Friday, October 2, 2009

कविता,

उदासी
तुम उदास हो
कप्तान नहीं रहे
हम उदास नहीं
खिलाड़ी ही कब रहे,

यह होना ही
होने की संभावना में
मात्र बस खोना है;
सुबह से शाम
शाम से सुबह तक
चक्की के पाटों में पिसा ही रहना है,

हवा बहती है
क्या अहसान करती है,
धूप
सबके आंगन में बराबर ही बरसती है
वर्षा सी नहीं
आधे ही खेत को खाली भी रखती हैै

दृष्य ही है सार
सच भी यही है
पर दर्शक नहीं होे तुम
दृष्टा, समय के संग
भुजाएं तनी रखना

सोने की धड़ी यह नहीं
ढपली अपनी ही यहाॅं बजनी हैै
जो जागा है
जगा है
जगने को सजग है
वही बार-बार गिरकर
जिन्दगी को जीकर रहा हेै

भले ही काला, बदसूरत
घिनोना चींटा रहा हो वह।

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