Saturday, October 5, 2013

11 अनुभव 2

11 अनुभव 2

स्वामीजी अस्वस्थ थे,शाम के समय वे मिलने वालों के प्रश््रनों के उत्तर दिया करते थे, यहाँ उन संवादों का सार संक्षेप हैः-

”हाँ, जो करना था, वह तो बहुत पहले हो चुका था... कई बार विचार उठा कि जो करना था, ... वह तो हो चुका, शरीर को क्यों रखा जाए , क्या प्रयोजन है?

 बहुत पहले आपको बताया था ,
स्वप्न आया था , मैं समुद्र के किनारे खड़ा हँू, ... और सोच रहा हूं,
रामतीर्थ की तरह इहलीला समाप्त करें,
मैं समुद्र में चलने लगा, धीरे-धीरे बढ़ता रहा, ... कमर तक पानी आ गया,
... मैं आगे बढ़ता रहा, गले तक आ गया,...
तभी अचानक लगा किसी ने धक्का दिया...
पाया मैं बड़ी सी नाव के पास खड़ा हूं। सिपाही ने मुझेपकड़ लिया है, वह कह रहा है, क्या मरने चले थे...
तब लगा कि अभी वक्त नहीं आया है,रहना है..।
.
तब इस सेवा प्रतिष्ठान का कार्य प्रारम्भ किया, ... सेवा क्या है,
बड़े वृक्ष के नीचे जो आ जाएगा, उसे छाया देनी है, उसने पूछा ,सुना
हो सकता है, संकेत  कर दिया, ... शारीरिक सेवा तो इस उम्र में कहां हो सकती है, हाँ, मानसिक सेवा सुबह से रात तक चल ही रही है।.

फिर पता ही नहीं चलता, .. कब कौन आया था, क्या सोच रहा था, वही आकर बताता है, कि वह कुछ सोचकर पहले आया था, ... उसका कार्य हो गया, ... वह यह बताने आया है।
मैं तो कुछ करता नहीं, ... मुझे मालूम भी नहीं होता, जो होना है वही होना है, अपने आप हो जाता है, उसके संकल्पों को दिशा मिल जाती है। यहां तो कुछ है ही नहीं, क्या करना है, यह भी नहीं है।“

प्रश्न था क्या यह करुणा है?
यह शब्द भी गलत है। जहॉं कोई दूसरा है, वह आपसे छोटा है, उसके लिए कुछ किया करुणा है। यहॉं दूसरा रहा ही नहीं। जो होना है, अपने आ हो जाता है। आप आनंद में हैं, आपके और उसके बीच का संबंध मात्र प्रेम है।

हम सभी चुप थे, पर भीतर से आशंकित भी, पर स्वामीजी निर्लिप्त , शांत उठकर बैठ गए थे।

”एक ही सवाल को कितनी बार आपने पूछा है, - बात तो एक ही है,
आप घुमा फिरा कर बार बार पूछते हो,
मन का जो अनावश्यक भटकाव  है, निरंतर विचारणा में जो लगा रहता है, वह रूक जाए, यही साधना है।
आज जो भी आता है, वह बर्हिमुखी है, उसका मन चंचल भी है, विकारी भी है, उसे अपने ऊपर विश्वास भी नहीं है, न ही वह कुछ करना चाहता है, वह चाहता है, उसे आशीर्वाद मिल जाए, और वह जागृत हो जाए, उसकी मनोकामना पूरी हो जाए, .. लाभ और लोभ दोनों प्राप्त हो।“

”पूरे देश में एक करोड़ से ऊपर लोग होंगे, जो आध्यात्म की  दुकानें खोलकर बैठे हैं। किताबों में कहानियां है, वो सुना देते हैं, ... सुना रहे हैं, संगीत से सुनाते हैं, मनोरंजन हो रहा है। साधना मनोरंजन नहीं है। वह पहले कहानी उस पंडित की भी सुनाई थी ने, जो भागवत बांचते थे, राजा को सुनाने गए थे। राजा ने कहा पंडित जी फिर आना अभी आप में कुछ कमी है।उन्हें बुरा लगा, घर गए,दुबारा कठोर अभ्यास किया।, .. फिर दुबारा गए, राजा ने फिर वही कहा, अंत मंे पंडित जी घर छोड़कर जंगल में चले गए। वहां जाकर तैयारी करेंगे। फिर आकर राजा को सुनाएंगे। परन्तु वे आए ही नहीं, फिर राजा उनकी खोज में गया। पंडित जी मिले, राजा ने कहा- वह कथा सुनने आया है। तब पंडित जी हंसे, बोले राजा अब कथा ही नहीं रही, न सुनने वाला रहा, न सुनाने वाला रहा है।

 सार, अंतर्मुखता की प्राप्ति का होना है। वह होती है, निरंतरता वर्तमान में रहने से। पर यही नहीं होता। आज सभी बाहिर्मुखी हैं। जो  बात खुद कह रहे हैं, वह उनके आचरण में नहीं है। उनका उस पर ही विश्वास नहीं है। अर्थ है, तो पालन करो, ... आचरण में लाओ, ... फिर तुम्हे कहीं भागने की जरूरत नहीं होगी। ‘सियाराम मय सब जग जानी, करहुं प्रणाम जोरी जुग पानी,’ सब जगह वही है, तब मात्र सेवा ही शेष रह जाती है। अपने पॉंव छुआने का,, रोली लगाने का, मालाएं पहनने का,, ये जो स्वांग भरा जाता है, इसकी भी जरूरत नहीं रहती।“

हम बाहर बैठे थे, पांव में जो घाव था उसकी ड्रेसिंग हो चुकी थी, ... बाहर हल्की धूप थी।

स्वामीजी कह रहे थे,”जब नमक का पुतला सागर की गहराई नापने गया, तो खुद ही गलकर एकाकार हो गया,...
वहां जाकर, कौन आया है, बताने, वहां क्या शेष बचता है,

पर इस अवस्था में जब देहांत होता है, तब?प्रश्न था।
”जो सबका होता है, वही होगा, मिट्टी मिट्टी में मिल जाएगी, बस एक बूंद समुद्र में मिल गई, तब क्या होगा, वह रही है कहां है, जो बताएगी, ।“...

”हाँ,, जब संस्कार  ही नहीं बचा है, ... तब सब खाली हो गया तब..तो यह संभव है,.पर साधारण पुरुष का क्या अंत होगा? प्रश्न था।

”साधारण, असाधारण क्या, ... जो पैदा होता है, ... वह मरता है, ... शरीर पंच महाभूतों से बना है, वह उनमें मिल जाता है। संस्कार जो है, वह शेष रहता है, गुण संस्कार  में है, ... मन तो गति है। वही सूक्ष्म शरीर है, ..वह तो रहेगा, ... अनुकूल वातावरण मिलने पर जैसे बरसात में न जाने कितने कीट पतंगे, वनस्पतियां उत्पन्न हो जाती है,... वह जन्म ले लेता है, ... न भी ले,... जैसा उसका संस्कार है, ... मनुष्य जीवन का उद्देश्य, अंतर्मुखता प्राप्त होने पर ही  उसे पता लगता है, ... बहिर्मुखी तो भटकता रहता है। यही माया है।

हां, सब यहीं है, कुछ भी खाली नहीं है। एक आलपिन की नौक पर सैकड़ों संस्कार रह सकते हैं। मात्र बबूला,,... एक हवा, ... शरीर तो है नहीं, वह तो संस्कार को आकर मिलता है।

क्रिया के लिए इन्द्रियां चाहिए, ... बिना इन्द्रियों के सब व्यर्थ है। मनुष्य जीवन भी इसीलिए सर्वश्रेष्ठ कहा है। पशुओं के पास मस्तिष्क नहीं है। सोच-समझ नहीं है। प्रयास वे नहीं कर सकते। और जो मूक शरीर है, उसे भी गति के लिए, विकास के लिए शक्ति चाहिए, जो उसके पास नहीं है।
बहस में पड़ना बेकार है।“



”तुम्हारा रास्ता ठीक है, या गलत है, इस सोच में पड़ना बेकार है।
जो रास्ता तुम्हे मिला है। उस पर चलो,
मैंने कोई रास्ता नहीं बताया, ... तुम चलोगे, और लगन सच्ची है, तो तुम अंतर्मुखी हो जाओगे, ... यह सच है।
यहीं आकर सारे रास्ते अपनी पहचान खो देते हैं।
अतः इस भूल भुलैया में पड़ना बेकार है,
इसीलिए मैंने कभी रास्तों की चर्चा ही नहीं की।
एक ही बात बताई,
सुबह बिस्तर से उठने से पहले और रात को सोते समय, ... थोड़ा अभ्यास नियमित करो और अभ्यास भी क्या, ... अपने विचारों को कम करने का प्रयास करो, ... रास्ता मात्र अवलोकन का है, ... इसमें धीरे-धीरे विचार और विचार के बीच में जो अन्तर है, वह अनुभव होगा। धीरे धीरे बढ़ता जाएगा, ... उस अवस्था में नींद भी आ जाए तो अच्छा  है, हो सकता है, शुरू में सपने बढ़ जाएॅं, ... पर घबराओ मत, ... यहीं अंतर्मुखता की चाबी है।“
अनंतयात्रा में कहा है, ”कभी अतीत में झांकने का प्रयास मत करना, कभी भविष्य को जानने का प्रयास मत करना।
वर्तमान में रहने की यही कला है, स्मृति पाप है, हमेशा यह बोध बना रहे। सजगता यह रहे। जो भी क्षण है, जहॉं जो क्रिया है, मन पूरी तरह वहीं रहे। जो कल होने वाला है, उसकेलिए लखिा है, ”कर्तुम, अकर्तुम , अन्यथा कर्तुम कुछ भी घट सकता है। सब प्रकृति र छोड़दो, अनावश्यक विचारण अपने आप छूट जाती है।

”साधना जीवन और जगत को काटकर नहीं हो सकती। मैंने कभी भी अलग से बैठकर, आँख भींचने को नहीं कहा। ये जो ध्यान सिखाते हैं, समाज और जीवन से काटकर बात करते हैं। सभी दिशाएं अच्छी हैं, सारे कमरे अच्छेे हैं, जीवन और जगत में जो तनाव रहित, शांत मन से जो भी क्रिया हो अधिक से अधिक मन को वहीं रखने का प्रयास करना चाहिए, यही सुमिरन है। पर क्या कर रहे हैं, घर से भाग रहे हैं, कहीं अलग जगह ले जाते हैं, कहते हैं यहां साधना शिविर है। एक उलझन पैदा करते हैं। हर व्यक्ति , हर परिवार उलझता जाता है। जितने आदर्श घड़ोगेे उतना ही पाखंड बनेगा। व्यक्ति  का आत्मविश्वास टूट जाता है।“

”पुराना, ... जब प्रकृति ने ही नहीं रखा...
तुम क्यों पीछे पड़ते हो।
यहां सब बदलता है। नित नई विचार धारा आती है। नहीं हो तो प्रकृति अपना कार्य करना बंद कर दे। यहां जो आज है, कल नहीं रहेगा, जो कल था वह आज कहां है?
इसीलिए किसी एक बात पर चिपककर बैठ जाना उचित नहीं है।
पुराने तरीके आज काम नहीं आ सकते। हम जो पुराने ग्रन्थों को, लीक पकड़कर परिपाटी की तरह पढते चले आ रहे हैं, वहां सवाल करना चाहिए, इससे कुछ फायदा भी हो रहा है, क्या..?
जो छूटता है, छूट जाने दो, ...
जो तुम्हारा अनुभव बनेगा, वह सच्चा होगा, वह तुम्हारा है। सनातन धर्म का मतलब होता है, जो सदा है, ... कल भी था, आज भी है, कल भी रहेगा, इसीलिए रास्ते को लेकर चलना उस पर बहस करना अब बेकार है। बाहर तो मात्र बहिर्मुखता है, ...उसके बाहर आना है। फिर जो है, सदा से है,उसकी अनभूति होने लगेगी, ... वहीं शांति है,, वहीं शक्ति भी है। समय के साथ भाषा बदल जाती है, कहने का तरीका बदल जाता है ।पर जोे कहा जाता है, ... जो शब्दों से भी परे हैं, वह महत्वपूर्ण है।

 गीता के दूसरे अध्याय में स्थितप्रज्ञ के जो लक्षण है, वे अंतर्मुखी व्यक्ति के है।, ... वहां पर सब रास्ते आकर मिल जाते हैं, ...  वह सदा से है,। वह अनभूति है, व्याख्या नहीं है।शब्द बताते हैं कि ऐसा हो सकता है।“

”धर्म की चर्चा मैंने भी की है, क्योंकि वह तो रास्ता है, अध्यात्म उससे परे है, वह छत पर आने की सूचना है। वहां आकर फिर बाहर और भीतर आने की स्वतंत्रता रहती है। मैं तो जो भी आता है सवाल पूछता है, उससे यही कहता हूं, तुम जो कर रहे हो उस पर विश्वास लाओ, करो,, सोचो मत, चलो, उसे व्यवहार में लाओ गलत होगा, अपने ..आप छूट जाएगा, प्रकृति अपने आप में सही बड़ी मार्गदर्शक है। अंतप्रेरणा अपने आप बता देती है। क्या सही  है?, क्या गलत है? गलत छूट जाएगा। पर चलो तो सही। तुम्हारा धर्म, तुम्हारी मान्यताएॅं , सही हैं या गलत यह चर्चा का विषय नहीं है। मैं किसी की मान्यता को बदलने  के पक्ष में नहीं हूं। बलपूर्वक या अन्य किसी प्रकार से यह कार्य नहीं करना चाहिए।“


”अन्तर्मुखी अवस्था में संस्कार खुलना शुरू होता है।
यही वास्तविक साधना है, पात्र का ढक्कन सा खुल जाता है, एक प्रवाह है, उसके खुलते ही, जहां पर यात्रा बंद की थी, वह मुकाम आ जाता है। जो जाना गया है, वह सब भीतर  है, बस वहां पत्थर रखा हुआ ह।, ... वर्तमान में रहने से क्या होता है, बाहर का भटकाव बंद होते  ही मन अंतर्मुखी होने लगता है।

पहले बताया था न, अंतर्मन, मन का ही हिस्सा है।, जो विराट से जुड़ा होता है, विराट अत्यंत शक्तिशाली है, वहॉं संबंध जुड़ते ही सब प्रकट हो जाता है, वही ज्ञान है।
तब वास्तविक यात्रा शुरू हो जाती हैं,े यही अध्यात्म है। अध्यात्म कोई ओढ़ने की चादर नहीं हैं, जब ये स्मृतियां खुलती है, एक साथ प्रवाह सा खुल जाता है, साधक बेचेन हो जाता है। यहीं तितिक्षा है, वेग को सहन करो, तभी वास्तविक प्रगति होती है।“

”अनंत यात्रा’ एक उपन्यास ही नहीं  है।
पता लगाओ, नीलकंठ कौन है?, उसकी यात्रा, साधक की यात्रा है, इन्हीं सारे सवालों का जवाब एक साथ यहां दिया हैं,
मैंने कुछ भी नहीं छिपाया है,
यह जो सत्य है, उसकी ही खोज, नीलकंठ की है,, तो शिखिघ्वज की भी है। मुझे किसको बताना था, यह भी साफ ही था
अंत प्रेरणा उठी, और मैंने लिख कर तुम्हे भेज दिया। जो भी कागज मिला उस पर लिखकर तुम्हे भेज देता। एक साथ तो लिखा  नहीं, पहले वाला भी मेरे पास नहीं था। तुमने जोड़कर किताब बना दी। अच्छा हुआ पर देखना, उसमें जो प्रवाह है, ... एक साथ बैठकर,, ... एक जगह बैठकर मैंने नहीं लिखा, ... सब स्वाभाविक है।“

”इसीलिए मेरे पास भीड़ नहीं थी। ... जो भाषा बनाता। मुझे किसे समझाना था, ... सामने कोई था नहीं। तुम्हारे आने के बाद तुमने सवाल पूछने शुरु किए। उसके पहले साठ साल तक कोई इस संबंध में पूछने नहीं आया। नहीं चर्चा की। मैं चुप रहा। गुरुकुल चलता था, ... उसी के संबंध में बात होती थी। कभी कोई कुएं में पानी आजाएगा, शादी होजाएगी, यह बात पूछता। जब गुरुकुल में शुरू-शुरू में आया था, तब गीता पर प्रवचन दिया। मोहन जी भी यहीं गुरुकुल में पढ़ाते थे, ... पर कभी आध्यात्मिक चर्चा उनके साथ नहीं हुई। श्री राम शर्मा भी आए, सत्यमित्रानंद जी भी आए, ... वे धर्म प्रचारक थे। ।  आपसे मिलने के बाद सिलसिला शुरू हुआ। मेरे सामने, मेरा उद्देश्य था, ... मैंने पाया। आज आप देखते हैं, मैं घंटों बैठा रहता हूं, पता भी नहीं रहता, क्या समय हुआ है, आप पानी के लिए पूछते हैं, ... तब दुबारा पूछने पर कनेक्शन जुड़ता है, ... हाथ उठता है, ... प्यास भी तभी अनुभव होती है। फिर बताओ, शब्द और भाषा कहां से आती। जो सत्य है,... वह जब व्यक्त होगा, कम से कम शब्दों में ही होगा। जहां वह भी है, मात्र उसकी वर्णना है, व्याख्या है, वहॉ। घंटों चर्चा करते रहो, कोई फर्क पढ़ने वाला नहीं है।“



”हां, मेरी कोई इच्छा ही नहीं थी।
 आपको बताया था बचपन में कि एक बार वो बड़े लेखक घर आए थे, मैंने उनकी सेवा की, तब उन्होंने कहा था, कुछ मांगों तब मैंने कहा था, कि किसी के सामने हाथ नहीं पसारुॅंे।. वही बात मैंने इंजीनियर साहब को बताई थी। इसीलिए संन्यास लेकर गुरुकुल खोला था। वही एक मात्र संकल्प था।

”मुझे कहां जाना है, ... क्या पता...
शरीर जब छूट जाए, तब गिद्धों के लिए डाल  देना, ... शायद उनके काम आ जाए, प्रकृति में हर वस्तु काम में आनी चाहिए।

‘यह आप क्या कह रहे हैं?’प्रश्न उठ खड़ा हुआ था।

”क्यों, मिट्टी का क्या, ... मिट्टी तो मिट्टी में मिल जाएगी।
फिर क्या बचेगा, ... बूंद के समुद्र में मिलने के बाद पूछने वाला भी नहीं मिलता।
 अंगुली से छाती पर दिखाते हुए यहां कुछ भी शेष नहीं रहा। कुछ भीनहीं। सब क्षय हो गया।“ (मुस्कराते हैं)

”जिनके संस्कार शेष रह जाते हैं, वे लौटते हैं। आना पड़ता है। नहीं भी आओ, जन्म कोई साधारण चीज नहीं है। संस्कार भटकाते हैं। यही क्रम है। सिलसिला है, जो जारी है। आज नहीं कल, विज्ञान  इधर भी हाथ बढ़ाएगा,
कुछ नहीं बस एक सपना होता है।
सपने में हम उठ जाते हैं, छूते हैं, यह मेरे हाथ है, पॉंव है। वहां कोहनी है। यह संस्कार भी एक सपना है।“

”वहां स्वप्न  है, बस एक गहरी नींद है। इंद्रिया है, नहीं, ... जो कह सके, ... व्यक्त कर सकें... स्वप्न हमेशा सच लगते हैं, टूटने के बाद पता लगता है, यह तो सपना था। वहां मात्र एक स्वप्न रहता है। उतना यथार्थ। स्वप्न में दुख कितना गहरा लगता है। राजा जनक को स्वप्न आया था, वे स्वप्न में भिखारी है, दाने -दाने के लिए मोहताज हैं।, उन्होंने जगते ही सवाल पूछा था,... यह सत्य है या वह सत्य हैै। तब अष्टावक्रजी ने उत्तर दिया, ... राजन दोनों ही सत्य हैं।

इस स्वप्न में भी दुख  होता है, सुख होता है, उतना ही यथार्थ लगता है, पर व्यक्त करने के लिए देह नहीं होती।
इस चर्चा में पड़ना बेकार है, सच यह है कि मनुष्य देह बहुत ही बहुमूल्य है। यह हमें हमारे संस्कार को शुद्ध करने के लिए मिलती है। यह जो संग्रह है जो स्मृतियां है, उन्हें खाली करना है,  इसके लिए मिलता है।। इसको ठीक से समझा नहीं जाता है। संग्रह कम हो, यही साधना है। संग्रह जो है, विचारों को पैदा करता है, विचार ही विकार है। विचार कम होंगे, संग्रह कम होता जाता है।

जो पुराना है वह खत्म हो ,नया संग्रह नहीं बने, यही वर्त्तमान में रहने की कला है।“

”सभी धर्म आत्मा की चर्चा करते हैं। आत्मज्ञान, आत्मानुभव, ... यह क्या है?
शरीर तो दिखाई पड़ता है, स्थूल है।
मन को देखा है क्या?
शास्त्र कहते हैं, मन विकारी है, सतोगुणी है, रजोगुणी है, तमोगुणी है, ... मन को तो किसी ने देखा नहीं है।
उसके क्रियाकलापों को हम जानते हैं, उसको देखकर ही हम मन की व्याख्या करते हैं।
मन एक गति है।
मात्र गति जो कल्पना करती है, स्मृति रखती है,
और प्राण भी गति है,
शरीर में आते ही गति दो रूपों में बंट जाती है। मन चक्राकार गतिे हैं, प्राण सीधी गति हैं, यह नाभि से मस्तिष्क तक है, ऊर्ध्वाकार। योग, वास्तविक अर्थ में दोनों दोनों गतियों का एक हो जाना है। शक्ति, प्राण में है, वही सृजन का कार्य करती है, उसी से पोषण होता है। विकास उसी से होता है। श्वास प्राण नहीं है।

सूक्ष्म शरीर में, यह गति संस्कार सहित रहती है, संस्कार का धरती पर नया जन्म लेना, और देह का छोड़कर जाना सब उसी पर निर्भर करता है।
तो जब हम मन को ही नहीं जानते, तब आत्मा पर चर्चा कैसे कर सकते हैं। गीता में बहुत समझाया है, ... पर वह जो मन से परे है, वहां मात्र अनुभव तो होगा, वर्णन नहीं।“

”अनंतयात्रा’ में वर्णना है, ... विराट का उल्लेख हुआ है। विराट का अनुभव होता है। गीता में भी आया है। वह मात्र अनुभव है। स्थिरता और गति का जो विरोधाभास है, वह मात्र शाब्दिक रह जाता है। वह है सदा है, जो इन्द्रियों से परे है, मन से पीछे,  वहां मात्र कल्पना से चित्रित किया जा सकता है। पदार्थ का सूक्ष्मतम कण जो होता है, वहां भी वैज्ञानिक रहते हैं, वह कण भी है, तरंग ही।

मैंने पहले भी कहा था, तरंगों के बारे में, ... लहरें टकराती हैं।, , वे विकार साथ लाती है, नाभि से टकराते ही, जहां संस्कार रहता है, मन मस्तिष्क से उसे जोड़ देता है। हमें इन लहरों के वेग को बर्दाश्त करना है। जैसे टी.वी. पर लहरंे टकराकर चित्र व भाषा दोनों देती हैं ,वही हमारी दशा है, हम भी वैसे ही प्रभावित होते हैं।

”तो फिर जब जहां शरीर का प्रयोजन नहीं रहा है। ध्यान और मन वहॉं कुछ नहीं रहता। अनुभव भी मानसिक होते हैं।वहॉं मन होता तो है। पर निष्क्रिय।जब जरुरत हुई वह आता है ,बात गई वह वापिस अपनी जगह पर चला जाता है।एक अवेयरनेस रहती है। जब बाहर आना हुआ कांशियसनेस हो जाती है। सब ऑटोमेटिक होता रहता है। यहॉं प्रयास कुछ भी नहीं होता। जब कोई सामने आता है ,वह कुछ बोलता है,फिर वह  दुबारा कुछ कहता है ,तब सम्बन्ध अपने आप जुड़ जाता है।तब ऑंखें उसे पहचान लेती हैं ,कान सुन लेते हैं। कुछ कहना है तो अंदर से प्रेरणा होती है। नहीं तो सीरियल की तरह चित्र आते रहते हैं जाते रहते हैं।“


Friday, October 4, 2013

अमृत पथ 10

अमृत पथ 10

आज इस आलेख में हम साधना की चर्चा कर रहे हैं।

साधना

प्रश्न था साधक किस प्रक्रिया का पालन करे?
स्वामीजी कह रहे थे-
‘किसी का भी मन नहीं दुखाना चाहिए, रास्ते सभी अच्छे हैैं, फिर सबकी परिस्थ्ािित, और योग्यता अलग-अलग है, दो पत्तियाँ भी प्रकृति  में एक सी नहीं होतीं, फिर एक जैसी व्यवस्था सबके लिए कैसे ला सकते हो? यही बड़ी गलती हो गई है। हम अपने शास्त्रों को सही दूसरे को गलत बताते हैं, उनकी मान्यताओं के परिवर्तन की कामना करते हैं।

यहां इसलिए मैंने कोई पद्दति नहीं बताई, कहा जो तुम करते हो करते रहो, तुम्हे छोड़ने की जरूरत नहीं है। तुम्हारी लगन सच्ची होनी चाहिए।
इसलिए बहिर्मुखी सत्संग नहीं हो सकता है। हाँ मनोरंजन व सद् चर्चा इसमें अवश्य होती है। क्योंकि सबकी मान्यताएं, रुचियॉं अलग - अलग हैैं, हम व्यक्ति विशेष की सहायता कर सकते हैं। उसका मार्गदर्शन हो सकता है। पर सबको एक लाठी से नहीं हॉका जा सकता, ... यह उनको देखना है।, ... हमें नहीं, ... यहां प्रकृति में सबको खुली छूट है, एक वक्त ऐसा आता है, रास्ता बंद जाता है, तब वापिस लौटना होता है। इससे निराशा आ जाती है।

कर्मकांड भी साधना है, सीढ़ी है, पर कब तक उस पर ठहरे रहोगे, आगे जाना भी होगा। कर्मकांड का अर्थ होता है क्रिया तो होरही है पर उसमें मन नहीं है।जब क्रिया और मन एक होजाता है वहॉं  उपासना बन जाती है।हमेशा वहां खड़े नहीं रह सकते, वह भी छूट जाएगा।... भक्ति की एक सीढ़ी है, जब वह छूटती है तब निःसंकल्पता में प्रवेश होता है। ... वहां ज्ञान है। ज्ञान है, संसार हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकता है। जो महान शक्ति है उसके प्रति जो जिज्ञासा शुरू में होती है, वह बाद में धीरे-धीरे रुचि में, फिर स्वभाव में बदल जाती है। रह जाती है, मात्र सजगता... रहना तो फिर भी पड़ेगा, कोई चमत्कार होने वाला  नहीं है। बस इस रहने में और उस रहने में भेेद यह हो जाता है,ै, यहाँ सभी कार्य तो वही  होंगे, पर शांति होगी, प्रेम होगा।

इसीलिए किसी की भी मान्यता पर अविश्वास मत करो, ...
प्रारंभ में मंदिर, और मूर्तिपूजा ही साधक को मिलती है। यह  वह जगह होती है, जहां जाकर उसकी भावना दृढ़ हो जाती है। उसे अपनी मलिनता का बोध हो जाता है।
वह वहां क्यों जाता है, इसका उसे पता नहीं रहता, उसे अच्छा लगता है, वह चाहता है। मंदिर कोई पत्थर, ईंटों का भवन नहीं होता। घोंसला तो चिड़िया भी बनाती है, पर यहां उसके भीतर संस्कार है जो जोर मार रहे हैं; वह भगवान को कहीं देखना चाहता है। लोग घरों पर इसी लिए मंदिर बनाते हैं, पूजा करते हैं।

पहले इन सबकी जरूरत होती है, कोई लक्ष्य है, तो  उसे इसे हटाना नहीं चाहिए। बाद में जो छूटना है, वह अपने आप छूट जाता है।

पहले बाह्य पूजा होती है, अभिषेक होता है, षेाड़षोेपचार होता है, विधि विधान से होती है। बाद में धीरे -धीरे मानसिक पूजा रह जाती है।फिर एक दिन आता है, वह भी छूट जाती है। मंत्र भी पहले स्थूल जपा जाता है, फिर धीरे-धीरे मानसिक जप रह जाता है। यह सब एक प्रक्रिया है, ... जो हर परंपरा में मिलती है।

हजारों साल से इस प्रकार से मनुष्य यह रास्ता खोजता आया है। मैंने कभी भी, कहीं भी, किसी की अवहेलना करने को नहीं कहा। चर्च का भी विधान है, मस्जिद का भी है, ... सब जगह अपनी- अपनी परंपरा है, उसमें जब साधक जाता है तो उसका मन कुछ देरके लिए शांति पाता है, सार यही है। वह कुछ देर स्मृति के दबाब से हट जाता है। घर में महिलाएॅं, तुलसी केे आगे दिया जलाकर, उस महाशक्ति का सहारा पा लेतीं थीं।यह सब भावना और लगन पर टिका हुआ है।
मंदिर यहां के लोगों के लिए इसी तरह की जगह थी।, जहां वे गए अपनी व्यथा सुना आए, ... पुराने लोगों ने बहुत काम किया है, तरह- तरह के उपाय बताए। दक्षिण में कितने बड़े  विष्णु के मंदिर हैं,ं, विष्णु जितने बड़े हैं, उनके मंदिर उतने ही बड़े हैं। मस्जिद, पूरी खुली होती है। मंदिर ढका होता है।यह सब अपना- अपना सोच था। आज के मंदिरों में वह बात नहीं रही। सब पैसे कमाने का तरीका बन गया। मंदिर वह हैै, जहां जाते ही लगे, यह जगह शांत है, यहां  जो विचार उठता है,  उस सवाल का उत्तर आता है। क्यों? वहां साधकों का मन शांत हुआ है। पुराने मंदिर जागृत है, वे चैतन्य है आनंद है। मंदिर कोई भवन नहीं होता, मूर्ति तो जयपुर मंे बनती है। फिर होता क्या है, ... तुम्हारी भावना, तुम्हारी शक्ति उसे चैतन्य कर देती है। हरिद्वार  गए थे, वहां क्या देखा, इतने मंदिर हैं, ... वहां पूजा भी अब मशीन से होने लगी है, सब यांत्रिक। .
साधक के लिए आवश्यक है, उसकी मान्यता दृढ़ हो। और उसकी  लगन हो,। हमें कभी भी किसी की मान्यता पर दबाब नहीं डालना चाहिए, इसीलिए ,मान्यताओं के परिवर्तन के लिए कभी मैंने नहीं कहा।

Wednesday, October 2, 2013

- यात्रा 8

अमृत पथ
- यात्रा 8
अमृत पथ की अगली कड़ी यहॉ, दी जारही है। सत्संग तथा ध्यान शिविर को लेकर अनेक प्रश्न उठते रहते हैं, यहॉं उनकी अर्थवत्ता पर विचार किया गया है।


स्वामीजी से बार-बार सत्संग शिविर आयोजित करने के लिए कहा जाता था,इसी संदर्भ में उन्होंने एकबार कहा थाः-

मैंने कोई सत्संग शिविर नहीं चलाया, ... लोग आते थे, मुझे समझातेे थे, ... आप मुझसे जुड़े है, मेरे विचारों से जुड़े है, .. आपके मन को इससे लाभ होता है, .. आप आते हैं, आपका आना स्वाभाविक है।

मैं तो कुछ नहीं करता, ... जो होता है, स्वाभाविक होता है, ... और जो होता है, वह आपको ही पता है, ... हाँ यहां में शांत हूं, कोई उत्तेतना नहीं है, कुछ करना नहीं है, ... उस शांति में आप आते हैं, ... आपको शांति मिलती है, .. बस। पर प्रवचन देकर, ... एक निर्धारित क्रम बनाकर रखना, कहना ज्यादती है। इससे मैंने तो कोई लाभ होता देखा नहीं, अहंकार ही बढ़ता है।
सन्यास भले ही हिमालय पर लिया, ... पर मेरा वहां मन नहीं लगा, ... प्रकृति यहां ले आई, यहां आकर, कार्य किया, तब तो यह इलाका बहुत पिछड़ा था, एक बस चलती थी, पैदल ही आता-जाता था, ... सत्य हिमालय पर ही नहीं मिलता, वह तो हर जगह प्राप्त हो सकता है।

हम क्या चाहते हैं, हम ही निश्चित नहीं है।
 जो सबका कारण है, जोे शरीर, मन, बुद्धि, सबसे परे है, ... उसे क्या हम एक स्थान, एक व्यक्ति, एक वातावरण का सहारा लेकर पा सकते हैं?

 जो स्वयं नाशवान है,... आप उसका लेते हैं। व्यक्ति से जुड़ते हैं, या विवेक से। आपके पास भी विवेक है, पर उसका आदर न होने से वह सुप्त है,... गुरु देह नहीं, साक्षात विवेक होते हैं?... जहा देह पूजा है, वहां विवेक अनुपस्थित है। अनंत यात्रा में कुंभका कथन है- नीलकंठ से-‘अब तुम्हारा विवेक जागृत हुआ है, हो सकता है, इसके बाद मेरा शरीर भी नहीं रहे’, गुरु का कार्य शिष्य का विवेक जगाना है, पर आज तो अपहरण ही होना रह गया है।

वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति, सभी परिवर्तनशील है, इनका आश्रय मत लो, तुमने चाहा था, ... तुम्हे कब आत्म ज्ञान होगा, ... जब तुम्हारा कर्तव्य कर्म पूरा होगा और तुम्हे अपने होने का अहसास जगेगा, ... विवेक ही सत्-असत् का भेद करता है, ... बस तुम्हे उसका आदर करना है, ... विवेक विरोधी कार्यों को छोड़ते जाना है, ... सामर्थ्य से परे के कार्यों को भले ही वह सही हों, तुम करना चाहते हो, पर तुम्हारी पहुँच से बाहर के हो, उन्हें छोड़ दो। जो कर सकते हो, उन्हें तुरंत करो, ‘क्षिप्रं भवति धर्मात्मां’,...

स्वतः कार्य की पूर्णता पर शांति उपलब्ध होने लगेगी।
विचार करो-
गुरु, आश्रम, चातुर्मास, सत्संग, शिविर, साधना, क्या ये सब मनोरंजन के साधन होकर नहीं रह गए। लोग कहते हैं, सिनेमा देखने जाएं उससे तो अच्छा है, सत्संग में जाकर प्रवचन सुन आएं।
महत्वपूर्ण बात है, आप चाहते क्या हैं?

अगर आपके जीवन का उद्देश्य मात्र मनोरंजन करना है, तो ठीक है, यहां लोग आते हैं, गृहस्थी की परेशानियों से दुखी हैं, सलाह मांगने आते हैं। आप गृहस्थ हैं, समस्या आपकी है, ... आप सुलझाते क्यों नहीं, क्यों उसे दीर्घकाल तक बनाए रखते हैं, जो दिखता है वह नहीं देखते, जो देखना चाहते हैं, वैसा देखते हैं, मुझसे तो मात्र सहमति लेने आते हो। मैं भी तो शरीर हूं, मैं तो कहीं नहीं गया, ... फिर आप में इतने आत्मविश्वास की क्यों कमी है? कि आप जरा सी परेशानी हुई, यहां भाग आते हैं? मन जब शांत होकर,... जो भी कार्य उपस्थित है, उसमें उत्तेजना रहित लग जाता है, ... तब स्वतः आत्मविश्वास की प्राप्ति होती है।
लेकिन आप, ... जिस पर विश्वास रख सकते हैं, ... कहते हैं, आप का ईश्वर पर दृढ़ विश्वास है, ... उसके द्वारा सौंपे गए कार्य पर पूरा मन नहीं लगाते, जो अप्राप्त है, उसके चिंतन में डूबे रहते हैं, वह कब मिलेगा, पूछने आते हैं, मैं कहता हूं, विचार करो, समझाता हूं, जो प्राप्त हुआ है, उस काम को तो पूरा करो, ... वहां तो मन नहीं लगता, दूसरे का काम, ... उसका चिंतन लगातार बना रहता है।
हमारा दूसरे पर, जो भी हो, जो नित्य नहीं है... परिवर्तनशील है उस पर विश्वास करना क्या उचित है?
दूसरे के साथ आपका संबंध आत्मीयता का हो, ‘आत्मवत सर्व भूतेष’ू, की भावना सदा बनी रहे, ... पर दूसरा सुख देगा,... दुख देगा, मानना व सोचना व्यर्थ है।
हाँ, जो जीवन मिला है, वह महत्वपूर्ण है।
मैंने कहा था- जीवन जीना भी एक कला है, यह सीखी जा सकती है।
जीवन एक पथिक की तरह जीयो। घूमा, फिरा चल दिए, न बांधा, न बंधे,। लोग आते हैं, बताते हैं वे आजकल आध्यात्मिक जीवन जी रहे हैं, सुबह से शाम तक नियमित क्रम में मंदिर जाते हैं, ग्रन्थ पढ़ते हैं, टी.वी. पर धार्मिक चैनल देखते हैं, वे आध्यात्मिक जीवन जी रहे हैं।

कहते हैं, जो कार्य कर रहे हैं, व्यवसाय या नौकरी कर रहे हैं, ...रुपया कमाने की सोच रहे हैं, वे भौतिकवादी  हैं।  परन्तु वे इस प्रकार के जीवन को छोड़ आए हैं।

जब तक देह है, संसार तो रहेगा ही।
संसार सेे ही देह की सभी आवश्यकताएं पूरी होती है, भौतिकवादी का मतलब है, जो  कामना पूर्ति के लिए ही  प्रयास करता है, ... फिर कामना का अंत होता नहीं, ... अनावश्यक और आवश्यक का अंतर धीरेे-धीरेे मिटता जाता है, वहां बस कामना पूर्ति ही साध्य रह जाती है, उसे भौतिकवादी कहते हैं। पर जो विवेक की रोशनी में कामना निवृति के मार्ग पर चलता है, वह आध्यात्मिक है, उसका सवाल, ... अपने भीतर की कामनाओं का धीरे-धीरे छोड़ने का होता है।
सन्यासी का मुंडित होना, भगवा पहनना, साधुओं का दिगम्बर हो जाना ये बस प्रतीक हैं। जितने शीष पर केश हैं, उतनी ही कामनाएँ हैं, ... पर आज गृहस्थों की अपेक्षा सन्यासियों की चाहत ज्यादा बढ़ती जा रही है। क्या वे आघ्यात्मिक हैं?
भई! कहीं मत जाओ, जहां भी बाह्य का सहारा लोगे, जब तक वह शक्ति रहेगी फिरकनी घूमती रहेगी। बल हटा फिरनी रुक गई, यही सिद्धांत है। बाह्य से मात्र उद्वीपन होता है, जो घटेगा भीतर ही घटेगा, ... बाहर उसकी गूंज हो, नहीं भी हो, क्या फर्क पड़ता है।
आप जैसे भी है, जहां भी है, अपनी राह पर चलते रहो।
कहाँ जाना है, प्रकृति ने तय कर रखा है,
भूत था जो वह घट गया, उसका परिणाम आज है, वर्तमान है, उससे ही कल का रास्ता जाएगा।
‘कर्त्तुम, अकर्त्तुम’, अन्यथा कर्त्तुम, कुछ भी घट सकता है, तुम्हें मात्र वर्तमान में रहना है। हर स्थान, हर समय, हर घडी उस महान प्रकृति ने दी है। न वहां शुभ है, न अशुभ।
शुभ और अशुभ की परिकल्पना यह जो पाखंड चल पड़ा है, इसने कितना नुकसान पहुंचाया है, यह सब बाद में पैदा हुआ हैं। मैंने पहले भी कहा है, मन फिरकनी की तरह है, बाह्य का बल लगाओ तेजी से घूमती जाती है, बल के हटते ही रुक जाती है। ऐसा मन धीरे-धीरे रुग्ण होता जाता हैं उसी में निराशाआती हैं एक बार बाहर का सहारा लिया, उसकी आदत होती जाती हैं यही दासता है, वहां स्वतंत्रता नहीं मिलती। इससे बचो, मन को स्वतः उत्साहित रखना सीखो। याद रखना उत्साह उसी को मिलता है, जो उत्साहित रहता है। जो प्रसन्न है, वहीं प्रसन्नता रहती है। उत्साह कोई बाजार में मिलने वाली वस्तु नहीं है। यह तुम्हारा कर्म के प्रति निष्ठा है, लगन है। यह स्वतः होनी चाहिए।

तुम्हारा कार्य है, जहां भी हो, वहीं रहो, तुम्हे कहीं भागने की जरूरत नहीं है, दूसरा कोई तुम्हे न तो आनंदित कर सकता है, न ही उत्साहित। साधारण सा सूत्र है, जो कभी हार स्वीकार नहीं करता, वही विजयी होता है। तुम्हें तो मात्र निरंतर कर्तव्य पथ पर कर्मरत रहना है, जो तुमने जाना है, वही विवेक का मार्गदर्शन है। उसका आदर करो उसे आचरण में लाओ, व्यवहार में आते ही, पूर्व में गलत कर्मों का बोझ भी कम होने लगता है, जैसे आग में पुराना काट.-कबाड़, सब जल जाता है, उसी प्रकार विवेक की अग्नि असत् के प्रभाव को उसके दोषों के प्रभाव को भी जलाकर राख करने में समर्थ है। यही साधना है, यही सत्संग है, जो शांति और शक्ति देनों में समर्थ है।

9 अनुभव

9 अनुभव


स्वामीजी साधना में प्राप्त अनुभवों की चर्चा कर रहे थे, ओंकारेश्वर घटना का वृत्तांत ”अनाम यात्री नामक कृति में भी है।

”यह ओंकारेश्वर की घटना है।
मैंने आपको कहा था न, तब भंडारी मिल में काम कर रहा था। वहीं ‘पाल ब्रन्टन की पुस्तक, ‘रमण महर्षि के बारे में पढी़ थी, जिसके बारे में पहले बताया था, ... मैंने पुस्तक पढ़कर जब रखी तक स्वप्न में वही का सारा दृश्य देख लिया था,-जब वहां गया तब रमण महर्षि वहांथे,-परउनकी अवस्था के यही अंतिम दिन थे।
बहुत कम बोलते थ.े खाना भी उनके हाथ में रखकर जब कहा जाता था तब वे इन्द्रियगत संबध्ंा जोड़ पाते थे, ... पहाडी की जब परिक्रमा की तब पाया,स्थान जैसे मैंने स्वप्नमें देखे थे, ... वैसे ही थे।मैंने इस परज्यादा विचार नहीं किया। हाँ, ओंकारेश्वर में तब पैदल चलना पड़ता था। मैं नदी के इस पार से उस पार जा रहा था, ... रास्ता बहुत संकड़ा, व पहाड़ी था। पत्थर भी उबड़-खाबड़ रखे थे, ... उतरना ही उतरना आगे उतरा व चढ़ना पड़ता था, ... रात का वक्त था। तभी अचानक प्रकाश का एक गोल घेरा दिखाई दिया, .. जो मेरे आगे आगे चल रहा थ, ... पहले तो मैं मुड़ नहीं पाया।  यह तो होता था, जब सोता था प्रकाशकी एक बीम सी आती थी, ... वह जो आज्ञा चक्र है, जहां बिंदी लगती है; वहां पर आकर ठहर जाती थी, ... और मैं गहरी नींद में सोे जाता था। पर वह प्रकाश भीतर से आकर इस प्रकार मार्गदर्शन करेगा, ... यह मुझे वहीं अनुभव हुआ।

भीतर का प्रकाश, ... बाहर अंधेरे को पता नहीं लगने देता। मेरी आँख की रोशनी बहुत कम हो चुकी है। एक आंख ग्लूकोकोमिया के बंबई आपरेशन से   चली गई हैं; पर दूसरी आँख में भी बहुत कम दिखाई देता है। पर अखबार पढ़ लेता हूं, मेरासारा काम यथावत हो जाता है।

‘तभी आप टार्च नहीं रखते...’
‘(हंसते हुए) हाँ, जरूरत नहीं पड़ती। रात को तीन बजे जगना पड़ता है। हाथ से टटोलता चला जाता हूं। बत्ती कहॉं है, स्विच कहां है,अंदाजा लग जाता है...’
या रोशनी... होती है,
‘कुछ भी मान लो,...’,उस दिन पिरामिडों की बात चल रही थी.......
स्वामी जी बोले-जिसे पिरामिड कहते हैं, अभी समझने में समय लगेगा। वहां अंधेरा था, दीया बत्ती का सबूत नहीं है। मशालों का सबूत नही ंमिला है।, ... अंदर कौनसा प्रकाश था, ...अभी इस पर खोज होनी है।।

तीर्थ जो आज है, वे धंधा बन गए हैं।
प्रश्न-आप तो चारों घाम गए, ...हिमालय भी...
 उत्तर- ‘हाँ, अमरनाथ पैदल गया था, ... उसके उसके बाद जब लौटे तब पॉव सुन्न हो गए थे, वो बता रहा था,...’
‘तीर्थ यात्रा, भावना से जुड़ी है। गंगाजल पवि़त्र करता है?  उसे ही जोे यह मानता है,
हमारा आज न तो विश्वास रहा, न निष्ठा, न श्रद्धा, ... लगन भी नहीं है, इसीलिए हम जाते हैं, जगह को छूकर  आ जाते हैं।
.हमारी मानसिक उर्जा को वहीं जाकर सहारा मिला है, ... जो दृढ विश्वास रखता है। वही अपनी बुराई में मुक्त भी हो जाता है, उसका संकल्प इतना घना हो जाता है, वह उसे मार्गदर्शन देने लग जाता है।
शक्ति तो हमारी जागृत होती है, जो पिंड में है, वही ब्रह्यांड में है।

पर विश्वास नहीं है।
एक तीर्थ, पत्थर- मिट्टी,गाारे से बना है, , वहॉं मूर्तियॉं  हैं।दूसरा तीर्थभाव लोकमें  में बसता है, हमारी मान्यता में बसता है,और जो जिस रूप में देखता है, वह उस रूप में पाता भी है, यही सार है।एक का तीर्थ  बस एक बस्ती है, एक शहर है, दूसरे का तीर्थ चिन्मय होता है। जैसे विदेशी भी यहां आकर तीर्थ में रहते हैं, उसे समझो, वही उनका जीवन  हो जाता है।परिवर्तन भीतर ही होता है,... जहां पहुंचकर हमारेे विचार शांत हो गए... शांति अनुभव हो, ... वहां हमें मार्गदर्शन भी मिलेगा, यह सच है।

Monday, September 30, 2013

अवलोकन


अवलोकन



प्रश्नः- स्वामीजी यह अवलोकन की जो विधि बताई जाती है ,वह क्या है?


स्वामीजी विभिन्न मतों की चर्चा करते हुए कह रहे थे :-
”इतने सारे मत है, पंथ है, रोज़ नए-नए बनते हैं, पुराने हटते चले जाते हैं क्यों? प्रकृति का यही रहस्य है, उसे हमेशा कुछ ना कुछ नया चाहिए।
वरन! इतने देवी-देवता कहाँ से आते, उनकी पूजा, उनकी आराधना,... इतने ग्रन्थ कहां से आते,... सिलसिला चल रहा है।
रूचि, योग्यता, सामर्थ्य इस संार में प्रत्येक प्राणी का अलग-अलग है। सब एक जैसे हों, यह हो नहीं सकता। साधन और साधना भेद का यही कारण है। नहीं तो सबका एक ही रंग होता, एक ही भाषा होती।
सब अपने-अपने रास्ते पर चलंे, अपने ही अनुसार चलंे, यही सही बात है। मैंने कभी किसी को मार्ग बदलने का नहीं कहा, हॉं, वह अपने रास्ते पर सही कैसे चल सकता है, उसे कोई दुविधा आ रही हो, आकर पूछे तो बताओ, पर किसी का रास्ता खराब है, उसमें कमी है, यह कहना गलत है।
जिसे कंन्वर्जन कहते हैं, धर्म परिवर्तन, यह हमारे यहां का शब्द नहीं है। यह बाहर से आया है। उन्होंने कहा तुम्हारा रास्ता गलत है, हमारा ठीक है, सारा झगड़ा यहीं से शुरू हुआ है। हमने तो उनको भी गलत नहीं कहा। सब बात तो एक ही करते है एक महान सत्ता है, वही नियंत्रक है, उसे पाना है, उसे जानना है, उसकी कृपा चाहो, फिर भेद कहां है? बस अहंकार ही बाधा देता है। उसके कारण से हम अपने आपको श्रेष्ठ तथा दूसरे को खराब कहते हैं।
साधन भेद तो समय व स्थान भेद से ही बदल जाता है। मनुष्य कोई जड़ तो है नहीं, जब पृथ्वी घूम रही है, गृह-नक्षत्र घूम रहे हैं, वहां निरंतर गति ही सार है। वहां एक मुकाम पर पड़े होकर बैठ जाना क्या सही है? यहां सब कुछ परिवर्तनशील है, जब सब-कुछ बदल रहा है तब एक निश्चित रूप व आधार या तरीके पर कैसे टिका रहा जा सकता है।
हाँ, प्राणिमात्र को ध्यान से देखो।
कुछ बातें उनकी एक ही है, उनकी मूलभूल आवश्यकताएं एक ही हैं। मनुष्यों को, उनकी विचारधारा को, उनकी साधना पद्दति को देखो सबका ध्यान एक ही जगह पर रहता है, हमारे जीवन से व्यर्थ का चिंतन हट जावे। वही हटाए नहीं हटता।
मजेदार बात यह है कि न तो हम बलपर्वूक सार्थक चिन्तन कर सकते हैं। नहीं व्यर्थ का चिन्तन हटा सकते हैं।
लगता है, हम तो मात्र तिनके हैं, हवा आई और हम उड़ गए। आप पता करो, यह बात कितनी सही है।
यहां लोग आते हैं, क्यांें आए उन्हें ही पता नहीं रहता। बातें चलती रहती हैं, उसमें बह जाते हैं।
मैं पूछता हूं, कैसे आए?
कहता है, वह बात तो रह ही गयी, अब में आऊंगा तो बात करूंगा। यही तो होता आया है।
जो करना होता है, वह तो होता नहीं है।
जो नहीं करना होता है, वही होता जाता है।
मैंने पहले कहा था-
जो करना होता है, उसे एक बार सोचो, अच्छी तरह सोचो फिर जो तय किया है, करो, सोचो मत। बार-बार सोचने से कार्य करने की शक्ति चली जाती है। अंत में वह कार्य भी छूट जाता है।
इस आदत को कम करना है।
इतने सारे पूजा-विधान इसलिए बनाए गए कि मन एकाग्र हो जाए। जितनी रुचि होती है, उतने ही विधान बनते गए पर मुख्य बात सब भूलते गए।
हम जहां भी हों, जो भी कार्य हो, मन को अधिक से अधिक वहीं रखा जाए। परमात्मा की इस सृष्टि का आदर यही है कि हर स्थान श्रेष्ट है। हर कार्य श्रेष्ट है। कोई छोटा नहीं। कोई बड़ा नहीं। हमारा अस्तित्व ही महत्वपूर्ण है।
हम जो भी हैं, जिस जाति कुल में पैदा हुए हैं, प्राकृतिक विधान से जो भी योग्यता हमें मिली है, वही हमारी साधन सामग्री है। वही हमारे विकास में सहायक है।
हमें अपने ही स्वधर्म का पालन करना चाहिए।
रास्ते अनेक हैं, पर पहुंचते एक ही जगह हैं।
व्यर्थ का चिंतन हमारे जीवन से हट जाए।
इसके लिए करना यही है-
जो भी प्राप्त परिस्थिति है, उसका स्वागत करो, उसे प्रिय मानो, उससे प्रेम करो, उससे भागो मत। हमारे यहां उपनिषद काल में यह भागना नहीं था। बाद में आया। समाज से भागकर कहां जाओगे? संसार कहॉं नहीं है?
आपने पूछा था- मैंने सन्यास क्यों लिया।
बचपन से ही मेरी रूचि, इस सत्य को जानने की। बाहर मेरी कोई रूचि नहीं थी। परिवार की परिस्थितियां भी ऐसी ही बनती गईं। हां, मां की मृत्यु के बाद फिर मेरे पास कोई पारिवारिक कार्य नहीं बचा था, मैं स्वेच्छा से सन्यास लेने गया पर वहां भी कहा था- याचक नहीं बनूंगा। सन्यास के बाद निरंतर कार्य करता रहा। सन्यासी की परंपरा तथा उसका निर्वाह छूटता चला गया। गरीब से गरीब के घर भी गया। सादा रोटी खाकर भी जीवन जिया। गृहस्थों के यहां ठहरता  रहा। उनके परिवार का हिस्सा बनकर, मार्गदर्शन किया ।
परंपरा में जाकर इसकी व्यर्थता को देखा। इसीलिए आपसे कहता हूं कि आपको कहीं जाने की जरूरत नहीं है। जो भी जैसा आया है, सामना करो। वर्तमान में रहो। कल जो होना है, प्रकृति का कार्य निर्धारित है, वह होना है। आज में आपको रहना है। यही सार है।
यह न होता तो क्या होता, हमें बचपन में सुविधाऐं नहीं मिली, यह कमी रही, वह कमी रही, यह सोच ही व्यर्थ है। जो जैसा प्राप्त हुआ है विधान के अंतर्गत ही है। हमें उसका आदर करना चाहिए। जब हम प्राप्त परिस्थिति को आदरपूर्वक सवीकार कर लेते हैं, तो व्यर्थ के चिंतन से बच जाते हैं।
आप भगना क्यों चाहते हैं, पलायन क्यों चाहते हैं, क्यों नहीं प्राप्त परिस्थिति का आदर कर पाते हैं, सोचें।
हमेशा नयी परिस्थिति से भय रहता है, पुरानी जगह पर प्राप्त सुख-सुविधाऐं पकड़ लेती हैं। यही सुख का प्रलोभन है। नई जगह जाने में संकोच का यही कारण है। सुविधा कम हो जाएगी। मान-सम्मान कम हो जाएगा। पैसा कम आएगा, बहुत सारी बातें है।
अगर एक बार यह सोचो, जो कुछ प्राप्त हुआ है, वह ऐसा ही होना था इसलिए हुआ है, इससे बेहतर हमारे हित में नहीं था। हमने जो चाहा था। जिन परिस्थितियों में हमारा विकास हो सकता है, जो हमारा प्राप्तव्य था, वही हमें प्राप्त हुआ है, तो आपकी दुनिया बदल जाएगी। अभाव पाकर, व्यथित होना रुक जावेगा। जो भी परिस्थिति मिली है, उसमें प्रसन्नता आ जावेगी। कहते सभी हैं, ईश्वर हैं, पर उस पर विश्वास किसी को नहीं है।
उसे भी अपनी इच्छानुसार चलाना चाहते है।
साधन में सफलता मिले, इसके लिए आवश्यक है कि जो भी प्राप्त हुआ है वह पूरी तरह स्वीकार हो। साथ ही उसके प्रति प्रियता भी रहे। वह कार्य बोझा नहीं लगे। उसमें उदासीनता नहीं आवे।
क्योंकि जो परिस्थिति आपको प्राप्त है, उसमें प्रियता नहीं होगी तो अनावश्यक चिंतन शुरू हो जावेगा। आपसे कहा था- प्रतिकूल परिस्थितियों को अनुकूल मानते हुए प्रेम से भोगो, जल्दी ही समाप्त हो जावेगी। जो है, सामना करो, आप जितना उसे बोझा मानते रहेंगे, वह समय उतना ही बढ़ता जाऐगा। यह प्रकृति का नियम है। अगर परमात्मा पर विश्वास हो तो सो टका हो, अपने ऊपर विश्वास हो तो सौ टका हो। बात एक ही है। हर परिस्थिति, एक विधान के अंतर्गत आती है, उसका स्वागत करो। मीरा के लिये गया जाता है, विष का प्याला भी उसके लिए अमृत हो गया।
तब व्यर्थ का चिंतन अपने आप कम होने लगता है।
पहले भी कहा है-
जो कर सकते हो, उसे तुरंत कर देना चाहिए। पर होता उसके विपरीत है-
जो कर सकते हो, वह तो होता नहीं है, जो नहीं कर सकते हो, उसके बारे में निरंतर सोचते रहते हो। प्रयास से न तो कोई व्यक्ति व्यर्थ के चिंतन को हटा सकता है, नहीं कोई सार्थक चिंतन कर सकता है, मात्र गहरी समझ ही सहायक है। प्राप्त समझ का आदर ही साधना है।
उस दिन आपने पूछा था-
मन में अशुभ व मलिन विचार आ रहे हैं तो क्या किया जाए?
उन्हें हटाओ मत, प्रवाह को आने दो, देखते रहो। परन्तु उन विचारों में रमण मत करो। न तो उनका समर्थन करो, न बुराई करो। इससे क्या होगा, जैसे जहॉं काले रंग का धब्बा हो, वहॉं पानी डाला जावे, तो काला पानी बाहर आता है। धब्बा धीरे-धीरे अपना रंग खोता है। उसी प्रकार बुराई भी अपने आप समर्थन  के न मिलने से, कम होती चली जाती है। जो विचार बुरे हैं, वे अपने भीतर संग्रहित बुराई के कारण से पैदा हो रहे हैं। उनका समर्थन न करने से बुराई जो जमा है वह कम होने लगती है। उन बुरे विचारों को पूरा करने का मत सोचो। बुराई अपने आप कम होती चली जावेगी। बुरे व अशुभ संकल्प अपने आप कम होने चले जाऐंगे।“

Sunday, September 29, 2013

अन्तर्यात्रा’

अन्तर्यात्रा’



उस दिन स्वामीजी सीरियल का उदाहरण देते हुए कह रहे थेः-

आप जब फिल्म देखते हैं, टी.वी. देखते हैं तो क्या होता है?
आप वास्तविक दुनिया से कट जाते हैं। उस दृश्यों की शृंखला में आप इतने डूब जाते हैं कि वे वास्तविक दुनिया का अहसास देते हैं। आप पात्रों के साथ बह जाते हैं, क्यों?
अर्थचेतन अवस्था सी चित्त की आ पाती है। वहां आधा सत्य, आधी कल्पना से प्रसूत दृश्यांकन आपको बहा ले जाता है। अच्छे उपन्यास की सफलता का भी यही रहस्य है। वह अपनी काल्पनिक दुनिया को जिस सच्चाई के साथ लाता है, हम उस काल्पनिक दुनिया कोे सच मानकर उसमें डूब जाते हैं।
हां, ‘ध्यान’ की प्रारंभिक अवस्था में सफलता का यही रहस्य है। हम जिस ‘सत्य’ का संधान पाने के लिए जिस तस्वीर का प्रयोग करते हैं, वह हमें ‘जीवन सत्य’ से हटाकर एक आकर्षक ‘इन्द्रजाल’ में ले आती है। ‘सत्संग’ समारोह की सफलता का भी यही रहस्य है।
यह दृश्यीकरण एक तकनीक  है। मानसिक पूजा में इसी का सहारा लिया जाता है।
पर हम गहराई से विचार करें, तो पाते हैं कि वहां से आने के बाद चित्त की दशा में कोई परिवर्तन नहीं होता है। यह एक मनोहारी नशे की अवस्था हो जाती है।
इस पर गहराई से विचार किया,... वर्षों तक लोग जाते हैं, प्रयोग करते हैं, वे अपनी कल्पना की दुनिया में जिन अनुभवों और अनुभूतियां की कल्पना को सुरिक्षत रख लेते हैं। उन्हें ही इस ‘एकाग्रता’ में या ‘स्वयं सम्मोहन’ की अवस्था में पाकर प्रसन्न हो जाते हैं। कुछ समय बाद, वापिस अपनी पुरानी अवस्था में आकर यथावत हो जाते है। उनकी आंतरिकता में कोई मौलिक परिवर्तन नहीं आता है।
हमारे व्यक्तित्व में, हमारे इस आंतरिक आलोचक का, निंदक का जोे हमारे ही मन का एक हिस्सा है, बनाने-बिगाड़ने में बहुत बड़ा हाथ है। वह हमारी स्मृति, अवधारणा से खाद-बीज की तरह पोषण लेता है, निरंतर बढ़ने वाली अनावश्यक विचारणा उसका कलेवर है।
आध्यात्मिक शब्दावली में उसे संस्कार कहा जाता है।
हां, इसी मन का एक भाग और भी है जो निरंतर महाशक्ति से जुड़ा रहता है, हम उसे अन्तर्मन भी कह सकते हैं। उसे ही ”आत्म“ कहा जाता है। यह यात्रा इतनी अभूर्त है, कि शब्द अपनी सीमा में उसे व्यक्त नहीं कर पाते हैं।

संक्षेप में चित्त, इन बाहर व भीतर के जो सागर है, इनकी लहरों से निरंतर प्रभावित होता रहता है। लहरें आती हैं, टकराती है, और बहाकर ले जाती हैं।
होना यही चाहिए, लंहरें आऐं, वे तो आवेंगी उनके बहाव को कोई नहीं रोक सकता है- हां, हमारी प्रभावित होने की क्षमता कम से कम होती चली जावे। यही साधना ‘तितिक्षा’ कहलाती है। आध्यात्मिक शब्दावली में इसे ‘कूटस्थ’ कहा जाता है।
ध्यान, मानसिक पूजा, प्रेक्षा ध्यान, अवलोकन, साक्षी भाव, अनेक पद्दतियां हैं जो हमारी इस चित्त शुद्धि में सहायक होती है। वे वहां बाह्य विचारों के प्रभाव को रोकने में सहायक हैं, वही भीतर के प्रभावों को निःशेष होने में सहायक होती हैं।
मुख्य बात आपकी मानसिक परिस्थिति की है।
पहले अशांत थे।
सुख था......संपति थी, धन था, पद था...... दोनों ही नावों पर, धन की तथा प्रतिष्ठा की पर निरंतर यात्रा कर रहे थे।
पर पाया,... भीतर अशांति है, उद्वलन है, तनाव है, मेरी प्रसन्नता गायब हो गई है।
तब इन शत्रुओं से पहचान हुई, पाया यह तो जनम से ही साथ चल रहे हैं। स्मृति इन्हें निरंतर ताकत देती है, अवधारणा सिंचित करती है, अनावश्यक विचारणा अधिकारिता सौंपती है।
आप स्वतंत्र न होकर परतंत्र हो गए हैं।
पराधीन सपनेहु सुख नाहीं...
दृश्य का चिंतन ही पराधीनता है।
दृश्य तो जब तक दृष्टा है, रहेगा, पर निरंतर चिंतन ने आपकोे दृश्य का दासत्व ही सौंप दिया।
वह पद्दति जहां आत्मविश्वास हो, आत्मज्ञान हो, स्वाभिमान हो और जहां आत्मकृपा हों। जहां आत्मकृपा होगी, वहां स्वाभाविक रूप से हमारे भीतर गरिमा, सम्मान, श्रद्धा, निष्ठा, गुण होंगे।
दुख का पर्यवसान शीघ्र ही सुख में हो जाता है।
शास्त्र कहते हैं, दोनों ही अनित्य है, क्षण भंगुर हैं। सर्दी-गर्मी की तरह है, इनके वेग को सहन कर।
क्रूा आपनेे इस प्रश्न पर गंभीरता से विवेचन किया है।
दुख से मार्ग, शांति की और नहीं जाता है।
हां, आवश्यकता व चाहत के वीच का संतुलन  पाना ही साध्य है।
यह प्राप्त होता है- विवेक के आदर तथा तथा जो भी हमारा सामर्थ्य है उसके निरंतर सदुपयोग से।
इस अवस्था में सुख के स्थाई सुख में ढलने की शुरूआत हो जाती है।
शारीरिक दुख, कष्ट होता है,इसका उपाय प्रयत्न,शरीर से सेवा, औषध, धन की व्यवस्था से संभव है।
मानसिक दुख- इसका मुख्य कारण आपका यह आहत द्रवित मन है, जो संस्कार है,... जो आपका निंदक है, जो आलोचक है, जो नकारात्मक सोच है।
हाँ, जीवन में इस संतुलन के आने से स्थाई सुख, शांति में ढल जाता है। शास्त्र कहते हैं,... जो निरंतर इस शांति में रहने लग जाता है-
”जिसका अंतःकरण राग द्वेष से रहित है, जो अपने वश में की की गई इन्द्रियों के द्वारा विषय भोग को प्राप्त करता है, उसे दिव्य प्रसाद की प्राप्ति होती है।“
और जिसे इस दिव्य प्रसाद की प्राप्ति होती है, उसके समस्त दुख दूर हो जाते हैं तथा उसे अंतःकरण की दिव्य प्रसन्नता प्राप्त होती ही है। यही प्रेम है यही मानव जीवन  की  उपलब्धि है।





Saturday, September 21, 2013

. अन्तर्यात्रा’अमृत पथ लेख माला की पंचम किश्त

अमृत पथ  लेख माला की पंचम किश्त

. अन्तर्यात्रा’



उस दिन स्वामीजी सीरियल का उदाहरण देते हुए कह रहे थेः-

आप जब फिल्म देखते हैं, टी.वी. देखते हैं तो क्या होता है?
    आप वास्तविक दुनिया से कट जाते हैं। उस दृश्यों की शृंखला में आप इतने डूब जाते हैं कि वे वास्तविक दुनिया का अहसास देते हैं। आप पात्रों के साथ बह जाते हैं, क्यों?
    अर्थचेतन अवस्था सी चित्त की आ पाती है। वहां आधा सत्य, आधी कल्पना से प्रसूत दृश्यांकन आपको बहा ले जाता है। अच्छे उपन्यास की सफलता का भी यही रहस्य है। वह अपनी काल्पनिक दुनिया को जिस सच्चाई के साथ लाता है, हम उस काल्पनिक दुनिया कोे सच मानकर उसमें डूब जाते हैं।
    हां, ‘ध्यान’ की प्रारंभिक अवस्था में सफलता का यही रहस्य है। हम जिस ‘सत्य’ का संधान पाने के लिए जिस तस्वीर का प्रयोग करते हैं, वह हमें ‘जीवन सत्य’ से हटाकर एक आकर्षक ‘इन्द्रजाल’ में ले आती है। ‘सत्संग’ समारोह की सफलता का भी यही रहस्य है।
    यह दृश्यीकरण एक तकनीक  है। मानसिक पूजा में इसी का सहारा लिया जाता है।
    पर हम गहराई से विचार करें, तो पाते हैं कि वहां से आने के बाद चित्त की दशा में कोई परिवर्तन नहीं होता है। यह एक मनोहारी नशे की अवस्था हो जाती है।
    इस पर गहराई से विचार किया,... वर्षों तक लोग जाते हैं, प्रयोग करते हैं, वे अपनी कल्पना की दुनिया में जिन अनुभवों और अनुभूतियां की कल्पना को सुरिक्षत रख लेते हैं। उन्हें ही इस ‘एकाग्रता’ में या ‘स्वयं सम्मोहन’ की अवस्था में पाकर प्रसन्न हो जाते हैं। कुछ समय बाद, वापिस अपनी पुरानी अवस्था में आकर यथावत हो जाते है। उनकी आंतरिकता में कोई मौलिक परिवर्तन नहीं आता है।
     हमारे व्यक्तित्व में, हमारे इस आंतरिक आलोचक का, निंदक का जोे हमारे ही मन का एक हिस्सा है, बनाने-बिगाड़ने में बहुत बड़ा हाथ है। वह हमारी स्मृति, अवधारणा से खाद-बीज की तरह पोषण लेता है, निरंतर बढ़ने वाली अनावश्यक विचारणा उसका कलेवर है।
    आध्यात्मिक शब्दावली में उसे संस्कार कहा जाता है।
    हां, इसी मन का एक भाग और भी है जो निरंतर महाशक्ति से जुड़ा रहता है, हम उसे अन्तर्मन भी कह सकते हैं। उसे ही ”आत्म“ कहा जाता है। यह यात्रा इतनी अभूर्त है, कि शब्द अपनी सीमा में उसे व्यक्त नहीं कर पाते हैं।

    संक्षेप में चित्त, इन बाहर व भीतर के जो सागर है, इनकी लहरों से निरंतर प्रभावित होता रहता है। लहरें आती हैं, टकराती है, और बहाकर ले जाती हैं।
    होना यही चाहिए, लंहरें आऐं, वे तो आवेंगी उनके बहाव को कोई नहीं रोक सकता है- हां, हमारी प्रभावित होने की क्षमता कम से कम होती चली जावे। यही साधना ‘तितिक्षा’ कहलाती है। आध्यात्मिक शब्दावली में इसे ‘कूटस्थ’ कहा जाता है।
    ध्यान, मानसिक पूजा, प्रेक्षा ध्यान, अवलोकन, साक्षी भाव, अनेक पद्दतियां हैं जो हमारी इस चित्त शुद्धि में सहायक होती है। वे वहां बाह्य विचारों के प्रभाव को रोकने में सहायक हैं, वही भीतर के प्रभावों को निःशेष होने में सहायक होती हैं।
    मुख्य बात आपकी मानसिक परिस्थिति की है।
     पहले अशांत थे।
    सुख था......संपति थी, धन था, पद था...... दोनों ही नावों पर, धन की तथा प्रतिष्ठा की पर निरंतर यात्रा कर रहे थे।
    पर पाया,... भीतर अशांति है, उद्वलन है, तनाव है, मेरी प्रसन्नता गायब हो गई है।
    तब इन शत्रुओं से पहचान हुई, पाया यह तो जनम से ही साथ चल रहे हैं। स्मृति इन्हें निरंतर ताकत देती है, अवधारणा सिंचित करती है, अनावश्यक विचारणा अधिकारिता सौंपती है।
    आप स्वतंत्र न होकर परतंत्र हो गए हैं।
    पराधीन सपनेहु सुख नाहीं...
    दृश्य का चिंतन ही पराधीनता है।
    दृश्य तो जब तक दृष्टा है, रहेगा, पर निरंतर चिंतन ने आपकोे दृश्य का दासत्व ही सौंप दिया।
ु    वह पद्दति जहां आत्मविश्वास हो, आत्मज्ञान हो, स्वाभिमान हो और जहां आत्मकृपा हों। जहां आत्मकृपा होगी, वहां स्वाभाविक रूप से हमारे भीतर गरिमा, सम्मान, श्रद्धा, निष्ठा, गुण होंगे।
    दुख का पर्यवसान शीघ्र ही सुख में हो जाता है।
    शास्त्र कहते हैं, दोनों ही अनित्य है, क्षण भंगुर हैं। सर्दी-गर्मी की तरह है, इनके वेग को सहन कर।
    क्रूा आपनेे इस प्रश्न पर गंभीरता से विवेचन किया है।
दुख से मार्ग, शांति की और नहीं जाता है।
    हां, आवश्यकता व चाहत के वीच का संतुलन  पाना ही साध्य है।
    यह प्राप्त होता है- विवेक के आदर तथा तथा जो भी हमारा सामर्थ्य है उसके निरंतर सदुपयोग से।
    इस अवस्था में सुख के स्थाई सुख में ढलने की शुरूआत हो जाती है।
    शारीरिक दुख, कष्ट होता है,इसका उपाय प्रयत्न,शरीर से सेवा, औषध, धन की व्यवस्था से संभव है।
    मानसिक दुख- इसका मुख्य कारण आपका यह आहत द्रवित मन है, जो संस्कार है,... जो आपका निंदक है, जो आलोचक है, जो नकारात्मक सोच है।
    हाँ, जीवन में इस संतुलन के आने से स्थाई सुख, शांति में ढल जाता है। शास्त्र कहते हैं,... जो निरंतर इस शांति में रहने लग जाता है-
    ”जिसका अंतःकरण राग द्वेष से रहित है, जो अपने वश में की की गई इन्द्रियों के द्वारा विषय भोग को प्राप्त करता है, उसे दिव्य प्रसाद की प्राप्ति होती है।“
    और जिसे इस दिव्य प्रसाद की प्राप्ति होती है, उसके समस्त दुख दूर हो जाते हैं तथा उसे अंतःकरण की दिव्य प्रसन्नता प्राप्त होती ही है। यही प्रेम है यही मानव जीवन  की  उपलब्धि है।