Sunday, May 3, 2009

सार्थकता की खोज

मित्रां ेने प्रश्न पूछा है,वर्र्तमान में कैसे रहा जाए? मन तो निरन्तर या तो स्मृति में या किसी कल्पना में रहता है। अनावश्यक विचारणा उसका स्वभाव है।विचारणा उठती रहती है निरन्तर स्मृति के सहयोग से।और स्मृति सघन होती रहती है अवधारणा का सहयोग पाकर , हम हमेशा इसी प्रवाह में रहते हैं।हमारा स्वभाव है अगर हमने किसी के प्रति अपनी राय नहीं रखी तो हम विचारक नहीं हैं।
पर क्या हमारी अपने बारे में यह राय उचित है?इसी बात पर आज यहाँ विचार किया गया है।



सार्थकता की खोज
कल रात हम लौट रहे थे, यही सवाल बार-बार उठ रहा था कि जीवन का उद्देश्य क्या है, आखिर हम पैदा ही क्यों हुए हैं ? जब जगत ही असार है, फिर  इस जगत के साथ हमारा संबंध क्या है ?
स्वामीजी से जब चर्चा में यह सवाल उठा, वे यही कहते हैं कि वर्तमान में रहो, उत्तर स्चयं तुम्हारे पास आ जायेगा। पर व्यवहार में कैसे रहा जाए। और जीवन की सार्थकता को किस प्रकार पाया जाए, प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाते हैं।
उस दिन चर्चा में वे बोले- जो भी व्यक्ति तुम्हारे पास आता है, उसके प्रति किसी प्रकार की दुर्भावना मत रखो, कोई प्रतिबद्धता नही। कोई पूर्वाग्रह नहीं। यही त्याग है। जो भी  दुराग्रह है, बनी बनायी धारणा है, उसको छोड़ देना ही त्याग है। वह बुराई उसमें नहीं है। तुम अपने भीतर की बुराई को उस पर प्रक्षेपित कर रहे हो। तुम अपने भीतर का गंदलापन उसके अन्तर्जगत पर फैक रहे हो। शांत हो जाओ। निश्छल मन से स्वागत करो। यही त्याग है।
छोड़ना और छूटना यहां नहीं है। यही छूटना है। बाहृा में जो कुछ भी परिवर्तन होगा, वह अर्थहीन है। जब बल समाप्त होगा, फिरकनी फिर रूक जाएगी। उससे भीतर बदलाव नहीं आता। वह भीतर से नहीं जुड़ता। कुछ किया जाना हो, कुछ होना भी हो, तो वह भीतर से ही होगा।
अतः जब भी कोई व्यक्ति सामने आए....परिस्थिति सामने आए उसके बारे में कभी पूर्व धारणा मत रखो। पूर्व में धारणा का आधार स्मृति है और स्मृति ही पाप है। बार बार विषयों के चिन्तन से वासना, स्मृति-रुप धारण कर लेती है। और फिर स्मृति जब भी किसी की उपस्थिति होती है, अवधारणा प्रस्तुत करती हे। हमारा सारा व्यवहार उसी धारणा के आधार पर होता है। यही जीवन की जटिलता है।
हम अपने भीतर इतना कचरा समेटे हुए हैं कि वह चाहते हुए भी नहीं छूटता। हम वर्तमान में रहना ही नहीं जानते। चाहते भी नही हैं। हमारा सारा कार्य, व्यवहार स्मृति से परिचालित है। यही तनाव का कारण है। यही विक्षोभ का कारण है। व्यक्ति को हम, व्यक्ति रूप में नहीं, स्त्री हरिजन, मुसलमान महाजन, अफसर नाना रूपों में देखते हैं। हर रंग, रुप,व्यवसाय जाति के प्रति हमारे पास अपनी धारणाएं है। हम उन्हीं सांचो में उसे देखते हैं, रखते हैं, और खुद समस्या खड़ी करते हैं।
स्वामीजी कहा करते है, ‘हम अपने तटस्थ भाव से, साक्षी भाव से जीने का प्रयास ही नहीं करते हैं।’
साक्षी भाव ‘होने’ की कला है।
आप अन्तःकरण की पवित्रता चाहते हैं। जीवन में निर्मलता चाहते हैं, पवित्रता चाहते हैं, शांति चाहते हैं। पर अपनी बनी, बनायी अवधारणाओं को छोड़ नहीं पाते।
अगर छोड़ना ही है तो इस अवधारणा को छोड़ना होगा जिसने हमें रुग्ण मानसिकता दी है।
यही त्याग है।
तब वह व्यक्ति, वह परिस्थिति अपने सहज रूप में सामने आएगी। वह वर्तमान में उपस्थिति देगी, और अपने आपको भी वर्तमान में रहने में सहायता देगी।
चित्त की सरलता सहज ही प्राप्त हो जाएगी। अन्तःकरण में पवित्रता प्राप्त होती जाएगी।
त्याग वस्तु का नही है। न ही वस्त्र का। न ही भोजन का। न ही स्त्री, सन्तान, घर द्वार का है।
जिसने छोड़ा उसने क्या पाया है ?
धर्म की, कर्मकाण्ड की यही जटिलता है। वह उलझा अधिक रहा है। वह छोड़ने पर अधिक बल देता है। छूटने पर कम।
जो बलात छोड़ा जाता है, क्या वह छूट पाता है ?
बार-बार लौट-लौट कर आता है।
बहुत पुरानी कहानी स्वामी सुनाया करते हैं-
राजा जनक के दरबार में ऋषि आत्म-ज्ञान की चर्चा करने गए थे। चर्चा चल रही थी। तभी सेवक ने आकर कहा- नगर के पश्चिमी छोर पर आग लग गई है। चर्चा चलती रही। जनक ने आग बुझाने का आदेश दिया। कुछ देर बाद फिर सूचना आई-आग आगे बढ़ती जा रही है। काबू में नहीं आ रही है। जनक आदेश भिजवाते रहे। तभी सूचना आई- आग अतिथिशाला तक आ पहुंची है। तभी ऋषि विचलित हुए, उठने लगे। जनक ने पूछा- क्यों ? बोले ”कमण्डल वहीं रह गया है।” जनक बोले मेरा तो राज्य जा रहा है, आपको अपने कमण्डल की पड़ी है।
ऋषि, जो संसार छोड़ आए थे, कमण्डल नहीं छोड़ पाए।
स्वामीजी कई बार कहते हैं, उनसे लोगों ने पूछा शराब छोड़ दें, सिगरेट छोड़ दें, मांसाहार छोड़ दें, आदि-आदि। तब उनका उत्तर यही रहता है, तुम अपना काम करते रहो, जिसे छूटना है वह अपने आप छूट जाएगा।
तुम्हारा काम अन्तर्मुखी होकर मन की निश्चलता को प्राप्त करना है, अन्तर्मन को जीवन का कार्य व्यवहार सौंप देना है। वर्तमान में जीना सीखो। स्वभाव स्मृति में हैं, आदत स्मृति में है, वर्तमान में रहने का अभ्यास होते ही स्वतः छूट जाएगी, पेड़ के पत्ते कब गिरते हैं, उसे अहसास भी नहीं होता, जिसे छूटना है, वह छूट जाएगा, कुछ पता भी नहीं चलेगा।
क्रिया साक्षी-भाव है। जो व्यक्ति उपस्थित हुआ है। परमात्मा ने ही उसे तुम्हारे पास भेजा है। कल वह क्या था, कोई मतलब नही। कल उसने क्या किया था याद रखना व्यर्थ है। आज अभी जब वह आया है, साक्षी भाव से साक्षात्कार करो, तुम खुद पाओगे, वह तुम्हें बदला हुआ मिलेगा। वह ही तुम्हें वर्तमान में रहना सिखला पाएगा।
यही त्याग है।
त्याग सेवा सौंप जाता है।
सेवा की नहीं जाती, हो जाती है। यह मनोदशा प्राप्त होते ही-जो शरीर का कार्य है, वह सेवा कहलाती है।
सभी सेवा की चर्चा करते हैं। तथाकथित सेवा अंहकार ही सोंपती है। मन को जटिलता देती है। साक्षी भाव मे देह का कृत्य ही सेवामय हो जाता है। शरीर का कर्म ही सेवामय हो जाना, साधना का रहस्य है। प्रतिफल है।
और तब जीवन में जग उठता है प्रेम। मन में त्याग, शरीर सेवामय, सम्पूर्ण जीवन प्रेममय हो जाता है। यह सिद्धि है, यही निर्वाण है, यही मोक्ष है। यही साक्षात्कार है। प्रेम दूसरे को खींचता है। यहां आकर्षण है। वह आकर्षित करता है। पर अब यह जान लिया जाता है कि दुरूपयोग नहीं करना है, वरन दूसरे के मनोजगत में यही भाव उपस्थित करने का प्रयास करना है। आकर्षण जो ग्रह नक्षत्रों में था, वह शरीर में आ जाता है। यहां लोहा सोना नहीं होता, वरन पारस दूसरे को पारस बनाने लग जाता है। जो खुद जागता है, दूसरे को जगाता है।
स्वामीजी कहते हैं- दूसरे के चित्त मंे यही मनोभाव जागृत स्वतः होने लग जाते हैं, वसुधैव कुटुम्बकम ओढ़ा नहीं जाता, पाया जाता है, हुआ जाता है। यही मानव धर्म है।
यही जीवन की सार्थकता है।
            नरेन्द नाथ

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