Wednesday, June 10, 2009

जीवन का स्त्रोत












मरने की कला

जिस दुनिया में हम रह रहे हैं, वह उस दुनिया से अलग नहीं है जो हमारे भीतर है,
हमारे और दुनिया के बीच में जो बंटवारा है, वह अस्वाभिवक है, जैसी दुनिया से बाहर है, हम भी भीतर वैसे ही है।
हम बाहर प्रेम तलाश करते हैं, सहानुभूति पाना चाहते हैं, सहृदयता चाहते हैं, पर क्या वह हमारे भीतर भी है? कभी जाना। हम जैसे है, बाहर की दुनिया भी वैसी ही है।
जब हमारे भीतर मौलिक परिवर्तन होगा, हमारे विचारों में, हमारे भावों में, हमारे व्यवहार में, बाहर भी हम वैसा ही परिवर्तन पाएंगे।
हमें अपने आपको, अपने आपके द्वारा समझना है, कोई दूसरा हमें हमारे बारे में समझा नहीं सकता।
हमारी अपने बारे में गहरी समझ ही, हमें अपने बारे में सही बता सकती है, और कोई दूसरा नहीं।
-जब हम आदर्शों के हिसाब से जीवन शुद्ध कर देते हैं, हमने तो हमारा काम कर दिया, जिम्मेदारी पूरी कर दी, हम समझते हैं, हम भले हैं, पर यह मात्र भौतिकवादी क्रियाकलाप ही रहता है, इसमें भावना का पोषण छूट जाता है, यह मात्र एक औपचारिक घटना होकर रह जाती है। हम तब वास्तविकता के साथ जुड़ नहीं पाते हैं। न ही हम अपने आपको सही रूप में समझ पाते हैं।

-हमारे विचार, हमारी मन-स्थिति, हमारी धारणाएं जो हमारी जीवन शैली को बनाती है, वे टुकड़ों में बंटी हुई है। हमारे विचार परस्पर विरोधी विचार भी है, जहां हम रहते हैं हमें अपने भीतर इस अराजक स्थिति को देखना होगा। उन कारणों को पहचानना होगा जहां से यह सारी अनियमितता पैदा होती है।
अपने आपको जब हम देखने का प्रयास करते हैं, तब हम पाते हैं कि हमारा अपना नजरिया न दूसरों के प्रति वरन अपने प्रति भी पूर्वाग्रह से भरा हुआ है। हम अपने आपको भी देखने में स्वतंत्र नहीं है। हमारे विचार, हमारी मान्यताएं, हमारे समाज व संस्कृति से प्रभावित है। हमारे भीतर जो मन है, जो दृष्टा है, वह स्वयं रंगा हुआ है। वह निर्मल नहीं है। स्वच्छ नहीं है। हमें कैसे देखना है, क्या देखना है, सब पूर्वाग्रह से ग्रसित है। यही हमारे भय का कारण है।
-पूर्वाग्रह से रहित होना, स्वतंत्र होने की पहली शर्त है। हमें अपने प्रति यह सजगता लानी होगी कि हम जिस प्रकार सोचते हैं, क्या सोचते हैं, क्यों सोचते हैं, हमारे विचार क्या हैं? न तो हमें उनकी निंदा करनी है न उसके साथ बढ़ना है। मात्र उन्हें स्पष्टता में, जैसे ही वे आ रहे हैं, उन्हें देखते रहना है। तब हम धीरे-धीरे यह समझने में सफल हो जाते है कि हमारे विचारों का ढांचा किस प्रकार का है, हम ऐसा ही क्यों सोचते हैं। तब हम अपने मन को विचारों की शृंखला से मुक्त कर पाने मे ंसफल हो पाते हैं।
गीता में भी कहा गया है- ‘श्रिप्रं भवति धर्मात्मां, या तो आप तुरंत बदल सकते हैं, या कभी नहीं, यह परिवर्तन शृंखला में नहीं होता है। मौलिक परिवर्तन त्वरित घटता है। उसके लिए आवश्यक है कि हम इस विधि के, इस प्रक्रिया को गंभीरता से ले- हम अपने जीवन को घटता हुआ देखें, हम अपने विचारों को देखें, ‘अपने क्रियाकलापों को देखें। तब हमारे और जिसे हम देखना चाहते हैं, उसके बीच दूरी नहीं होती है। यह इसी विचारों के कारण से होती है।
मेरे भीतर भय है, जब मैं अपने भय को सीधे देखता हूं, मुझमें और भय के भीतर कोई अंतराल नहीं है, न ही में भागना चाहता हूं, न ही लड़ना चाहता हूं, तब पाया भय मुझसे दूर नहीं रहता है। इस दूरी के टूटते ही, जो दिख रहा था, जो देख रहा था, दोनों में एक रूप होते ही समय का अंतराल विदा हो जाता है।
जीवन क्या है, मृत्यु क्या है, रहना क्या है?
हमारे जीवन का एक मात्र ध्येय अधिक से अधिक सुख पाना है। पर जहां सुख है, वहीं उसके पीछे भय और दुख भी छिपा हुआ है। सुख-शारीरिक है, मानसिक है बौद्धिक है स्वास्थ्य है, काम है, प्रशंसा है, सम्मान है, हमने सुख को ही जीवन की अनिवार्यता मान लिय है। हमने सुख को इतना महत्व क्यों दिया है? जीवन अनुभवों की एक अनवरत शृंखला है। हम उन अनुभवों को नहीं चाहते हैं, जो दुखात्मक है। बीमारी है, असफलता है, मृत्यु है, नाश है, नहीं चाहते हैं। जहां सुख मिल सकता है, संभावना भी है, वहां हम उसे पाने के लिए भागते हैं, मंदिर में, पूजा में, तंत्र में, राजनेताओं के पास, धन लिप्सा में, सुंदर भोजन में, कहां नहीं जाते। हम सुख पाना चाहते हैं, सुख इसीलिए हमें खींचते हैं।
आखिर यह सुख कहां है? कहां रहता है, जाना जो भोग हुआ है उसकी मधुर छाप स्मृति पर रह जाती है, वह बार-बार उसकी पुनरावृत्ति चाहती है। जब भी अनुभव नया हो उसके पूर्व स्मृति उस क्षण को निकाल लाती है। वहां नया अनुभव नहीं होता, मात्र एक दोहराव रहता है, वह भी यांत्रिक सा हो जाता है।
... तब जो अनुभव विचार ने संग्रहित कर, बाहर फैंका था, वह विचार भय तथा दुख को भी संग्रहित कर निरंतर बाहर लाता रहता है। कल क्या होगा? आज यह दुख आया है, भोगा है,उसकी कटु स्मृतियां कल भी आ सकती है, यही भय है।

यही विचार जो सुख को जगाता रहता है, यही भय को, दुख को भी पैदा करता रहता है। हमारा सादा जीवन इन्हीं स्मृतियों का ही विकास है। एक निरंतर संघर्ष, दुख और सुख का बना रहता है। और हमारा जीवन हम ध्यान से देखें तो दुख से अधिक भरा हुआ है। जहां सुख है, वहां भय भी साथ रखा हुआ है।
हमारे अतीत में जहां सुख का संग्रह कम है, वहां भय और दुख की छाप अधिक संग्रहित है। प्रश्न उठता है, क्या हम इन सबको जो अतीत का हिस्सा बन चुका है, एक साथ हटा सकते हैं?
तब एक ही प्रश्न शेष रह जाता है कि क्या विचार जो दुख और सुख को एक सातव्य एक निरंतरता प्रदान करता है, रूक सकता है, अप्रभावी हो सकता है कि वह दुख और सुख को स्थायित्व नहीं दे पाए, उसे आधार न दे पाए। हम यह जान चुके हैं कि विचार ही उसे आधार देता है, तब क्या विचार से मुक्त हुआ जा सकता है?
विचार तो रहेगा, तथ्यात्मक विचार के आधार पर बाह्य संसार चल रहा है, पर हम यहां मनोवैज्ञानिक विचार की बात कर रहे हैं जो मात्र हमारी स्मृति का भंडार है, अवधारणाओं का जनक है, अनावश्यक विचारणा यहा से निरंतर प्रभावित होती रहती है। भीतर हमारे अंतर्जगत में इस मनोवैज्ञानिक विचार के लिए कोई आधार नहीं है क्योंकि जहां यह सुखात्मक अवधारणा को रखता है वहीं यह भय और दुख का जनक भी है। जहां आवश्यक हो, वहां विचार का सहयोग ले, अन्यथा उससे अप्रभावित रहे। मात्र देखें। तब यह संभव हो जाता है कि हम वास्तविक अनुभव के साथ रहें, उसमें जीएं, तब विचार का अनावश्यक दखल कम होता जाता है। तब हम उस वास्तविक क्षण में जीने में समर्थ हो जाते हैं जो हमेशा ‘वर्तमान होता है।

मृत्यु क्या है, हम मृत्यु के नाम से भय खाते हैं। जानते हैं, कहना कठिन है, जो सामने अभी था, वह नहीं रहा है। मात्र उसकी स्मृतियां रह जाती है। हर याद, उसके न होने की पीड़ा का दंश दे जाती है। कटुता खिन्नता हृदय दुखों के सागर में डूब जाता है। अपनी मौत का इतना दुख नहीं होता, जितना परिजन की मृत्यु का होता है। अपनी मौत का मात्र भय होता है। जबकि हम जानते हैं कि हम स्वयं मरने की ओर ही जा रहे हैं। हम मृत्यु शब्द से ही डरते हैं। हम इस बारे में विचार ही नहीं करते हैं। स्मृति हमेशा अतीत की होती है। मृत्यु भविष्य में है, अतः वहां कल्पना का आधार ही नहीं मिलता है।

मृत्यु- पंचमहाभूतों से जोे शरीर बना है, उसका स्वाभाविक विसर्जन है। इसीलिए बुढ़ापा, बीमारी, दुर्घटना जो मृत्यु के वाहक हैं,, भयभीत करते रहते हैं। हम पुनर्जन्म की चर्चा करते हैं, पर अभी तक उसका वैज्ञानिक आधार तलाश नहीं कर पाए हैं, पर हमारी मान्यताएं दृढ़ है।

हम चाहते हैं, मृत्यु टल जाए, हमारी पूजा, प्रार्थना, प्रार्थना यहां तक की ध्यान का भी अभिप्राय यही रहता है। हम दुख नहीं चाहते है। मृत्यु सबसे अधिक भयावह है, हम उससे दूर जाना चाहते हैं।

तब प्रश्न उठता है कि हम जो कुछ भी हमारा जाना गया है, हमारे भीतर स्मृति है, उससे मनोवैज्ञानिक रूप से उसके बोझ से उसकी आसक्ति से हट सकंे। उसके प्रति मर सकंे। यहां शारीरिक मृत्यु की बात नहीं है, हमारी जो आसक्ति है, जो चिपकाव है, यहां उसकी मृत्यु की बात हो रही है, क्या कभी हमने उस सुखात्मक क्षण को, अनुभव को, याद को जिसे हमने बहुत संभालकर अपने भीतर रख रखा है, क्या उसे हटने दिया है, क्या उसे अप्रभावी होने दिया है? क्या हम उसे भूल पाए हैं? लेकिन यदि हम उन सबके प्रति, हमारी सारी आसक्तियों के प्रति, अपने परिवार अपने पद, अपनी उपलब्धियों के प्रति मर सकंे, उन्हें भूल सकंे तब हम वास्तविक रूप से स्मृतियों के, उस जाल से बाहर आ सकते हैं, जो विचारणा का भंडार है। जहां अतीत हमेशा भविष्य की ओर प्रेरित करता रहता है, तथा स्वयं अतीत में ही है। उनका हम इन सबके प्रति मर सकें तब हम जीवन को समझ सकते हैं। तब जीवन जीने का अर्थ बदल जाता है। यहां जो अनुभव है, जो उससेे परे है, वह प्रेम है। यह प्रेम सुख-दुख से परे हैं।
यहां आने की प्रक्रिया ध्यान है। ध्यान यह वह नहीं है, जो सिखाया जाता है। ध्यान जो जाना गया है, जो ज्ञात का भंडार है, उसका खाली हो जाना है। यहां मन जो जाना गया है, जो स्मृतियों  का भंडार है, उसके अनुकरण में काम नहीं करता है, परन्तु मन स्वतंत्र होकर उसका प्रयोग भी करता है। यही मन का नियंत्रण कहा जाता है।
इसीलिए जीवन जीने की कला, वर्तमान में रहना है। यहां जो अतीत है, जो भविष्य है, दोनों के प्रति मर जाना है। तब मात्र वर्तमान में रहा जा सकता है। यहां आत्मा या शरीर का विभाजन नहीं है, शरीर बिना चैतन्य के जड़ है, चैतन्य को आधार शरीर का चाहिए। इस एकरूपताप में विभाजन गलत दृष्टि है। वर्तमान में जहां शरीर है, वहां मन है। वहीं चैतन्य है, यही वह स्वाभाविक अवस्था है जिसे ‘सहज’ कहा जाता है।

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