दो लड़कियां तथा पोते पोतियों से भरा पूरा संसार आज भी उसे अपनी ओर आकर्षित कर रहा था। उत्कंठावश अनेक सत्यान्वेषितों ने सही पता तथा अन्य जानकारी कमला से लेकर सच्चाई का पता लगाने की कोशिश की तथा कुछ दिनों बाद कुछ बातें सही किन्तु बहुत कुछ गलत होने के निर्णय दिया। अनेक दिनों की चर्चा के बाद घटना भूतकाल में विलीन हो गई।
पाश्चात्य संसार और शिक्षा के कारण पुनर्जन्म पर मेरा विश्वास नहीं था। मैंने अपनी बुद्धि अनुसार कमला को मानसिक रूप से विकृत बताया इस विषय पर अधिक सोचने की आवश्यकता नहीं समझी व घटना को भूलने का प्रयास करने लगा।
परन्तु न मालूम क्यों, पुनर्जन्म हो सकता है या नहीं यह विचार दिन रात मेरे मन में चक्कर काटने लगा।
मेरे एक मित्र अर्जुनदेव से घंटों इस विषय पर वाद विवाद होता रहा तथा एक ग्रंथ ”योग वशिष्ठ“ की अनेक घटनाएं सुना सुना कर उसने मुझे पुनर्जन्म के सिद्धान्तों पर विश्वास करने के लिए बाध्य करने का प्रयास किया। अचानक एक दिन जबकि मैं मात्र बारह वर्ष का किशोर था, संध्या समय अर्ध मूच्र्छित अवस्था में पहुंच कर मैंने एक विचित्र अनुभव किया।
क्या वह एक स्वप्न था या वास्तविकता इसका आज तक निर्णय नहीं कर पा रहा हँू ? तथापि पाठकों के सम्मुख उस घटना को यथावत रखने का प्रयास कर रहा हँू।
त
बीसंवी सदी के प्रारंभ में अंग्रेजी सल्तनत का सूर्य अस्त नही हो रहा था, बल्कि उसके मध्यान्ह की प्रखरता के कारण विश्व की अधिक से अधिक जनसंख्या त्रस्त एवं क्षुब्ध थी। इसी बीच एक संभ्रान्त तथा अंगेज परस्त परिवार में मेरा जन्म हुआ। इस जमाने में ईसाई स्कूलों में अंगे्रजी माध्यम से पढ़ाई करना जहां बड़े भाग्यवानों के लिए सुरक्षित माना जाता था, वहां समाज में भी ऐसे बालक के प्रति बड़ा सम्मान प्रदर्शित किया जाता था। पितृविहिन तथा माता से अलग किया पाकर निकटतम रिश्तेदारों ने मुझे अपनाया और एक ख्याति प्राप्त स्कूल में भर्ती करके उस जमाने की अच्छी से अच्छी शिक्षा के साथ उच्च सामाजिक स्तर तथा प्रतिष्ठा का जीवन जीने के लिए श्रेष्ठतम साधनो का प्रबंध मेरे लिए किया।
परिणाम होना था वही हुआ। ईसा मसीह के लुभावने उपदेश, बाईबल की रोचक तथा मन की गहरी पकड़ करने वाली कथाएं पढ़ भाव विभोर होकर धीरे धीरे मन वचन और कर्म से ईसाइयत मेरे रोम रोम में व्याप्त हो गई। परन्तु मेरे पैनी दृष्टि वाले अभिभावकों से मेरी मानसिक स्थिति ओझल न हो सकी तथा ईसाइयत का प्रभाव कम करने के लिए समानांतर वैदिक शिक्षा एवं सनातन संस्कारों को पुनस्र्थापित करने का पूरा प्रयास किया गया। परन्तु मैं परस्पर विरोधी संस्कार एवं विचारधाराओं के पाटों में पिसता हुआ भी ऐसी विचित्र दशा को पहुंच गया जहां मेरा वास्तविक स्वरूप एक तीसरे ही रूप में प्रकट होने लगा। एक तरफ जहां मन अत्यन्त शुद्ध निर्मल व पवित्र हुआ वहीं बा्रह्म व्यवहार, मेरे अभिभावकों को नास्तिक संस्कारहीन तथा परिवार, समाज, धर्म एवं देश के प्रति असम्मानजनक भासित होने लगे।
मेरी अपनी स्थिति से मैं कभी संतुष्ट नही हुआ। इस संसार को समझने तथा देश के अनेक दारूण दुखों से ग्रसित मेरे देशवासियों के कष्टों का निवारण किस प्रकार हो, इसका उपाय किसी चमत्कारिक शक्ति से अभिप्रेरित होकर करने लगा।
अनेक धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन, नाम, जप, मंत्र जप तथा यौगिक क्रियाएं प्रकाश के स्थान पर भयानक अंधकार को और दौड़ने लगी। सभी प्रयास धीरे धीरे समाप्त प्रायः हुए। मन निराशा के गर्त में डूब गया और.............और................तब।
एक दिन एक विचित्र घटना घटी। हमारे पड़ौस में रहने वाली छः वर्षीय कमला बड़े जोर जोर से अपने पूर्व जन्म की घटनाएं कहने लगी। दस बीस कोस किसी देहात में उसका वृद्ध पति आज भी मौजूद था। चार लड़के दो लड़कियां तथा पोते पोतियों से भरा पूरा संसार आज भी उसे अपनी ओर आकर्षित कर रहा था। उत्कंठावश अनेक सत्यान्वेषितों ने सही पता तथा अन्य जानकारी कमला से लेकर सच्चाई का पता लगाने की कोशिश की तथा कुछ दिनों बाद कुछ बातें सही किन्तु बहुत कुछ गलत होने के निर्णय दिया। अनेक दिनों की चर्चा के बाद घटना भूतकाल में विलीन हो गई।
पाश्चात्य संसार और शिक्षा के कारण पुनर्जन्म पर मेरा विश्वास नहीं था। मैंने अपनी बुद्धि अनुसार कमला को मानसिक रूप से विकृत बताया इस विषय पर अधिक सोचने की आवश्यकता नहीं समझी व घटना को भूलने का प्रयास करने लगा।
परन्तु न मालूम क्यों, पुनर्जन्म हो सकता है या नहीं यह विचार दिन रात मेरे मन में चक्कर काटने लगा।
मेरे एक मित्र अर्जुनदेव से घंटों इस विषय पर वाद विवाद होता रहा तथा एक ग्रंथ ”योग वशिष्ठ“ की अनेक घटनाएं सुना सुना कर उसने मुझे पुनर्जन्म के सिद्धान्तों पर विश्वास करने के लिए बाध्य करने का प्रयास किया। अचानक एक दिन जबकि मैं मात्र बारह वर्ष का किशोर था, संध्या समय अर्ध मूच्र्छित अवस्था में पहुंच कर मैंने एक विचित्र अनुभव किया।
क्या वह एक स्वप्न था या वास्तविकता इसका आज तक निर्णय नहीं कर पा रहा हँू ? तथापि पाठकों के सम्मुख उस घटना को यथावत रखने का प्रयास कर रहा हँू।
त
पूज्य स्वामीजी
”अनंत यात्रा“
कृति एवं कृतिकार
यह कृति मात्र लघु उपन्यास ही नहीं है, वरन-अद्भुत साधन ग्रन्थ है। यह एक आख्यायिका है। वृतान्त योगवशिष्ठ के रानी चूड़ाला प्रसंग पर आधारित है।योगवशिष्ठ में यह साधारण कथा रानी चूड़ाला के माध्यम से व्यक्त हुई है कि वह किस प्रकार अपने पति राजा शिखिध्वज को जो योग साधना के आकर्षण में घर छोड़कर वन को चले जाते हैं, आत्मोपलब्धि करवाती है। इस कथा सूत्र के माध्यम से पूज्य स्वामीजी ने साधारण जन तक ”साधना रहस्य“ को पहुंचाया है।
यह ”अनंत यात्रा“ है। मनुष्य की सहज आकांक्षा सुख एवं शांति की है। वह अपने जीवन को किस प्रकार, किस उपाय से व्यवस्थित कर जीवन के उद्देश्य को प्राप्त करे, यह उसकी सनातन जिज्ञासा है। धर्म, साधना, योग, तंत्र आदि सदैव से मनुष्य की जिज्ञासा को उत्प्रेरित करते रहे है। यह कृति इन्हीं चिरंतन प्रश्नों का मात्र उत्तर ही नहीं देती है, वरन जीवन और जगत की सहज व्याख्या भी करती है। कथा नायक एक बालक है। उसका मित्र अर्जुन देव है, जो कि उसका ही प्रतिरूप है। इस आख्यायिका के प्रवेश में, अर्जुनदेव को समझना आवश्यक है। वह सांसारिक मन है, जो तमस का प्रतिरूप है। नीलकंठ साधक मन है, जो अनन्त की यात्रा पर गतिशील है। जीवन के पार क्या है ? अचानक आई बेहोशी में यह बालक अपने आपको एक दीर्घ स्वप्न में अतीत की किसी माया नगरी में पाता है। उसका मित्र अर्जुनदेव भी साथ ही है। वह वहां भी चपल है। नायक स्वप्न गाथा में वह अपने आपको नीलकंठ के रूप में पाता है।
नीलकंठ को कार्य सौंपा जाता है कि वह राजा शिखिध्वज का पता लगाकर आये। राजा शिखिध्वज, योग साधना के आकर्षण में राज्य, घर, परिवार छोड़कर अरण्य मे चले गये हैं नीलकंठ कई यात्राओं के बाद, जहां वह साधना के रहस्यों को समझता है, वहीं राजा शिखिध्वज से मिलता है। वह पाता है कि राजा शिखिध्वज जिस साधना पथ पर अग्रसित हुए हैं, वहां उन्हें मात्र निराशा ही प्राप्त हुई है। रानी चूड़ाला, नीलकंठ के साथ राजा शिखिध्वज से मिलने निकलती है तथा उन्हें वह सहज साधना सौंपती है। जिससे राजा शिखिध्वज आत्मोपलब्धि पाकर पुनः गृहस्थ जीवन में प्रवेश करते हैं। एक सन्यासी के द्वारा ”गृहस्थ जीवन“ का अभिनन्दन तथा ”स्त्री गरिमा“ का रेखांकन अपने आप में अद्भुत परिकल्पना है।
स्वामीजी संन्यासी हैं। दंडी सन्यासी। पूर्व नाम भालचन्द्र। लगभग चालीस वर्ष से राजस्थान के इस सुदूर अंचल में झालावाड़ जिले की बकानी उप तहसील के ग्राम मोलक्या में रह रहे हैं। पहले गुरूकुल चलाया था। अब वह भी राज्य सरकार को सौंपकर सहज वटवृक्ष की तरह हर पथिक को शांत छाया प्रदान कर रहे है। कभी महाराष्ट्र से आये थे। अहिन्दी भाषी। पर अब लगता है, यहां के ग्रामीण समुदाय से जैसे अभिन्न हो गये है। अठहत्तर वर्षीय स्वामीजी ने इस आयु में यह कृति क्यों लिखी है। इस प्रश्न का उत्तर ही यह कृति है।
आखिर वेदांत साधना क्या चीज ? क्या उसके लिए अरण्य चिंतन ही मार्ग है। जीवन भर धर्म व आध्यात्म के गूढ़ प्रश्नों से हुआ साक्षात्कार ही इस कृति का केन्द्र है। स्वामीजी प्रयोग धर्मी है। उनकी प्रयोगशीलता, कठोर अनुशासन से होकर गुजरी है। जो आरोपित नहीं होकर सहज है। रानी चूड़ाला निर्देशित करती है- सतत् अभ्यास, तीव्र लगन और स्वयं कृपा ही, साधक को साध्य से अभिन्न करने में समर्थ है। साधना जब तक ”पर“ पर केन्द्रित है, बाहर ही भटकाती है। यह ”पर“ गुरू भी है। ”ईश्वर“ भी है। वेदान्त की साधना निज का उद्घाटन है। वह बाहर नही भीतर है। तब उसके लिए ”पर“ कृपा नहीं स्वयं कृपा आवश्यक है। निजता की खोज ही विराट से जोड़ती है। ”विराट“ शब्द स्वामीजी की मौलिक उद्भावना है। ”रानी चूड़ाला“ के माध्यम से स्वामीजी यहां ”ब्रह्म“ के समानार्थी इस विराट की उद्भावना को रेखांकित करते हैं। वहीं वे ”अन्तर्मन“ के रूप में एक नई प्रस्तुति दे रहे हैं। नीलकंठ और अर्जुनदेव एक दूसरे के प्रतिरूप है। नदी के दो तल है। ऊपर और नीचे, जल दोनों तरफ है। चेतना का ऊपरी अस्तर अर्जुनदेव है, निचला नीलकंठ है। यह अन्तर्मन सदैव विराट से संयुक्त रहता है। संस्कार शब्द यहां एक नई व्याख्या के साथ आया है, जो कि अत्यंत गत्यात्मक उपकरण है। यह अन्तर्मन के समीप है। यही ”वैयक्तिक विभिन्नताओं का कारण है।“ जो विराट है, वह सर्वत्र सब जगह व्याप्त है तथा अन्तर्मन उससे सदैव संयुक्त रहता है। फिर साधना क्या है ? स्वामीजी कहते हैं, हम अलग है ही कहां, पर उसका अहसास नही है। यह ज्ञान होना ही आत्म ज्ञान है।
इस आख्यायिका के माध्यम से आघ्यात्म के गूढ़ प्रश्नों को सरल व सहज भाषा में स्वामीजी ने मात्र व्यक्त नही किया है, वरन् सत्य का जो ‘कुंभ’ शास्त्रों की दुरूह शब्दावली से ढका हुआ था, उसके आवरण को हटा दिया है। कर्म और ज्ञान पर आधारित साधना ही वेदांत की धरोहर है। शरीर कर्म से संयुक्त रहे और चेतना अज्ञान के कल्मष से मुक्त हो यही अनन्त यात्रा है। यहां जीवन और जगत से पलायन नहीं है, वरन् सीधा साक्षात्कार है। जिसके लिए प्रत्येक मनुष्य स्वतंत्र है। ”वेदान्त दर्शन“ का यही अनुपम संदेश है। ”शिप्रं भवति धर्मात्मा“ यही पूज्य स्वामीजी की मंगल वाणी है।
स्वामीजी की मातृभाषा मराठी है। यह उनकी हिन्दी में पहली कृति है। अठहत्तर वर्ष की आयु में इस कृति का सृजन चमत्कार ही कहा जा सकता है। भाषा स्वामीजी की ही है। उसमें किसी प्रकार का संशोधन, सम्पादन कर्ता ने नही किया है। उसके मूल स्वरूप को बनाये रखा गया है।
उन सभी के लिए जो साधना पथ पर हैं तथा जो जीवन और जगत के रहस्यों का साक्षात्कार करना चाहते हैं, यह कृति अपने आप में अमृत वाणी है। साधकों का पथ प्रशस्त हो, वे सुख एवं शांति इसी जीवन में प्राप्त करे, यही अनन्त यात्रा की उपलब्धि है।
त
कृति एवं कृतिकार
यह कृति मात्र लघु उपन्यास ही नहीं है, वरन-अद्भुत साधन ग्रन्थ है। यह एक आख्यायिका है। वृतान्त योगवशिष्ठ के रानी चूड़ाला प्रसंग पर आधारित है।योगवशिष्ठ में यह साधारण कथा रानी चूड़ाला के माध्यम से व्यक्त हुई है कि वह किस प्रकार अपने पति राजा शिखिध्वज को जो योग साधना के आकर्षण में घर छोड़कर वन को चले जाते हैं, आत्मोपलब्धि करवाती है। इस कथा सूत्र के माध्यम से पूज्य स्वामीजी ने साधारण जन तक ”साधना रहस्य“ को पहुंचाया है।
यह ”अनंत यात्रा“ है। मनुष्य की सहज आकांक्षा सुख एवं शांति की है। वह अपने जीवन को किस प्रकार, किस उपाय से व्यवस्थित कर जीवन के उद्देश्य को प्राप्त करे, यह उसकी सनातन जिज्ञासा है। धर्म, साधना, योग, तंत्र आदि सदैव से मनुष्य की जिज्ञासा को उत्प्रेरित करते रहे है। यह कृति इन्हीं चिरंतन प्रश्नों का मात्र उत्तर ही नहीं देती है, वरन जीवन और जगत की सहज व्याख्या भी करती है। कथा नायक एक बालक है। उसका मित्र अर्जुन देव है, जो कि उसका ही प्रतिरूप है। इस आख्यायिका के प्रवेश में, अर्जुनदेव को समझना आवश्यक है। वह सांसारिक मन है, जो तमस का प्रतिरूप है। नीलकंठ साधक मन है, जो अनन्त की यात्रा पर गतिशील है। जीवन के पार क्या है ? अचानक आई बेहोशी में यह बालक अपने आपको एक दीर्घ स्वप्न में अतीत की किसी माया नगरी में पाता है। उसका मित्र अर्जुनदेव भी साथ ही है। वह वहां भी चपल है। नायक स्वप्न गाथा में वह अपने आपको नीलकंठ के रूप में पाता है।
नीलकंठ को कार्य सौंपा जाता है कि वह राजा शिखिध्वज का पता लगाकर आये। राजा शिखिध्वज, योग साधना के आकर्षण में राज्य, घर, परिवार छोड़कर अरण्य मे चले गये हैं नीलकंठ कई यात्राओं के बाद, जहां वह साधना के रहस्यों को समझता है, वहीं राजा शिखिध्वज से मिलता है। वह पाता है कि राजा शिखिध्वज जिस साधना पथ पर अग्रसित हुए हैं, वहां उन्हें मात्र निराशा ही प्राप्त हुई है। रानी चूड़ाला, नीलकंठ के साथ राजा शिखिध्वज से मिलने निकलती है तथा उन्हें वह सहज साधना सौंपती है। जिससे राजा शिखिध्वज आत्मोपलब्धि पाकर पुनः गृहस्थ जीवन में प्रवेश करते हैं। एक सन्यासी के द्वारा ”गृहस्थ जीवन“ का अभिनन्दन तथा ”स्त्री गरिमा“ का रेखांकन अपने आप में अद्भुत परिकल्पना है।
स्वामीजी संन्यासी हैं। दंडी सन्यासी। पूर्व नाम भालचन्द्र। लगभग चालीस वर्ष से राजस्थान के इस सुदूर अंचल में झालावाड़ जिले की बकानी उप तहसील के ग्राम मोलक्या में रह रहे हैं। पहले गुरूकुल चलाया था। अब वह भी राज्य सरकार को सौंपकर सहज वटवृक्ष की तरह हर पथिक को शांत छाया प्रदान कर रहे है। कभी महाराष्ट्र से आये थे। अहिन्दी भाषी। पर अब लगता है, यहां के ग्रामीण समुदाय से जैसे अभिन्न हो गये है। अठहत्तर वर्षीय स्वामीजी ने इस आयु में यह कृति क्यों लिखी है। इस प्रश्न का उत्तर ही यह कृति है।
आखिर वेदांत साधना क्या चीज ? क्या उसके लिए अरण्य चिंतन ही मार्ग है। जीवन भर धर्म व आध्यात्म के गूढ़ प्रश्नों से हुआ साक्षात्कार ही इस कृति का केन्द्र है। स्वामीजी प्रयोग धर्मी है। उनकी प्रयोगशीलता, कठोर अनुशासन से होकर गुजरी है। जो आरोपित नहीं होकर सहज है। रानी चूड़ाला निर्देशित करती है- सतत् अभ्यास, तीव्र लगन और स्वयं कृपा ही, साधक को साध्य से अभिन्न करने में समर्थ है। साधना जब तक ”पर“ पर केन्द्रित है, बाहर ही भटकाती है। यह ”पर“ गुरू भी है। ”ईश्वर“ भी है। वेदान्त की साधना निज का उद्घाटन है। वह बाहर नही भीतर है। तब उसके लिए ”पर“ कृपा नहीं स्वयं कृपा आवश्यक है। निजता की खोज ही विराट से जोड़ती है। ”विराट“ शब्द स्वामीजी की मौलिक उद्भावना है। ”रानी चूड़ाला“ के माध्यम से स्वामीजी यहां ”ब्रह्म“ के समानार्थी इस विराट की उद्भावना को रेखांकित करते हैं। वहीं वे ”अन्तर्मन“ के रूप में एक नई प्रस्तुति दे रहे हैं। नीलकंठ और अर्जुनदेव एक दूसरे के प्रतिरूप है। नदी के दो तल है। ऊपर और नीचे, जल दोनों तरफ है। चेतना का ऊपरी अस्तर अर्जुनदेव है, निचला नीलकंठ है। यह अन्तर्मन सदैव विराट से संयुक्त रहता है। संस्कार शब्द यहां एक नई व्याख्या के साथ आया है, जो कि अत्यंत गत्यात्मक उपकरण है। यह अन्तर्मन के समीप है। यही ”वैयक्तिक विभिन्नताओं का कारण है।“ जो विराट है, वह सर्वत्र सब जगह व्याप्त है तथा अन्तर्मन उससे सदैव संयुक्त रहता है। फिर साधना क्या है ? स्वामीजी कहते हैं, हम अलग है ही कहां, पर उसका अहसास नही है। यह ज्ञान होना ही आत्म ज्ञान है।
इस आख्यायिका के माध्यम से आघ्यात्म के गूढ़ प्रश्नों को सरल व सहज भाषा में स्वामीजी ने मात्र व्यक्त नही किया है, वरन् सत्य का जो ‘कुंभ’ शास्त्रों की दुरूह शब्दावली से ढका हुआ था, उसके आवरण को हटा दिया है। कर्म और ज्ञान पर आधारित साधना ही वेदांत की धरोहर है। शरीर कर्म से संयुक्त रहे और चेतना अज्ञान के कल्मष से मुक्त हो यही अनन्त यात्रा है। यहां जीवन और जगत से पलायन नहीं है, वरन् सीधा साक्षात्कार है। जिसके लिए प्रत्येक मनुष्य स्वतंत्र है। ”वेदान्त दर्शन“ का यही अनुपम संदेश है। ”शिप्रं भवति धर्मात्मा“ यही पूज्य स्वामीजी की मंगल वाणी है।
स्वामीजी की मातृभाषा मराठी है। यह उनकी हिन्दी में पहली कृति है। अठहत्तर वर्ष की आयु में इस कृति का सृजन चमत्कार ही कहा जा सकता है। भाषा स्वामीजी की ही है। उसमें किसी प्रकार का संशोधन, सम्पादन कर्ता ने नही किया है। उसके मूल स्वरूप को बनाये रखा गया है।
उन सभी के लिए जो साधना पथ पर हैं तथा जो जीवन और जगत के रहस्यों का साक्षात्कार करना चाहते हैं, यह कृति अपने आप में अमृत वाणी है। साधकों का पथ प्रशस्त हो, वे सुख एवं शांति इसी जीवन में प्राप्त करे, यही अनन्त यात्रा की उपलब्धि है।
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Thursday, July 16, 2009
ेेआज का समय और हम
ेेआज का समय और हम
जो शास्त्र में लिखा है, वही सही है, उसे मानकर यह चलना भूल है। शास्त्र भी मनुष्य ने बनाए हैं, उस समय जैसी बुद्धि थी, ... जैसा चिन्तन था, वह कहा गया है। यह संसार विकासशील है, हमारे समय में जो बालक थे, वे आज के बालकों की तुलना में बहुत पीछे थे, आगे आने वाले बच्चे और भी बुद्धिगत योग्यता में आगे आएंगे।
मनुष्य की बौद्धिक क्षमता पहले से बहुत बढ़ गई है। नए-नए विचार उत्पन्न हुए हैं। विज्ञान के क्षेत्र में नए-नए आविष्कार हुए हैं। टेक्नोलोजी का इतना तेजी से विकास हुआ है कि हमारे विचारों में बहुत बड़ा परिवर्तन हुआ है।
पुराने विचार वर्तमान में लाभप्रद नहीं है। कई प्रकार की विसंगतियां उनसे उत्पन्न होती है।
ग्रन्थ भी मनुष्य ने ही बनाए हैं। भगवान तो लिखने आए नहीं हैं।
भगवान कृष्ण को भगवान माना, भागवत पुराण ही है। पुरानी घटनाओं पर आधारित है। इसमें लोगों ने विशेषताएं, शक्तियां बढ़ा-चढ़ाकर बताई है।
थे, तो वे भी मनुष्य ही।
मानव शरीरधारी कोई भी हो, उसकी सीमा होती है। महान शक्ति उसमें समा नहीं सकती है। सौ वाट के लट्टू में चार हजार वाट की पावर आ जाए तो वह फ्यूज हो जाएगा।
शरीर में शक्ति को सहन करने की एक सीमा है।
शास्त्र आप पढ़ते रहे।
शास्त्र आपको प्रभावित नहीं करेंगे, यदि आपने सही तरीके से मुझे सुना है। इन विचारों पर मनन-चिंतन किया है। तो पुराने शास्त्र आपको प्रभावित नहीं करेंगे। पढ़कर देखें, पढ़ा करें, क्या नई बात आपको पता होती है, चिंतन करें, बुद्धि से परीक्षण करें, उचित लगे अभ्यास में लावे।
जितनी बातें हम सुनते हैं, अधिकतर अतिश्योक्ति होती है। सब मन को उलझाने के प्रयास हैं।
सृष्टि के दो भाग हैं।
एक ब्रह्म है, एक माया है। ब्रह्म शक्ति है। उसकी क्रियाशीलता माया है। माया में पांच महाभूत हैं। पांच महाभूतों से ही सारी सृष्टि और यह शरीर बना है। इसमें पृथ्वी, अग्नि, वायु, पवन और आकाश है। इससे बना हुआ शरीर या हर वस्तु, इस दृष्टि के साथ निरंतर घूम रही है। तो यह माया है। पंचमहाभूत है। इसका स्वभाव स्थिरता नहीं है। निरंतर गतिशीलता और परिवर्तन। वह इतना सूक्ष्म है कि हमको नज़र नहीं आता है। कण-कण में परिवर्तन हो रहा है। निरंतर हो रहा है। इस परिवर्तन के साथ, विकास समझिए, बनना, बिगड़ना, हर वस्तु का समान है। मनुष्य का भी यही स्वभाव है।
बचपन से बुढ़ापे तक गतिशीलता ही है। वृद्धावस्था में विकार होता है, इन्द्रियां थक जाती है। फिर शरीर का टिका रहना मुश्किल है। हमारे यहां सौ वर्ष की आयु अधिकतम मानी गई है। आज कोई कहे किसी की हजार-पांच सौ साल की आयु है, ... वे हिमालय पर रहते हैं, ... मात्र अतिश्योक्ति है। हमें अपनी बुद्धि से निर्णय करना है।
आप भी मेरी बात पर इसीलिए विश्वास मत करना कि आप मेरे प्रतिश्रद्धा रखत हैं। मेरे विचार मेरे लिए हैं।
आप सही तरीके से सोचें-
ळववक उंेजमत जमंबीमे ीवू जव जीपदा दवज ूींज जव जीपदाण्
निर्णय अपनी बुद्धि से लेना है। मनन चिंतन करके सही निर्णय पर पहुंचना है। सुनी-सुनाई बातें, केवल सुनाने के लिए होती है।
पुरानी कहावत है-
।सस जींज हसपजजमते पे दवज हवसकण्
चमकने वाली हर चीज सोना नहीं होती है। करोड़ों में कोई एक संत होता है, ... कोई एक दार्शनिक, ... इसके लिए चित्त का निर्मल होना अत्यधिक आवश्यक है।
संसार एक विचित्र नाटक है। ।इेनतक क्तंउं कहा जाता है। विचित्र है। यहां अनेकों विचित्रताएं होंगी।
यदि हमें कोई भी व्यक्ति यह कहे कि यही सच है, तो जितनी शक्ति से वह कहेगा लोग उसे ही सही मानेंगे।
थोड़े दिन बाद दूसरा विचार आएगा, वह उसको खारिज कर देगा। यही प्रकृति का बड़ा नाटक है।
साधक कहता है, वह साधना करता है। प्रकृति के नियम के अनुसार, साधना आवश्यक ही नहीं है। स्वाभाविकता आनी चाहिए। साधना मात्र प्रयास है, यह स्वाभाविकता के निकट है।
म्ििवतजे ंतम तमुनपतमक जव ादवू जींज दव मििवतज पे तमुनपतमकण्
मििवतजेए (प्रयास) तो करने हैं, यदि नहीं करते हैं तो कर्म की प्रकृति के खिलाफ जाते हैं। कर्म तो करना ही है। पर अंत में जाकर- सच्ची साधना स्वाभाविकता ही है। बालक स्वाभाविक है। वह अपना आचरण बाह्य दबावों से नहीं बदलता है। विचित्रता संसार रूपी नाटक की विशेषता है।एक भी अंग इसका अनावश्यक नहीं है। परन्तु इसमें उलझने के स्थान पर तटस्थ रहो। तटस्थता केवल वर्तमान में रहने से आती है। यदि वर्तमान में नहीं है तो हर विचार हमें धक्का देगा, सोचने पर मजबूर करेगा।
... साधु-संतों की चर्चा व्यर्थ है।
जिन्हें हम साधु समझते हैं, वास्तविक साधु नहीं है।
लाखों करोड़ों में कोई एक साधु होता है।
सब अपने-अपने स्वार्थों से चिपटे लोग हैं, ... यह भी उदरपूर्ति साधन है, इसीलिए बने हुए हैं।
- हमारे यहां बहुत बड़ी परंपरा है।
पुराने ग्रन्थों के चार्वाक को भी ऋषि माना है। उनकी भी परंपरा रही हैं। जब तक जीना है, सुख से जीना है। कर्ज लेकर भी घी को पीना है। सुख से रहना है। एक बार शरीर भस्म हो गया फिर किसने उसे देखा है। यही संसार की विचित्रता है।
जितने दर्शन उतने विचार, ... जितनी संप्रदाय उतनी ही पद्दतियां है। यही संसार की विचित्रता है। सही-गलत के चक्कर में मत पड़ो। संसार लीला क्षेत्र है। प्रकृति का आनंद लो। तटस्थता बनी रहे। स्थितप्रज्ञ रहते हुए सांसारिक कर्म करो, यही सार है। भागकर कहीं जाना नहीं है।
वाचिक मौन, मौन नहीं होता है। परन्तु मानसिक मौन मन का मौन है। मानसिक मौन जब एक सीमा तक पहुंच जाता है, तब उस मन में तरंगे जैसी निकलती है। वो सीधी दूसरे के मन को जाकर उसे वे प्रेरणा देती है। वह भी इसी प्रकार मौन रहकर के, मौन होने से जो वह महान शक्ति है, उसके द्वारा आने वाली तरंगों से दूसरे व्यक्ति को, मन की तरंगों द्वारा प्रभावित कर देता है।
वह संदेश उन तक पहुंचा देता है जिससे उनकी मानसिक स्थिति अपने आप ही एक विशेष स्थिति में पहुंच जाती है, उन्हें अटूट शांति मिलती है। संतोष होता है। उनकी शंकाओं का समाधान हो जाता है।
किसी के भविष्य को जानने का प्रयास मत करो, पता भी लग जावे तो बोलो मत, पूर्वाभास होता है, तो इससे आत्मविश्वास बढ़ता है। परन्तु यह भी बाधक है। पहले एक दो बातें सही होंगी, फिर तीसरी बात गलत हो जाएगी। प्रकृति किसी को भी अपने रहस्य को जानने का अवसर नहीं देती है। कोई भी जान भी लेता है तो उसका मुंह बंद करा देती है, उसे हटा देती है।
‘मैं’ का अर्थ, गीता में भक्ति मार्गियों ने भगवान कृष्ण के लिए किया है। भगवान मानकर उनकी पूजा करो ‘शरणा गति में जाओ’
- ‘मैं का अर्थ, मैं शरीर धारी नहीं हं। यह तो पंच महाभूतों का बना है। स्वभाव है, वह निरंतर परिवर्तनशील है।
व्यवहार और आध्यात्मिकता में परस्पर विरोधी बातें हैं।
मैं का अर्थ, अंतर्मुखी होना पड़ेगा। तभी सामंजस्य का पता लगता है।
याद रखना। जो भी समस्या आपके सामने आएगी। उसका मुकाबला सीना तानकर करना। फिर वह कभी आएगी ही नहीं। यदि पीठ दिखाई तो फिर वह हावी होती जाएगी। कहां तक भागते फिरोगे। भागकर जावेगे भी कहां, मेरे सामने अनेक समस्याएं आई, मैं नहीं भागा। समस्याएं इसीलिए आती है कि हमें अपनी योग्यता का परिचय देने का मौका मिलता है। इससे मुझे जीवन में सफलताएं मिलीं।
निडर होकर मुकाबला करना होगा।
भागकर चले जान चाहो तो कहां जाओगे, हमारे भीतर से अंदर का डर निकल जाना चाहिए। इसीलिए भीतर किसी तरह की आसक्ति नहीं रहे।
आसक्ति नहीं होने से जो भी चीज चाही है, हमारे पास आएगी, जिस क्षण उसे जाना है, चली जाएगी।
आपका इस पर वश नहीं चलेगा।
समुद्र में लकड़ियां लहरें ले आती है, एक जगह इकट्ठी हो जाती है। फिर हवा का झोंका आता है, बिखर जाती है।
वर्तमान में हर चीज मेरी है।
जब संबंध टूटेगा।
टूट जाएगा, बस आसक्ति नहीं होनी चाहिए। चिंता नहीं होनी चाहिए। यही सार है। हमेशा मुस्कराते रहो। प्रसन्न रहो। हर परिस्थिति में प्रसन्न रहो। जहां आत्मविश्वास नहीं है वहीं दूसरे का सहारा लिया जाता है। चाहे बीमार पड़ने पर बार-बार चिकित्सा व चिकित्सक का हो। भोगने में विश्वास करो। भागने में नहीं। शारीरिक विकार है, हमें भोगना है। शांति के साथ भोगना हैं। प्रसन्नता रहे, जैसा सुख है, वैसा ही दुख है।
भगवान शंकर का प्रतीक इसी बात का है।
खुद विष पी गए, पर गले से भी नीचे नहीं उतरने दिया।
अर्जुन को मोह हुआ था, ... हमारे भाई-बन्धु मारे जाएंगे। मृत्यु को कोई पसंद नहीं करता। भगवान ने उससे कहा- ‘तुम इन विचारों से कर्तव्य से हट रहे हो। धर्म से विचलित हो रहे हो। तुम्हे युद्ध करना है। लोग कुछ भी कहें। प्रकृति को तो युद्ध चाहिए। जो बना है, वह बिगड़ेगा ही। प्रकृति में जो पैदा हुआ है, ... वह रहेगा, ... नष्ट भी होगा।
जितनी सृजन की आवश्यकता है, उतनी ही नाश की भी है। सृष्टि की गति के लिए नाश भी आवश्यक है।
परिस्थिति से भागना नहीं है, मुकाबला करो।
अर्जुन के प्रश्न के उत्तर में कहा था- स्थितिप्रज्ञ बनकर युद्ध करो। यही सार है।
जो शास्त्र में लिखा है, वही सही है, उसे मानकर यह चलना भूल है। शास्त्र भी मनुष्य ने बनाए हैं, उस समय जैसी बुद्धि थी, ... जैसा चिन्तन था, वह कहा गया है। यह संसार विकासशील है, हमारे समय में जो बालक थे, वे आज के बालकों की तुलना में बहुत पीछे थे, आगे आने वाले बच्चे और भी बुद्धिगत योग्यता में आगे आएंगे।
मनुष्य की बौद्धिक क्षमता पहले से बहुत बढ़ गई है। नए-नए विचार उत्पन्न हुए हैं। विज्ञान के क्षेत्र में नए-नए आविष्कार हुए हैं। टेक्नोलोजी का इतना तेजी से विकास हुआ है कि हमारे विचारों में बहुत बड़ा परिवर्तन हुआ है।
पुराने विचार वर्तमान में लाभप्रद नहीं है। कई प्रकार की विसंगतियां उनसे उत्पन्न होती है।
ग्रन्थ भी मनुष्य ने ही बनाए हैं। भगवान तो लिखने आए नहीं हैं।
भगवान कृष्ण को भगवान माना, भागवत पुराण ही है। पुरानी घटनाओं पर आधारित है। इसमें लोगों ने विशेषताएं, शक्तियां बढ़ा-चढ़ाकर बताई है।
थे, तो वे भी मनुष्य ही।
मानव शरीरधारी कोई भी हो, उसकी सीमा होती है। महान शक्ति उसमें समा नहीं सकती है। सौ वाट के लट्टू में चार हजार वाट की पावर आ जाए तो वह फ्यूज हो जाएगा।
शरीर में शक्ति को सहन करने की एक सीमा है।
शास्त्र आप पढ़ते रहे।
शास्त्र आपको प्रभावित नहीं करेंगे, यदि आपने सही तरीके से मुझे सुना है। इन विचारों पर मनन-चिंतन किया है। तो पुराने शास्त्र आपको प्रभावित नहीं करेंगे। पढ़कर देखें, पढ़ा करें, क्या नई बात आपको पता होती है, चिंतन करें, बुद्धि से परीक्षण करें, उचित लगे अभ्यास में लावे।
जितनी बातें हम सुनते हैं, अधिकतर अतिश्योक्ति होती है। सब मन को उलझाने के प्रयास हैं।
सृष्टि के दो भाग हैं।
एक ब्रह्म है, एक माया है। ब्रह्म शक्ति है। उसकी क्रियाशीलता माया है। माया में पांच महाभूत हैं। पांच महाभूतों से ही सारी सृष्टि और यह शरीर बना है। इसमें पृथ्वी, अग्नि, वायु, पवन और आकाश है। इससे बना हुआ शरीर या हर वस्तु, इस दृष्टि के साथ निरंतर घूम रही है। तो यह माया है। पंचमहाभूत है। इसका स्वभाव स्थिरता नहीं है। निरंतर गतिशीलता और परिवर्तन। वह इतना सूक्ष्म है कि हमको नज़र नहीं आता है। कण-कण में परिवर्तन हो रहा है। निरंतर हो रहा है। इस परिवर्तन के साथ, विकास समझिए, बनना, बिगड़ना, हर वस्तु का समान है। मनुष्य का भी यही स्वभाव है।
बचपन से बुढ़ापे तक गतिशीलता ही है। वृद्धावस्था में विकार होता है, इन्द्रियां थक जाती है। फिर शरीर का टिका रहना मुश्किल है। हमारे यहां सौ वर्ष की आयु अधिकतम मानी गई है। आज कोई कहे किसी की हजार-पांच सौ साल की आयु है, ... वे हिमालय पर रहते हैं, ... मात्र अतिश्योक्ति है। हमें अपनी बुद्धि से निर्णय करना है।
आप भी मेरी बात पर इसीलिए विश्वास मत करना कि आप मेरे प्रतिश्रद्धा रखत हैं। मेरे विचार मेरे लिए हैं।
आप सही तरीके से सोचें-
ळववक उंेजमत जमंबीमे ीवू जव जीपदा दवज ूींज जव जीपदाण्
निर्णय अपनी बुद्धि से लेना है। मनन चिंतन करके सही निर्णय पर पहुंचना है। सुनी-सुनाई बातें, केवल सुनाने के लिए होती है।
पुरानी कहावत है-
।सस जींज हसपजजमते पे दवज हवसकण्
चमकने वाली हर चीज सोना नहीं होती है। करोड़ों में कोई एक संत होता है, ... कोई एक दार्शनिक, ... इसके लिए चित्त का निर्मल होना अत्यधिक आवश्यक है।
संसार एक विचित्र नाटक है। ।इेनतक क्तंउं कहा जाता है। विचित्र है। यहां अनेकों विचित्रताएं होंगी।
यदि हमें कोई भी व्यक्ति यह कहे कि यही सच है, तो जितनी शक्ति से वह कहेगा लोग उसे ही सही मानेंगे।
थोड़े दिन बाद दूसरा विचार आएगा, वह उसको खारिज कर देगा। यही प्रकृति का बड़ा नाटक है।
साधक कहता है, वह साधना करता है। प्रकृति के नियम के अनुसार, साधना आवश्यक ही नहीं है। स्वाभाविकता आनी चाहिए। साधना मात्र प्रयास है, यह स्वाभाविकता के निकट है।
म्ििवतजे ंतम तमुनपतमक जव ादवू जींज दव मििवतज पे तमुनपतमकण्
मििवतजेए (प्रयास) तो करने हैं, यदि नहीं करते हैं तो कर्म की प्रकृति के खिलाफ जाते हैं। कर्म तो करना ही है। पर अंत में जाकर- सच्ची साधना स्वाभाविकता ही है। बालक स्वाभाविक है। वह अपना आचरण बाह्य दबावों से नहीं बदलता है। विचित्रता संसार रूपी नाटक की विशेषता है।एक भी अंग इसका अनावश्यक नहीं है। परन्तु इसमें उलझने के स्थान पर तटस्थ रहो। तटस्थता केवल वर्तमान में रहने से आती है। यदि वर्तमान में नहीं है तो हर विचार हमें धक्का देगा, सोचने पर मजबूर करेगा।
... साधु-संतों की चर्चा व्यर्थ है।
जिन्हें हम साधु समझते हैं, वास्तविक साधु नहीं है।
लाखों करोड़ों में कोई एक साधु होता है।
सब अपने-अपने स्वार्थों से चिपटे लोग हैं, ... यह भी उदरपूर्ति साधन है, इसीलिए बने हुए हैं।
- हमारे यहां बहुत बड़ी परंपरा है।
पुराने ग्रन्थों के चार्वाक को भी ऋषि माना है। उनकी भी परंपरा रही हैं। जब तक जीना है, सुख से जीना है। कर्ज लेकर भी घी को पीना है। सुख से रहना है। एक बार शरीर भस्म हो गया फिर किसने उसे देखा है। यही संसार की विचित्रता है।
जितने दर्शन उतने विचार, ... जितनी संप्रदाय उतनी ही पद्दतियां है। यही संसार की विचित्रता है। सही-गलत के चक्कर में मत पड़ो। संसार लीला क्षेत्र है। प्रकृति का आनंद लो। तटस्थता बनी रहे। स्थितप्रज्ञ रहते हुए सांसारिक कर्म करो, यही सार है। भागकर कहीं जाना नहीं है।
वाचिक मौन, मौन नहीं होता है। परन्तु मानसिक मौन मन का मौन है। मानसिक मौन जब एक सीमा तक पहुंच जाता है, तब उस मन में तरंगे जैसी निकलती है। वो सीधी दूसरे के मन को जाकर उसे वे प्रेरणा देती है। वह भी इसी प्रकार मौन रहकर के, मौन होने से जो वह महान शक्ति है, उसके द्वारा आने वाली तरंगों से दूसरे व्यक्ति को, मन की तरंगों द्वारा प्रभावित कर देता है।
वह संदेश उन तक पहुंचा देता है जिससे उनकी मानसिक स्थिति अपने आप ही एक विशेष स्थिति में पहुंच जाती है, उन्हें अटूट शांति मिलती है। संतोष होता है। उनकी शंकाओं का समाधान हो जाता है।
किसी के भविष्य को जानने का प्रयास मत करो, पता भी लग जावे तो बोलो मत, पूर्वाभास होता है, तो इससे आत्मविश्वास बढ़ता है। परन्तु यह भी बाधक है। पहले एक दो बातें सही होंगी, फिर तीसरी बात गलत हो जाएगी। प्रकृति किसी को भी अपने रहस्य को जानने का अवसर नहीं देती है। कोई भी जान भी लेता है तो उसका मुंह बंद करा देती है, उसे हटा देती है।
‘मैं’ का अर्थ, गीता में भक्ति मार्गियों ने भगवान कृष्ण के लिए किया है। भगवान मानकर उनकी पूजा करो ‘शरणा गति में जाओ’
- ‘मैं का अर्थ, मैं शरीर धारी नहीं हं। यह तो पंच महाभूतों का बना है। स्वभाव है, वह निरंतर परिवर्तनशील है।
व्यवहार और आध्यात्मिकता में परस्पर विरोधी बातें हैं।
मैं का अर्थ, अंतर्मुखी होना पड़ेगा। तभी सामंजस्य का पता लगता है।
याद रखना। जो भी समस्या आपके सामने आएगी। उसका मुकाबला सीना तानकर करना। फिर वह कभी आएगी ही नहीं। यदि पीठ दिखाई तो फिर वह हावी होती जाएगी। कहां तक भागते फिरोगे। भागकर जावेगे भी कहां, मेरे सामने अनेक समस्याएं आई, मैं नहीं भागा। समस्याएं इसीलिए आती है कि हमें अपनी योग्यता का परिचय देने का मौका मिलता है। इससे मुझे जीवन में सफलताएं मिलीं।
निडर होकर मुकाबला करना होगा।
भागकर चले जान चाहो तो कहां जाओगे, हमारे भीतर से अंदर का डर निकल जाना चाहिए। इसीलिए भीतर किसी तरह की आसक्ति नहीं रहे।
आसक्ति नहीं होने से जो भी चीज चाही है, हमारे पास आएगी, जिस क्षण उसे जाना है, चली जाएगी।
आपका इस पर वश नहीं चलेगा।
समुद्र में लकड़ियां लहरें ले आती है, एक जगह इकट्ठी हो जाती है। फिर हवा का झोंका आता है, बिखर जाती है।
वर्तमान में हर चीज मेरी है।
जब संबंध टूटेगा।
टूट जाएगा, बस आसक्ति नहीं होनी चाहिए। चिंता नहीं होनी चाहिए। यही सार है। हमेशा मुस्कराते रहो। प्रसन्न रहो। हर परिस्थिति में प्रसन्न रहो। जहां आत्मविश्वास नहीं है वहीं दूसरे का सहारा लिया जाता है। चाहे बीमार पड़ने पर बार-बार चिकित्सा व चिकित्सक का हो। भोगने में विश्वास करो। भागने में नहीं। शारीरिक विकार है, हमें भोगना है। शांति के साथ भोगना हैं। प्रसन्नता रहे, जैसा सुख है, वैसा ही दुख है।
भगवान शंकर का प्रतीक इसी बात का है।
खुद विष पी गए, पर गले से भी नीचे नहीं उतरने दिया।
अर्जुन को मोह हुआ था, ... हमारे भाई-बन्धु मारे जाएंगे। मृत्यु को कोई पसंद नहीं करता। भगवान ने उससे कहा- ‘तुम इन विचारों से कर्तव्य से हट रहे हो। धर्म से विचलित हो रहे हो। तुम्हे युद्ध करना है। लोग कुछ भी कहें। प्रकृति को तो युद्ध चाहिए। जो बना है, वह बिगड़ेगा ही। प्रकृति में जो पैदा हुआ है, ... वह रहेगा, ... नष्ट भी होगा।
जितनी सृजन की आवश्यकता है, उतनी ही नाश की भी है। सृष्टि की गति के लिए नाश भी आवश्यक है।
परिस्थिति से भागना नहीं है, मुकाबला करो।
अर्जुन के प्रश्न के उत्तर में कहा था- स्थितिप्रज्ञ बनकर युद्ध करो। यही सार है।
Monday, July 13, 2009
पूज्य स्वामीजी
1
समर्पण का पथ
यहां मात्र विधि है। सब स्वीकार है मुझे
प्रकृति ने जो दिया है
जो सौंपा है
श्रेष्ठतम है।मैं कहाँ तक बदलूंगा, मेरा सामथ्र्य ही बहुत कम है।कहीं तो मुझे रुकना ही होगा।जो भी मुझे आज मिला है ,कल मैंने ही तो यह चाहा था।तब हम साधना का प्रारंभ कर सकते हैं।यहां लड़ना किसी से नहीं है।न निंदा न वंदना।न कोई चाहत।
स्वामी जी कहा करते थे,याचक मत बनो।तुम अनिष्ट की कल्पना कर-कर ही टूट जाते हो।तूफ़ान आता है,पेड. किस तरह सामना करता है,पूरा हिल जाता है,पर वह गिड़गिड़ता नहीं है।
योग के नाम पर प्रारभ में ही पूरा बल छोड़ने और छूटने पर होता है। यहा उसकी कोई जरूरत ही नहीं है।तुम तो बस जो विधि तुमने ली है उस पर चलते रहो जिसे छूटना होगा वह स्वतः छूटता चला जाएगा। साधना के नाम पर साधक को लड़ने के लिए तैयार किया जाता है।यह योग का मार्ग है। संकल्प का मार्ग है, संघर्ष करना है
पहला संघर्ष- काम से
काम के विरूद्ध रहना है, जब विवाह किया है,तब आप योग की तैयारी में नहीं जासकते।पर सब जगह उल्टा पाठ पढ़ाया जारहा है।गृहस्थ का मार्ग दूसरा होगा,उसका मार्ग गृहस्थी से ही जाएगा।उसे अपने परिवार की सभी जिम्मेदारियाँ पूरी तरह से निभानी ही होंगी।
इसीलिए योगी जो भी साधन अपनाता है वह गृहस्थ के प्रतिकूल है।भारत की हजार साल की गुलामी का मुख्य कारण यही रहा कि हमने मूढ़ता में आकर गृहस्थ के विरुद्ध ही रास्ता पकड़ लिया। शक्ति का मूल केन्द्र नाभि के पास है।उसे जागृत होना है।परन्त परम्परागत साधना मूलाधार के विरूद्ध है।हमारी सारी साधनाओं का प्रारंभ इसी मूलाधार के विरुद्ध ही रहता है।यही गलती हमें कहीं का नहीं रहने देती।
गहरी सांस लेना सीखें।प्राण वायु नाभि तक जाए ,विचार कम से कम हों, मस्तिष्क की क्रिया पर कम से कम दबाब डाला जाए।इससे स्वाभाविक रूप से उर्जा का विकास होगा।उर्जा का विकसित होना कोई पाप नहीं है।
होना यही चाहिए- यह जगत परमात्मा की लीला भूमी है। सब उसी का ही है, शिव और शक्ति का मिलन है यहाँ
किसके खिलाफ जाना है?
किससे कब लड़ना है?
- उसका उपभोग करो, काम शक्ति परमात्मा की देन है।उसके आभारी रहो। तुमने असहयोग किया ,क्या इ्र्रश्वर खुश होगा,यह तुम्हारी भूल है।जो भी परमात्मा ने दिया है ,साधन सामग्री है।
उपयोग करो
रूपांतरण करो
- जो भी है, उसे स्वीकार करो। सामथ्र्य का सदुपयोग ही साधना का प्रारंभ है।
समग्र स्वीकार
मांगो मत, प्रयास करो। जो भी क्रिया है उसमें अपने आपको पूरा लगादो। कर्तुम, अकर्तुम ,अन्यथा कर्तुम, यही होगा।होगा,नहीं होगा,कुछ तीसरा होगा। परन्तु यहां तुम्हारी लगन महत्वपूर्ण है। लेकिन सजगता में रहो- होश में रहो
संसार और मोक्ष- विपरीत नहीं है
जाल सनातन से रहा है
किससे छुटकारा
मुक्ति किसी की नहीं होती, कहां जाओगे ,जो भी गया लौटके बताने नहीं आया,इस दुनिया से बेहतर कोई भी जगह नहीं है।
संसार रसमय है, ऐसा कोई स्थान नहीं है, जहां परमात्मा न हो
जब सब जगह परमात्मा है
तो फिर किसे छोड़कर कहां जाना है-
सब जगह जो भी है स्वीकार है, अच्छा मिला उसके अनुग्रही बनो।मन माफिक नहीं हुआ ,उसकी इच्छा तुमनत ही तो की थी।।तुम भी तो अपने बच्चों के हर काम पूरे नहीं कर पाते हो।उसकी भी मजबूरी रही होगी।तुम्हारा प्रयास कम रहा होगा।कम से कम सोचो।कोई संघर्ष नहीं होना है।
तब मन का अनावश्यक भटकाव कम होने लगता है
- सबको प्रकृति ने अपने कार्य से भेजा है। हम सब इसरंगमंच के पात्र है
जो ‘रोल’ हमेें दिया गया है, उसको वैसा ही करता है।
शैतान भी उन्हीं ने बनाया है, उसका भी कार्य होना है।हम कौन उसका खेल बिगाड़ने वाले होते हैं।
,जहां समर्पण होता है, वहां मन की उहापोह भी खो जाती है
अहंकार कभी भी समर्पण नहीं होने देता है, वह हर जगह कुतर- कुतर करता है।वह किसी की बात स्वीकार ही नहीं करता।जब दूसरा चाहे वह गुरू ही क्यों नहो वह उस वक्त भी इसमें नई बात क्या है? यह तो मुझे पहले से ही पता है, यह तो उस किताब में भी लिखा है मानकर अपनी ग्राहकता को रोक देता है।पत्थर की तरह जो रात दिन नदी में भीगा रहने बाद भी सूखा रहता है।
बुद्धि अनेक उत्तर अपने पास रखती है
-सीस देय ले जाए- कबीर ने कहा था, प्रेम बाजार में नहीं मिलता, शर्त है, सिर दे जाओ ।अहंकार कभी भी नहीं जाता।
.. रावण के दस सिर थेे, दस गुना अहंकार, ... हांॅं
तीर जब नाभि पर मारा गया, तब वह मरा..। अहम् की मृत्यु माम् के साथ लय में होती है। माम् का मूल स्थान नाभि पर है।अहम्, माम् में लय हो जाता है। मम् माया दुरत्या, पार होनी कठिन है।परन्तु इस माम् की शरण ही पार कराने में समर्थ है।
समर्पण का पथ
यहां मात्र विधि है। सब स्वीकार है मुझे
प्रकृति ने जो दिया है
जो सौंपा है
श्रेष्ठतम है।मैं कहाँ तक बदलूंगा, मेरा सामथ्र्य ही बहुत कम है।कहीं तो मुझे रुकना ही होगा।जो भी मुझे आज मिला है ,कल मैंने ही तो यह चाहा था।तब हम साधना का प्रारंभ कर सकते हैं।यहां लड़ना किसी से नहीं है।न निंदा न वंदना।न कोई चाहत।
स्वामी जी कहा करते थे,याचक मत बनो।तुम अनिष्ट की कल्पना कर-कर ही टूट जाते हो।तूफ़ान आता है,पेड. किस तरह सामना करता है,पूरा हिल जाता है,पर वह गिड़गिड़ता नहीं है।
योग के नाम पर प्रारभ में ही पूरा बल छोड़ने और छूटने पर होता है। यहा उसकी कोई जरूरत ही नहीं है।तुम तो बस जो विधि तुमने ली है उस पर चलते रहो जिसे छूटना होगा वह स्वतः छूटता चला जाएगा। साधना के नाम पर साधक को लड़ने के लिए तैयार किया जाता है।यह योग का मार्ग है। संकल्प का मार्ग है, संघर्ष करना है
पहला संघर्ष- काम से
काम के विरूद्ध रहना है, जब विवाह किया है,तब आप योग की तैयारी में नहीं जासकते।पर सब जगह उल्टा पाठ पढ़ाया जारहा है।गृहस्थ का मार्ग दूसरा होगा,उसका मार्ग गृहस्थी से ही जाएगा।उसे अपने परिवार की सभी जिम्मेदारियाँ पूरी तरह से निभानी ही होंगी।
इसीलिए योगी जो भी साधन अपनाता है वह गृहस्थ के प्रतिकूल है।भारत की हजार साल की गुलामी का मुख्य कारण यही रहा कि हमने मूढ़ता में आकर गृहस्थ के विरुद्ध ही रास्ता पकड़ लिया। शक्ति का मूल केन्द्र नाभि के पास है।उसे जागृत होना है।परन्त परम्परागत साधना मूलाधार के विरूद्ध है।हमारी सारी साधनाओं का प्रारंभ इसी मूलाधार के विरुद्ध ही रहता है।यही गलती हमें कहीं का नहीं रहने देती।
गहरी सांस लेना सीखें।प्राण वायु नाभि तक जाए ,विचार कम से कम हों, मस्तिष्क की क्रिया पर कम से कम दबाब डाला जाए।इससे स्वाभाविक रूप से उर्जा का विकास होगा।उर्जा का विकसित होना कोई पाप नहीं है।
होना यही चाहिए- यह जगत परमात्मा की लीला भूमी है। सब उसी का ही है, शिव और शक्ति का मिलन है यहाँ
किसके खिलाफ जाना है?
किससे कब लड़ना है?
- उसका उपभोग करो, काम शक्ति परमात्मा की देन है।उसके आभारी रहो। तुमने असहयोग किया ,क्या इ्र्रश्वर खुश होगा,यह तुम्हारी भूल है।जो भी परमात्मा ने दिया है ,साधन सामग्री है।
उपयोग करो
रूपांतरण करो
- जो भी है, उसे स्वीकार करो। सामथ्र्य का सदुपयोग ही साधना का प्रारंभ है।
समग्र स्वीकार
मांगो मत, प्रयास करो। जो भी क्रिया है उसमें अपने आपको पूरा लगादो। कर्तुम, अकर्तुम ,अन्यथा कर्तुम, यही होगा।होगा,नहीं होगा,कुछ तीसरा होगा। परन्तु यहां तुम्हारी लगन महत्वपूर्ण है। लेकिन सजगता में रहो- होश में रहो
संसार और मोक्ष- विपरीत नहीं है
जाल सनातन से रहा है
किससे छुटकारा
मुक्ति किसी की नहीं होती, कहां जाओगे ,जो भी गया लौटके बताने नहीं आया,इस दुनिया से बेहतर कोई भी जगह नहीं है।
संसार रसमय है, ऐसा कोई स्थान नहीं है, जहां परमात्मा न हो
जब सब जगह परमात्मा है
तो फिर किसे छोड़कर कहां जाना है-
सब जगह जो भी है स्वीकार है, अच्छा मिला उसके अनुग्रही बनो।मन माफिक नहीं हुआ ,उसकी इच्छा तुमनत ही तो की थी।।तुम भी तो अपने बच्चों के हर काम पूरे नहीं कर पाते हो।उसकी भी मजबूरी रही होगी।तुम्हारा प्रयास कम रहा होगा।कम से कम सोचो।कोई संघर्ष नहीं होना है।
तब मन का अनावश्यक भटकाव कम होने लगता है
- सबको प्रकृति ने अपने कार्य से भेजा है। हम सब इसरंगमंच के पात्र है
जो ‘रोल’ हमेें दिया गया है, उसको वैसा ही करता है।
शैतान भी उन्हीं ने बनाया है, उसका भी कार्य होना है।हम कौन उसका खेल बिगाड़ने वाले होते हैं।
,जहां समर्पण होता है, वहां मन की उहापोह भी खो जाती है
अहंकार कभी भी समर्पण नहीं होने देता है, वह हर जगह कुतर- कुतर करता है।वह किसी की बात स्वीकार ही नहीं करता।जब दूसरा चाहे वह गुरू ही क्यों नहो वह उस वक्त भी इसमें नई बात क्या है? यह तो मुझे पहले से ही पता है, यह तो उस किताब में भी लिखा है मानकर अपनी ग्राहकता को रोक देता है।पत्थर की तरह जो रात दिन नदी में भीगा रहने बाद भी सूखा रहता है।
बुद्धि अनेक उत्तर अपने पास रखती है
-सीस देय ले जाए- कबीर ने कहा था, प्रेम बाजार में नहीं मिलता, शर्त है, सिर दे जाओ ।अहंकार कभी भी नहीं जाता।
.. रावण के दस सिर थेे, दस गुना अहंकार, ... हांॅं
तीर जब नाभि पर मारा गया, तब वह मरा..। अहम् की मृत्यु माम् के साथ लय में होती है। माम् का मूल स्थान नाभि पर है।अहम्, माम् में लय हो जाता है। मम् माया दुरत्या, पार होनी कठिन है।परन्तु इस माम् की शरण ही पार कराने में समर्थ है।
Wednesday, June 10, 2009
जीवन का स्त्रोत
मरने की कला
जिस दुनिया में हम रह रहे हैं, वह उस दुनिया से अलग नहीं है जो हमारे भीतर है,
हमारे और दुनिया के बीच में जो बंटवारा है, वह अस्वाभिवक है, जैसी दुनिया से बाहर है, हम भी भीतर वैसे ही है।
हम बाहर प्रेम तलाश करते हैं, सहानुभूति पाना चाहते हैं, सहृदयता चाहते हैं, पर क्या वह हमारे भीतर भी है? कभी जाना। हम जैसे है, बाहर की दुनिया भी वैसी ही है।
जब हमारे भीतर मौलिक परिवर्तन होगा, हमारे विचारों में, हमारे भावों में, हमारे व्यवहार में, बाहर भी हम वैसा ही परिवर्तन पाएंगे।
हमें अपने आपको, अपने आपके द्वारा समझना है, कोई दूसरा हमें हमारे बारे में समझा नहीं सकता।
हमारी अपने बारे में गहरी समझ ही, हमें अपने बारे में सही बता सकती है, और कोई दूसरा नहीं।
-जब हम आदर्शों के हिसाब से जीवन शुद्ध कर देते हैं, हमने तो हमारा काम कर दिया, जिम्मेदारी पूरी कर दी, हम समझते हैं, हम भले हैं, पर यह मात्र भौतिकवादी क्रियाकलाप ही रहता है, इसमें भावना का पोषण छूट जाता है, यह मात्र एक औपचारिक घटना होकर रह जाती है। हम तब वास्तविकता के साथ जुड़ नहीं पाते हैं। न ही हम अपने आपको सही रूप में समझ पाते हैं।
-हमारे विचार, हमारी मन-स्थिति, हमारी धारणाएं जो हमारी जीवन शैली को बनाती है, वे टुकड़ों में बंटी हुई है। हमारे विचार परस्पर विरोधी विचार भी है, जहां हम रहते हैं हमें अपने भीतर इस अराजक स्थिति को देखना होगा। उन कारणों को पहचानना होगा जहां से यह सारी अनियमितता पैदा होती है।
अपने आपको जब हम देखने का प्रयास करते हैं, तब हम पाते हैं कि हमारा अपना नजरिया न दूसरों के प्रति वरन अपने प्रति भी पूर्वाग्रह से भरा हुआ है। हम अपने आपको भी देखने में स्वतंत्र नहीं है। हमारे विचार, हमारी मान्यताएं, हमारे समाज व संस्कृति से प्रभावित है। हमारे भीतर जो मन है, जो दृष्टा है, वह स्वयं रंगा हुआ है। वह निर्मल नहीं है। स्वच्छ नहीं है। हमें कैसे देखना है, क्या देखना है, सब पूर्वाग्रह से ग्रसित है। यही हमारे भय का कारण है।
-पूर्वाग्रह से रहित होना, स्वतंत्र होने की पहली शर्त है। हमें अपने प्रति यह सजगता लानी होगी कि हम जिस प्रकार सोचते हैं, क्या सोचते हैं, क्यों सोचते हैं, हमारे विचार क्या हैं? न तो हमें उनकी निंदा करनी है न उसके साथ बढ़ना है। मात्र उन्हें स्पष्टता में, जैसे ही वे आ रहे हैं, उन्हें देखते रहना है। तब हम धीरे-धीरे यह समझने में सफल हो जाते है कि हमारे विचारों का ढांचा किस प्रकार का है, हम ऐसा ही क्यों सोचते हैं। तब हम अपने मन को विचारों की शृंखला से मुक्त कर पाने मे ंसफल हो पाते हैं।
गीता में भी कहा गया है- ‘श्रिप्रं भवति धर्मात्मां, या तो आप तुरंत बदल सकते हैं, या कभी नहीं, यह परिवर्तन शृंखला में नहीं होता है। मौलिक परिवर्तन त्वरित घटता है। उसके लिए आवश्यक है कि हम इस विधि के, इस प्रक्रिया को गंभीरता से ले- हम अपने जीवन को घटता हुआ देखें, हम अपने विचारों को देखें, ‘अपने क्रियाकलापों को देखें। तब हमारे और जिसे हम देखना चाहते हैं, उसके बीच दूरी नहीं होती है। यह इसी विचारों के कारण से होती है।
मेरे भीतर भय है, जब मैं अपने भय को सीधे देखता हूं, मुझमें और भय के भीतर कोई अंतराल नहीं है, न ही में भागना चाहता हूं, न ही लड़ना चाहता हूं, तब पाया भय मुझसे दूर नहीं रहता है। इस दूरी के टूटते ही, जो दिख रहा था, जो देख रहा था, दोनों में एक रूप होते ही समय का अंतराल विदा हो जाता है।
जीवन क्या है, मृत्यु क्या है, रहना क्या है?
हमारे जीवन का एक मात्र ध्येय अधिक से अधिक सुख पाना है। पर जहां सुख है, वहीं उसके पीछे भय और दुख भी छिपा हुआ है। सुख-शारीरिक है, मानसिक है बौद्धिक है स्वास्थ्य है, काम है, प्रशंसा है, सम्मान है, हमने सुख को ही जीवन की अनिवार्यता मान लिय है। हमने सुख को इतना महत्व क्यों दिया है? जीवन अनुभवों की एक अनवरत शृंखला है। हम उन अनुभवों को नहीं चाहते हैं, जो दुखात्मक है। बीमारी है, असफलता है, मृत्यु है, नाश है, नहीं चाहते हैं। जहां सुख मिल सकता है, संभावना भी है, वहां हम उसे पाने के लिए भागते हैं, मंदिर में, पूजा में, तंत्र में, राजनेताओं के पास, धन लिप्सा में, सुंदर भोजन में, कहां नहीं जाते। हम सुख पाना चाहते हैं, सुख इसीलिए हमें खींचते हैं।
आखिर यह सुख कहां है? कहां रहता है, जाना जो भोग हुआ है उसकी मधुर छाप स्मृति पर रह जाती है, वह बार-बार उसकी पुनरावृत्ति चाहती है। जब भी अनुभव नया हो उसके पूर्व स्मृति उस क्षण को निकाल लाती है। वहां नया अनुभव नहीं होता, मात्र एक दोहराव रहता है, वह भी यांत्रिक सा हो जाता है।
... तब जो अनुभव विचार ने संग्रहित कर, बाहर फैंका था, वह विचार भय तथा दुख को भी संग्रहित कर निरंतर बाहर लाता रहता है। कल क्या होगा? आज यह दुख आया है, भोगा है,उसकी कटु स्मृतियां कल भी आ सकती है, यही भय है।
यही विचार जो सुख को जगाता रहता है, यही भय को, दुख को भी पैदा करता रहता है। हमारा सादा जीवन इन्हीं स्मृतियों का ही विकास है। एक निरंतर संघर्ष, दुख और सुख का बना रहता है। और हमारा जीवन हम ध्यान से देखें तो दुख से अधिक भरा हुआ है। जहां सुख है, वहां भय भी साथ रखा हुआ है।
हमारे अतीत में जहां सुख का संग्रह कम है, वहां भय और दुख की छाप अधिक संग्रहित है। प्रश्न उठता है, क्या हम इन सबको जो अतीत का हिस्सा बन चुका है, एक साथ हटा सकते हैं?
तब एक ही प्रश्न शेष रह जाता है कि क्या विचार जो दुख और सुख को एक सातव्य एक निरंतरता प्रदान करता है, रूक सकता है, अप्रभावी हो सकता है कि वह दुख और सुख को स्थायित्व नहीं दे पाए, उसे आधार न दे पाए। हम यह जान चुके हैं कि विचार ही उसे आधार देता है, तब क्या विचार से मुक्त हुआ जा सकता है?
विचार तो रहेगा, तथ्यात्मक विचार के आधार पर बाह्य संसार चल रहा है, पर हम यहां मनोवैज्ञानिक विचार की बात कर रहे हैं जो मात्र हमारी स्मृति का भंडार है, अवधारणाओं का जनक है, अनावश्यक विचारणा यहा से निरंतर प्रभावित होती रहती है। भीतर हमारे अंतर्जगत में इस मनोवैज्ञानिक विचार के लिए कोई आधार नहीं है क्योंकि जहां यह सुखात्मक अवधारणा को रखता है वहीं यह भय और दुख का जनक भी है। जहां आवश्यक हो, वहां विचार का सहयोग ले, अन्यथा उससे अप्रभावित रहे। मात्र देखें। तब यह संभव हो जाता है कि हम वास्तविक अनुभव के साथ रहें, उसमें जीएं, तब विचार का अनावश्यक दखल कम होता जाता है। तब हम उस वास्तविक क्षण में जीने में समर्थ हो जाते हैं जो हमेशा ‘वर्तमान होता है।
मृत्यु क्या है, हम मृत्यु के नाम से भय खाते हैं। जानते हैं, कहना कठिन है, जो सामने अभी था, वह नहीं रहा है। मात्र उसकी स्मृतियां रह जाती है। हर याद, उसके न होने की पीड़ा का दंश दे जाती है। कटुता खिन्नता हृदय दुखों के सागर में डूब जाता है। अपनी मौत का इतना दुख नहीं होता, जितना परिजन की मृत्यु का होता है। अपनी मौत का मात्र भय होता है। जबकि हम जानते हैं कि हम स्वयं मरने की ओर ही जा रहे हैं। हम मृत्यु शब्द से ही डरते हैं। हम इस बारे में विचार ही नहीं करते हैं। स्मृति हमेशा अतीत की होती है। मृत्यु भविष्य में है, अतः वहां कल्पना का आधार ही नहीं मिलता है।
मृत्यु- पंचमहाभूतों से जोे शरीर बना है, उसका स्वाभाविक विसर्जन है। इसीलिए बुढ़ापा, बीमारी, दुर्घटना जो मृत्यु के वाहक हैं,, भयभीत करते रहते हैं। हम पुनर्जन्म की चर्चा करते हैं, पर अभी तक उसका वैज्ञानिक आधार तलाश नहीं कर पाए हैं, पर हमारी मान्यताएं दृढ़ है।
हम चाहते हैं, मृत्यु टल जाए, हमारी पूजा, प्रार्थना, प्रार्थना यहां तक की ध्यान का भी अभिप्राय यही रहता है। हम दुख नहीं चाहते है। मृत्यु सबसे अधिक भयावह है, हम उससे दूर जाना चाहते हैं।
तब प्रश्न उठता है कि हम जो कुछ भी हमारा जाना गया है, हमारे भीतर स्मृति है, उससे मनोवैज्ञानिक रूप से उसके बोझ से उसकी आसक्ति से हट सकंे। उसके प्रति मर सकंे। यहां शारीरिक मृत्यु की बात नहीं है, हमारी जो आसक्ति है, जो चिपकाव है, यहां उसकी मृत्यु की बात हो रही है, क्या कभी हमने उस सुखात्मक क्षण को, अनुभव को, याद को जिसे हमने बहुत संभालकर अपने भीतर रख रखा है, क्या उसे हटने दिया है, क्या उसे अप्रभावी होने दिया है? क्या हम उसे भूल पाए हैं? लेकिन यदि हम उन सबके प्रति, हमारी सारी आसक्तियों के प्रति, अपने परिवार अपने पद, अपनी उपलब्धियों के प्रति मर सकंे, उन्हें भूल सकंे तब हम वास्तविक रूप से स्मृतियों के, उस जाल से बाहर आ सकते हैं, जो विचारणा का भंडार है। जहां अतीत हमेशा भविष्य की ओर प्रेरित करता रहता है, तथा स्वयं अतीत में ही है। उनका हम इन सबके प्रति मर सकें तब हम जीवन को समझ सकते हैं। तब जीवन जीने का अर्थ बदल जाता है। यहां जो अनुभव है, जो उससेे परे है, वह प्रेम है। यह प्रेम सुख-दुख से परे हैं।
यहां आने की प्रक्रिया ध्यान है। ध्यान यह वह नहीं है, जो सिखाया जाता है। ध्यान जो जाना गया है, जो ज्ञात का भंडार है, उसका खाली हो जाना है। यहां मन जो जाना गया है, जो स्मृतियों का भंडार है, उसके अनुकरण में काम नहीं करता है, परन्तु मन स्वतंत्र होकर उसका प्रयोग भी करता है। यही मन का नियंत्रण कहा जाता है।
इसीलिए जीवन जीने की कला, वर्तमान में रहना है। यहां जो अतीत है, जो भविष्य है, दोनों के प्रति मर जाना है। तब मात्र वर्तमान में रहा जा सकता है। यहां आत्मा या शरीर का विभाजन नहीं है, शरीर बिना चैतन्य के जड़ है, चैतन्य को आधार शरीर का चाहिए। इस एकरूपताप में विभाजन गलत दृष्टि है। वर्तमान में जहां शरीर है, वहां मन है। वहीं चैतन्य है, यही वह स्वाभाविक अवस्था है जिसे ‘सहज’ कहा जाता है।
Sunday, June 7, 2009
जीवन का स्त्रोत
जीवन का स्त्रोत
जीवन का स्त्रोत क्या है ,यह प्रश्न सभी चिंतकों को व्यथित करता रहा हैं।भगवान बुद्ध ने अव्याृत प्रश्न कहकर इसे पूछने पर मना कर दिया था।भारतीय दर्शन की यात्रा , मैं हूँ,मेरी सत्ता है, मैं चैतन्य हूँ, तथा अद्धैत वेदान्त तक आते - आते मैं आनंद भी हूँ, गीता में भगवान ने ”मम माया दुरत्या कहकर परम सत्ता ”आत्म“ तक दी है।पूज्य स्वामीजी जहाँबुद्ध के आलय मत को मानते हुए परम चैतन्य को अत्यंत गत्यात्मक कहरहे हैं, वहीं वे केन्द्र की सत्ता को भी स्वीकृति दे रहे हैं, पर यहाँ जो केन्द्र है ,वह निरन्तर परिवर्तनशील है , जो अनेक ज्योतियों के एक थिर होने का अहसास भी कराता है।
कृपया आप इसे पढें ,अपनी प्रतिकिया दें,यहाँंस्थागत धर्म से हटकर भारतीय संस्कृति और धर्म दर्शन की विवेचना होरही हैं
.
साधकांे से हुई बातचीत के आधार पर
योग मात्र शारीरिक क्रिया प्रक्रिया का सामन्जस्य ही नही है, वरन योग सम्पूर्णता पाने की प्रक्रिया है। जो पूर्ण है, जहां किसी प्रकार का कोई अभाव नहीं है। अभाव ही विक्षोभ का जनक है। वही दुख है। प्रत्येक प्राणी में किसी न किसी प्रकार की कोई न कोई कमी रहती है। कमी प्रकृति जन्य है। विषमता प्रकृति का स्वरूप ही है। आकांक्षा से गति उत्पन्न होती है, गति इस विषमता को हलचल देती है। एक स्फुरणा, पूर्णता की ओर बढ़ने की ललक, यही विकास यात्रा है। हम निरन्तर सम्भावना में है, रूपान्तरण में हैं, अपने आप को बदलने की प्रक्रिया में हैं।
यही कर्म का स्वभाव है। कर्म उस तरंग की स्वाभाविक गति है, जो चित्त सरोवर में उठी है। स्फुरणा क्यों ? क्या मात्र इसलिए ही नहीं कि वहां मात्र उद्वेलन ही है। सरोवर में आने वाली हर लहर एक छाप छोड़ जाती है। फिर उसी छाप पर, उसी प्रभाव पर दूसरी लहर लाती है।यही तो संकल्पों का सिलसिला है, कारण है- संस्कार ! संस्कार ही वह छाप है, जहां नाभि से आने वाले स्पन्दन तरंग उत्पन्न करते हैं। इस तरह यन्त्र जो कि स्वचालित है, चलता रहता है। लहर उठती है, गिरती है, छाप बनती है, उस पर पुनःलहर उठती है। यह छाप ही वह संस्कर है जो कि संकल्पों की जनक है। हर संकल्प जो जितना गहरा होता है, उतना ही कर्म में ढल जाता है और कर्म की परिस्थिति भोग में होती है। भोगावस्था में वह तरंग पुनः टूटती है और उसका प्रभाव शेष रह जाता है। उस प्रभाव से पुनःतरंग उठती है।
यह एक लंबा सिलसिला है।
प्रश्न उठता है, फिर इस सिलसिले को योग में कैसे परिणित किया जाये ? योग-सम्पूर्ण रूपान्तरण ! अभाव का ही अभाव ! मात्र पूर्णता। यहां हैं गहरी शांति हार्दिकता तथा प्रेम।
शरीर मात्र जड़ ही नहीं है, वह परम चेतन्य के साथ जुड़कर चेतन तथा जड़ के साथ जुड़कर जड़वत हो जाता है। वह जड़ और चेतन का समवाय है, जो अद्भुत है, इसलिए ही रूपान्तरण संभव है। इस शरीर का सम्पूर्ण समर्पण ही साधक के लिए श्रेयस्कर है। साधक कहते हैं कि वे ध्यान करते हैं कुछ कहते हैं जाप करते हैं, कुछ कीर्तन करते हैं, एक-एक इन्द्रिय को लेकर वे संयमित हो रहे है। वाणी जाप करती है, तब मन बाजार घूम आता है। हाथ से सुमिरिनी फिरती है, तब कान पड़ौस का बाजा सुनता है। घण्टे भर मौन रहे, पर आसन से उठते ही क्रोध से आग बबूला हो उठे हैं। इतना गुस्सा, यह कैसा योग हैं ? योग- जुड़ना। परम सत्य में लय भाव। यह मात्र एकांकी नही है, वरन यहां जुड़ना सम्पूर्ण है। टोटल....कुछ भी बाकी नहीं रखना। अपने आपको पूरा दे देना। चैबीस घंटे दे देना। तब जो कर्म है, वह भगवद कर्म में ढल जाता है।
यह कर्म कब संभव हो ?
प्रश्न उठ खड़ा होता है, यह कैसे संभव हो ? हम जो कुछ करते हैं, क्या वह सार्थक कर्म नही है? हां उत्तर सम्भवतः यही है। सार्थक कर्म पूर्णता देता है, जब कि निरर्थक कर्म मात्र अभाव और असंतोष सौंपता है। निरर्थक कर्म जन्म लेता है उन बातों से जो आज की नही है। आगे और पीछे का जो व्यर्थ का चिन्तन है, उसमें हम डूबे रहते है। वह इस प्रभाव का चित्त सरोवर पर सौंपता है, जिससे विक्षोभ जन्य लहरें उत्पन्न होती हैं, जहां मात्र अभाव ही है।
अतः आवश्यक है कि पहले निरर्थक कर्म से सार्थक कर्म की और बढ़ा जावे जो प्रकृति जन्य है, वही सहज है।
वही स्वाभाविक है। वह अपने आप पूरा हो जाता है। निरर्थक कर्म होता है, मन-तन के आगे और पीछे के चिन्तन में डूबने से। मन को जितना इससे हटाया जाकर वर्तमान में लाया जायेगा। उतना ही मन अपनी स्वाभाविक स्थिति में होगा।और मन जितनी शांत अवस्था में होगा, उतनी ही सक्रियता बढ़ेगी। साथ ही, उतनी ही सृजनात्मकता रहेगी। कर्म, सार्थकता पाएगा। कर्म, सार्थकता तभी पाता है, जब वह कर्म दुबारा न किया जावे यह भावना पूरी हो जावे। यही कर्म का रहस्य है। अन्यथा कर्म का भोग शेष रह जाता है। कर्म की स्वाभाविक परिणति लय है और जब कर्म मुक्ति का कारण बन जाता है, तब वही योेग कहलाता है, अन्यथा कर्म की परिणति भोग में ही होती है।
कर्म भी साधन ही है। इसके स्वरूप को समझे बिना बचने का उपाय नही है। यह जगत, कर्म के ही ताने-बाने से बना हुआ है। अतः जगत से बाहर जाना तो संभव नही है। करोड़ो में कोई बिरला बाहर आ सकता है, परन्तु अपने भीतर से जगत को बाहर कर सकता है। जगत में रहते हुए भीतर के जगत से छुटकारा ! यही साध्य है। जगत आगे और पीछे के व्यर्थ के चिन्तन में उपस्थित रहता है वह तरंग पैदा करता है। जो कर्म को उपस्थित कर भोगों में बदल देती है।
अतः कर्मयोग का रहस्य यही है। कर्म का योग में रूपान्तरण ही साध्य रहे। चित्त सरोवर मे आने वाली हर लहर पर ध्यान रहे। उसका साक्षी भाव से निरीक्षण। निरर्थकता से बचा जाये। तभी गंदलाया जल स्थिर होना शुरू हो जाता है। और पारदर्शी तली उपस्थिति देती है।
यह स्थिति मात्र जड़ हो जाना नही है, वरन यह है- सम्पूर्ण सृजनात्मकता का अवतरण, टोटल रिवोल्यूशन सम्पूर्ण परिवर्तन दूसरे शब्दों में सम्पूर्ण योग। यहां मात्र क्रिया का अन्त नही है, परन्तु क्रिया का सहज और स्वाभाविक रूपान्तरण है।
इसकी साधक में पहचान है, हार्दिकता और आचरण में निस्वार्थता।
कर्मयोग, साधक को अदभुत क्रिया शक्ति से जोड़ता है, जिसकी परिणति होती है, त्याग और सेवा में। उसका हर क्षण प्रकृति जन्य होने लगता है। जिससे प्रकृति से साधक की सम्प्रत्ति गहरी होने लगती है।
व्यक्तित्व की संरचना
प्रश्न ः यह माना जाता है कि शरीर जड़ और चेतन दोनो का समवाय है, शरीर में चेतना का प्रकाश कहां होता है, तथा चेतना किस प्रकार कार्य करती है इस सन्दर्भ में विवाद है। क्या मन, चित्त और आत्मा के बीच में भी अन्य किसी प्रकार के स्तर है।
स्वामी जी ः यह तो वही बता सकता है, जिसने सवाल खड़ा किया है। किताबों में पढ़ा होगा। प्रश्न अगर मन से आया है तो उत्तर उसी के पास होगा, उत्तर उसी से पूछा जाए मिल जायेगा। रमण महर्षि ने प्रश्न यही उठाया था और इसी की तलाश में रहे।
प्रकृति की लहरें अनवरत उठ रही हैं। ये नाभि में उठती हैं। नाभि में विकारों के बीज हैं। वे बीज सूक्ष्म हैं। वहां मात्र स्पंदन है। वे धीरे धीरे उफनते जाते हैं, जैसे लहरें सभी के अन्दर उठ रही है, किसी को जल्दी उत्तेजित करती हैं, किसी को कम। यह व्यक्ति की बनावट, बुनावट पर निर्भर रहता है।
जैसे कुछ लोग सो रहे हैं, कोई आकर आवाज देता है तो कोई एक आवाज पर, कोई दो आवाज पर, कोई चार आवाज पर उठ जाता है, और कोई होता है, उस पर असर ही नही होता- वह सोता रह जाता है। आवाज देने वाला एक ही होता है। संस्कार सूक्ष्म बीज रूप में हैं, लहरें टकरायी, टकराते टकराते कोई उफन जाता है, किसी पर कोई असर नही होता। यह उसी प्रकार से है कहीं बच्चों ! आवाज लगते ही उठ जाता है, कोई सोया रहता है। वासना जागृत ही नहीं होती।लहरें अनवरत उठ रही हैं धीरे-धीरे यह अनुभव हो जाता है कि प्रकृति का कार्य यही है। हमें तो सहन करना है। सहन करने के लिए अपने स्थान पर स्थिर होकर रहना है।
चेतन्य केन्द्र आत्मा है या यूं कहिए, वहां अवेयरनेस है वह है, उसका अनुभव हो जाता है, उसके सबसे समीप अन्तर्मन ही है, मनोविज्ञान की भाषा में इसे अनकांशस कहा जा सकता है। यहां जानने का माध्यम कोई है नहीं, इन्द्रियों की पहुंच यहां तक नहीं है। यहां तक स्थूल शरीर की पहुंच नही रहती है। यह उसके परे की बात है, अभ्यास यही करना है कि नाभि से उठ रहे स्पंदनों को, जो चित्त पर आकर टकराते हैं तथा वहां स्थूलता ग्रहण करते हैं, और वासनाएं जन्म लेती है, उस उफान को उस संवेग को, उस लहर को, उस तरंग को उस भाव दशा को गहरी जागरूकता के साथ, सतर्कता के साथ साक्षी भाव से अवलोकित करना है।
इसी अन्तर्मन से स्पंदन आगे बढ़ते हैं, वे स्थूल शरीर से अभिव्यक्त होते हैं। नाभि से उठने वाले स्पंदन चित्त पर आकर टकरा कर स्थूलता ग्रहण करते हैं। यहां आकर भाव- दशा शरीर के माध्यम से प्रकट होने लगती है। यहां आकर वासनाएं आकर ग्रहण करती हैं, स्पंदन तरंगों का रूप ग्रहण कर लेते हैं, वासनाएं विषयों के लिए लालायित रहती हैं, उन्हें पोषण मिल जाता हैं, अगर वर्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ जाता है तो वे ऊपर की ओर उठती जाती हैं, पर उन्हें फैलने के लिए जगह नहीं मिलती स्वभाव में बदलाव व्यवहार की श्रेष्ठता अनुकरण से नहीं सीखी जाती। यदि हमारा क्रोधी स्वभाव है और उसकी हमें प्रतीती भी है, तो वर्तमान में रहने का अभ्यास होेने के बाद लहर जो उठी है, वह अनुभव होगी और लहर जिस प्रकार पत्थर पर टकरा कर वापिस लौट जाती है, वैसे ही मालूम होगा। टकराई व लौट गई, अन्तर्मुखी होेने के बाद वृत्तियां उठते हुए भी पनपती नही है। और धीरे-धीरे बिल्कुल ही नहीं होती।
इसीलिए कहा है, स्वभाव बाद की स्थिति है। इसीलिए स्वभाव का पता तब तक नही चलता, जब तक क्रिया नहीं होती। आप चुप हैं, मौन हैं, पर बोलते ही शब्द बाहर आते ही जब क्रिया होती है, स्वभाव का पता चल जाता है। वर्तमान में रहने वाले का स्वभाव समझ में नही आता है, क्योंकि वहां प्रतिक्रिया नही होगी। न भूत है, न भविष्य, न कल्पना है, न अतीत से संग्रहित कोई व्याख्या है। क्योंकि बाह्य, मन अनुपस्थित है। उसका काम होता है-स्मृति करना, कल्पना करना, चिन्तन करना, संग्रहित करना, रिकार्ड रूम नहीं रहा तब न अतीत रहा न भविष्य रहा, मात्र क्रिया, कोई प्रतिक्रिया नहीं। स्वभाव सहज, साधारण बन जाता है। हां, यह भी नहीं होता कि निठल्लापन होता है, या पलायन। हां, अत्यधिक सृजनशीलता, और चित्त की नमनीयता वहीं संभव है। सवेंदनशीलता यही प्राप्त होती है। जो भी कार्य प्रकृति को करना है, वह कराती जायेगी, तथा कार्य स्वतः होता जायेगा।
मैं इतनी देर से चुप बैठा था, आपने प्रश्न पूछा मैं बोला। नही तो चुप रहता हूं। प्रश्न पूछा है तो क्रिया होती है। नहीं तो व्यवहार कुशलता नही रही। हम सब भीतर से जुड़े हुए हैं। व्यवहार ही सबके प्रति सही होना चाहिए। यहां इतने लोग आते हैं, पर आवश्यक नहीं है, बोला जावे। पर कोई प्रश्न पूछता है, तब उत्तर आ जाता है, अन्यथा मौन, व्यवहार का सही तरीका यही है। अन्तर्मुखी होने पर कर्म स्वतः प्रकृति जन्य हो जाता है, वहीं यह पहचान होती है।
इसीलिए वह बात गहराई से समझने की है कि हमें इस प्रक्रिया के प्रति जागृत होना है। जागरुकता की सबसे बड़ी यही जरूरत है। हम हजारों साल से शरीर के प्रति अत्यधिक सजग हैं। सारे शास्त्र यहीं आकर रूक गये हैं, जो आगे बढ़े वे भी काल भय से हमें छोड़ नहीं पाये। बुद्ध जब बोले, तब तो शरीर से इतना लड़ चुके थे कि उनकी बात को भी स्वीकारते हुए जो उन्होंने करके छोड़ दिया था, वह भी उनके अनुयायी मानते गये। लोग कहते हैं कि मन, जो क्रिया-तन्त्र है, वाक है, शरीर के इस पर नियंत्रण कर ले, और चित्त से उठने वाली तरंगों के प्रति असहयोग रखें तो साधना की ओर तेजी से बढ़ेंगे। यह सबसे बड़ा खतरा है।
उपशमन, नियमन, नियंत्रण फिर उल्टी तरफ चलना है। शरीर के नियंत्रण व नियमन की जितनी चिन्ता होती है, शरीर उतना अधिक खतरनाक हो जाता है। वहीं जब क्रिया का स्वरूप स्पष्ट है तो मात्र साध्य अन्तर्मन से उठने वाली तरंगो के प्रति सहनशीलता को प्राप्त करना है। शरीर के नियंत्रण पर हजारों साल से जो बल दे रहे हैं, वह यह जानकर भी छोड़ने का साहस नहीं कर पा रहे है। मन से असहयोग लेना है मन का निष्क्रमण भूत और भविष्य में है। वर्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ते ही मन स्वतः अनुपस्थित हो जाता है। यह क्रिया तन्त्र को राजी रखने का तरीका नहीं है, वरन उसका सहज साक्षात्कार है। जिससे वह स्वतः अनुपस्थित होने लग जाता है। यही पहली मंजिल है, न यहां दमन है, न क्षय की स्पर्धा। अभ्यास का क्रम है, मात्र साक्षी ध्यान। यही हमें जानना है, आगे गहरे समझना है। तभी साधना का रहस्य समझ में आता है। यही सार है। तभी लक्ष्य की प्राप्ति संभव है।
अ
जीवन का स्त्रोत क्या है ,यह प्रश्न सभी चिंतकों को व्यथित करता रहा हैं।भगवान बुद्ध ने अव्याृत प्रश्न कहकर इसे पूछने पर मना कर दिया था।भारतीय दर्शन की यात्रा , मैं हूँ,मेरी सत्ता है, मैं चैतन्य हूँ, तथा अद्धैत वेदान्त तक आते - आते मैं आनंद भी हूँ, गीता में भगवान ने ”मम माया दुरत्या कहकर परम सत्ता ”आत्म“ तक दी है।पूज्य स्वामीजी जहाँबुद्ध के आलय मत को मानते हुए परम चैतन्य को अत्यंत गत्यात्मक कहरहे हैं, वहीं वे केन्द्र की सत्ता को भी स्वीकृति दे रहे हैं, पर यहाँ जो केन्द्र है ,वह निरन्तर परिवर्तनशील है , जो अनेक ज्योतियों के एक थिर होने का अहसास भी कराता है।
कृपया आप इसे पढें ,अपनी प्रतिकिया दें,यहाँंस्थागत धर्म से हटकर भारतीय संस्कृति और धर्म दर्शन की विवेचना होरही हैं
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साधकांे से हुई बातचीत के आधार पर
योग मात्र शारीरिक क्रिया प्रक्रिया का सामन्जस्य ही नही है, वरन योग सम्पूर्णता पाने की प्रक्रिया है। जो पूर्ण है, जहां किसी प्रकार का कोई अभाव नहीं है। अभाव ही विक्षोभ का जनक है। वही दुख है। प्रत्येक प्राणी में किसी न किसी प्रकार की कोई न कोई कमी रहती है। कमी प्रकृति जन्य है। विषमता प्रकृति का स्वरूप ही है। आकांक्षा से गति उत्पन्न होती है, गति इस विषमता को हलचल देती है। एक स्फुरणा, पूर्णता की ओर बढ़ने की ललक, यही विकास यात्रा है। हम निरन्तर सम्भावना में है, रूपान्तरण में हैं, अपने आप को बदलने की प्रक्रिया में हैं।
यही कर्म का स्वभाव है। कर्म उस तरंग की स्वाभाविक गति है, जो चित्त सरोवर में उठी है। स्फुरणा क्यों ? क्या मात्र इसलिए ही नहीं कि वहां मात्र उद्वेलन ही है। सरोवर में आने वाली हर लहर एक छाप छोड़ जाती है। फिर उसी छाप पर, उसी प्रभाव पर दूसरी लहर लाती है।यही तो संकल्पों का सिलसिला है, कारण है- संस्कार ! संस्कार ही वह छाप है, जहां नाभि से आने वाले स्पन्दन तरंग उत्पन्न करते हैं। इस तरह यन्त्र जो कि स्वचालित है, चलता रहता है। लहर उठती है, गिरती है, छाप बनती है, उस पर पुनःलहर उठती है। यह छाप ही वह संस्कर है जो कि संकल्पों की जनक है। हर संकल्प जो जितना गहरा होता है, उतना ही कर्म में ढल जाता है और कर्म की परिस्थिति भोग में होती है। भोगावस्था में वह तरंग पुनः टूटती है और उसका प्रभाव शेष रह जाता है। उस प्रभाव से पुनःतरंग उठती है।
यह एक लंबा सिलसिला है।
प्रश्न उठता है, फिर इस सिलसिले को योग में कैसे परिणित किया जाये ? योग-सम्पूर्ण रूपान्तरण ! अभाव का ही अभाव ! मात्र पूर्णता। यहां हैं गहरी शांति हार्दिकता तथा प्रेम।
शरीर मात्र जड़ ही नहीं है, वह परम चेतन्य के साथ जुड़कर चेतन तथा जड़ के साथ जुड़कर जड़वत हो जाता है। वह जड़ और चेतन का समवाय है, जो अद्भुत है, इसलिए ही रूपान्तरण संभव है। इस शरीर का सम्पूर्ण समर्पण ही साधक के लिए श्रेयस्कर है। साधक कहते हैं कि वे ध्यान करते हैं कुछ कहते हैं जाप करते हैं, कुछ कीर्तन करते हैं, एक-एक इन्द्रिय को लेकर वे संयमित हो रहे है। वाणी जाप करती है, तब मन बाजार घूम आता है। हाथ से सुमिरिनी फिरती है, तब कान पड़ौस का बाजा सुनता है। घण्टे भर मौन रहे, पर आसन से उठते ही क्रोध से आग बबूला हो उठे हैं। इतना गुस्सा, यह कैसा योग हैं ? योग- जुड़ना। परम सत्य में लय भाव। यह मात्र एकांकी नही है, वरन यहां जुड़ना सम्पूर्ण है। टोटल....कुछ भी बाकी नहीं रखना। अपने आपको पूरा दे देना। चैबीस घंटे दे देना। तब जो कर्म है, वह भगवद कर्म में ढल जाता है।
यह कर्म कब संभव हो ?
प्रश्न उठ खड़ा होता है, यह कैसे संभव हो ? हम जो कुछ करते हैं, क्या वह सार्थक कर्म नही है? हां उत्तर सम्भवतः यही है। सार्थक कर्म पूर्णता देता है, जब कि निरर्थक कर्म मात्र अभाव और असंतोष सौंपता है। निरर्थक कर्म जन्म लेता है उन बातों से जो आज की नही है। आगे और पीछे का जो व्यर्थ का चिन्तन है, उसमें हम डूबे रहते है। वह इस प्रभाव का चित्त सरोवर पर सौंपता है, जिससे विक्षोभ जन्य लहरें उत्पन्न होती हैं, जहां मात्र अभाव ही है।
अतः आवश्यक है कि पहले निरर्थक कर्म से सार्थक कर्म की और बढ़ा जावे जो प्रकृति जन्य है, वही सहज है।
वही स्वाभाविक है। वह अपने आप पूरा हो जाता है। निरर्थक कर्म होता है, मन-तन के आगे और पीछे के चिन्तन में डूबने से। मन को जितना इससे हटाया जाकर वर्तमान में लाया जायेगा। उतना ही मन अपनी स्वाभाविक स्थिति में होगा।और मन जितनी शांत अवस्था में होगा, उतनी ही सक्रियता बढ़ेगी। साथ ही, उतनी ही सृजनात्मकता रहेगी। कर्म, सार्थकता पाएगा। कर्म, सार्थकता तभी पाता है, जब वह कर्म दुबारा न किया जावे यह भावना पूरी हो जावे। यही कर्म का रहस्य है। अन्यथा कर्म का भोग शेष रह जाता है। कर्म की स्वाभाविक परिणति लय है और जब कर्म मुक्ति का कारण बन जाता है, तब वही योेग कहलाता है, अन्यथा कर्म की परिणति भोग में ही होती है।
कर्म भी साधन ही है। इसके स्वरूप को समझे बिना बचने का उपाय नही है। यह जगत, कर्म के ही ताने-बाने से बना हुआ है। अतः जगत से बाहर जाना तो संभव नही है। करोड़ो में कोई बिरला बाहर आ सकता है, परन्तु अपने भीतर से जगत को बाहर कर सकता है। जगत में रहते हुए भीतर के जगत से छुटकारा ! यही साध्य है। जगत आगे और पीछे के व्यर्थ के चिन्तन में उपस्थित रहता है वह तरंग पैदा करता है। जो कर्म को उपस्थित कर भोगों में बदल देती है।
अतः कर्मयोग का रहस्य यही है। कर्म का योग में रूपान्तरण ही साध्य रहे। चित्त सरोवर मे आने वाली हर लहर पर ध्यान रहे। उसका साक्षी भाव से निरीक्षण। निरर्थकता से बचा जाये। तभी गंदलाया जल स्थिर होना शुरू हो जाता है। और पारदर्शी तली उपस्थिति देती है।
यह स्थिति मात्र जड़ हो जाना नही है, वरन यह है- सम्पूर्ण सृजनात्मकता का अवतरण, टोटल रिवोल्यूशन सम्पूर्ण परिवर्तन दूसरे शब्दों में सम्पूर्ण योग। यहां मात्र क्रिया का अन्त नही है, परन्तु क्रिया का सहज और स्वाभाविक रूपान्तरण है।
इसकी साधक में पहचान है, हार्दिकता और आचरण में निस्वार्थता।
कर्मयोग, साधक को अदभुत क्रिया शक्ति से जोड़ता है, जिसकी परिणति होती है, त्याग और सेवा में। उसका हर क्षण प्रकृति जन्य होने लगता है। जिससे प्रकृति से साधक की सम्प्रत्ति गहरी होने लगती है।
व्यक्तित्व की संरचना
प्रश्न ः यह माना जाता है कि शरीर जड़ और चेतन दोनो का समवाय है, शरीर में चेतना का प्रकाश कहां होता है, तथा चेतना किस प्रकार कार्य करती है इस सन्दर्भ में विवाद है। क्या मन, चित्त और आत्मा के बीच में भी अन्य किसी प्रकार के स्तर है।
स्वामी जी ः यह तो वही बता सकता है, जिसने सवाल खड़ा किया है। किताबों में पढ़ा होगा। प्रश्न अगर मन से आया है तो उत्तर उसी के पास होगा, उत्तर उसी से पूछा जाए मिल जायेगा। रमण महर्षि ने प्रश्न यही उठाया था और इसी की तलाश में रहे।
प्रकृति की लहरें अनवरत उठ रही हैं। ये नाभि में उठती हैं। नाभि में विकारों के बीज हैं। वे बीज सूक्ष्म हैं। वहां मात्र स्पंदन है। वे धीरे धीरे उफनते जाते हैं, जैसे लहरें सभी के अन्दर उठ रही है, किसी को जल्दी उत्तेजित करती हैं, किसी को कम। यह व्यक्ति की बनावट, बुनावट पर निर्भर रहता है।
जैसे कुछ लोग सो रहे हैं, कोई आकर आवाज देता है तो कोई एक आवाज पर, कोई दो आवाज पर, कोई चार आवाज पर उठ जाता है, और कोई होता है, उस पर असर ही नही होता- वह सोता रह जाता है। आवाज देने वाला एक ही होता है। संस्कार सूक्ष्म बीज रूप में हैं, लहरें टकरायी, टकराते टकराते कोई उफन जाता है, किसी पर कोई असर नही होता। यह उसी प्रकार से है कहीं बच्चों ! आवाज लगते ही उठ जाता है, कोई सोया रहता है। वासना जागृत ही नहीं होती।लहरें अनवरत उठ रही हैं धीरे-धीरे यह अनुभव हो जाता है कि प्रकृति का कार्य यही है। हमें तो सहन करना है। सहन करने के लिए अपने स्थान पर स्थिर होकर रहना है।
चेतन्य केन्द्र आत्मा है या यूं कहिए, वहां अवेयरनेस है वह है, उसका अनुभव हो जाता है, उसके सबसे समीप अन्तर्मन ही है, मनोविज्ञान की भाषा में इसे अनकांशस कहा जा सकता है। यहां जानने का माध्यम कोई है नहीं, इन्द्रियों की पहुंच यहां तक नहीं है। यहां तक स्थूल शरीर की पहुंच नही रहती है। यह उसके परे की बात है, अभ्यास यही करना है कि नाभि से उठ रहे स्पंदनों को, जो चित्त पर आकर टकराते हैं तथा वहां स्थूलता ग्रहण करते हैं, और वासनाएं जन्म लेती है, उस उफान को उस संवेग को, उस लहर को, उस तरंग को उस भाव दशा को गहरी जागरूकता के साथ, सतर्कता के साथ साक्षी भाव से अवलोकित करना है।
इसी अन्तर्मन से स्पंदन आगे बढ़ते हैं, वे स्थूल शरीर से अभिव्यक्त होते हैं। नाभि से उठने वाले स्पंदन चित्त पर आकर टकरा कर स्थूलता ग्रहण करते हैं। यहां आकर भाव- दशा शरीर के माध्यम से प्रकट होने लगती है। यहां आकर वासनाएं आकर ग्रहण करती हैं, स्पंदन तरंगों का रूप ग्रहण कर लेते हैं, वासनाएं विषयों के लिए लालायित रहती हैं, उन्हें पोषण मिल जाता हैं, अगर वर्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ जाता है तो वे ऊपर की ओर उठती जाती हैं, पर उन्हें फैलने के लिए जगह नहीं मिलती स्वभाव में बदलाव व्यवहार की श्रेष्ठता अनुकरण से नहीं सीखी जाती। यदि हमारा क्रोधी स्वभाव है और उसकी हमें प्रतीती भी है, तो वर्तमान में रहने का अभ्यास होेने के बाद लहर जो उठी है, वह अनुभव होगी और लहर जिस प्रकार पत्थर पर टकरा कर वापिस लौट जाती है, वैसे ही मालूम होगा। टकराई व लौट गई, अन्तर्मुखी होेने के बाद वृत्तियां उठते हुए भी पनपती नही है। और धीरे-धीरे बिल्कुल ही नहीं होती।
इसीलिए कहा है, स्वभाव बाद की स्थिति है। इसीलिए स्वभाव का पता तब तक नही चलता, जब तक क्रिया नहीं होती। आप चुप हैं, मौन हैं, पर बोलते ही शब्द बाहर आते ही जब क्रिया होती है, स्वभाव का पता चल जाता है। वर्तमान में रहने वाले का स्वभाव समझ में नही आता है, क्योंकि वहां प्रतिक्रिया नही होगी। न भूत है, न भविष्य, न कल्पना है, न अतीत से संग्रहित कोई व्याख्या है। क्योंकि बाह्य, मन अनुपस्थित है। उसका काम होता है-स्मृति करना, कल्पना करना, चिन्तन करना, संग्रहित करना, रिकार्ड रूम नहीं रहा तब न अतीत रहा न भविष्य रहा, मात्र क्रिया, कोई प्रतिक्रिया नहीं। स्वभाव सहज, साधारण बन जाता है। हां, यह भी नहीं होता कि निठल्लापन होता है, या पलायन। हां, अत्यधिक सृजनशीलता, और चित्त की नमनीयता वहीं संभव है। सवेंदनशीलता यही प्राप्त होती है। जो भी कार्य प्रकृति को करना है, वह कराती जायेगी, तथा कार्य स्वतः होता जायेगा।
मैं इतनी देर से चुप बैठा था, आपने प्रश्न पूछा मैं बोला। नही तो चुप रहता हूं। प्रश्न पूछा है तो क्रिया होती है। नहीं तो व्यवहार कुशलता नही रही। हम सब भीतर से जुड़े हुए हैं। व्यवहार ही सबके प्रति सही होना चाहिए। यहां इतने लोग आते हैं, पर आवश्यक नहीं है, बोला जावे। पर कोई प्रश्न पूछता है, तब उत्तर आ जाता है, अन्यथा मौन, व्यवहार का सही तरीका यही है। अन्तर्मुखी होने पर कर्म स्वतः प्रकृति जन्य हो जाता है, वहीं यह पहचान होती है।
इसीलिए वह बात गहराई से समझने की है कि हमें इस प्रक्रिया के प्रति जागृत होना है। जागरुकता की सबसे बड़ी यही जरूरत है। हम हजारों साल से शरीर के प्रति अत्यधिक सजग हैं। सारे शास्त्र यहीं आकर रूक गये हैं, जो आगे बढ़े वे भी काल भय से हमें छोड़ नहीं पाये। बुद्ध जब बोले, तब तो शरीर से इतना लड़ चुके थे कि उनकी बात को भी स्वीकारते हुए जो उन्होंने करके छोड़ दिया था, वह भी उनके अनुयायी मानते गये। लोग कहते हैं कि मन, जो क्रिया-तन्त्र है, वाक है, शरीर के इस पर नियंत्रण कर ले, और चित्त से उठने वाली तरंगों के प्रति असहयोग रखें तो साधना की ओर तेजी से बढ़ेंगे। यह सबसे बड़ा खतरा है।
उपशमन, नियमन, नियंत्रण फिर उल्टी तरफ चलना है। शरीर के नियंत्रण व नियमन की जितनी चिन्ता होती है, शरीर उतना अधिक खतरनाक हो जाता है। वहीं जब क्रिया का स्वरूप स्पष्ट है तो मात्र साध्य अन्तर्मन से उठने वाली तरंगो के प्रति सहनशीलता को प्राप्त करना है। शरीर के नियंत्रण पर हजारों साल से जो बल दे रहे हैं, वह यह जानकर भी छोड़ने का साहस नहीं कर पा रहे है। मन से असहयोग लेना है मन का निष्क्रमण भूत और भविष्य में है। वर्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ते ही मन स्वतः अनुपस्थित हो जाता है। यह क्रिया तन्त्र को राजी रखने का तरीका नहीं है, वरन उसका सहज साक्षात्कार है। जिससे वह स्वतः अनुपस्थित होने लग जाता है। यही पहली मंजिल है, न यहां दमन है, न क्षय की स्पर्धा। अभ्यास का क्रम है, मात्र साक्षी ध्यान। यही हमें जानना है, आगे गहरे समझना है। तभी साधना का रहस्य समझ में आता है। यही सार है। तभी लक्ष्य की प्राप्ति संभव है।
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Tuesday, June 2, 2009
जीवन भाष्य
़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़स्वभाव ए आदतें और संस्कारएक्या हम अपने आपको जानते हैंहम निरन्तर बाह्य से जो प्रभाव ग्रहण करते हैंए वही तो कालांतर में हम होते चले जाते है जब पतंजलि ने वृत्तियों के निरोध को योग कहा था तब वह योग में प्रवेश के लिए पहला कदम ही थाएअन्तर्मन में प्रवेश द्वार का यह प्रारम्भ है।
साधकों से हुई बात.चीत के अंश
आदतें और स्वभाव उठने वाली वृत्ति को पहचान देते हैं जिससे जीवन की पहचान मिलती है।
संस्कारों में यह चीज तो बीज रूप में रहेगी ही। अच्छी मिठाई भी खाते आ रहे हैं। लेकिन मिठाई के प्रति हमारी रुचि नहीं है। परन्तु मिठाई खाते आ रहे हैं इसलिए उसका भी संस्कार है पर जिससे लहरें उठती हैए संस्कारों में से वृत्तियां वासनाएं जागृत करने में वह समान रूप से संस्कारों के भण्डार से टकराती है।
हमारी चाय पीने की आदत है।
चाय और मिठाई सामने आयी तो चाय पीने की वृत्ति जल्दी जागृत होगी परन्तु मिठाई की जागृत्ति होकर भी उतनी नही होगी। परिणाम यह होगा कि चाय के लिए हाथ पहले बढ़ेगा मिठाई के लिए नहीं। वृत्ति अपना स्वरूप स्वयं उजागर कर देती है।
इस प्रकार जितने भोग भोग चुके हैंए उनके संस्कार रुपी बीज अन्दर हैं। पर यह सामुदायिक लहर जो उठती है। प्रकृति की वह एक व्यक्ति की नहींए मानव मात्र की होती हैए टकराते ही अंदर हलचल मचती है।
वृत्तियां उफान खाकर ऊपर आ जाती है।
इन्दिरा गांधी की मृत्यु से लहर उठी है। कोई शंात रह गएण्ण्ण् कोई विचलित हुएए कोई उफान खाऐंगे। लहर तो एक ही है। चारों तरफ से उठी है। कर्म एक ही हुआ है। परन्तु प्रतिक्रिया अलग.अलग। जो जितना निकट है उसकी अनुभूति उतनी ही गहरी होगी।
इसी तरह से यही संस्कार है। हमने जीवन मंे जो जो भोगा है अनुभव किया है या जिन.जिन वस्तुओं के प्रति आकर्षण रहा है वही संस्कार रूप मेंए बीज रूप में उपस्थित होता है। प्रकृति उसमें वृत्तियां जागृत करके इस शरीर और इन्द्रियो द्वारा करने को प्रेरित करती है।
केवल संस्कार
मृत्यु के बाद संस्कार शेष रह जाता है। संस्कारों का भण्डार अन्तर्मन में रहता है। उसका ही एक हिस्सा इन्द्रियां और मन हैं। यही एक शरीर छोड़कर जाता है। जिस शरीर में वह जाता है वहीं प्राण की गति प्रारम्भ हो जाती है। बीच में कुछ नहीं रहता है। बीज रूप में यही संस्कार रहता है।
इस जीवन में अगर वर्तमान में रहने का अभ्यास किया तो अन्दर उसमें संस्कार नहीं बनते। संस्कारों के अनुकूल ही वह जहां जहां देख लेते हैं कि वासनाओं की पूर्ति होनी सहायक होती है उस परिस्थिति में परिवार में जन्म हो जाता है।
प्रश्नर संस्कार मृत्यु के बाद कहां रह जाते है
उत्तरर कहां रह जाते हैं कुछ कहा नही जा सकता। यहा इस जीवन में कम से कम एक कमरा मकान गली शहर की कल्पना तो है। हमारी जितनी कल्पनाएं हैं शरीर के साथ हैं। मन के साथ हैं। इसके बाद कुछ नहीं। वह स्वप्न सब कहां चला जाता है। इसका भी अस्त्तिव तब तक है जब तक शरीर और मन है। यहां से जाने के बाद यह भी गायब हो जाएगा। बड़ी विचित्रता है। कहंा जाते हैं कोई वस्तु तो है नहीं।
परन्तु प्रकृति के द्वारा एक वह संस्कारों का बीज तो है जिसे प्रकृति ने पैदा किया है।एकोऽहं बहुस्यामि जैसे एक चीज से हजारों रूप हो जाते है। यह विलीन हो जाते है। नाटक करने से लिए अपने आप पैदा हो जाते हैं। वापिस चले जाते हैं। वैसे बीच के समय में यह संस्कार रूपी बीज नाटक करने के लिए उसमे ऐसे पड जाते हैंए जो सब नाटक अपने साथ करते जाते हैं बनते जाते है बिगड़ते जाते हैंए सार कुछ नहीं।
जीवात्मा का स्वरूप
मृत्यु के बाद वो जो निकल जाता हैए उसमें वासनाएं होती हैंए संस्कार उसका एक छोटा सा पुन्ज उसे जीवात्मा कहते है।
ये सब पैदा हुए हैं जब से सृष्टि उत्पन्न हुई है।एकोऽहं बहुस्याम स्वप्न में हम लेटते हैं। सोने के लिए अपन अकेले होेते हैं। और वहां भी वेदान्त कहता है इसमें आया है. स्वप्न क्यों पैदा होते हैं जब लेटा.लेटा व्यक्ति अपने आपको अकेला महसूस करता है तो वह घबड़ा जाता है। क्योंकि वह अकेले में रहने का आदी नहीं है। और जब भय से कि वह अकेला है यह भावना पैदा होती है तो बहुस्याम की भावना पैदा हो जाती है। उसमें स्वप्न सृष्टि पैदा हो जाती है।
जो स्वप्न सृष्टि बनने के लिए प्रक्रिया है। अनेक व्यक्ति नजर आने चाहिएए अपने आप आ जाते हैं इसी प्रकार यहां तो अलग.अलग संस्कार है। इच्छायें हैं जो पुनःवहां से निकल जाता है। क्योंकि वह अलग अलग जीवात्मा तो है ही वह जीवात्मा जिसमें जितनी अधिक शक्ति होगी। इसमें ऐसे भी बहुत से व्यक्ति होतेे हैं जो कड़ी साधना के बाद शरीर छोड़कर जाते हैं जिनको हमने विद्वान माना है उनका अपना प्रकाश रहता है तेज होता है पर यहां चाहे सौ में अट्ठानवें टका तरक्की करलोए एक दो भी कमी रह गई तो प्रकृति के लिए यह काफी है नीचे खींच देने के लिए। वह वापिस खींच लेती है।
वहां तो जो सौ टका हुआए वही पास हो सकता हैए पूरा ही पकना होता है। हां जो भी किया है उसका लाभ तो मिलेगा। परन्तु जब तक शुद्ध सोना नही है तब तक उसको चक्कर काटने पड़ेंगे। प्रकृति उसे हटाएगी। जब तक वह सौ टन्च सोना हो जायेगा। उसे अपने हर जन्म की तब स्मृति रहेगी।
समान स्वभाव वाले लोग इकट्ठे हो जाते हैं वहां भी ऐसा होता होगा। पहले इच्छा हुई थी जीवात्मा कहां रहती है तब दिखाए जैसे जुगनू होते हैंए पांच सात झुण्ड में बड़ा प्रकाश होता है। तरह तरह से वो इधर.उधर आते जाते हैं। दिखा कई बार कई दिनों तक दिखता रहा। इच्छा न रहते हुए भी दिखता रहा। पर मन वहां भी नहीं लगा। विचारधारा शुरू हो गई फिर मन ने कहा छोड़ो तो छूट गई। इसी प्रकार दिखाया। फिर नहीं दिखा। अब उसकी आवश्यकता ही नहीं रही। जिज्ञासा भी नहीं रही। जहां जो इच्छा होगीए जानने की वह भी एक संस्कार बना देगी। वह भी खतरनाक होगी। जितना बचा जाएए उतना ही अच्छा।
जीवनमुक्त अवस्था
साध्य इसीलिए यही है। जीवनमुक्त अवस्था में यही होता है कि हमे हमारे शरीर मे रहते हुए शरीर से अलग अनुभव करते हुए हमारी इन्द्रियां हमारे शरीर में किस प्रकार काम करती हैंए इसका निरीक्षण करना है। यह करना हमने प्रारम्भ कर दिया तो संस्कार उठना कम हो जाता है। लहरें उठने की क्रिया धीरे.धीरे कम होती जाती है। संस्कारों में वासनाएं उत्पन्न करने की क्षमता कम हो जाती है। ये जो लहरें उठती रहती हैं प्रति क्षण फिर ये प्रभावित नहीं करती। यही सार है।
़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़स्वभाव ए आदतें और संस्कारएक्या हम अपने आपको जानते हैंहम निरन्तर बाह्य से जो प्रभाव ग्रहण करते हैंए वही तो कालांतर में हम होते चले जाते है जब पतंजलि ने वृत्तियों के निरोध को योग कहा था तब वह योग में प्रवेश के लिए पहला कदम ही थाएअन्तर्मन में प्रवेश द्वार का यह प्रारम्भ है।
साधकों से हुई बात.चीत के अंश
आदतें और स्वभाव उठने वाली वृत्ति को पहचान देते हैं जिससे जीवन की पहचान मिलती है।
संस्कारों में यह चीज तो बीज रूप में रहेगी ही। अच्छी मिठाई भी खाते आ रहे हैं। लेकिन मिठाई के प्रति हमारी रुचि नहीं है। परन्तु मिठाई खाते आ रहे हैं इसलिए उसका भी संस्कार है पर जिससे लहरें उठती हैए संस्कारों में से वृत्तियां वासनाएं जागृत करने में वह समान रूप से संस्कारों के भण्डार से टकराती है।
हमारी चाय पीने की आदत है।
चाय और मिठाई सामने आयी तो चाय पीने की वृत्ति जल्दी जागृत होगी परन्तु मिठाई की जागृत्ति होकर भी उतनी नही होगी। परिणाम यह होगा कि चाय के लिए हाथ पहले बढ़ेगा मिठाई के लिए नहीं। वृत्ति अपना स्वरूप स्वयं उजागर कर देती है।
इस प्रकार जितने भोग भोग चुके हैंए उनके संस्कार रुपी बीज अन्दर हैं। पर यह सामुदायिक लहर जो उठती है। प्रकृति की वह एक व्यक्ति की नहींए मानव मात्र की होती हैए टकराते ही अंदर हलचल मचती है।
वृत्तियां उफान खाकर ऊपर आ जाती है।
इन्दिरा गांधी की मृत्यु से लहर उठी है। कोई शंात रह गएण्ण्ण् कोई विचलित हुएए कोई उफान खाऐंगे। लहर तो एक ही है। चारों तरफ से उठी है। कर्म एक ही हुआ है। परन्तु प्रतिक्रिया अलग.अलग। जो जितना निकट है उसकी अनुभूति उतनी ही गहरी होगी।
इसी तरह से यही संस्कार है। हमने जीवन मंे जो जो भोगा है अनुभव किया है या जिन.जिन वस्तुओं के प्रति आकर्षण रहा है वही संस्कार रूप मेंए बीज रूप में उपस्थित होता है। प्रकृति उसमें वृत्तियां जागृत करके इस शरीर और इन्द्रियो द्वारा करने को प्रेरित करती है।
केवल संस्कार
मृत्यु के बाद संस्कार शेष रह जाता है। संस्कारों का भण्डार अन्तर्मन में रहता है। उसका ही एक हिस्सा इन्द्रियां और मन हैं। यही एक शरीर छोड़कर जाता है। जिस शरीर में वह जाता है वहीं प्राण की गति प्रारम्भ हो जाती है। बीच में कुछ नहीं रहता है। बीज रूप में यही संस्कार रहता है।
इस जीवन में अगर वर्तमान में रहने का अभ्यास किया तो अन्दर उसमें संस्कार नहीं बनते। संस्कारों के अनुकूल ही वह जहां जहां देख लेते हैं कि वासनाओं की पूर्ति होनी सहायक होती है उस परिस्थिति में परिवार में जन्म हो जाता है।
प्रश्नर संस्कार मृत्यु के बाद कहां रह जाते है
उत्तरर कहां रह जाते हैं कुछ कहा नही जा सकता। यहा इस जीवन में कम से कम एक कमरा मकान गली शहर की कल्पना तो है। हमारी जितनी कल्पनाएं हैं शरीर के साथ हैं। मन के साथ हैं। इसके बाद कुछ नहीं। वह स्वप्न सब कहां चला जाता है। इसका भी अस्त्तिव तब तक है जब तक शरीर और मन है। यहां से जाने के बाद यह भी गायब हो जाएगा। बड़ी विचित्रता है। कहंा जाते हैं कोई वस्तु तो है नहीं।
परन्तु प्रकृति के द्वारा एक वह संस्कारों का बीज तो है जिसे प्रकृति ने पैदा किया है।एकोऽहं बहुस्यामि जैसे एक चीज से हजारों रूप हो जाते है। यह विलीन हो जाते है। नाटक करने से लिए अपने आप पैदा हो जाते हैं। वापिस चले जाते हैं। वैसे बीच के समय में यह संस्कार रूपी बीज नाटक करने के लिए उसमे ऐसे पड जाते हैंए जो सब नाटक अपने साथ करते जाते हैं बनते जाते है बिगड़ते जाते हैंए सार कुछ नहीं।
जीवात्मा का स्वरूप
मृत्यु के बाद वो जो निकल जाता हैए उसमें वासनाएं होती हैंए संस्कार उसका एक छोटा सा पुन्ज उसे जीवात्मा कहते है।
ये सब पैदा हुए हैं जब से सृष्टि उत्पन्न हुई है।एकोऽहं बहुस्याम स्वप्न में हम लेटते हैं। सोने के लिए अपन अकेले होेते हैं। और वहां भी वेदान्त कहता है इसमें आया है. स्वप्न क्यों पैदा होते हैं जब लेटा.लेटा व्यक्ति अपने आपको अकेला महसूस करता है तो वह घबड़ा जाता है। क्योंकि वह अकेले में रहने का आदी नहीं है। और जब भय से कि वह अकेला है यह भावना पैदा होती है तो बहुस्याम की भावना पैदा हो जाती है। उसमें स्वप्न सृष्टि पैदा हो जाती है।
जो स्वप्न सृष्टि बनने के लिए प्रक्रिया है। अनेक व्यक्ति नजर आने चाहिएए अपने आप आ जाते हैं इसी प्रकार यहां तो अलग.अलग संस्कार है। इच्छायें हैं जो पुनःवहां से निकल जाता है। क्योंकि वह अलग अलग जीवात्मा तो है ही वह जीवात्मा जिसमें जितनी अधिक शक्ति होगी। इसमें ऐसे भी बहुत से व्यक्ति होतेे हैं जो कड़ी साधना के बाद शरीर छोड़कर जाते हैं जिनको हमने विद्वान माना है उनका अपना प्रकाश रहता है तेज होता है पर यहां चाहे सौ में अट्ठानवें टका तरक्की करलोए एक दो भी कमी रह गई तो प्रकृति के लिए यह काफी है नीचे खींच देने के लिए। वह वापिस खींच लेती है।
वहां तो जो सौ टका हुआए वही पास हो सकता हैए पूरा ही पकना होता है। हां जो भी किया है उसका लाभ तो मिलेगा। परन्तु जब तक शुद्ध सोना नही है तब तक उसको चक्कर काटने पड़ेंगे। प्रकृति उसे हटाएगी। जब तक वह सौ टन्च सोना हो जायेगा। उसे अपने हर जन्म की तब स्मृति रहेगी।
समान स्वभाव वाले लोग इकट्ठे हो जाते हैं वहां भी ऐसा होता होगा। पहले इच्छा हुई थी जीवात्मा कहां रहती है तब दिखाए जैसे जुगनू होते हैंए पांच सात झुण्ड में बड़ा प्रकाश होता है। तरह तरह से वो इधर.उधर आते जाते हैं। दिखा कई बार कई दिनों तक दिखता रहा। इच्छा न रहते हुए भी दिखता रहा। पर मन वहां भी नहीं लगा। विचारधारा शुरू हो गई फिर मन ने कहा छोड़ो तो छूट गई। इसी प्रकार दिखाया। फिर नहीं दिखा। अब उसकी आवश्यकता ही नहीं रही। जिज्ञासा भी नहीं रही। जहां जो इच्छा होगीए जानने की वह भी एक संस्कार बना देगी। वह भी खतरनाक होगी। जितना बचा जाएए उतना ही अच्छा।
जीवनमुक्त अवस्था
साध्य इसीलिए यही है। जीवनमुक्त अवस्था में यही होता है कि हमे हमारे शरीर मे रहते हुए शरीर से अलग अनुभव करते हुए हमारी इन्द्रियां हमारे शरीर में किस प्रकार काम करती हैंए इसका निरीक्षण करना है। यह करना हमने प्रारम्भ कर दिया तो संस्कार उठना कम हो जाता है। लहरें उठने की क्रिया धीरे.धीरे कम होती जाती है। संस्कारों में वासनाएं उत्पन्न करने की क्षमता कम हो जाती है। ये जो लहरें उठती रहती हैं प्रति क्षण फिर ये प्रभावित नहीं करती। यही सार है।
Sunday, May 24, 2009
पूज्य स्वामीजी
पूज्य स्वामीजी से यह प्रसंग एक वात्र्ता के पूछा गया था,सवामीजी संस्ािठत धर्म के खिलाफ रहे, वे उपनिषद कालीन ऋषि की तरह सदा अधिक से अधिक मौन में रहते थे ,प्रश्न पूछने पर सवाल का उत्तर उनका उनकी अनुभव यात्रा से निकल कर आताथा।आज आध्यात्म की दुनिया में बहुत कुहासा है,”अन्तर्यात्रा“ से कुछ अंश हम आपके लिए देते रहेंगे ,आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेंगे।
नरेन्द्रनाथ
क्या छोड़ा क्या पाया ?
स्वामीजी कहा करते हैं कि मैंने आज तक किसी को अपना शिष्य नही बनाया, न ही कोई पंथ चलाया, न ही कोई गद्दी बनायी, न ही भण्डारा किया। लोग आते हैं, वे कहते हैं दुनियां से थक गये, दुख ही दुख, घर-बार छोड़ना चाहते हैं, कुछ छोड़ आये हैं, धर्म की शरण में जाना चाहते हैं। कुछ कहने हैं- वे हरिद्वार हो आये, तीर्थयात्रा कर आये। कुछ कहते हैं- संन्यास लेना चाहते हैं, उनको दीक्षा की जरूरत है। और जब मैं उन्हें कहता हूं कि छोड़ने की जरूरत नहीं है, जिसे छोड़ना है, वह तुम्हारे पास है, जो तुमसे चिपटा हुआ है। वह जब तुम चाहोगे, स्वतःछूट जाएगा। चाहना तुम्हारी है, छूटना उसको है तो वे निराश हो जाते है।
स्वामीजी कहा करते हैं कि बहुत पहले, जब उन्होंने सन्यास लिया था, और एक गुरूकुल शुरू किया था, तब लोग आते थे कहा करते थे, गांवों में हम तुम्हारा प्रचार करेंगे, लोगो के शिष्य बनने से तुम्हें जो आमदनी होगी आधा-आधा बांट लेंगे। स्वामीजी कहा करते हैं। न तो तब किसी को शिष्य बनाया और न अब। जब मैं किसी से कहता तो वे नाराज हो उठते थे। और यही सुनने में आता था, हम तुम्हारा विरोध करेंगे- और लोगों से कहेंगे, तुम कुछ नहीं जानते। तो यह सब ऐसे ही चलता रहता है।
छोड़ना क्या है, यह लोग समझ नहीं पाते हैं। जब मैं कहता हूं, अन्तर्मुखी हो जाओ, वर्तमान में रहने का अभ्यास करों। जो छूटना है, स्वतः छूट जायेगा। बाहर छोड़ने पकड़ने के चक्कर में मत पड़ो।
बाहर जो भी किया जा रहा है, हो रहा है- उसका भीतर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। कितने ही रंग के कपड़े पहन लो, घर छोड़कर जंगल में चले जाओ- माया तो भीतर है, वह कहां पीछा छोड़ेगी ? वह साथ ही तो चल रही है।
स्वामीजी ने कभी भी दमन को साधन नहीं बनाया। और यही कारण है कि जब भी कोई उन्हें मिलता है तो वह तथाकथित संन्यास धारण की परिधि मे उन्हें समझ नहीं पाता। दरअसल हजारों साल से धर्म के नाम पर जो अनुशासन सौपा गया, उसने मनुष्य को इतना जड़ बना दिया है कि वह सहज हो ही नहीं पाता। मनुष्य चेतना और पदार्थ का समवाय है। और शरीर जो प्राप्त हुआ है, उसकी स्वतन्त्रता अपने आप में कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है। इसीलिए जब मनुष्य के विकास की चर्चा होती है या दूसरी और मनुष्य के स्वरूप की खोज की जाती है तो जो चीज है-अपने सामने आती है, वह उसका शरीर ही है। बाहर और भीतर जो कुछ भी घट रहा है वह शरीर के धरातल पर ही है। बाहर की बाहृा घटनाओं की प्रतिक्रिया इन्द्रियों के माध्यम से भीतर पहुंचती है। और भीतर जो कुछ भी हो रहा है, वह इसी शरीर के माध्यम से बाहर व्यक्त होता है। इसीलिये भीतर तक पहुंचने के लिए वह माना गया कि शरीर को नियंत्रण में लेना आवश्यक है। दरअसल यह एक भ्रान्ति है। और जब तक इस भ्रान्ति को नहीं समझा जाए तब तक भीतर तक प्रवेश संभव नहीं होगा। प्रकृति का यह नियम है कि बाहृा में कितना भी बड़ा परिवर्तन किया जाये, वह तभी तक कारगर होगा, जब तक कि उस पर बल लगा हुआ है। ज्यों ही बल हटाया जायेगा, वह क्रिया अपने आप समाप्त हो जायेगी। यही कारण है कि बाहृा में जो परिवर्तन होता है और हम जिसे स्वभाव मान बैठते है। वह क्षणिक उत्तेजना पाकर ही टूट जाता है। यह स्थिति तथाकथित जो भी बाहृा अनुशासन को, दमन को इस साधना मार्ग पर जो आरोपित करते हैं, स्वीकार करते हैं, उनके साथ घटती रहती है।
प्रायः लोग चर्चा करते हैं और कहते हैं कि अगर मनुष्य अपने शरीर के प्रति जागरुक हो जाता है, सजग हो जाता है तो वह जान जाता है, इस शरीर के बारे में जो संवेग बिन्दु हैं, जहां पर कि शक्तियों के स्रोत हैं और जिनके माध्यम से वृत्तियां प्रकट होती हैं, और अगर हम यह जान पाये तो हम इन वृत्तियों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लेंगे और नाड़ी संस्थान पर प्रभुत्व स्थापित करने के बाद हम भीतर के आवेग, संवेग और व्यवहार पर नियंत्रण पाने में समर्थ हो जायेंगे। इस आधार पर यम, नियम, आसन और प्राणायाम की आधार शिला रखी गई हैं। यह जो विधि है, यह दमन की है। और यह मान लिया गया है कि दमन के द्वारा जो निषेध का मार्ग है, वह धार्मिक यंत्र में बहुत सहयोगी है। इसी आधार पर हजारांे साल से गृहस्थ की अपेक्षा संन्यास की स्थापना की गयी। और इसी रुप में धार्मिक यन्त्र के लिये सम्पूर्ण जगत को अस्वीकार किया गया, पर वास्तविकत्ता यह है कि हम यह नहीं मानते कि शरीर की जितनी निंदा की जाय, शरीर की जितनी चर्चा की जाय, शरीर रहेगा, और शरीर की अपने आप की सत्ता नही है, जो कुछ भी घटता है, वह भीतर घटता है। और जब तक भीतर की पहचान नही होगी, तब तक यह पता नही चलता कि बाहर क्यों सब कुछ घट रहा है। हम ये मान कर चलते हैं कि काया के नियंत्रण से चित्त वृत्तियों का शोधन हो जायेगा। यह मानते चले आ रहे हैं और हमारे शास्त्र भी यही कहते हैं। हजारों साल से हजारों आदमी यही कहते चलें आ रहे हैं, लेकिन शरीर के इस अत्यधिक नियंत्रण से जो प्राप्तव्य है, मन की शांति स्थिरता, सृजनशील मन जहां प्रसन्नता है, क्या वह प्राप्त हो सकता है ?
यह कहा जाता है कि जो नाड़ी संस्थान है, वह मन का अनुचर नही है। संवेग प्राप्त होकर नाड़ी संस्थान में प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है, और वहां मन कुछ कर नहीं पाता है, तब तक शरीर उत्तेजना में चला जाता है और वह सबकुछ घट जाता है, जो कि नहीं घटना चाहिए था। लेकिन अगर किसी संवेग को, किसी वृत्ति का निरीक्षण किया जाये और गहराई में जाकर स्पष्ट रूप से पाया जाय तो वहां ऐसा कुछ नही है।
स्वामीजी कहा करते हैं कि प्रकृति के द्वारा उठने वाली लहरें नाभि से गति लेकर जहां चित्त है, वहां ये निरन्तर धक्का दे रही है और यह स्पंदन चित्त पर आकर अधिक स्थूल रूप धारण कर लेता है, यही विचार का जन्म है। और ये लहरें ऊपर उठकर स्नायुओं द्वारा शरीर में व्याप्त हो जाती हैं, और शरीर बाहृा व्यवहार कर उठता है। जब तक उठने वाली लहर का जागरूक अवलोकन न हो, एक अवांछनीय सजगता न हो, तब तक व्यवहार के कारण की अन्वीक्षा नही हो सकती।
इसीलिये इस मार्ग पर जहां से प्रारम्भ होता है, वह बाहर नही भीतर की ओर जाना है। स्वामीजी कहा करते है कि अन्तर्मुखी हो जाओ, जो छूटना है, स्वतः छूट जायेगा, तो छोड़ने और पकड़ने की रूचि नहीं रहे।
लोग कहते हैं कि मै तो खामोश बैठा था, कुछ कहना भी नहीं चाहता था, पर ऐसा कुछ हुआ, ऐसा शब्द आया कि मैं अपने वश में नहीं रहा और क्रोध में जो कुछ मैं नहीं कहना चाहता था, वह सब निकल गया। अघटित, घटित हो गया। यहीं आकर कहा जाता है कि मन का वाणी पर कोई नियंत्रण है तो ऐसा नहीं कहा जाता। लेकिन यह बात गहराई से सोचें और वह जो प्रक्रिया देह पर घटी है, वाक यन्त्र पर घटी है, यहीं से प्रारम्भ करें और भीतर की ओर चलें, डुबकी लगायें संवेग के साथ तो पता चलता है न अच्छा, न बुरा, मात्र साक्षी ध्यान को पायेंगे, उस क्षण एक धक्का सा लगेगा। एक लहर सी आयी और समाप्त हो गयी थी। यह लहर अहर्निश आ रही है और मन इन लहरों पर तैरते हुए तिनको की तरह है। और जब साक्षी ध्यान बढ़ जाता है तो अचानक वह घट जाता है, जो अकल्पनीय है। जो छूटना था, वह तो स्वतः छूट जाता है, यह पता भी नहीं चलता कि कब छूट गया। इसीलिये छोड़ने और छूटने की अधिक चिन्ता यहां नहीं करनी है। बस करना, इतना ही है, जो भीतर का सागर है, वहीं बस, एक डुबकी लगानी है। अपने आपको बस छोड़ देना है। बिना किसी सहारे के, बिना किसी आलम्बन के, बिना किसी आश्रय के, चेतना सागर में लगायी हुई एक डुबकीवह सब छुड़ा देती है, जिसे छुड़ाना है।
नरेन्द्रनाथ
क्या छोड़ा क्या पाया ?
स्वामीजी कहा करते हैं कि मैंने आज तक किसी को अपना शिष्य नही बनाया, न ही कोई पंथ चलाया, न ही कोई गद्दी बनायी, न ही भण्डारा किया। लोग आते हैं, वे कहते हैं दुनियां से थक गये, दुख ही दुख, घर-बार छोड़ना चाहते हैं, कुछ छोड़ आये हैं, धर्म की शरण में जाना चाहते हैं। कुछ कहने हैं- वे हरिद्वार हो आये, तीर्थयात्रा कर आये। कुछ कहते हैं- संन्यास लेना चाहते हैं, उनको दीक्षा की जरूरत है। और जब मैं उन्हें कहता हूं कि छोड़ने की जरूरत नहीं है, जिसे छोड़ना है, वह तुम्हारे पास है, जो तुमसे चिपटा हुआ है। वह जब तुम चाहोगे, स्वतःछूट जाएगा। चाहना तुम्हारी है, छूटना उसको है तो वे निराश हो जाते है।
स्वामीजी कहा करते हैं कि बहुत पहले, जब उन्होंने सन्यास लिया था, और एक गुरूकुल शुरू किया था, तब लोग आते थे कहा करते थे, गांवों में हम तुम्हारा प्रचार करेंगे, लोगो के शिष्य बनने से तुम्हें जो आमदनी होगी आधा-आधा बांट लेंगे। स्वामीजी कहा करते हैं। न तो तब किसी को शिष्य बनाया और न अब। जब मैं किसी से कहता तो वे नाराज हो उठते थे। और यही सुनने में आता था, हम तुम्हारा विरोध करेंगे- और लोगों से कहेंगे, तुम कुछ नहीं जानते। तो यह सब ऐसे ही चलता रहता है।
छोड़ना क्या है, यह लोग समझ नहीं पाते हैं। जब मैं कहता हूं, अन्तर्मुखी हो जाओ, वर्तमान में रहने का अभ्यास करों। जो छूटना है, स्वतः छूट जायेगा। बाहर छोड़ने पकड़ने के चक्कर में मत पड़ो।
बाहर जो भी किया जा रहा है, हो रहा है- उसका भीतर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। कितने ही रंग के कपड़े पहन लो, घर छोड़कर जंगल में चले जाओ- माया तो भीतर है, वह कहां पीछा छोड़ेगी ? वह साथ ही तो चल रही है।
स्वामीजी ने कभी भी दमन को साधन नहीं बनाया। और यही कारण है कि जब भी कोई उन्हें मिलता है तो वह तथाकथित संन्यास धारण की परिधि मे उन्हें समझ नहीं पाता। दरअसल हजारों साल से धर्म के नाम पर जो अनुशासन सौपा गया, उसने मनुष्य को इतना जड़ बना दिया है कि वह सहज हो ही नहीं पाता। मनुष्य चेतना और पदार्थ का समवाय है। और शरीर जो प्राप्त हुआ है, उसकी स्वतन्त्रता अपने आप में कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है। इसीलिए जब मनुष्य के विकास की चर्चा होती है या दूसरी और मनुष्य के स्वरूप की खोज की जाती है तो जो चीज है-अपने सामने आती है, वह उसका शरीर ही है। बाहर और भीतर जो कुछ भी घट रहा है वह शरीर के धरातल पर ही है। बाहर की बाहृा घटनाओं की प्रतिक्रिया इन्द्रियों के माध्यम से भीतर पहुंचती है। और भीतर जो कुछ भी हो रहा है, वह इसी शरीर के माध्यम से बाहर व्यक्त होता है। इसीलिये भीतर तक पहुंचने के लिए वह माना गया कि शरीर को नियंत्रण में लेना आवश्यक है। दरअसल यह एक भ्रान्ति है। और जब तक इस भ्रान्ति को नहीं समझा जाए तब तक भीतर तक प्रवेश संभव नहीं होगा। प्रकृति का यह नियम है कि बाहृा में कितना भी बड़ा परिवर्तन किया जाये, वह तभी तक कारगर होगा, जब तक कि उस पर बल लगा हुआ है। ज्यों ही बल हटाया जायेगा, वह क्रिया अपने आप समाप्त हो जायेगी। यही कारण है कि बाहृा में जो परिवर्तन होता है और हम जिसे स्वभाव मान बैठते है। वह क्षणिक उत्तेजना पाकर ही टूट जाता है। यह स्थिति तथाकथित जो भी बाहृा अनुशासन को, दमन को इस साधना मार्ग पर जो आरोपित करते हैं, स्वीकार करते हैं, उनके साथ घटती रहती है।
प्रायः लोग चर्चा करते हैं और कहते हैं कि अगर मनुष्य अपने शरीर के प्रति जागरुक हो जाता है, सजग हो जाता है तो वह जान जाता है, इस शरीर के बारे में जो संवेग बिन्दु हैं, जहां पर कि शक्तियों के स्रोत हैं और जिनके माध्यम से वृत्तियां प्रकट होती हैं, और अगर हम यह जान पाये तो हम इन वृत्तियों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लेंगे और नाड़ी संस्थान पर प्रभुत्व स्थापित करने के बाद हम भीतर के आवेग, संवेग और व्यवहार पर नियंत्रण पाने में समर्थ हो जायेंगे। इस आधार पर यम, नियम, आसन और प्राणायाम की आधार शिला रखी गई हैं। यह जो विधि है, यह दमन की है। और यह मान लिया गया है कि दमन के द्वारा जो निषेध का मार्ग है, वह धार्मिक यंत्र में बहुत सहयोगी है। इसी आधार पर हजारांे साल से गृहस्थ की अपेक्षा संन्यास की स्थापना की गयी। और इसी रुप में धार्मिक यन्त्र के लिये सम्पूर्ण जगत को अस्वीकार किया गया, पर वास्तविकत्ता यह है कि हम यह नहीं मानते कि शरीर की जितनी निंदा की जाय, शरीर की जितनी चर्चा की जाय, शरीर रहेगा, और शरीर की अपने आप की सत्ता नही है, जो कुछ भी घटता है, वह भीतर घटता है। और जब तक भीतर की पहचान नही होगी, तब तक यह पता नही चलता कि बाहर क्यों सब कुछ घट रहा है। हम ये मान कर चलते हैं कि काया के नियंत्रण से चित्त वृत्तियों का शोधन हो जायेगा। यह मानते चले आ रहे हैं और हमारे शास्त्र भी यही कहते हैं। हजारों साल से हजारों आदमी यही कहते चलें आ रहे हैं, लेकिन शरीर के इस अत्यधिक नियंत्रण से जो प्राप्तव्य है, मन की शांति स्थिरता, सृजनशील मन जहां प्रसन्नता है, क्या वह प्राप्त हो सकता है ?
यह कहा जाता है कि जो नाड़ी संस्थान है, वह मन का अनुचर नही है। संवेग प्राप्त होकर नाड़ी संस्थान में प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है, और वहां मन कुछ कर नहीं पाता है, तब तक शरीर उत्तेजना में चला जाता है और वह सबकुछ घट जाता है, जो कि नहीं घटना चाहिए था। लेकिन अगर किसी संवेग को, किसी वृत्ति का निरीक्षण किया जाये और गहराई में जाकर स्पष्ट रूप से पाया जाय तो वहां ऐसा कुछ नही है।
स्वामीजी कहा करते हैं कि प्रकृति के द्वारा उठने वाली लहरें नाभि से गति लेकर जहां चित्त है, वहां ये निरन्तर धक्का दे रही है और यह स्पंदन चित्त पर आकर अधिक स्थूल रूप धारण कर लेता है, यही विचार का जन्म है। और ये लहरें ऊपर उठकर स्नायुओं द्वारा शरीर में व्याप्त हो जाती हैं, और शरीर बाहृा व्यवहार कर उठता है। जब तक उठने वाली लहर का जागरूक अवलोकन न हो, एक अवांछनीय सजगता न हो, तब तक व्यवहार के कारण की अन्वीक्षा नही हो सकती।
इसीलिये इस मार्ग पर जहां से प्रारम्भ होता है, वह बाहर नही भीतर की ओर जाना है। स्वामीजी कहा करते है कि अन्तर्मुखी हो जाओ, जो छूटना है, स्वतः छूट जायेगा, तो छोड़ने और पकड़ने की रूचि नहीं रहे।
लोग कहते हैं कि मै तो खामोश बैठा था, कुछ कहना भी नहीं चाहता था, पर ऐसा कुछ हुआ, ऐसा शब्द आया कि मैं अपने वश में नहीं रहा और क्रोध में जो कुछ मैं नहीं कहना चाहता था, वह सब निकल गया। अघटित, घटित हो गया। यहीं आकर कहा जाता है कि मन का वाणी पर कोई नियंत्रण है तो ऐसा नहीं कहा जाता। लेकिन यह बात गहराई से सोचें और वह जो प्रक्रिया देह पर घटी है, वाक यन्त्र पर घटी है, यहीं से प्रारम्भ करें और भीतर की ओर चलें, डुबकी लगायें संवेग के साथ तो पता चलता है न अच्छा, न बुरा, मात्र साक्षी ध्यान को पायेंगे, उस क्षण एक धक्का सा लगेगा। एक लहर सी आयी और समाप्त हो गयी थी। यह लहर अहर्निश आ रही है और मन इन लहरों पर तैरते हुए तिनको की तरह है। और जब साक्षी ध्यान बढ़ जाता है तो अचानक वह घट जाता है, जो अकल्पनीय है। जो छूटना था, वह तो स्वतः छूट जाता है, यह पता भी नहीं चलता कि कब छूट गया। इसीलिये छोड़ने और छूटने की अधिक चिन्ता यहां नहीं करनी है। बस करना, इतना ही है, जो भीतर का सागर है, वहीं बस, एक डुबकी लगानी है। अपने आपको बस छोड़ देना है। बिना किसी सहारे के, बिना किसी आलम्बन के, बिना किसी आश्रय के, चेतना सागर में लगायी हुई एक डुबकीवह सब छुड़ा देती है, जिसे छुड़ाना है।
Sunday, May 3, 2009
सार्थकता की खोज
मित्रां ेने प्रश्न पूछा है,वर्र्तमान में कैसे रहा जाए? मन तो निरन्तर या तो स्मृति में या किसी कल्पना में रहता है। अनावश्यक विचारणा उसका स्वभाव है।विचारणा उठती रहती है निरन्तर स्मृति के सहयोग से।और स्मृति सघन होती रहती है अवधारणा का सहयोग पाकर , हम हमेशा इसी प्रवाह में रहते हैं।हमारा स्वभाव है अगर हमने किसी के प्रति अपनी राय नहीं रखी तो हम विचारक नहीं हैं।
पर क्या हमारी अपने बारे में यह राय उचित है?इसी बात पर आज यहाँ विचार किया गया है।
सार्थकता की खोज
कल रात हम लौट रहे थे, यही सवाल बार-बार उठ रहा था कि जीवन का उद्देश्य क्या है, आखिर हम पैदा ही क्यों हुए हैं ? जब जगत ही असार है, फिर इस जगत के साथ हमारा संबंध क्या है ?
स्वामीजी से जब चर्चा में यह सवाल उठा, वे यही कहते हैं कि वर्तमान में रहो, उत्तर स्चयं तुम्हारे पास आ जायेगा। पर व्यवहार में कैसे रहा जाए। और जीवन की सार्थकता को किस प्रकार पाया जाए, प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाते हैं।
उस दिन चर्चा में वे बोले- जो भी व्यक्ति तुम्हारे पास आता है, उसके प्रति किसी प्रकार की दुर्भावना मत रखो, कोई प्रतिबद्धता नही। कोई पूर्वाग्रह नहीं। यही त्याग है। जो भी दुराग्रह है, बनी बनायी धारणा है, उसको छोड़ देना ही त्याग है। वह बुराई उसमें नहीं है। तुम अपने भीतर की बुराई को उस पर प्रक्षेपित कर रहे हो। तुम अपने भीतर का गंदलापन उसके अन्तर्जगत पर फैक रहे हो। शांत हो जाओ। निश्छल मन से स्वागत करो। यही त्याग है।
छोड़ना और छूटना यहां नहीं है। यही छूटना है। बाहृा में जो कुछ भी परिवर्तन होगा, वह अर्थहीन है। जब बल समाप्त होगा, फिरकनी फिर रूक जाएगी। उससे भीतर बदलाव नहीं आता। वह भीतर से नहीं जुड़ता। कुछ किया जाना हो, कुछ होना भी हो, तो वह भीतर से ही होगा।
अतः जब भी कोई व्यक्ति सामने आए....परिस्थिति सामने आए उसके बारे में कभी पूर्व धारणा मत रखो। पूर्व में धारणा का आधार स्मृति है और स्मृति ही पाप है। बार बार विषयों के चिन्तन से वासना, स्मृति-रुप धारण कर लेती है। और फिर स्मृति जब भी किसी की उपस्थिति होती है, अवधारणा प्रस्तुत करती हे। हमारा सारा व्यवहार उसी धारणा के आधार पर होता है। यही जीवन की जटिलता है।
हम अपने भीतर इतना कचरा समेटे हुए हैं कि वह चाहते हुए भी नहीं छूटता। हम वर्तमान में रहना ही नहीं जानते। चाहते भी नही हैं। हमारा सारा कार्य, व्यवहार स्मृति से परिचालित है। यही तनाव का कारण है। यही विक्षोभ का कारण है। व्यक्ति को हम, व्यक्ति रूप में नहीं, स्त्री हरिजन, मुसलमान महाजन, अफसर नाना रूपों में देखते हैं। हर रंग, रुप,व्यवसाय जाति के प्रति हमारे पास अपनी धारणाएं है। हम उन्हीं सांचो में उसे देखते हैं, रखते हैं, और खुद समस्या खड़ी करते हैं।
स्वामीजी कहा करते है, ‘हम अपने तटस्थ भाव से, साक्षी भाव से जीने का प्रयास ही नहीं करते हैं।’
साक्षी भाव ‘होने’ की कला है।
आप अन्तःकरण की पवित्रता चाहते हैं। जीवन में निर्मलता चाहते हैं, पवित्रता चाहते हैं, शांति चाहते हैं। पर अपनी बनी, बनायी अवधारणाओं को छोड़ नहीं पाते।
अगर छोड़ना ही है तो इस अवधारणा को छोड़ना होगा जिसने हमें रुग्ण मानसिकता दी है।
यही त्याग है।
तब वह व्यक्ति, वह परिस्थिति अपने सहज रूप में सामने आएगी। वह वर्तमान में उपस्थिति देगी, और अपने आपको भी वर्तमान में रहने में सहायता देगी।
चित्त की सरलता सहज ही प्राप्त हो जाएगी। अन्तःकरण में पवित्रता प्राप्त होती जाएगी।
त्याग वस्तु का नही है। न ही वस्त्र का। न ही भोजन का। न ही स्त्री, सन्तान, घर द्वार का है।
जिसने छोड़ा उसने क्या पाया है ?
धर्म की, कर्मकाण्ड की यही जटिलता है। वह उलझा अधिक रहा है। वह छोड़ने पर अधिक बल देता है। छूटने पर कम।
जो बलात छोड़ा जाता है, क्या वह छूट पाता है ?
बार-बार लौट-लौट कर आता है।
बहुत पुरानी कहानी स्वामी सुनाया करते हैं-
राजा जनक के दरबार में ऋषि आत्म-ज्ञान की चर्चा करने गए थे। चर्चा चल रही थी। तभी सेवक ने आकर कहा- नगर के पश्चिमी छोर पर आग लग गई है। चर्चा चलती रही। जनक ने आग बुझाने का आदेश दिया। कुछ देर बाद फिर सूचना आई-आग आगे बढ़ती जा रही है। काबू में नहीं आ रही है। जनक आदेश भिजवाते रहे। तभी सूचना आई- आग अतिथिशाला तक आ पहुंची है। तभी ऋषि विचलित हुए, उठने लगे। जनक ने पूछा- क्यों ? बोले ”कमण्डल वहीं रह गया है।” जनक बोले मेरा तो राज्य जा रहा है, आपको अपने कमण्डल की पड़ी है।
ऋषि, जो संसार छोड़ आए थे, कमण्डल नहीं छोड़ पाए।
स्वामीजी कई बार कहते हैं, उनसे लोगों ने पूछा शराब छोड़ दें, सिगरेट छोड़ दें, मांसाहार छोड़ दें, आदि-आदि। तब उनका उत्तर यही रहता है, तुम अपना काम करते रहो, जिसे छूटना है वह अपने आप छूट जाएगा।
तुम्हारा काम अन्तर्मुखी होकर मन की निश्चलता को प्राप्त करना है, अन्तर्मन को जीवन का कार्य व्यवहार सौंप देना है। वर्तमान में जीना सीखो। स्वभाव स्मृति में हैं, आदत स्मृति में है, वर्तमान में रहने का अभ्यास होते ही स्वतः छूट जाएगी, पेड़ के पत्ते कब गिरते हैं, उसे अहसास भी नहीं होता, जिसे छूटना है, वह छूट जाएगा, कुछ पता भी नहीं चलेगा।
क्रिया साक्षी-भाव है। जो व्यक्ति उपस्थित हुआ है। परमात्मा ने ही उसे तुम्हारे पास भेजा है। कल वह क्या था, कोई मतलब नही। कल उसने क्या किया था याद रखना व्यर्थ है। आज अभी जब वह आया है, साक्षी भाव से साक्षात्कार करो, तुम खुद पाओगे, वह तुम्हें बदला हुआ मिलेगा। वह ही तुम्हें वर्तमान में रहना सिखला पाएगा।
यही त्याग है।
त्याग सेवा सौंप जाता है।
सेवा की नहीं जाती, हो जाती है। यह मनोदशा प्राप्त होते ही-जो शरीर का कार्य है, वह सेवा कहलाती है।
सभी सेवा की चर्चा करते हैं। तथाकथित सेवा अंहकार ही सोंपती है। मन को जटिलता देती है। साक्षी भाव मे देह का कृत्य ही सेवामय हो जाता है। शरीर का कर्म ही सेवामय हो जाना, साधना का रहस्य है। प्रतिफल है।
और तब जीवन में जग उठता है प्रेम। मन में त्याग, शरीर सेवामय, सम्पूर्ण जीवन प्रेममय हो जाता है। यह सिद्धि है, यही निर्वाण है, यही मोक्ष है। यही साक्षात्कार है। प्रेम दूसरे को खींचता है। यहां आकर्षण है। वह आकर्षित करता है। पर अब यह जान लिया जाता है कि दुरूपयोग नहीं करना है, वरन दूसरे के मनोजगत में यही भाव उपस्थित करने का प्रयास करना है। आकर्षण जो ग्रह नक्षत्रों में था, वह शरीर में आ जाता है। यहां लोहा सोना नहीं होता, वरन पारस दूसरे को पारस बनाने लग जाता है। जो खुद जागता है, दूसरे को जगाता है।
स्वामीजी कहते हैं- दूसरे के चित्त मंे यही मनोभाव जागृत स्वतः होने लग जाते हैं, वसुधैव कुटुम्बकम ओढ़ा नहीं जाता, पाया जाता है, हुआ जाता है। यही मानव धर्म है।
यही जीवन की सार्थकता है।
नरेन्द नाथ
पर क्या हमारी अपने बारे में यह राय उचित है?इसी बात पर आज यहाँ विचार किया गया है।
सार्थकता की खोज
कल रात हम लौट रहे थे, यही सवाल बार-बार उठ रहा था कि जीवन का उद्देश्य क्या है, आखिर हम पैदा ही क्यों हुए हैं ? जब जगत ही असार है, फिर इस जगत के साथ हमारा संबंध क्या है ?
स्वामीजी से जब चर्चा में यह सवाल उठा, वे यही कहते हैं कि वर्तमान में रहो, उत्तर स्चयं तुम्हारे पास आ जायेगा। पर व्यवहार में कैसे रहा जाए। और जीवन की सार्थकता को किस प्रकार पाया जाए, प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाते हैं।
उस दिन चर्चा में वे बोले- जो भी व्यक्ति तुम्हारे पास आता है, उसके प्रति किसी प्रकार की दुर्भावना मत रखो, कोई प्रतिबद्धता नही। कोई पूर्वाग्रह नहीं। यही त्याग है। जो भी दुराग्रह है, बनी बनायी धारणा है, उसको छोड़ देना ही त्याग है। वह बुराई उसमें नहीं है। तुम अपने भीतर की बुराई को उस पर प्रक्षेपित कर रहे हो। तुम अपने भीतर का गंदलापन उसके अन्तर्जगत पर फैक रहे हो। शांत हो जाओ। निश्छल मन से स्वागत करो। यही त्याग है।
छोड़ना और छूटना यहां नहीं है। यही छूटना है। बाहृा में जो कुछ भी परिवर्तन होगा, वह अर्थहीन है। जब बल समाप्त होगा, फिरकनी फिर रूक जाएगी। उससे भीतर बदलाव नहीं आता। वह भीतर से नहीं जुड़ता। कुछ किया जाना हो, कुछ होना भी हो, तो वह भीतर से ही होगा।
अतः जब भी कोई व्यक्ति सामने आए....परिस्थिति सामने आए उसके बारे में कभी पूर्व धारणा मत रखो। पूर्व में धारणा का आधार स्मृति है और स्मृति ही पाप है। बार बार विषयों के चिन्तन से वासना, स्मृति-रुप धारण कर लेती है। और फिर स्मृति जब भी किसी की उपस्थिति होती है, अवधारणा प्रस्तुत करती हे। हमारा सारा व्यवहार उसी धारणा के आधार पर होता है। यही जीवन की जटिलता है।
हम अपने भीतर इतना कचरा समेटे हुए हैं कि वह चाहते हुए भी नहीं छूटता। हम वर्तमान में रहना ही नहीं जानते। चाहते भी नही हैं। हमारा सारा कार्य, व्यवहार स्मृति से परिचालित है। यही तनाव का कारण है। यही विक्षोभ का कारण है। व्यक्ति को हम, व्यक्ति रूप में नहीं, स्त्री हरिजन, मुसलमान महाजन, अफसर नाना रूपों में देखते हैं। हर रंग, रुप,व्यवसाय जाति के प्रति हमारे पास अपनी धारणाएं है। हम उन्हीं सांचो में उसे देखते हैं, रखते हैं, और खुद समस्या खड़ी करते हैं।
स्वामीजी कहा करते है, ‘हम अपने तटस्थ भाव से, साक्षी भाव से जीने का प्रयास ही नहीं करते हैं।’
साक्षी भाव ‘होने’ की कला है।
आप अन्तःकरण की पवित्रता चाहते हैं। जीवन में निर्मलता चाहते हैं, पवित्रता चाहते हैं, शांति चाहते हैं। पर अपनी बनी, बनायी अवधारणाओं को छोड़ नहीं पाते।
अगर छोड़ना ही है तो इस अवधारणा को छोड़ना होगा जिसने हमें रुग्ण मानसिकता दी है।
यही त्याग है।
तब वह व्यक्ति, वह परिस्थिति अपने सहज रूप में सामने आएगी। वह वर्तमान में उपस्थिति देगी, और अपने आपको भी वर्तमान में रहने में सहायता देगी।
चित्त की सरलता सहज ही प्राप्त हो जाएगी। अन्तःकरण में पवित्रता प्राप्त होती जाएगी।
त्याग वस्तु का नही है। न ही वस्त्र का। न ही भोजन का। न ही स्त्री, सन्तान, घर द्वार का है।
जिसने छोड़ा उसने क्या पाया है ?
धर्म की, कर्मकाण्ड की यही जटिलता है। वह उलझा अधिक रहा है। वह छोड़ने पर अधिक बल देता है। छूटने पर कम।
जो बलात छोड़ा जाता है, क्या वह छूट पाता है ?
बार-बार लौट-लौट कर आता है।
बहुत पुरानी कहानी स्वामी सुनाया करते हैं-
राजा जनक के दरबार में ऋषि आत्म-ज्ञान की चर्चा करने गए थे। चर्चा चल रही थी। तभी सेवक ने आकर कहा- नगर के पश्चिमी छोर पर आग लग गई है। चर्चा चलती रही। जनक ने आग बुझाने का आदेश दिया। कुछ देर बाद फिर सूचना आई-आग आगे बढ़ती जा रही है। काबू में नहीं आ रही है। जनक आदेश भिजवाते रहे। तभी सूचना आई- आग अतिथिशाला तक आ पहुंची है। तभी ऋषि विचलित हुए, उठने लगे। जनक ने पूछा- क्यों ? बोले ”कमण्डल वहीं रह गया है।” जनक बोले मेरा तो राज्य जा रहा है, आपको अपने कमण्डल की पड़ी है।
ऋषि, जो संसार छोड़ आए थे, कमण्डल नहीं छोड़ पाए।
स्वामीजी कई बार कहते हैं, उनसे लोगों ने पूछा शराब छोड़ दें, सिगरेट छोड़ दें, मांसाहार छोड़ दें, आदि-आदि। तब उनका उत्तर यही रहता है, तुम अपना काम करते रहो, जिसे छूटना है वह अपने आप छूट जाएगा।
तुम्हारा काम अन्तर्मुखी होकर मन की निश्चलता को प्राप्त करना है, अन्तर्मन को जीवन का कार्य व्यवहार सौंप देना है। वर्तमान में जीना सीखो। स्वभाव स्मृति में हैं, आदत स्मृति में है, वर्तमान में रहने का अभ्यास होते ही स्वतः छूट जाएगी, पेड़ के पत्ते कब गिरते हैं, उसे अहसास भी नहीं होता, जिसे छूटना है, वह छूट जाएगा, कुछ पता भी नहीं चलेगा।
क्रिया साक्षी-भाव है। जो व्यक्ति उपस्थित हुआ है। परमात्मा ने ही उसे तुम्हारे पास भेजा है। कल वह क्या था, कोई मतलब नही। कल उसने क्या किया था याद रखना व्यर्थ है। आज अभी जब वह आया है, साक्षी भाव से साक्षात्कार करो, तुम खुद पाओगे, वह तुम्हें बदला हुआ मिलेगा। वह ही तुम्हें वर्तमान में रहना सिखला पाएगा।
यही त्याग है।
त्याग सेवा सौंप जाता है।
सेवा की नहीं जाती, हो जाती है। यह मनोदशा प्राप्त होते ही-जो शरीर का कार्य है, वह सेवा कहलाती है।
सभी सेवा की चर्चा करते हैं। तथाकथित सेवा अंहकार ही सोंपती है। मन को जटिलता देती है। साक्षी भाव मे देह का कृत्य ही सेवामय हो जाता है। शरीर का कर्म ही सेवामय हो जाना, साधना का रहस्य है। प्रतिफल है।
और तब जीवन में जग उठता है प्रेम। मन में त्याग, शरीर सेवामय, सम्पूर्ण जीवन प्रेममय हो जाता है। यह सिद्धि है, यही निर्वाण है, यही मोक्ष है। यही साक्षात्कार है। प्रेम दूसरे को खींचता है। यहां आकर्षण है। वह आकर्षित करता है। पर अब यह जान लिया जाता है कि दुरूपयोग नहीं करना है, वरन दूसरे के मनोजगत में यही भाव उपस्थित करने का प्रयास करना है। आकर्षण जो ग्रह नक्षत्रों में था, वह शरीर में आ जाता है। यहां लोहा सोना नहीं होता, वरन पारस दूसरे को पारस बनाने लग जाता है। जो खुद जागता है, दूसरे को जगाता है।
स्वामीजी कहते हैं- दूसरे के चित्त मंे यही मनोभाव जागृत स्वतः होने लग जाते हैं, वसुधैव कुटुम्बकम ओढ़ा नहीं जाता, पाया जाता है, हुआ जाता है। यही मानव धर्म है।
यही जीवन की सार्थकता है।
नरेन्द नाथ
Saturday, May 2, 2009
पूज्य स्वामीजी
पूज्य स्वामीजी की वात्र्ताओं के क्रम में यह लेखमाला की तीसरी कड़ी यहाँ दी जारही है।आप इस संदर्भ में अपनी प्रतिक्रिया अवश्य भेजें।यहाँ मनुष्य की उसके स्वयं से जुड़ने की तथा उसकी अन्तर्यात्रा की पहचान ही संकल्पित है।
साधन सन्दर्भ
स्वामीजी से प्रायः जिज्ञासु जब भी मिलते हैं, वे क्या करें ? यही पूछते रहते हैं। वे साधना की ओर किस तरह बढ़ें, यही जिज्ञासा रहती है।
स्वामीजी कहा करते है-
”साधक के लिए आत्मनिरीक्षण ही साधन है। साधक को चाहिए कि वह अपनी आंतरिक्ता में विचरण करे। मनोजगत में पैठ करे। आप वहीं पहुंचेंगे, जहां से विचार चले आ रहे हैं। एक गहरी सतर्कता के साथ की गई आंतरिकता में निगरानी मन को क्रमशः निष्क्रियता प्रदान करती है। मन से, मन की जब निगरानी की जाती है, तब वह जल्दी ही थक जाता है। और एक खालीपन निष्क्रियता प्राप्त होती है। परन्तु यहां पर किसी ओर अन्य प्रकार के परिवर्तन की आकांक्षा नहीं होनी चाहिए। हम गुण और दोष को ही जीवन मान बैठे हैं। जीवन जो है, जिस रूप में है। उसके मूल रूप को जान ही नहीं पाते।”
प्रायः आत्मनिरीक्षण के साथ ही परिवर्तन की ललक रहती है। अरे मुझमें यह दोष है...यह मुझे दूर करना है, तभी गुण का स्वरूप सामने आ जाता है, मुझे तो यह होना चाहिए, आखिर यह भी तो संकल्प यात्रा ही है। जब तक गुण शेष है, तभी तक दोष की सत्ता भी विद्यमान है। राग द्वेष की समाप्ति ही सही वैराग्य है। हमें और कुछ नया नहीं करना- बस, इसी तकनीक को समझना है कि यहां कुछ होने के लिए आत्मनिरीक्षण नही करना है। बाहृा से लाकर कुछ आरोपित नहीं करना है, जो है उसका सतर्कतापूर्वक अवलोकन ही साधन है। यहां किसी प्रकार का कोई ंसंकल्प नही है, रूपान्तरण की चाहत भी नहीं है तभी तो ‘जो’ है वह उसी रूप में अभिव्यक्त हो सकता है। जब ध्यान में रुपान्तरण की क्रिया शुरू हो जाती है। तभी तनाव शुरू होता है। एक द्वन्द यह ध्यान नहीं है। इसीलिए आवश्यक है, आत्मनिरीक्षण की नौका पर मात्र लहरें ही देखना है, गिनना नही है। पानी के गंदलेपन को देखकर अस्वीकृति की भावना नही, जो है, उसे ही साक्षी भाव से देखना है, यह नाव चलती रहे, तभी यह अन्तर्यात्रा संभव है। यहां निसंकल्प अवलोकन ही सार्थक ध्यान है। आंतरिक विचारणा का अवलोकन ही यह हमें प्रदान करता है।
इसलिए आवश्यक है कि काल के इस अमूल्य क्षण में मन अत्यधिक संवेदनशील हो, और यह तभी संभव है कि विचारणा ही नही रहे। जिस क्षण यह अनुभवन है, अनुभव और अनुभव-कर्ता की पृथकता समाप्त हो जाती है। पर होता क्या है, अनुभव क्षणिक रहता है। फिर आती है स्मृति जो सार्थक क्षण का विश्लेषण करती है। अनुभव और अनुभव कर्ता पृथक हो जाते हैं। इसलिए हम पाते है, हम अधिकांशतः अनुभव से बाहर ही रहते हैं। अनुभव के लिए आवश्यक है, इस क्षण विचारणा अनुपस्थित रहे, भूत और भविष्य में मन का संक्रमण न रहे, रहे मात्र वर्तमान और तभी प्राप्त होती है, निसंकल्पता, एक गहरा मौन, यही तो हमारा ध्येय है।
ध्यान-योेग हर क्षण के अनुभव में रूपांतरित होने की वह कला है जिसके द्वारा जगत भागवत-भाव की प्राप्ति होती है, वहीं जीवन भागवत-कर्म से युक्त हो जाता है। ज्यों-ज्यों अनुभवन बढ़ता है, जीवन की सार्थकता उपलब्ध होती जाती है।
यह स्थिति जीवन से पलायन नही है, निठल्लापन नही है, वहां है- सर्वाधिक गत्यात्मकता, खुला विक्षोभहीन जीवन क्या यही हम नहीं चाहते हैं?
यह सच है, यहां तक साधारण साधक के लिए पहुंचना सरल नही है। अतः अभ्यास आवश्यक है। शास्त्रों ने इसीलिए भगवत इच्छा का आदर किया है। भगवत इच्छा ही प्राणी की भोगेच्छा को समाप्त कर देती है। और अन्त में जाकर यह भी परमात्मा में विलीन हो जाती है। अतः प्रयत्न यहां निन्दनीय नहीं है। सच तो यह है कि प्रयत्न ही यही है।
इसलिए साधक को अभ्यास का आदर करना चाहिए, उन विचारों को, जो किसी काम के नही है, उन्हें तो न आने दें। बिना काम के विचार वे ही हैं, जो कभी वर्तमान में नही रहने देते। हमेशा मन को भूत और भविष्य में ले जाते हैं। यही तो चिन्ता है जो कि चित्त भी है।
इसीलिए आवश्यक है कि गहरी सतर्कता रहे। यह सतर्कता और कहीं नहीं, अन्तर्जगत में हमेशा रहे। याद रखिए मन गत्यात्मक है। उसकी गति असाधारण है, इसीलिए जहां आप चूके, मन एक क्षण में लाखों मील की दूरी लाँघ जाता है। और जहां सतर्कता पूर्वक अवलोकन हुआ, वह नियंत्रित होता चला जाता है। सतर्कता की इस अवधि को बढ़ाइये, जितनी यह अवधि बढ़ती चली जाएगी, उतनी ही गहरी शांति में आप अपने आपको पाते चले जाऐगे।
सच तो यह है, यहां पानी पर उठने वाली लहर को ही एकाग्र करना लक्ष्य नही है, हम चाहते हैं- उसको बर्फ बनाना, जिससे कि फिर कभी कोई लहर ही नही बने। यह स्थिति मानसिक एकाग्रता ही नही है। एकाग्रता के लिए कम से कम एक संकल्प तो चाहिए ही, और नहीं अब तक अन्य स्थानों पर परिभाषित किया ध्यान ही है। यहां ध्यान योग हमे, कुविचार से हटाते हुए उस संकल्प-हीनता को सौंपता है, जहां मात्र आत्मानुभव है और भगवत्कर्म है, यही हमारा ध्येय है।
साधक कहते हैं-
दुख है जीवन में दुख ही दुख है। हम उससे अपने आपको हटाना भी चाहते हैं पर संभव नही है। वे दुख के प्रभाव को संसार की सहायता से दूर करना चाहते हैं। यह जानते हुए भी कि जब तक सुख की सत्ता है, तभी तक दुख है। पर जाने कैसा भटकाव है ? प्राणी दुख भोगता हुआ भी सुख की भूल- भुलैया में इतना उलझा रहता है कि वह छोड़ते हुए भी छोड़ नहीं पाता है और अगर प्रयास भी करता है तो उसका यह प्रयास किन्हीं सिद्धियों की तलाश में, हठयोग में, या सुख की कामना में ही यह सोचते हुए कि उसके संकल्पों की पूर्ति किसी अन्य की कृपा से संभव है, गुरूडम के भटकाव में भटक जाता है।
नहीं, हमें इसी जीवन में अभ्यास सत्संग द्वारा ध्येय पाना ही है। ध्यानयोग ही सहज और सुगम वह मार्ग है, जो सन्तों का साध्य पथ रहा है।
इसीलिए आवश्यक है, अगर अपूर्णता है, और उसे पूर्ण करने की तीव्र इच्छा है, तो प्रयत्न आज से और अभी से किया जाए।
पहला कदम
जरूरी नहीं कि एक ही दिन में, एक ही क्षण में चमत्कार हो जाय। योग मार्ग पिपीलिका-मार्ग है। चींटी का मार्ग, जिस प्रकार मधु की तलाश में अनवरत लगी हुई वह दुर्गम से दुर्गम जगह पहुच जाती है, वही भाव साधक के मन मेें होना चाहिए कम से कम दिन में दो बार तो कुछ समय हमें अपने अभ्यास के लिए देना ही चाहिए सोते समय और सुबह नींद खुलते समय।
बैठ नहीं सके तो लेटे ही रहें। देखे मन क्या कर रहा है ? सतर्कता से आंतरिक विचारणा का अवलोकन करें, न जाने कितने विचार आ रहे हैं, पर आप तो विश्राम में हैं और मन दोपहरी में गया, इस कल से उस कल में गया, समझाइए अभी तो विश्राम में हूं। मन को वर्तमान में लाइए। यही प्रयत्न है, शुरू-शुरू में मन नहीं मानेगा, फिर ज्यो-ज्यों अभ्यास बढ़ता जायेगा, वह नियंत्रित होता चला जायेगा। साधक कहेंगे, इससे तुरन्त नींद आ जाती है। नींद आती है तो आने दीजिए, यह बाधक नही है।
सुबह उठते ही इस अभ्यास को दोहराइए। आंतरिक विचारणा का अवलोकन कीजिए। मन जो वा´छा कर रहा है उसे देखिए। बिना किसी पूर्वाग्रह के। और रूपांतर की कामना छोड़िए। जो है, उसी रूप में कुछ क्षण देखने का प्रयास कीजिए। मन ही, मन की निगरानी कर जब थक जाता है तो अशांति स्वतः कम होने लगती है। एक गहरी शांति का अनुभव ही सार्थक उपासना है।
दूसरा कदम
ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों का गहरा संबंध है। मन इसी कारण से भोगों में लिप्त रहता है। ध्यान के लिए यही श्रेष्ठ है कि किसी बाहृा नाम, रूप पर मन को स्थिर करने के स्थान पर आंतरिक ब्रहृानाद पर ही मन को स्थिर किया जाय। मन जब ठहरता है, तब अन्तर्जगत से आती हुई ये ध्वनियां साधक को सुनाई देती हैं। संतो ने इनके कई रूप बतलाये हैं, ज्यो-ज्यों मन ठहरता जाता है यह नाद एक स्पष्ट अनवरत सायरन की आवाज सा शेष रह जाता है। साधक को चाहिए कि वह कहीं भी रहे, कुछ भी करता रहे, मन वहीं लगा रहना चाहिए। श्रवण और वाणी का गहरा संबंध है।
इसीलिए साधन यात्रा में जिस कर्मेन्द्रिय पर सबसे अधिक ध्यान देना चाहिए, वह वाणी ही है।
तीसरा कदम:-
साधन पथ पर सबसे अधिक फिसलने वाली चीज ”जीभ” है। स्वाद की परिधि में भी तथा वाचालता की परिधि में भी। सभी इन्द्रियों का दमन सरल है। पर इस रसना का नियंत्रण कठिन ही है। क्योंकि इसके दो कार्य है, जब वह बाहर आती है, तब शब्दों से खिलवाड़ करती है, दोष-दर्शन में लग जाती है या पर- निंदा या चाटुकारिता मे। साथ ही स्वाद के लिए मन को इधर उधर दौड़ाए रखती है। जब यह एक साथ दो काम करती है, तब उसका दुरूपयोग घातक ही है।
नाद श्रवण पर मन की एकाग्रता से वाक संयम सरलता से बढ़ जाता है। क्योंकि श्रवण और वाक् का गहरा संबंध है। जो गूंगा होता है, वह बहरा भी होता है।
फिर भी साधक को चाहिए, वह इसके नियन्त्रण पर ध्यान दे। गपशप अस्थिर मन की परिचायक है। जब हम अपने आपसे बचना चाहते हैं, तभी दूसरों को अपने सामने उपस्थित करते हैं। जब तक दोष दर्शन और पर-निंदा उवाच जारी है, हम अपने भीतर की सीढ़ियों पर उतर नहीं सकते। दूसरों के बारे में जानने की यह जिज्ञासा हमें आत्मानुसन्धान से रोक देती है। जितना हम बाहर भटकते हैं, उतनी ही हमारी आंतरिकता हमसे दूर होती चली जाती है। बाहर जो कुछ है, परिवर्तनशील है, उत्तेजनात्मक है और यह उत्तेजना मन को अस्थिरता ही प्रदान करती है। इसीलिए संयम अगर करना है तो वाक-संयम ही करना है।
अन्त में
स्मृतियों से असहयोग तथा जीवेषणा की पहचान ही साधक को सही समझ सौंपती है।
अशुद्ध और अनचाहे संकल्पों के परित्याग से आवश्यक संकल्पों की पूर्ति अपने आप होने लगती है।
यह वह स्थिति है, जब सक्रियता अचानक बढ़ जाती है। साधक पाता है कि उसके भीतर असाधारण शक्ति आ गई है। वह जिस किसी भी कार्य को करना चाहता है, वह पूर्ण ही होता है। प्रमाद, जो कल तक संगी था- कहीं दूर चला गया है।
साथ ही ”अशुद्ध संकल्प” जो पर-निन्दा तथा पर-अहित में थे, उनके जाते ही मनोनिग्रह हो जाता है।
साधक निर्दोष होने के लिए प्रयत्नशील है। कत्र्तव्य- परायणता बढ़ती है। उसमें स्वतः ही उदारता, मुदिता, प्रेम प्रकट होता है।
प्रेम आंतरिक है।
साधक पाता है कि उसका ह्नदय अब तक जो अनावश्यक विचारों के बोझ से तनाव से भरा हुआ था, खाली हो गया है। वह गहरी शान्ति का अनुभव करता है। साथ ही जगत के प्रति जो संबंध थे, वे भी बदल रहे हैं। साधन यात्रा की पहली पहचान आचरण परिवर्तन है। आचरण में त्याग और सेवा की भावना बढ़ती है।
वह कत्र्तव्य कर्म से जुड़ता है।
कत्र्तव्य कर्म से जुड़ते ही अनावश्यक संकल्प जो भूत और भविष्य में घूमते रहते हैं स्वतः ही कम होने लगते हैं।
व्यर्थ ही जो समय जा रहा था, कम होने लगता है वहीं पर साधक में परिवर्तन आता है। उसकी आंतरिकता घनी होते ही उसमें कलात्मकता आ जाती है।
और भी आगे, अगर साधन-यात्रा निरन्तर गतिशील रहे तो साधक पाता है कि ज्यों-ज्यों संकल्पों की संख्या कम होती है, संकल्प निवृत्ति से प्राप्त शांति सघन होती जाती है।
सधन प्रशांत मन वह पाता है। जो छूटना था, वह स्वतः छूटता चला जा रहा है। जो पाना था, वह स्वतः प्राप्त हो रहा है।
साधन यात्रा में यह पड़ाव ही है।
इसमें रहते हुए और आगे बढ़ना है।
बिरले ही साधक होते हैं, जो यहां आकर रूकते नही हैं। अन्यथा यहां आकर प्राप्त शांति का उपभोग शुरू हो जाता है। पंथ बनने लगते हैं।
सद्गुरू की कृपा, उनकी शरण, प्रभु प्राप्ति की अनन्त जिज्ञासा ही साधक को आगे ले जाती है।
आगे, और आगे, जो साधन यात्रा का पड़ाव है।
”जो” है स्वरूप की प्राप्ति उसकी अभिन्नता है। इस बारे में कुछ कहा नही जा सकता। यह अनुभव का जगत है। अनुभव जब विचारणा के क्षेत्र में आता है, तब भाषा भी उसे प्रकट करने में असमर्थता पाती है। जहां मात्र अनुभवन है, वहां फिर प्रकट करने की आकांक्षा ही नहीं है।
यह हर साधक का अधिकार है। स्वतन्त्रता हर साधक का जन्म सिद्ध अधिकार है। वह यहां आकर स्वाधीनता प्राप्त करता है।
साधन-यात्रा का प्रयोगात्मक है। एक गहरा प्रयोग। यहां प्रारम्भ तो दिखता है, पर अन्त नहीं। इसलिए अनन्त धैर्य और अगाध जिज्ञासा का होना ही साधक के लिए पहली आवश्यकता है।
अ
साधन सन्दर्भ
स्वामीजी से प्रायः जिज्ञासु जब भी मिलते हैं, वे क्या करें ? यही पूछते रहते हैं। वे साधना की ओर किस तरह बढ़ें, यही जिज्ञासा रहती है।
स्वामीजी कहा करते है-
”साधक के लिए आत्मनिरीक्षण ही साधन है। साधक को चाहिए कि वह अपनी आंतरिक्ता में विचरण करे। मनोजगत में पैठ करे। आप वहीं पहुंचेंगे, जहां से विचार चले आ रहे हैं। एक गहरी सतर्कता के साथ की गई आंतरिकता में निगरानी मन को क्रमशः निष्क्रियता प्रदान करती है। मन से, मन की जब निगरानी की जाती है, तब वह जल्दी ही थक जाता है। और एक खालीपन निष्क्रियता प्राप्त होती है। परन्तु यहां पर किसी ओर अन्य प्रकार के परिवर्तन की आकांक्षा नहीं होनी चाहिए। हम गुण और दोष को ही जीवन मान बैठे हैं। जीवन जो है, जिस रूप में है। उसके मूल रूप को जान ही नहीं पाते।”
प्रायः आत्मनिरीक्षण के साथ ही परिवर्तन की ललक रहती है। अरे मुझमें यह दोष है...यह मुझे दूर करना है, तभी गुण का स्वरूप सामने आ जाता है, मुझे तो यह होना चाहिए, आखिर यह भी तो संकल्प यात्रा ही है। जब तक गुण शेष है, तभी तक दोष की सत्ता भी विद्यमान है। राग द्वेष की समाप्ति ही सही वैराग्य है। हमें और कुछ नया नहीं करना- बस, इसी तकनीक को समझना है कि यहां कुछ होने के लिए आत्मनिरीक्षण नही करना है। बाहृा से लाकर कुछ आरोपित नहीं करना है, जो है उसका सतर्कतापूर्वक अवलोकन ही साधन है। यहां किसी प्रकार का कोई ंसंकल्प नही है, रूपान्तरण की चाहत भी नहीं है तभी तो ‘जो’ है वह उसी रूप में अभिव्यक्त हो सकता है। जब ध्यान में रुपान्तरण की क्रिया शुरू हो जाती है। तभी तनाव शुरू होता है। एक द्वन्द यह ध्यान नहीं है। इसीलिए आवश्यक है, आत्मनिरीक्षण की नौका पर मात्र लहरें ही देखना है, गिनना नही है। पानी के गंदलेपन को देखकर अस्वीकृति की भावना नही, जो है, उसे ही साक्षी भाव से देखना है, यह नाव चलती रहे, तभी यह अन्तर्यात्रा संभव है। यहां निसंकल्प अवलोकन ही सार्थक ध्यान है। आंतरिक विचारणा का अवलोकन ही यह हमें प्रदान करता है।
इसलिए आवश्यक है कि काल के इस अमूल्य क्षण में मन अत्यधिक संवेदनशील हो, और यह तभी संभव है कि विचारणा ही नही रहे। जिस क्षण यह अनुभवन है, अनुभव और अनुभव-कर्ता की पृथकता समाप्त हो जाती है। पर होता क्या है, अनुभव क्षणिक रहता है। फिर आती है स्मृति जो सार्थक क्षण का विश्लेषण करती है। अनुभव और अनुभव कर्ता पृथक हो जाते हैं। इसलिए हम पाते है, हम अधिकांशतः अनुभव से बाहर ही रहते हैं। अनुभव के लिए आवश्यक है, इस क्षण विचारणा अनुपस्थित रहे, भूत और भविष्य में मन का संक्रमण न रहे, रहे मात्र वर्तमान और तभी प्राप्त होती है, निसंकल्पता, एक गहरा मौन, यही तो हमारा ध्येय है।
ध्यान-योेग हर क्षण के अनुभव में रूपांतरित होने की वह कला है जिसके द्वारा जगत भागवत-भाव की प्राप्ति होती है, वहीं जीवन भागवत-कर्म से युक्त हो जाता है। ज्यों-ज्यों अनुभवन बढ़ता है, जीवन की सार्थकता उपलब्ध होती जाती है।
यह स्थिति जीवन से पलायन नही है, निठल्लापन नही है, वहां है- सर्वाधिक गत्यात्मकता, खुला विक्षोभहीन जीवन क्या यही हम नहीं चाहते हैं?
यह सच है, यहां तक साधारण साधक के लिए पहुंचना सरल नही है। अतः अभ्यास आवश्यक है। शास्त्रों ने इसीलिए भगवत इच्छा का आदर किया है। भगवत इच्छा ही प्राणी की भोगेच्छा को समाप्त कर देती है। और अन्त में जाकर यह भी परमात्मा में विलीन हो जाती है। अतः प्रयत्न यहां निन्दनीय नहीं है। सच तो यह है कि प्रयत्न ही यही है।
इसलिए साधक को अभ्यास का आदर करना चाहिए, उन विचारों को, जो किसी काम के नही है, उन्हें तो न आने दें। बिना काम के विचार वे ही हैं, जो कभी वर्तमान में नही रहने देते। हमेशा मन को भूत और भविष्य में ले जाते हैं। यही तो चिन्ता है जो कि चित्त भी है।
इसीलिए आवश्यक है कि गहरी सतर्कता रहे। यह सतर्कता और कहीं नहीं, अन्तर्जगत में हमेशा रहे। याद रखिए मन गत्यात्मक है। उसकी गति असाधारण है, इसीलिए जहां आप चूके, मन एक क्षण में लाखों मील की दूरी लाँघ जाता है। और जहां सतर्कता पूर्वक अवलोकन हुआ, वह नियंत्रित होता चला जाता है। सतर्कता की इस अवधि को बढ़ाइये, जितनी यह अवधि बढ़ती चली जाएगी, उतनी ही गहरी शांति में आप अपने आपको पाते चले जाऐगे।
सच तो यह है, यहां पानी पर उठने वाली लहर को ही एकाग्र करना लक्ष्य नही है, हम चाहते हैं- उसको बर्फ बनाना, जिससे कि फिर कभी कोई लहर ही नही बने। यह स्थिति मानसिक एकाग्रता ही नही है। एकाग्रता के लिए कम से कम एक संकल्प तो चाहिए ही, और नहीं अब तक अन्य स्थानों पर परिभाषित किया ध्यान ही है। यहां ध्यान योग हमे, कुविचार से हटाते हुए उस संकल्प-हीनता को सौंपता है, जहां मात्र आत्मानुभव है और भगवत्कर्म है, यही हमारा ध्येय है।
साधक कहते हैं-
दुख है जीवन में दुख ही दुख है। हम उससे अपने आपको हटाना भी चाहते हैं पर संभव नही है। वे दुख के प्रभाव को संसार की सहायता से दूर करना चाहते हैं। यह जानते हुए भी कि जब तक सुख की सत्ता है, तभी तक दुख है। पर जाने कैसा भटकाव है ? प्राणी दुख भोगता हुआ भी सुख की भूल- भुलैया में इतना उलझा रहता है कि वह छोड़ते हुए भी छोड़ नहीं पाता है और अगर प्रयास भी करता है तो उसका यह प्रयास किन्हीं सिद्धियों की तलाश में, हठयोग में, या सुख की कामना में ही यह सोचते हुए कि उसके संकल्पों की पूर्ति किसी अन्य की कृपा से संभव है, गुरूडम के भटकाव में भटक जाता है।
नहीं, हमें इसी जीवन में अभ्यास सत्संग द्वारा ध्येय पाना ही है। ध्यानयोग ही सहज और सुगम वह मार्ग है, जो सन्तों का साध्य पथ रहा है।
इसीलिए आवश्यक है, अगर अपूर्णता है, और उसे पूर्ण करने की तीव्र इच्छा है, तो प्रयत्न आज से और अभी से किया जाए।
पहला कदम
जरूरी नहीं कि एक ही दिन में, एक ही क्षण में चमत्कार हो जाय। योग मार्ग पिपीलिका-मार्ग है। चींटी का मार्ग, जिस प्रकार मधु की तलाश में अनवरत लगी हुई वह दुर्गम से दुर्गम जगह पहुच जाती है, वही भाव साधक के मन मेें होना चाहिए कम से कम दिन में दो बार तो कुछ समय हमें अपने अभ्यास के लिए देना ही चाहिए सोते समय और सुबह नींद खुलते समय।
बैठ नहीं सके तो लेटे ही रहें। देखे मन क्या कर रहा है ? सतर्कता से आंतरिक विचारणा का अवलोकन करें, न जाने कितने विचार आ रहे हैं, पर आप तो विश्राम में हैं और मन दोपहरी में गया, इस कल से उस कल में गया, समझाइए अभी तो विश्राम में हूं। मन को वर्तमान में लाइए। यही प्रयत्न है, शुरू-शुरू में मन नहीं मानेगा, फिर ज्यो-ज्यों अभ्यास बढ़ता जायेगा, वह नियंत्रित होता चला जायेगा। साधक कहेंगे, इससे तुरन्त नींद आ जाती है। नींद आती है तो आने दीजिए, यह बाधक नही है।
सुबह उठते ही इस अभ्यास को दोहराइए। आंतरिक विचारणा का अवलोकन कीजिए। मन जो वा´छा कर रहा है उसे देखिए। बिना किसी पूर्वाग्रह के। और रूपांतर की कामना छोड़िए। जो है, उसी रूप में कुछ क्षण देखने का प्रयास कीजिए। मन ही, मन की निगरानी कर जब थक जाता है तो अशांति स्वतः कम होने लगती है। एक गहरी शांति का अनुभव ही सार्थक उपासना है।
दूसरा कदम
ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों का गहरा संबंध है। मन इसी कारण से भोगों में लिप्त रहता है। ध्यान के लिए यही श्रेष्ठ है कि किसी बाहृा नाम, रूप पर मन को स्थिर करने के स्थान पर आंतरिक ब्रहृानाद पर ही मन को स्थिर किया जाय। मन जब ठहरता है, तब अन्तर्जगत से आती हुई ये ध्वनियां साधक को सुनाई देती हैं। संतो ने इनके कई रूप बतलाये हैं, ज्यो-ज्यों मन ठहरता जाता है यह नाद एक स्पष्ट अनवरत सायरन की आवाज सा शेष रह जाता है। साधक को चाहिए कि वह कहीं भी रहे, कुछ भी करता रहे, मन वहीं लगा रहना चाहिए। श्रवण और वाणी का गहरा संबंध है।
इसीलिए साधन यात्रा में जिस कर्मेन्द्रिय पर सबसे अधिक ध्यान देना चाहिए, वह वाणी ही है।
तीसरा कदम:-
साधन पथ पर सबसे अधिक फिसलने वाली चीज ”जीभ” है। स्वाद की परिधि में भी तथा वाचालता की परिधि में भी। सभी इन्द्रियों का दमन सरल है। पर इस रसना का नियंत्रण कठिन ही है। क्योंकि इसके दो कार्य है, जब वह बाहर आती है, तब शब्दों से खिलवाड़ करती है, दोष-दर्शन में लग जाती है या पर- निंदा या चाटुकारिता मे। साथ ही स्वाद के लिए मन को इधर उधर दौड़ाए रखती है। जब यह एक साथ दो काम करती है, तब उसका दुरूपयोग घातक ही है।
नाद श्रवण पर मन की एकाग्रता से वाक संयम सरलता से बढ़ जाता है। क्योंकि श्रवण और वाक् का गहरा संबंध है। जो गूंगा होता है, वह बहरा भी होता है।
फिर भी साधक को चाहिए, वह इसके नियन्त्रण पर ध्यान दे। गपशप अस्थिर मन की परिचायक है। जब हम अपने आपसे बचना चाहते हैं, तभी दूसरों को अपने सामने उपस्थित करते हैं। जब तक दोष दर्शन और पर-निंदा उवाच जारी है, हम अपने भीतर की सीढ़ियों पर उतर नहीं सकते। दूसरों के बारे में जानने की यह जिज्ञासा हमें आत्मानुसन्धान से रोक देती है। जितना हम बाहर भटकते हैं, उतनी ही हमारी आंतरिकता हमसे दूर होती चली जाती है। बाहर जो कुछ है, परिवर्तनशील है, उत्तेजनात्मक है और यह उत्तेजना मन को अस्थिरता ही प्रदान करती है। इसीलिए संयम अगर करना है तो वाक-संयम ही करना है।
अन्त में
स्मृतियों से असहयोग तथा जीवेषणा की पहचान ही साधक को सही समझ सौंपती है।
अशुद्ध और अनचाहे संकल्पों के परित्याग से आवश्यक संकल्पों की पूर्ति अपने आप होने लगती है।
यह वह स्थिति है, जब सक्रियता अचानक बढ़ जाती है। साधक पाता है कि उसके भीतर असाधारण शक्ति आ गई है। वह जिस किसी भी कार्य को करना चाहता है, वह पूर्ण ही होता है। प्रमाद, जो कल तक संगी था- कहीं दूर चला गया है।
साथ ही ”अशुद्ध संकल्प” जो पर-निन्दा तथा पर-अहित में थे, उनके जाते ही मनोनिग्रह हो जाता है।
साधक निर्दोष होने के लिए प्रयत्नशील है। कत्र्तव्य- परायणता बढ़ती है। उसमें स्वतः ही उदारता, मुदिता, प्रेम प्रकट होता है।
प्रेम आंतरिक है।
साधक पाता है कि उसका ह्नदय अब तक जो अनावश्यक विचारों के बोझ से तनाव से भरा हुआ था, खाली हो गया है। वह गहरी शान्ति का अनुभव करता है। साथ ही जगत के प्रति जो संबंध थे, वे भी बदल रहे हैं। साधन यात्रा की पहली पहचान आचरण परिवर्तन है। आचरण में त्याग और सेवा की भावना बढ़ती है।
वह कत्र्तव्य कर्म से जुड़ता है।
कत्र्तव्य कर्म से जुड़ते ही अनावश्यक संकल्प जो भूत और भविष्य में घूमते रहते हैं स्वतः ही कम होने लगते हैं।
व्यर्थ ही जो समय जा रहा था, कम होने लगता है वहीं पर साधक में परिवर्तन आता है। उसकी आंतरिकता घनी होते ही उसमें कलात्मकता आ जाती है।
और भी आगे, अगर साधन-यात्रा निरन्तर गतिशील रहे तो साधक पाता है कि ज्यों-ज्यों संकल्पों की संख्या कम होती है, संकल्प निवृत्ति से प्राप्त शांति सघन होती जाती है।
सधन प्रशांत मन वह पाता है। जो छूटना था, वह स्वतः छूटता चला जा रहा है। जो पाना था, वह स्वतः प्राप्त हो रहा है।
साधन यात्रा में यह पड़ाव ही है।
इसमें रहते हुए और आगे बढ़ना है।
बिरले ही साधक होते हैं, जो यहां आकर रूकते नही हैं। अन्यथा यहां आकर प्राप्त शांति का उपभोग शुरू हो जाता है। पंथ बनने लगते हैं।
सद्गुरू की कृपा, उनकी शरण, प्रभु प्राप्ति की अनन्त जिज्ञासा ही साधक को आगे ले जाती है।
आगे, और आगे, जो साधन यात्रा का पड़ाव है।
”जो” है स्वरूप की प्राप्ति उसकी अभिन्नता है। इस बारे में कुछ कहा नही जा सकता। यह अनुभव का जगत है। अनुभव जब विचारणा के क्षेत्र में आता है, तब भाषा भी उसे प्रकट करने में असमर्थता पाती है। जहां मात्र अनुभवन है, वहां फिर प्रकट करने की आकांक्षा ही नहीं है।
यह हर साधक का अधिकार है। स्वतन्त्रता हर साधक का जन्म सिद्ध अधिकार है। वह यहां आकर स्वाधीनता प्राप्त करता है।
साधन-यात्रा का प्रयोगात्मक है। एक गहरा प्रयोग। यहां प्रारम्भ तो दिखता है, पर अन्त नहीं। इसलिए अनन्त धैर्य और अगाध जिज्ञासा का होना ही साधक के लिए पहली आवश्यकता है।
अ
ृृृृृृृअन्तर्यात्रा पूज्य स्वामीजी के सानिध्य में लिखा गया पहला ग्रन्थ है।यहाँ स्वामीजी के विचार तथा उनसे पूछे गए सवालों के उत्तर जो प्राप्त हुए थे वे दिए गए हैं।यह पहले ही बता चुके हैं कि स्वामीजी ने अपना कोई स्वतंत्र पंथ नहीं चलाया , वे एक अनन्य खोजी थे, निरन्तर मौन में रहे, आपने प्रश्न पूछा तो उत्तर दे दिया अन्यथा वे मौन ही रहते थे। उनकी कुटिया सभी के लिए हमेशा खुली रहती थी।वहाँ जाति, संप्रदाय , का कोई भेद नहीं था।
साधना की ओर
यह प्रश्न और कहीं नहीं, हर साधक के सम्मुख ही सबसे पहले उपस्थित होता है कि साधना क्यों ? हम चाहते क्या हैं ? मनुष्य की मांग क्या है ? अगर वह अपनी वर्तमान स्थिति से सन्तुष्ट है तो फिर यह प्रश्न उपस्थित ही नहीं होता है। परन्तु अगर उत्तर नहीं से आए...तो यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है।
जिसका पेट खाली है उसके सामने भूख का सवाल सबसे बड़ा है। लगता है यही सबसे बड़ी जरूरत है। नौकरी, और नौकरी उससे बड़ी नौकरी या बड़ी दुकान खोलना, सब पेट भरने का ही तो साधन है। पर पेट कितना बड़ा है,जितना धन होता है, उतना ही खाली रहता है। किसी तरह जब पेट भरता है, तब शरीर की भूख जगती है। इसीलिए शरीर की भूख न जगे, हजारों साल से पेट की भूख पर नियंत्रण रखने की बात कही जा रही है। अनशन, उपवास सब उसी के रूप हैं। पेट की भूख और शरीर की भूख जैविक आवश्यकताएं हैं। इससे इतर मनुष्य की मानसिक और बौद्धिक आवश्यकताएं भी बढ़ती हैं। कला और संस्कृति, सभ्यता और विकास यात्रा, इन्हीं का विस्तार है। सभ्यता, मनुष्य की बहिर्मुखता का ही विस्तार है। मन चंचल है, गत्यात्मक है, इसीलिए सभ्यता निरन्तर गतिशील है। पर यह मन की स्वाभाविक अवस्था नही है। वह कितना भी गति में क्यों न हो, सदैव नहीं रह सकता। उसे प्रशांिन्त की स्थिति में आना ही होता है। हर श्रम का प्रारम्भ और अन्त प्रशान्ति में है। नींद से उठकर मनुष्य सब कुछ करता हुआ नींद में जाना चाहता है। यही उसके सम्पूर्ण जीवन की यात्रा है।
विश्राम, मन की स्थिरता हैं, यही कला और संस्कृति आकार ग्रहण करती है। संस्कृति मन की अन्तर्मुखी यात्रा है।
यह भी मनुष्य की मांग है। यहां सुख भी है, शान्ति भी है।
पेट की भूख और शरीर की भूख के बाद विलासिता की भूख बढ़ती है। विलासिता का आधार आकांक्षा है, संसार इसी कामना का ही विस्तार है।
मनुष्य सम्भावना की भूख में रहता है, निरन्तर कुछ न कुछ होने की सम्भावना। दैविक आवश्यकताओं के ऊपर मानसिक और बौद्धिक आवश्यकताएं है। यह जो भूख है, उसका आधार आकांक्षा है।
और इन सब आवश्यकताओं का एक लम्बा सिलसिला है, जिसमें कि मनुष्य उलझता है।
सवाल फिर खड़ा होता है।
यह सब क्यों ? मैं इतना सब कुछ क्यों चाहता हूं ? मैं आखिर जीवित ही क्यो हूं ? मैं इस लंबी यात्रा पर निरन्तर चल ही नहीं रहा हूं, दौड़ रहा हूं, आखिर किसलिए ?
पेट की भूख, समाप्त होते ही, तुष्टि देती है। शरीर अपनी कामक्षुधा की तृप्ति के बाद क्षणिक तुष्टि लेता है। सिलसिला रूकता नहीं है, चलता रहता है। पढ़ना रोज पढ़ना नौकरी तक। नौकरी से और दूसरी बड़ी नौकरी तक धन की ललक। आदिम पारस की ललक जो वस्तुएं देंगी। वस्तुएं जिनसे परितुष्टि प्राप्त होगी। शरीर क्षणिक है, जर्जर है, कब ढह जाए, इसीलिए अमृत की खोज हुई। शरीर ही नहीं रहा, तब तुष्टि किसे ?
अकसर इन्हीं सबके लिए उमर बीत जाती है।
मन्दिर, यज्ञ, तप, स्वाध्याय, गुरू भण्डारे इन सबके पीछे जो भीड़ है, वह क्या चाहती है ?
तुष्टि का अगाध भण्डार ! उसकी तृप्ति में कभी कोई कमी न आए। यही सुखोपासना सभ्यता का केन्द्र है।
संकल्प पूर्ति सुख देती है, और संकल्प पूर्ति का अभाव दुख देता है। यही सुख दुख की यात्रा है।
मनुष्य सुख चाहता है, मात्र सुख !
सुख अल्प है, दुःख अनन्त है।
इसीलिए ईश्वर की खोज है। एक बड़े आधार की खोज, जो दुख दूर करेगा अनवरत सुख देगा।
अनन्त सुख !
और यही नही मिलता है।
शेष रह जाता है विक्षोभ, व्यथा, दुख का प्रभाव यहीं से साधन यात्रा शुरू होती है।
स्थायी सुख की खोज शान्ति की खोज !
जहां अमृत है !
कामना पूर्ति से प्राप्त तुष्टि का भाव ही सुख है। यह क्षणिक है। मन कामनाओं का सागर है।
एक कामना की पूर्ति हो, इसके पूर्व ही हजारों कामनाएं पैदा हो जाती हैं। क्या वे सब पूरी हो पाती हैं ?
वस्तुगत उपलब्धियों की खोज में व्यक्ति डूबा रहता है। वे ही जीवन का साध्य हो जाती हैं।
और इधर जीवनी शक्ति निरन्तर क्षीण होती चली जा रही है। भारी छटपटाहट है।
वस्तु में सुख तलाशा, प्रयास किया। पर जब तक वस्तु आई शरीर धोखा दे रहा है।
लौटकर दुख ही शेष रहता है। विक्षोभ का धारावाही व्यूह मनुष्य को जकड़े रहता है।
सामान्यतः यही मनुष्य की यात्रा है।
मनुष्य यह मानकर चलता है कि यह जो दूसरा है, वह उसे सुख देगा। दूसरे की खोज ही संसार की यात्रा है। दूसरा पिता में, पत्नी में, पुत्र में समाज में, धन में मकान मेे, यश में हर जगह ढूंढा जाता है।
सुख दूसरे से ही प्राप्त होगा, यह वह मानता है, और दुख ?
इस सवाल पर वह सोचता ही नही है।
यह जो दूसरा है। जो संसार है, क्या कभी उसकी आवश्यकता की पूर्ति कर पाता है ?
और सच तो यह है कि यह जो दूसरा है। हमेशा कल में ही आता है। दूसरा, जो है, जीवेषणा में है। कामना में है।
उसका आकर्षण यही है कि उसके आधार पर भविष्य की आशा शेष है।
इसीलिए मनुष्य भगवान को अपने से अलग मानता है, उनसे कुछ मांगता है और इसी तरह वह इस आशा में जीवित रहता है कि वह जो दूसरा है, उसे आज नहीं तो कल सुख ही देगा।
जहां मनुष्य अपने स्वरूप को छोड़कर, अपने स्वभाव से अनभिज्ञ रहकर दूसरे से जुड़ता है, वहीं वह दुख पाता है। यह जो दूसरा है, उसका कभी नहीं हुआ। क्योंकि वह उसका है ही नहीं। उसकी इससे नित्य दूरी है। इसलिए इस दूसरे के लिए, जो संसार है, शरीर है, धन है, परिवार है, सुख की लालसा बनी हुई है। वह कभी पूरी होगी कि नहीं ? मनुष्य उसे ही पा सकता है, जो कि उसका है। सदा से उसका रहा है।हां, आज भले ही उसकी विस्मृति हो गई हो।
लेकिन होता यह नहीं है, मनुष्य जो उसका है, जो वह है, उसे छोड़कर जो उसे कभी प्राप्त नहीं होने वाला है, निरन्तर परिवर्तनशील है, उसे चाहता है और जब वह उसे नहीं मिलता है, तब वह दुखी होता है। विक्षोभ जग जाता है। दुख का कारण है- अपने को छोड़कर, पराये सुख की खोज करना।
जो स्वभाव है, उसे भूलकर जो नहीं है, उसमें डूबना।
जब तक स्वयं की समझ नहीं होती। दुख के कारण ही तलाश नहीं होती। तब तक यह दूसरा ही महत्वपूर्ण रहता है।
यही विडम्बना है।
दुख दुखी के उद्धार के लिए आता है। उसकी समझ को जाग्रत करता है। पर वह लोलुपता के अधीन होकर सुख की तलाश में भटकता रहता है।
इसीलिए दुख और उसका प्रभाव आदर के योग्य है। यही प्रभाव अपनी तीव्रता में ‘जो है’ उसके प्रति ध्यान दिलाता है। जब वह पाता है कि संसार उसकी आवश्यकता की पूर्ति में सहायक नही है तभी वह अन्वेषी बनता है। खोजी होता है।
‘जो’ अब तक विस्मृति में था, उसकी स्मृति ही जिज्ञासा जगा देती है। जिज्ञासा जगते ही विवेक का आदर होता है। विवेक था, अभी भी जीवन में था, पर बुद्धि का आदर था। विवेक तिरस्कृत था। विवेक का आदर होते ही, अविवेक छूटता है। विवेक ‘जो’ है, उसके प्रति आदर भाव तथा जो नहीं है, उसके प्रति अनादर भाव का भाव जगाता है। आदर का भाव ज्यों-ज्यों दृढ़ होता जाता है, आचरण में स्वाभाविक परिवर्तन आता है। जिसे छूटना है, वह छूटना शुरू हो जाता है। अविवेक से ही बुरे भाव और बुरे कर्म होते हैं। विवेक के जाग्रत होते ही, जो कुछ श्रेष्ठ है,वह आचरण में आने लगता है। साधन प्रारम्भ हो जाता है। साधन कहीं बाहर नहीं अपने पास ही है।
अपनी आवश्यकताओं को समझा जाए। मन का आगे पीछे का चिन्तन ही बाधक है, जो स्मृतियों तथा आकांक्षाओं में डूबा रहता है। यही अविवेक है। यही विक्षोभ का कारण है। इसीलिए आवश्यक है कि पहले निज के विक्षोभ को समझा जाए। जब तक विक्षोभ की समझ नही होगी, तब तक बाहर आने का सार्थक प्रयास भी नहीं हो सकता।
वह सोचता है कि जो दुख दूर कर देगा। जीवन भर भौतिक वस्तुओं की अप्राप्ति ही दुख बन जाती है। वस्तुओं की दासता और उनकी अप्राप्ति दुख का बहुत बड़ा कारण हो जाती है। वह वस्तुओं से अपने आपको बाहर ला नहीं पाता। वह उनकी प्राप्ति के लिए छटपटाता रहता है। यह प्राप्ति ओस कणों से प्यास बुझाने की तरह है। उसकी सांसारिक भूख उसी तरह आजीवन कायम रहती है। कभी-कभी अवसर आता है, विवेक कौंध जाता है। उसे लगता है कि कामनाओं की पूर्ति से प्राप्त तुष्टि क्षणिक है। हर कामना पूरी भी नहीं होती। अतृप्त कामनाएं असंख्य रहती हैं। अपूर्ति से विक्षोभ दुख का अनवरत प्रवाह कायम रहता है।
कभी कभी विवेक का आदर जब साधक करता है, तो व्याकुलता बढ़ती है। जिज्ञासा बढ़ती है। वह अविवेक को समझ जाता है, समझ बढ़ते ही वह साधन यात्रा पर बढ़ जाता है। अन्यथा वह पुनः विवेक का अनादर करते ही सांसारिक प्रवाह मे डूबता चला जाता है।
कामना निवृत्ति ही शांति में प्रवेश कराती है।
यहां सरोवर की लहरें शांत हैं। तली स्पष्ट दिखाई देने लगती है। चित्त दर्पण है। पक्षी उड़ा तो लगा, वह यह दिखा। जब तक वह उड़ता रहा, बिम्ब रहा। जाते ही जल, फिर वही दर्पण का दर्पण !
यही तो प्रशांत मन है।
जो है उसी पर ध्यान केन्द्रित रहे, यही साधन है। जो निरन्तर बदलता रहा है, वही गलत है। वह स्वरूप नहीं है। उससे छूटते ही स्वरूप उपलब्ध होता है। जो भी बदल रहा है, वह मैं नहीं हूं। यह शरीर जो मुझे मिला है, क्या मैं हूं ? यह संसार जो बदल रहा है, क्या मैं हूं ? शरीर मन और संसार सब बदल रहे हैं। संसार मन का ही तो विस्तार है। जगत और शरीर प्रतिरूप ही हैं। जो निरन्तर बदल रहा है, वह सत्य नहीं है। जो असत्य है उसी पर ही तो ध्यान है। उसी का ही चिन्तन है। उसी की ही खोज है। उससे ध्यान हटाना ही ध्यान है। वह तो है, उस पर जब ध्यान पहुंचता है, तभी स्वरूप उपलब्ध होता है। तभी स्थिरता प्राप्त होती है।
इसीलिए ध्यान जो है उसके अवलोकन की कला है। यह शरीर जिस इन्द्रिय के द्वारा यह कार्य कर पाता है वह मन है। तभी तो सारा बह्माण्ड इसी से हलचल लेता हुआ दिखाई पड़ता है। मन की गति असाधारण है, कहा जाता है कि प्रकाश की गति भी उसके सामने कुछ नहीं है। इसीलिए ध्यान आन्तरिक अवलोकन ही कहा गया है। प्रायः ध्यान का अर्थ मानसिक एकाग्रता के लिए लिया जाता है। मन के द्वारा किसी यन्त्र रूप या नाम के प्रति सजगता पूर्वक रखी गई एकाग्रता ही आजकल ध्यान कही जाती है। यह याद रखिए ध्यान, एकाग्रता नहीं है। एकाग्रता मन की बहिर्मुख वृत्तियों को किसी नाम, रूप या मन्त्र पर केन्द्रित करने का अभ्यास ही है। परन्तु एकाग्रता को ही साधना-यात्रा स्वीकारने से साधक, साधन पथ को ही छोड़ बैठता है।
हमारे संकल्प से निश्चित की गई, यह देव प्रतिमा, यह मन्त्र, यह नाम, फिर इतना शक्तिशाली हो जाता है कि मन उससे छूट नहीं पाता, और जो होना चाहिए था, वह नहीं हो पाता है। चित्त पुनःऔर अशांत हो जाता है। अप्रमाद के स्थान पर प्रमाद पुनः उपस्थित हो जाता है।
”ध्यान” एकाग्रता नही है।
ध्यान सतर्कता सहित आंतरिक विचारणा का अवलोकन है। हम जो भीतर हैं, वही वास्तव है। उस वास्तव की सही-सही विश्वसनीय पहचान ही ध्यान प्रक्रिया है। हम जो है, एक स्थिर इकाई नही हैं। हर क्षण हम बदल रहे हैं। जो चीज बदल रही है, वह हमारी आंतरिकता नहीं है।
मन के संकल्प-विकल्प की अनवरत श्रंखला है। इसी श्रंखला, इसी विचारणा का सतर्कतापूर्वक किया गया अवलोकन ही ध्यान है।
अवलोकन दूसरे शब्दों में मात्र देखना।
बाहर नहीं भीतर देखना है। देखते समय ईमानदारी यही रखनी है कि किसी प्रकार का कोई पूर्वाग्रह नही ंरखना है। बनी बनायी पूर्व निर्धारित को क्या देखना। जो बात तय कर ली जाय, जैसे कोई नाम, कोई रूप, उसका अवलोकन ध्यान नहीं है। यहां जो लहरें उठ रही हैं, उन्हें बिना किसी तिरस्कार के, बिना किसी चश्में के देखना है, यहां पर सम्पूर्ण विचारणा को उसके वास्तविक रूप में देखने का प्रयास है।
यह अवलोकन ही क्रमशः स्थिरता प्रदान करता है।र्
िस्थरता ही साधना का लक्ष्य है।
मन का आगे पीछे का चिन्तन ही बेहोशी है। यह वर्तमान से पलायन है। यह नींद है।
सच है, हम जागते हुए भी सोए रहते हैं। कोई पूछे तो हमें लगता है, हम कहीं और थे। यही विवशता असाधन है। इसका त्याग होते ही साधन स्वयं प्राप्त हो जाता है। यह साधन अगर साधक में पर्याप्त धैर्य रहा तो अवश्य ही साध्य से मिलायेगा।
मन की गति असाधारण है। क्षणभर मे ही न जाने कहां से कितनी बातें आ जाती हैं। चित्र ही चित्र ! न जाने कितने युगों से हम चित्र ही चित्र सहेजते आ रहे हैं। ये ही स्मृतियां हैं, जिन्हें हम मन मान बैठे हैं। मन जब इनके साथ सहयोग करता है, तो ये गाढ़ी हो जाती हैं। मूलधन ब्याज कमा लेता है।
मन अगर स्मृतियों के साथ असहयोग करे तो मूलधन ही खर्च होना शुरू हो जाता है।
यही हमें करना है।
यहां न कुछ अच्छा है,न बुरा।
अन्यथा हम सही रूप को जान ही नहीं पायेंगे। जो कुछ है, भीतर है। अंधेरी बावड़ी में रखा हुआ है। उसे बाहर तो आने दें। जहां अस्वीकार किया, वहीं ध्यान ध्यान नहीं रहा। प्रायः अपने भीतर के गंदलाए जल को देखकर हम चैंक जाते हैं। और अस्वीकार करने लग जाते हैं। या उससे बचकर ईश्वर के किसी रूप या नाम में डूबने लगते हैं। यह क्या है, यह तो पागलपन है। परमात्मा का मार्ग कायरता का मार्ग नहीं है। यह अज्ञान है। यहां हमारी जागरूकता यही है कि हमारी उपस्थिति बनी रहे, जहां हम हैं, हाजरी रहे।
छात्र कक्षा मे आते है। पर जरा पूछो तो लगता है- यहां थे ही कहां, कहीं और थे। गायब।
”ध्यान” गायब होने का नाम नही, साक्षत अनुभवन है। जो कुछ है,विश्वसनीय साक्षात्कार यहां है।
यही ध्यान उस विराट आनन्द स्रोत से हमें जोड़ देता है, जो हमारा साध्य है। इसीलिए ध्यान मात्र प्रक्रिया ही नहीं है। हर प्रकार की क्रिया का यहां अन्त भी है।
यहां सब प्रकार के बंधन छूट जाते हैं। ज्ञान की अग्नि उठते ही अज्ञानरूपी कूड़ा कचरा जलकर राख हो जाता है। बंधन वे पाश जिनसे हमने अपने आप को बांध रखा है, टूट जाते हैं। संसार के प्रति उमड़ती हुई कामनाओं के बादलों के हटते सी शेष रह जाता है, खुला आकाश, निरभ्र और शांत, जहां फिर कोई अभाव नहीं।
अगर हमारे पास थोड़ा सा अवकाश हो, और हम अपने आपको सामने रखकर देखें तो पाऐंगे, हमारे भीतर जो आकांक्षाएं हैं, वे दो विभिन्न रास्तों पर चलना चाहती हैं। ज्वार सा उमड़ता है।
यही वह द्वन्द है जो मनुष्य को मनुष्य बनाता है। भोगेच्छा और भगवदेच्छा भोगेच्छा संसार की ओर ले जाती है, यह सांसारिक सुख को ही जीवन की उपलब्धि मानती है।
दूसरी ओर इस सुख-दुख के झंझावात से उठकर फिर शांति की ओर बढ़ने की इच्छा उमड़ती है। वही भगवद् इच्छा है, जो मनुष्य को सांसारिक जगत में व्याकुल बनाये रखती है।
शास्त्रों में इसे ही ”योगमाया” कहा जाता है। यही मोक्ष अभिलाषा है, यही साधन यात्रा में साधक के मन में प्रयत्न उपस्थित करती है।
साधन यात्रा संसार से पलायन नही है।यह संसार के प्रति सभी संबंधों की तलाश है।
यहां जो प्रयत्न है, वह उस समझ पर आधारित है, जो उसे आभ्यान्तरिक प्रश्न के लिए प्रेरित करती है। वह अधूरापन जो उसे हर समय अशान्त रखता है- उसे दूर करने का है। इसलिए यहा व्यक्त्तिव का सम्पूर्ण रूपांतरण है। यहां आभ्यन्तर तथा बाहृा जीवन का एक ऐसा परिवर्तन है कि यहां देह परमात्म भाव के साथ ही परमात्म कर्म की साधन बन जाती है। इसीलिए साधन यात्रा की उपलब्धि सांसारिक देहात्म भाव से ऊपर उठकर आत्मानुभव ही नहीं, बल्कि साथ ही उस परमात्म भाव को जीवन तक भी ले जाना है।
आज के मनुष्य के सामने उसका अशांत मन ही कष्टकर है। वह पाता है कि अपने समस्त भौतिक प्रयत्नों के बाद भी वह विक्षोभ से बाहर नहीं निकल पाता है, वह इसी विक्षोभ को दूर करने के लिए कभी जगत में पूरी तरह बैठना चाहता है तो कभी इससे दूर कहीं और भागना चाहता है। मन जो बीमार है, अशांत है, एक पल को भी तो स्थिर नही रह पाता है। कभी अतीत में तो कभी भविष्य में दौड़ता ही रहता है। कितनी हिंसा भरी है। कितना गंदलाया जल है। सदा अपने को छोड़ परायी खिड़की में झांकता ही रहता है। क्योंकि वही तो इसका रस है। जब तक इसे संसार की समझ नहीं होती, तब तक मन का अपना जो स्वरूप है, वहां लौटना असम्भव है।
यह जो विक्षोभ है, उसका जनक यह संसार, और उसकी ओर ले जाने वाली आकांक्षाएं हैं। यही हम जान पाए है। अभिलाषा ही कारण है जो कार्य में परिणत होती हैं। ज्यों-ज्यों हम निम्न प्रकृति से मुक्त होने लगते हैं, त्यों-त्यों हम भगवतकृपा के हकदार बनते चले जाते हैं।साथ ही, जितनी भगवत्कृपा हम पर होगी उतनी ही निम्न प्रकृति की शुद्ध होेती रहेगी यह साधारण नियम है। इसीलिए बहिर्जगत में छोड़ने और छूटने के प्रति यहां अत्यधिक आग्रह नहीं है। जो कुछ छूटना है स्वतः ही होता जायेगा। जब हम इस यात्रा पर बढ़ेंगे। छोड़ता और ग्रहण करता मन ही है। मन का छोड़ा ही छूटा है और मन का ग्रहण किया चिपटाता है।
चित्त शुद्धि और भगवत् कृपा का पारस्परिक संबंध है। जितनी अधिक स्थिरता हम प्राप्त करते जाते हैं, उतनी ही अधिक भगवत कृपा हम प्राप्त करते हैं। यही साधना यात्रा है। इच्छा रूप ही संसार है और इच्छा निवृत्ति ही मोक्ष है। यही विक्षोभ का अन्त है। और प्राप्ति है- उस विराट शांति की, जिसके लिए हम इस अन्तर्यात्रा पर गतिशील हैं।
यह स्थिति जीवन और जगत से पलायन नही है। यहां जिसमें, जिस संसार की उपस्थिति है, उसका अभाव तो है, परन्तु अब जगत के प्रति जो अब तक संबंध था, वह भी तो परिवर्तित है।
यही वह स्थिति है, जहां साधक जीवन और जगत के प्रति सही संबंध स्थापित कर पाता है। आसक्ति के स्थान पर अनासक्ति, भोगेच्छा के स्थान पर भगवत इच्छा ! तभी तो कर्म का स्वरूप ही बदल जाता है।
यहां जगत के प्रति त्याग और सेवा ही शेष रह जाती है। ये शब्द मात्र शाब्दिक नहीं रह जाते हैं, वरन आचरण में स्वतः ही आ जाते हैं। यही तो भगवत्कर्म है, जो साधक को साधन यात्रा प्रदान करता है। यह स्थिति पलायन नही है। वरन जीवन की सही स्वीकृति है। जीवन कुशलता से जीने के लिए है और योग उसकी श्रेष्ठ कला है। अभिलाषाओं से सन्यास ही तो विक्षोभ का अन्त हे। यही तो मोक्ष है।
इसलिए हमें इसी जीवन में भगवत कृपा प्राप्त करनी है। और साथ ही इस शरीर में भगवत्कर्म से युक्त करना है।
अशांत मनुष्य के लिए उसका मन ही भार है। वह अनुकूलता की तलाश में इधर से उधर भटकता रहता है। उसका अशांत मन, कामनाओं की पूर्ति के लिए भटकता फिरता है।
प्रतिकूलताएं जहां उसे दुख देती हैं, वहीं अनुकूलताएं उसे गुलाम बनाती हैं। यही कारण है कि वह स्थिर नहीं रह पाता है। इसीलिए स्थूल देह की अपेक्षा मन जो है, वही महत्वपूर्ण है। इस मन का नियमन ही महत्वपूर्ण है।
इसीलिए अवलोकन के अलावा दूसरा कोई प्रयत्न नही है। इसी से ही विक्षोभ का अन्त संभव है। सच तो यह है कि अभिलाषाओं का ही नाम चित्त है। जब यह सांसारिक पदार्थों की इच्छा से रहित हो जाता है, तभी संकल्प त्याग संभव है। जो कुछ भी अतीत है, वहां मात्र स्मृतियां हैं। जन्म-जन्म के संस्कार हैं।
स्थिरता के लिए वांछनीय है-इन स्मृतियों का असहयोग। साधक को स्मृति मात्र से ही असहयोग सफलता देगा। मन का बार बार स्मृतियों में जाना तनाव ही लाता है। सच तो यह है कि स्मृति ही पाप है।
जो कुछ भी अतीत का संग्रहित है वह अशुभ ही अधिक है। सुखद है। यह वर्तमान पर अपनी काली छाया छोड़ता है। सच तो यह है कि हम स्मृतियों को ही ध्यान मान बैठे है। जमा की गई पूंजी ! जब तक यह ताला बन्द है मन का शांत भाव में आना असम्भव है।हर साधक प्रयोगशाला है। उसे चाहिए अनन्त धैर्य, अनन्त प्रतीक्षा, साधन के प्रति गहरा विश्वास ! जब तक विश्वास नहीं होगा- सफलता नहीं मिलेगी।
स्पष्ट है, ध्यान सजगतापूर्वक किया गया आंतरिक अवलोकन है। निरन्तर सजगतापूर्वक की गई मन की यह निगरानी स्थिरता अवश्य देगी। यहां कोई दबाव नहीं है। वरन् जो कुछ है वह सहज है। यहां किसी प्रकार का बाहृा-आरोपण नही है। नहीं, नया कुछ सीखना है। वरन जो जरूरी है, उसको ही छोड़ना है- इसी से ‘जो’ है उस स्वरुप का ज्ञान हो जाता है।
जरूरी नहीं है- आज जो मौन मिला है, वह दीर्घ हो। हो सकता है- क्षणिक हो।
आज होश कम रहा, नींद अधिक रही, पश्चाताप नहीं करना है। पुनः यात्रा पर गतिशील रहना है। टुकड़े टुकड़े जोड़ते हुए कभी तो सम्पूर्ण पाया जा सकता है। इतना धैर्य अवश्य रखना है।
प्रायः ध्यान को हमने अपने जीवन से अलग कोई निश्चित अभ्यास मान लिया है। जो आरोपित है। जिसके लिए परिवार, तथा समाज से महत्ता प्राप्त होना आवश्यक है। यह विचारणा अनुचित है।
ध्यान तो ‘जो’ जरूरी नही है उसका छूटना है। असाधन का त्याग ही- साधन है। ध्यान, सहज और साधक की आवश्यकताओं के अनुरूप है, उसके लिए प्रिय और मंगलकारी है।
जहां भी रहें, जब भी रहें, यह सतर्कता बनी रहें। हम वहीं रहें, उसी क्षण में रहें।
स्मृतियों तथा आकांक्षाओं से जाना ही होश खोना है। नींद में जाना है, वर्तमान से पलायन है। सजगता बनी रहे। जागरूकता रहे। हर पल, हर क्षण हमारी, हमारे कर्म में मौजूदगी रहे। इसीलिए साधन, साधक के लिए जिन्दगी से पलायन नहीं है। वरन जिंदगी को सुचारू रूप से जीने की कला है।
साधना की ओर
यह प्रश्न और कहीं नहीं, हर साधक के सम्मुख ही सबसे पहले उपस्थित होता है कि साधना क्यों ? हम चाहते क्या हैं ? मनुष्य की मांग क्या है ? अगर वह अपनी वर्तमान स्थिति से सन्तुष्ट है तो फिर यह प्रश्न उपस्थित ही नहीं होता है। परन्तु अगर उत्तर नहीं से आए...तो यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है।
जिसका पेट खाली है उसके सामने भूख का सवाल सबसे बड़ा है। लगता है यही सबसे बड़ी जरूरत है। नौकरी, और नौकरी उससे बड़ी नौकरी या बड़ी दुकान खोलना, सब पेट भरने का ही तो साधन है। पर पेट कितना बड़ा है,जितना धन होता है, उतना ही खाली रहता है। किसी तरह जब पेट भरता है, तब शरीर की भूख जगती है। इसीलिए शरीर की भूख न जगे, हजारों साल से पेट की भूख पर नियंत्रण रखने की बात कही जा रही है। अनशन, उपवास सब उसी के रूप हैं। पेट की भूख और शरीर की भूख जैविक आवश्यकताएं हैं। इससे इतर मनुष्य की मानसिक और बौद्धिक आवश्यकताएं भी बढ़ती हैं। कला और संस्कृति, सभ्यता और विकास यात्रा, इन्हीं का विस्तार है। सभ्यता, मनुष्य की बहिर्मुखता का ही विस्तार है। मन चंचल है, गत्यात्मक है, इसीलिए सभ्यता निरन्तर गतिशील है। पर यह मन की स्वाभाविक अवस्था नही है। वह कितना भी गति में क्यों न हो, सदैव नहीं रह सकता। उसे प्रशांिन्त की स्थिति में आना ही होता है। हर श्रम का प्रारम्भ और अन्त प्रशान्ति में है। नींद से उठकर मनुष्य सब कुछ करता हुआ नींद में जाना चाहता है। यही उसके सम्पूर्ण जीवन की यात्रा है।
विश्राम, मन की स्थिरता हैं, यही कला और संस्कृति आकार ग्रहण करती है। संस्कृति मन की अन्तर्मुखी यात्रा है।
यह भी मनुष्य की मांग है। यहां सुख भी है, शान्ति भी है।
पेट की भूख और शरीर की भूख के बाद विलासिता की भूख बढ़ती है। विलासिता का आधार आकांक्षा है, संसार इसी कामना का ही विस्तार है।
मनुष्य सम्भावना की भूख में रहता है, निरन्तर कुछ न कुछ होने की सम्भावना। दैविक आवश्यकताओं के ऊपर मानसिक और बौद्धिक आवश्यकताएं है। यह जो भूख है, उसका आधार आकांक्षा है।
और इन सब आवश्यकताओं का एक लम्बा सिलसिला है, जिसमें कि मनुष्य उलझता है।
सवाल फिर खड़ा होता है।
यह सब क्यों ? मैं इतना सब कुछ क्यों चाहता हूं ? मैं आखिर जीवित ही क्यो हूं ? मैं इस लंबी यात्रा पर निरन्तर चल ही नहीं रहा हूं, दौड़ रहा हूं, आखिर किसलिए ?
पेट की भूख, समाप्त होते ही, तुष्टि देती है। शरीर अपनी कामक्षुधा की तृप्ति के बाद क्षणिक तुष्टि लेता है। सिलसिला रूकता नहीं है, चलता रहता है। पढ़ना रोज पढ़ना नौकरी तक। नौकरी से और दूसरी बड़ी नौकरी तक धन की ललक। आदिम पारस की ललक जो वस्तुएं देंगी। वस्तुएं जिनसे परितुष्टि प्राप्त होगी। शरीर क्षणिक है, जर्जर है, कब ढह जाए, इसीलिए अमृत की खोज हुई। शरीर ही नहीं रहा, तब तुष्टि किसे ?
अकसर इन्हीं सबके लिए उमर बीत जाती है।
मन्दिर, यज्ञ, तप, स्वाध्याय, गुरू भण्डारे इन सबके पीछे जो भीड़ है, वह क्या चाहती है ?
तुष्टि का अगाध भण्डार ! उसकी तृप्ति में कभी कोई कमी न आए। यही सुखोपासना सभ्यता का केन्द्र है।
संकल्प पूर्ति सुख देती है, और संकल्प पूर्ति का अभाव दुख देता है। यही सुख दुख की यात्रा है।
मनुष्य सुख चाहता है, मात्र सुख !
सुख अल्प है, दुःख अनन्त है।
इसीलिए ईश्वर की खोज है। एक बड़े आधार की खोज, जो दुख दूर करेगा अनवरत सुख देगा।
अनन्त सुख !
और यही नही मिलता है।
शेष रह जाता है विक्षोभ, व्यथा, दुख का प्रभाव यहीं से साधन यात्रा शुरू होती है।
स्थायी सुख की खोज शान्ति की खोज !
जहां अमृत है !
कामना पूर्ति से प्राप्त तुष्टि का भाव ही सुख है। यह क्षणिक है। मन कामनाओं का सागर है।
एक कामना की पूर्ति हो, इसके पूर्व ही हजारों कामनाएं पैदा हो जाती हैं। क्या वे सब पूरी हो पाती हैं ?
वस्तुगत उपलब्धियों की खोज में व्यक्ति डूबा रहता है। वे ही जीवन का साध्य हो जाती हैं।
और इधर जीवनी शक्ति निरन्तर क्षीण होती चली जा रही है। भारी छटपटाहट है।
वस्तु में सुख तलाशा, प्रयास किया। पर जब तक वस्तु आई शरीर धोखा दे रहा है।
लौटकर दुख ही शेष रहता है। विक्षोभ का धारावाही व्यूह मनुष्य को जकड़े रहता है।
सामान्यतः यही मनुष्य की यात्रा है।
मनुष्य यह मानकर चलता है कि यह जो दूसरा है, वह उसे सुख देगा। दूसरे की खोज ही संसार की यात्रा है। दूसरा पिता में, पत्नी में, पुत्र में समाज में, धन में मकान मेे, यश में हर जगह ढूंढा जाता है।
सुख दूसरे से ही प्राप्त होगा, यह वह मानता है, और दुख ?
इस सवाल पर वह सोचता ही नही है।
यह जो दूसरा है। जो संसार है, क्या कभी उसकी आवश्यकता की पूर्ति कर पाता है ?
और सच तो यह है कि यह जो दूसरा है। हमेशा कल में ही आता है। दूसरा, जो है, जीवेषणा में है। कामना में है।
उसका आकर्षण यही है कि उसके आधार पर भविष्य की आशा शेष है।
इसीलिए मनुष्य भगवान को अपने से अलग मानता है, उनसे कुछ मांगता है और इसी तरह वह इस आशा में जीवित रहता है कि वह जो दूसरा है, उसे आज नहीं तो कल सुख ही देगा।
जहां मनुष्य अपने स्वरूप को छोड़कर, अपने स्वभाव से अनभिज्ञ रहकर दूसरे से जुड़ता है, वहीं वह दुख पाता है। यह जो दूसरा है, उसका कभी नहीं हुआ। क्योंकि वह उसका है ही नहीं। उसकी इससे नित्य दूरी है। इसलिए इस दूसरे के लिए, जो संसार है, शरीर है, धन है, परिवार है, सुख की लालसा बनी हुई है। वह कभी पूरी होगी कि नहीं ? मनुष्य उसे ही पा सकता है, जो कि उसका है। सदा से उसका रहा है।हां, आज भले ही उसकी विस्मृति हो गई हो।
लेकिन होता यह नहीं है, मनुष्य जो उसका है, जो वह है, उसे छोड़कर जो उसे कभी प्राप्त नहीं होने वाला है, निरन्तर परिवर्तनशील है, उसे चाहता है और जब वह उसे नहीं मिलता है, तब वह दुखी होता है। विक्षोभ जग जाता है। दुख का कारण है- अपने को छोड़कर, पराये सुख की खोज करना।
जो स्वभाव है, उसे भूलकर जो नहीं है, उसमें डूबना।
जब तक स्वयं की समझ नहीं होती। दुख के कारण ही तलाश नहीं होती। तब तक यह दूसरा ही महत्वपूर्ण रहता है।
यही विडम्बना है।
दुख दुखी के उद्धार के लिए आता है। उसकी समझ को जाग्रत करता है। पर वह लोलुपता के अधीन होकर सुख की तलाश में भटकता रहता है।
इसीलिए दुख और उसका प्रभाव आदर के योग्य है। यही प्रभाव अपनी तीव्रता में ‘जो है’ उसके प्रति ध्यान दिलाता है। जब वह पाता है कि संसार उसकी आवश्यकता की पूर्ति में सहायक नही है तभी वह अन्वेषी बनता है। खोजी होता है।
‘जो’ अब तक विस्मृति में था, उसकी स्मृति ही जिज्ञासा जगा देती है। जिज्ञासा जगते ही विवेक का आदर होता है। विवेक था, अभी भी जीवन में था, पर बुद्धि का आदर था। विवेक तिरस्कृत था। विवेक का आदर होते ही, अविवेक छूटता है। विवेक ‘जो’ है, उसके प्रति आदर भाव तथा जो नहीं है, उसके प्रति अनादर भाव का भाव जगाता है। आदर का भाव ज्यों-ज्यों दृढ़ होता जाता है, आचरण में स्वाभाविक परिवर्तन आता है। जिसे छूटना है, वह छूटना शुरू हो जाता है। अविवेक से ही बुरे भाव और बुरे कर्म होते हैं। विवेक के जाग्रत होते ही, जो कुछ श्रेष्ठ है,वह आचरण में आने लगता है। साधन प्रारम्भ हो जाता है। साधन कहीं बाहर नहीं अपने पास ही है।
अपनी आवश्यकताओं को समझा जाए। मन का आगे पीछे का चिन्तन ही बाधक है, जो स्मृतियों तथा आकांक्षाओं में डूबा रहता है। यही अविवेक है। यही विक्षोभ का कारण है। इसीलिए आवश्यक है कि पहले निज के विक्षोभ को समझा जाए। जब तक विक्षोभ की समझ नही होगी, तब तक बाहर आने का सार्थक प्रयास भी नहीं हो सकता।
वह सोचता है कि जो दुख दूर कर देगा। जीवन भर भौतिक वस्तुओं की अप्राप्ति ही दुख बन जाती है। वस्तुओं की दासता और उनकी अप्राप्ति दुख का बहुत बड़ा कारण हो जाती है। वह वस्तुओं से अपने आपको बाहर ला नहीं पाता। वह उनकी प्राप्ति के लिए छटपटाता रहता है। यह प्राप्ति ओस कणों से प्यास बुझाने की तरह है। उसकी सांसारिक भूख उसी तरह आजीवन कायम रहती है। कभी-कभी अवसर आता है, विवेक कौंध जाता है। उसे लगता है कि कामनाओं की पूर्ति से प्राप्त तुष्टि क्षणिक है। हर कामना पूरी भी नहीं होती। अतृप्त कामनाएं असंख्य रहती हैं। अपूर्ति से विक्षोभ दुख का अनवरत प्रवाह कायम रहता है।
कभी कभी विवेक का आदर जब साधक करता है, तो व्याकुलता बढ़ती है। जिज्ञासा बढ़ती है। वह अविवेक को समझ जाता है, समझ बढ़ते ही वह साधन यात्रा पर बढ़ जाता है। अन्यथा वह पुनः विवेक का अनादर करते ही सांसारिक प्रवाह मे डूबता चला जाता है।
कामना निवृत्ति ही शांति में प्रवेश कराती है।
यहां सरोवर की लहरें शांत हैं। तली स्पष्ट दिखाई देने लगती है। चित्त दर्पण है। पक्षी उड़ा तो लगा, वह यह दिखा। जब तक वह उड़ता रहा, बिम्ब रहा। जाते ही जल, फिर वही दर्पण का दर्पण !
यही तो प्रशांत मन है।
जो है उसी पर ध्यान केन्द्रित रहे, यही साधन है। जो निरन्तर बदलता रहा है, वही गलत है। वह स्वरूप नहीं है। उससे छूटते ही स्वरूप उपलब्ध होता है। जो भी बदल रहा है, वह मैं नहीं हूं। यह शरीर जो मुझे मिला है, क्या मैं हूं ? यह संसार जो बदल रहा है, क्या मैं हूं ? शरीर मन और संसार सब बदल रहे हैं। संसार मन का ही तो विस्तार है। जगत और शरीर प्रतिरूप ही हैं। जो निरन्तर बदल रहा है, वह सत्य नहीं है। जो असत्य है उसी पर ही तो ध्यान है। उसी का ही चिन्तन है। उसी की ही खोज है। उससे ध्यान हटाना ही ध्यान है। वह तो है, उस पर जब ध्यान पहुंचता है, तभी स्वरूप उपलब्ध होता है। तभी स्थिरता प्राप्त होती है।
इसीलिए ध्यान जो है उसके अवलोकन की कला है। यह शरीर जिस इन्द्रिय के द्वारा यह कार्य कर पाता है वह मन है। तभी तो सारा बह्माण्ड इसी से हलचल लेता हुआ दिखाई पड़ता है। मन की गति असाधारण है, कहा जाता है कि प्रकाश की गति भी उसके सामने कुछ नहीं है। इसीलिए ध्यान आन्तरिक अवलोकन ही कहा गया है। प्रायः ध्यान का अर्थ मानसिक एकाग्रता के लिए लिया जाता है। मन के द्वारा किसी यन्त्र रूप या नाम के प्रति सजगता पूर्वक रखी गई एकाग्रता ही आजकल ध्यान कही जाती है। यह याद रखिए ध्यान, एकाग्रता नहीं है। एकाग्रता मन की बहिर्मुख वृत्तियों को किसी नाम, रूप या मन्त्र पर केन्द्रित करने का अभ्यास ही है। परन्तु एकाग्रता को ही साधना-यात्रा स्वीकारने से साधक, साधन पथ को ही छोड़ बैठता है।
हमारे संकल्प से निश्चित की गई, यह देव प्रतिमा, यह मन्त्र, यह नाम, फिर इतना शक्तिशाली हो जाता है कि मन उससे छूट नहीं पाता, और जो होना चाहिए था, वह नहीं हो पाता है। चित्त पुनःऔर अशांत हो जाता है। अप्रमाद के स्थान पर प्रमाद पुनः उपस्थित हो जाता है।
”ध्यान” एकाग्रता नही है।
ध्यान सतर्कता सहित आंतरिक विचारणा का अवलोकन है। हम जो भीतर हैं, वही वास्तव है। उस वास्तव की सही-सही विश्वसनीय पहचान ही ध्यान प्रक्रिया है। हम जो है, एक स्थिर इकाई नही हैं। हर क्षण हम बदल रहे हैं। जो चीज बदल रही है, वह हमारी आंतरिकता नहीं है।
मन के संकल्प-विकल्प की अनवरत श्रंखला है। इसी श्रंखला, इसी विचारणा का सतर्कतापूर्वक किया गया अवलोकन ही ध्यान है।
अवलोकन दूसरे शब्दों में मात्र देखना।
बाहर नहीं भीतर देखना है। देखते समय ईमानदारी यही रखनी है कि किसी प्रकार का कोई पूर्वाग्रह नही ंरखना है। बनी बनायी पूर्व निर्धारित को क्या देखना। जो बात तय कर ली जाय, जैसे कोई नाम, कोई रूप, उसका अवलोकन ध्यान नहीं है। यहां जो लहरें उठ रही हैं, उन्हें बिना किसी तिरस्कार के, बिना किसी चश्में के देखना है, यहां पर सम्पूर्ण विचारणा को उसके वास्तविक रूप में देखने का प्रयास है।
यह अवलोकन ही क्रमशः स्थिरता प्रदान करता है।र्
िस्थरता ही साधना का लक्ष्य है।
मन का आगे पीछे का चिन्तन ही बेहोशी है। यह वर्तमान से पलायन है। यह नींद है।
सच है, हम जागते हुए भी सोए रहते हैं। कोई पूछे तो हमें लगता है, हम कहीं और थे। यही विवशता असाधन है। इसका त्याग होते ही साधन स्वयं प्राप्त हो जाता है। यह साधन अगर साधक में पर्याप्त धैर्य रहा तो अवश्य ही साध्य से मिलायेगा।
मन की गति असाधारण है। क्षणभर मे ही न जाने कहां से कितनी बातें आ जाती हैं। चित्र ही चित्र ! न जाने कितने युगों से हम चित्र ही चित्र सहेजते आ रहे हैं। ये ही स्मृतियां हैं, जिन्हें हम मन मान बैठे हैं। मन जब इनके साथ सहयोग करता है, तो ये गाढ़ी हो जाती हैं। मूलधन ब्याज कमा लेता है।
मन अगर स्मृतियों के साथ असहयोग करे तो मूलधन ही खर्च होना शुरू हो जाता है।
यही हमें करना है।
यहां न कुछ अच्छा है,न बुरा।
अन्यथा हम सही रूप को जान ही नहीं पायेंगे। जो कुछ है, भीतर है। अंधेरी बावड़ी में रखा हुआ है। उसे बाहर तो आने दें। जहां अस्वीकार किया, वहीं ध्यान ध्यान नहीं रहा। प्रायः अपने भीतर के गंदलाए जल को देखकर हम चैंक जाते हैं। और अस्वीकार करने लग जाते हैं। या उससे बचकर ईश्वर के किसी रूप या नाम में डूबने लगते हैं। यह क्या है, यह तो पागलपन है। परमात्मा का मार्ग कायरता का मार्ग नहीं है। यह अज्ञान है। यहां हमारी जागरूकता यही है कि हमारी उपस्थिति बनी रहे, जहां हम हैं, हाजरी रहे।
छात्र कक्षा मे आते है। पर जरा पूछो तो लगता है- यहां थे ही कहां, कहीं और थे। गायब।
”ध्यान” गायब होने का नाम नही, साक्षत अनुभवन है। जो कुछ है,विश्वसनीय साक्षात्कार यहां है।
यही ध्यान उस विराट आनन्द स्रोत से हमें जोड़ देता है, जो हमारा साध्य है। इसीलिए ध्यान मात्र प्रक्रिया ही नहीं है। हर प्रकार की क्रिया का यहां अन्त भी है।
यहां सब प्रकार के बंधन छूट जाते हैं। ज्ञान की अग्नि उठते ही अज्ञानरूपी कूड़ा कचरा जलकर राख हो जाता है। बंधन वे पाश जिनसे हमने अपने आप को बांध रखा है, टूट जाते हैं। संसार के प्रति उमड़ती हुई कामनाओं के बादलों के हटते सी शेष रह जाता है, खुला आकाश, निरभ्र और शांत, जहां फिर कोई अभाव नहीं।
अगर हमारे पास थोड़ा सा अवकाश हो, और हम अपने आपको सामने रखकर देखें तो पाऐंगे, हमारे भीतर जो आकांक्षाएं हैं, वे दो विभिन्न रास्तों पर चलना चाहती हैं। ज्वार सा उमड़ता है।
यही वह द्वन्द है जो मनुष्य को मनुष्य बनाता है। भोगेच्छा और भगवदेच्छा भोगेच्छा संसार की ओर ले जाती है, यह सांसारिक सुख को ही जीवन की उपलब्धि मानती है।
दूसरी ओर इस सुख-दुख के झंझावात से उठकर फिर शांति की ओर बढ़ने की इच्छा उमड़ती है। वही भगवद् इच्छा है, जो मनुष्य को सांसारिक जगत में व्याकुल बनाये रखती है।
शास्त्रों में इसे ही ”योगमाया” कहा जाता है। यही मोक्ष अभिलाषा है, यही साधन यात्रा में साधक के मन में प्रयत्न उपस्थित करती है।
साधन यात्रा संसार से पलायन नही है।यह संसार के प्रति सभी संबंधों की तलाश है।
यहां जो प्रयत्न है, वह उस समझ पर आधारित है, जो उसे आभ्यान्तरिक प्रश्न के लिए प्रेरित करती है। वह अधूरापन जो उसे हर समय अशान्त रखता है- उसे दूर करने का है। इसलिए यहा व्यक्त्तिव का सम्पूर्ण रूपांतरण है। यहां आभ्यन्तर तथा बाहृा जीवन का एक ऐसा परिवर्तन है कि यहां देह परमात्म भाव के साथ ही परमात्म कर्म की साधन बन जाती है। इसीलिए साधन यात्रा की उपलब्धि सांसारिक देहात्म भाव से ऊपर उठकर आत्मानुभव ही नहीं, बल्कि साथ ही उस परमात्म भाव को जीवन तक भी ले जाना है।
आज के मनुष्य के सामने उसका अशांत मन ही कष्टकर है। वह पाता है कि अपने समस्त भौतिक प्रयत्नों के बाद भी वह विक्षोभ से बाहर नहीं निकल पाता है, वह इसी विक्षोभ को दूर करने के लिए कभी जगत में पूरी तरह बैठना चाहता है तो कभी इससे दूर कहीं और भागना चाहता है। मन जो बीमार है, अशांत है, एक पल को भी तो स्थिर नही रह पाता है। कभी अतीत में तो कभी भविष्य में दौड़ता ही रहता है। कितनी हिंसा भरी है। कितना गंदलाया जल है। सदा अपने को छोड़ परायी खिड़की में झांकता ही रहता है। क्योंकि वही तो इसका रस है। जब तक इसे संसार की समझ नहीं होती, तब तक मन का अपना जो स्वरूप है, वहां लौटना असम्भव है।
यह जो विक्षोभ है, उसका जनक यह संसार, और उसकी ओर ले जाने वाली आकांक्षाएं हैं। यही हम जान पाए है। अभिलाषा ही कारण है जो कार्य में परिणत होती हैं। ज्यों-ज्यों हम निम्न प्रकृति से मुक्त होने लगते हैं, त्यों-त्यों हम भगवतकृपा के हकदार बनते चले जाते हैं।साथ ही, जितनी भगवत्कृपा हम पर होगी उतनी ही निम्न प्रकृति की शुद्ध होेती रहेगी यह साधारण नियम है। इसीलिए बहिर्जगत में छोड़ने और छूटने के प्रति यहां अत्यधिक आग्रह नहीं है। जो कुछ छूटना है स्वतः ही होता जायेगा। जब हम इस यात्रा पर बढ़ेंगे। छोड़ता और ग्रहण करता मन ही है। मन का छोड़ा ही छूटा है और मन का ग्रहण किया चिपटाता है।
चित्त शुद्धि और भगवत् कृपा का पारस्परिक संबंध है। जितनी अधिक स्थिरता हम प्राप्त करते जाते हैं, उतनी ही अधिक भगवत कृपा हम प्राप्त करते हैं। यही साधना यात्रा है। इच्छा रूप ही संसार है और इच्छा निवृत्ति ही मोक्ष है। यही विक्षोभ का अन्त है। और प्राप्ति है- उस विराट शांति की, जिसके लिए हम इस अन्तर्यात्रा पर गतिशील हैं।
यह स्थिति जीवन और जगत से पलायन नही है। यहां जिसमें, जिस संसार की उपस्थिति है, उसका अभाव तो है, परन्तु अब जगत के प्रति जो अब तक संबंध था, वह भी तो परिवर्तित है।
यही वह स्थिति है, जहां साधक जीवन और जगत के प्रति सही संबंध स्थापित कर पाता है। आसक्ति के स्थान पर अनासक्ति, भोगेच्छा के स्थान पर भगवत इच्छा ! तभी तो कर्म का स्वरूप ही बदल जाता है।
यहां जगत के प्रति त्याग और सेवा ही शेष रह जाती है। ये शब्द मात्र शाब्दिक नहीं रह जाते हैं, वरन आचरण में स्वतः ही आ जाते हैं। यही तो भगवत्कर्म है, जो साधक को साधन यात्रा प्रदान करता है। यह स्थिति पलायन नही है। वरन जीवन की सही स्वीकृति है। जीवन कुशलता से जीने के लिए है और योग उसकी श्रेष्ठ कला है। अभिलाषाओं से सन्यास ही तो विक्षोभ का अन्त हे। यही तो मोक्ष है।
इसलिए हमें इसी जीवन में भगवत कृपा प्राप्त करनी है। और साथ ही इस शरीर में भगवत्कर्म से युक्त करना है।
अशांत मनुष्य के लिए उसका मन ही भार है। वह अनुकूलता की तलाश में इधर से उधर भटकता रहता है। उसका अशांत मन, कामनाओं की पूर्ति के लिए भटकता फिरता है।
प्रतिकूलताएं जहां उसे दुख देती हैं, वहीं अनुकूलताएं उसे गुलाम बनाती हैं। यही कारण है कि वह स्थिर नहीं रह पाता है। इसीलिए स्थूल देह की अपेक्षा मन जो है, वही महत्वपूर्ण है। इस मन का नियमन ही महत्वपूर्ण है।
इसीलिए अवलोकन के अलावा दूसरा कोई प्रयत्न नही है। इसी से ही विक्षोभ का अन्त संभव है। सच तो यह है कि अभिलाषाओं का ही नाम चित्त है। जब यह सांसारिक पदार्थों की इच्छा से रहित हो जाता है, तभी संकल्प त्याग संभव है। जो कुछ भी अतीत है, वहां मात्र स्मृतियां हैं। जन्म-जन्म के संस्कार हैं।
स्थिरता के लिए वांछनीय है-इन स्मृतियों का असहयोग। साधक को स्मृति मात्र से ही असहयोग सफलता देगा। मन का बार बार स्मृतियों में जाना तनाव ही लाता है। सच तो यह है कि स्मृति ही पाप है।
जो कुछ भी अतीत का संग्रहित है वह अशुभ ही अधिक है। सुखद है। यह वर्तमान पर अपनी काली छाया छोड़ता है। सच तो यह है कि हम स्मृतियों को ही ध्यान मान बैठे है। जमा की गई पूंजी ! जब तक यह ताला बन्द है मन का शांत भाव में आना असम्भव है।हर साधक प्रयोगशाला है। उसे चाहिए अनन्त धैर्य, अनन्त प्रतीक्षा, साधन के प्रति गहरा विश्वास ! जब तक विश्वास नहीं होगा- सफलता नहीं मिलेगी।
स्पष्ट है, ध्यान सजगतापूर्वक किया गया आंतरिक अवलोकन है। निरन्तर सजगतापूर्वक की गई मन की यह निगरानी स्थिरता अवश्य देगी। यहां कोई दबाव नहीं है। वरन् जो कुछ है वह सहज है। यहां किसी प्रकार का बाहृा-आरोपण नही है। नहीं, नया कुछ सीखना है। वरन जो जरूरी है, उसको ही छोड़ना है- इसी से ‘जो’ है उस स्वरुप का ज्ञान हो जाता है।
जरूरी नहीं है- आज जो मौन मिला है, वह दीर्घ हो। हो सकता है- क्षणिक हो।
आज होश कम रहा, नींद अधिक रही, पश्चाताप नहीं करना है। पुनः यात्रा पर गतिशील रहना है। टुकड़े टुकड़े जोड़ते हुए कभी तो सम्पूर्ण पाया जा सकता है। इतना धैर्य अवश्य रखना है।
प्रायः ध्यान को हमने अपने जीवन से अलग कोई निश्चित अभ्यास मान लिया है। जो आरोपित है। जिसके लिए परिवार, तथा समाज से महत्ता प्राप्त होना आवश्यक है। यह विचारणा अनुचित है।
ध्यान तो ‘जो’ जरूरी नही है उसका छूटना है। असाधन का त्याग ही- साधन है। ध्यान, सहज और साधक की आवश्यकताओं के अनुरूप है, उसके लिए प्रिय और मंगलकारी है।
जहां भी रहें, जब भी रहें, यह सतर्कता बनी रहें। हम वहीं रहें, उसी क्षण में रहें।
स्मृतियों तथा आकांक्षाओं से जाना ही होश खोना है। नींद में जाना है, वर्तमान से पलायन है। सजगता बनी रहे। जागरूकता रहे। हर पल, हर क्षण हमारी, हमारे कर्म में मौजूदगी रहे। इसीलिए साधन, साधक के लिए जिन्दगी से पलायन नहीं है। वरन जिंदगी को सुचारू रूप से जीने की कला है।
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