Tuesday, September 3, 2013

हमारी साधना


हमारी साधना

पूज्य स्वामी जी कहा करते थे, बहिर्मुखी साधनाओं की यहां कोई आवश्यकता नहीं है। वे जप, तप, प्राणायाम, उपवास, आदि, जहां शरीर को कष्ट दिया जाता है, उन के समर्थक नहीं थे। अनन्त यात्रा में आप ने उस पर प्रकाश डाला है।

यहां साधना न करने की है। जहां संसार में कार्य करना है, वहां करना होता है, उसे ही प्रयत्न कहा जाता है। प्रयत्न नहीं करेंगे तो हम ज़िन्दा कैसे रहेंगे? भीख मांगना बुरी बात है। वे कहते थे, याचक नहीं दाता बनो। जो मांगता है, वह छोटा..हो जाता है।

तो फिर, वे सन्यास धारण करने के बाद भी कभी भिक्षा को नहीं गए। भूखा रहना पड़ा, रह लिए, फिर गुरु जी ने अपनी थाली से ही भोजन निकाल कर देना प्रारम्भ कर दिया था।

मूल बात है, गृहस्थ के मन जो सन्यासी की श्रेयता को ले कर घरबार छोड़ने की जो कामना बनी रहती है, वे इस के विरु( थे। ‘अनन्त यात्रा’ में रानी चूड़ाला, राजा शिखिध्वज को जो विरक्त हो कर वन में चले गए थे, उन्हें आत्म ज्ञान दे कर वापस घर ले आती है।

संत कबीर जी ने कहा है, घर में गंगा, घर में ही जमुना हमारे, तीरथ कौन करे?

स्वामी जी प्रयत्न और पुरुषार्थ के बीच की रेखा बनाए रखने में ध्यान देते थे। संसार में रहने की कला प्रयत्न है, तथा परमात्मा से लग्न की, अनुभव की यात्रा पुरुषार्थ है। पुरुषार्थ में शरीर से कुछ नहीं करना है। हां, मन जो भटकता है, उस के भटकाव को रोकने का प्रयास करना है। यहीं अन्तर्मुखता प्राप्त होती है। जो मन को अमन बनाती हुई विपरीत दिशा में जहां विराट है, उस के पास ले आती है। यहीं मन का मूल स्थान है।

इसी लिए हमारी साधना में, शरीर के द्वारा कुछ नहीं करने का साधन है। तब बचेगा मन, मन का काम सोचने का है, सोचना कम करते जाओ, सोचना शुरू होता है, स्मृतियों में, याद रखो, स्मृति ही पाप है। स्मृति पुख़्ता होती है, अवधारणाओं से, अवधारणाएं ही दुष्कर्म हैं। बुरा काम तथा इस से मन निरन्तर अनावश्यक विचारणाओं में भटकता रहता है। यही चरम पाप है।

तब क्या होगा? तुम्हारा दूसरों से अनावश्यक बोलना बन्द होने पर, वे तुम्हारी बात सुनना चाहेंगे। अनावश्यक देखना बन्द कर दो। दिन भर टी.वी. देखते हो, कितना कचरा अपने भीतर ले जाते हो। आंखें ही संसार को अपने साथ भीतर ले जाती हैं। तभी अचानक प्रभु की आवाज़ सुनाई पड़ती है। जो अनवरत है। जैसे सागर तट पर लहरों का संघात सुनाई पड़ता है, वैसे ही यह ‘नाद’ जो अनवरत है, जो अन्दर है, वह सुनाई पड़ता है। यह ध्वनि अनवरत है।

तभी कुछ आंखें बाहर देखना बन्द कर देती हैं। कम देखती हैं, अचानक भीतर से उठता प्रकाश दिखाई देता है।

लोग प्रकाश का ध्यान लगवाते हैं, यह भी कल्पना है। हमारे यहां भी एक विधि है, गहरे ध्यान में उतरो।

बाह्य किसी वस्तु, प्रतिमा, नाम, रूप पर एकाग्रता कुछ सजगता तो देती है, पर बाद में वही अपना ग़्ाुलाम बना लेती है।

पहला चरण चुप होना सीखो, मन को रोको, ज़रूरत नहीं है तो मत बोलो।

अपने भीतर उतारो, वहां विचारणा का गहरा दबाव है, तरंगें, बाहर आ कर शब्द बनना चाहती हैं।

वहीं ध्यान को ले जाओ। आने वाले विचार को देखते ही, उस के बाद का आने वाला धुआं स्वतः रुक जाएगा।

धीरे-धीरे जितनी विचारों की संख्या कम होती जाएगी, उस निर्विचारता में शान्त प्रकाश, शान्त आदर्श, जहां धुआं नहीं हैं। वही वास्तविक भगवा रंग है,वह स्वतः प्रकट होगा। रात पर ध्यान गया तो उस सन्नाटे में, उस वीराने में ये गहरी ध्वनियां सुनाई देंगी। अनतरत, कभी घण्टा नाद, कभी बांसुरी, तो कभी घुुंघरू, यह ध्वनि निरन्तर सब जगह, स्पष्ट सुनाई देती है।

इसी लिए हम कल्पना के सहयोगी नहीं हैं।

यह तो मन की ही शान्ति है।

परन्तु जब निर्विचारता सधती है, तब प्रकाश और नाद स्वतः जन्मते हैं।

ये सि(ियां नहीं हैं। परन्तु मन की शान्ति की सूचना देती हैं। यह सच है, शान्त मन ही शक्तिशाली होता है।

इस लिए साधना में गहरी समझ की ज़रूरत प्रारम्भ में होती है।

हम विचारों से लड़ नहीं रहे हैं, मन को  जाना आज तक नहीं गया है।ै, मन तो गति है, उस की गति, विचार के आते ही बढ़ जाती है। वह एक फिरकनी की तरह है, बाह्य का बल विचार होता है और विचार ही गति है, वह अचानक विचारणा के वेग को अपने साथ बहा देता है। तब अनवरत विचारणा का वेग प्रारम्भ हो जाता है। हमारा अधिकांश समय इसी अनावश्यक विचारणा के वेग के साथ ही गुज़रता है। हम कभी इस से हट कर रह ही नहीं पाते हैं।

इस से हटते ही, मन की गति कम हो जाती है। वही मन की शक्ति है।

यहां अगर हम यह कल्पना करें कि, हम प्रभु के सामने बैठे हैं। हम प्रकाश रूप हैं। हमारे हृदय में प्रकाश है, वही गुरु है। हम उस के सामने बैठै हैं, तो हमारे अन्य विचार, इस एस विचार में छूटते चले जाएंगे। यह सही है। इस विधि में एकाग्रता बढ़ जाती है। मन का बिखराव भी कम होता है। मन की एकाग्रता की शक्ति बढ़ जाती है।

परन्तु चित्त की वृत्तियों का विरोध यानी निर्विचारता, यानी चित्त रूप सरोवर पर बाह्य कम्पन का कोई प्रभाव न पड़ना, यह वहीं सध जाता है। क्यों कि यह एकाग्रता, निर्विकल्पता में जाने से रोक देती है।

परमहंस के जीवन की घटना है। वे जब भी ध्यान लगाते थे, काली का रूप. उन की भृकुटि पर आ कर ठहर जाता था। जब गुरु ने, उस ब्राह्मणी ने, एक कांच का टुकड़ा ले कर उन की दोनों बाहों के बीच आज्ञा चक्र पर गड़ा दिया। ख़ून निकल आया। तब वह एकाग्रता से प्राप्त बिम्ब हट पाया, और वे तत्क्षण निर्विचारता में चले गए।

हमारे यहां साधना में, नया कुछ नहीं सिखाया जाता।

ध्यान ही विधि है, ध्यान ही साध्य है।

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