Saturday, May 15, 2021

योग सूत्र

 योग सूत्र

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अक्सर हम यही शिकायत करते रहते हैं, कि जो जीवन जी रहे हैं, वह कठिनाई से कट रहा है, इससे भी बेहतर संभव है, हम उसें लिए  हम हर प्रकार के प्रयास करना चाहते है। हमारे ज्योतिषी, धार्मिक बाबाओ, तांत्रिको जिनकी संख्या भारत में ही करोड़ो के ऊपर है, इस माया जाल के उद्योग में संलग्न हैं।सबका कहना यही है, कि वर्तमान तो नर्क की तरह होता है, हम उसमें रह नही पाते, जी नहीं सकते, हम हमेशा सपनों में जीते हैं, सपनों में पैदा होते हैं, सपने देखते चले जाते हैं, हम जिसे यथार्थ कहते हैं, वह भी एक कल्पना ही है।जो दुखद अधिक है।

तो क्या यही हमारी नियति है? क्या हमारे लिए कठपुतली की तरह ही नाचना हमारी किस्मत में लिखा है? या हम बेहतर , शक्तिमय आनंदमय जीवन जीने के हकदार हैं? इन सवालों का उत्तर लगभग चार हजार वर्ष पूर्व भगवान पतंजलि ने तलाश किया था। उनका योगसूत्र आज भी थके हुए , हारे हुए मनुष्य के लिए एक नई सुखद यात्रा का प्रारम्भ है।


यह सही है कि हम जहां भी हैं, वहां इसी क्षण में ,,वहां रह नहीं  पाते ,कहीं ओर चले जाते हैं। जो दिखना चाहता है, उसे नहीं देखते, देखते है तो अपने रंग में देखते हैं, इन रंगांे से बाहर आना ही वर्तमान में आना है, जिसे हम पसंद नहीं करते, वह कटु-तिक्त नजर अता है।

स्वामीजी कहा करते थे, वर्तमान में रहो, यही योग है।

कहते थे, बहुत सीमित विधि है, न भूत में न भविष्य में। सपनों में चले जाते हो। ज्योही वर्तमान सेें भाग के बाहर चले जाते हो। मैं गया था, मैं जाऊगा, सपना ही है। एक जी चुके हो, एक जीना चाहते हो। जो जी लिया वहां भी सोचते हो,ऐसा करते तो कितना अच्छा था, फिर सपने शुरू हो जाते हैंैं, यह भूला हुआ मन सपना ही देखता है। यह वर्तमान में रह नहीं पाता। मन और प्राण की युति ही योग है। मन जब प्राण के संयुक्त होता है, वहां मात्र वर्तमान ही शेष रह जाता है।

अभी मित्र आए थे, बोले योग करता हूं,, उन्हें किस प्रकार बताया जाए कि  आसन प्राणायाम ही योग नहीं है। यह अग्रेजी का योगा है, योग तो जो जैसा जीवन है उसे वैसा ही स्वीकार करना। जहाॅं आवश्यकताओं की पूर्ति तो है, पर इच्छाओं के पीछे नहीं दौड़ना। 

-जो योगी हैं, वह जान जाता है, अब कहीं नहीं जाना, न भूत में न भविष्य में, जो  आता-जाता है, वह मन ही है। शरीर तो जहां है, वहीं रहता है, आता-जाता यह मन ही है। यह भी शरीर के साथ रह जाए, अब कहीं नहीं जाना, तब युति सध जाती है। यही तो योग है।

मन माने आपके विचार, जो या तो आगे जा रहे है, या पीछे लौट रहे हैं, जब यह पक्का पता हो जाता है, यह बेकार की यात्रा है, तब मुकान पर ठहरना शुरू होता है।

... जो तथाकथित योगी हैं, वे भी सपने ही बेच रहे हैं। उनका मन साधारण जन के मन से भी जटिल व कुटिल है। उनके मन की भूख और प्यास बहुत है।

योग मात्र रुकना है, अब कहीं नहीं जाना है। जहां जाना है, वहां बहिर्मुखता है। अंतर्मुखता घर की वापसी है। पर पहले रुकना होगा तभी पीछे मुड़ सकते हैं।

योग का प्रारंभ इसी जगत में होता है। अब कहंीं नहीं जाना। सब यात्राएं व्यर्थ हैं। यात्रा हमेशा सपने में होती है। वहां शाश्वत नहीं रहता। यह सपना ही यात्रा है। कहावत है, निराशा परम सुखं, किसी प्रकार की कोई आशा मत रखो। आशा ही मन है, स्मृति ही मन है, कल्पना ही मन है। जब यह मन थक जाता है, तब योग का प्रारंभ संभव है।

योग तो आंतरिक सत्संग है। अपने आपसे जुड़ा रहने का अहसास है। जो है वही परम है। वही सत्ता है, वही हमारा केन्द्र है। हम मात्र परिधि पर ही घूमते रहते हैं। बाहर कितना भी जाए,ॅ वहां यात्रा भटकाव है। ‘घर की वापसी’ अपने अंतःकरण पर लौटना है। पूज्य स्वामीजी कहा करते थे, बाह्य मन और अंतर्मन का मिलन ही योग है। बाह्यमन, जब अंतर्मुखी होता है वह  अंतर्मन में डूब जाता है।


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