Tuesday, June 2, 2009

जीवन भाष्य

़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़स्वभाव ए आदतें और संस्कारएक्या हम अपने आपको जानते हैंहम निरन्तर बाह्य से जो प्रभाव ग्रहण करते हैंए वही तो कालांतर में हम होते चले जाते है जब पतंजलि ने वृत्तियों के निरोध को योग कहा था तब वह योग में प्रवेश के लिए पहला कदम ही थाएअन्तर्मन में प्रवेश द्वार का यह प्रारम्भ है।
साधकों से हुई बात.चीत के अंश
आदतें और स्वभाव उठने वाली वृत्ति को पहचान देते हैं जिससे जीवन की पहचान मिलती है।
संस्कारों में यह चीज तो बीज रूप में रहेगी ही। अच्छी मिठाई भी खाते आ रहे हैं। लेकिन मिठाई के प्रति हमारी रुचि नहीं है। परन्तु मिठाई खाते आ रहे हैं इसलिए उसका भी संस्कार है पर जिससे लहरें उठती हैए संस्कारों में से वृत्तियां वासनाएं जागृत करने में वह समान रूप से संस्कारों के भण्डार से टकराती है।
हमारी चाय पीने की आदत है।
चाय और मिठाई सामने आयी तो चाय पीने की वृत्ति जल्दी जागृत होगी परन्तु मिठाई की जागृत्ति होकर भी उतनी नही होगी। परिणाम यह होगा कि चाय के लिए हाथ पहले बढ़ेगा मिठाई के लिए नहीं। वृत्ति अपना स्वरूप स्वयं उजागर कर देती है।
इस प्रकार जितने भोग भोग चुके हैंए उनके संस्कार रुपी बीज अन्दर हैं। पर यह सामुदायिक लहर जो उठती है। प्रकृति की वह एक व्यक्ति की नहींए मानव मात्र की होती हैए टकराते ही अंदर हलचल मचती है।
वृत्तियां उफान खाकर ऊपर आ जाती है।
इन्दिरा गांधी की मृत्यु से लहर उठी है। कोई शंात रह गएण्ण्ण् कोई विचलित हुएए कोई उफान खाऐंगे। लहर तो एक ही है। चारों तरफ से उठी है। कर्म एक ही हुआ है। परन्तु प्रतिक्रिया अलग.अलग। जो जितना निकट है उसकी अनुभूति उतनी ही गहरी होगी।
इसी तरह से यही संस्कार है। हमने जीवन मंे जो जो भोगा है अनुभव किया है या जिन.जिन वस्तुओं के प्रति आकर्षण रहा है वही संस्कार रूप मेंए बीज रूप में उपस्थित होता है। प्रकृति उसमें वृत्तियां जागृत करके इस शरीर और इन्द्रियो द्वारा करने को प्रेरित करती है।
केवल संस्कार
मृत्यु के बाद संस्कार शेष रह जाता है। संस्कारों का भण्डार अन्तर्मन में रहता है। उसका ही एक हिस्सा इन्द्रियां और मन हैं। यही एक शरीर छोड़कर जाता है। जिस शरीर में वह जाता है वहीं प्राण की गति प्रारम्भ हो जाती है। बीच में कुछ नहीं रहता है। बीज रूप में यही संस्कार रहता है।
इस जीवन में अगर वर्तमान में रहने का अभ्यास किया तो अन्दर उसमें संस्कार नहीं बनते। संस्कारों के अनुकूल ही वह जहां जहां देख लेते हैं कि वासनाओं की पूर्ति होनी सहायक होती है उस परिस्थिति में परिवार में जन्म हो जाता है।
प्रश्नर संस्कार मृत्यु के बाद कहां रह जाते है
उत्तरर कहां रह जाते हैं कुछ कहा नही जा सकता। यहा इस जीवन में कम से कम एक कमरा मकान गली शहर की कल्पना तो है। हमारी जितनी कल्पनाएं हैं शरीर के साथ हैं। मन के साथ हैं। इसके बाद कुछ नहीं। वह स्वप्न सब कहां चला जाता है। इसका भी अस्त्तिव तब तक है जब तक शरीर और मन है। यहां से जाने के बाद यह भी गायब हो जाएगा। बड़ी विचित्रता है। कहंा जाते हैं कोई वस्तु तो है नहीं।
परन्तु प्रकृति के द्वारा एक वह संस्कारों का बीज तो है जिसे प्रकृति ने पैदा किया है।एकोऽहं बहुस्यामि जैसे एक चीज से हजारों रूप हो जाते है। यह विलीन हो जाते है। नाटक करने से लिए अपने आप पैदा हो जाते हैं। वापिस चले जाते हैं। वैसे बीच के समय में यह संस्कार रूपी बीज नाटक करने के लिए उसमे ऐसे पड जाते हैंए जो सब नाटक अपने साथ करते जाते हैं बनते जाते है बिगड़ते जाते हैंए सार कुछ नहीं।
जीवात्मा का स्वरूप
मृत्यु के बाद वो जो निकल जाता हैए उसमें वासनाएं होती हैंए संस्कार उसका एक छोटा सा पुन्ज उसे जीवात्मा कहते है।
ये सब पैदा हुए हैं जब से सृष्टि उत्पन्न हुई है।एकोऽहं बहुस्याम  स्वप्न में हम लेटते हैं। सोने के लिए अपन अकेले होेते हैं। और वहां भी वेदान्त कहता है इसमें आया है. स्वप्न क्यों पैदा होते हैं  जब लेटा.लेटा व्यक्ति अपने आपको अकेला महसूस करता है तो वह घबड़ा जाता है। क्योंकि वह अकेले में रहने का आदी नहीं है। और जब भय से कि वह अकेला है यह भावना पैदा होती है तो बहुस्याम की भावना पैदा हो जाती है। उसमें स्वप्न सृष्टि पैदा हो जाती है।
जो स्वप्न सृष्टि बनने के लिए प्रक्रिया है। अनेक व्यक्ति नजर आने चाहिएए अपने आप आ जाते हैं इसी प्रकार यहां तो अलग.अलग संस्कार है। इच्छायें हैं जो पुनःवहां से निकल जाता है। क्योंकि वह अलग अलग जीवात्मा तो है ही वह जीवात्मा जिसमें जितनी अधिक शक्ति होगी। इसमें ऐसे भी बहुत से व्यक्ति होतेे हैं जो कड़ी साधना के बाद शरीर छोड़कर जाते हैं जिनको हमने विद्वान माना है उनका अपना प्रकाश रहता है तेज होता है पर यहां चाहे सौ में अट्ठानवें टका तरक्की करलोए एक दो भी कमी रह गई तो प्रकृति के लिए यह काफी है नीचे खींच देने के लिए। वह वापिस खींच लेती है।
वहां तो जो सौ टका हुआए वही पास हो सकता हैए पूरा ही पकना होता है। हां जो भी किया है उसका लाभ तो मिलेगा। परन्तु जब तक शुद्ध सोना नही है तब तक उसको चक्कर काटने पड़ेंगे। प्रकृति उसे हटाएगी। जब तक वह सौ टन्च सोना हो जायेगा। उसे अपने हर जन्म की तब स्मृति रहेगी।
समान स्वभाव वाले लोग इकट्ठे हो जाते हैं वहां भी ऐसा होता होगा। पहले इच्छा हुई थी जीवात्मा कहां रहती है तब दिखाए जैसे जुगनू होते हैंए पांच सात झुण्ड में बड़ा प्रकाश होता है। तरह तरह से वो इधर.उधर आते जाते हैं। दिखा कई बार कई दिनों तक दिखता रहा। इच्छा न रहते हुए भी दिखता रहा। पर मन वहां भी नहीं लगा। विचारधारा शुरू हो गई फिर मन ने कहा छोड़ो तो छूट गई। इसी प्रकार दिखाया। फिर नहीं दिखा। अब उसकी आवश्यकता ही नहीं रही। जिज्ञासा भी नहीं रही। जहां जो इच्छा होगीए जानने की वह भी एक संस्कार बना देगी। वह भी खतरनाक होगी। जितना बचा जाएए उतना ही अच्छा।
जीवनमुक्त अवस्था
साध्य इसीलिए यही है। जीवनमुक्त अवस्था में यही होता है कि हमे हमारे शरीर मे रहते हुए शरीर से अलग अनुभव करते हुए हमारी इन्द्रियां हमारे शरीर में किस प्रकार काम करती हैंए इसका निरीक्षण करना है। यह करना हमने प्रारम्भ कर दिया तो संस्कार उठना कम हो जाता है। लहरें उठने की क्रिया धीरे.धीरे कम होती जाती है। संस्कारों में वासनाएं उत्पन्न करने की क्षमता कम हो जाती है। ये जो लहरें उठती रहती हैं प्रति क्षण फिर ये प्रभावित नहीं करती। यही सार है।

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