Saturday, December 3, 2011

ब्रह्मलीन पूज्य स्वामी श्री रामेश्वराश्रम जी महाराज

ब्रह्मलीन पूज्य स्वामी श्री रामेश्वराश्रम जी महाराज दिनांक 26 फरवरी, 2000 को संक्षिप्त बीमारी के बाद 89 वर्ष की अवस्था में महानिर्वाण को प्राप्त हो गये। 28 जनवरी, 1911 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में रेडी गांव में आपका जन्म हुआ था। बचपन से सतत् आत्मानुंसधान में आप लगे रहे। सन् 1952 में आपने राजस्थान के सुदूर बकानी ग्राम में ‘गुरुकुल’ की स्थापना की थी। लगभग 25 वर्ष तक संन्यास लेने के बाद भी आप स्वतः शिक्षा कार्य में लगे रहे। सन् 1972 में संस्था को सरकार को सौंप दिया, आज जहां माध्यमिक विद्यालय कार्यरत है। निरंतर चिंतनरत स्वामी जी ‘सहज साधना’ का अमृत संदेश साधारण जन तक पहुंचाते रहे। न तो विधिवत कोई आश्रम वहां था न ही कहीं विशिष्ट परंपरा के निर्वाह की प्रक्रिया थी, एक साधारण सी कुटिया, और झोले के साथ स्वामीजी अंचल के सामान्य अकिंचन घर तक आध्यात्मिक का संदेश देते रहे। न अमीर न गरीब किसी प्रकार का कोई भेद वहां नहीं था। सभी के लिए कुटिया का द्वार सदा खुला रहता था। अपनी अद्भुत आध्यात्मिक शक्ति सम्पदा के बावजूद स्वामी सरल व सहज ही रहें। आपके निरन्तर सान्निध्य में कुछ प्रसन्न उभरते रहे,यह पहली पुस्तक पहली बार सन ्1975 में प्रकाशित हुई थी। यह पुस्तक तब सभी का आकर्षण का केन्द्र बन गई थी। कई वर्षों से अप्राप्त भी थी।

Tuesday, November 29, 2011

श्री सत्‍यि‍मृानंदजी गु:कुल में

 
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जगन्‍नाथजी ओझा,पार्वती बहन

 
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गु:कुल में सत्‍यि‍मृानंद जी

 
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गु/कुल में नरेन्‍द्र नाथ

 
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साधना क्रम

साधना क्रम पहला कदम:- जरूरी नहीं कि एक दिन एक ही क्षण में चमत्कार हो जाये। योग मार्ग पीपिलिका मार्ग है। चींटी का मार्ग, जिस प्रकार मधु की तलाश में अनवरत लगी हुयी वह दुर्गम से दुर्गम जगह पहुंच जाती है, वही भाव साधक के मन में होना चाहिए। कम से कम दो बार तो कुछ समय हमें अपने अभ्यास के लिए देना चाहिए। सोते समय और सुबह नींद खुलते समय। बैठ नहीं सके तो लेटे ही रहे। देखे मन क्या कर रहा, सतर्कता से आंतरिक विचारणा का अवलोकन करंे न जाने कितने विचार आ रहे हैं, पर आप तो विश्राम मे है और मन दोपहरी में गया, इस कल से उस कल में गया समझाइये अभी तो विश्राम मे हूं। मन को वर्तमान में लाइए। यही प्रयत्न है, शुरू- शुरू मंे मन नहीं मानेगा फिर ज्यों ज्यों अभ्यास बढ़ता जाएगा वह नियंत्रित होता चला जाएगा। साधक कहेंगे, इससे तुरन्त नींद आ जाती है। नींद आती है तो आने दीजिये यह बाधक नही है। सुबह उठते ही इस अभ्यास को दोहराइये। आंतरिक विचारणा का अवलोकन कीजिए। मन जो वांछा कर रहा है। उसे देखिए। बिना किसी पूर्वाग्रह के ओर रूपांतर की कामना छोड़िए। जो है उसी रूप में कुछ क्षण देखने का प्रयास कीजिये। मन ही मन की निगरानी कर जब थक जाती हो तो अशांति स्वतः कम होने लगती है। एक गहरी शांति का यह अनुभव ही सार्थक उपासना है। दूसरा कदम:- ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों का गहरा संबंध है। मन इसी कारण से भोगों में लिप्त रहता है। ध्यान के लिए यही श्रेष्ठ है कि किसी बाह्य नाम रूप पर मन को स्थिर करने के स्थान पर आंतरिक ब्रह्मनाद पर ही मन को स्थिर किया जाये। मन जब ठहरता है, तब अन्र्तजगत से आती हुई ये ध्वनियां साधक को सुनाई देती है। संतो ने इनके कई रूप बतलाए हैं ज्यों ज्यों मन ठहरता जाता है, ‘यह नाद’ एक स्पष्ट अनवरत सायरन की आवाज सा शेष रह जाता है। साधक को चाहिए कि वह कहीं भी रहे कुछ भी करता रहे मन यहीं लगा रहना चाहिए। श्रवण और वाणी का गहरा संबंध है। इसीलिए साधन यात्रा मे जिस कर्मेन्द्रिय पर सबसे अधिक ध्यान देना चाहिए वह वाणी ही है। तीसरा कदम:- साधन पथ पर सबसे अधिक फिसलने वाली चीज जीभ है। स्वाद की परिधि मे भी तथा वाचालता की परिधि में भी। सभी इन्द्रियों का दमन सरल है। पर इस रसना का नियंत्रण कठिन ही है। क्योंकि इसके दो कार्य हैं, जब वह बाहर आती है तब शब्दों से खिलवाड़ करती है, दोष दर्शन में लग जाती है। पर निंदा या चाटुकारी साथ ही स्वाद के लिए मन को इधर उधर दौड़ाए रखती है। जब यह एक साथ दो काम करती है तब उसका दुरूपयोग घातक ही है। नाद श्रवण पर मन की एकाग्रता से वाक संयम सरलता से बढ़ जाता है। क्योंकि श्रवण और वाक का गहरा संबंध है। जो गूंगा होता है वह बहरा भी होता है। फिर भी साधक को चाहिए, वह इसके नियन्त्रण पर ध्यान दंे। गपशप अस्थिर मन का परिचायक है। जब हम अपने आपसे बचना चाहते है तभी दूसरों को अपने सामने उपस्थित करते है। जब तक दोष दर्शन और पर निंदा उवाच जारी है हम अपने भीतर की सीढ़ियों पर उतर नही सकते। दूसरों के बारे में जानने की यह जिज्ञासा हमें आत्मानुसंधान से रोक देती है। जितना हम बाहर भटकते हैं उतनी ही हमारी आंतरिकता हमसे दूर होती चली जाती है। बाहर जो कुछ है, परिवर्तनशील है, उत्तेजनात्मक है और यह उत्तेजना मन को अस्थिरता ही प्रदान करती है। इसीलिए संयम अगर करना है तो वाक-संयम की करना है। अंत में:- इस यात्रा का प्रारम्भ ही एकाग्रता से होता है। अशुभ संकल्प जैसे जैसे मन वर्तमान मे रहना शुरू करता है, दूर होने लग जाते है। स्मृतियों से असहयोग तथा जीवेषणा की पहचान ही साधक को सही समझ सौंपती है। अशुद्व और अनचाहे संकल्पों के परित्याग से आवश्यक संकल्पों की पूर्ति अपने आप होने लगती है। यह वह स्थिति है जब सक्रियता अचानक बढ़ जाती है। साधक पाता है कि उसके भीतर असाधारण शक्ति आ गई है। वह जिस किसी भी कार्य को करना चाहता है, वह पूर्ण ही होता है। प्रमाद जो कल तक संगी था कहीं दूर चला गया है। साथ ही अशुद्व संकल्प जो पर निंदा तथा पर अहित मे थे, उनके जाते ही मनोनिग्रह हो जाता है। साधक निर्दोष होने के लिए प्रयत्नशील है। कर्तव्य परायणता बढ़ती है। उसमें स्वतः ही उदारता, मुद्रिता, प्रेम प्रकट होता है। प्रेम आंतरिक है। साधक पाता है कि उसका ह्नदय अब तक जो अनावश्यक विचारों के बोझ से, तनाव से भरा हुआ था। खाली हो गया है। वह गहरी शांति का अनुभव करता है। साथ ही जगत के प्रति जो संबंध थे। वे भी बदल रहे है। साधन यात्रा की पहली पहचान आचरण परिवर्तन है। आचरण में त्याग और सेवा की भावना बढ़ती है। वह कर्तव्य कर्म से जुड़ता है। कर्तव्य कर्म से जुड़ते ही अनावश्यक संकल्प जो भूत और भविष्य में घूमते रहते हैं, स्वतः ही कम होने लगते है। व्यर्थ ही जो समय जा रहा था, वह उपयोगी होने लगता है , वहीं पर साधक में परिवर्तन आता है। उसकी संकल्प शक्ति बढ़ जाती है। उसकी आंतरिकता घनी होते ही उसमें कलात्मकता आ जाती है।पर यह ध्यान नहीं है,यह एक प्रक्रिया है,निर्विचारता ही ध्यान है,वहीं परमात्मा है।ज्ञानी को परम ज्ञान की प्राप्ती के बाद रहना इसी संसार में है।‘ गीता ’ का संदेश गलत ही लिया गया है,पूज्य स्वामीजी कहा करते थे भगवान कृष्ण को संन्यासधर्म का ही उपदेश देना होता तो वे मिालय पर जाकर देते ,अर्जुन को सन्यासी बना देते।परन्तु उन्होंने यु( क्षेत्र चुना हैऔर यही कहा है ‘सब परिस्थितियों में ,सब कालों में निरंतर वत्र्तमान में रहते हुए कर्म रत रहो।’ हम जब निरंतर विचारणा के दबाब में रहते हैतब हम अपने आप से दूर ‘राक्षस’ तक बन जाते हैं। वत्र्तमान में रहने की उपसंपदा जब हमें प्राप्त होती है तब हम ईश्वरीय शक्तियों के अपने भीतरप्रकट होने का मार्ग प्रशस्त करते जाते हैं ।यहीं आकर हमें आत्म कृपा प्राप्त होती है। हां,व्यक्तित्व का रूपान्तरण संभव है।हम अति मानसिक चेतना को अपने भीतर प्रकट होने में सहायक हो सकते हैं।जितना हम वत्र्तमान में रहने में संलग्न होंगे,उतना ही अधिक सुख ,शांति का हम अनुभव तो करेंगे ही हमारी सृजनातमकता भी बढ़ती जाएगी। इसीलिए आज से प्रयास करें। जो जाना गया है उसका आदर करना सीखें।इससे विवेक की प्राप्ति होती है।जो माना गया है ,उस पर विश्वास लाएं।इससे आत्मविश्वास घना होता है।जो हमने कहा है,जो हमने किया है,उस पर हमारा विश्वास होना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है ,हम जहां भी हों,जो भी कार्य कर रहे हों, मन अध्ीिक से अधिक से वहीं रहना चाहिए, किंचित मात्र भी विपरीत नहीं जाने देना चाहिए। ओर भी आगे अगर साधन यात्रा निरन्तर गतिशील रहे तो साधक पाता है ज्यों ज्यों संकल्पों की संख्या कम होती जाती है, संकल्प निवृत्ति से प्राप्त शांति सघन हो जाती है।सघन प्रशांत मन वह पाता है। जो छूटना था वह स्वतः छूटता जा रहा है। जो पाना था। वह स्वतः प्राप्त हो रहा है। ”जो“ है, स्वरूप की प्राप्ति उसकी अभिन्नता है। इस बारे मे कुछ कहा नहीं जा सकता। यह अनुभव का जगत है। अनुभव जब विचारणा के क्षेत्र में आता है तब भाषा भी उसे प्रकट करने मे असमर्थता पाती है। जहां मात्र अनुभवन है वहां फिर प्रकट करने की आकांक्षा ही नही है।यहां सचमुच ही स्वयं की अंत्रनिहित शक्तियों का जागरण तो होता ही है,अपने जीवन के उद्देश्य की प्राप्ति होती है,इससे जहंा आत्मविश्वास घना होता है,वहीं जीवन में सुख और शांति की प्राप्ति होती है। यह हर साधक का अधिकार है। स्वतंत्रता हर साधक का जन्म सिद्व अधिकार है। वह यहां आकर स्वाधीनता प्राप्त करता है।साधन यात्रा प्रयोगात्मक है। एक गहरा प्रयोग। अनवरत है। यहां प्रारम्भ तो दिखता है पर अंत नहीं। इसीलिए अनन्त धैर्य ओर अगाध जिज्ञासा का होना ही साधक के लिए पहली आवश्यकता है।

Monday, November 28, 2011

सेवा प्रि‍तष्‍ठान अध्‍यक्ष मुकेश भाई पटेल

 
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सत्‍संग का एक ि‍दन

 
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गु:कुल में पूजा का एक ि‍दन

 
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नरेन्‍द्रनाथ गु:कुल में

 
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गु:कुल में स्‍वामीजी की पूजा के समय

 
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गु:कुल में नारायणि‍संह जी सांसद राजगढ्

 
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गु:कुल के कार्यक्रम मे ि‍दव्‍यानंद जी शंकराचार्य भानपुरा

 
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गुरूकुल में मोहन जोशी

 
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गंरूकुल में

 
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साधन क्रम

साधन क्रम साधन पथ रूपी त्रिभुज को अभ्यास, सत्संग और स्वाध्याय ये तीन भुजाएं है। जो साधन यात्रा की संपूर्णता देती है। स्वाध्याय सत्संग के लिए प्रेरित करता है और सत्संग अभ्यास के लिए तभी साधक संपूर्णता पाता है। यह शास्त्रानुसार प्रदर्शित मार्ग है। स्वाध्याय स्वाध्याय ही सामान्य व्यक्ति को साधन पथ सौंपता है। स्वाध्याय जीवन में नियमित रहना चाहिए। मन की स्थिरता के लिए और पथ की तलाश के लिए आवश्यक है कि सद्ग्रन्थों का नियमित अययन होता रहे। स्वाध्याय - स्व का अध्ययन है। यह हमें आत्मनिरीक्षण की ओर ले जाताहै। इसलिए स्वाध्याय का अर्थ मात्र शास्त्र अध्ययन से नही है। अगर जीवन में सद्गुरू प्राप्त न हो तो, साधन यात्रा में सद्ग्रन्थों को ही सद्गुरू मान कर उनके आधार पर साधन की समस्याओं को हल करना चाहिए। वैसे सद्गुरू के द्वारा बताए गए सद्ग्रन्थ ही उपयोगी होते है। वे रोगी के रोग को देखकर ही दवा देते है। अन्यथा पुस्तकालय तो दवाई की दुकानों की तरह होता है। ग्रन्थों को समझ के लिए भी पर्याप्त समझ चाहिए। अंधों के लिए जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश व्यर्थ है उसी प्रकार सद्ग्रन्थों का अध्ययन विवेक के प्रकाश में ही होता है। अतः साधको को चाहिए कि गुरू आज्ञा से ही वह स्वाध्याय मे रत रहे। ये ग्रन्थ मनोरंजन के लिए नही है। साधन ग्रन्थ पहले सद्गुरू दिया करते थे। अब छापे खाने हो गये है। सभी तरह के ग्रन्थ उपलब्ध है। अतः अनर्थ अधिक हो गया है। साधन सूत्र यहां रूपक कथाओं में हैं।प्राप्त विवेक का आदर हमारे व्यवहार को बदलने में सहायक होता है। जो सही है, और सही पथ पर चलने के लिए प्रेरित करता है ,वही विवेक है। सत्संग - सत्संग और सद्चर्चा मे अंतर है। असत का त्याग होने पर सत्संग अपने आप हो जाता है। प्रायः सत्संग के नाम पर जब हम एकत्रित होते हैं, गपशप ही अधिक करते है। बातें करते हैं। कहा करते हैं हम सत्संग में गए थे। जब तक भीतर से परिवर्तन न हो, और आप खुद न करना चाहे, सत्संग आप नहीं कर सकते। अभ्यास और सत्संग विवेक के ही दो पहलू है। अभ्यास ही सत्संग है और सत्संग ही अभ्यास है। इसीलिए जहां तक हो सके सद्चर्चाओं के स्थान पर सत्संग ही किया जाना चाहिए। आत्मनिरीक्षण ही व्यक्तिगत सत्संग है। यहां साधक को ”जो है“ साक्षात्कार, अनुभवन का अभ्यास करना है। परन्तु साधक को आंतरिक गहरे मौन में स्मृतियां पास नही रहने देती। मूक सत्संग में सबसे बड़ी बाधा यही है।इन स्मृतियों के असहयोग से संबंध विच्छेद से इनसे बचा जा सकता है। संबंध समाप्त होते ही इनकी सत्ता समाप्त हो जाती है। फिर इनका प्रभाव नहीं पड़ता है। परन्तु यह होना सहज और सरल नही है। जब साधक अपने एकांत सत्संग मे प्रवेश करने मे पने आपको असफल समझता है। तब उसे चाहिए कि उन कुछ लोगों को जिन्हें साधन में रूचि है। समान भाव है। उसे साथ बैठना चाहिए। यह सामूहिक अभ्यास भी लाभकारी है। परन्तु यहां पर दोष चिंतन के स्थान पर निज के दोषों की चर्चा करनी चाहिए। उन्हें दूर करने के उपाय तलाश करने चाहिए। सत्संग का अर्थ भजन कीर्तन नही है। न ही शास्त्र श्रवण है। परन्तु बहुत गहरे में अपने ”सत“ से युक्त होना है। इस तकनीक को जिसने समझा है वही साधन यात्रा का लाभ ले पाया है। क्यांेकि यात्रा में कई पड़ाव आते है। कोई साधक आगे, कोई साधक पीछे रहता है। कई समस्याएं सभी को एक जैसी पार करनी पड़ती है। जहां पर भी जिस साधक ने अपनी समस्याओं को जिस प्रकार दूर किया है, समाधान जानना लाभकारी रहता है। साधन यात्रा अनवरत प्रयोग है। जब तक परिणाम प्राप्त न हो तब तक प्रयोग नही छूटता है। अतः सत्संग को श्रेष्ठ साधन समझकर ग्रहण करना चाहिए। इस जीवन मे कभी कभी ऐसा होता है जो सत है, जो जीवन मुक्त है, उनकी कृपा दृष्टि भी हो जाती है। यदि साधक स्वयं अपनी जिज्ञासाओं के समाधान मे असफलता पा रहा है, उसे कुछ पूछना शेष रह गया हो, जानना शेष रह गया हो। वह पाता है कि उसके विक्षोभ को वह दूर नही कर पा रहा है बैचेनी है। तो फिर किसी सद्गुरू की शरण में जाना चाहिए। सद्गुरू की पहले खूब जांच पड़ताल रखनी चाहिए। बुद्वि लाभ, लोभ की दासी अवश्य है, पर वह बारीकी से जांच पड़ताल करने मे समर्थ है। जिसमेंअपने जानते हुए किसी प्रकार का दोष नहीं दिखता हो। जिसके सम्मुख अंहकार झुकना चाहता हो। क्योंकि मन का स्वभाव यही है कि वह अपने से बड़े के सम्मुख श्रेष्ठ के सम्मुख स्वतः ही झुक जाता है। यह समर्पण जो है, अस्वाभाविक नही है। यहां सम्मुख होते ही शांति की लहरों में साधक अपने आप को पाता है। शांत सरोवर जिस प्रकार अपने संसर्ग से चित्त की बैचेनी दूर कर देता है उसी प्रकार संतो के प्रेमिल चित्त साधक के मन में प्रेम की धाराएं उत्पन्ना कर देते है। यह उनके संसर्ग का ही परिणाम है कि अपने भीतर गहरी शांति अनुभव करता है। परन्तु यह ध्यान रहे, यहां तर्क नहीं, शंका नहीं। वरण का अधिकार एक बार का ही है। पर होता विपरीत है। साधक की सद्गुरू के प्रति श्रद्र्वा नहीं होती। वह वहां भी सांसारिक लाभ के लिए जाता है। व्यर्थ की चर्चाएं करता है। साथ ही वह जैसे कपड़े बदलता है, वैसे ही वह गुरू बदल लेता है। परिणाम यह रहता है कि वह लाभ नहींले पाता है। उसके भीतर परिवर्तन नही आता है। सद्गुरू मनोरंजन नहीं करते। वे अनुभव के स्त्रोत है। साधक के अनुभवन को जागृत करते हैं, पर आवश्यक है कि उनके परामर्श पर अमल किया जाए। अभ्यास:- संसार से अपने आप को हटा लेना अभ्यास नहीं है।अपने आप से संसार को हटा लेना ही अभ्यास है। यह सब एक ही दिन एक ही क्षण में तो नहीं होने वाला है, परन्तु निरन्तर अभ्यास से ही इसे पा अवश्य सकते है। संसार संकल्प रूप ही है। इच्छा कि उत्पत्ति ही दुख है। उसकी पूर्ति सुख है, और इच्छाएं अनन्त है,अतः हर इच्छा की पूर्ति असंभव ही है। परिणामतः दुख ही दुख है। अतः इच्छा की निवृत्ति ही आनन्द है। यही पूर्णता मिलती है। संसार की सहायता से पूर्णता नहीं मिलती है। यह संसार हर क्षण और अभाव बढ़ा सकता है। गरीबी दे सकता है। और जो अभाव में है उसका चित्त कभी शांत नहीं हो सकता। मन अपने आप में ,अपने आप से हच्छा की पूर्ति नहीं कर सकता है,उसे इसके लिए इन्द्रियों की सहायता चाहिए।जब हम नाद सुनते हैं तो हमारी बाह्य श्रवणेन्द्रिय इसे नहीं सुनती है,पर हम सुनते हैं इसी तरह हम सोते हैं ,पर स्वप्न में तीव्र प्रकाश देखते हैं।यह हमारी अन्तेन्द्रिय करती है।पर मन अपने आप में इतना शक्तिशाली नहीं है कि वह बिना इन्द्रियों के भोग कर सके। इन्द्रिय भोग से मन पर जो प्रभाव बनता है ,वह सुखात्मक और दुखात्मक दोनों ही प्रकार का होता है।इसीलिए वृत्ति के उठते ही अगर सतर्कता रहे तो हम दुख के प्रभाव को कम कर सकते हैं।निरंतर वत्र्तमान में रहने का जब अभ्यास बढ़ने लगता है तो वृत्ति के उठते ही हम यह जान जाते हैं कि यह संकल्प सहज और स्वाभाविक है, हमारे सामथ्र्य के अनुकूल है,हम इसे बिना किसी प्रलोभन या किसी अन्य के अनुकरण के अभाव में ,अपने बल के आधार पर कर सकते हैं,और हमने पूरा प्रयास किया है तब प्राकृतिक विधान से जो भी फल प्राप्त होगा,वह हमें सुख भी देगा और शांति भी देगा। साधक को चाहिए कि वह क्षण को जो उनके सामने उपस्थित है, सार्थकता प्रदान करे। यह सार्थकता उस क्षण को अनुभव में बदल कर हम पा सकते हैं अनुभव के लिए वर्तमान मे रहना होगा। आगे पीछे भटकना, मन का भूत और भविष्य में हो रहा संक्रमण हमें रोकना चाहिए। यह भटकाव हमारी शक्तियों को विघटित करता है। मन जितना अतीत और भविष्य के भटकाव से पृथक होगा, उतनी ही वह सार्थकता प्राप्त कर सकेगा। भगवत कर्म से युक्त होने का यही सार्थक प्रयत्न है।मन जितना वत्र्तमान में है उतना ही वह ईश्वर के नजदीक है।मात्र राम-राम रटने से ,छाप तिलक लगाने से,ईश्वर के नाम का प्रदर्शन ही होसकता है। इसीलिए जिन चीजों को अपने अंदर रख रखा है, उन्हें धीरे धीरे हटाते चले जाना ही यहां अभ्यास है। मन संकल्प रूप है, उसकी अशुद्वि दो प्रकार की है। एक तो वह चंचल है, दूसरा वह मलिन है। मलिनता और चंचलता, स्थिरतापाते ही दूर होती है। जितनी अधिक स्थिरता प्राप्त हो जाएगी, विवेक के स्पर्श से मलिनता भी दूर हो जाएगी, और कर्म, भगवत कर्म में रूपांतरित होता चला जाएगा। इसीलिए साधक के लिए आवश्यक है, वह आत्मनिरीक्षण की ओर बढ़े। आत्म निरीक्षण यहां आत्मनिरीक्षण ही साधन है। साधक को चाहिए कि वह अपनी आंतरिकता में विचरण करे। मनोजगत मे पेठ करे।विचार ही राक्षस हैं।वाणी के आधार पर विचार मूत्र्तता पाते हैं। आप जो सोचते हैं,वही बोलते हैं।अपने आपको सोचते हुए कभी तटस्थता से अपने आपको देखें तो आप पाएंगे आपका असली स्वरूप यही है।आप जब स्वप्न में आप अपने आपको देखते हैं तो जो आप वत्र्तमान में नहीं कर पाए,नहीं सोच पाए ,यह सिलसिला वहां भी शुरू हो जाता है।स्वप्न भी उतने ही अधिक सच होते हैं जितनी यह व्यवहारिक दुनिया।हां जब आप वत्र्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ाते हैं तो इस विचारणा पर भी प्रभाव पड़ता है। विचारो की संख्या कम होने से विकार भी कम होने लग जाते हें,फिर स्वप्न भी कम आने लगते हैं।अवलोकन के माध्यम से धीरे-धीरे आप वहीं पहुंचेंगे, जहां से विचार चले आ रहे है। एक गहरी सतर्कता के साथ की गई आंतरिकता में निगरानी मन को क्रमशः निष्क्रियता प्रदान करती है। मन से मन की जब निगरानी की जाती है, तब वह जल्दी ही थक जाता है। और एक खालीपन निष्क्रियता प्राप्त होती है परन्तु यहां पर किसी और अन्य प्रकार के परिवर्तन की आकांक्षा नहीं होनी चाहिए। हम गुण और दोष को ही जीवन मान बैठे है। जीवन जो है, जिस रूप मे है। उसके मूल रूप को जान ही नहीं पाते। प्रायः आत्मनिरीक्षण के साथ ही परिवर्तन की ललक रहती है। अरे मुझमें यह दोष है..........यह मुझे दूर करना है तभी गुण का स्वरूप सामने आ जाता है, मुझे तो यह होना चाहिए, आखिर यह भी तो संकल्प यात्रा ही है। जब तक गुण शेष है, तभी तक दोष की सत्ता भी विधमान है। राग द्वेष की समाप्ति ही सही वैराग्य है। हमें और कुछ नया नहीं करना, बस इसी तकनीक को समझना है कि यहां कुछ होने के लिए आत्मनिरीक्षण नहीं करना है, बाह्य से लाकर कुद आरोपित नहीं करना है जो है उसका सतर्कता पूर्वक अवलोकन ही साधन है। यहां किसी प्रकार का कोई संकल्प नही है रूपांतरण की चाहत भी नही है तभी तो जो है उसी रूपमें अभिव्यक्त हो सकता है। जब ध्यान मे रूपान्तरण को क्रिया शुरू नहीं करनी है,जब यह शुरु हो जाती है तभी तनाव शुरू होता है। एक द्वन्द्व, यह ध्यान नही है। इसीलिए आवश्यक है, आत्मनिरीक्षण की नौका पर.............मात्र लहरें ही देखना है, गिनना नहीं। पानी के गंदलेपन को देखकर अस्वीकृति भावना नहीं, जो है उसे ही निःसंकल्पता से देखना है, बस नाव चलती रहे चलती रहे तभी यह अन्र्तयात्रा संभव है। यह निःसंकल्प अवलोकन ही सार्थक ध्यान है। आंतरिक विचारणा का अवलोकन हो यह हमें प्रदान करता है। इसीलिए आवश्यक है काल के इस अमूल्य क्षण में मन अत्यधिक संवेदनशील हो, और यह तभी संभव है, कि विचारणा ही नहीं रहे। जिस क्षण यह अनुभवन है, अनुभव और अनुभवकर्ता की पृथकता समाप्त हो जाती है। पर होता क्या है, अनुभव क्षणिक रहता है। फिर आती है स्मृति जो सार्थक क्षण का विश्लेषण करती है अनुभव और अनुभवकर्ता पृथक हो जाते हैं इसीलिए हम पाते हैं हम अधिकांशतः अनुभव से बाहर ही रहते है। अनुभव के लिए आवश्यक है, इस क्षण विचारणा अनुपस्थित रहे, भूत और भविष्य मे मन का संक्रमण न रहे, रहे मात्र वर्तमान और तभी प्राप्त होती है निःसंकल्पता, एक गहरा मौन यही तो हमारा ध्येय है। यह हर क्षण के अनुभव में रूपांतरित होने की वह कला है जिसके द्वारा भगवद् भाव की प्राप्ति होती है, वही जीवन भगवद् कर्म से युक्त हो जाता है। ज्यों ज्यों अनुभवन बढ़ता है, जीवन की सार्थकता उपलब्ध होती जाती है। यह स्थिति जीवन से पलायन नही है, निठल्लापन नही है यहां है सर्वाधिक गत्यात्मकता, खुला विक्षोभहीन जीवन क्या यही हम नहीं चाहते हैं ? यह सच है, यहां तक साधारण साधक के लिए पहुंचना सरल नही है। अतः अभ्यास आवश्यक है। अतः प्रयत्न यहंा निंदनीय नही है। सच तो यह है कि प्रयत्न ही यही है। इसीलिए साधक को अभ्यास का आदर करना चाहिए उन विचारों को जो किसी काम के नही है, उन्हें तो न आने दे। बिना काम के विचार वे ही हैं जो कभी वर्तमान मे नहीं रहने देते। हमेशा मन को भूत और भविष्य में ले जाते है। यही तो चिन्ता है, जो कि चित्त भी है। इसीलिए आवश्यक है कि गहरी सतर्कता रहे। यह सतर्कता और कहीं नहीं, अन्तर्गजगत मे हमेशा रहे। याद रखिए मन गत्यात्मक है। उसकी गति असाधारण है, इसीलिए जहां आप चूके मन एक क्षण में लाखांे मील की दूरी लांघ जाता है। ओर जहां सतर्कता पूर्वक अवलोकन हुआ वह नियंत्रित होता चला जाता है। सतर्कता की इस अवधि को बढ़ाइये, जितनी यह अवधि बढ़ती जाएगी, उतनी ही गहरी शांति में आप अपने आपको पाते चले जाऐंगे। सच तो यह है, यहां पानी पर उठने वाली लहर को ही एकाग करना लक्ष्य नही है हम चाहते हैं, उसका बर्फ बनाना जिससे कि फिर कभी र्कोइ लहर ही नही बने। यह स्थिति मानसिक एकाग्रता ही नही है। एकाग्रता के लिए कम से कम एक संकल्प तो चाहिए ही और नहीं अबतक अन्य स्थानों पर परिभाषित किया ध्यान ही है। यहां हमें, अनावश्यक विचारणा से मन को हटाते हुए उसे सार्थक संकल्प को सौंपता हैं , फिर धीरे -धीरे निर्विचारता तक उसे लाना है।जहां मात्र आत्मानुभव है और भगवत कर्म है। यही हमारा ध्येय है। साधक कहते हैं। दुख है जीवन में दुख ही दुख है। हम उससे अपने आपको हटाना भी चाहते हैं पर समय नही है। वे दुख के प्रभाव को संसार की सहायता से दूर करना चाहते है। यह जानते हुए भी कि जब तक सुख की सत्ता है तभी तक दुख है। पर न जाने कैसा भटकाव है। प्राणी दुख से भागता हुआ भी सुख की भूल भुलैया में इतना उलझा रहता है...............तो उसका यह प्रयास किन्हीं सिद्वियों की तलाश में हठयोग में, या सुख की कामना मे ही यह सोचते हुए कि उसके संकल्पों की पूर्ति किसी अन्य की कृपा से संभव है , गुरू डम के भटकाव में भटक जाता है। नहीं, हमें इसी जीवन मे शास्त्रानुसार बताए मार्ग पर चलकर अभ्यास सत्संग और स्वाध्याय द्वारा ध्येय पाना ही है। ध्यान योग ही सहज और सुगम वह मार्ग है जो संतो का साध्य पथ रहा है। इसीलिए आवश्यक है, अगर अपूर्णता है, और उसे पूर्ण करने की तीव्र इच्छा है तो प्रयत्न आज से और अभी से ही किया जाए।

Sunday, November 27, 2011

साधन सूृ

साधन सूत्र
पर यह यात्रा सहज नही है। इसमें कई रूकावटें है। सुख लोलुपता भय सौंपती है। भय है, जिन चीजों में जिन वस्तुओं में, रूपों में, व्यक्तियों में मन उलझ गया है, रस लेता है, उनके छूट जाने का। सच तो यह है कि इस सुख लोलुपता के कारण व्यक्ति सारी उमर दुख झेलते हुए भी उसके कारण को समझ नहीं पाता है। समझ भी लेता है तो छोड़ने का प्रयत्न नहीं करता। इसके विपरीत वह भक्ति के नाम पर इस लोलुपता की मांग ही अधिक करता है।भक्ति प्रायः साधक को भटकाती ही रहती है,वह याचक बनता चला जाता है।
1. बुद्वि और विवेक में अंतर है। विवेक सत्यरूपी सूर्य की किरण है जो हमेशा सतपथ की ओर बढ़ने के लिए संकेत करती है। बुद्वि का आदर होने से सांसारिक लाभ तो मिलता ही है, साथ ही स्वार्थभावना भी बढ़ती है।
बुद्वि लाभ -हानि अधिक सोचती है। यहां सत-असत का भेद नहीं है।
अतः विवेक का आदर होना चाहिए। साधक को जो जाना गया है, उसका आदर करना चाहिए। बु(ि से जब हम अपने आपको न्यायोचित ठहराने का प्रयास करते हैं,हम गलत रास्ते पर चलना शुरू कर देते हैं।
2. विवेक का आदर होते ही, देहाभिमान टूटता है। शरीर भाव बहुत ही पुख्ता है। ऊंची से ऊंची अवस्था में भी यह नहीं जाता। व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का ही गुलाम हो जाता है। यह सूक्ष्म अंहकार है।यहां हम जो सही है उसके समीप आजाते हैं।हम अपने पुरूषार्थ से परिचित ही नहीं होते हें उसका सदुपयोग भी करने में समर्थ हो जाते हैं।
श्रीमद्भागवत में इस अवस्था का बहुत ही सुंदर वर्णन है गोपियां जो सबकुछ छोड़ आयी, वे भी यह सोच कर कि उन जैसा प्रेम और कहीं नहीं कृष्ण जो प्राप्त थे उन्हे ही खो देती है। और तो और वह विशेष गोपिका जिसके साथ उन्होंने आराधना की थी। वह भी इसी अहमभाव में डूब जाती है और जब पाती है कि कृष्ण उसे भी छोड़ गये हैं.. वह व्याकुल हो उठती है।
कृष्ण के पदचिन्हों को ढूंएती हुयी अन्य गोपियां जब वहां पहुंचती है तो वे भी उसे उदास पाती है।यह सूक्ष्म अहमभाव साधना में विघ्न उपस्थित करता है। ऊंची से ऊंची अवस्था में भी व्यक्तित्व का मोह बना रहता है। यही द्वैत है। दूसरे से अपने को श्रेष्ठ समझने की भावना। दरअसल गुणों का संग्रह करने की भावना भी बाधा उपस्थित करती है। जब तक गुण की सत्ता है तभी तक दोष भी विधमान है। अतः साधक को चाहिए कि वह विवेक का आदर करे। मैं ओरों से श्रेष्ठ हूं यह अहमभाव साधक को वहां पहुंचा देता है जहां से यात्रा शुरू हुई है। अतः यह याद रहे, साधना का यह अर्थ नहीं है कि दोषों की अस्वीकृति के साथ ही गुणों को स्वीकारता चला जाये। यह गुणों की स्वीकृति एक मान्यता बना देती है उससे मोह हो जाता है। यह मोह अभिमान पैदा करता है, फिर साधक वहीं का वहीं रह जाता है।
3. साधक के लिये जैसा कहा, दो रास्ते हैं - पहला संसार की महत्ता उसे सौंपता है। दूसरा संसार को कत्र्तव्य भूमि बताते हुये उसे दासता से मुक्त करता है। सुखों की उपासना उसे गुलाम बनाती है। व्यक्ति अजाने सुख की लालसा में गुलाम रह जाता है। साथ ही कामना पूर्ति का अभाव उसे व्यथित कर देता है, तथा कामना पूर्ति का सुख उसे प्रसन्नता देता है। वह इसे ईश्वर कृपा कहता है और प्राप्त दुख को हटाने के लिए सद्गुरू तथा भगवान की शरण लेता है। वह दुखी होते हुए भी संसार की गुलामी नहीं छोड़ पाता है। अधिकांश इसी स्थिति में जीते हैं। कामना पूर्ति का लोभ उन्हें व्यथित बनाए रखता है।
इसीलिए साधक को चाहिए कि वह इस विघ्न को समझे। प्राप्त समझ का आदर करे। समझ ही उसे स्वाधीनता की ओर अग्रसित करेगी। वह कामना का स्वरूप समझ पाएगा तथा अनुकूल एवं प्रतिकूल परिस्थितियों को सहज भाव से जी सकेगा। समत्व बुद्वि यही है। साधक के लिए कामनाओं का पूरा होना या न होना समान ही है। परिस्थितियां प्रारब्धवश होती है। प्रयत्न उनका चिंतन नहीं उनकी सहज स्वीकृति है। उन्हें जिया जाए......उनका चिंतन व्यर्थ है। फल जो भी हो उसे प्रारब्ध मानकर स्वीकारा जाए। फल से पलायन तथा विचलित होना साधक के लिए उचित नही है। परिस्थितियां साधक में विवेक जागृत करने के लिए आती हंै।
जो भी कर्म सामने उपस्थित हुआ हे मन को अधिक से अधिक वहीं रखना चाहिए,किंचित मात्र भी विपरीत नहीं जाने देना चाहिए।कर्म की पूर्णता निश्चित ही पूर्णता का फल स्थाई शांति में सौंपने में समर्थ है।
4. कई बार ऐसा होता है कि हम प्राप्त परिस्थिति में सुधार की बात करते है। यह नहीं होता तो कितना अच्छा था, शायद इसके स्थान पर यह दूसरी नौकरी मिलती तो मैं बहुत खुश रहता, यह विकल्पों की यात्रा बड़ी लम्बी है। यही प्रमाद है, यही भ्रम है।
हर परिस्थिति प्रभु का प्रसाद है। प्रारब्धवश प्राप्त है। वह साधन के लिए ही है। परिस्थितियों में जान बूझकर किया गया परिवर्तन सिलसिले को बढ़ाता ही है। हां, यह जरूर है कि हर परिस्थिति का सदुपयोग किया जाए। सदुपयोग से परिस्थिति का भोग समाप्त हो जाता है। सुख के सदुपयोग से, विनय प्राप्त होता है। यह मनुष्यत्व है। दुख का सदुपयोग वैराग्य सौंपता है।वस्तु के प्रति आसक्ति कम होने लगती है,साथ ही हमें अपनी सहनशीलता, कठिनाइयों में प्रसन्नता का अनुभव भी होता है।परिस्थितियों की निंदा,दूसरों पर दोषारोपण,उचित नहीं है।
परिस्थितियां जो भी प्राप्त है, वही हमारा वरण है। उनकी स्वीकृति ही जीवन का आदर है। प्राप्त का सदुपयोग और अप्राप्त का चिंतन छोड़ देना ही उचित है। इससे अभ्यास मे बहुत ही सहायता मिलती है। यह साधक को वह मंगलमल विधान सौंपता है जिससे कि उसका पारिवारिक जीवन ही मंगलमय हो जाता है। जहां भी हम रहें, होश में रहें। तो हर कार्य कुशलता के साथ तो होता ही है, साथ ही करने का भाव भी छूटने लगता है। प्रायः यह जो हम भविष्य पर टालते हैं कि आज नहीं कल करूंगा पहले यह हो जाए तब वह करूं, यह चिंतन साधक के लिए उचित नही है।
जो करना है, आज ही करना है।
साधन के लिए हिमालय की किसी कंदरा में नहीं जाना है। जहां भी रहंे, जिस समय रहे, वहीं से शुरू किया जा सकता है। साधन का अस्तित्व ही वर्तमान मे है। न वह स्मृति में है, न जीवेषण में। इस तरह प्राप्त परिस्थिति का सदुपयोग ही साधन का लक्ष्य होना चाहिए।
बाह्य यह जो जगत है, इसमे जो मान अपमान है, आदर भाव है, अवहेलना है, साधन क्षेत्र में इसकी कोई उपयोगिता नहीं।इसे एक सीरियल की तरह लेना चाहिए,ज्यादा विचलित होने की जरूरत नहीं है।यह संसार गतिशील है, जो परिस्थिति आज है कल नहीं रहेगी।इसलिए बात-बात पर उत्तेजित होना ,अशांत होना उचित नहीं है।
हर प्राणी जो किसी भी स्थिति मे है वह अपनी योग्यतानुसार अपने विवेक का आदर कर साधन निश्चित कर साध्य को पाने के लिए स्वतंत्र है। क्योंकि लक्ष्य मात्र अध्ीिक से अधिक वत्र्तमान में रहना है।
5. हर साधक, साधन का यह अर्थ समझता है कि यह उसके भौतिक लाभ में सहायक होगा। यह सोचना ही गलत नहीं हैै। परन्तु भौतिक सुख के लिए आवश्यक है कि प्रयत्न किया जाए। प्रयत्न की सफलता भौतिक सुख देती है। जो भी प्रयत्न हो पूरी ताकत से किया जाए।मन की शक्तियां अधिक से अधिक वहीं रहें।
यह कहना है कि जो साधक है, वे इस जीवन मे धनी होंगे, स्वस्थ होंगे, वस्तुएं प्राप्त करेंगे, यह सोचना ही गलत नहीं है। क्योंकि साधक जब अपने विवेक का आदर कर अपने पुरूषार्थ का सदुपयोग करता है तब उसे भौतिक सुख जो उसके प्रारब्ध से उसे प्राप्त होने हैं ,वे तो प्राप्त होंगे ही कर्मो की श्रेष्ठता से यह अवधि बढ़ती भी चली जाती है।

6. सीखना एक अनवरत क्रिया है। साधक के लिए आवश्यक है कि वह सदैव प्रयोगशील रहे। प्रयोग का अंत कहीं नहीं है और न ही प्रयोग दूसरे के अनुभवों पर आधारित है। हर साधक का पथ उसको खुद की यात्रा ही नही है वरन् वही उसका प्रयोग है। अतः यह उसे कभी नहीं भूलना कि वह साधक है और प्रयोेगरत है। प्रयोग वही कर सकता है जो जगा हुआ है। सोया हुआ कभी कुछ जान नहीं सकता। अनुभव के लिए जागरूकता आवश्यक है। अतः साधक को अपनी मान्यता की कभी विस्मृति नहीं होनी चाहिए।
7. इस विस्मृति से ही साधक प्रायः अपनी साधन प्रणाली से मोहकर बैठते है। जैसे जप करने वाले जप को ही साधन मान लेते है। आसन लगाने वाले आसन को कभी छोड़ नहीं पाते। यह याद रखना चाहिये कि साधन सामग्री जो है वह प्रयोग की सामग्री है। हर सामग्री प्रयोग में सदा काम नहीं आती। जो कभी प्रारम्भ में काम आती है। वह कुछ ही समय बाद छूट जाती है। प्रयोग में मोह नहीं रहता। हां, साध्य के प्रति, कुतूहल रह जाता है। साधक प्रायः अपनी साधना की प्रणाली से इतना एकाकार हो जाता है कि वह अपने साध्य को ही भूल जाता है। उसे ही सबकुछ मान बैठता है। यह सबसे बड़ा विघ्न है। साथ ही प्रणाली के प्रति यह जो आसक्ति है वहअहं भाव पैदा करती है। साधक अपने साध्य को छोड़ कर साधन को ही सबकुछ मान लेता है। इससे वह साध्य से विचलित हो जाता है।
8. साधन यात्रा मे सबसे बड़ी कठिनाई, छोड़ने और छूटने की होती है। साधन उबाऊ और नीरस नही है। जो अपने साध्य के प्रति समर्पित है, वह कभी नीरस नहीं हो सकता। उसमें तो नित्य प्रियता रहती है।
इसीलिए छोड़ने और छूटने पर अधिक बल नहीं दिया जाना चाहिये। अगर वर्तमान का आदर रहे, व्यर्थ के चिंतन में मन को नहीं जाने दिया जाये तो जो कुछ छूटना है वह सहज ही छूट जाता है। हां, आवश्यक है कि विवेक का पूरी तरह आदर किया जाए, विवेक जन्य आचरण रखा जाए, जिसे छूटना है वह सहज ही छूट जाता है। जो जाना गया है उसका पूर्ण आदर किया जाये तभी आचरण में शुद्वता रहती है।
पर होता विपरीत ही है। साधक और सिद्व भी जो जाना गया है अपने आचरण में उससे विपरीत रहते है। अहं सबसे बड़ा विघ्न है। साधक के लिए गुणी का आरोपण नहीं होना चाहिए। ऊपर से ओढ़ने के स्थान पर , विवेक का आदर और उसके अनुरूप आचरण ही पर्याप्त है।
9. साधक के लिए जो प्राप्त हो चुका है। प्रारब्धवश मिला है, वह उसके ही कृत संकल्पों का परिणाम है। यह जान लेना ही आवश्यक है। जो संबंध प्रारब्धवश बन गए हैं, माने गए हैं उनके प्रति कर्तव्य परायणता आवश्यक है। जो संबंधों को तोड़कर भगने को साधन मान बैठे हैं। वह कहीं भी लाभ नहीं ले सकते।
हां, जो संबंध हैं ? वहां अधिकार भावना के स्थान पर सेवा का भाव रखने से साधन में सफलता मिलती है। सेवक के लिए कत्र्तवय परायण होना आवश्यक है। जो हमारा है उसका ही हम त्याग कर सकते हैं, त्याग हम अपनी स्मृयिों का ही कर सकते हैं, वे ही हमारी संपत्ति हैं। वस्त्र बदलना ,घर छोड़ना, कोई त्याग नहीं है, घन की वस्त्रों की ,भोजन की आवश्यकता सभी को होती है,सन्यासियों की आवश्यकताएं गृहस्थों से अध्ीिक होती हैं।इसलिए त्यागी होना आवश्यक है। जोे निरंतर वत्र्तमान में रहना चाहता है वही त्यागी है। वैराग्य वस्त्रों का परिवत्र्तन नहीं है, अनावश्यक कल्पनाओं के बोझ को छोड़ते जाना ही वैराग्य है।साधक को चाहिए कि वह परमात्म भाव से कत्र्तव्य कर्म करे, यही वास्तविक सेवा है। जो संबंध है, उनकी कर्तव्य भावना से पूर्ति करे।
10. साधक मे अपने साधन के प्रति अनन्य प्रेम, विश्वास जब तक नहीं होगा उसे सफलता नहीं मिलेगी। प्रायः साधक सारी उम्र साधन तलाश करते रहते हैं, जबकि साधन उनके ही पास उपलब्ध है। जो असाधन है उसका त्याग हो तो साधन है। पर वे भटकते रहते है। शास्त्रों का अध्ययन करते है तो वहां भी शंका करते है। सद्गुरू से मिलते है तो तार्किक बुद्वि ले आते है। गुरूवाणी मे तलाशते हैं कि यह शास्त्रों से कितना मेल खाता है। हर जगह वे संदेह से भरे रहते है। यह पहले ही कहा गया है कि रास्ते अलग अलग है मंजिल एक ही है।
हां, रास्ता चुनने से पहले खूब सोच लो, तर्क कर लो, पर जब समझ आ गई हो तो तब चलना ही श्रेयस्कर है। वहां वादविवाद होना, संदेह होना लाभप्रद नही है।एक ही सफलता का सूत्रा है जो भी हम कहें ,जोभी हम करें उसके प्रति हमारे भीतर पूर्ण विश्वास हो।
11. साधन यात्रा में सबसे बड़ी कठिनाई, साधन के चयन की है। साधन का यचन अपनी योग्यता तथा आवश्यकतानुसार होना चाहिए। हर साधक अपनी मांग को अवश्य जानता है। फिर भी अगर निर्णय लेने में परेशानी हो, असुविधा हो तो सदगुरू की शरण में जाना चाहिए।
शिक्षक और सद्गुरू में भेद है।
शिक्षक जानकारी देगा। शास्त्र वचनों के आधार पर साधक को समझाएगा पर सद्गुरू निजी अनुभव के आलोक में साधक के विवेक को जागृत करेगा।
विवेक अलौकिक है। वह एकाग्रता का फल है।
सद्गुरू पर पूर्ण विश्वास करके उसके आदेशों को स्वीकार करना चाहिए। साथ ही अन्य साधकों से न तो अपनी तुलना करनी चाहिए और न ही उनका अनुकरण करना चाहिए। सब अपनी योग्यतानुसार बढ़ते है।
जिस प्रकार एक ही रोग की एक ही दवा तथा एक ही पथ्य होते हुए भी रोग की अवस्थानुसार रोगियों को अलग अलग मात्राऐं दी जाती है, वही स्थिति साधन प्रणाली की है। हर साधन हरेक के लिए आवश्यक नही है।
12. साधन यात्रा मे कई पड़ाव आते है। साधक प्रायः एक दूसरे को देखकर मन में कई बार हीनता का भाव ले आत है। इसलिए प्रायः साधन को प्रायः गुप्त रखनेके लिए कहा जाता है प्रायः जो अतिरिक्त अनुभूतियां हैं वे एक दूसरे की समान नहीं हो।
उदाहरण के लिए एकाग्रता कर अंतिम अवस्था में कई बार साधको को प्रकाशपुंजों का जो कि बैंगनी रंग के होेेेेेेेेते है दर्शन होते हैं, किसी किसी की यह न हो कर अनवरत ध्वनियां सुनाई देती है, प्रारम्भ में ये बहुत तीव्र होती है साधक डर जाता है, वह कान मे दवाई डालने लग जाता है किसी की सूक्ष्म नाद, झींगुर की तरह या घुंघरू की तरह सुनाई देता है। नाद की कई अवस्थाएं है। परन्तु सच तो यह है कि हर साधक के अनुभव दूसरे से पृथक है।
यही स्थिति स्वप्न और ”विजन“ की है। स्वप्न और ”विजन“ में अंतर है। विजन स्थाई सा रहता है। आंख खोले रखने पर भी उसकी प्रतीती होती है। पर ये विजन तथा स्वप्न हर साधक की स्थितियों के आधार पर अलग अलग होते है।
प्रायः साधक यहां अनुकरण शुरू कर देते है। इस बारे मंे कई बार जो धारणाएं बन जाती है। उन्हें ही वे पाने का प्रयास करते है।
साधक अपनी साधन यात्रा से विचलित हो जाता है।
13. साथ ही साधको की भी अवस्थाएं है। उनकी मानसिक अवस्था के आधार पर उनके भेद हैं । कुछ हैं जो अपने दोषों से, अपने दुख से इतने व्याकुल हैं कि वे निर्दोषिता प्राप्त करने के लिए चल दिए है। उनका हर पल साधन को समर्पित है।
कुछ साधक है, समझते भी हैं। समझ का आदर भी करते हैं, पर सुख लोलुपता छोड़ नहीं पाते है। से साधन मे स्थिर नहीं रह पाते और तो और वे अपने दुख का कारण अपने से बाहर तलाशते हुए उसके रूपांतरण का प्रयास भी करते है। वे जानते हुए भी आचरण में अपनी समझ को नहीं ला पाते। कहते हैं, समझ तो गया परन्तु अभी इसके लिए समय नही है। उन्हें दोष पता तो है परन्तु अभी व्याकुलता बढ़ी नही है कि वे बदलने के लिए प्रयास करें।
इसलिए सद्गुरू सत्संग और सद्गुरू की शरण एक मात्र आधार है।
सत्संग से आत्म प्रशंसा रूकती है और निज का दोष दर्शन शुरू होता है। वह समझ का आदर करने लगता है।
सदगुरू की आज्ञा मानते ही विनय प्राप्त होता है। विनय ही विवेका की तरफ ले जाता है। विनय ही अंहकार को तोड़ता है। अंहकार ही अविद्याा का जनक है। इसलिए विनय महत्वपूर्ण है। विनय अलौकिक है। विनय ही विाद्या प्रदान करता है। यह याद रखना महत्वपूर्ण है।
सर्वाधिक संख्या उनकी है जो विवेक का महत्व समझते तो है परन्तु अपने आपको इस दुख से इस दोष से, बाहर आने में असमर्थ मान लेते है। वे संसार की भागदौड़ में उलझ कर ही रह जाते है। यहां, बुढ़ापा ही भगवान के भजन के लिए छोड़ दिया गया है। इनके लिए वर्तमान में तो समय है ही नहीं। ये सब उधार की जिंदगी जी रहे है। उनके लिए खुद के लिए एक मिनट भी नही है। वे जीवेषणा में जीवित है। वे भविष्योन्मुखी है। कल में ही वे सबकुछ करना चाहते है। ये लोग सद्गुरू के पास भी जाते हैं तो भौतिक सुख को कामना ही शेष रहती है।
इनसे भी नीची अवस्था उनकी होती है जो प्राप्त समझ का दुरूपयोग करते है। ये आध्यात्मिक जानकारी को पेट भरने का धंधा बना लेते है। ये आध्यात्मिक सूचनाएं बेचते हैं। धन ही इनका लक्ष्य रहता है। ये स्वयं साधन यात्रा पर न होते हुए भी साधन की चर्चा सर्वाधिक करते हैं इन ज्ञान बंधुओं को साधन का लाभ कभी प्राप्त नहीं होता है।यह आवश्यक नहीं है घर वापिस पहुंचने के बाद वापसी इसी रूप में हो,इन परिस्थिितियों से भी बदतर स्थ्तिि में लौटना हो सकता है।यह जीवन अत्यध्ीिक महत्वपूर्ण है।साम्थ्र्य का सदुपयोग ही सार तत्व है।
14. हर साधक को यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि साधन यात्रा में आत्म प्रशंसा ही शत्रु है मन जो हीन भावना से ग्रस्त रहता है वह स्वयं ही अपनी प्रशंसा में लिप्त हो जाता है।
क्यों ?
यहां भी तो संतोष मिलता है। पर आत्म प्रशंसा व्यक्ति के विकास में बाधक है। वह कभी आपको अपने आपसे संलग्न नहीं कर पाती। दूर ही रखती है।
आत्म प्रशंसा-आत्मनिरीक्षण में बाधक है। जब हम अपने दोषों से जी चुराना चाहते है। तभी आत्म प्रशंसा में डूबते है। खोलखलापन जो है, वहां गूंज जोरों से होती है। ओर जो दोष है, वे उसी रूप में विधमान रहते है। अगर देखनी है तो अपनी बुराई देखिए।
15. दूसरों के दोष देखने से निज का अंहभाव दृढ़ ही होता है। आत्मनिरीक्षण रूक जाता है। साधन पथ में यह सर्वथा अहितकर है। पर दोष चिंतन में मन असाधारण गतिशील होता है उसे रस मिलता है। निंदा स्तुति ही प्रायः मनुष्य की पहचान हो गई है।
साधक को चाहिए कि वह इससे बेचे।
परदोष चिंतन और आत्मप्रशंसा का मुख्य कारण है,
वाचालता।
हमें कुछ ना कुछ बोलने की आदत ही हो गई है। साधन यात्रा में अगर संयम करना ही है तो वाकसंयम आवश्यक है।
जब साधक निरन्तर बोलता है, तब दो ही रास्ते बने हैं -
1. आत्म प्रशंसा 2. परदोष दर्शन।
इससे मन और अधिक विक्षोभ में डूबता है। तनाव रहता है।
साधन में यह बाधक है।
16. वाचालता का प्रमुख कारण स्मृति है।
स्मृतियां ही व्यर्थ का चिंतन करती है।
मन जब व्यर्थ का चिंतन करता है तब आवश्यक संकल्पों की पूर्ति नहीं हो पाती। कर्म तभी सफल हो पाता है जब अनावश्यक विचारणा का दबाब नहीं होता है। यहीं कर्म कर्तव्य बुद्वि से जन्य होकर सार्थकता देने में सफल होता है।
यह व्यर्थ का चिंतन होता है, स्मृतियों में रस लेने से । स्मृतियां ही तो अचेतन मन में संग्रहित है। उनके साथ असहयोग होते ही उनकी अर्थवत्ता समाप्त हो जाती है वर्तमान में रहने की यही कला है कि स्मृतियों के साथ सहयोग न किया जाये। तभी आगे पीछे का व्यर्थ चिंतन रोका जा सकता है।
स्मृतियों का दबाब कम से कम होता जाए इसके लिए आवश्यक है:-
1 आप शांत होकर बैठें संकल्प लें आप किसी से भी नाराज नहीं हैं,जिनके प्रतिनाराजगी है ,उन्हें याद करें ,उन्हें अपने अंतः करण से क्षमा करदंे।जिस को भी आप अपना इष्अ मानते हैं कल्पना करें वे आपके साक्षी हैं।
2 जो आप से नाराज हैं,उनको याद कर उनसे भी क्षमा मांगें।
दस दिन बाद आप पाएंगे आपके विचार भी कम होने लग गए हैं
विचारों के कम होते ही विकारों का कम होजाना स्वाभाविक है।इससे आपका आत्मविश्वास बढ़ता है।

gurukul

 
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Friday, November 25, 2011

साधन का उपाय ”जो है“ उसी पर ही ध्यान केन्द्रित रहे यही साधन है। जो निरन्तर बदलता रहता है, वही गलत है। वह स्वरूप नहीं है। उससे छूटते ही स्वरूप उपलब्ध होता है। जो भी बदल रहा है, वह मैं नहीं हूं। यह शरीर जो मुझे मिला है क्या मैं हूं ? यह संसार जो बदल रहा है, क्या मैं हूं ? शरीर, मन और संसार सब बदल रहे है। संसार मन का ही तो विस्तार है। जगत और शरीर में क्या अंतर है ? जो निरन्तर बदल रहा है वह सत्य नहीं। जो असत्य है उसी पर ही तो ध्यान है, उसी का ही चिंतन है। उसी की ही खोज है। उससे ध्यान हटाना ही ध्यान है। वह जो है उस पर जब ध्यान पहुंचता है तभी स्वरूप उपलब्ध होता है। तभी स्थिरता प्राप्त होती है। इसीलिए ध्यान ”जो है“ उसके अवलोकन की कला है। यह शरीर जिस इन्द्रिय के द्वारा यह कार्य कर पाता है, वह मन है। तभी तो सारा ब्राह्यंड इसी से हलचल लेता हुआ दिखाई पड़ता है। मन की गति असाधारण है, कहा जाता है कि प्रकाश की गति भी उसके सामने कुछ नहीं है। इसीलिए ध्यान मनोनिग्रह का साधन कहा गया है। प्रायः ध्यान का अर्थ मानसिक एकाग्रता के लिए लिया जाता है। मन के द्वारा किसी यंत्र, रूप या नाम के प्रति सजगता पूर्वक रखी गई एकाग्रता ही आजकल ध्यान कही जाती है। यह याद रखिए ध्यान मात्र एकाग्रता नही है। एकाग्रता मन का बहिर्मुख वृत्तियों को किसी नाम, रूप या मंत्र पर केन्द्रित करने का अभ्यास ही है। एकाग्रता के बाद ही अन्तर्यात्रा प्रारम्भ होती है। परन्तु एकाग्रता को ही साधन यात्रा स्वीकारने से साधक साधक पथ को ही छोड़ बैठता है। हमारे संकल्प से निश्चित की गई, यह देव प्रतिमा यह मंत्र यह नाम फिर इतना शक्तिशाली हो जाता है कि मन उससे छूट नहीं पाता, और जो होना चाहिए था वह नहीं हो पाता है। चित्त पुनः और अशांत हो जाता है। अप्रमाद के स्थान पर प्रमाद पुनः उपस्थित हो जाता है। ”ध्यान“ एकाग्रता नही है। ”ध्यान“ सतर्कता सहित आंतरिक विचारणा का अवलोकन का पथ है,यहयह भी आंशिक सही है। हम जो भीतर है, वही वास्तव है। उस वास्तव की सही सही विश्वसनीय पहचान हो,यहां ”ध्यान“ प्रक्रिया है। हम जो हैं एक स्थिर इकाई नही है। हर क्षण हम बदल रहे हैं। जो चीज बदल रही है, वह हमारी आन्तरिकता नही है। मन के संकल्प विकल्प की अनवरत श्रंृखला है। इसी श्रृंखला, इसी विचारणा का सतर्कता पूर्वक किया गया अवलोकन होना ,ध्यान की प्रक्रिया हैै। अवलोकन दूसरे शब्दों में मात्र देखना। बाहर नहीं भीतर देखना है। देखते समय ईमानदारी यही रखनी है कि किसी प्रकार का कोई पूर्वाग्रह नहीं रखना है। बनी बनाई पूर्व निर्धारित कल्पना को क्या देखना । जो बात तय कर ली जाए, जैसे कोई नाम, कोई रूप उसका अवलोकन ध्यान नहीं है। यहां जो लहरें उठ रही है, उन्हें बिना किसी तिरस्कार के, बिना किसी चश्में के देखना है, यहां पर संपूर्ण विचारणा को उसके वास्तविक रूप में देखने का प्रयास है। यह अवलोकन ही क्रमशः एक खालीपन एक गैप ,विचार और विचार के बीच में प्रदान करता है। यह अंतराल ही, यह खलीपन ही साधना का एक पड़ाव है। मन का आगे पीछे का चिंतन ही बेहोशी है। यह वर्तमान से पलायन है। यह बेहोशी है, यह नींद है। सच है हम जागते हुए भी सोए रहते है। कोई पूछे तो हमे लगता है, हम कहीं ओर थे। यही विवशता असाधन है। इसका त्याग होते ही साधक स्वयं को प्राप्त हो जाता है। यह साधन अगर साधक में पर्याप्त धैर्य रहा तो अवश्य ही साध्य से मिलाएगा। मन की गति असाधारण है। क्षण भर में ही न जाने कहां से कितनी बातें आ जाती है। चित्र ही चित्र। न जाने कितने युगों से हम चित्र ही चित्र सहेजते आ रहे है। ये ही स्मृतियां हैं, जिन्हें हम अपनी पूंजी मान बैठे है। मन जब इनके साथ सहयोग करता है, तो ये गाढ़ी हो जाती है। मूलधन ब्याज कमा लेता है। मन अगर स्मृतियां के साथ असहयोग करे तो संभव है कि मूलधन ही खर्च होना शुरू हो जाता है। यही हमें करना है। यहां न कुछ अच्छा है, न बुरा। अन्यथा हम सही रूप को जान ही नहीं पाऐंगे। जो कुछ है भीतर अंधेरी बावड़ी में रखा हुआ उसे बाहर तो आने दे। जहां अस्वीकार किया, वहीं ध्यान ध्यान नहीं रहा। प्रायः अपने भीतर के गंद लाए जल को देखकर हम चैंक जाते हैं, और अस्वीकार करने लग जाते है। या उससे बचकर ईश्वर के किसी रूप या नाम में डूबने लगते है। यह क्या है, यह तो पलायन है। परमात्मा का मार्ग कायरता का मार्ग नही है। यह अज्ञान ही है। यहां हमारी जागरूकता यही है। कि हमारी उपस्थिति बनी रहे, जहां हम है हाजरी रहे। छात्र कक्षा में आते हैं, बैठते हैं। पर जरा पूछो तो लगता है यहा थे ही कहां, कहीं और थे। गायब। ”ध्यान“ गायब होने का नाम नहीं, साक्षात अनुभवन है। जो कुछ है उसका विश्वसनीय साक्षात्कार यहां है। यही ध्यान उस विराट आनन्द स्त्रोत से हमें जोड़ देता है, जो हमारा साध्य है। इसीलिए ध्यान मात्र प्रक्रिया ही नही है, हर प्रकार की क्रिया का यहां अन्त भी है। यहां सब प्रकार के बंधन टूट जाते हैं। ज्ञान की अग्नि उठते ही अज्ञान रूपी कूड़ा कचरा जल कर राख हो जाता है। बंधन, वे पाश जिनसे हमने अपने आपको बांध रखा है, टूट जाते है। संसार के प्रति उमड़ती हुई कामनाओं के बादलों के हटते ही शेष रह जाता है, खुला आकाश निरभ्र और शांत जहां फिर कोई अभाव नहीं। अगर हमारे पास थोड़ा सा अवकाश हो, और हम अपने आपको सामने रख कर देखें तो पाऐंगे, हमारे भीतर जो आकांक्षाएं वे दो विभिन्न रास्तों पर चलना चाहती है। ज्वार सा उमड़ता है। यही वह द्वन्द है, जो मनुष्य को मनुष्य बनाता है। भोगेच्छा और भगवद् इच्छा भोगेच्छा संसार की ओर ले जाती है, यह सांसारिक सुख को ही जीवन की उपलब्धि मानती है। दूसरी ओर इस सुख दुख के झंझावत से उठकर फिर शांति की ओर बढ़ने की इच्छा उमड़ती है। यही भगवत्इच्छा है, जो मनुष्य को सांसारिक जगत में व्याकुल बनाए रखती है। शास्त्रों में इसे ही योगमाया कहा जाता है। यही सोच मोक्ष अभिलाषा है यही साधन यात्रा में साधक के मन में प्रयत्न उपस्थित करती है। साधन यात्रा...... संसार से पलायन नही है। यह संसार के प्रति सही संबंधों की तलाश है। यहां जो प्रयत्न है, वह उस समझ पर आधारित है, जो उसे आम्यंतरिक परिवर्तन के लिए प्रेरित करती है। वह अधूरापन जो उसे हर समय अशांत रखता है, उसे दूर करने का है। इसलिए यहां व्यक्तित्व का संपूर्ण रूपान्तरण है। यहां आभ्यांतर तथा बाहय जीवन का एक ऐसा परिवर्तन है कि यहां देह परमात्म भाव के साथ ही परमात्म कर्म को साधन बन जाती है। इसीलिए साधन यात्रा की उपलब्धि सांसारिक देहात्मभाव से ऊपर उठ कर आत्मानुभव ही नही हैं, परन्तु साथ ही उस परमात्मभाव को जीवन तक भी ले जाना है। आज के मनुष्य के सामने उसका अशांत मन ही कष्टकर है। वह पाता है कि अपने समस्त भौतिक प्रयत्नों के बाद भी वह विक्षोभ से बाहर नहीं निकल पाता है, वह इसी विक्षोभ को दूर करने के लिए कभी जगत में पूरी तरह बैठना चाहता है तो कभी इससे दूर कहंी ओर भागना चाहता है। मन जो बीमार है, अशांत है, एक पल भी तो स्थिर नहीं रह पाता है। कभी अतीत में तो कभी भविष्य में दौड़ता ही रहता है। कितनी हिंसा भरी है। कितनागंदलाया, जल है। हमेशा निज को छोड़ परायी खिड़की में झांकता ही रहता है। क्यों वहीं तो इसका रस है। जब तक उसे संसार से निराशा नहीं होती तब तक मन का अपना जो स्वरूप है वहां लौटना असंभव ही है। यह जो विक्षोभ है, उसका जनक यह संसार और उसकी ओर ले जाने वाली आकांक्षाएं है। यही हम जान पाए है। अभिलाषा ही कारण है जो कार्य में परिणत होती है। ज्यों ज्यों हम निम्न प्रकृति से मुक्त होने लगते हैं, त्यो त्यों भगवत्कृपा के हम हकदार बनते चले जाते है। साथ ही जितनी भगवत कृपा हम पर होती रहेगी उतनी ही निम्न प्रकृति भी शुद्व होती रहेगी। यह साधारण नियम है। इसीलिए बर्हिजगत में छोड़ने और छूटने के प्रति यहां अत्यधिक आग्रह नहीं है। जो कुछ छूटना है स्वतः ही होता जाएगा। जब हम इस यात्रा पर बढ़ेंगे। छोड़ता और ग्रहण करता मन ही है। मन को छोड़ा ही छूटा है, और मन का ग्रहण किया चिपटा है। चित्त शुद्वि और भगवत कृपा का पारस्परिक संबंध है। जितनी अधिक स्थिरता हम प्राप्त करते जाते हैं, उतनी ही अधिक भगवत कृपा हम प्राप्त करते है। यही साधन यात्रा है। इच्छा रूप ही संसार है और इच्छा निवृत्ति ही मोक्ष है। यही विक्षोभ का अन्त है। और प्राप्ति उस विराट शांति की जिसके लिए हम इस अन्र्तयात्रा पर गतिशील है। यह स्थिति जीवन और जगत से पलायन नही है। यहां जिस में जिस संसार की उपस्थिति है उसका अभाव तो है, परन्तु अब जगत के प्रति जो अब तक संबंध था, वह भी तो परिवर्तित है। कभी आचार्य ने कहा था। ब्रह्म सत्य है। जगत मिथ्या है। और साथ ही जगत ही ब्रह्म है। यह तीसरा कथन अत्यधिक महत्वपूर्ण है। यही तो आध्यात्मिक यात्रा की उपलब्धि है। यह पूर्व कथनों की अवहेलना न कर उन्हें ही अधिक स्पष्ट कर रहा है। यही वह स्थिति है जहां साधक जीवन और जगत के प्रति सही संबंध स्थापित कर पाता है। आसक्ति के स्थान अनासक्ति भोगेच्छा के स्थान पर भगवत इच्छा तभी तो कर्म का स्वरूप ही बदल जाता है। यहां जगत के प्रति त्याग और सेवा ही शेष रह जाती है। ये शब्द मात्र शाब्दिक ही नहीं रह जाते हैं, वरन् आचरण मे स्वतः ही आ जाते है। यही तो भगवतकर्म है। जो साधक को साधन यात्रा प्रदान करती है। यह स्थिति पलायन नही है। वरन् जीवन की सही स्वीकृति है। जीवन कुशलता से जीने के लिए है और योग उसकी श्रेष्ठकला है। अभिलाषाओं सेसन्यास ही तो विक्षोभ का अंत है। यही तो मोक्ष है। इसीलिए हमें इसी जीवन में भगवत कृपा प्राप्त करनी है और साथ ही इस शरीर को भगवतकर्म से युक्त करना है। अशांत मनुष्य के लिए उसका मन ही भार है। वह अनुकूलता की तलाश में इधर से उधर भटकता रहता है। उसका अशांत मन, कामनाओं की पूर्ति के लिए भटकता फिरता है। प्रतिकूलताएं जहां उसे दुख देती है वहीं अनुकूलताएं उसे गुलाम बनाती है। यही कारण है कि वह स्थिर नहीं रह पाता है। इसीलिए स्थूल देह की अपेक्षा मन जो है वही महत्वपूर्ण है। इस मन का नियमन ही महत्वपूर्ण है। इसीलिए मनोनिग्रह के अलावा दूसरा कोई प्रयत्न नही है। इसी से विक्षोभ का अंत संभव है। सच तो यह है कि अभिलाषाओं का ही नाम चित्त है। जब यह सांसारिक पदार्थों की इच्छा से रहित हो जाता है तभी सकल त्याग संभव है। जो कुछ भी अतीत है, वहां मात्र स्मृतियां है। जन्म जन्म का संस्कार है। स्थिरता के लिए वांछनीय है, इन स्मृतियों से असहयोग। साधक स्मृति मात्र से ही असहयोग सफलता देगा। अतीत के जो निष्कर्ष हैं, वे साधन पथ के चयन मे सहायक तो हैं पर मन का बार बार स्मृतियांे जाना तनाव ही लाता है। जो कुछ भी अतीत का संग्रहित है। वह अशुभ ही अधिक है। दुखद है। वर्तमान पर अपनी काली छाया छोड़ता है। सच तो यह है कि हम स्मृतियों को ही ध्यान मान बैठे है। जमा की गई पूंजी। जब तक यह ताला बंद है। मन का शांत भाव में आना असंभव ही है। हर साधक प्रयोगशील है । उसे चाहिये अनंत धैर्य अनंत प्रतीक्षा। साधन के प्रति गहरा विश्वास। जब तक विश्वास नहीं होगा, सफलता नही मिलेगी। स्पष्ट है, ध्यान सजगता पूर्वक किया गया आंतरिक अवलोकन है। यह एकाग्रता से प्रारम्भ होकर स्थिरता प्रदान करता है। निरन्तर सजगता पूर्वक की गई मन की निगरानी स्थिरता प्रदान अवश्य करेगी। यहां कोई दबाव नही है। वरन् जो कुछ है वह सहज है। यहां किसी प्रकार का बाह्य आरोपण नही है। नहीं, नया कुछ सीखना है। वरन् जो जरूरी नही है उसको छोड़ना है इसी से ”जो“ है उस स्वरूप का ज्ञान हो जाता है। जरूरी नहीं है, आज जो मौन मिला है, वह दीर्घ हो। हो सकता है क्षणिक हो। आज होश कम रहा, नींद अधिक हो, पश्चाताप नहीं करना है। पुनः यात्रा पर गतिशील रहना है। टुकड़े टुकड़े जोड़ते हुए कभी तो संपूर्ण पाया जा सकता है। इतना धैर्य अवश्य रखना है। प्रायः, ध्यान को हमने अपने जीवन से अलग कोई निश्चित अभ्यास मान लिया है। जो आरोपित है। और उसमें जाना बहुत ही महत्वपूर्ण है। जिसके लिए परिवार, तथा समाज से महत्ता प्राप्त होना आवश्यक है। यह विचारणा अनुचित है। ध्यान तो ”जो“ जरूरी नही है, उसका छूटना है। असाधन का त्याग ही साधन है। ध्यान, सहज और साधक की आवश्यकताओं के अनुरूप है, उसके लिए प्रिय और मंगलकारी हे। जहां भी रहे जब भी रहें, यह सतर्कता बनी रहे। हम वहीं रहे उसी क्षण में रहे। स्मृतियां तथा आकांक्षाओं मे जाना ही होश खोना है। नींद में जाना है वर्तमान से पलायन है। सजगता बनी रहे। जागरूकता रहे। हर पल, हर क्षण हमारी हमारे कर्म में मौजूदगी रहे। इसीलिए साधन, साधक के लिए जिंदगी से पलायन नही है। वरन् जिंदगी को सुचारू रूप से जीने की कला है। यहां संसार को छोड़कर कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है। नहीं कोई विचित्र वेशभूषा धार ण करनी है,संसार में रहते हुए ही अपनी सर्वोत्तम भूमिका प्राप्त करनी है।हम जहां भी हैं ,जो भी कार्य कर रहे हैं,उस कार्य को बेहतर करते हुए,वहीं जीवन में सुख एवं शांति पासकते हैं। साधन मात्र है ,निरंतर वत्र्तमान में रहने का अधिक से अधिक से अधिक अभ्यास रखना।यहां किसी भी प्रकार के पलायन की कोई आवश्यकता नहीं है,जितना हम वत्र्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ाते जाएंगे उतना ही जिसे छूटना है वह स्वतः छूटता चला जाता है।सुख इन्द्रियों के माध्यम से मन ही प्राप्त करता है,स्थायी सुख ही शांति की ओर लेजाता है।

Thursday, November 24, 2011

साधन क्यों ? यह प्रश्न और कहीं नहीं हर साधक के सम्मुख ही सबसे पहले उपस्थित होता है कि साधन क्यों ? हम चाहते क्या हैं ? मनुष्य की मांग क्या है ? अगर वह अपनी वर्तमान स्थिति से संतुष्ट है तो फिर यह प्रश्न उपस्थित ही नहीं होता है। पर अगर उत्तर नहीं में आए......तो यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है। जिसका पेट खाली है उसके सामने भूख का सवाल सबसे बड़ा है। लगता है, यही सबसे बड़ी जरूरत है। नौकरी, और नौकरी उससे बड़ी नौकरी या बड़ी दुकान खोलना, सब पेट भरने का ही तो साधन है। पर पेट कितना बड़ा है, जितना धन होता है, उतना ही खाली रहता है। किसी तरह जब पेट भरता है तब शरीर की भूख जगती है। इसीलिए शरीर की भूख न जगे, हजारों साल से पेट की भूख पर नियंत्रण रखने की बात कही जा रही है। अनशन, उपवास, सब उसी के रूप है। पेट की भूख और शरीर की भूख और शरीर की भूख जैविक आवश्यकताएं है। इससे इतर मनुष्य की मानसिक और बौद्विक आवश्यकताएं भी बढ़ती है। कला और संस्कृति, सभ्यता और विकास यात्रा, इन्हीं का विस्तार है। सभ्यता, मनुष्य की बर्हिमुखता का ही विस्तार है। मन चंचल है, गत्यात्मक है, इसीलिए सभ्यता निरंतर गतिशील है। पर यह मन की स्वाभाविक अवस्था नही है, वह कितना भी गति में क्यों न हो, सदैव नहीं रह सकता, उसे विश्राम की स्थति में आना ही होता है। हर श्रम का प्रारम्भ और अंत प्रशांति में है। नींद से उठकर मनुष्य सब कुछ करता हुआ नींद में जाना चाहता है। यही उसके संपूर्ण जीवन की यात्रा है।वह गहरी नींद से जन्म लेता है फिर उसी में लौट जाता है। विश्राम, मन की स्थिरता है, यही कला और संस्कृति आकार ग्रहण करती है। संस्कृति मन की अन्र्तमुखी यात्रा है। यह भी मनुष्य की मांग है। पेट की भूख और शरीर की भूख के बाद विलासिता की भूख बढ़ती है। विलासिता का आधार आकांक्षा है, संसार इसी कामना का ही विस्तार है।मनुष्य संभावना की भूख में रहता है, निरन्तर कुछ न कुछ होने की संभावना। जैविक आवश्यकताओं के ऊपर मानसिक और बौद्विक आवश्यकताएं यह जो भूख है, उसका आधार आकांक्षा है। और इन सब आवश्यकताओं का एक लंबा सिलसिला है, जिसमें कि मनुष्य उलझता है। सवाल फिर खड़ा होता है। यह सब क्यों ? मैं इतना सब कुछ क्यां चाहता हूं ? मैं, आखिर जीवित ही क्यों हूं ? मैं इस लंबी यात्रा पर निरन्तर चल ही नहीं रहा हूं, दौड़ रहा हूं आखिर किसलिए ? पेट की भूख, समाप्त होते ही, तुष्टि देती है। शरीर अपनी कामक्षुधा की तृप्ति के बाद क्षणिक तुष्टि लेता है। सिलसिला रूकता नही है, चलता ही रहता है। पढ़ना, रोज पढ़ना...........नौकरी तक......नौकरी से और दूसरी बड़ी नौकरी तक धन की ललक। आदिम पारस की ललक जो वस्तुएं देगी। वस्तुएं जिनसे परितुष्टि प्राप्त होगी। शरीर क्षणिक है, जर्जर है, कब ढह जाए इसीलिए अमृत की खोज हुई। शरीर ही नहीं रहा तब तुष्टि किसे ? अक्सर इन्हीं सबके लिए उमर बीत जाती है। मन्दिर, यज्ञ, तप, स्वाध्याय, गुरू भण्डारे, इन सबके पीछे जो भीड़ है............वह क्या चाहती है ? तुष्टि का अगाध भण्डार। उसकी तृप्ति में कभी कोई कमी न आए । यही सुखोपासना सभ्यता का केन्द्र है। संकल्प पूर्ति सुख देती है, और सकल्प पूर्ति का अभाव दुःख देता है। यही सुख दुख की यात्रा है। मनुष्य सुख चाहता है, मात्र सुख। सुख अल्प है, दुख अनंत है। इसीलिए ईश्वर की खोज है...............एक बड़े आधार को खोज जो दुख दूर करेगा...........अनवरत सुख देगा। अनंत सुख। और यही नहीं मिलता है................. शेष रह जाता है, विक्षोभ, व्यथा, दुख का प्रभाव यही से साधन यात्रा शुरू होती है। स्थायी सुख की खोज........ जहां अमृत है। कामना पूर्ति से प्राप्त तुष्टि का भाव ही सुख है। यह क्षणिक है। मन कामनाओं का सागर है। एक कामना की पूर्ति हो इसके पूर्व ही हजार कामनाएं पैदा हो जाती है। क्या वे सब पूरी हो पाती है ? वस्तुगत उपलब्धियों की खोज में व्यक्ति डूबा रहता है। वे ही जीवन का साध्य हो जाती है। और इधर जीवनी शक्ति निरन्तर क्षीण होती चली जा रही है। भारी छटपटाहट है। वस्तु में सुख तलाशा,.............प्रयास किया। पर जब तक वस्तु आई शरीर धोखा दे रहा है। लौटकर दुख ही शेष रहता है। विक्षोभ का धारावही व्यूह मनुष्य को जकड़े रहता है। सामान्यतः यही मनुष्य की यात्रा है। मनुष्य यह मानकर चलता है कि यह जो दूसरा है वह उसे सुख देगा। दूसरे की खोज ही संसार की यात्रा है। दूसरा पिता में, पत्नी में, पुत्र में , समाज में, धन में, मकान में, धर्म में, यश में, हर जगह ढूंढा जाता है। सुख दूसरे से ही प्राप्त होगा, यह वह मानता है, और दुख ? इस सवाल पर वह सोचता ही नहीं है।यह जो दूसरा है। जो संसार है, क्या कभी उसकी आवश्यकता की पूर्ति कर पाता है ? और सच तो यह है कि यह जो दूसरा है, हमेशा आज मंे ही आता है। दूसरा, जो है, जीवेषणा में है। कामना में है। उसका आकर्षण यही है कि उसके आधार पर भविष्य की आशा शेष है। इसीलिए मनुष्य भगवान को अपने से अलग मानता है उनसे कुछ मांगता है, और इसी तरह वह इस आशा में जीवित रहता है कि वह जो दूसरा है, उसे आज नहीं तो कल सुख ही देगा। जहां मनुष्य अपने स्वरूप को छोड़कर, अपने स्वभाव से अनभिज्ञ रहकर दूसरे से जुड़ता है वही वह दुख पाता है। यह जो दूसरा है उसका कभी नही हुआ। क्योंकि वह उसका है ही नहीं। उसकी इससे नित्य दूरी है। इसलिए इस दूसरे के लिए, जो संसार है, शरीर है, धन है,परिवार है, सुख की लालसा बनी हुई है। वह कमी पूरी होगी कि नहीं ? मनुष्य उसे ही पा सकता है, जो कि उसका है। सदा से उसका है। हां, आज भले ही उसकी विस्मृति हो गई हो। लेकिन होता यह नहीं है, मनुष्य जो उसका है, जो वह है उसे छोड़कर जो उसे कभी प्राप्त नहीं होने वाला है, निरन्तर परिवर्तनशील है उसे चाहता है और जब वह उसे नहीं मिलता है, तब वह दुखी होता है। विक्षोभ जग जाता है। दुख का कारण है, अपने को छोड़कर, परे सुख को खोज करना। जो स्वभाव है, जो है, उसे भूलकर जो नहीं है, उसमें डूबना। जब तक स्वयं की समझ नहीं होती। दुख के कारण की तलाश नहीं होती। तब तक यह दूसरा ही महत्वपूर्ण रहता है। यही विडम्बना है। दुख, दुखी के उद्वार के लिए आता है। उसकी समझ को जागृत करता है। पर वह लोलुपता के अधीन होकर सुख की तलाश में भटकता रहता है। इसीलिए दुख और उसका प्रभाव आदर के योग्य है। यही प्रभाव अपनी तीव्रता में ”जो है“ उसके प्रति ध्यान दिलाता है। जब वह पाता है कि संसार उसकीआवश्यकता की पूर्ति में सहायक नही है तभी वह अन्वेषी बनता है, खोजी होता है। ”जो“ अब तक विस्मृति में था, उसकी स्मृति ही जिज्ञासा जगा देती है। जिज्ञासा जगते ही विवेक का आदर होता है। विवेक था अभी भी जीवन में था, पर बुद्वि का आदर था। विवेक तिरस्कृत था। विवेक का आदर होते ही अविवेक छूटता है। विवेक ”जो“ है उसके प्रति आदर भाव तथा ”जो“ नहीं है उसके प्रति अनादर का भाव जगाता है। आदर का भाव ज्यों ज्यों दृढ़ होता जाता है, आचरण में स्वाभाविक परिवर्तन आता है। जिसे छूटना है वह छूटना शुरू हो जाता है। अविवेक से ही बुरे भाव और बुरे कर्म होते है। विवेक के जागृत होते ही, जो कुछ श्रेष्ठ है वह आचरण में आने लगता है। साधन प्रारम्भ हो जाता है। साधन कहीं बाहर नहीं, अपने पास ही है। अपनी आवश्यकताओं को समझा जाए। मन का आगे पीछे का चिंतन ही बाधक है। जो स्मृतियांे तथा आकांक्षाओं में डूबा रहता है। यही अविवेक है। यही विक्षोभ का कारण है। इसीलिए आवश्यक है कि पहले निज के विक्षोभ को समझा जाए। जब तक विक्षोभ की समझ नहीं होगी तब तक बाहर आने का सार्थक प्रयास भी नहीं हो सकता। वह सोचता है कि जो दुख है वह जगत के कारण से है। जगत ही सुख देने वाला है। जगत ही दुख दूर कर देगा। जीवन भर भौतिक वस्तुओं की अप्राप्ति ही दुख बन जाती है। वस्तुओं की दासता और उनकी अप्राप्ति दुख का बहुत बड़ा कारण हो जाती है। वह वस्तुओं से अपने आपको बाहर ला नहीं पाता। वह उनकी प्राप्ति के लिए छटपटाता रहता है। यह प्राप्ति ओस कणों से प्यास बुझाने की तरह है। उसकी सांसारिक भूख उसी तरह आजीवन कायम रहती है। कभी कभी अवसर आता है, विवेक कौंध जाता है। उसे लगता है कि कामनाओं की पूर्ति से प्राप्त तुष्टि क्षणिक है। हर कामना पूरी भी नहीं होती, अतृप्त कामनाएं असंख्य रहती है। अपूर्ति से विक्षोभ दुख का अनवरत प्रवाह कायम रहता है। कभी कभी विवेक का आदर जब साधक करता है, तो व्याकुलता बढ़तीहै। जिज्ञासा बढ़ती है। वह अविवेक को समझ जाता है, समझ बढ़ते ही, वह साधन यात्रा पर बढ़ जाता है। अन्यथा वह पुनः विवेक का अनादर करते ही सांसारिक प्रवाह में डूबता चला जाता है। कामना निवृत्ति ही शांति मंे प्रवेश कराती है। यहां सरोवर की लहरें शांत है। तली स्पष्ट दिखाई देने लगती है। चित्त दर्पण है। पक्षी उड़ा तो लगा वह यह दिखा। जब तक वह उड़ता रहा बिम्ब रहा। जाते ही जल फिर वही दर्पण का दर्पण। यही तो प्रशांत मन है। उस दिन पाया, शरद के शांत सरोवर में भी हवा के स्पर्श से लहरें उठ गयी। तब जाना मात्र सरोवर का उद्वेलन हीन होना ही साध्य नहीं है। कामना निवृत्ति से प्राप्त शांति भी स्थायी नहीं है। उसमे रहने का भाव, साधक के मन में सूक्ष्म अंहकार जगा देता है। यहां से पार जाना ही कठिन है। उसके जगते ही यह जो दूसरा है, संसार है, वह उपस्थित हो जाता है। हो सकता है, साधक उपदेशक बन जाए, ऋषि महर्षि हो जाए, भगवान बन बैठे। संसार पर प्रभाव डालने की आकांक्षा बलवती हो जाती है। साधक अपनी विशिष्टता स्थापित करने के प्रयास में डूब जाता है। वह पुनः संसार के आकर्षण में लौट आता है। तो फिर ? जल का बर्फ हो जाना ही यहां साध्य है। सुख दुख, शांति से परे ”जो“ है वही साध्य है। यह सच है शांति बहुमूल्य है। पर अंत मे उससे भी परे जाना है। तभी ”जो“ है उसकी प्राप्ति संभव है। साध्य वही है। जो नित्य है, तथा जिसकी प्राप्ति से नित्य अभय और नित्य शांति प्राप्त होती है। यही धर्म का रहस्य है। जो धार्मिक है वह इसे पाने में समर्थ है। जिसकी प्राप्ति सहज हो, जो दूर नहीं जो विनाश युक्त न हो, तथा जिसमें आत्मीयता हो। जो इसी जीवन में, आज में अभी ही प्राप्त किया जा सकता है, वही साध्य है। साधन की सही समझ और विवेक के प्रति आदर भाव साध्य से अवश्य ही मिला देता है। जीवन आज में, अभी में, वर्तमान में ही जिया जाता है। वही साध्य उपस्थित है। विवेक का आदर होते हीमन की रूग्णता चली जाती है, जो दुख का कारण है। हाॅं, यह जो कल है,हमेशा स्मृति की कोटर से निकल कर आता है, वहीं वापिस लौट जाता है।स्मृति जननी है ,वह निरंतर विचारणा को सृजित करती रहती है।अवधारणा ीभी वहीं जगह पाती है।यह वह ऐसा है, वह तो ऐसा ही है,विचारणा ,अवधारणा का आधार पाकर और पुख्ता होती जाती है।तब विचार बन जाता है। यही विचार मन का ही स्वरूप है। विचार जैसा होता है,मन वैसा ही होजाता है। विचारों का परिवर्तन ही मौलिक परिवत्र्तन है। विचार ही भय है, विचार ही घृणा है,विचार ही लोभ है,वही राक्षस भी बना सकता है,और निर्विचारता ही परमात्मा है,वहीं शक्ति है,वहीं शांति है।वह और कहीं दूर नहीं स्वयं के समीप है,जब यह जाना जाता है,तब जानने की जिज्ञासा में जो प्रयास अब तक किए थे तब उनकी अर्थहीनता का पता लगता है। पूज्य स्वामी जी कहाकरते थे,‘ प्रयासों की आवश्यकता है ,यह जानने के लिए कि उनकी आवश्यकता नहीं रही है।’ शांत रहने के लिए ,शक्ति पाने के लिए आवश्यक है,हम मन के नियंत्रण के लिए,विचारों के नियंत्रण के लिए प्रयास करें। यही आध्यात्म का मार्ग है,जिसका प्रवेश हमारे अंतः करण से ही होता है।

Wednesday, March 2, 2011

गुरू:वाणी 2






2

गुरु पूर्णिमा का उत्सव पहले यहाँ नहीं होता था। शुरु-शुरु मंे बहुत कम लोग यहाँ आते थे। बाद में उनका मन हुआ साल में एक बार कार्यक्रम हो तो सब एक-दूसरे को जानते, मिलते, बस इतना ही लक्ष्य था।



कई बार तो मैं पूरे चातुर्मास कुटिया से नीचे ही नहीं उतरा। फिर लोगों का आग्रह था, स्वीकारना पड़ा। कारण यही रहा। मैं गुरु नहीं हूँ। न ही मेरी कोई इच्छा रहीं। हाँ, आप लोग मानते ह ै, यह आपका विश्वास है, मेरा तो इतना ही कहना है, जो यहाँ कहा गया है, उस पर विचार करंे, प्रयोग करे, अनुभव में लाएँ। अगर आपव को लाभ मिलता है तो आगे बढ़ें। मेरी तो कुटिया का दरवाजा सबके लिए सदा खुला रहता है। यहाँ पर किसी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं है, यह सबकी अपनी ही है।



यह सवाल सब पूछते है कि क्या गुरु की जरुरत नहीं है? अगर मैं कहता हूँ, हाँ, तो सब खुश हो जाते हैं। अगर नहीं, तो सबके चेहरे उतर जाते हैं। इन गुरुओं ने बहुत परेशान किया है। जब बच्चा छोटा होता है, तो उसकी माँ या कोई और उसे पहली बार स्लेट पर कुछ लिखना सिखाता है। बिना शिक्षक के सामान्य शिक्षा भी सम्भव नहीं है। प्रारम्भ में अभ्यास सिखाया जाता है। यह आवश्यक है। जब मैं छोटा था, तब इंजीनियर साहब मिले थे, उन्होंने मार्गदर्शन दिया और कहा, करना तुम्हें ही पड़ेगा। जब मैने कहा, सन्यासी बनना चाहता हूँ, तब वे बोले, भोजन और वस्त्र की आवश्यकताएं कम से कम होनी चाहिए।

बात कहने की है कि मार्ग दर्शन अपेक्षित है। अनन्त यात्रा में बताया गया है कि किस प्रकार रानी चूड़ाता कुंभ को बटुक बनाकर अपने साथ ले जाती है। ब्रह्मनिष्ठ गुरु और सामान्य गुरु में भेद है। आज तो हमें हजारों गुरु मिल जायेंगे। उनकी रुचि लोकेषणा और धन कमाने में है।



ब्रह्मनिष्ठ जिनकी ब्रह्म में निष्ठा हो, जो श्रात्रि़य भी हो, जो कुछ उसने जाना है, वह दूसरों को बता भी सके। पर पर आजकल शास्त्र कथन व बु(ि का पदर्शन अधिक है।



चोयल, औरमेहरा, कृष्णमूर्ति को मानते थे। कृष्णमूर्ति गुरु को नहीं मानते।मानने से न मानना अच्छा है।मैं उनसे यही कहता था।

वे कहते थे फिर आप क्या हैं?

”आपका मित्र, सहयात्री।“



डॉत्र बसावड़ा नेे चोयल को फोन किया था, कि मैं मिलना चाहता हूँ। तब मैं बम्बई गया हुआ था।

बम्बई में पदमा के यहाँ मिलना तय हुआ।

वे आए, दरवाजे पर खडे़ होकर बहुत देर तक टकटकी लगाए मुझे देखते रहे, वे बहुत बडे़ मनोवैज्ञानिक थे।

मैंने कहा, अन्दर तो आइए।

वे अन्दर आए, उन्होंने हाथ बढ़ाया।

मैं मुस्कराया, उनके लिए कुर्सी लगी थी, वे वहाँ बैठ गए।

जाने लगे, बोले, फिर दस-पन्०ह दिन में आऊंगा।

पर वो तो अगले ही दिन आ गए। कुर्सी लगी थी, पर वो नीचे बैठना चाह रहे थे। मैंने मना किया।

उस दिन बोले, जो आपने अर्जित किया है, मुझे दे दें। मैं यह मांगता हूं।

मैं हंसा, मैंने कहा, यहाँ तो नदी बह रही है, जिसका जितना पात्र हो, वह ले जाए।

कहने का मतलब है, कि कही भी हमें हम क्या हैं। क्या जानते है, प्रदर्शन नहीं करना चाहिए। आज जो सब दुकान लगा कर बैठ गए है। इसीलिए कृष्णमूर्तिजी सही कहते हैं, गलत जगह पर जाने से कहीं नही जाना बेहतर है।

”पर आप?“

”मैं यही कहता हूँ बीच का रास्ता ठीक है। एक बार मागदर्शन अवश्य लेना चाहिए। पर गुरु को ही पकड़ कर बैठ गए। उससे कुछ नहीं होगा। इस देश में यही हुआ है। गुरुवाद ने सबको निकम्मा कर दिया है। पहले तो मानसिक गुलामी आई, फिर दैहिक गुलामी आ गई। सात सौ साल से अधिक यह देश गुलाम रहा है, क्यों? जहाँ गीता का उपदेश दिया गया, वहाँ गुलामी क्यांे? कभी पूछा है।



भगवान ने तो यही कहा था-”माम अनुस्मर यु( च...“ मेरा सतत स्मरण, और कर्म कर, पर हमने काहिली को ही धर्म मान लिया।



मैं इसीलिए गुरुपूजा नहीं कर वाता। मुझे कोई पांव में रोली लगाए, माला पहनाए, पसंद नहीं है। मैं भी आप की तरह साधारण इन्सान हूँ। ”आत्मवत सर्वभूतेषु, सर्वभूतेष हितैरेतः, यही सार तत्व है।

फिर दूसरे से पूजा करवाना, यह, कहाँ का नियम है?



पर सब जगह भेड़ चाल है, न तो कोई समझना चाहता है, न खुद प्रयोग करना चाहता है। लोग आते है, बड़ी-बड़ी किताबें लिख देते है।जितना पुराना छप चुका है, उससे हर बार नया तैयार हो जाता है। मैं पूछता हूँ, आपका इसमें क्या है, उत्तर नहीं मिलता है। सब ब्रह्म का पता बता रहे है। भ्रम ही अधिक फैला है।



मैंने पहले ही कहा है, साधक का जो जानना चाहता है,उसकी जिज्ञासा ही बड़ी चीज है। तब जिज्ञासा उसे उस व्यक्ति के पास स्वतः ले जाती है, जो जानता है।मुंडक उपनिषद में कहा गया है कि उसके शीष पर अग्नि जलती है,

बटुक छोटा बच्चा। जो अपनी माँ को ही समस्त ज्ञान का अधिकारी मानता है। उसका और उसकी माँ का जो सम्बन्ध है। देखा है, वह माँ कहकर उसके साथ चिपट जाता है। बाहर खेलता रहेगा, पर जहाँ माँ हटी ,वह तुरंत उसके साथ हो लेगा।यह गुरु और शिष्य का संबंध है। वे तब दो नहीं रह पाते है। जो जहाँ जाना गया है, वह वहाँ तुरन्त सम्प्रेषित होने लगता है।



पर यहाँ तो लोग शार्टकट चाहते है। गुरु हैं, तो तुम्हारे सारे कष्ट दूर हो जायेंगे। भगवान राम ने कितने कष्ट उठाए। कृष्ण को जन्म से ही दुःख मिलेे। पर एक बात है, हम न देखते है, न समझते हैं। उस गुरु से संसार के सुख चाहते है। चाहते हैं संसार पार कर जाना, जाग्रत पुरुष होना। पर भीतर ही भीतर पूरी तरह संसार में डूबे रहते है।



मैं किसी को सन्यासी बनने को नहीं कहता। मैं गृहस्थों के ही घर ठहरता रहा हूँ, मेरी इस बारे में आलोचना भी हुई है। पर सच बात यह है कि आज शांति और शक्ति की उनको ही जरुरत है।



मुफ्त का भोजन पाना मुझको पसंद नहीं था। जब तक शरीर में शाक्ति रही, समाज की सेवा की। सन्यास लेने के बाद गुरुकुल चलाया। संस्था चलाई। जब शरीर से सेवा नहीं होती, तो मन से करता हूँ, न मेरे पास पैसा है, न बैंक में खाता है, न मकान है, न जमीन है, फिर भी प्रसéा हूँ। इस शरीर से समाज की सेवा हुई है। यही जीवन का उद्देश्य है। प्रकृति पर जो निर्भर है, वह उसके कामों का स्वयं संचालन करती है। मैं बहुत बार आपको बताया है, यह कोई शास्त्रों की चर्चा नहीं है, यह अनुभव है। लाभ, लोभ और भय से कोई काम नहीं होना चाहिए। यहाँ सेवा करो, मरने के बाद स्वर्ग मिलेगा, यह भी लोभ ही हैं।स्वभाव ही सेवा रहे। सर्व भूतेषु हितै रतः यह भावना रहे।

होना यही चाहिए, हम अधिक से अधिक वर्तमान में रहें।“



प्रश्न था - प्रारम्भ में कठिनाई आती है।यह समझने में नहीं आता है।

”हाँ, हम हमेशा बाहर ही दुनिया में ही उलझे रहते है, संसार जितना बाहर है, उससे अधिक हमारे भीतर भी है, वह ज्यादा है। हम निरंतर सोचते रहते हैं, रात को सोने का अभिनय करते है, वहाँ भी स्वप्न में विचारधारा शुरु हो जाती है। संसार नाना रुपों में उपस्थित हो जाता है। यह सब मन ही है। वर्तमान में रहने की कला है, जहाँ शरीर है, वहाँ मन रहे।



मैंने यह जाना, इसका प्रारम्भ, रात से शुरु हो सकता है। जब हम अपने रोजमर्रा के काम सारे समाप्त कर बिस्तर पर जाएँ तो तब बाहर के विचारों को आने से रोकंे तथा मन को देखें, वहाँ क्या विचार आ रहे है। यहाँ कोई संकल्प नहीं, कोई आदर्श नहीं, कैसे विचार आ रहे है, उन्हें बस देखें, यही पहला कदम है। होगा क्या, भीतर सजग होते ही, दूसरा विचार आते-आते रुक जायेगा। वही सजगता रहे, यही ध्यान है।



हो सकता है, नींद आ जाए। पर अगर सजगता रही, तो कुछ दिन बाद, एक विचार से दूसरे विचार के बीच का गेप दिखने लग जाता है। यही सार है। यह अंतराल ही बढ़ना चाहिए। यही ध्यान है। सुबह उठते समय भी यही किया करंे। जो विचार आ रहे है, उन्हें देखे। यहाँ सतर्कता पूर्वक किया गया, अवलोकन ही ध्यान बन जाता है। फिर जब दिन में कभी फुरसत मिले, हमें यह क्रिया करते रहने देना चाहिए। इससे वर्तमान में रहने में सहायता मिलतेी है। मन का भटकाव कम होने लगता है।



प्रश्न था-”पर यह संभव नहीं हो पाता है।“

”हाँ, प्रारम्भ में कठिनाई आती है, मन का स्वभाव है। वह नियंत्रण में नहीं आना चाहता। इसीलिए यहाँ बल नहीं लगाना है। क्रिया सहज हो, इसमें कोई कठिनाई भी नही है। फिर जो भी कार्य हो, क्रिया हो, वहीं मन को रखनेे का अभ्यास बने।“



प्रश्न था- ”फिर त्राटक, ध्यान, मंत्र जप, पूजा, का क्या प्रभाव रहेगा?“

”यह सभी मन को एकाग्र करने की विधियाँ हैं। समय-समय पर बताई गई हैं। मूर्तिपूजा का भी यही आधार बना था। पर मन जितना बाह्य में उलझता जाता है, उतना ही मन बाह्य से प्रेरित होकर दबाव बनाता चला जाता है। मंत्र भी एक बार गहराई में जाने के बाद छूटता नहीं है। ध्यान निर्विचारण को पाना है। किसी मूर्ति, चित्त पर एकाग्रता नहीं है। हम जिसके बारे में ज्यादा सोचते है, उसके गुलाम हो जाते है। क्या कारण रहा, इस्लाम में उनके महान गुरु का चित्र ही नहीं बनाया। चित्र मन ही बनाता है। गुरुजन का यही खेल है, हम गुरु के गुलाम बन कर रह जाते है।



एकाग्रता प्रारम्भ में सहायक है। बच्चों को सिखाते है, सूर्य की किरणें कागज को जला नहीं पाती है। पर जब आतशी शीशे से गुजरती हैं, तो कागज जल उठता है। एकाग्रता में शक्ति है। परन्तु बाद में यही एकाग्रता बाधक भी हो जाती है। निर्विचारता में रहने में यही बाधा बन जाती है।अंत में इसे भी दूर होना पड़ता है। पुरानी कहानी है।परमहंस जब भी ध्यान लगान लगाते थे, माँ काली के ध्यान में उनका मन डूब जाता था। गुरु उन्हें निर्विचारता का अभ्यास करा रहेथे। पर उनका चित्त काली में डूब जाता था। तब गुरु ने कांच निकाल कर , उनकी भृकुटि के बीच में चुभो दिया। खून निकल आया। काली की प्रतिमा चली गई, वे शांत मन से समाधि में चले गए। सार क्या है, एकाग्रता कहीं भी हो, वह भी अंत में एक बाधा बन जाती है। अनंत के सरोवर में डुबकी तभी लगती है, जब बाहर के सारे आधार खो जाते है, इसीलिए यहाँ जो अभ्यास है, वहाँ मन को प्रारम्भ से ही कही चिपटने की जरुरत नहीं रहती है।



साध्य तक पहुँचने की यह सरल विधि है।

बाह्य मन ही संसार है, वह तो रहेगा, पर जब मन अन्तर्मुखी होकर अन्तर्मन में लीन हो जाता है, तब भटकाव नहीं रहता। शांति रहती है। जो गीता के हमारे अध्याय में बताया है, प्रसाद की प्राप्ति होती है। यह प्रसाद मांगने से नहीं मिलता, न चोरी से मिलता है। यह सहज प्राप्ति है, जिसको पाकर चित को ब्राह्मी स्थिति प्राप्त होती है।



वह संसार में ही रहेगा, उसके सभी कार्य यथावत होते रहेंगे। पर उसका व्यवहार संतुलित, स्थिति प्रज्ञ की तरह रहेगा। यह बाते पढ़ने-पढ़ाने की भी नहीं है। यह हमारा स्वभाव बनना चाहिए। ऐसा व्यक्ति सभी के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है। पता करंे, अपने आप से पूछें, क्या आप यह नहीं चाहते है?







आपने घर छोड़ दिया। सन्यास ले लिया। वहाँ आश्रम बन गया। वहाँ सामान आ गया। सम्पत्ति बन गई। खूब किताबंे लिख दी। खूब विचार इकट्ठेे कर लिए, यह क्या है? यही लोभ है। वस्तु लोभ नहीं है। पर उससे चिपकाव लोभ है। यह जाता नहीं है। यह मन का स्वभाव है। जितना भीतर खालीपन होता जाता है, उतना बाहर का संग्रह भी कम होने लगता हे। पर हम यह नहीं चाहते। बाहर की हर वस्तु, हर विचार की छाप हमारे भीतर इकट्ठी होती रहती है।



आपने मुझसे पूछा था, आप को याद होगा, ”मुझ में क्या परिवर्तन आया है?“ तब मैंने कहा था, अभी तो संग्रह बहुत जमा है, ठसा-ठस। संग्रह कम होता है, निरन्तर वर्तमान में रहने के अभ्यास से। पर यह बात समझने में नहीं आती। बाहर का दबाव निरन्तर हिलाता रहता है। कभी सोचने का समय नहीं मिलता। बस आए, कुछ सवाल पूछ लिए और प्रसन्न हो गए। यही तो अब तक किया है।



भीतर से खालीपन न हो, यह आदत हो गई है। पेट की भूख तो शांत हो जाती है। पर मन की भूख नहीं होती है। शास्त्र कहता है‘प्रजहाति यदा कामनि’ जहाँ सब कामनाओं का क्षरण हो जाता है। यह कामनाएं ही तो भीतर भरी रहती है। हम निरन्तर जो बाहर का संग्रह करते है, वह अधिक महत्वपूर्ण नहीं है। वह तो यहीं रह जाता है, पर भीतर जो संग्रह जमा करते जा रहे हैं, उस पर निगाह रहे। वह कम हो। कहा जाता है, बीज भुन गया। फिर उसकी अंकुरण क्षमता समाप्त हो जाती है। होना यही है। निरन्तर यही अभ्यास होना है, पर यही नहीं होता है।



आपको दो संतों की कहानी सुनाई थी। जो सब छोड़कर हिमालय में कुटिया बना कर रह रहे थे। अपनी लंगोटी सुखाने के लिए रस्सी ले आए थे।बांध दी। फिर रस्सी पर झगड़ा हो गया। दोनों का आधा-आधा हिस्सा था। मारपीट तक हो गई।



वस्तु में मोह नहीं है, लोभ वस्तु में नहीं है। लोभ मन में है, यही जानना महत्वपूर्ण है।

चन्द्रधर जी ने बहुत बड़ी किताब लिखी है। भंेट करने आए थे। अद्वैत वेदान्त व बु( दर्शन का तुलनात्मक अध्ययन है। मैंन देखा वे बहुत बड़े विद्वान हैं। आते है। मैंने उनकी ओर ध्यान से देखा। उनकी आंखों में झांका। वे सकपका गए। मैंने कुछ नहीं कहा। पूछा आपने क्या जाना? वे बोले, जानना क्या? किताबों का सार है।



सार है, जाना क्या जाता है। सूचनाएं ज्ञान नहीं होती है। यहाँ जो भी आता है, पूरा गलेमर भरा हुआ आता है। लगातार बोलता रहता है। जब उसके होठ बंद हो जाते है, तब उसकी ओर ध्यान जाता है। सम्बन्ध सुनने का भी टूट जाता है। वह समझता है, बहुत ज्ञान की बातें कर रहा है। आत्मा परमात्मा की चर्चा ज्ञान की बात है।” अरे! ये तो किताबी सूचना है, तुम्हारा अपना अनुभव क्या है? वह चुप हो जाता है।“



अधिकांश के सवाल किताबों के सवाल है। मैं कहता हूँ, प्रयोग करो, अनुभव में ले आओ, वह तुम्हारा अपना होगा। मेरी बात भी मन मानो। प्रकृति ने दो पत्तियाँ कभी एक सी नहीं बनाई। हमें किसी की भी नकल नहीं करनी चाहिए।



‘ज्ञान’ शब्द का अर्थ बाहर की दुनिया की जरुररत नहीं है। ये सूचनाएं निरन्तर बदलती रहती है। एक आदमी बाहर से बहुत विद्वान हो सकता है, पर भीतर से उतना ही रीता, किताबी जानकारी ज्ञान नहीं है। कबीरदास कहीं पढ़ने नहींगए। पर उनका कथन अविश्वसनीय नहीं है।

यह जो आज का व्यक्ति है, यह पहले की अपेक्षा अधिक जानकार है। इसके पास सूचनाओं का विशाल भंडार है,पर यह अपने आप में उतना ही दूर है। जब हम निरन्तर वर्तमान में रहने लगते है, तब क्या होता हे। भीतर का संग्रह या तो खतम हो जाता है या भुनेे बीज की तरह अपनी अंकुरण क्षमता खो देता है। तब जो खालीपन है, वह अनुभव में आता है, वहाँ वह निरन्तर अंतर्मन जो विराट से जुड़ा हुआ है, वह अचानक उसे भर देता है,उसे अपने अस्तित्व का बोध होता है। वह जान जाता है, वह अकेला नहीं है। यह अनुभूति ही ज्ञान है।



”पर यहाँ तक मन नहीं आने देता है?“

”क्योंकि वह स्वयं खोना नहीं चाहता। न हम में इतना साहस होता है, हम उसके पार छलांग लगालें। मन ही लोभ है, मन ही अहंकार है। इसकी कोई अलग मूर्ति थोड़ी होती है। यह विचार रुप है। तुम यहाँ आए हो, कितने वर्षो से मेरे साथ रहे। तुम किसके साथ रहे, मेरे विचारों के साथ या मेरे साथ। तुम हर बार उलझते रहे। मेरे विचार जो आज हैं, कल बदल जाएं। यहाँ सब परिवर्तनशील है, पर मैं जो हू., जिसे गीता में ‘माम’ कहा है। उसके साथ रहना ही सत्संग है।



पर तुम्हारा मन, बु(ि हमेशा तुम्हें भी बाहर ढकेलती रही। कभी विश्वास तो कभी अविश्वास। मैं यही कह सकता हूँ, जब जिम्मेदारियाँ खत्म हो जायेगी, तब तुम्हें भी वह प्राप्त होगा, जो तुम चाहते हो। पाना जैसी चीज कोई नहीं है, पर जो अस्तित्व है, उसका अहसासा होगा, यही जीवन का उद्देश्य हौ। यहाँ पाना और खाने जैसी चीज कोई नहीं है। जब तक विचारों से जुड़ो़गे, सवाल पूछते रहोगे, अपने आपको विशेष मानते रहोगेे, भटकाव ही होगा।जैसे सब हैं, वैसे ही हम हैं। सब मिट्टी के भांडे है, इससे अधिक नहीं। यही अहंकार है। धन के अहंकार से भी अधिक, इन झूठी सूचनाओं के संग्रह का अहंकार होता है। दो पात्रों में पानी भर दो, नली से जोड़ दो। दोनों पात्रों में जल की ऊंचाई बराबर हो जाती है। जहाँ गुरु है, वहाँ बस रहना है। कोई तर्क नहीं हो, वहाँ सहज चेतना का प्रवाह बन जाता है, पर अहंकार यही नही होने देता। बु(िमता का अधिक होना भी हानिकारक होता है। जब यह विचार भी गिर जाता है, तब भीतर से स्वतः अपने होने का अहसास होता है। पर यह विचार नहीं है। हमेशा भाषा में अपने आपको व्यक्त करने की कोशिश मत करना। अहंकार फिर आकर दबोच लेगा।‘मैं हूँ ही नहीं’, यह सोच ज्योति की तरह बना रहे। शास्त्र ने बहुत तरह से समझाने का प्रयास किया था। पर उनकी भी कमजोरी है। अनुभव, शब्द से परे है। वहाँ तुम्हें ही अपना रास्ता तलाश करना है। वहाँ किसी की जरुरत नहीं होगी। शास्त्र, गुरु सब बाहर ही रह जाते है। उस यात्रा में तुम्हें अकेला जाना है।गुरु बस उसके भीतर इस ‘मैं नहीं हूँ’ यह बोध एक चिन्गाारी की तरह छोड़कर अलग हो जाता है। इसीलिए मैंने कहा था, मैंने किसी को शिष्य नहीं बनाया। हाँ, जो तुम मानते हो, उसके लिए स्वतंत्र हो, पर मुझे ढोना नहीं। मैं भी एक साधारण-सा इन्सान हूँ। जो मैंने जाना है, कुछ भी छिपाया नहीं है।“



”आपके पांव में तकलीफ है, घाव है, आपको दर्द तो बहुत होगा?“



”हूँ , ;हंसते हैद्ध पर जब मैंने कहा आपकी तरह मैं भी हूँ, तो आपको अच्छा लगा होगा। दर्द तो होगा, होता है, पर मुझे अनुभव नहीं होता। मैं अपने आपको वहाँ से हटा लेता हूँ। डाक्टर आते है , चीरफाड़ करते है, पर मुझे पता नहीं लगता। मैं एनस्थीटिया नहीं लेता। बंबई में आंख का आपरेशन था, उनसे मना कर दिया था। पर वे नहीं माने इंजेक्शन लगा दिया। मुझे होश था। उसने सहायक से पूछा था, ‘ क्या इंजेक्शन नहीं दिया’। मैंने कहा, ”दिया था आप अपना काम करंे।“ शरीर का जो धर्म है, वह यथावत रहता है। पर विषय, इन्द्रियाँ और मन का सम्बन्ध टूट जाता है। इस अवस्था में जहाँ मन क्रियाशील नहीं है। वह रहेगा तो पर एक कौने में में पड़ा रहेगा। जरुरत होगी तो जुड़ेगा, यह बात समझ में आने वाली नहीं है। अनुभव करो। निरन्तर वर्तमान में रहने से यह सम्भव होता है। यहाँ किसी प्रकार की न तो धारणा रहती है, नहीं विचारणा। मन ही समय है। जहाँ वर्तमान है, वहाँ न भूत है, न भविष्य है। बस बूंद है, जो सागर से मिली नहीं है, वह जानती भी है, जा रही है, यही अनुभव रहता है।



”क्या यहाँ आकर भी पतन हो जाता है?“

“हाँ, शास्त्र में भी बहुत कहानियाँ है, इस जगह आकर भी संभलना रहता है। कांस्टेन्ट अवेयरनेस, जागरूकता

से। वह निरन्तर बनी रहे। रमण महर्षि के अंतिम दिनों में उनकी माँ वहाँ आकर रहने लग गईं थी। उनकी मृत्यु हुई। रमण ने उनके लिए समाधि बनवाई थी। वहाँ भी पूजा उनके ही सामने होने लग गई थी। ओशो भी पहुँच गये थे। फिर हीरे के मुकुट लगाने लग गए। सब चलता है, यह अंतिम अवस्था बस एक छलांग है, बहुत पास है, पर जरूरत यहाँ दुकान पूरी खाली करने की होती है। कुछ भी नहीं, मात्र अस्तित्व, वह भी मिट रहा है।



”बूंद जब समुद्र में मिल जायेगी, वहाँ क्या अनुभव होगा,“ ......

”कौन किसको बताएगा? पूछो मत, चुप रहो।

तुम्हें एकलव्य की कहानी सुनाई थी। कहानी सबने सुनी है, पर अर्थ समझाा नहीं है। जब गुरु के साथ एक लय बन जाती है, एक रसता, तब उसी की ही अनुगूंज सुनाई देती है। वही उसके भीतर प्रकट हो जाता है। पूरा अस्तित्व उसमें प्रकट हो जाता है। भीतर सब खाली कर देना। यही अभ्यास रहे। कुछ भी नहीं रहे। सुख-दुःख सब आएंगे। हिलना मत। डगमगाना मत। मुसीबतें आएंगी। छाती खोलकर सामना करना। हमें पोला नहीं होना है। प्रकृति पर भरोसा पूरा रहे। जितना भीतर खाली होता जाता है। न भूत न भविष्य, वहाँ बस वाह्यमन सिमटना चला जाएगा। फिर अंतर्मन ही सारे कार्य व्यवहार संभाल लेगा। वही विवेक है। वही गुरु है। सब जगह वही है, वही होगा, मौन में वही बोलेगा। कार्य-व्यवहार सभी सही होते वले जाएंगे।



मेरे जाने के बाद मेरी बाते समझ में आयेगी। अभी व्यवहार में बहुत से काम हैं, घर है, परिवार है, नौकरी है।सब जगह रहो, बाहर की बात बाहर रहे, भीतर नहीं ले जाना है। रात को बिस्तर पर जाएँ। पर बाहर का सब छूट जाए। वर्तमान में रहने से पहली यही बात मिलती है। जीवन और जगत सें कटकर या काटकर कही नहीं जाना है। दूसरे क्या करते हैं, हमंे इससे कोई मतलब नहीं। हमें जो काम मिला है, उसे पूरा करना है। मन अधिक से अधिक वहीं रहे। स्वाभाविक रुप से मन की गति कम होती है। उसकी शक्ति बढ़ जाती हैं। हमें रहने की कला आनी चाहिए। बाहर जो घट रहा है, वह हमारे संकल्पों से कम होने वाला नहीं है। अरबों मनुष्यों के संकल्प है। जो घट रहा है, जैसा घट रहा है, वहाँ रहना है। मैंने बहुत पहले कहा था, शराब, जुआा, यह कभी बंद नहीं होगा। यह प्रकृति चाहती है। हजारों सालों से इन्हें बंद करने का प्रयास हो रहा है। जितना समाज आगे बड़ रहा है, ये प्रवृत्तियाँ भी उतनी तेजी से आगे बढ़ी हैं। समझना कठिन है। जिसने हमको बनाया है , उसी ने उनको भी भेजा है। अनावश्यक इस पचड़े में मत पड़ना। यहाँ न कुछ अच्छा है, न बुरा। चीजों को जैसे घटना है, वह घटेगीं पर हमें प्रभावित नहीं होना है। कहने का मतलब है न अतीत में झांकना है, न भविष्य में कल्पना करना है। दोनों ही मन के खेल है। यहाँ कुछ भी न अच्छा है, न बुरा है। नैतिकता हमारे ऐच्छिक कर्मो से आती है। जो माँस खाते है, वे माँस को अपने भगवान को अर्पित करते हैं, शाकाहारी फल-दूध अर्पित करते है, ये सब उनकी परम्पराएं हैं।



हम इस विवाद में नहीं पड़ना है। जो जहाँ जैसा है, वहाँ वह है। हम कौन बदलने वाले होते है। हाँ, हमारा ही यह कत्र्तव्य हो तो उत्कृष्टता के साथ कत्र्तव्य निभाना चाहिए। भागवत में कहानी है , उस मांस बेचने वाले कोभी वही स्थिति प्राप्त होगई थी , जो उस संत को दुर्लभ थी। जो सवाल पूछने उस के पास गया था।

मैंने आपको बहुत पहले कंवरलाल की लड़की की शादी की घटना बताई। उसकी मदद के लिए धन जमा किया। प्रकृति ने मना किया। कुतिया काट लेगी पता लगा। उसने काट भी लिया। धन उस तक पहुँच भी गया। पर उसके काम नहीं आया। कोई ले गया। प्रकृति के खेल में हम सहयोगी तो बन सकते है, पर उसकी इच्छा के विरु( कार्य नहीं करना है, यह ध्यान रहे।



हम जब अंतर्मुखी बनेंगे,ें भीतर से अंतः प्रेरणा अपने आप बतायेगी, क्या करना है, क्या नहीं करना है। मैंने दीनदयाल जी को बताया था। मुझसे भी एक कार्य हो गया, जो नहीं होना था। मेरे मुँह से निकल गया, हो जाएगा। काम तो हो गया, पर प्रकृति के विरु( था, उसका परिणाम भी मिला। यह अटूट सि(ान्त है, याद रखना। शक्ति जरा सी आते ही बाहर का प्रलोभन बहुत जोर से आता है। मैंने भोग लिया, मेरा योग था। हाँ, अब दुकान खाली है। कुछ नहीं बचा है।



एक बात हमेशा याद रहे, जो अंतःप्रेरणा उठे, वह कार्य करते रहना है। पर कोई अपना चयन नहीं हो, अपनी निजी मान्यता नहीं हो। जहाँ कामना है, वही मन है। मन का जाला, मकड़ी के जाले से भी महीन है। इससे निकलना कठिन है। शास्त्र ने इसी का माया कहा है, ‘मन माया दुरत्या, यह मेरी माया है’ मेरी, भगवान कृष्ण की नहीं, तुम्हारी है। निरन्तर वर्तमान में रहने से ही इससे पार जाया जा सकता है। वर्तमान में क्या होगा, क्रिया होगी, पर विचारणा का दबाव नहीं होगा। लोग पूछते है, क्या मन नहीं होगा। अरे! मन तो भूत और भविष्य में रहता है। वहाँ जो है, बहुत शक्तिशाली है, पता करो, वहाँ सजगता तो होगी। पर वहाँ मन का दबाव नहीं हैं, वहाँ स्वतः ही कामना नहीं है। यह कोई निठल्ले की अवस्था नहीं है। आज भी इस नब्बे साल की उम्र में शरीर थक गया है, फिर भी में निरन्तर क्रियारत हूँ।

























14

”मुझे याद है, आज सत्ताईस वर्ष पूर्व आपसे मिला था, तब लगता था, बहुत कुछ पाया है, बचपन से ही संस्कार थे। साधना जैसी भी मिली, करता गया। पर अब इतने वर्षो बाद लगता है, कुछ नहीं पाया है। मैं वैसा का वैसा ही रह गया हूँ। मात्र कुछ भावनाएं साथ रही, वे यहाँ आकर पूरी हो सकती है, यही उम्मीद बची रही। शुरु के वर्षो में जिज्ञासा थी, पर धीरे-धीरे लगा, मैं कही का नहीं रहा। आपने ‘अनंत यात्रा’ के पृष्ठ भेजे थे, मैंने छपा दिए। पर लगता है , उस उपन्यास के नायक ‘शिखिध्वज’, से भी गई गुजरी मेरी हालत रही, मैं न तो पूरी तरह अपने आप जुड़ पाया, न पूरी तरह संसार में ही पूरा उतरा। क्या कारण रहा?“



”जाना कहाँ था, मैंने तो कभी कोई आश्वासन नहीं दिया। जब में ही हिमालय से उतरकर बकानी के इस गांव में आ गया, तो जाना कहाँ है? हम आशाएं लेकर ही कहीं जाते है। वो कहते है, जब तक हम है, आप यहाँ है, चिन्ता न करे, ये सब पाखंड है। प्रकृति का अपना एक नियम है, उससे हम सब बंधे है। उम्मीद किससे? यहाँ तुम्हारी या किसी की आशाओं को पूरा क्यों करना है? जो यह वादा करते है, वे अपने आपसे झूठ बोलते है। मैं तो कुछ नहीं करता, जानता भी नहीं, बाहर क्या हो जाता है। कुटिया में गांव वाले आते है, बस नहाये-धोये बाहर चबूतरे पर सो गए। जाते समय मिलने आते है, कहते हैं, अच्छी नींद आई। उनकी तो कोई आशा नहीं है। न ही वे कुछ पाना चाहते हैं। जो पाने के लिए आता है, उसकी कभी कोई तृप्ति नहीं होती है। जो जानता है, वह कुछ करना नहीं चाहता। आप इतने वर्षों से यहाँ है? मैंने तो कोई सवाल आपसे नहीं पूछा। आपसे यही कहा है, सवाल नहीं, उत्तर देना सीखो। सवाल मन करता है, उत्तर हृदय देता है।



पर अभी जो कहा गया है, उस पर विश्वास नहीं हुआ। विश्वास तो अंधा होता है। जो माना गया है, वहाँ विश्वास तो पूरा करो। कमी यही रही। मैंने आपको पत्र में लिखा था, अभी आप में आत्मविश्वास की कमी है। मुझे उम्मीद है, भविष्य में आपका हर कदम सही ही होगा। मुझे तो उम्मीद है, पूरा विश्वास है। जो कहा है, उसे सुनो, उसे समझो, प्रयोग में लाओ। उम्मीद नहीं, आशा तो परम दुःख का कारण है। यहाँ तो बस एक सीरियल चल रहा है, इससे अधिक नहीं, जो काम प्रकृति ने सौपा है, उसे पूरा कर दो, बस ज्यादा उलझना बेकार है।“



”आपने अंतत यात्रा में कुंभ के द्वारा नीलकंठ को कहलाया है। मेरा कार्र्य तुम्हारा विवेक जाग्रत करना था। हो सकता है, इसके बाद मेरा शरीर भी न रहे...यह क्यों?“



”क्यों, बस एक कहानी है, बस। प्रकृति हर एक को अपना कार्य करने भेजती है। यह भी कि एक ड्रामा चल रहा है। इसका कोई कारण नहीं है। किसी ने कहा है,‘एब्सर्ड ड्रामा’, आपने ही बताया था। इसका कोई कारण नहीं है। बु(िमता और विवेक में फर्क है। जब बु(ि शत-प्रतिशत शु० हो जाती है, तब विवेक जाग्रत होता हे। नीलकंठ और कुंभ एक ही सिक्के के दो पहलू है। जो मन संसार में भटकता है, वही मन अंतर्मुखी हो जाता है, तब वह अपने अस्तित्व को पाता है, पर मार्ग विवेक के द्वारा ही मिलता है। संसार में सफलता बु(ि के द्वारा मिलती है। शक्ति एक ही है। बु(िमता जहाँ दुनिया में वैभवशाली बनाती है, वहीं विवेक भीतर की सम्पदा को सौपता है। पर जो विवेकी है, उसे इस बात की कोई चिन्ता नहीं है कि उसे लोग किस तरह देखते है। वह बाहर के दबाव में विचलित नहीं होता है। पवित्रता उसकी अपनी निजी होती है, वह बाहर के दबाव के आगे अपने आपको बदलता भी नहीं है। मैंने बकानी की घटना बताई थी, जब गुरुकुल शुरु हुआ, तब मेरे विरु( बहुत ही गलत व्यवहार होता था। यहाँ तक कि मुझे मारने के

लिएभी लोग आए थे। यहाँ तक कि जो गुरुकुल का सेवक था, वह भी यह ंजानता था, पर उसने भी मुझे नहीं बताया। वे लोग लाठिया लेकर आए, मैं कुए पर एक लंगोटी में नहा रहा था। वे लोग सामने आए और लाठी मारकर नमस्कार करके चले गए। बाद में मैंने पूछा क्या बात थी। तब मुझे बताया गया था कि मुझे पीटकर भगाने के लिए कोई षडयंत्र था। बात बताने की है कि मुझे पता हो जाता तो क्या होता? मैं भी कुछ सोचता? पर नहीं, प्रकृति ने हमें साधारण मनुष्य बनाकर ही भेजा है।हमें, हम कुछ विशिष्ट हैं, ज्यादा जानते है, इस भ्रम से दूर रहना होगा। जो वास्तविक ब्रह्मनिष्ठ गुरु होते है, वे अपनी किसी भी विशिष्टता से अवगत भी नहीं होते। जो कुछ बाहर अप्रत्याशित घट जाता है, वह स्वतः हो जाता है, वे इस बारे में किसी भी प्रकार की कामना भी नहीं करते।

यहाँ बहुत से लोग आए। आए और चले गए, साधारण सी कुटिया में उन्हें कुछ नहीं मिला। वे कुछ पाने आए थें, चले गए, कुछ रुक गए कुछ ठहर गए। कई लोग हैं, क्यों रुक गए उन्हें पता नहीं, डॉ. बसावड़ा आए थें। शिकागो में अपना क्लिनिक चलाते थे। दरवाजे से मुझे एकटक देखते रहे, फिर पास आकर बोले, जो आपने पाया, मुझे दे दें। मैंने कहा मुझे पता नहीं, क्या है। यहाँ तो नदी बह रही है, वह सभी की है।आपका पात्र जितना बड़ा है , ले जाएँ मुझे कुछ पता नहीं है। यह जल सबका है, किसी एक का नहीं है।

आप अपने सवाल का उत्तर खुद पता करें, उत्तर मिलेगा।











































































15

आप ही क्या, यहाँ जो भी आता है,शार्टकट चाहता है। यह दुनिया का कायदा है, दुनिया मेंसफलता पाने के लिए शार्टकट चल पड़ा है। परयहाँ का नियम दूसरा है।यहाँ कोई शार्टकट नहीं है। मुझे साठ साल से अधिक का समय लग गया था। बचपन में एक बार बैठा था। तब अचानक विचारों की श्रृंखला रुक गई थी। कुछ समझ नहीं पाया। फिर इंजीनियर साहब से पूछा, उन्होंने सब समझाया, पर फिर मैं भी परम्परागत साधनाओं में चला गया। धीरे-धीरे सब छूटता गया, आपने ‘अनाम यात्री’ भी लिखा है। जब मुझे इतने वर्ष लग गए। आप चाहते है, कुछ दिनों में कुछ घंटों में हो जाए। आप जाग्रत हो जाएं। ‘अनन्त यात्रा’ में कहा है, लगन महत्वपूर्ण है, एक दिन लक्ष्य तक ले जाती है। शस्त्रों ने इसीलिए इसे साधना माना है।



मैंने बहुत बार समझाया है, शरीर और उसके द्वारा की गई साधनाओं से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। यह मानसिक क्रिया है। गीता में दो शब्द आए है। ‘मन‘ और ‘माम,’ एक व्यक्तिगत मन है, दूसरा अंतर्मन है। मैंने कभी आत्मा शब्द का प्रयोग नहीं किया। यह रुढ़ हो गया है। फिर इसकी व्याख्या करो। ईश्वर शब्द भी रुढ़ हो गया है। सबके अपने-अपने ईश्वर है। जैसे कागज की दो परते होती है, उसी तरह इस मन की दो परत है। एक बाहर की ओर है, एक भीतर की ओर है। बाहर की ओर जो जाता है, वह आपका बाहरी मन है, जो भीतर की ओर हो रहा है, वह आपका अंतर्मन है। है वह शक्ति एक ही। एक की पहचान बु(िमता से होती है, दूसरी की पहचान विवेक से होती है।



सबसे कठिन होता है मन और मस्तिष्क का गठजोड़ टूटना। मन का यह अस्वाभाविक निवास स्थान है।

मन का मूल स्थान नाभि में है। इसे आप ”कॉस्मिक माइन्ड“ या ”नो माइन्ड“, भी कह सकते है। मैंने इसे अंतर्मन कहा है। यह विराट से जुड़ा रहने कारण अत्यधिक शक्तिशाली है। पर यह जो कुछ कहा है, यह बु(िगत विवेचन नहीं है। यह उससे परे है, यह अनुभव है। पहले आपको अपने मन को नियंत्रण में ले जाना होगा।



मैंने बार-बार कहा, मन की मृत्यु नहीं होगी। मन का नाश नहीं होगा। पंतजलिजी ने निरोध शब्द को सही तरह से समझाया होगा। चित्त की वृत्तियाँ जो तरंगों की तरह है, जब शांत हो जाती है, तब क्या होता है। योग मन और प्राण दोनों शक्तियों का एक हो जाना है। यह स्वाभाविक अवस्था है। अनन्त यात्रा में ‘रानी चूड़ाला’ राजा शिखिध्वज को यही समझाती है, आसन, प्रणायाम आदि बहिर्मुखी निरर्थक साधनाओं सेकोई लाभ होने वाला नहीं है।



बाह्य मन जब नीचे उतरता है, तब इसकी अनुभूति स्वयं को होती है। विचारों की संख्या कम होने लगती है। कुछ दिव्य अनुभव भी होते है। अनवरत नाद सुनाई पड़ता है। पूर्वभास सा होने लगता है। फिर मन धीरे-धीरे कंठ पर होता हुआ हृदय तक आता है। यहाँ पर आकर प्रेमानुभूति उठती है। रविन्०नाथ टेगोर का संस्मरण पढ़ा था।अचानक उन्हें तालाब में, रास्ते के पोखर में, छोटे डबरेमें एक ही प्रकाश दिखाई पड़ा था, यह बात गीतांजलि लिखने के बहुत बाद की है। मन जब हृदय पर आता है, तब बाहर का बहुत कुछ छूट जाता है। यहाँ पर आकर बूंद निर्मल तो हो जाती है, पर तभी भीतर का भी अनुभव होता है और बाहर भी आना-जाना बना रहता है।



पर हमारा मन अहंकारी है, वह बाहर अपनी पहचान चाहता है। संत लोग कितनी मालाएं पहनते है, भभूत लगाते है, इससे क्या होगा? जो नहीं है, क्या वह प्रकट हो जाएगा। वह तो तभी प्रकट होगा। जब मन, अंर्तमन में लय होगा। तब अंतर्मन सारे कार्य व्यवहार संभाल लेता है। बु(ि विवेक में डूब जाती है। यहाँ पर आकर राग-द्वेष विलीन होने लगते है। हम कहते है, दर्पण हो जाओ। वह यहाँ घटता है, पर यहाँ आओगे कैसे?



बहुत पहले जब आप मिले थे। मूलचंद जी आते थे। डाह्याभाई आते थे। पोस्टमास्टर कन्हैयालाल जी थे। वे लोग आते गुरुकुल में थे। पर इनका अधिक समय आसन, प्रणायाम, शास्त्र अध्ययन तथा बातों मे बीतता था।मैंने एक-दो बार इशारा भी किया पर समझ नहीं पाए। वे बहुत भले सेवा भावी थे।निर्मल चरित्र के थे। पर मन जो एक बार परम्परागत विचारों में बंध जाता है, वह छूट नहीं पाता है। मन तो किसी न किसी एक खूंटे में बंधा रहना चाहता है। कन्हैयालाल जी विपश्यना सीखकर आए थे। वे वहाँ कुछ बन भी गए थे। चोयल साहब कहते थे, ध्यान सिखाओ, वे कृष्णमूर्ति के अनुयायी है, वे अवेयरनेस की बात करते है। जब कृष्णमूर्ति आते वे और उनके मित्र उनके लैक्चर सुनने पहुंच जाते।फिर मुझे सुनाने आते। मुझे उस आधार पर परखते। अगर मैं उन जैसी बात कर रहा हूॅं, तो ठीक है, नहीं तो, क्या कहा जाए?



चहे मंत्र जपो, किसी मूर्ति का ध्यान लगाओ, विपश्यना में जाओ, सब बाहर ही भटकाते रहेंगे। यह बात ध्यान रखना। जब स्वाभाविक साधन उपलब्ध है, तब बाह्य साधनों में जाकर मन को भटकाने की क्या जरुरत है?



मैंने ‘अनंत यात्रा’ में कहा है, आपको समझाया है, जो भी कार्य प्रकृति ने सौपा है, मन को पूरी तरह उस में लगा दो। किसी भी हालत में उसे विपरित जाने से रोकना होगा, मन की यह स्वाभाविक अवस्था हो जायेगी। वह हर जगह एकाग्र होने लगेगा। किसी एक ही मुकाम पर एकाग्र करने से उसकी दासता शुरु हो जाती है। ये सारेे, पंथ मत, मनुष्य को गुलाम बनाए रखने की परम्परा में ही है। ये सब व्यर्थ हैं। जो भी साधन है, उसमें मन लगाए रखना ही सार है।



दूसरी महत्वपूर्ण बात है, मन जब क्रिया में न हो, तब उसे बलपूर्वक क्रिया में लगाना बेकार है। यह सब सम्भव होता है, खाली समय मिलते ही अपने मन को विचार रहित लाने का प्रयास करना। यह सामान्य विधि है। इसे अवलोकन कहदो। धीरे-धीरे दो विचारों का गैप अनुभवन में आता है, इसे आप वत्र्तमाव कह सकते है, यह समय नहीं है। विचार ही भूत और भविष्य में रहता है। जहाँ विचार नहीं है, वही वर्तमान घटता है। भले ही यह क्षण भर का हो, साधना यही है। यह अन्तराल धीरे-धीरे बढ़ता जावे। वर्तमान में विचार अपने आप गिर जाता है। वर्तमान ही, इस अनंत का दरवाजा है। ‘अनंत यात्रा’ में इसी बात को स्पष्ट किया है।



बात होती भी है, लोग आते है, पूछते है। मैं कहता हूँ, वर्तमान में रहो। वो कहते है, यह कैसे सम्भव है। मैं कहता हूँ, आप यहाँ आए है, अकेले आए है या और भी साथ है? वे हँसते है, कहते है, अकेले है, फिर मैं चुप हो जाता हूँ। कैसे समझााऊँ, कि वे अकेले नहीं आए,अपने साथ बहुत बड़ी भीड़ साथ लेकर आए है। रात को सपने आते है, कितने लोग दिखाई पड़ते है। ये शाम तक तो साथ नहीं थे, रात को कहाँ से आ गए। सुबह उठते ही कहाँ चले गए? इन सभी की विदाई हो, तब जागृति, विचारण और स्वप्न में चेतना की एक धारा का अनुभव होता है।

”आपने आत्मकृपा की बात कही थी?“



“हाँ आपने किताब भी लिखी, पर आत्मकृपा आपसे ही गायब हो गई। ”मैं“ और ”आत्म“, में भेद है, मैं और माम में भेद है। ”माम“, की कृपा, जब मैं इस ‘माम’ में विलीन हो जाता हूँ, तब ‘माम’ ही सारे कार्य व्यवहार को संभाल लेता। जब यह पता लगता है कि यह मेरी ही माया है। यह बाहर और भी भीतरका जगत मैंने ही बनाया है। बाह्य जगत से अधिक कष्टकारी मनोजगत होता है। बाह्य का जगत तो निरन्तर परिवर्तनशील है, पर भीतर का जगत तो संस्कार में ढलता जाता है। खली न हो तो संग्रह ही कारण बनता चला जाता है।“



”यह कैसे कम हो?“

”फिर वही बात, बाह्य में किया गया कोई भी प्रयास अन्तर्मुखी बनने में सहायक नहीं होगा।

इसके लिए एक ही उपाय है, निरन्तर वर्तमान में रहा जाए। वर्तमान का यह क्षण समय की सबसे छोटी इकाई मानलो। जहाँ समय है, वहाँ मन है, वही भूत है, वही भविष्य है। भूत का कोई अस्तित्व नहीं है। वह तो गया, हम उसे स्मृति के द्वारा वर्तमान में लाते है। भविष्य है वह एक सम्भावना है। जहाँ वर्तमान है, वहाँ निरन्तर सजग रहो तो पता लगता है।



हम वर्तमान में हैं, वहाँ विचार नहीं है। यह निर्विचारता ही हमारा लक्ष्य है, जो हमें सदा से उपलब्ध है, पर हमें इसका ध्यान नहीं है। यहाँ जानना कुछ भी नहीं है, मात्र जिसे हम भूल गए थे, उसकी याद है। गीता में कहा गया ह, ै‘माम अनुस्मर यु( च’ मेरा निरन्तर स्मरण। यह स्मरण जप करना नहीं है। सुमिरन शब्द यहीं से बना है। काम तो करना ही होगा। मैंने यहाँ कुटिया पर लिख दिया था, ‘आलसी मत बनो,कार्यरत रहो।’



इसीलिए मैंने ध्यान शब्द का भी प्रयोग नहीं किया। ध्यान शब्द एकाग्रता के साधनों के लिए रुढ़ हो गया है। जितना हम वर्तमान में रहेंगे, एकाग्रता सहज ही प्राप्त होती जाएगा। मन स्वतः नियंत्रण में रहना सीखता जाएगा। मन बहुत चतुर है, याद रखना। ज्यांे ही तुम भीतर उतारोगे,यह तुम्हारे अनुभव को शब्द देने लगेगा। तुम अपने आप को असाधरण मानने लगोगे। गुरु बनना चाहोगे, बचना। यह काम तो तुमने पहले ही बहुत किया है। इसीलिए बार-बार यहाँ आते हो, बचना, बाहर के दुश्मन इतने बुरे नहीं है, जितने भीतर के होते है। यह मन बहुत चतुर है। अनुभूति बु(ि से परे है। जहाँ तक बु(ि है, वहाँ तक सब मन की कपोल कल्पनाएँ है, हम सत्य को कल्पनाओं से ढक देते हैं। वहाँ निरन्तर सजगता ही उपाय है। मन ज्यांे ही कल्पना लोक में ले जाना चाहे, तब सजग हो जाना। सजगता आग की तरह है, घास-फूस को तुरन्त जला देती है।



”गीता में कहा गया है,‘क्षिप्रं भवति धर्मात्मा’, इसका क्या आशय रहा होगा?“

”आशय क्या, वह धर्मात्मा तुरन्त हो जाता है। कहानियाँ हंै। इसके पहले श्लोक में आया है, ‘कोई कितना भी बुरा क्यों न हो। स्त्री, पाप योनी, शु० सभी धर्मात्मा हो सकते है।



इसमें क्या गलत है, धार्मिकता, कर्मकांड से परे है। इसे अध्यात्म भी कहा जाता है। यह जीवन जीने की शैली है। एक वाक्य में कहा जा सकता है, वत्र्तमान में रहो। ज्योंही हम यह सीख जाते हैं,यह हमारे जीवन जीने की शैली बन जाती है।हम धर्मात्मा हो जाते हैं। जहाँ तक मन है , वहीं तक समय है। वहीँ तक अतीत है और भविष्य है, वहीं तक पाप और पुण्य है। स्वर्ग और नर्क है। सब मन ही तो है, मन के खेल हैं। जब मन ही नहीं रहा तब क्या,...... क्षिप्रं, रस्सी जब कुएं में बाल्टी उतारती है, तब निरन्तर वह कार्य करती है, पर धीरे-धीरे वह घिसती जाती है, फिर अचानक टूट जाती है। परन्तु इस अचानक तक आते-आते उसे समय तो लगा था। यह हम क्यों भूल जाते है?



जब पहली बार आप मिले थे, आप व्रत, उपवास करते थे। मुझे देखकर आप चैके थे। मैंने कभी व्रत के लिए नहीं कहा। स्वयं मेरा भोजन इतना अल्प रहा है कि लोग आश्चर्य करते हैं। व्रत-उपवास से जाग्रत पुरुष का कोई सम्बन्ध नहीं है। यह परम्परागत रुढ़ी है। हाँ, भोजन स्वास्थ्य के लिए अनुकूल हो। आहार-विहार में संतुलन है। आपको दो कहानियाँ थीं। पहली ब्राह्मण बालक मूर्ति बनाता है और सिर काट देता है। पिता जाकर वणिक जिसने अनुष्ठान करवाया था ,उससेे पूछता है, धन वहाँ से आया था। वह बताता है कि उसका संकल्प था जो धन कमाई के यहाँ डूब गया है, मिल जाएगा तो कथा कराएगा। वह जाकर वणिक को उसका धन दे आता है। दूसरी कहानी थी कि संत जो भोजन करने गए थे, वे सेठानी का हार चुरा लाते है। फिर सोचते है, यह क्यों हुआ। वापिस लौटते है, पूछते है, तब पता लगता है कि जिस सेविका ने भोजन बनाया था, उसकी हार चुराने की भावना ढ्ढ़ हो चुकी थी। वही भावना अन्न ग्रहण के सरथ उन्हें पराजित कर गई। संत हार वहाँ रख कर लौटते है।



कहानी, कहानी होती है। सार जानना चाहिए। अéा से मन बनता है। मन का पोषण होता है। अéा की शु(ि अपरिहार्य है। इससे मन की गति कम होती है। पर यह छोड़कर अनीति से धन कमाओ, व्रत-उपवास करो, सब व्यर्थ है।

पर कितना समझाओ, कोई मानने वाला नहीं है। सबके पास अपने- अपने तर्क हैं।



सभी आसन सबके लिए नहीं है। हठ योग का जाग्रति से कोई सम्बन्ध नहीं है। आध्यात्म के नाम पर बजार में सभी कुछ परोसा जाता है। रास्ता मन से ही है। मन से ही उसके पार जाया जा सकता है। मन को देखना है। गहरी सतर्कता के साथ, हर पल साथ रहता है। मन एक साथ दो कार्य कर सकता है। वह देखता भी है और दिखता भी है। वही दृष्टा है, वही दृश्य है। देखते-देखते दृश्य सिमटने लग जाता है। बातें सुनने के लिए नहीं है, प्रयो में लाओ।





”तुमने पूछा था, पच्चीस सालों से मेरे साथ रहे, क्या पाया?“

”पूछा, अपने आप से पूछो, अगर कुछ पाने के लिए ही आए थे, तो समय व्यर्थ गया। पानी में पड़ा पत्थर भी सौ साल तक भी वैसा ही रहता है, परिवर्तन वहीं आता है, जहाँ उसके लिए जगह हो।



गीता में जो कहा गया है, वह प्रवचन के लिए नहीं है। तुरन्त, और यह भी कहा गया है, मन पर नियन्त्रण पाना कठिन है। अगर तुम यह समझ गए कि मन ही समय है। वे पच्चीस साल तुम्हारे मन पर अंकित छाप की तरह हैं,तो और वर्ष लग जाऐगेे। समझ गए कि मन ही समय है। मन जिन्दा रहता है, अतीत में या भविष्य में। जहाँ दोनों नहीं है, वही मन भी नहीं है। वहाँ समय कहाँ होगा? मात्र वर्तमान है, वर्तमान का द्वार ही भीतर का दरवाजा खोल देता है। जहाँ उस जगह जाना सम्भव है। परिवर्तन बाहर कुछ नहीं होगा, पर भीतर कुछ गुछ बदलनेे लगता है। विचारों के कम होते ही , विकार भी कम होने लगते है। पर जो लोग एक बाहर की ओर लक्ष्य बनाकर कुछ पाने के लिए निकलते है, वे वैसे के वैसे ही रह जाते है। बाहर जो आज सही दिख रहा है, वह कल गलत भी हो सकता है। बाहर कहाँ तक जाना है, परम्परागत साधनाएं प(तियाँ बाहर ही भटकाती हैं।



यहाँ समय महत्वपूर्ण नहीं है। समझो, यह भटकाने वाली बातें हैं। हमारे ग्रन्थ यही करते आ रहे हैं। वे बाहर कोई लक्ष्य बनाते है। हम जब तक उस तक आते है, दूसरा हमारे सामनेे आ जाता है। मन को जरा सी छूट मिलती है, सतर्कता हटती है, वह पचासों सपने ले आता है, वह तुरन्त भविष्य में दौड़ जाता हैं। समझ यही है कि रास्ता भी यही है। इसलिए कृष्णमूर्ति कहते थे पाथ लैस लैंड , पर उनके अनुयायी समाज से कटकर रास्ता तलाश कर रहे थे। मेरी बातें उन लोगों के समझने में नही आतीं थीं। जाना मन से ही है। व्रत, उपवास, यम, नियम, आसन, प्राणायाम, तंत्र- मंत्र , ये सब परम्परागत उपाय हैं। जड़ तो मन मे ंहै, वहीं से शुरुआत हो। सही आहार और व्यायाम शरीर के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। बस इतना ही इनका महत्व है। मन से हटकर क्रियाएं करो तथा वर्षो बाद मन पर आओ। यह सब व्यर्थ के उपाय है। दूसरे जो अपने ऊपर किसी नाम पर, किसी चित्र पर, एकाग्रता करना बताते है, वे भी धोखा ही देते है।



मन ही तुम्हें नियंत्रित कर रहा है, अभी तक तुम मन से ही नियंजित हो रहे हो। मन तुम्हारे भीतर कोई एक लक्ष्य बना देता है। तुम उनके पीछे चल देते हो। बार-बार कहा है, मन से ही मन के पार तुम्हें जाना है। दूसरा कोई उपाय नहीं है। मन ही कल्पनाओं से तुम्हें अनुभव भी दिखा देता है। जो भावतीत ध्यान की बात करते हैं, वह भी एक प्रकार की कल्पना ही है। यह हमारा मन ही हमें मुक्ति दिलाता है। यह बंधन में बांधता जाता है। जब जो चाहते है, वही दिखना शुरु हो जाता है। मन की शक्ति अपरम्पार है। पर उसके परे जो है, जो अतर्मन है, वह विराट से जुड़ा होने के कारण अत्यधिक शक्तिशाली है। जो समझतदार हंै, वे इसी मन को एक उपाय देकर तुम्हें उलझा देते है। उस दिन तांत्रिक आए थे। वे भूत-प्रेतों की, सी(ियों की चर्चा कर रहे थे। उनकां भैरव दिखाई पड़ते हैं। मुझ से भी कहलाना चाह रहे थे, यह भी मन का ही प्रोजेक्शन है। मन जैसा चाहता है, बाहर वैसा ही दिखना शुरु हो जाता है। हम जो भी कल्पनाएं करते है, वे हमें सच दिखाई देती है। क्योंकि उन्हें हम ही ताकत देते है। देवी-देवताओं के दर्शन के पीछे यही धारणा है। हमारी ही शक्ति उन्हें प्रकट कर देती है। वे भी यही कहते है। शक्ति तुम्हारी ही है,जिसने मुझे प्रकट किया है। स्वर्गा और नर्क हमने ही बनाए हैं । हमारा लोभ और भय इन्हंे बना देता है।आपने सवाल किया था, हम लोग वृन्दावन गए थे। स्वामी शरणानन्दजी के आश्रम में ठहरे थे। वहाँ के लगभग सभी मंदिरों में आप गए थे। मैं बाहर ही गााड़ी में रहा। आप बार-बार पूछते थे, मैं भीतर क्यों नहीं जा रहा हूँ? गुरुकुल मंे मुकेश भाई अखण्ड रामायण कराते थे, यज्ञ होता था, मैं उधर नहीं गया। वे भी पूछते थे, क्यों? क्या उत्तर होगा, आपने मुझे अपने साथ जैसा आप चाहते हैं, करने को क्यों कहते हैं? हम ही तो मूर्तिया बना रहे है, और हम ही पूजा कर रहे है, उनसे मांगते भी है, यह सब मन का ही प्रपंच है, इससे अधिक कुछ भी नहीं है। एक दिन मेरी बातें समझ में आएंगी।



मैं क्या साथ लेकर आया था। एक झोला था, यह शरीर, गुरुकुल कभी का छोड़ दिया। जिस दिन सरकार को सोंपा ,सब छोड़ दिया। शरीर को भी अब जाना है, यह प्रकृति का नियम है। पर यह याद रखना है कि यह कभी हमारा रहा ही नहीं। यह सम्पत्ति भी हमारी नहीं है शास्त्र की पहली पंक्ति थी-तेन त्यक्तेन भुंजीथा, त्याग करते हुए भोग कर।



पर जो हम चाहते है, जो पाना चाहते है, वह हमारी पूंजी निरन्तर हमारे साथ है, पर हमें उसका ध्यान नहीं है। यह ध्यान ही सजगता है। अवेयरनेस है। उसका स्मरण निरन्तर रहे, यही ध्यान है। पर जो हमारा नहीं है, वह हमेशा हमारा बना रहे। यही संसार है। यही हमारी मृग-मरीचिका है, जो हमारा हमेशा है, उसकी कोई खोज-खबर नहीं है।जो हमारा है, उसे क्या पाना है, उसे जो भूल गए है, उसकी स्मृति ही साधना है। यही सुमिरन है।“



”आपका सि(ान्ता तो बहुत छोटा सा है?“

”पर आपने पूछ-पूछ कर इतना बड़ा कर दिया है। मौन ही सत्संग है। वही साधन है, वही साधना है। वहाँ मन अपने स्वाभाविक रुप को पाने लगता है। पर जहाँ शब्द आए, वही बु(ि आ जाती है। विचार-बु(ि की पहचान है। हस पथ पर चलने के लिए दो ही बाते मैंने बताई है, स्वाद पर नियंत्रण रखना और बोलने पर। यही एक इंद्रिय दो-दो काम एक साथ करती है। इस पर नियंत्रण सबसे कठिन होता है।जितना नियंत्रण होता जाए, उतना बेहतर है।



आखिरी बात, शांत बैठ जाना और कुछ न करना, चोयल और मेहरा ने पूछाथा, पैसिव अवेयरनैस, चॉइस लैस अवेयर नैस, यह मेरी मान्यता नहीं है। ध्यान यानि निरंतर अवेयरनैस, निरन्तर वर्तमान में रहना, जीवन की शैली है। प्रकृति ने हमें एक निश्चित कार्य से यहाँ भेजा है। उसका पता तभी लगता है, जब हम अन्तर्मुखी होते हैं। और अन्तर्मुखता में प्रवेश तभी होता है, जब हम वर्तमान में रहने लगते हैं। यहाँ जो भी घटता है, जो भी होता है, वहाँ न लोभ है, न भय है। न स्वर्ग की चाह है, न नरक का भय है। जो कृत्य होता है, वह स्वतः सेवा में ढल जाता है। ध्यान इसीलिए नहीं सिखाया जा सकता। जो ध्यान सिखाने की बात करते है वे समाज से भागकर कहीं ओर ले जाने की बात करते है। प्रकृति ने शांत होकर जड़ हो जाने के लिए नहीं भेजा है। हम शांत रहें , निरन्तर सजग रहें और कर्मरत रहेंं। सब प्रकृति का है, वह निरन्तर दे रही है, तेरा तुझको सौपत, क्या लागे मेरा, यही भावना बनी रहे। मेरे जाने के बाद यह शरीर भी किसी के काम आए तो अच्छा होगा। इसे किसी अस्पताल में दे देना, वैसे बहुत कृश हो गया है।