Monday, September 16, 2013

अमृत पथ 1




अमृत पथ
यह लेखमाला पूज्य स्वामीजी द्वारा दिए गए  प्रवचनो के अंश है।
उनके महानिर्वाण के बाद पुस्तकों का प्रकाशन कुछ रुक गया था। समाधि स्थल पर उनके अनुयायियेा द्वारा भी तथाकथित कर्मकांड का सहारा लेना भी प्रारम्भ कर दिया गया था। जिन मूल्यों का स्वामीजी ने जीवन भर निर्वहन किया ं , वे मूल्य नई पीढ़ी के हाथों सुरक्षित रहें, इसी अभिप्राय से ये लेखमाला प्रकाशित की जारही हैअमृथ पथः-
प्रश्न था- पूज्य स्वामी जी हमारा तो मन ठहरता ही नहीं है।भटकता ही रहता है ,क्या किया जाए?
स्वामीजी ने कहा थाः-
”आपने सवाल किया है, मन ठहरता ही नही है,  एकाग्र ही नही हो पाता है।
 आपको पहले भी बताया था कि किसी बाहरी क्रिया से  या किसी अन्य उपाय की सहायता लेने की कोई आवश्यकता ही नही है। मन का स्वभाव है कि जिसका भी आप चिन्तन करंेगें, उसी के अनरूप यह ढल जाएगा। यह जो बाह्य क्रियाओ का सहारा लिया जाता है। उनसे शुरु-शुरु में तो सहायता मिलती है। फिर मन उन्हीं का दासत्व ले लेता है। जब तक पूजा रही ध्यान रहा, मन एकाग्र हुआ, उठते ही फिर वही विचार आ गए। मन भटकने लगा। लोगों को देखा है, चेहरा खिंचा- खिंचा रहता है। कहते है, ध्यान लगाकर आये है, उसमें भी इतनी कठिनाई, इतना कष्ट, यह तो विश्राम के लिए था? पूछो उनसे।
शांत होना कोई कष्टकारी साधना नहीं है। नहीं शरीर को कष्ट देना आवश्यक है। एक परिपाटी चल गई है। आप करते रहो इससे मन जो शक्तिशाली है। वह शक्तिहीन हो जाता है। जड़ बना देता है। इसका कोई मूल्य नहीं है।
अब आप विचार करें, मन किन-किन विचारों में रहता है। आपने ही बताया है, भय है, लोभ है।
रात- दिन आप किसी भी प्रकार से धन आ जाए, इस चिन्तन में डूबे रहते हैं। हर व्यक्ति , हर परिवार, समाज लोभ की दिशा में ही दौड़ रहा है, कहने को त्याग की बातें होती हैं, पर जो त्यागी है, उनसे बड़ा लोभी कोई नही है। नाम वे परमात्मा का लेते है, ईश्वर चर्चा की बातें करते हैं। पर गृहस्थ से भी अधिक उन्हें धन व यश की चिन्ता रहती है। साधन सुविधा की उन्हें अधिक तलाश है। उनके रहने के तरीके देखो। आज आश्रम भी होटलों की तरह हो गए हैं।
साधु, महात्मा, मैनेजर बन गए हैं ज्ञान वार्ता करेगें, ग्रन्थ सुना देगें, मीठी- मीठी लोभ लुभावनी बाते करंेगे, पर उनकी दृष्टि साधारण जनता की जेब पर रहती है।
 
आज सारा समाज इसी प्रदूषण से युक्त हो गया है। चित्त ही प्रदूषित है। चेहरा देखो, वहाँ से लोभ ही झांकता है। धन का लोभ हटता हैतो  प्रशंसा का लोभ पैदा हो जाता हैं लोभ और प्रशंसा में दो ही नावें हैं, जिन पर सवार होकर संसार सागर में लोग यात्रा करते हैं।
और यही कारण है कि लोभी को जो भी प्राप्त है, उसके छिन जाने का भय हमेशा रहता है।
धन संग्रह किया है, उसे चोर- डाकू नही ले जाएं, यही भय है। समाज में प्रतिष्ठा बनाई है, वह छिन न जाए, पद से जो सम्मान- सुविधा प्राप्त है, वह छिन न पाए उसी का भय है।
जब हमारी प्रसन्नता दूसरे पर निर्भर हो जाती है, तब हमारे भीतर भय और लोभ उत्पन्न होता है।
गीता में कहा गया है, जो व्यक्ति दुःख मंे अनुद्विग्न  है, सुख में जिसकी लालसा नहीं है, वही रागसे, भय से, क्रोध से परे जा सकता है।
दूसरा ही दुःख का कारण है, वही सुख का कारण है,  प्रीति जब कम होने लगती है, तब दूसरे पर आश्रित होने का भाव हटने लगता है।
यहीं पर वर्त्तमान में रहना प्राप्त होता है।
ऐसा क्यो होता है, उस पर विचार करो।
हमारी संसार पर उसके क्रिया कलापों पर ममता है। मैने कभी भी छोड़ने को नहीं कहा।  छूट जाना ही सार है, यह ममता हमारी बढ़ती जाती है। संतान के प्रति हममें कर्तव्य परायणता का भाव नहीं होकर ममता का भाव रहता है। ममता में आसक्ति होती है। वह पूरी नही होने पर, दूसरे के द्वारा आपके राग की पूर्ति नहीं होने पर आपको क्रोध आता है। निरंतर दूसरों का चिन्तन, और उसका या उसके द्वारा अहित न हो जाए यही कल्पना आपको भयभीत करती रहती है।
जब आप ईश्वर को मानते हैं, कर्मफल को मानते है, गुरु को मानते हैं, तो कहीं पर तो आपको विश्वास होना चाहिए। आपको न अपने ऊपर विश्वास है, न किसी और पर। यही  परंपरा  आप बच्चों को सौंप जाते हैं।
आपको एक कहानी उस फकीर की सुनाई थी।
वह दिन भर मेहनत मजदूरी करता था। सुबह उठता किसी भी दरवाजे पर खड़ा होकर काम मांगता। काम मिलने पर काम मिला है, पूरे मन से उसे करता, बदले में बस भोजन लेता रात को मस्जिद में जाकर सो जाता ।
े। एक रात वहॉं फरिश्ता आया, वह लालटेन की रोशनी में कुछ लिख रहा था
फकीर ने पूछा, ”क्या कर रहे हो?“
उसने कहा, ”जो परमात्मा को प्यार करते है, उनका नाम लिख रहा हूँ।“
”उसने अपना नाम बताया पूछा, मेरा नाम तो नही है?“
फरिश्ते ने सूची पढ़ी, बोला, ”तुम्हारा नाम तो नही है।“
वह कुछ देर उदास रहा, फिर जाकर अपनी जगह सो गया।
कुछ दिनों बाद उसने देखा फिर फरिश्ता आया और सूची बना रहा है। वह उधर गया, बोला, ”अब क्या कर रहे हो?“
उसने कहा, ”सूची बना रहूँ।“
‘किसकी’
”जिन्हें अल्लाह प्यार करता है।“
वह मुड़ गया, बोला, ”इसमें मेरा नाम तो नही होगा!“
‘उसने कहा - ”अपना नाम तो बताओ।“
उसने नाम बताया।
उसने सूची पढ़ी, बोला, ”तुम्हारा नाम तो सबसे ऊपर है।“
कहानी, कहानी होती है। पर उसका अभिप्राय होता है। हम जहाँ भी विश्वास करें, वहीं विश्वास पूरा होना चाहिए।
हमारे पास दो ही बातंे हैं।
पहली बुद्धि चातुर्य है, हम उसके ही सहारे चलते हैं। जहाँ से दो पैसे का लाभ मिले, वही काम करना अपना उद्देश्य हो गया है। हम गलत को सही, सही को गलत अपनी अक्ल से ठहराते आए हैं।जो सही है, उसकी पहचान सभी को हैं। सही की आवाज हमारे भीतर से आती है, पर हम उसे नही सुनते हैं वही आवाज विवेक की है। परमात्मा ने हर प्राणी को विवेक सोंपा हैं पर वह उसका आदर नही करता है, हर गलत कार्य को सही ठहराने का प्रयास करता है।
अपना आचरण  कोई नही देखता। अपना खुद का आचरण देखो। कितना आपने सही किया है, गलत किया है। यह व्यक्ति को खुद पता है।यह जो चित्त है, दर्पण की तरह है।यहॉं भुक्त,अभुक्त वासनाओं का प्रभाव अंकित रहता है। पर हम उसे दबा कर रखते हैं। बाहर आते ही उपद्रव खड़े होने की आशंका बनी रहती है।
ध्यान इस संग्रह के दबाव का कम होते जाना है।
 आप चाहते हैं, शंाति, आप चाहते हैं अभय और आपने अब तक विवेक विरोधी कार्य ही तो किया है।
जो आपके पास किसी आशा से आया था, आपने उसका कार्य किया अथवा नहीं यह महत्च पूर्ण नहीं है, पर आपने उसके साथ गलत भाषा का प्रयोग किया झूठा आश्वासन दिया, क्या यह विवेक का अनादर नहीं है?
सच बोलने में आपका क्या जाता , पर आपको लगता है, आपका मान सम्मान घट जाएगा, प्रलोभन से भी काम करना विवेक विरोधी ही है, पर उसे कौन मानता है?
आज समाचार पत्र, ज्योतिषियों, वास्तुविदों  के लेखों से भरे होते है। तंात्रिक उपचार भी बताते हैं कोई उनसे पूछे हजार-पांच सौसालपहले   इन्ही ग्रन्थों की , और इन्ही लोगों की ,राजाओं के राज में भरमार थी.... क्या वे बच पाए, इतनी गुलामी और इतना अत्याचार समाज ने भोगा, इनसे कोई लाभ होने वाला नही है। इनकी फालतू बाते मनोरंजन के लिए हैं। इनसे अधिक इनका कोई मूल्य नही है।
जब तक मनुष्य अपने विवेक का अनादर करता रहेगा, वह भय और प्रलोभन से युक्त होकर कार्य करेगा, उसके जीवन में अभय और शांति नही रहेगी।
यहॉं संसार में सभी वस्तुएं सदुपयोग के लिए प्राप्त हैं ये जीवन के लिए अनिवार्य है। परन्तु उसमें लालसा नही रखनी है। मैं, धोती में छेद होते ही उसे हटा देता हूॅं। एक धोती के दो टुकड़े हैं, दो कुर्ते बस। यह एक झोला है,जब इतने कम सामान में मेरा काम चल जाता है, तब आपने मुझे देखकर क्या समझा? हम अपनी आवश्यकताओं को  अनावश्यक रूप से बढ़ाते चले जा रहे है। हमारी जरुरतों को प्रकृति हमेशा पूरा करती है। परन्तु हम अपनी आवश्यकताओं को बढ़ाते ही  चले जा रहे हैं। क्या चाहते हैं, हमें भी नही पता है? वस्तुओं के संग्रह में सुख नही है। सुख तो वस्तु के उपभोग व उपयोग में है। यह हमेशा ध्यान रखना चाहिए।
परन्तु यही नही होता है।
हम जिसे मानते हैं, उस पर हमारा विश्वास नही है और जो जानते हैं, वह हमारा व्यवहार नहीं है। जब हम अपने जीवन में विवेक का आदर करते हैं। तब हमारा विश्वास भी, वस्तुओं से, इनके प्रभाव से, हटनेलग जाता है। विश्वास एक बार आने के बाद जाता नहीं है, विकल्प रहित विश्वास जब अपने भीतर घना होने लगता है,  तब वहाँ भय नही रहता।
जो होना है, वह तो होगा ही, प्राकृतिक विधान से होना निर्धारित है, व्यक्ति तो मात्र दृष्टा है, देख रहा है, उसके शरीर के द्वारा मन के द्वारा जो भोगा जाना है, वह उसके लिए तैयार रहता है।
आपको कंवर लाल की लड़की की शादी के बारे में बताया था। वह आया था, उसने कार्ड दिया ।
पूछा तो बताया, कुछ हजार रुपयों की जरुरत होगी।
मैने संकल्प लिया आज से जो भी भेंट आएगी, उसमें जो रुपये आएंगें, सब उसे दे दंूगा। तब सो पचास रोज आ पाते थे। उसी रात सपना आया मैं जा रहा हूँ, रास्ते में कुतिया आई, उसने मेरा पांव काट लिया, मैं लहूलुहान हो गया हूँ।
सुबह उठा, मैं समझ गया, संकेत मिला है। पर मेरा संकल्प था, सहायता करनी है, जो होगा देखा जाएगा।
अगले ही दिन से भेंट पूजा ही कम हो गई। जो सौ-पचास 3पये भेंट देते थ,े उन्होंने आना बन्द कर दिया।
बड़ी मुश्किल से कुछ हजार हो पाए। तभी पास से कथा का बुलावा आया। वो जो कभी इधर नहीं आता था, वह आया। मैने सोचा वहां से कुछ मिलेगा, उससे कमी पूरी हो जाएगी।
उस रात फिर वही सपना आया।
सुबह मै उठा, तैयार हुआ,उससे कहा था, कथा समाप्त होते- होते मैं पहुँच जाऊंगाा। पैदल- पैदल गांव गया। दूर, उधर खेतों से लाउड स्पीकर की आवाज आ रही थी। मैं पगडंडी पर जा रहा था। वहाँ कथा हो रही थी, वहाँ पहुँचने वाला था कि अचानक कहीं से काली कुतिया निकली। उसने मेरे टखने पर दांत गड़ा दिए। मै खून से नहा गया। मैने वहीं धोती फाड़ी पट्टी बांधी। खून आना बंद हो गया। मैं चारपाई पर आकर लेट गया। वहीं खाना खाया। जितना लेता हूँ, उतना लिया। फिर थाली नीचे रख दी। वही कुतिया वहीं आकर नीचे चारपाई के नीचे बैठ गई। ये लैैटते समय लोग मोटर साइकिल लाए। मैने मना किया पैदल ही आ गया। बाद मै बकानी वाले डॉक्टर को लेकर आए। ड्रेसिंग तो मैने करवाली, पर इंजेक्शन नही लगाए।
.. यह घटना क्यों बताई,सोचो।
हर घटना का अभिप्राय होता है।
बाद में कंवर लाल से पूछा रुपयों का क्या हुआ?
उसने बताया, शादी तो अच्छी होगयी, पर रुपये उसका कोई परिजन ले गया।
विश्वास स्वयं के प्रति होना चाहिए। हमारा कार्य विवेक जन्य हो। कठिनाई तो आयगी, तो हम उसे भोगेंगे, भागंेगें नहीं। वहीं आत्म विश्वास पैदा होता है। कोई भी परिस्थिति है, वह स्थायी नहीं है।
आज है कल नहीं रहेगी।
..यहाँ तो सब परिवर्तनशील है।
हमारी प्रसन्नता दूसरे पर आश्रित नहीं है। हम पर ही है। तब सारा झुकाव बदल जाता है। जागृति में जब आनावश्यक विचारणा का प्रवाह रुक जाता है। हम अधिक से अधिक क्रिया के साथ रहने लग जाते है, तब हम स्वतः ही हम शांत अवस्था में रहने लग जाते हैं।
इस अवस्था में रहने के बाद, अनावश्यक संकल्प विकल्पों के उठने की जो प्रक्रिया है, वह रुक जाती है। आवश्यक संकल्प स्वतः ही पूरे होने लग जाते है। अंतः प्रेरणा सजग हो जाती है।


     





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