Monday, November 28, 2011
साधन क्रम
साधन क्रम
साधन पथ रूपी त्रिभुज को अभ्यास, सत्संग और स्वाध्याय ये तीन भुजाएं है। जो साधन यात्रा की संपूर्णता देती है। स्वाध्याय सत्संग के लिए प्रेरित करता है और सत्संग अभ्यास के लिए तभी साधक संपूर्णता पाता है।
यह शास्त्रानुसार प्रदर्शित मार्ग है।
स्वाध्याय
स्वाध्याय ही सामान्य व्यक्ति को साधन पथ सौंपता है। स्वाध्याय जीवन में नियमित रहना चाहिए। मन की स्थिरता के लिए और पथ की तलाश के लिए आवश्यक है कि सद्ग्रन्थों का नियमित अययन होता रहे।
स्वाध्याय - स्व का अध्ययन है। यह हमें आत्मनिरीक्षण की ओर ले जाताहै। इसलिए स्वाध्याय का अर्थ मात्र शास्त्र अध्ययन से नही है।
अगर जीवन में सद्गुरू प्राप्त न हो तो, साधन यात्रा में सद्ग्रन्थों को ही सद्गुरू मान कर उनके आधार पर साधन की समस्याओं को हल करना चाहिए।
वैसे सद्गुरू के द्वारा बताए गए सद्ग्रन्थ ही उपयोगी होते है। वे रोगी के रोग को देखकर ही दवा देते है। अन्यथा पुस्तकालय तो दवाई की दुकानों की तरह होता है।
ग्रन्थों को समझ के लिए भी पर्याप्त समझ चाहिए। अंधों के लिए जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश व्यर्थ है उसी प्रकार सद्ग्रन्थों का अध्ययन विवेक के प्रकाश में ही होता है।
अतः साधको को चाहिए कि गुरू आज्ञा से ही वह स्वाध्याय मे रत रहे। ये ग्रन्थ मनोरंजन के लिए नही है। साधन ग्रन्थ पहले सद्गुरू दिया करते थे। अब छापे खाने हो गये है। सभी तरह के ग्रन्थ उपलब्ध है। अतः अनर्थ अधिक हो गया है। साधन सूत्र यहां रूपक कथाओं में हैं।प्राप्त विवेक का आदर हमारे व्यवहार को बदलने में सहायक होता है। जो सही है, और सही पथ पर चलने के लिए प्रेरित करता है ,वही विवेक है।
सत्संग -
सत्संग और सद्चर्चा मे अंतर है। असत का त्याग होने पर सत्संग अपने आप हो जाता है। प्रायः सत्संग के नाम पर जब हम एकत्रित होते हैं, गपशप ही अधिक करते है। बातें करते हैं। कहा करते हैं हम सत्संग में गए थे। जब तक भीतर से परिवर्तन न हो, और आप खुद न करना चाहे, सत्संग आप नहीं कर सकते।
अभ्यास और सत्संग विवेक के ही दो पहलू है। अभ्यास ही सत्संग है और सत्संग ही अभ्यास है। इसीलिए जहां तक हो सके सद्चर्चाओं के स्थान पर सत्संग ही किया जाना चाहिए।
आत्मनिरीक्षण ही व्यक्तिगत सत्संग है। यहां साधक को ”जो है“ साक्षात्कार, अनुभवन का अभ्यास करना है। परन्तु साधक को आंतरिक गहरे मौन में स्मृतियां पास नही रहने देती। मूक सत्संग में सबसे बड़ी बाधा यही है।इन स्मृतियों के असहयोग से संबंध विच्छेद से इनसे बचा जा सकता है। संबंध समाप्त होते ही इनकी सत्ता समाप्त हो जाती है। फिर इनका प्रभाव नहीं पड़ता है। परन्तु यह होना सहज और सरल नही है।
जब साधक अपने एकांत सत्संग मे प्रवेश करने मे पने आपको असफल समझता है। तब उसे चाहिए कि उन कुछ लोगों को जिन्हें साधन में रूचि है। समान भाव है। उसे साथ बैठना चाहिए।
यह सामूहिक अभ्यास भी लाभकारी है।
परन्तु यहां पर दोष चिंतन के स्थान पर निज के दोषों की चर्चा करनी चाहिए। उन्हें दूर करने के उपाय तलाश करने चाहिए।
सत्संग का अर्थ भजन कीर्तन नही है। न ही शास्त्र श्रवण है। परन्तु बहुत गहरे में अपने ”सत“ से युक्त होना है। इस तकनीक को जिसने समझा है वही साधन यात्रा का लाभ ले पाया है। क्यांेकि यात्रा में कई पड़ाव आते है। कोई साधक आगे, कोई साधक पीछे रहता है। कई समस्याएं सभी को एक जैसी पार करनी पड़ती है। जहां पर भी जिस साधक ने अपनी समस्याओं को जिस प्रकार दूर किया है, समाधान जानना लाभकारी रहता है।
साधन यात्रा अनवरत प्रयोग है। जब तक परिणाम प्राप्त न हो तब तक प्रयोग नही छूटता है।
अतः सत्संग को श्रेष्ठ साधन समझकर ग्रहण करना चाहिए।
इस जीवन मे कभी कभी ऐसा होता है जो सत है, जो जीवन मुक्त है, उनकी कृपा दृष्टि भी हो जाती है।
यदि साधक स्वयं अपनी जिज्ञासाओं के समाधान मे असफलता पा रहा है, उसे कुछ पूछना शेष रह गया हो, जानना शेष रह गया हो। वह पाता है कि उसके विक्षोभ को वह दूर नही कर पा रहा है बैचेनी है। तो फिर किसी सद्गुरू की शरण में जाना चाहिए।
सद्गुरू की पहले खूब जांच पड़ताल रखनी चाहिए। बुद्वि लाभ, लोभ की दासी अवश्य है, पर वह बारीकी से जांच पड़ताल करने मे समर्थ है। जिसमेंअपने जानते हुए किसी प्रकार का दोष नहीं दिखता हो। जिसके सम्मुख अंहकार झुकना चाहता हो। क्योंकि मन का स्वभाव यही है कि वह अपने से बड़े के सम्मुख श्रेष्ठ के सम्मुख स्वतः ही झुक जाता है।
यह समर्पण जो है, अस्वाभाविक नही है। यहां सम्मुख होते ही शांति की लहरों में साधक अपने आप को पाता है।
शांत सरोवर जिस प्रकार अपने संसर्ग से चित्त की बैचेनी दूर कर देता है उसी प्रकार संतो के प्रेमिल चित्त साधक के मन में प्रेम की धाराएं उत्पन्ना कर देते है। यह उनके संसर्ग का ही परिणाम है कि अपने भीतर गहरी शांति अनुभव करता है।
परन्तु यह ध्यान रहे, यहां तर्क नहीं, शंका नहीं। वरण का अधिकार एक बार का ही है।
पर होता विपरीत है।
साधक की सद्गुरू के प्रति श्रद्र्वा नहीं होती। वह वहां भी सांसारिक लाभ के लिए जाता है। व्यर्थ की चर्चाएं करता है।
साथ ही वह जैसे कपड़े बदलता है, वैसे ही वह गुरू बदल लेता है।
परिणाम यह रहता है कि वह लाभ नहींले पाता है। उसके भीतर परिवर्तन नही आता है।
सद्गुरू मनोरंजन नहीं करते। वे अनुभव के स्त्रोत है। साधक के अनुभवन को जागृत करते हैं, पर आवश्यक है कि उनके परामर्श पर अमल किया जाए।
अभ्यास:-
संसार से अपने आप को हटा लेना अभ्यास नहीं है।अपने आप से संसार को हटा लेना ही अभ्यास है। यह सब एक ही दिन एक ही क्षण में तो नहीं होने वाला है, परन्तु निरन्तर अभ्यास से ही इसे पा अवश्य सकते है। संसार संकल्प रूप ही है। इच्छा कि उत्पत्ति ही दुख है। उसकी पूर्ति सुख है, और इच्छाएं अनन्त है,अतः हर इच्छा की पूर्ति असंभव ही है। परिणामतः दुख ही दुख है। अतः इच्छा की निवृत्ति ही आनन्द है। यही पूर्णता मिलती है। संसार की सहायता से पूर्णता नहीं मिलती है। यह संसार हर क्षण और अभाव बढ़ा सकता है। गरीबी दे सकता है। और जो अभाव में है उसका चित्त कभी शांत नहीं हो सकता। मन अपने आप में ,अपने आप से हच्छा की पूर्ति नहीं कर सकता है,उसे इसके लिए इन्द्रियों की सहायता चाहिए।जब हम नाद सुनते हैं तो हमारी बाह्य श्रवणेन्द्रिय इसे नहीं सुनती है,पर हम सुनते हैं
इसी तरह हम सोते हैं ,पर स्वप्न में तीव्र प्रकाश देखते हैं।यह हमारी अन्तेन्द्रिय करती है।पर मन अपने आप में इतना शक्तिशाली नहीं है कि वह बिना इन्द्रियों के भोग कर सके।
इन्द्रिय भोग से मन पर जो प्रभाव बनता है ,वह सुखात्मक और दुखात्मक दोनों ही प्रकार का होता है।इसीलिए वृत्ति के उठते ही अगर सतर्कता रहे तो हम दुख के प्रभाव को कम कर सकते हैं।निरंतर वत्र्तमान में रहने का जब अभ्यास बढ़ने लगता है तो वृत्ति के उठते ही हम यह जान जाते हैं कि यह संकल्प सहज और स्वाभाविक है, हमारे सामथ्र्य के अनुकूल है,हम इसे बिना किसी प्रलोभन या किसी अन्य के अनुकरण के अभाव में ,अपने बल के आधार पर कर सकते हैं,और हमने पूरा प्रयास किया है तब प्राकृतिक विधान से जो भी फल प्राप्त होगा,वह हमें सुख भी देगा और शांति भी देगा।
साधक को चाहिए कि वह क्षण को जो उनके सामने उपस्थित है, सार्थकता प्रदान करे। यह सार्थकता उस क्षण को अनुभव में बदल कर हम पा सकते हैं अनुभव के लिए वर्तमान मे रहना होगा। आगे पीछे भटकना, मन का भूत और भविष्य में हो रहा संक्रमण हमें रोकना चाहिए। यह भटकाव हमारी शक्तियों को विघटित करता है। मन जितना अतीत और भविष्य के भटकाव से पृथक होगा, उतनी ही वह सार्थकता प्राप्त कर सकेगा। भगवत कर्म से युक्त होने का यही सार्थक प्रयत्न है।मन जितना वत्र्तमान में है उतना ही वह ईश्वर के नजदीक है।मात्र राम-राम रटने से ,छाप तिलक लगाने से,ईश्वर के नाम का प्रदर्शन ही होसकता है।
इसीलिए जिन चीजों को अपने अंदर रख रखा है, उन्हें धीरे धीरे हटाते चले जाना ही यहां अभ्यास है। मन संकल्प रूप है, उसकी अशुद्वि दो प्रकार की है। एक तो वह चंचल है, दूसरा वह मलिन है। मलिनता और चंचलता, स्थिरतापाते ही दूर होती है। जितनी अधिक स्थिरता प्राप्त हो जाएगी, विवेक के स्पर्श से मलिनता भी दूर हो जाएगी, और कर्म, भगवत कर्म में रूपांतरित होता चला जाएगा।
इसीलिए साधक के लिए आवश्यक है, वह आत्मनिरीक्षण की ओर बढ़े।
आत्म निरीक्षण
यहां आत्मनिरीक्षण ही साधन है। साधक को चाहिए कि वह अपनी आंतरिकता में विचरण करे। मनोजगत मे पेठ करे।विचार ही राक्षस हैं।वाणी के आधार पर विचार मूत्र्तता पाते हैं। आप जो सोचते हैं,वही बोलते हैं।अपने आपको सोचते हुए कभी तटस्थता से अपने आपको देखें तो आप पाएंगे आपका असली स्वरूप यही है।आप जब स्वप्न में आप अपने आपको देखते हैं तो जो आप वत्र्तमान में नहीं कर पाए,नहीं सोच पाए ,यह सिलसिला वहां भी शुरू हो जाता है।स्वप्न भी उतने ही अधिक सच होते हैं जितनी यह व्यवहारिक दुनिया।हां जब आप वत्र्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ाते हैं तो इस विचारणा पर भी प्रभाव पड़ता है। विचारो की संख्या कम होने से विकार भी कम होने लग जाते हें,फिर स्वप्न भी कम आने लगते हैं।अवलोकन के माध्यम से धीरे-धीरे आप वहीं पहुंचेंगे, जहां से विचार चले आ रहे है। एक गहरी सतर्कता के साथ की गई आंतरिकता में निगरानी मन को क्रमशः निष्क्रियता प्रदान करती है। मन से मन की जब निगरानी की जाती है, तब वह जल्दी ही थक जाता है। और एक खालीपन निष्क्रियता प्राप्त होती है परन्तु यहां पर किसी और अन्य प्रकार के परिवर्तन की आकांक्षा नहीं होनी चाहिए। हम गुण और दोष को ही जीवन मान बैठे है। जीवन जो है, जिस रूप मे है। उसके मूल रूप को जान ही नहीं पाते।
प्रायः आत्मनिरीक्षण के साथ ही परिवर्तन की ललक रहती है। अरे मुझमें यह दोष है..........यह मुझे दूर करना है तभी गुण का स्वरूप सामने आ जाता है, मुझे तो यह होना चाहिए, आखिर यह भी तो संकल्प यात्रा ही है। जब तक गुण शेष है, तभी तक दोष की सत्ता भी विधमान है। राग द्वेष की समाप्ति ही सही वैराग्य है। हमें और कुछ नया नहीं करना, बस इसी तकनीक को समझना है कि यहां कुछ होने के लिए आत्मनिरीक्षण नहीं करना है, बाह्य से लाकर कुद आरोपित नहीं करना है जो है उसका सतर्कता पूर्वक अवलोकन ही साधन है। यहां किसी प्रकार का कोई संकल्प नही है रूपांतरण की चाहत भी नही है तभी तो जो है उसी रूपमें अभिव्यक्त हो सकता है। जब ध्यान मे रूपान्तरण को क्रिया शुरू नहीं करनी है,जब यह शुरु हो जाती है तभी तनाव शुरू होता है। एक द्वन्द्व, यह ध्यान नही है। इसीलिए आवश्यक है, आत्मनिरीक्षण की नौका पर.............मात्र लहरें ही देखना है, गिनना नहीं। पानी के गंदलेपन को देखकर अस्वीकृति भावना नहीं, जो है उसे ही निःसंकल्पता से देखना है, बस नाव चलती रहे चलती रहे तभी यह अन्र्तयात्रा संभव है। यह निःसंकल्प अवलोकन ही सार्थक ध्यान है। आंतरिक विचारणा का अवलोकन हो यह हमें प्रदान करता है।
इसीलिए आवश्यक है काल के इस अमूल्य क्षण में मन अत्यधिक संवेदनशील हो, और यह तभी संभव है, कि विचारणा ही नहीं रहे। जिस क्षण यह अनुभवन है, अनुभव और अनुभवकर्ता की पृथकता समाप्त हो जाती है। पर होता क्या है, अनुभव क्षणिक रहता है। फिर आती है स्मृति जो सार्थक क्षण का विश्लेषण करती है अनुभव और अनुभवकर्ता पृथक हो जाते हैं इसीलिए हम पाते हैं हम अधिकांशतः अनुभव से बाहर ही रहते है। अनुभव के लिए आवश्यक है, इस क्षण विचारणा अनुपस्थित रहे, भूत और भविष्य मे मन का संक्रमण न रहे, रहे मात्र वर्तमान और तभी प्राप्त होती है निःसंकल्पता, एक गहरा मौन यही तो हमारा ध्येय है।
यह हर क्षण के अनुभव में रूपांतरित होने की वह कला है जिसके द्वारा भगवद् भाव की प्राप्ति होती है, वही जीवन भगवद् कर्म से युक्त हो जाता है। ज्यों ज्यों अनुभवन बढ़ता है, जीवन की सार्थकता उपलब्ध होती जाती है।
यह स्थिति जीवन से पलायन नही है, निठल्लापन नही है यहां है सर्वाधिक गत्यात्मकता, खुला विक्षोभहीन जीवन क्या यही हम नहीं चाहते हैं ?
यह सच है, यहां तक साधारण साधक के लिए पहुंचना सरल नही है। अतः अभ्यास आवश्यक है। अतः प्रयत्न यहंा निंदनीय नही है। सच तो यह है कि प्रयत्न ही यही है।
इसीलिए साधक को अभ्यास का आदर करना चाहिए उन विचारों को जो किसी काम के नही है, उन्हें तो न आने दे। बिना काम के विचार वे ही हैं जो कभी वर्तमान मे नहीं रहने देते। हमेशा मन को भूत और भविष्य में ले जाते है। यही तो चिन्ता है, जो कि चित्त भी है। इसीलिए आवश्यक है कि गहरी सतर्कता रहे। यह सतर्कता और कहीं नहीं, अन्तर्गजगत मे हमेशा रहे। याद रखिए मन गत्यात्मक है। उसकी गति असाधारण है, इसीलिए जहां आप चूके मन एक क्षण में लाखांे मील की दूरी लांघ जाता है। ओर जहां सतर्कता पूर्वक अवलोकन हुआ वह नियंत्रित होता चला जाता है। सतर्कता की इस अवधि को बढ़ाइये, जितनी यह अवधि बढ़ती जाएगी, उतनी ही गहरी शांति में आप अपने आपको पाते चले जाऐंगे।
सच तो यह है, यहां पानी पर उठने वाली लहर को ही एकाग करना लक्ष्य नही है हम चाहते हैं, उसका बर्फ बनाना जिससे कि फिर कभी र्कोइ लहर ही नही बने। यह स्थिति मानसिक एकाग्रता ही नही है। एकाग्रता के लिए कम से कम एक संकल्प तो चाहिए ही और नहीं अबतक अन्य स्थानों पर परिभाषित किया ध्यान ही है। यहां हमें, अनावश्यक विचारणा से मन को हटाते हुए उसे सार्थक संकल्प को सौंपता हैं , फिर धीरे -धीरे निर्विचारता तक उसे लाना है।जहां मात्र आत्मानुभव है और भगवत कर्म है। यही हमारा ध्येय है।
साधक कहते हैं।
दुख है जीवन में दुख ही दुख है। हम उससे अपने आपको हटाना भी चाहते हैं पर समय नही है। वे दुख के प्रभाव को संसार की सहायता से दूर करना चाहते है। यह जानते हुए भी कि जब तक सुख की सत्ता है तभी तक दुख है। पर न जाने कैसा भटकाव है। प्राणी दुख से भागता हुआ भी सुख की भूल भुलैया में इतना उलझा रहता है...............तो उसका यह प्रयास किन्हीं सिद्वियों की तलाश में हठयोग में, या सुख की कामना मे ही यह सोचते हुए कि उसके संकल्पों की पूर्ति किसी अन्य की कृपा से संभव है , गुरू डम के भटकाव में भटक जाता है।
नहीं, हमें इसी जीवन मे शास्त्रानुसार बताए मार्ग पर चलकर अभ्यास सत्संग और स्वाध्याय द्वारा ध्येय पाना ही है। ध्यान योग ही सहज और सुगम वह मार्ग है जो संतो का साध्य पथ रहा है।
इसीलिए आवश्यक है, अगर अपूर्णता है, और उसे पूर्ण करने की तीव्र इच्छा है तो प्रयत्न आज से और अभी से ही किया जाए।
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