Sunday, November 27, 2011

साधन सूृ

साधन सूत्र
पर यह यात्रा सहज नही है। इसमें कई रूकावटें है। सुख लोलुपता भय सौंपती है। भय है, जिन चीजों में जिन वस्तुओं में, रूपों में, व्यक्तियों में मन उलझ गया है, रस लेता है, उनके छूट जाने का। सच तो यह है कि इस सुख लोलुपता के कारण व्यक्ति सारी उमर दुख झेलते हुए भी उसके कारण को समझ नहीं पाता है। समझ भी लेता है तो छोड़ने का प्रयत्न नहीं करता। इसके विपरीत वह भक्ति के नाम पर इस लोलुपता की मांग ही अधिक करता है।भक्ति प्रायः साधक को भटकाती ही रहती है,वह याचक बनता चला जाता है।
1. बुद्वि और विवेक में अंतर है। विवेक सत्यरूपी सूर्य की किरण है जो हमेशा सतपथ की ओर बढ़ने के लिए संकेत करती है। बुद्वि का आदर होने से सांसारिक लाभ तो मिलता ही है, साथ ही स्वार्थभावना भी बढ़ती है।
बुद्वि लाभ -हानि अधिक सोचती है। यहां सत-असत का भेद नहीं है।
अतः विवेक का आदर होना चाहिए। साधक को जो जाना गया है, उसका आदर करना चाहिए। बु(ि से जब हम अपने आपको न्यायोचित ठहराने का प्रयास करते हैं,हम गलत रास्ते पर चलना शुरू कर देते हैं।
2. विवेक का आदर होते ही, देहाभिमान टूटता है। शरीर भाव बहुत ही पुख्ता है। ऊंची से ऊंची अवस्था में भी यह नहीं जाता। व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का ही गुलाम हो जाता है। यह सूक्ष्म अंहकार है।यहां हम जो सही है उसके समीप आजाते हैं।हम अपने पुरूषार्थ से परिचित ही नहीं होते हें उसका सदुपयोग भी करने में समर्थ हो जाते हैं।
श्रीमद्भागवत में इस अवस्था का बहुत ही सुंदर वर्णन है गोपियां जो सबकुछ छोड़ आयी, वे भी यह सोच कर कि उन जैसा प्रेम और कहीं नहीं कृष्ण जो प्राप्त थे उन्हे ही खो देती है। और तो और वह विशेष गोपिका जिसके साथ उन्होंने आराधना की थी। वह भी इसी अहमभाव में डूब जाती है और जब पाती है कि कृष्ण उसे भी छोड़ गये हैं.. वह व्याकुल हो उठती है।
कृष्ण के पदचिन्हों को ढूंएती हुयी अन्य गोपियां जब वहां पहुंचती है तो वे भी उसे उदास पाती है।यह सूक्ष्म अहमभाव साधना में विघ्न उपस्थित करता है। ऊंची से ऊंची अवस्था में भी व्यक्तित्व का मोह बना रहता है। यही द्वैत है। दूसरे से अपने को श्रेष्ठ समझने की भावना। दरअसल गुणों का संग्रह करने की भावना भी बाधा उपस्थित करती है। जब तक गुण की सत्ता है तभी तक दोष भी विधमान है। अतः साधक को चाहिए कि वह विवेक का आदर करे। मैं ओरों से श्रेष्ठ हूं यह अहमभाव साधक को वहां पहुंचा देता है जहां से यात्रा शुरू हुई है। अतः यह याद रहे, साधना का यह अर्थ नहीं है कि दोषों की अस्वीकृति के साथ ही गुणों को स्वीकारता चला जाये। यह गुणों की स्वीकृति एक मान्यता बना देती है उससे मोह हो जाता है। यह मोह अभिमान पैदा करता है, फिर साधक वहीं का वहीं रह जाता है।
3. साधक के लिये जैसा कहा, दो रास्ते हैं - पहला संसार की महत्ता उसे सौंपता है। दूसरा संसार को कत्र्तव्य भूमि बताते हुये उसे दासता से मुक्त करता है। सुखों की उपासना उसे गुलाम बनाती है। व्यक्ति अजाने सुख की लालसा में गुलाम रह जाता है। साथ ही कामना पूर्ति का अभाव उसे व्यथित कर देता है, तथा कामना पूर्ति का सुख उसे प्रसन्नता देता है। वह इसे ईश्वर कृपा कहता है और प्राप्त दुख को हटाने के लिए सद्गुरू तथा भगवान की शरण लेता है। वह दुखी होते हुए भी संसार की गुलामी नहीं छोड़ पाता है। अधिकांश इसी स्थिति में जीते हैं। कामना पूर्ति का लोभ उन्हें व्यथित बनाए रखता है।
इसीलिए साधक को चाहिए कि वह इस विघ्न को समझे। प्राप्त समझ का आदर करे। समझ ही उसे स्वाधीनता की ओर अग्रसित करेगी। वह कामना का स्वरूप समझ पाएगा तथा अनुकूल एवं प्रतिकूल परिस्थितियों को सहज भाव से जी सकेगा। समत्व बुद्वि यही है। साधक के लिए कामनाओं का पूरा होना या न होना समान ही है। परिस्थितियां प्रारब्धवश होती है। प्रयत्न उनका चिंतन नहीं उनकी सहज स्वीकृति है। उन्हें जिया जाए......उनका चिंतन व्यर्थ है। फल जो भी हो उसे प्रारब्ध मानकर स्वीकारा जाए। फल से पलायन तथा विचलित होना साधक के लिए उचित नही है। परिस्थितियां साधक में विवेक जागृत करने के लिए आती हंै।
जो भी कर्म सामने उपस्थित हुआ हे मन को अधिक से अधिक वहीं रखना चाहिए,किंचित मात्र भी विपरीत नहीं जाने देना चाहिए।कर्म की पूर्णता निश्चित ही पूर्णता का फल स्थाई शांति में सौंपने में समर्थ है।
4. कई बार ऐसा होता है कि हम प्राप्त परिस्थिति में सुधार की बात करते है। यह नहीं होता तो कितना अच्छा था, शायद इसके स्थान पर यह दूसरी नौकरी मिलती तो मैं बहुत खुश रहता, यह विकल्पों की यात्रा बड़ी लम्बी है। यही प्रमाद है, यही भ्रम है।
हर परिस्थिति प्रभु का प्रसाद है। प्रारब्धवश प्राप्त है। वह साधन के लिए ही है। परिस्थितियों में जान बूझकर किया गया परिवर्तन सिलसिले को बढ़ाता ही है। हां, यह जरूर है कि हर परिस्थिति का सदुपयोग किया जाए। सदुपयोग से परिस्थिति का भोग समाप्त हो जाता है। सुख के सदुपयोग से, विनय प्राप्त होता है। यह मनुष्यत्व है। दुख का सदुपयोग वैराग्य सौंपता है।वस्तु के प्रति आसक्ति कम होने लगती है,साथ ही हमें अपनी सहनशीलता, कठिनाइयों में प्रसन्नता का अनुभव भी होता है।परिस्थितियों की निंदा,दूसरों पर दोषारोपण,उचित नहीं है।
परिस्थितियां जो भी प्राप्त है, वही हमारा वरण है। उनकी स्वीकृति ही जीवन का आदर है। प्राप्त का सदुपयोग और अप्राप्त का चिंतन छोड़ देना ही उचित है। इससे अभ्यास मे बहुत ही सहायता मिलती है। यह साधक को वह मंगलमल विधान सौंपता है जिससे कि उसका पारिवारिक जीवन ही मंगलमय हो जाता है। जहां भी हम रहें, होश में रहें। तो हर कार्य कुशलता के साथ तो होता ही है, साथ ही करने का भाव भी छूटने लगता है। प्रायः यह जो हम भविष्य पर टालते हैं कि आज नहीं कल करूंगा पहले यह हो जाए तब वह करूं, यह चिंतन साधक के लिए उचित नही है।
जो करना है, आज ही करना है।
साधन के लिए हिमालय की किसी कंदरा में नहीं जाना है। जहां भी रहंे, जिस समय रहे, वहीं से शुरू किया जा सकता है। साधन का अस्तित्व ही वर्तमान मे है। न वह स्मृति में है, न जीवेषण में। इस तरह प्राप्त परिस्थिति का सदुपयोग ही साधन का लक्ष्य होना चाहिए।
बाह्य यह जो जगत है, इसमे जो मान अपमान है, आदर भाव है, अवहेलना है, साधन क्षेत्र में इसकी कोई उपयोगिता नहीं।इसे एक सीरियल की तरह लेना चाहिए,ज्यादा विचलित होने की जरूरत नहीं है।यह संसार गतिशील है, जो परिस्थिति आज है कल नहीं रहेगी।इसलिए बात-बात पर उत्तेजित होना ,अशांत होना उचित नहीं है।
हर प्राणी जो किसी भी स्थिति मे है वह अपनी योग्यतानुसार अपने विवेक का आदर कर साधन निश्चित कर साध्य को पाने के लिए स्वतंत्र है। क्योंकि लक्ष्य मात्र अध्ीिक से अधिक वत्र्तमान में रहना है।
5. हर साधक, साधन का यह अर्थ समझता है कि यह उसके भौतिक लाभ में सहायक होगा। यह सोचना ही गलत नहीं हैै। परन्तु भौतिक सुख के लिए आवश्यक है कि प्रयत्न किया जाए। प्रयत्न की सफलता भौतिक सुख देती है। जो भी प्रयत्न हो पूरी ताकत से किया जाए।मन की शक्तियां अधिक से अधिक वहीं रहें।
यह कहना है कि जो साधक है, वे इस जीवन मे धनी होंगे, स्वस्थ होंगे, वस्तुएं प्राप्त करेंगे, यह सोचना ही गलत नहीं है। क्योंकि साधक जब अपने विवेक का आदर कर अपने पुरूषार्थ का सदुपयोग करता है तब उसे भौतिक सुख जो उसके प्रारब्ध से उसे प्राप्त होने हैं ,वे तो प्राप्त होंगे ही कर्मो की श्रेष्ठता से यह अवधि बढ़ती भी चली जाती है।

6. सीखना एक अनवरत क्रिया है। साधक के लिए आवश्यक है कि वह सदैव प्रयोगशील रहे। प्रयोग का अंत कहीं नहीं है और न ही प्रयोग दूसरे के अनुभवों पर आधारित है। हर साधक का पथ उसको खुद की यात्रा ही नही है वरन् वही उसका प्रयोग है। अतः यह उसे कभी नहीं भूलना कि वह साधक है और प्रयोेगरत है। प्रयोग वही कर सकता है जो जगा हुआ है। सोया हुआ कभी कुछ जान नहीं सकता। अनुभव के लिए जागरूकता आवश्यक है। अतः साधक को अपनी मान्यता की कभी विस्मृति नहीं होनी चाहिए।
7. इस विस्मृति से ही साधक प्रायः अपनी साधन प्रणाली से मोहकर बैठते है। जैसे जप करने वाले जप को ही साधन मान लेते है। आसन लगाने वाले आसन को कभी छोड़ नहीं पाते। यह याद रखना चाहिये कि साधन सामग्री जो है वह प्रयोग की सामग्री है। हर सामग्री प्रयोग में सदा काम नहीं आती। जो कभी प्रारम्भ में काम आती है। वह कुछ ही समय बाद छूट जाती है। प्रयोग में मोह नहीं रहता। हां, साध्य के प्रति, कुतूहल रह जाता है। साधक प्रायः अपनी साधना की प्रणाली से इतना एकाकार हो जाता है कि वह अपने साध्य को ही भूल जाता है। उसे ही सबकुछ मान बैठता है। यह सबसे बड़ा विघ्न है। साथ ही प्रणाली के प्रति यह जो आसक्ति है वहअहं भाव पैदा करती है। साधक अपने साध्य को छोड़ कर साधन को ही सबकुछ मान लेता है। इससे वह साध्य से विचलित हो जाता है।
8. साधन यात्रा मे सबसे बड़ी कठिनाई, छोड़ने और छूटने की होती है। साधन उबाऊ और नीरस नही है। जो अपने साध्य के प्रति समर्पित है, वह कभी नीरस नहीं हो सकता। उसमें तो नित्य प्रियता रहती है।
इसीलिए छोड़ने और छूटने पर अधिक बल नहीं दिया जाना चाहिये। अगर वर्तमान का आदर रहे, व्यर्थ के चिंतन में मन को नहीं जाने दिया जाये तो जो कुछ छूटना है वह सहज ही छूट जाता है। हां, आवश्यक है कि विवेक का पूरी तरह आदर किया जाए, विवेक जन्य आचरण रखा जाए, जिसे छूटना है वह सहज ही छूट जाता है। जो जाना गया है उसका पूर्ण आदर किया जाये तभी आचरण में शुद्वता रहती है।
पर होता विपरीत ही है। साधक और सिद्व भी जो जाना गया है अपने आचरण में उससे विपरीत रहते है। अहं सबसे बड़ा विघ्न है। साधक के लिए गुणी का आरोपण नहीं होना चाहिए। ऊपर से ओढ़ने के स्थान पर , विवेक का आदर और उसके अनुरूप आचरण ही पर्याप्त है।
9. साधक के लिए जो प्राप्त हो चुका है। प्रारब्धवश मिला है, वह उसके ही कृत संकल्पों का परिणाम है। यह जान लेना ही आवश्यक है। जो संबंध प्रारब्धवश बन गए हैं, माने गए हैं उनके प्रति कर्तव्य परायणता आवश्यक है। जो संबंधों को तोड़कर भगने को साधन मान बैठे हैं। वह कहीं भी लाभ नहीं ले सकते।
हां, जो संबंध हैं ? वहां अधिकार भावना के स्थान पर सेवा का भाव रखने से साधन में सफलता मिलती है। सेवक के लिए कत्र्तवय परायण होना आवश्यक है। जो हमारा है उसका ही हम त्याग कर सकते हैं, त्याग हम अपनी स्मृयिों का ही कर सकते हैं, वे ही हमारी संपत्ति हैं। वस्त्र बदलना ,घर छोड़ना, कोई त्याग नहीं है, घन की वस्त्रों की ,भोजन की आवश्यकता सभी को होती है,सन्यासियों की आवश्यकताएं गृहस्थों से अध्ीिक होती हैं।इसलिए त्यागी होना आवश्यक है। जोे निरंतर वत्र्तमान में रहना चाहता है वही त्यागी है। वैराग्य वस्त्रों का परिवत्र्तन नहीं है, अनावश्यक कल्पनाओं के बोझ को छोड़ते जाना ही वैराग्य है।साधक को चाहिए कि वह परमात्म भाव से कत्र्तव्य कर्म करे, यही वास्तविक सेवा है। जो संबंध है, उनकी कर्तव्य भावना से पूर्ति करे।
10. साधक मे अपने साधन के प्रति अनन्य प्रेम, विश्वास जब तक नहीं होगा उसे सफलता नहीं मिलेगी। प्रायः साधक सारी उम्र साधन तलाश करते रहते हैं, जबकि साधन उनके ही पास उपलब्ध है। जो असाधन है उसका त्याग हो तो साधन है। पर वे भटकते रहते है। शास्त्रों का अध्ययन करते है तो वहां भी शंका करते है। सद्गुरू से मिलते है तो तार्किक बुद्वि ले आते है। गुरूवाणी मे तलाशते हैं कि यह शास्त्रों से कितना मेल खाता है। हर जगह वे संदेह से भरे रहते है। यह पहले ही कहा गया है कि रास्ते अलग अलग है मंजिल एक ही है।
हां, रास्ता चुनने से पहले खूब सोच लो, तर्क कर लो, पर जब समझ आ गई हो तो तब चलना ही श्रेयस्कर है। वहां वादविवाद होना, संदेह होना लाभप्रद नही है।एक ही सफलता का सूत्रा है जो भी हम कहें ,जोभी हम करें उसके प्रति हमारे भीतर पूर्ण विश्वास हो।
11. साधन यात्रा में सबसे बड़ी कठिनाई, साधन के चयन की है। साधन का यचन अपनी योग्यता तथा आवश्यकतानुसार होना चाहिए। हर साधक अपनी मांग को अवश्य जानता है। फिर भी अगर निर्णय लेने में परेशानी हो, असुविधा हो तो सदगुरू की शरण में जाना चाहिए।
शिक्षक और सद्गुरू में भेद है।
शिक्षक जानकारी देगा। शास्त्र वचनों के आधार पर साधक को समझाएगा पर सद्गुरू निजी अनुभव के आलोक में साधक के विवेक को जागृत करेगा।
विवेक अलौकिक है। वह एकाग्रता का फल है।
सद्गुरू पर पूर्ण विश्वास करके उसके आदेशों को स्वीकार करना चाहिए। साथ ही अन्य साधकों से न तो अपनी तुलना करनी चाहिए और न ही उनका अनुकरण करना चाहिए। सब अपनी योग्यतानुसार बढ़ते है।
जिस प्रकार एक ही रोग की एक ही दवा तथा एक ही पथ्य होते हुए भी रोग की अवस्थानुसार रोगियों को अलग अलग मात्राऐं दी जाती है, वही स्थिति साधन प्रणाली की है। हर साधन हरेक के लिए आवश्यक नही है।
12. साधन यात्रा मे कई पड़ाव आते है। साधक प्रायः एक दूसरे को देखकर मन में कई बार हीनता का भाव ले आत है। इसलिए प्रायः साधन को प्रायः गुप्त रखनेके लिए कहा जाता है प्रायः जो अतिरिक्त अनुभूतियां हैं वे एक दूसरे की समान नहीं हो।
उदाहरण के लिए एकाग्रता कर अंतिम अवस्था में कई बार साधको को प्रकाशपुंजों का जो कि बैंगनी रंग के होेेेेेेेेते है दर्शन होते हैं, किसी किसी की यह न हो कर अनवरत ध्वनियां सुनाई देती है, प्रारम्भ में ये बहुत तीव्र होती है साधक डर जाता है, वह कान मे दवाई डालने लग जाता है किसी की सूक्ष्म नाद, झींगुर की तरह या घुंघरू की तरह सुनाई देता है। नाद की कई अवस्थाएं है। परन्तु सच तो यह है कि हर साधक के अनुभव दूसरे से पृथक है।
यही स्थिति स्वप्न और ”विजन“ की है। स्वप्न और ”विजन“ में अंतर है। विजन स्थाई सा रहता है। आंख खोले रखने पर भी उसकी प्रतीती होती है। पर ये विजन तथा स्वप्न हर साधक की स्थितियों के आधार पर अलग अलग होते है।
प्रायः साधक यहां अनुकरण शुरू कर देते है। इस बारे मंे कई बार जो धारणाएं बन जाती है। उन्हें ही वे पाने का प्रयास करते है।
साधक अपनी साधन यात्रा से विचलित हो जाता है।
13. साथ ही साधको की भी अवस्थाएं है। उनकी मानसिक अवस्था के आधार पर उनके भेद हैं । कुछ हैं जो अपने दोषों से, अपने दुख से इतने व्याकुल हैं कि वे निर्दोषिता प्राप्त करने के लिए चल दिए है। उनका हर पल साधन को समर्पित है।
कुछ साधक है, समझते भी हैं। समझ का आदर भी करते हैं, पर सुख लोलुपता छोड़ नहीं पाते है। से साधन मे स्थिर नहीं रह पाते और तो और वे अपने दुख का कारण अपने से बाहर तलाशते हुए उसके रूपांतरण का प्रयास भी करते है। वे जानते हुए भी आचरण में अपनी समझ को नहीं ला पाते। कहते हैं, समझ तो गया परन्तु अभी इसके लिए समय नही है। उन्हें दोष पता तो है परन्तु अभी व्याकुलता बढ़ी नही है कि वे बदलने के लिए प्रयास करें।
इसलिए सद्गुरू सत्संग और सद्गुरू की शरण एक मात्र आधार है।
सत्संग से आत्म प्रशंसा रूकती है और निज का दोष दर्शन शुरू होता है। वह समझ का आदर करने लगता है।
सदगुरू की आज्ञा मानते ही विनय प्राप्त होता है। विनय ही विवेका की तरफ ले जाता है। विनय ही अंहकार को तोड़ता है। अंहकार ही अविद्याा का जनक है। इसलिए विनय महत्वपूर्ण है। विनय अलौकिक है। विनय ही विाद्या प्रदान करता है। यह याद रखना महत्वपूर्ण है।
सर्वाधिक संख्या उनकी है जो विवेक का महत्व समझते तो है परन्तु अपने आपको इस दुख से इस दोष से, बाहर आने में असमर्थ मान लेते है। वे संसार की भागदौड़ में उलझ कर ही रह जाते है। यहां, बुढ़ापा ही भगवान के भजन के लिए छोड़ दिया गया है। इनके लिए वर्तमान में तो समय है ही नहीं। ये सब उधार की जिंदगी जी रहे है। उनके लिए खुद के लिए एक मिनट भी नही है। वे जीवेषणा में जीवित है। वे भविष्योन्मुखी है। कल में ही वे सबकुछ करना चाहते है। ये लोग सद्गुरू के पास भी जाते हैं तो भौतिक सुख को कामना ही शेष रहती है।
इनसे भी नीची अवस्था उनकी होती है जो प्राप्त समझ का दुरूपयोग करते है। ये आध्यात्मिक जानकारी को पेट भरने का धंधा बना लेते है। ये आध्यात्मिक सूचनाएं बेचते हैं। धन ही इनका लक्ष्य रहता है। ये स्वयं साधन यात्रा पर न होते हुए भी साधन की चर्चा सर्वाधिक करते हैं इन ज्ञान बंधुओं को साधन का लाभ कभी प्राप्त नहीं होता है।यह आवश्यक नहीं है घर वापिस पहुंचने के बाद वापसी इसी रूप में हो,इन परिस्थिितियों से भी बदतर स्थ्तिि में लौटना हो सकता है।यह जीवन अत्यध्ीिक महत्वपूर्ण है।साम्थ्र्य का सदुपयोग ही सार तत्व है।
14. हर साधक को यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि साधन यात्रा में आत्म प्रशंसा ही शत्रु है मन जो हीन भावना से ग्रस्त रहता है वह स्वयं ही अपनी प्रशंसा में लिप्त हो जाता है।
क्यों ?
यहां भी तो संतोष मिलता है। पर आत्म प्रशंसा व्यक्ति के विकास में बाधक है। वह कभी आपको अपने आपसे संलग्न नहीं कर पाती। दूर ही रखती है।
आत्म प्रशंसा-आत्मनिरीक्षण में बाधक है। जब हम अपने दोषों से जी चुराना चाहते है। तभी आत्म प्रशंसा में डूबते है। खोलखलापन जो है, वहां गूंज जोरों से होती है। ओर जो दोष है, वे उसी रूप में विधमान रहते है। अगर देखनी है तो अपनी बुराई देखिए।
15. दूसरों के दोष देखने से निज का अंहभाव दृढ़ ही होता है। आत्मनिरीक्षण रूक जाता है। साधन पथ में यह सर्वथा अहितकर है। पर दोष चिंतन में मन असाधारण गतिशील होता है उसे रस मिलता है। निंदा स्तुति ही प्रायः मनुष्य की पहचान हो गई है।
साधक को चाहिए कि वह इससे बेचे।
परदोष चिंतन और आत्मप्रशंसा का मुख्य कारण है,
वाचालता।
हमें कुछ ना कुछ बोलने की आदत ही हो गई है। साधन यात्रा में अगर संयम करना ही है तो वाकसंयम आवश्यक है।
जब साधक निरन्तर बोलता है, तब दो ही रास्ते बने हैं -
1. आत्म प्रशंसा 2. परदोष दर्शन।
इससे मन और अधिक विक्षोभ में डूबता है। तनाव रहता है।
साधन में यह बाधक है।
16. वाचालता का प्रमुख कारण स्मृति है।
स्मृतियां ही व्यर्थ का चिंतन करती है।
मन जब व्यर्थ का चिंतन करता है तब आवश्यक संकल्पों की पूर्ति नहीं हो पाती। कर्म तभी सफल हो पाता है जब अनावश्यक विचारणा का दबाब नहीं होता है। यहीं कर्म कर्तव्य बुद्वि से जन्य होकर सार्थकता देने में सफल होता है।
यह व्यर्थ का चिंतन होता है, स्मृतियों में रस लेने से । स्मृतियां ही तो अचेतन मन में संग्रहित है। उनके साथ असहयोग होते ही उनकी अर्थवत्ता समाप्त हो जाती है वर्तमान में रहने की यही कला है कि स्मृतियों के साथ सहयोग न किया जाये। तभी आगे पीछे का व्यर्थ चिंतन रोका जा सकता है।
स्मृतियों का दबाब कम से कम होता जाए इसके लिए आवश्यक है:-
1 आप शांत होकर बैठें संकल्प लें आप किसी से भी नाराज नहीं हैं,जिनके प्रतिनाराजगी है ,उन्हें याद करें ,उन्हें अपने अंतः करण से क्षमा करदंे।जिस को भी आप अपना इष्अ मानते हैं कल्पना करें वे आपके साक्षी हैं।
2 जो आप से नाराज हैं,उनको याद कर उनसे भी क्षमा मांगें।
दस दिन बाद आप पाएंगे आपके विचार भी कम होने लग गए हैं
विचारों के कम होते ही विकारों का कम होजाना स्वाभाविक है।इससे आपका आत्मविश्वास बढ़ता है।

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