Sunday, May 24, 2009

पूज्य स्वामीजी

पूज्य स्वामीजी से यह प्रसंग एक वात्र्ता के पूछा गया था,सवामीजी संस्ािठत धर्म के खिलाफ रहे, वे उपनिषद कालीन ऋषि की तरह सदा अधिक से अधिक मौन में रहते थे ,प्रश्न पूछने पर सवाल का उत्तर उनका उनकी अनुभव यात्रा से निकल कर आताथा।आज आध्यात्म की दुनिया में बहुत कुहासा है,”अन्तर्यात्रा“ से कुछ अंश हम आपके लिए देते रहेंगे ,आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेंगे।
नरेन्द्रनाथ


क्या छोड़ा क्या पाया ?
स्वामीजी कहा करते हैं कि मैंने आज तक किसी को अपना शिष्य नही बनाया, न ही कोई पंथ चलाया, न ही कोई गद्दी बनायी, न ही भण्डारा किया। लोग आते हैं, वे कहते हैं दुनियां से थक गये, दुख ही दुख, घर-बार छोड़ना चाहते हैं, कुछ छोड़ आये हैं, धर्म की शरण में जाना चाहते हैं। कुछ कहने हैं- वे हरिद्वार हो आये, तीर्थयात्रा कर आये। कुछ कहते हैं- संन्यास लेना चाहते हैं, उनको दीक्षा की जरूरत है। और जब मैं उन्हें कहता हूं कि छोड़ने की जरूरत नहीं है, जिसे छोड़ना है, वह तुम्हारे पास है, जो तुमसे चिपटा हुआ है। वह जब तुम चाहोगे, स्वतःछूट जाएगा। चाहना तुम्हारी है, छूटना उसको है तो वे निराश हो जाते है।
स्वामीजी कहा करते हैं कि बहुत पहले, जब उन्होंने सन्यास लिया था, और एक गुरूकुल शुरू किया था, तब लोग आते थे कहा करते थे, गांवों में हम तुम्हारा प्रचार करेंगे, लोगो के शिष्य बनने से तुम्हें जो आमदनी होगी आधा-आधा बांट लेंगे। स्वामीजी कहा करते हैं। न तो तब किसी को शिष्य बनाया और न अब। जब मैं किसी से कहता तो वे नाराज हो उठते थे। और यही सुनने में आता था, हम तुम्हारा विरोध करेंगे- और लोगों से कहेंगे, तुम कुछ नहीं जानते। तो यह सब ऐसे ही चलता रहता है।
छोड़ना क्या है, यह लोग समझ नहीं पाते हैं। जब मैं कहता हूं, अन्तर्मुखी हो जाओ, वर्तमान में रहने का अभ्यास करों। जो छूटना है, स्वतः छूट जायेगा। बाहर छोड़ने पकड़ने के चक्कर में मत पड़ो।
बाहर जो भी किया जा रहा है, हो रहा है- उसका भीतर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। कितने ही रंग के कपड़े पहन लो, घर छोड़कर जंगल में चले जाओ- माया तो भीतर है, वह कहां पीछा छोड़ेगी ? वह साथ ही तो चल रही है।
स्वामीजी ने कभी भी दमन को साधन नहीं बनाया। और यही कारण है कि जब भी कोई उन्हें मिलता है तो वह तथाकथित संन्यास धारण की परिधि मे उन्हें समझ नहीं पाता। दरअसल हजारों साल से धर्म के नाम पर जो अनुशासन सौपा गया, उसने मनुष्य को इतना जड़ बना दिया है कि वह सहज हो ही नहीं पाता। मनुष्य चेतना और पदार्थ का समवाय है। और शरीर जो प्राप्त हुआ है, उसकी स्वतन्त्रता अपने आप में कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है। इसीलिए जब मनुष्य के विकास की चर्चा होती है या दूसरी और मनुष्य के स्वरूप की खोज की जाती है तो जो चीज है-अपने सामने आती है, वह उसका शरीर ही है। बाहर और भीतर जो कुछ भी घट रहा है वह शरीर के धरातल पर ही है। बाहर की बाहृा घटनाओं की प्रतिक्रिया इन्द्रियों के माध्यम से भीतर पहुंचती है। और भीतर जो कुछ भी हो रहा है, वह इसी शरीर के माध्यम से बाहर व्यक्त होता है। इसीलिये भीतर तक पहुंचने के लिए वह माना गया कि शरीर को नियंत्रण में लेना आवश्यक है। दरअसल यह एक भ्रान्ति है। और जब तक इस भ्रान्ति को नहीं समझा जाए तब तक भीतर तक प्रवेश संभव नहीं होगा। प्रकृति का यह नियम है कि बाहृा में कितना भी बड़ा परिवर्तन किया जाये, वह तभी तक कारगर होगा, जब तक कि उस पर बल लगा हुआ है। ज्यों ही बल हटाया जायेगा, वह क्रिया अपने आप समाप्त हो जायेगी। यही कारण है कि बाहृा में जो परिवर्तन होता है और हम जिसे स्वभाव मान बैठते है। वह क्षणिक उत्तेजना पाकर ही टूट जाता है। यह स्थिति तथाकथित जो भी बाहृा अनुशासन को, दमन को इस साधना मार्ग पर जो आरोपित करते हैं, स्वीकार करते हैं, उनके साथ घटती रहती है।
प्रायः लोग चर्चा करते हैं और कहते हैं कि अगर मनुष्य अपने शरीर के प्रति जागरुक हो जाता है, सजग हो जाता है तो वह जान जाता है, इस शरीर के बारे में जो संवेग बिन्दु हैं, जहां पर कि शक्तियों के स्रोत हैं और जिनके माध्यम से वृत्तियां प्रकट होती हैं, और अगर हम यह जान पाये तो हम इन वृत्तियों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लेंगे और नाड़ी संस्थान पर प्रभुत्व स्थापित करने के बाद हम भीतर के आवेग, संवेग और व्यवहार पर नियंत्रण पाने में समर्थ हो जायेंगे। इस आधार पर यम, नियम, आसन और प्राणायाम की आधार शिला रखी गई हैं। यह जो विधि है, यह दमन की है। और यह मान लिया गया है कि दमन के द्वारा जो निषेध का मार्ग है, वह धार्मिक यंत्र में बहुत सहयोगी है। इसी आधार पर हजारांे साल से गृहस्थ की अपेक्षा संन्यास की स्थापना की गयी। और इसी रुप में धार्मिक यन्त्र के लिये सम्पूर्ण जगत को अस्वीकार किया गया, पर वास्तविकत्ता यह है कि हम यह नहीं मानते कि शरीर की जितनी निंदा की जाय, शरीर की जितनी चर्चा की जाय, शरीर रहेगा, और शरीर की अपने आप की सत्ता नही है, जो कुछ भी घटता है, वह भीतर घटता है। और जब तक भीतर की पहचान नही होगी, तब तक यह पता नही चलता कि बाहर क्यों सब कुछ घट रहा है। हम ये मान कर चलते हैं कि काया के नियंत्रण से चित्त वृत्तियों का शोधन हो जायेगा। यह मानते चले आ रहे हैं और हमारे शास्त्र भी यही कहते हैं। हजारों साल से हजारों आदमी यही कहते चलें आ रहे हैं, लेकिन शरीर के इस अत्यधिक नियंत्रण से जो प्राप्तव्य है, मन की शांति स्थिरता, सृजनशील मन जहां प्रसन्नता है, क्या वह प्राप्त हो सकता है ?
यह कहा जाता है कि जो नाड़ी संस्थान है, वह मन का अनुचर नही है। संवेग प्राप्त होकर नाड़ी संस्थान में प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है, और वहां मन कुछ कर नहीं पाता है, तब तक शरीर उत्तेजना में चला जाता है और वह सबकुछ घट जाता है, जो कि नहीं घटना चाहिए था। लेकिन अगर किसी संवेग को, किसी वृत्ति का निरीक्षण किया जाये और गहराई में जाकर स्पष्ट रूप से पाया जाय तो वहां ऐसा कुछ नही है।
स्वामीजी कहा करते हैं कि प्रकृति के द्वारा उठने वाली लहरें नाभि से गति लेकर जहां चित्त है, वहां ये निरन्तर धक्का दे रही है और यह स्पंदन चित्त पर आकर अधिक स्थूल रूप धारण कर लेता है, यही विचार का जन्म है। और ये लहरें ऊपर उठकर स्नायुओं द्वारा शरीर में व्याप्त हो जाती हैं, और शरीर बाहृा व्यवहार कर उठता है। जब तक उठने वाली लहर का जागरूक अवलोकन न हो, एक अवांछनीय सजगता न हो, तब तक व्यवहार के कारण की अन्वीक्षा नही हो सकती।
इसीलिये इस मार्ग पर जहां से प्रारम्भ होता है, वह बाहर नही भीतर की ओर जाना है। स्वामीजी कहा करते है कि अन्तर्मुखी हो जाओ, जो छूटना है, स्वतः छूट जायेगा, तो छोड़ने और पकड़ने की रूचि नहीं रहे।
लोग कहते हैं कि मै तो खामोश बैठा था, कुछ कहना भी नहीं चाहता था, पर ऐसा कुछ हुआ, ऐसा शब्द आया कि मैं अपने वश में नहीं रहा और क्रोध में जो कुछ मैं नहीं कहना चाहता था, वह सब निकल गया। अघटित, घटित हो गया। यहीं आकर कहा जाता है कि मन का वाणी पर कोई नियंत्रण है तो ऐसा नहीं कहा जाता। लेकिन यह बात गहराई से सोचें और वह जो प्रक्रिया देह पर घटी है, वाक यन्त्र पर घटी है, यहीं से प्रारम्भ करें और भीतर की ओर चलें, डुबकी लगायें संवेग के साथ तो पता चलता है न अच्छा, न बुरा, मात्र साक्षी ध्यान को पायेंगे, उस क्षण एक धक्का सा लगेगा। एक लहर सी आयी और समाप्त हो गयी थी। यह लहर अहर्निश आ रही है और मन इन लहरों पर तैरते हुए तिनको की तरह है। और जब साक्षी ध्यान बढ़ जाता है तो अचानक वह घट जाता है, जो अकल्पनीय है। जो छूटना था, वह तो स्वतः छूट जाता है, यह पता भी नहीं चलता कि कब छूट गया। इसीलिये छोड़ने और छूटने की अधिक चिन्ता यहां नहीं करनी है। बस करना, इतना ही है, जो भीतर का सागर है, वहीं बस, एक डुबकी लगानी है। अपने आपको बस छोड़ देना है। बिना किसी सहारे के, बिना किसी आलम्बन के, बिना किसी आश्रय के, चेतना सागर में लगायी हुई एक डुबकीवह सब छुड़ा देती है, जिसे छुड़ाना है।

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