अवलोकन
प्रश्नः- स्वामीजी यह अवलोकन की जो विधि बताई जाती है ,वह क्या है?
स्वामीजी विभिन्न मतों की चर्चा करते हुए कह रहे थे :-
”इतने सारे मत है, पंथ है, रोज़ नए-नए बनते हैं, पुराने हटते चले जाते हैं क्यों? प्रकृति का यही रहस्य है, उसे हमेशा कुछ ना कुछ नया चाहिए।
वरन! इतने देवी-देवता कहाँ से आते, उनकी पूजा, उनकी आराधना,... इतने ग्रन्थ कहां से आते,... सिलसिला चल रहा है।
रूचि, योग्यता, सामर्थ्य इस संार में प्रत्येक प्राणी का अलग-अलग है। सब एक जैसे हों, यह हो नहीं सकता। साधन और साधना भेद का यही कारण है। नहीं तो सबका एक ही रंग होता, एक ही भाषा होती।
सब अपने-अपने रास्ते पर चलंे, अपने ही अनुसार चलंे, यही सही बात है। मैंने कभी किसी को मार्ग बदलने का नहीं कहा, हॉं, वह अपने रास्ते पर सही कैसे चल सकता है, उसे कोई दुविधा आ रही हो, आकर पूछे तो बताओ, पर किसी का रास्ता खराब है, उसमें कमी है, यह कहना गलत है।
जिसे कंन्वर्जन कहते हैं, धर्म परिवर्तन, यह हमारे यहां का शब्द नहीं है। यह बाहर से आया है। उन्होंने कहा तुम्हारा रास्ता गलत है, हमारा ठीक है, सारा झगड़ा यहीं से शुरू हुआ है। हमने तो उनको भी गलत नहीं कहा। सब बात तो एक ही करते है एक महान सत्ता है, वही नियंत्रक है, उसे पाना है, उसे जानना है, उसकी कृपा चाहो, फिर भेद कहां है? बस अहंकार ही बाधा देता है। उसके कारण से हम अपने आपको श्रेष्ठ तथा दूसरे को खराब कहते हैं।
साधन भेद तो समय व स्थान भेद से ही बदल जाता है। मनुष्य कोई जड़ तो है नहीं, जब पृथ्वी घूम रही है, गृह-नक्षत्र घूम रहे हैं, वहां निरंतर गति ही सार है। वहां एक मुकाम पर पड़े होकर बैठ जाना क्या सही है? यहां सब कुछ परिवर्तनशील है, जब सब-कुछ बदल रहा है तब एक निश्चित रूप व आधार या तरीके पर कैसे टिका रहा जा सकता है।
हाँ, प्राणिमात्र को ध्यान से देखो।
कुछ बातें उनकी एक ही है, उनकी मूलभूल आवश्यकताएं एक ही हैं। मनुष्यों को, उनकी विचारधारा को, उनकी साधना पद्दति को देखो सबका ध्यान एक ही जगह पर रहता है, हमारे जीवन से व्यर्थ का चिंतन हट जावे। वही हटाए नहीं हटता।
मजेदार बात यह है कि न तो हम बलपर्वूक सार्थक चिन्तन कर सकते हैं। नहीं व्यर्थ का चिन्तन हटा सकते हैं।
लगता है, हम तो मात्र तिनके हैं, हवा आई और हम उड़ गए। आप पता करो, यह बात कितनी सही है।
यहां लोग आते हैं, क्यांें आए उन्हें ही पता नहीं रहता। बातें चलती रहती हैं, उसमें बह जाते हैं।
मैं पूछता हूं, कैसे आए?
कहता है, वह बात तो रह ही गयी, अब में आऊंगा तो बात करूंगा। यही तो होता आया है।
जो करना होता है, वह तो होता नहीं है।
जो नहीं करना होता है, वही होता जाता है।
मैंने पहले कहा था-
जो करना होता है, उसे एक बार सोचो, अच्छी तरह सोचो फिर जो तय किया है, करो, सोचो मत। बार-बार सोचने से कार्य करने की शक्ति चली जाती है। अंत में वह कार्य भी छूट जाता है।
इस आदत को कम करना है।
इतने सारे पूजा-विधान इसलिए बनाए गए कि मन एकाग्र हो जाए। जितनी रुचि होती है, उतने ही विधान बनते गए पर मुख्य बात सब भूलते गए।
हम जहां भी हों, जो भी कार्य हो, मन को अधिक से अधिक वहीं रखा जाए। परमात्मा की इस सृष्टि का आदर यही है कि हर स्थान श्रेष्ट है। हर कार्य श्रेष्ट है। कोई छोटा नहीं। कोई बड़ा नहीं। हमारा अस्तित्व ही महत्वपूर्ण है।
हम जो भी हैं, जिस जाति कुल में पैदा हुए हैं, प्राकृतिक विधान से जो भी योग्यता हमें मिली है, वही हमारी साधन सामग्री है। वही हमारे विकास में सहायक है।
हमें अपने ही स्वधर्म का पालन करना चाहिए।
रास्ते अनेक हैं, पर पहुंचते एक ही जगह हैं।
व्यर्थ का चिंतन हमारे जीवन से हट जाए।
इसके लिए करना यही है-
जो भी प्राप्त परिस्थिति है, उसका स्वागत करो, उसे प्रिय मानो, उससे प्रेम करो, उससे भागो मत। हमारे यहां उपनिषद काल में यह भागना नहीं था। बाद में आया। समाज से भागकर कहां जाओगे? संसार कहॉं नहीं है?
आपने पूछा था- मैंने सन्यास क्यों लिया।
बचपन से ही मेरी रूचि, इस सत्य को जानने की। बाहर मेरी कोई रूचि नहीं थी। परिवार की परिस्थितियां भी ऐसी ही बनती गईं। हां, मां की मृत्यु के बाद फिर मेरे पास कोई पारिवारिक कार्य नहीं बचा था, मैं स्वेच्छा से सन्यास लेने गया पर वहां भी कहा था- याचक नहीं बनूंगा। सन्यास के बाद निरंतर कार्य करता रहा। सन्यासी की परंपरा तथा उसका निर्वाह छूटता चला गया। गरीब से गरीब के घर भी गया। सादा रोटी खाकर भी जीवन जिया। गृहस्थों के यहां ठहरता रहा। उनके परिवार का हिस्सा बनकर, मार्गदर्शन किया ।
परंपरा में जाकर इसकी व्यर्थता को देखा। इसीलिए आपसे कहता हूं कि आपको कहीं जाने की जरूरत नहीं है। जो भी जैसा आया है, सामना करो। वर्तमान में रहो। कल जो होना है, प्रकृति का कार्य निर्धारित है, वह होना है। आज में आपको रहना है। यही सार है।
यह न होता तो क्या होता, हमें बचपन में सुविधाऐं नहीं मिली, यह कमी रही, वह कमी रही, यह सोच ही व्यर्थ है। जो जैसा प्राप्त हुआ है विधान के अंतर्गत ही है। हमें उसका आदर करना चाहिए। जब हम प्राप्त परिस्थिति को आदरपूर्वक सवीकार कर लेते हैं, तो व्यर्थ के चिंतन से बच जाते हैं।
आप भगना क्यों चाहते हैं, पलायन क्यों चाहते हैं, क्यों नहीं प्राप्त परिस्थिति का आदर कर पाते हैं, सोचें।
हमेशा नयी परिस्थिति से भय रहता है, पुरानी जगह पर प्राप्त सुख-सुविधाऐं पकड़ लेती हैं। यही सुख का प्रलोभन है। नई जगह जाने में संकोच का यही कारण है। सुविधा कम हो जाएगी। मान-सम्मान कम हो जाएगा। पैसा कम आएगा, बहुत सारी बातें है।
अगर एक बार यह सोचो, जो कुछ प्राप्त हुआ है, वह ऐसा ही होना था इसलिए हुआ है, इससे बेहतर हमारे हित में नहीं था। हमने जो चाहा था। जिन परिस्थितियों में हमारा विकास हो सकता है, जो हमारा प्राप्तव्य था, वही हमें प्राप्त हुआ है, तो आपकी दुनिया बदल जाएगी। अभाव पाकर, व्यथित होना रुक जावेगा। जो भी परिस्थिति मिली है, उसमें प्रसन्नता आ जावेगी। कहते सभी हैं, ईश्वर हैं, पर उस पर विश्वास किसी को नहीं है।
उसे भी अपनी इच्छानुसार चलाना चाहते है।
साधन में सफलता मिले, इसके लिए आवश्यक है कि जो भी प्राप्त हुआ है वह पूरी तरह स्वीकार हो। साथ ही उसके प्रति प्रियता भी रहे। वह कार्य बोझा नहीं लगे। उसमें उदासीनता नहीं आवे।
क्योंकि जो परिस्थिति आपको प्राप्त है, उसमें प्रियता नहीं होगी तो अनावश्यक चिंतन शुरू हो जावेगा। आपसे कहा था- प्रतिकूल परिस्थितियों को अनुकूल मानते हुए प्रेम से भोगो, जल्दी ही समाप्त हो जावेगी। जो है, सामना करो, आप जितना उसे बोझा मानते रहेंगे, वह समय उतना ही बढ़ता जाऐगा। यह प्रकृति का नियम है। अगर परमात्मा पर विश्वास हो तो सो टका हो, अपने ऊपर विश्वास हो तो सौ टका हो। बात एक ही है। हर परिस्थिति, एक विधान के अंतर्गत आती है, उसका स्वागत करो। मीरा के लिये गया जाता है, विष का प्याला भी उसके लिए अमृत हो गया।
तब व्यर्थ का चिंतन अपने आप कम होने लगता है।
पहले भी कहा है-
जो कर सकते हो, उसे तुरंत कर देना चाहिए। पर होता उसके विपरीत है-
जो कर सकते हो, वह तो होता नहीं है, जो नहीं कर सकते हो, उसके बारे में निरंतर सोचते रहते हो। प्रयास से न तो कोई व्यक्ति व्यर्थ के चिंतन को हटा सकता है, नहीं कोई सार्थक चिंतन कर सकता है, मात्र गहरी समझ ही सहायक है। प्राप्त समझ का आदर ही साधना है।
उस दिन आपने पूछा था-
मन में अशुभ व मलिन विचार आ रहे हैं तो क्या किया जाए?
उन्हें हटाओ मत, प्रवाह को आने दो, देखते रहो। परन्तु उन विचारों में रमण मत करो। न तो उनका समर्थन करो, न बुराई करो। इससे क्या होगा, जैसे जहॉं काले रंग का धब्बा हो, वहॉं पानी डाला जावे, तो काला पानी बाहर आता है। धब्बा धीरे-धीरे अपना रंग खोता है। उसी प्रकार बुराई भी अपने आप समर्थन के न मिलने से, कम होती चली जाती है। जो विचार बुरे हैं, वे अपने भीतर संग्रहित बुराई के कारण से पैदा हो रहे हैं। उनका समर्थन न करने से बुराई जो जमा है वह कम होने लगती है। उन बुरे विचारों को पूरा करने का मत सोचो। बुराई अपने आप कम होती चली जावेगी। बुरे व अशुभ संकल्प अपने आप कम होने चले जाऐंगे।“
1 comment:
are this is tap conversation of swami Ji or yours thoughts? according to my feeling these are statements of pujya swami ji. If you have such tapes records please keep writing in the blogs.
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