Monday, July 13, 2009

पूज्य स्वामीजी

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समर्पण का पथ

               
यहां मात्र विधि है। सब स्वीकार है मुझे
    प्रकृति ने जो दिया है
    जो सौंपा है
    श्रेष्ठतम है।मैं कहाँ तक बदलूंगा, मेरा सामथ्र्य ही बहुत कम है।कहीं तो मुझे रुकना ही होगा।जो भी मुझे आज मिला है ,कल मैंने ही तो यह चाहा था।तब हम साधना का प्रारंभ कर सकते हैं।यहां लड़ना किसी से नहीं है।न निंदा न वंदना।न कोई चाहत।
स्वामी जी कहा करते थे,याचक मत बनो।तुम अनिष्ट की कल्पना कर-कर ही टूट जाते हो।तूफ़ान आता है,पेड. किस तरह सामना करता है,पूरा हिल जाता है,पर वह गिड़गिड़ता नहीं है।

योग के नाम पर प्रारभ में ही पूरा बल छोड़ने और छूटने पर होता है। यहा उसकी कोई जरूरत ही नहीं है।तुम तो बस जो विधि तुमने ली है उस पर चलते रहो जिसे छूटना होगा वह स्वतः छूटता चला जाएगा। साधना के नाम पर साधक को लड़ने के लिए तैयार किया जाता है।यह योग का मार्ग है।    संकल्प का मार्ग है, संघर्ष करना है
    पहला संघर्ष- काम से
    काम के विरूद्ध  रहना है, जब विवाह किया है,तब आप योग की तैयारी में नहीं जासकते।पर सब जगह उल्टा पाठ पढ़ाया जारहा है।गृहस्थ का मार्ग दूसरा होगा,उसका मार्ग गृहस्थी से ही जाएगा।उसे अपने परिवार की सभी जिम्मेदारियाँ पूरी तरह से निभानी ही होंगी।
    इसीलिए  योगी  जो भी साधन अपनाता है वह गृहस्थ के प्रतिकूल है।भारत की हजार साल की गुलामी का मुख्य कारण यही रहा कि हमने मूढ़ता में आकर गृहस्थ के विरुद्ध ही रास्ता पकड़ लिया।  शक्ति का मूल केन्द्र नाभि के पास है।उसे जागृत होना है।परन्त परम्परागत  साधना  मूलाधार के विरूद्ध है।हमारी सारी साधनाओं का प्रारंभ इसी मूलाधार के विरुद्ध ही रहता है।यही गलती हमें कहीं का नहीं रहने देती।
     गहरी सांस लेना सीखें।प्राण वायु नाभि तक जाए ,विचार कम से कम हों, मस्तिष्क की क्रिया पर कम से कम दबाब डाला जाए।इससे स्वाभाविक रूप से उर्जा का विकास होगा।उर्जा का विकसित होना  कोई पाप नहीं है।
होना  यही चाहिए-    यह जगत परमात्मा की लीला भूमी है। सब उसी का  ही है, शिव और शक्ति का मिलन  है यहाँ
    किसके खिलाफ जाना है?
    किससे कब लड़ना है?
    - उसका उपभोग करो, काम शक्ति परमात्मा की देन है।उसके आभारी रहो। तुमने असहयोग किया ,क्या इ्र्रश्वर खुश होगा,यह तुम्हारी भूल है।जो भी परमात्मा ने दिया है ,साधन सामग्री है।
    उपयोग करो
    रूपांतरण करो
    - जो भी है, उसे स्वीकार करो। सामथ्र्य का सदुपयोग ही साधना का प्रारंभ है।
    समग्र स्वीकार
     मांगो मत, प्रयास करो। जो भी क्रिया है उसमें अपने आपको पूरा लगादो। कर्तुम, अकर्तुम ,अन्यथा कर्तुम, यही होगा।होगा,नहीं होगा,कुछ तीसरा होगा। परन्तु यहां तुम्हारी लगन महत्वपूर्ण है। लेकिन सजगता में रहो- होश में रहो
    संसार और मोक्ष- विपरीत नहीं है
    जाल  सनातन से रहा है
    किससे छुटकारा
    मुक्ति किसी की नहीं होती, कहां जाओगे ,जो भी गया लौटके बताने नहीं आया,इस दुनिया से बेहतर कोई भी जगह नहीं है।
    संसार रसमय है, ऐसा कोई स्थान नहीं है, जहां परमात्मा न हो
    जब सब जगह परमात्मा है
    तो फिर किसे छोड़कर कहां जाना है-
    सब जगह जो भी है स्वीकार है, अच्छा मिला उसके अनुग्रही बनो।मन माफिक नहीं हुआ ,उसकी इच्छा तुमनत ही तो की थी।।तुम भी तो अपने बच्चों के हर काम पूरे नहीं कर पाते हो।उसकी भी मजबूरी रही होगी।तुम्हारा प्रयास कम रहा होगा।कम से कम सोचो।कोई संघर्ष नहीं होना है।
    तब मन का अनावश्यक भटकाव कम होने लगता है
    - सबको प्रकृति ने अपने कार्य से भेजा है।  हम सब इसरंगमंच के पात्र है
     जो ‘रोल’ हमेें दिया गया है, उसको वैसा ही करता है।
    शैतान भी उन्हीं ने बनाया है, उसका भी कार्य होना है।हम कौन उसका खेल बिगाड़ने वाले होते हैं।

,जहां समर्पण होता है, वहां मन की उहापोह भी खो जाती है
    अहंकार कभी भी समर्पण नहीं होने देता है, वह हर जगह कुतर- कुतर  करता है।वह किसी की बात स्वीकार ही नहीं करता।जब दूसरा चाहे वह गुरू ही क्यों नहो वह उस वक्त भी  इसमें नई बात क्या है? यह तो मुझे पहले से ही पता है, यह तो उस किताब में भी लिखा है मानकर अपनी ग्राहकता को रोक देता है।पत्थर की तरह जो रात दिन नदी में भीगा रहने बाद भी सूखा रहता है।
    बुद्धि अनेक उत्तर अपने पास रखती है
    -सीस देय ले जाए- कबीर ने कहा था, प्रेम बाजार में नहीं मिलता, शर्त है, सिर दे जाओ ।अहंकार कभी भी नहीं जाता।
    .. रावण के दस सिर थेे, दस गुना अहंकार, ... हांॅं
    तीर जब नाभि पर मारा गया, तब वह मरा..। अहम् की मृत्यु माम् के साथ लय में होती है। माम् का मूल स्थान नाभि पर है।अहम्, माम् में लय हो जाता है। मम् माया दुरत्या,  पार होनी कठिन है।परन्तु इस माम् की शरण ही पार कराने में समर्थ है।
               

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