Tuesday, November 29, 2011

साधना क्रम

साधना क्रम पहला कदम:- जरूरी नहीं कि एक दिन एक ही क्षण में चमत्कार हो जाये। योग मार्ग पीपिलिका मार्ग है। चींटी का मार्ग, जिस प्रकार मधु की तलाश में अनवरत लगी हुयी वह दुर्गम से दुर्गम जगह पहुंच जाती है, वही भाव साधक के मन में होना चाहिए। कम से कम दो बार तो कुछ समय हमें अपने अभ्यास के लिए देना चाहिए। सोते समय और सुबह नींद खुलते समय। बैठ नहीं सके तो लेटे ही रहे। देखे मन क्या कर रहा, सतर्कता से आंतरिक विचारणा का अवलोकन करंे न जाने कितने विचार आ रहे हैं, पर आप तो विश्राम मे है और मन दोपहरी में गया, इस कल से उस कल में गया समझाइये अभी तो विश्राम मे हूं। मन को वर्तमान में लाइए। यही प्रयत्न है, शुरू- शुरू मंे मन नहीं मानेगा फिर ज्यों ज्यों अभ्यास बढ़ता जाएगा वह नियंत्रित होता चला जाएगा। साधक कहेंगे, इससे तुरन्त नींद आ जाती है। नींद आती है तो आने दीजिये यह बाधक नही है। सुबह उठते ही इस अभ्यास को दोहराइये। आंतरिक विचारणा का अवलोकन कीजिए। मन जो वांछा कर रहा है। उसे देखिए। बिना किसी पूर्वाग्रह के ओर रूपांतर की कामना छोड़िए। जो है उसी रूप में कुछ क्षण देखने का प्रयास कीजिये। मन ही मन की निगरानी कर जब थक जाती हो तो अशांति स्वतः कम होने लगती है। एक गहरी शांति का यह अनुभव ही सार्थक उपासना है। दूसरा कदम:- ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों का गहरा संबंध है। मन इसी कारण से भोगों में लिप्त रहता है। ध्यान के लिए यही श्रेष्ठ है कि किसी बाह्य नाम रूप पर मन को स्थिर करने के स्थान पर आंतरिक ब्रह्मनाद पर ही मन को स्थिर किया जाये। मन जब ठहरता है, तब अन्र्तजगत से आती हुई ये ध्वनियां साधक को सुनाई देती है। संतो ने इनके कई रूप बतलाए हैं ज्यों ज्यों मन ठहरता जाता है, ‘यह नाद’ एक स्पष्ट अनवरत सायरन की आवाज सा शेष रह जाता है। साधक को चाहिए कि वह कहीं भी रहे कुछ भी करता रहे मन यहीं लगा रहना चाहिए। श्रवण और वाणी का गहरा संबंध है। इसीलिए साधन यात्रा मे जिस कर्मेन्द्रिय पर सबसे अधिक ध्यान देना चाहिए वह वाणी ही है। तीसरा कदम:- साधन पथ पर सबसे अधिक फिसलने वाली चीज जीभ है। स्वाद की परिधि मे भी तथा वाचालता की परिधि में भी। सभी इन्द्रियों का दमन सरल है। पर इस रसना का नियंत्रण कठिन ही है। क्योंकि इसके दो कार्य हैं, जब वह बाहर आती है तब शब्दों से खिलवाड़ करती है, दोष दर्शन में लग जाती है। पर निंदा या चाटुकारी साथ ही स्वाद के लिए मन को इधर उधर दौड़ाए रखती है। जब यह एक साथ दो काम करती है तब उसका दुरूपयोग घातक ही है। नाद श्रवण पर मन की एकाग्रता से वाक संयम सरलता से बढ़ जाता है। क्योंकि श्रवण और वाक का गहरा संबंध है। जो गूंगा होता है वह बहरा भी होता है। फिर भी साधक को चाहिए, वह इसके नियन्त्रण पर ध्यान दंे। गपशप अस्थिर मन का परिचायक है। जब हम अपने आपसे बचना चाहते है तभी दूसरों को अपने सामने उपस्थित करते है। जब तक दोष दर्शन और पर निंदा उवाच जारी है हम अपने भीतर की सीढ़ियों पर उतर नही सकते। दूसरों के बारे में जानने की यह जिज्ञासा हमें आत्मानुसंधान से रोक देती है। जितना हम बाहर भटकते हैं उतनी ही हमारी आंतरिकता हमसे दूर होती चली जाती है। बाहर जो कुछ है, परिवर्तनशील है, उत्तेजनात्मक है और यह उत्तेजना मन को अस्थिरता ही प्रदान करती है। इसीलिए संयम अगर करना है तो वाक-संयम की करना है। अंत में:- इस यात्रा का प्रारम्भ ही एकाग्रता से होता है। अशुभ संकल्प जैसे जैसे मन वर्तमान मे रहना शुरू करता है, दूर होने लग जाते है। स्मृतियों से असहयोग तथा जीवेषणा की पहचान ही साधक को सही समझ सौंपती है। अशुद्व और अनचाहे संकल्पों के परित्याग से आवश्यक संकल्पों की पूर्ति अपने आप होने लगती है। यह वह स्थिति है जब सक्रियता अचानक बढ़ जाती है। साधक पाता है कि उसके भीतर असाधारण शक्ति आ गई है। वह जिस किसी भी कार्य को करना चाहता है, वह पूर्ण ही होता है। प्रमाद जो कल तक संगी था कहीं दूर चला गया है। साथ ही अशुद्व संकल्प जो पर निंदा तथा पर अहित मे थे, उनके जाते ही मनोनिग्रह हो जाता है। साधक निर्दोष होने के लिए प्रयत्नशील है। कर्तव्य परायणता बढ़ती है। उसमें स्वतः ही उदारता, मुद्रिता, प्रेम प्रकट होता है। प्रेम आंतरिक है। साधक पाता है कि उसका ह्नदय अब तक जो अनावश्यक विचारों के बोझ से, तनाव से भरा हुआ था। खाली हो गया है। वह गहरी शांति का अनुभव करता है। साथ ही जगत के प्रति जो संबंध थे। वे भी बदल रहे है। साधन यात्रा की पहली पहचान आचरण परिवर्तन है। आचरण में त्याग और सेवा की भावना बढ़ती है। वह कर्तव्य कर्म से जुड़ता है। कर्तव्य कर्म से जुड़ते ही अनावश्यक संकल्प जो भूत और भविष्य में घूमते रहते हैं, स्वतः ही कम होने लगते है। व्यर्थ ही जो समय जा रहा था, वह उपयोगी होने लगता है , वहीं पर साधक में परिवर्तन आता है। उसकी संकल्प शक्ति बढ़ जाती है। उसकी आंतरिकता घनी होते ही उसमें कलात्मकता आ जाती है।पर यह ध्यान नहीं है,यह एक प्रक्रिया है,निर्विचारता ही ध्यान है,वहीं परमात्मा है।ज्ञानी को परम ज्ञान की प्राप्ती के बाद रहना इसी संसार में है।‘ गीता ’ का संदेश गलत ही लिया गया है,पूज्य स्वामीजी कहा करते थे भगवान कृष्ण को संन्यासधर्म का ही उपदेश देना होता तो वे मिालय पर जाकर देते ,अर्जुन को सन्यासी बना देते।परन्तु उन्होंने यु( क्षेत्र चुना हैऔर यही कहा है ‘सब परिस्थितियों में ,सब कालों में निरंतर वत्र्तमान में रहते हुए कर्म रत रहो।’ हम जब निरंतर विचारणा के दबाब में रहते हैतब हम अपने आप से दूर ‘राक्षस’ तक बन जाते हैं। वत्र्तमान में रहने की उपसंपदा जब हमें प्राप्त होती है तब हम ईश्वरीय शक्तियों के अपने भीतरप्रकट होने का मार्ग प्रशस्त करते जाते हैं ।यहीं आकर हमें आत्म कृपा प्राप्त होती है। हां,व्यक्तित्व का रूपान्तरण संभव है।हम अति मानसिक चेतना को अपने भीतर प्रकट होने में सहायक हो सकते हैं।जितना हम वत्र्तमान में रहने में संलग्न होंगे,उतना ही अधिक सुख ,शांति का हम अनुभव तो करेंगे ही हमारी सृजनातमकता भी बढ़ती जाएगी। इसीलिए आज से प्रयास करें। जो जाना गया है उसका आदर करना सीखें।इससे विवेक की प्राप्ति होती है।जो माना गया है ,उस पर विश्वास लाएं।इससे आत्मविश्वास घना होता है।जो हमने कहा है,जो हमने किया है,उस पर हमारा विश्वास होना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है ,हम जहां भी हों,जो भी कार्य कर रहे हों, मन अध्ीिक से अधिक से वहीं रहना चाहिए, किंचित मात्र भी विपरीत नहीं जाने देना चाहिए। ओर भी आगे अगर साधन यात्रा निरन्तर गतिशील रहे तो साधक पाता है ज्यों ज्यों संकल्पों की संख्या कम होती जाती है, संकल्प निवृत्ति से प्राप्त शांति सघन हो जाती है।सघन प्रशांत मन वह पाता है। जो छूटना था वह स्वतः छूटता जा रहा है। जो पाना था। वह स्वतः प्राप्त हो रहा है। ”जो“ है, स्वरूप की प्राप्ति उसकी अभिन्नता है। इस बारे मे कुछ कहा नहीं जा सकता। यह अनुभव का जगत है। अनुभव जब विचारणा के क्षेत्र में आता है तब भाषा भी उसे प्रकट करने मे असमर्थता पाती है। जहां मात्र अनुभवन है वहां फिर प्रकट करने की आकांक्षा ही नही है।यहां सचमुच ही स्वयं की अंत्रनिहित शक्तियों का जागरण तो होता ही है,अपने जीवन के उद्देश्य की प्राप्ति होती है,इससे जहंा आत्मविश्वास घना होता है,वहीं जीवन में सुख और शांति की प्राप्ति होती है। यह हर साधक का अधिकार है। स्वतंत्रता हर साधक का जन्म सिद्व अधिकार है। वह यहां आकर स्वाधीनता प्राप्त करता है।साधन यात्रा प्रयोगात्मक है। एक गहरा प्रयोग। अनवरत है। यहां प्रारम्भ तो दिखता है पर अंत नहीं। इसीलिए अनन्त धैर्य ओर अगाध जिज्ञासा का होना ही साधक के लिए पहली आवश्यकता है।

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