Friday, September 20, 2013

अमृतपथ लेखमाला की यहॉं चौथी किश्त ”प्रेम“ दी जारही हें।


प्रेम

प्रश्नः- स्वामीजी क्या यही प्रेम है? आपको देखकर लगता है आपके पास कुछ विशिष्ठता है जो हमारे पास नहीं है।
स्वामीजीः-
यहां क्या है,... आप पता करें, मुझे तो कुछ भी पता नहीं रहता, एक जैसी स्थिति रहती है। कोई आया उसका पता भी नहीं रहता जब तक वह बोलता नहीं है,... या आंखों के सामने नहीं आता,... आपने देखा है जब मैं घूमता था, निगाह नीचे तीन फीट तक ही रहती थी। क्या निकल गया है, मुझे पता नहीं रहता, जब तक वह स्वयं सामने आकर रोकता नहीं था।
यहां विचार तो है ही नहीं, जब विचार नहीं होता, मन भी नहीं होता। मन ही तो विचार है, वह रहता है जब कोईक्रियाहुयी
तब वह जाता है, फिर मुकाम पर आकर ठहर जाता है। स्मृति भी है, वहां तो भंडार है, आवश्यकता होने पर वह वहाँ से सूचना ले आता है।
जब मन शांत होने लगता है, तब संग्रह साथ नहीं रखना पड़ता। ग्रन्थों की तभी तक आवश्यकता रहती है। जब तक आपके भीतर जो उत्तर देता है, वह उपेक्षित है जब उत्तर भीतर से अपने आप आने लगते हैं। तब ग्रन्थों की जरूरत नहीं होती। उस खालीपन से भय नहीं होता है। यह स्मृति लोप नहीं है। आप जो चौबीस घंटे सोचते रहते हैं वह विचारणा हैं, आप विचारक नहीं है। विचार जो आएगा, वह मौलिक होगा। वर्तमान में होगा।
जब यह विचारणा ही रुक जाती है तब उस शांति का पता लगता है, आप एक ही विचार या एक ही क्रिया में अधिक से अधिक रहने का प्रयास करें। मन वहीं रहे... तब मन स्वतः अन्तर्मुखी होने लगता है। वहीं शांति है। इस शांति की अवस्था में अधिक से अधिक रहने पर स्वाभाविक प्रेम का उदय होता है।
जहां प्रेम है वहां राग-द्वेष नहीं होगा। यही चित्त की शुद्धि है। क्योंकि विचार ही विकार है, जब विचार आने रुक  जाते हैं तो हम विकारों से भी मुक्त होने लग जाते हैं। सभी के प्रति एक रस एक भाव रह जाता है। आचरण में धर्म स्वाभाविक रूप से आ जाता है।
‘आत्मवत सर्वभूतेषु, सर्वभूतेषु हितेरतः’, यह भावना जितनी दृढ़ होती जाती है, उतना ही हम प्रेम भी पाते जाते हैं। यहां आने पर आप भी होंगे, परिवार भी होगा, जो भी कार्य कर रहे हैं, वह भी होगा। पर अब क्रम विपरीत हो जाता है। बहाव अपने मूल स्थान पर लौटने लगता है। अभी तक बहाव बाहर की ओर था। बाहर की छोटी से छोटी  घटना भी आपको बाहर भटकाती चली जाती थी। आप तिनके की तरह भटक रहे थे। पर अब, विषय भी रहेगा, इंद्रियाँ भी रहंेगी, मन भी रहेगा पर सबंध नहीं जुड़ेगा। संबंध मन जोड़ता है। मन के न रहने पर स्वाभाविक क्रम में कर्मेन्द्रिय, ज्ञानेन्दिय में तथा ज्ञानेन्द्रिय, अंतःकरण में डूब जाती है। वहां तीनों का एकीकरण हो जाता है। यह बलपूर्वक नहीं होता, स्वाभाविक क्रम में होता है।
इस स्थिति में बुद्धि जो है वह ‘सम’ हो जाती है। समता यहीं आती है। बुद्धि का कार्य है, निरंतर परीक्षण करते रहना, जितना बुद्धिमान होगा उतना ही वह विचारणा का दास होगा। उसकी मान्यता होगी, हम नहीं सोचेंगे, नहीं बोलंेगे तो मूर्ख माने जायेंगे। विवेकी चुप रहेगा।बुद्धि जब स्थिर होती है, तब वह विवेक में ढल पाती है। अतः कर्मेेन्द्रिय, ज्ञानेन्द्रिय तथा अंतःकरण जब एकीकृत हो पाते हैं। तब ये बुद्धि में, तथा बुद्धि विवेक में लीन हो जाती है। इसके पहले बताया गया था कि अब अंतर्मन आकर हमारे कार्य व्यवहार संभाल लेता है। वह विराट के समीप होने के कारण से अत्यंत शक्तिशाली है, और सच तो यही है कि जहां शांति है, वहीं प्रेम है, और शक्ति भी।
यह प्रेम जो है, इसकी स्वाभाविक पहचान ‘आकर्षण’ है, जैसे पूर्णमासी का चांद, ज्वार आने पर लहरों को अपनी तरफ खींच लेता है उसी प्रकार प्रेम का उदय होने पर, स्वाभाविक रूप से हमारे भीतर आकर्षण शक्ति पढ़ने लगती है। प्राणिमात्र के प्रति, कल्याणकारी भावना रहती है, कर्म तब सेवा में ढल जाता है। तुम्हारा सोच  है, तुम्हें कुछ ना कुछ हमेशा करना चाहिए और जब तक  सफलता नहीं मिल, निरंतर प्रयास करना चाहिए।

मैंने प्रयत्न के लिए कभी मना नहीं किया। सामर्थ्य जो तुम्हें मिला है, उसका सदुपयोग पूरा करना चाहिए, साथ ही विवेक विरोधी कार्य नहीं करना चाहिए। कोई भी कर्म, भय तथा प्रलोभन से नहीं करना चाहिए। कर्म के बिना कोई नहीं रह सकता है,अतःप्राकृतिक विधान से जो भी कार्य उपस्थित हो वहां मन को पूरी तरह लगाए रखना चाहिए। पर कर्म का फल क्या होगा? इस पर अधिक नहीं सोचना चाहिए। कर्त्ता ही निष्काम होता है, कर्म नहीं, हम जब स्वधर्म का पालन करते हुए अपने कर्तव्य कर्म का पालन करते हैं तब किया हुआ कर्म स्वाभाविक यप से निष्काम होता है। क्योंकि वहां मन वर्तमान में रहता है।
वर्तमान में किया गया कर्म निष्काम होता है। वर्तमान का क्षण वह है, जहाँ मन, भूत और भविष्य की विचारणा में नहीं है। सरल भाषा में जो भी क्रिया है, मन वहीं है, किंचित मात्र भी विपरीत दिशा में नहीं है।
बस यही स्वतंत्रता है, इसलिए निरंतर बिना उत्तेजना केे शांत मन से कर्मरत रहना चाहिए।
रहा सवाल, प्राप्ति का, अप्राप्ति का,- वस्तु तो प्राकृतिक विधान के अनुसार ही मिलेगी। जिसको जो मिलना है वह उसके पूर्व संकल्पों के अनुसार मिलेगा ही, जिसके द्वारा जो अच्छा या बुरा किया जाता है वह उसके ही काम आता है, कई गुणा होकर लौटता है, उसे ही मिलता है।
प्राकृतिक नियम की अवहेलना कभी नहीं होती है। इसीलिए किसी वस्तु को देना देने वाले के हाथ में नहीं हैं। हम जिसे देना चाहते हैं उसे नहीं मिलता, जिसे नहीं देना चाहते हैं, उसे मिल जाता है। प्रकृ्रति में कर्तुम, अकर्तुम अन्थथाकर्तुम, सदा से रहा है। होगा, नहीं होगा या तीसरा कुछ होगा।यह एक विधान है।
इसलिए पहले बताया था, जो कार्य कर सकते हें उसे तत्काल पूरा करने का प्र्रयास होना चाहिए, जो विवेक विरोधी है, उसे छोड़ देना चाहिए जो आपके सामर्थ्य की सीमा से बाहर है, उसे प्रकृति पर छोड़ देना चाहिए।








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