Sunday, September 29, 2013

अन्तर्यात्रा’

अन्तर्यात्रा’



उस दिन स्वामीजी सीरियल का उदाहरण देते हुए कह रहे थेः-

आप जब फिल्म देखते हैं, टी.वी. देखते हैं तो क्या होता है?
आप वास्तविक दुनिया से कट जाते हैं। उस दृश्यों की शृंखला में आप इतने डूब जाते हैं कि वे वास्तविक दुनिया का अहसास देते हैं। आप पात्रों के साथ बह जाते हैं, क्यों?
अर्थचेतन अवस्था सी चित्त की आ पाती है। वहां आधा सत्य, आधी कल्पना से प्रसूत दृश्यांकन आपको बहा ले जाता है। अच्छे उपन्यास की सफलता का भी यही रहस्य है। वह अपनी काल्पनिक दुनिया को जिस सच्चाई के साथ लाता है, हम उस काल्पनिक दुनिया कोे सच मानकर उसमें डूब जाते हैं।
हां, ‘ध्यान’ की प्रारंभिक अवस्था में सफलता का यही रहस्य है। हम जिस ‘सत्य’ का संधान पाने के लिए जिस तस्वीर का प्रयोग करते हैं, वह हमें ‘जीवन सत्य’ से हटाकर एक आकर्षक ‘इन्द्रजाल’ में ले आती है। ‘सत्संग’ समारोह की सफलता का भी यही रहस्य है।
यह दृश्यीकरण एक तकनीक  है। मानसिक पूजा में इसी का सहारा लिया जाता है।
पर हम गहराई से विचार करें, तो पाते हैं कि वहां से आने के बाद चित्त की दशा में कोई परिवर्तन नहीं होता है। यह एक मनोहारी नशे की अवस्था हो जाती है।
इस पर गहराई से विचार किया,... वर्षों तक लोग जाते हैं, प्रयोग करते हैं, वे अपनी कल्पना की दुनिया में जिन अनुभवों और अनुभूतियां की कल्पना को सुरिक्षत रख लेते हैं। उन्हें ही इस ‘एकाग्रता’ में या ‘स्वयं सम्मोहन’ की अवस्था में पाकर प्रसन्न हो जाते हैं। कुछ समय बाद, वापिस अपनी पुरानी अवस्था में आकर यथावत हो जाते है। उनकी आंतरिकता में कोई मौलिक परिवर्तन नहीं आता है।
हमारे व्यक्तित्व में, हमारे इस आंतरिक आलोचक का, निंदक का जोे हमारे ही मन का एक हिस्सा है, बनाने-बिगाड़ने में बहुत बड़ा हाथ है। वह हमारी स्मृति, अवधारणा से खाद-बीज की तरह पोषण लेता है, निरंतर बढ़ने वाली अनावश्यक विचारणा उसका कलेवर है।
आध्यात्मिक शब्दावली में उसे संस्कार कहा जाता है।
हां, इसी मन का एक भाग और भी है जो निरंतर महाशक्ति से जुड़ा रहता है, हम उसे अन्तर्मन भी कह सकते हैं। उसे ही ”आत्म“ कहा जाता है। यह यात्रा इतनी अभूर्त है, कि शब्द अपनी सीमा में उसे व्यक्त नहीं कर पाते हैं।

संक्षेप में चित्त, इन बाहर व भीतर के जो सागर है, इनकी लहरों से निरंतर प्रभावित होता रहता है। लहरें आती हैं, टकराती है, और बहाकर ले जाती हैं।
होना यही चाहिए, लंहरें आऐं, वे तो आवेंगी उनके बहाव को कोई नहीं रोक सकता है- हां, हमारी प्रभावित होने की क्षमता कम से कम होती चली जावे। यही साधना ‘तितिक्षा’ कहलाती है। आध्यात्मिक शब्दावली में इसे ‘कूटस्थ’ कहा जाता है।
ध्यान, मानसिक पूजा, प्रेक्षा ध्यान, अवलोकन, साक्षी भाव, अनेक पद्दतियां हैं जो हमारी इस चित्त शुद्धि में सहायक होती है। वे वहां बाह्य विचारों के प्रभाव को रोकने में सहायक हैं, वही भीतर के प्रभावों को निःशेष होने में सहायक होती हैं।
मुख्य बात आपकी मानसिक परिस्थिति की है।
पहले अशांत थे।
सुख था......संपति थी, धन था, पद था...... दोनों ही नावों पर, धन की तथा प्रतिष्ठा की पर निरंतर यात्रा कर रहे थे।
पर पाया,... भीतर अशांति है, उद्वलन है, तनाव है, मेरी प्रसन्नता गायब हो गई है।
तब इन शत्रुओं से पहचान हुई, पाया यह तो जनम से ही साथ चल रहे हैं। स्मृति इन्हें निरंतर ताकत देती है, अवधारणा सिंचित करती है, अनावश्यक विचारणा अधिकारिता सौंपती है।
आप स्वतंत्र न होकर परतंत्र हो गए हैं।
पराधीन सपनेहु सुख नाहीं...
दृश्य का चिंतन ही पराधीनता है।
दृश्य तो जब तक दृष्टा है, रहेगा, पर निरंतर चिंतन ने आपकोे दृश्य का दासत्व ही सौंप दिया।
वह पद्दति जहां आत्मविश्वास हो, आत्मज्ञान हो, स्वाभिमान हो और जहां आत्मकृपा हों। जहां आत्मकृपा होगी, वहां स्वाभाविक रूप से हमारे भीतर गरिमा, सम्मान, श्रद्धा, निष्ठा, गुण होंगे।
दुख का पर्यवसान शीघ्र ही सुख में हो जाता है।
शास्त्र कहते हैं, दोनों ही अनित्य है, क्षण भंगुर हैं। सर्दी-गर्मी की तरह है, इनके वेग को सहन कर।
क्रूा आपनेे इस प्रश्न पर गंभीरता से विवेचन किया है।
दुख से मार्ग, शांति की और नहीं जाता है।
हां, आवश्यकता व चाहत के वीच का संतुलन  पाना ही साध्य है।
यह प्राप्त होता है- विवेक के आदर तथा तथा जो भी हमारा सामर्थ्य है उसके निरंतर सदुपयोग से।
इस अवस्था में सुख के स्थाई सुख में ढलने की शुरूआत हो जाती है।
शारीरिक दुख, कष्ट होता है,इसका उपाय प्रयत्न,शरीर से सेवा, औषध, धन की व्यवस्था से संभव है।
मानसिक दुख- इसका मुख्य कारण आपका यह आहत द्रवित मन है, जो संस्कार है,... जो आपका निंदक है, जो आलोचक है, जो नकारात्मक सोच है।
हाँ, जीवन में इस संतुलन के आने से स्थाई सुख, शांति में ढल जाता है। शास्त्र कहते हैं,... जो निरंतर इस शांति में रहने लग जाता है-
”जिसका अंतःकरण राग द्वेष से रहित है, जो अपने वश में की की गई इन्द्रियों के द्वारा विषय भोग को प्राप्त करता है, उसे दिव्य प्रसाद की प्राप्ति होती है।“
और जिसे इस दिव्य प्रसाद की प्राप्ति होती है, उसके समस्त दुख दूर हो जाते हैं तथा उसे अंतःकरण की दिव्य प्रसन्नता प्राप्त होती ही है। यही प्रेम है यही मानव जीवन  की  उपलब्धि है।





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