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बीसंवी सदी के प्रारंभ में अंग्रेजी सल्तनत का सूर्य अस्त नही हो रहा था, बल्कि उसके मध्यान्ह की प्रखरता के कारण विश्व की अधिक से अधिक जनसंख्या त्रस्त एवं क्षुब्ध थी। इसी बीच एक संभ्रान्त तथा अंगेज परस्त परिवार में मेरा जन्म हुआ। इस जमाने में ईसाई स्कूलों में अंगे्रजी माध्यम से पढ़ाई करना जहां बड़े भाग्यवानों के लिए सुरक्षित माना जाता था, वहां समाज में भी ऐसे बालक के प्रति बड़ा सम्मान प्रदर्शित किया जाता था। पितृविहिन तथा माता से अलग किया पाकर निकटतम रिश्तेदारों ने मुझे अपनाया और एक ख्याति प्राप्त स्कूल में भर्ती करके उस जमाने की अच्छी से अच्छी शिक्षा के साथ उच्च सामाजिक स्तर तथा प्रतिष्ठा का जीवन जीने के लिए श्रेष्ठतम साधनो का प्रबंध मेरे लिए किया।
परिणाम होना था वही हुआ। ईसा मसीह के लुभावने उपदेश, बाईबल की रोचक तथा मन की गहरी पकड़ करने वाली कथाएं पढ़ भाव विभोर होकर धीरे धीरे मन वचन और कर्म से ईसाइयत मेरे रोम रोम में व्याप्त हो गई। परन्तु मेरे पैनी दृष्टि वाले अभिभावकों से मेरी मानसिक स्थिति ओझल न हो सकी तथा ईसाइयत का प्रभाव कम करने के लिए समानांतर वैदिक शिक्षा एवं सनातन संस्कारों को पुनस्र्थापित करने का पूरा प्रयास किया गया। परन्तु मैं परस्पर विरोधी संस्कार एवं विचारधाराओं के पाटों में पिसता हुआ भी ऐसी विचित्र दशा को पहुंच गया जहां मेरा वास्तविक स्वरूप एक तीसरे ही रूप में प्रकट होने लगा। एक तरफ जहां मन अत्यन्त शुद्ध निर्मल व पवित्र हुआ वहीं बा्रह्म व्यवहार, मेरे अभिभावकों को नास्तिक संस्कारहीन तथा परिवार, समाज, धर्म एवं देश के प्रति असम्मानजनक भासित होने लगे।
मेरी अपनी स्थिति से मैं कभी संतुष्ट नही हुआ। इस संसार को समझने तथा देश के अनेक दारूण दुखों से ग्रसित मेरे देशवासियों के कष्टों का निवारण किस प्रकार हो, इसका उपाय किसी चमत्कारिक शक्ति से अभिप्रेरित होकर करने लगा।
अनेक धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन, नाम, जप, मंत्र जप तथा यौगिक क्रियाएं प्रकाश के स्थान पर भयानक अंधकार को और दौड़ने लगी। सभी प्रयास धीरे धीरे समाप्त प्रायः हुए। मन निराशा के गर्त में डूब गया और.............और................तब।
एक दिन एक विचित्र घटना घटी। हमारे पड़ौस में रहने वाली छः वर्षीय कमला बड़े जोर जोर से अपने पूर्व जन्म की घटनाएं कहने लगी। दस बीस कोस किसी देहात में उसका वृद्ध पति आज भी मौजूद था। चार लड़के दो लड़कियां तथा पोते पोतियों से भरा पूरा संसार आज भी उसे अपनी ओर आकर्षित कर रहा था। उत्कंठावश अनेक सत्यान्वेषितों ने सही पता तथा अन्य जानकारी कमला से लेकर सच्चाई का पता लगाने की कोशिश की तथा कुछ दिनों बाद कुछ बातें सही किन्तु बहुत कुछ गलत होने के निर्णय दिया। अनेक दिनों की चर्चा के बाद घटना भूतकाल में विलीन हो गई।
पाश्चात्य संसार और शिक्षा के कारण पुनर्जन्म पर मेरा विश्वास नहीं था। मैंने अपनी बुद्धि अनुसार कमला को मानसिक रूप से विकृत बताया इस विषय पर अधिक सोचने की आवश्यकता नहीं समझी व घटना को भूलने का प्रयास करने लगा।
परन्तु न मालूम क्यों, पुनर्जन्म हो सकता है या नहीं यह विचार दिन रात मेरे मन में चक्कर काटने लगा।
मेरे एक मित्र अर्जुनदेव से घंटों इस विषय पर वाद विवाद होता रहा तथा एक ग्रंथ ”योग वशिष्ठ“ की अनेक घटनाएं सुना सुना कर उसने मुझे पुनर्जन्म के सिद्धान्तों पर विश्वास करने के लिए बाध्य करने का प्रयास किया। अचानक एक दिन जबकि मैं मात्र बारह वर्ष का किशोर था, संध्या समय अर्ध मूच्र्छित अवस्था में पहुंच कर मैंने एक विचित्र अनुभव किया।
क्या वह एक स्वप्न था या वास्तविकता इसका आज तक निर्णय नहीं कर पा रहा हँू ? तथापि पाठकों के सम्मुख उस घटना को यथावत रखने का प्रयास कर रहा हँू।
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Wednesday, September 30, 2009
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