जीवन का स्त्रोत
जीवन का स्त्रोत क्या है ,यह प्रश्न सभी चिंतकों को व्यथित करता रहा हैं।भगवान बुद्ध ने अव्याृत प्रश्न कहकर इसे पूछने पर मना कर दिया था।भारतीय दर्शन की यात्रा , मैं हूँ,मेरी सत्ता है, मैं चैतन्य हूँ, तथा अद्धैत वेदान्त तक आते - आते मैं आनंद भी हूँ, गीता में भगवान ने ”मम माया दुरत्या कहकर परम सत्ता ”आत्म“ तक दी है।पूज्य स्वामीजी जहाँबुद्ध के आलय मत को मानते हुए परम चैतन्य को अत्यंत गत्यात्मक कहरहे हैं, वहीं वे केन्द्र की सत्ता को भी स्वीकृति दे रहे हैं, पर यहाँ जो केन्द्र है ,वह निरन्तर परिवर्तनशील है , जो अनेक ज्योतियों के एक थिर होने का अहसास भी कराता है।
कृपया आप इसे पढें ,अपनी प्रतिकिया दें,यहाँंस्थागत धर्म से हटकर भारतीय संस्कृति और धर्म दर्शन की विवेचना होरही हैं
.
साधकांे से हुई बातचीत के आधार पर
योग मात्र शारीरिक क्रिया प्रक्रिया का सामन्जस्य ही नही है, वरन योग सम्पूर्णता पाने की प्रक्रिया है। जो पूर्ण है, जहां किसी प्रकार का कोई अभाव नहीं है। अभाव ही विक्षोभ का जनक है। वही दुख है। प्रत्येक प्राणी में किसी न किसी प्रकार की कोई न कोई कमी रहती है। कमी प्रकृति जन्य है। विषमता प्रकृति का स्वरूप ही है। आकांक्षा से गति उत्पन्न होती है, गति इस विषमता को हलचल देती है। एक स्फुरणा, पूर्णता की ओर बढ़ने की ललक, यही विकास यात्रा है। हम निरन्तर सम्भावना में है, रूपान्तरण में हैं, अपने आप को बदलने की प्रक्रिया में हैं।
यही कर्म का स्वभाव है। कर्म उस तरंग की स्वाभाविक गति है, जो चित्त सरोवर में उठी है। स्फुरणा क्यों ? क्या मात्र इसलिए ही नहीं कि वहां मात्र उद्वेलन ही है। सरोवर में आने वाली हर लहर एक छाप छोड़ जाती है। फिर उसी छाप पर, उसी प्रभाव पर दूसरी लहर लाती है।यही तो संकल्पों का सिलसिला है, कारण है- संस्कार ! संस्कार ही वह छाप है, जहां नाभि से आने वाले स्पन्दन तरंग उत्पन्न करते हैं। इस तरह यन्त्र जो कि स्वचालित है, चलता रहता है। लहर उठती है, गिरती है, छाप बनती है, उस पर पुनःलहर उठती है। यह छाप ही वह संस्कर है जो कि संकल्पों की जनक है। हर संकल्प जो जितना गहरा होता है, उतना ही कर्म में ढल जाता है और कर्म की परिस्थिति भोग में होती है। भोगावस्था में वह तरंग पुनः टूटती है और उसका प्रभाव शेष रह जाता है। उस प्रभाव से पुनःतरंग उठती है।
यह एक लंबा सिलसिला है।
प्रश्न उठता है, फिर इस सिलसिले को योग में कैसे परिणित किया जाये ? योग-सम्पूर्ण रूपान्तरण ! अभाव का ही अभाव ! मात्र पूर्णता। यहां हैं गहरी शांति हार्दिकता तथा प्रेम।
शरीर मात्र जड़ ही नहीं है, वह परम चेतन्य के साथ जुड़कर चेतन तथा जड़ के साथ जुड़कर जड़वत हो जाता है। वह जड़ और चेतन का समवाय है, जो अद्भुत है, इसलिए ही रूपान्तरण संभव है। इस शरीर का सम्पूर्ण समर्पण ही साधक के लिए श्रेयस्कर है। साधक कहते हैं कि वे ध्यान करते हैं कुछ कहते हैं जाप करते हैं, कुछ कीर्तन करते हैं, एक-एक इन्द्रिय को लेकर वे संयमित हो रहे है। वाणी जाप करती है, तब मन बाजार घूम आता है। हाथ से सुमिरिनी फिरती है, तब कान पड़ौस का बाजा सुनता है। घण्टे भर मौन रहे, पर आसन से उठते ही क्रोध से आग बबूला हो उठे हैं। इतना गुस्सा, यह कैसा योग हैं ? योग- जुड़ना। परम सत्य में लय भाव। यह मात्र एकांकी नही है, वरन यहां जुड़ना सम्पूर्ण है। टोटल....कुछ भी बाकी नहीं रखना। अपने आपको पूरा दे देना। चैबीस घंटे दे देना। तब जो कर्म है, वह भगवद कर्म में ढल जाता है।
यह कर्म कब संभव हो ?
प्रश्न उठ खड़ा होता है, यह कैसे संभव हो ? हम जो कुछ करते हैं, क्या वह सार्थक कर्म नही है? हां उत्तर सम्भवतः यही है। सार्थक कर्म पूर्णता देता है, जब कि निरर्थक कर्म मात्र अभाव और असंतोष सौंपता है। निरर्थक कर्म जन्म लेता है उन बातों से जो आज की नही है। आगे और पीछे का जो व्यर्थ का चिन्तन है, उसमें हम डूबे रहते है। वह इस प्रभाव का चित्त सरोवर पर सौंपता है, जिससे विक्षोभ जन्य लहरें उत्पन्न होती हैं, जहां मात्र अभाव ही है।
अतः आवश्यक है कि पहले निरर्थक कर्म से सार्थक कर्म की और बढ़ा जावे जो प्रकृति जन्य है, वही सहज है।
वही स्वाभाविक है। वह अपने आप पूरा हो जाता है। निरर्थक कर्म होता है, मन-तन के आगे और पीछे के चिन्तन में डूबने से। मन को जितना इससे हटाया जाकर वर्तमान में लाया जायेगा। उतना ही मन अपनी स्वाभाविक स्थिति में होगा।और मन जितनी शांत अवस्था में होगा, उतनी ही सक्रियता बढ़ेगी। साथ ही, उतनी ही सृजनात्मकता रहेगी। कर्म, सार्थकता पाएगा। कर्म, सार्थकता तभी पाता है, जब वह कर्म दुबारा न किया जावे यह भावना पूरी हो जावे। यही कर्म का रहस्य है। अन्यथा कर्म का भोग शेष रह जाता है। कर्म की स्वाभाविक परिणति लय है और जब कर्म मुक्ति का कारण बन जाता है, तब वही योेग कहलाता है, अन्यथा कर्म की परिणति भोग में ही होती है।
कर्म भी साधन ही है। इसके स्वरूप को समझे बिना बचने का उपाय नही है। यह जगत, कर्म के ही ताने-बाने से बना हुआ है। अतः जगत से बाहर जाना तो संभव नही है। करोड़ो में कोई बिरला बाहर आ सकता है, परन्तु अपने भीतर से जगत को बाहर कर सकता है। जगत में रहते हुए भीतर के जगत से छुटकारा ! यही साध्य है। जगत आगे और पीछे के व्यर्थ के चिन्तन में उपस्थित रहता है वह तरंग पैदा करता है। जो कर्म को उपस्थित कर भोगों में बदल देती है।
अतः कर्मयोग का रहस्य यही है। कर्म का योग में रूपान्तरण ही साध्य रहे। चित्त सरोवर मे आने वाली हर लहर पर ध्यान रहे। उसका साक्षी भाव से निरीक्षण। निरर्थकता से बचा जाये। तभी गंदलाया जल स्थिर होना शुरू हो जाता है। और पारदर्शी तली उपस्थिति देती है।
यह स्थिति मात्र जड़ हो जाना नही है, वरन यह है- सम्पूर्ण सृजनात्मकता का अवतरण, टोटल रिवोल्यूशन सम्पूर्ण परिवर्तन दूसरे शब्दों में सम्पूर्ण योग। यहां मात्र क्रिया का अन्त नही है, परन्तु क्रिया का सहज और स्वाभाविक रूपान्तरण है।
इसकी साधक में पहचान है, हार्दिकता और आचरण में निस्वार्थता।
कर्मयोग, साधक को अदभुत क्रिया शक्ति से जोड़ता है, जिसकी परिणति होती है, त्याग और सेवा में। उसका हर क्षण प्रकृति जन्य होने लगता है। जिससे प्रकृति से साधक की सम्प्रत्ति गहरी होने लगती है।
व्यक्तित्व की संरचना
प्रश्न ः यह माना जाता है कि शरीर जड़ और चेतन दोनो का समवाय है, शरीर में चेतना का प्रकाश कहां होता है, तथा चेतना किस प्रकार कार्य करती है इस सन्दर्भ में विवाद है। क्या मन, चित्त और आत्मा के बीच में भी अन्य किसी प्रकार के स्तर है।
स्वामी जी ः यह तो वही बता सकता है, जिसने सवाल खड़ा किया है। किताबों में पढ़ा होगा। प्रश्न अगर मन से आया है तो उत्तर उसी के पास होगा, उत्तर उसी से पूछा जाए मिल जायेगा। रमण महर्षि ने प्रश्न यही उठाया था और इसी की तलाश में रहे।
प्रकृति की लहरें अनवरत उठ रही हैं। ये नाभि में उठती हैं। नाभि में विकारों के बीज हैं। वे बीज सूक्ष्म हैं। वहां मात्र स्पंदन है। वे धीरे धीरे उफनते जाते हैं, जैसे लहरें सभी के अन्दर उठ रही है, किसी को जल्दी उत्तेजित करती हैं, किसी को कम। यह व्यक्ति की बनावट, बुनावट पर निर्भर रहता है।
जैसे कुछ लोग सो रहे हैं, कोई आकर आवाज देता है तो कोई एक आवाज पर, कोई दो आवाज पर, कोई चार आवाज पर उठ जाता है, और कोई होता है, उस पर असर ही नही होता- वह सोता रह जाता है। आवाज देने वाला एक ही होता है। संस्कार सूक्ष्म बीज रूप में हैं, लहरें टकरायी, टकराते टकराते कोई उफन जाता है, किसी पर कोई असर नही होता। यह उसी प्रकार से है कहीं बच्चों ! आवाज लगते ही उठ जाता है, कोई सोया रहता है। वासना जागृत ही नहीं होती।लहरें अनवरत उठ रही हैं धीरे-धीरे यह अनुभव हो जाता है कि प्रकृति का कार्य यही है। हमें तो सहन करना है। सहन करने के लिए अपने स्थान पर स्थिर होकर रहना है।
चेतन्य केन्द्र आत्मा है या यूं कहिए, वहां अवेयरनेस है वह है, उसका अनुभव हो जाता है, उसके सबसे समीप अन्तर्मन ही है, मनोविज्ञान की भाषा में इसे अनकांशस कहा जा सकता है। यहां जानने का माध्यम कोई है नहीं, इन्द्रियों की पहुंच यहां तक नहीं है। यहां तक स्थूल शरीर की पहुंच नही रहती है। यह उसके परे की बात है, अभ्यास यही करना है कि नाभि से उठ रहे स्पंदनों को, जो चित्त पर आकर टकराते हैं तथा वहां स्थूलता ग्रहण करते हैं, और वासनाएं जन्म लेती है, उस उफान को उस संवेग को, उस लहर को, उस तरंग को उस भाव दशा को गहरी जागरूकता के साथ, सतर्कता के साथ साक्षी भाव से अवलोकित करना है।
इसी अन्तर्मन से स्पंदन आगे बढ़ते हैं, वे स्थूल शरीर से अभिव्यक्त होते हैं। नाभि से उठने वाले स्पंदन चित्त पर आकर टकरा कर स्थूलता ग्रहण करते हैं। यहां आकर भाव- दशा शरीर के माध्यम से प्रकट होने लगती है। यहां आकर वासनाएं आकर ग्रहण करती हैं, स्पंदन तरंगों का रूप ग्रहण कर लेते हैं, वासनाएं विषयों के लिए लालायित रहती हैं, उन्हें पोषण मिल जाता हैं, अगर वर्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ जाता है तो वे ऊपर की ओर उठती जाती हैं, पर उन्हें फैलने के लिए जगह नहीं मिलती स्वभाव में बदलाव व्यवहार की श्रेष्ठता अनुकरण से नहीं सीखी जाती। यदि हमारा क्रोधी स्वभाव है और उसकी हमें प्रतीती भी है, तो वर्तमान में रहने का अभ्यास होेने के बाद लहर जो उठी है, वह अनुभव होगी और लहर जिस प्रकार पत्थर पर टकरा कर वापिस लौट जाती है, वैसे ही मालूम होगा। टकराई व लौट गई, अन्तर्मुखी होेने के बाद वृत्तियां उठते हुए भी पनपती नही है। और धीरे-धीरे बिल्कुल ही नहीं होती।
इसीलिए कहा है, स्वभाव बाद की स्थिति है। इसीलिए स्वभाव का पता तब तक नही चलता, जब तक क्रिया नहीं होती। आप चुप हैं, मौन हैं, पर बोलते ही शब्द बाहर आते ही जब क्रिया होती है, स्वभाव का पता चल जाता है। वर्तमान में रहने वाले का स्वभाव समझ में नही आता है, क्योंकि वहां प्रतिक्रिया नही होगी। न भूत है, न भविष्य, न कल्पना है, न अतीत से संग्रहित कोई व्याख्या है। क्योंकि बाह्य, मन अनुपस्थित है। उसका काम होता है-स्मृति करना, कल्पना करना, चिन्तन करना, संग्रहित करना, रिकार्ड रूम नहीं रहा तब न अतीत रहा न भविष्य रहा, मात्र क्रिया, कोई प्रतिक्रिया नहीं। स्वभाव सहज, साधारण बन जाता है। हां, यह भी नहीं होता कि निठल्लापन होता है, या पलायन। हां, अत्यधिक सृजनशीलता, और चित्त की नमनीयता वहीं संभव है। सवेंदनशीलता यही प्राप्त होती है। जो भी कार्य प्रकृति को करना है, वह कराती जायेगी, तथा कार्य स्वतः होता जायेगा।
मैं इतनी देर से चुप बैठा था, आपने प्रश्न पूछा मैं बोला। नही तो चुप रहता हूं। प्रश्न पूछा है तो क्रिया होती है। नहीं तो व्यवहार कुशलता नही रही। हम सब भीतर से जुड़े हुए हैं। व्यवहार ही सबके प्रति सही होना चाहिए। यहां इतने लोग आते हैं, पर आवश्यक नहीं है, बोला जावे। पर कोई प्रश्न पूछता है, तब उत्तर आ जाता है, अन्यथा मौन, व्यवहार का सही तरीका यही है। अन्तर्मुखी होने पर कर्म स्वतः प्रकृति जन्य हो जाता है, वहीं यह पहचान होती है।
इसीलिए वह बात गहराई से समझने की है कि हमें इस प्रक्रिया के प्रति जागृत होना है। जागरुकता की सबसे बड़ी यही जरूरत है। हम हजारों साल से शरीर के प्रति अत्यधिक सजग हैं। सारे शास्त्र यहीं आकर रूक गये हैं, जो आगे बढ़े वे भी काल भय से हमें छोड़ नहीं पाये। बुद्ध जब बोले, तब तो शरीर से इतना लड़ चुके थे कि उनकी बात को भी स्वीकारते हुए जो उन्होंने करके छोड़ दिया था, वह भी उनके अनुयायी मानते गये। लोग कहते हैं कि मन, जो क्रिया-तन्त्र है, वाक है, शरीर के इस पर नियंत्रण कर ले, और चित्त से उठने वाली तरंगों के प्रति असहयोग रखें तो साधना की ओर तेजी से बढ़ेंगे। यह सबसे बड़ा खतरा है।
उपशमन, नियमन, नियंत्रण फिर उल्टी तरफ चलना है। शरीर के नियंत्रण व नियमन की जितनी चिन्ता होती है, शरीर उतना अधिक खतरनाक हो जाता है। वहीं जब क्रिया का स्वरूप स्पष्ट है तो मात्र साध्य अन्तर्मन से उठने वाली तरंगो के प्रति सहनशीलता को प्राप्त करना है। शरीर के नियंत्रण पर हजारों साल से जो बल दे रहे हैं, वह यह जानकर भी छोड़ने का साहस नहीं कर पा रहे है। मन से असहयोग लेना है मन का निष्क्रमण भूत और भविष्य में है। वर्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ते ही मन स्वतः अनुपस्थित हो जाता है। यह क्रिया तन्त्र को राजी रखने का तरीका नहीं है, वरन उसका सहज साक्षात्कार है। जिससे वह स्वतः अनुपस्थित होने लग जाता है। यही पहली मंजिल है, न यहां दमन है, न क्षय की स्पर्धा। अभ्यास का क्रम है, मात्र साक्षी ध्यान। यही हमें जानना है, आगे गहरे समझना है। तभी साधना का रहस्य समझ में आता है। यही सार है। तभी लक्ष्य की प्राप्ति संभव है।
अ
जीवन का स्त्रोत क्या है ,यह प्रश्न सभी चिंतकों को व्यथित करता रहा हैं।भगवान बुद्ध ने अव्याृत प्रश्न कहकर इसे पूछने पर मना कर दिया था।भारतीय दर्शन की यात्रा , मैं हूँ,मेरी सत्ता है, मैं चैतन्य हूँ, तथा अद्धैत वेदान्त तक आते - आते मैं आनंद भी हूँ, गीता में भगवान ने ”मम माया दुरत्या कहकर परम सत्ता ”आत्म“ तक दी है।पूज्य स्वामीजी जहाँबुद्ध के आलय मत को मानते हुए परम चैतन्य को अत्यंत गत्यात्मक कहरहे हैं, वहीं वे केन्द्र की सत्ता को भी स्वीकृति दे रहे हैं, पर यहाँ जो केन्द्र है ,वह निरन्तर परिवर्तनशील है , जो अनेक ज्योतियों के एक थिर होने का अहसास भी कराता है।
कृपया आप इसे पढें ,अपनी प्रतिकिया दें,यहाँंस्थागत धर्म से हटकर भारतीय संस्कृति और धर्म दर्शन की विवेचना होरही हैं
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साधकांे से हुई बातचीत के आधार पर
योग मात्र शारीरिक क्रिया प्रक्रिया का सामन्जस्य ही नही है, वरन योग सम्पूर्णता पाने की प्रक्रिया है। जो पूर्ण है, जहां किसी प्रकार का कोई अभाव नहीं है। अभाव ही विक्षोभ का जनक है। वही दुख है। प्रत्येक प्राणी में किसी न किसी प्रकार की कोई न कोई कमी रहती है। कमी प्रकृति जन्य है। विषमता प्रकृति का स्वरूप ही है। आकांक्षा से गति उत्पन्न होती है, गति इस विषमता को हलचल देती है। एक स्फुरणा, पूर्णता की ओर बढ़ने की ललक, यही विकास यात्रा है। हम निरन्तर सम्भावना में है, रूपान्तरण में हैं, अपने आप को बदलने की प्रक्रिया में हैं।
यही कर्म का स्वभाव है। कर्म उस तरंग की स्वाभाविक गति है, जो चित्त सरोवर में उठी है। स्फुरणा क्यों ? क्या मात्र इसलिए ही नहीं कि वहां मात्र उद्वेलन ही है। सरोवर में आने वाली हर लहर एक छाप छोड़ जाती है। फिर उसी छाप पर, उसी प्रभाव पर दूसरी लहर लाती है।यही तो संकल्पों का सिलसिला है, कारण है- संस्कार ! संस्कार ही वह छाप है, जहां नाभि से आने वाले स्पन्दन तरंग उत्पन्न करते हैं। इस तरह यन्त्र जो कि स्वचालित है, चलता रहता है। लहर उठती है, गिरती है, छाप बनती है, उस पर पुनःलहर उठती है। यह छाप ही वह संस्कर है जो कि संकल्पों की जनक है। हर संकल्प जो जितना गहरा होता है, उतना ही कर्म में ढल जाता है और कर्म की परिस्थिति भोग में होती है। भोगावस्था में वह तरंग पुनः टूटती है और उसका प्रभाव शेष रह जाता है। उस प्रभाव से पुनःतरंग उठती है।
यह एक लंबा सिलसिला है।
प्रश्न उठता है, फिर इस सिलसिले को योग में कैसे परिणित किया जाये ? योग-सम्पूर्ण रूपान्तरण ! अभाव का ही अभाव ! मात्र पूर्णता। यहां हैं गहरी शांति हार्दिकता तथा प्रेम।
शरीर मात्र जड़ ही नहीं है, वह परम चेतन्य के साथ जुड़कर चेतन तथा जड़ के साथ जुड़कर जड़वत हो जाता है। वह जड़ और चेतन का समवाय है, जो अद्भुत है, इसलिए ही रूपान्तरण संभव है। इस शरीर का सम्पूर्ण समर्पण ही साधक के लिए श्रेयस्कर है। साधक कहते हैं कि वे ध्यान करते हैं कुछ कहते हैं जाप करते हैं, कुछ कीर्तन करते हैं, एक-एक इन्द्रिय को लेकर वे संयमित हो रहे है। वाणी जाप करती है, तब मन बाजार घूम आता है। हाथ से सुमिरिनी फिरती है, तब कान पड़ौस का बाजा सुनता है। घण्टे भर मौन रहे, पर आसन से उठते ही क्रोध से आग बबूला हो उठे हैं। इतना गुस्सा, यह कैसा योग हैं ? योग- जुड़ना। परम सत्य में लय भाव। यह मात्र एकांकी नही है, वरन यहां जुड़ना सम्पूर्ण है। टोटल....कुछ भी बाकी नहीं रखना। अपने आपको पूरा दे देना। चैबीस घंटे दे देना। तब जो कर्म है, वह भगवद कर्म में ढल जाता है।
यह कर्म कब संभव हो ?
प्रश्न उठ खड़ा होता है, यह कैसे संभव हो ? हम जो कुछ करते हैं, क्या वह सार्थक कर्म नही है? हां उत्तर सम्भवतः यही है। सार्थक कर्म पूर्णता देता है, जब कि निरर्थक कर्म मात्र अभाव और असंतोष सौंपता है। निरर्थक कर्म जन्म लेता है उन बातों से जो आज की नही है। आगे और पीछे का जो व्यर्थ का चिन्तन है, उसमें हम डूबे रहते है। वह इस प्रभाव का चित्त सरोवर पर सौंपता है, जिससे विक्षोभ जन्य लहरें उत्पन्न होती हैं, जहां मात्र अभाव ही है।
अतः आवश्यक है कि पहले निरर्थक कर्म से सार्थक कर्म की और बढ़ा जावे जो प्रकृति जन्य है, वही सहज है।
वही स्वाभाविक है। वह अपने आप पूरा हो जाता है। निरर्थक कर्म होता है, मन-तन के आगे और पीछे के चिन्तन में डूबने से। मन को जितना इससे हटाया जाकर वर्तमान में लाया जायेगा। उतना ही मन अपनी स्वाभाविक स्थिति में होगा।और मन जितनी शांत अवस्था में होगा, उतनी ही सक्रियता बढ़ेगी। साथ ही, उतनी ही सृजनात्मकता रहेगी। कर्म, सार्थकता पाएगा। कर्म, सार्थकता तभी पाता है, जब वह कर्म दुबारा न किया जावे यह भावना पूरी हो जावे। यही कर्म का रहस्य है। अन्यथा कर्म का भोग शेष रह जाता है। कर्म की स्वाभाविक परिणति लय है और जब कर्म मुक्ति का कारण बन जाता है, तब वही योेग कहलाता है, अन्यथा कर्म की परिणति भोग में ही होती है।
कर्म भी साधन ही है। इसके स्वरूप को समझे बिना बचने का उपाय नही है। यह जगत, कर्म के ही ताने-बाने से बना हुआ है। अतः जगत से बाहर जाना तो संभव नही है। करोड़ो में कोई बिरला बाहर आ सकता है, परन्तु अपने भीतर से जगत को बाहर कर सकता है। जगत में रहते हुए भीतर के जगत से छुटकारा ! यही साध्य है। जगत आगे और पीछे के व्यर्थ के चिन्तन में उपस्थित रहता है वह तरंग पैदा करता है। जो कर्म को उपस्थित कर भोगों में बदल देती है।
अतः कर्मयोग का रहस्य यही है। कर्म का योग में रूपान्तरण ही साध्य रहे। चित्त सरोवर मे आने वाली हर लहर पर ध्यान रहे। उसका साक्षी भाव से निरीक्षण। निरर्थकता से बचा जाये। तभी गंदलाया जल स्थिर होना शुरू हो जाता है। और पारदर्शी तली उपस्थिति देती है।
यह स्थिति मात्र जड़ हो जाना नही है, वरन यह है- सम्पूर्ण सृजनात्मकता का अवतरण, टोटल रिवोल्यूशन सम्पूर्ण परिवर्तन दूसरे शब्दों में सम्पूर्ण योग। यहां मात्र क्रिया का अन्त नही है, परन्तु क्रिया का सहज और स्वाभाविक रूपान्तरण है।
इसकी साधक में पहचान है, हार्दिकता और आचरण में निस्वार्थता।
कर्मयोग, साधक को अदभुत क्रिया शक्ति से जोड़ता है, जिसकी परिणति होती है, त्याग और सेवा में। उसका हर क्षण प्रकृति जन्य होने लगता है। जिससे प्रकृति से साधक की सम्प्रत्ति गहरी होने लगती है।
व्यक्तित्व की संरचना
प्रश्न ः यह माना जाता है कि शरीर जड़ और चेतन दोनो का समवाय है, शरीर में चेतना का प्रकाश कहां होता है, तथा चेतना किस प्रकार कार्य करती है इस सन्दर्भ में विवाद है। क्या मन, चित्त और आत्मा के बीच में भी अन्य किसी प्रकार के स्तर है।
स्वामी जी ः यह तो वही बता सकता है, जिसने सवाल खड़ा किया है। किताबों में पढ़ा होगा। प्रश्न अगर मन से आया है तो उत्तर उसी के पास होगा, उत्तर उसी से पूछा जाए मिल जायेगा। रमण महर्षि ने प्रश्न यही उठाया था और इसी की तलाश में रहे।
प्रकृति की लहरें अनवरत उठ रही हैं। ये नाभि में उठती हैं। नाभि में विकारों के बीज हैं। वे बीज सूक्ष्म हैं। वहां मात्र स्पंदन है। वे धीरे धीरे उफनते जाते हैं, जैसे लहरें सभी के अन्दर उठ रही है, किसी को जल्दी उत्तेजित करती हैं, किसी को कम। यह व्यक्ति की बनावट, बुनावट पर निर्भर रहता है।
जैसे कुछ लोग सो रहे हैं, कोई आकर आवाज देता है तो कोई एक आवाज पर, कोई दो आवाज पर, कोई चार आवाज पर उठ जाता है, और कोई होता है, उस पर असर ही नही होता- वह सोता रह जाता है। आवाज देने वाला एक ही होता है। संस्कार सूक्ष्म बीज रूप में हैं, लहरें टकरायी, टकराते टकराते कोई उफन जाता है, किसी पर कोई असर नही होता। यह उसी प्रकार से है कहीं बच्चों ! आवाज लगते ही उठ जाता है, कोई सोया रहता है। वासना जागृत ही नहीं होती।लहरें अनवरत उठ रही हैं धीरे-धीरे यह अनुभव हो जाता है कि प्रकृति का कार्य यही है। हमें तो सहन करना है। सहन करने के लिए अपने स्थान पर स्थिर होकर रहना है।
चेतन्य केन्द्र आत्मा है या यूं कहिए, वहां अवेयरनेस है वह है, उसका अनुभव हो जाता है, उसके सबसे समीप अन्तर्मन ही है, मनोविज्ञान की भाषा में इसे अनकांशस कहा जा सकता है। यहां जानने का माध्यम कोई है नहीं, इन्द्रियों की पहुंच यहां तक नहीं है। यहां तक स्थूल शरीर की पहुंच नही रहती है। यह उसके परे की बात है, अभ्यास यही करना है कि नाभि से उठ रहे स्पंदनों को, जो चित्त पर आकर टकराते हैं तथा वहां स्थूलता ग्रहण करते हैं, और वासनाएं जन्म लेती है, उस उफान को उस संवेग को, उस लहर को, उस तरंग को उस भाव दशा को गहरी जागरूकता के साथ, सतर्कता के साथ साक्षी भाव से अवलोकित करना है।
इसी अन्तर्मन से स्पंदन आगे बढ़ते हैं, वे स्थूल शरीर से अभिव्यक्त होते हैं। नाभि से उठने वाले स्पंदन चित्त पर आकर टकरा कर स्थूलता ग्रहण करते हैं। यहां आकर भाव- दशा शरीर के माध्यम से प्रकट होने लगती है। यहां आकर वासनाएं आकर ग्रहण करती हैं, स्पंदन तरंगों का रूप ग्रहण कर लेते हैं, वासनाएं विषयों के लिए लालायित रहती हैं, उन्हें पोषण मिल जाता हैं, अगर वर्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ जाता है तो वे ऊपर की ओर उठती जाती हैं, पर उन्हें फैलने के लिए जगह नहीं मिलती स्वभाव में बदलाव व्यवहार की श्रेष्ठता अनुकरण से नहीं सीखी जाती। यदि हमारा क्रोधी स्वभाव है और उसकी हमें प्रतीती भी है, तो वर्तमान में रहने का अभ्यास होेने के बाद लहर जो उठी है, वह अनुभव होगी और लहर जिस प्रकार पत्थर पर टकरा कर वापिस लौट जाती है, वैसे ही मालूम होगा। टकराई व लौट गई, अन्तर्मुखी होेने के बाद वृत्तियां उठते हुए भी पनपती नही है। और धीरे-धीरे बिल्कुल ही नहीं होती।
इसीलिए कहा है, स्वभाव बाद की स्थिति है। इसीलिए स्वभाव का पता तब तक नही चलता, जब तक क्रिया नहीं होती। आप चुप हैं, मौन हैं, पर बोलते ही शब्द बाहर आते ही जब क्रिया होती है, स्वभाव का पता चल जाता है। वर्तमान में रहने वाले का स्वभाव समझ में नही आता है, क्योंकि वहां प्रतिक्रिया नही होगी। न भूत है, न भविष्य, न कल्पना है, न अतीत से संग्रहित कोई व्याख्या है। क्योंकि बाह्य, मन अनुपस्थित है। उसका काम होता है-स्मृति करना, कल्पना करना, चिन्तन करना, संग्रहित करना, रिकार्ड रूम नहीं रहा तब न अतीत रहा न भविष्य रहा, मात्र क्रिया, कोई प्रतिक्रिया नहीं। स्वभाव सहज, साधारण बन जाता है। हां, यह भी नहीं होता कि निठल्लापन होता है, या पलायन। हां, अत्यधिक सृजनशीलता, और चित्त की नमनीयता वहीं संभव है। सवेंदनशीलता यही प्राप्त होती है। जो भी कार्य प्रकृति को करना है, वह कराती जायेगी, तथा कार्य स्वतः होता जायेगा।
मैं इतनी देर से चुप बैठा था, आपने प्रश्न पूछा मैं बोला। नही तो चुप रहता हूं। प्रश्न पूछा है तो क्रिया होती है। नहीं तो व्यवहार कुशलता नही रही। हम सब भीतर से जुड़े हुए हैं। व्यवहार ही सबके प्रति सही होना चाहिए। यहां इतने लोग आते हैं, पर आवश्यक नहीं है, बोला जावे। पर कोई प्रश्न पूछता है, तब उत्तर आ जाता है, अन्यथा मौन, व्यवहार का सही तरीका यही है। अन्तर्मुखी होने पर कर्म स्वतः प्रकृति जन्य हो जाता है, वहीं यह पहचान होती है।
इसीलिए वह बात गहराई से समझने की है कि हमें इस प्रक्रिया के प्रति जागृत होना है। जागरुकता की सबसे बड़ी यही जरूरत है। हम हजारों साल से शरीर के प्रति अत्यधिक सजग हैं। सारे शास्त्र यहीं आकर रूक गये हैं, जो आगे बढ़े वे भी काल भय से हमें छोड़ नहीं पाये। बुद्ध जब बोले, तब तो शरीर से इतना लड़ चुके थे कि उनकी बात को भी स्वीकारते हुए जो उन्होंने करके छोड़ दिया था, वह भी उनके अनुयायी मानते गये। लोग कहते हैं कि मन, जो क्रिया-तन्त्र है, वाक है, शरीर के इस पर नियंत्रण कर ले, और चित्त से उठने वाली तरंगों के प्रति असहयोग रखें तो साधना की ओर तेजी से बढ़ेंगे। यह सबसे बड़ा खतरा है।
उपशमन, नियमन, नियंत्रण फिर उल्टी तरफ चलना है। शरीर के नियंत्रण व नियमन की जितनी चिन्ता होती है, शरीर उतना अधिक खतरनाक हो जाता है। वहीं जब क्रिया का स्वरूप स्पष्ट है तो मात्र साध्य अन्तर्मन से उठने वाली तरंगो के प्रति सहनशीलता को प्राप्त करना है। शरीर के नियंत्रण पर हजारों साल से जो बल दे रहे हैं, वह यह जानकर भी छोड़ने का साहस नहीं कर पा रहे है। मन से असहयोग लेना है मन का निष्क्रमण भूत और भविष्य में है। वर्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ते ही मन स्वतः अनुपस्थित हो जाता है। यह क्रिया तन्त्र को राजी रखने का तरीका नहीं है, वरन उसका सहज साक्षात्कार है। जिससे वह स्वतः अनुपस्थित होने लग जाता है। यही पहली मंजिल है, न यहां दमन है, न क्षय की स्पर्धा। अभ्यास का क्रम है, मात्र साक्षी ध्यान। यही हमें जानना है, आगे गहरे समझना है। तभी साधना का रहस्य समझ में आता है। यही सार है। तभी लक्ष्य की प्राप्ति संभव है।
अ
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