Friday, November 25, 2011

साधन का उपाय ”जो है“ उसी पर ही ध्यान केन्द्रित रहे यही साधन है। जो निरन्तर बदलता रहता है, वही गलत है। वह स्वरूप नहीं है। उससे छूटते ही स्वरूप उपलब्ध होता है। जो भी बदल रहा है, वह मैं नहीं हूं। यह शरीर जो मुझे मिला है क्या मैं हूं ? यह संसार जो बदल रहा है, क्या मैं हूं ? शरीर, मन और संसार सब बदल रहे है। संसार मन का ही तो विस्तार है। जगत और शरीर में क्या अंतर है ? जो निरन्तर बदल रहा है वह सत्य नहीं। जो असत्य है उसी पर ही तो ध्यान है, उसी का ही चिंतन है। उसी की ही खोज है। उससे ध्यान हटाना ही ध्यान है। वह जो है उस पर जब ध्यान पहुंचता है तभी स्वरूप उपलब्ध होता है। तभी स्थिरता प्राप्त होती है। इसीलिए ध्यान ”जो है“ उसके अवलोकन की कला है। यह शरीर जिस इन्द्रिय के द्वारा यह कार्य कर पाता है, वह मन है। तभी तो सारा ब्राह्यंड इसी से हलचल लेता हुआ दिखाई पड़ता है। मन की गति असाधारण है, कहा जाता है कि प्रकाश की गति भी उसके सामने कुछ नहीं है। इसीलिए ध्यान मनोनिग्रह का साधन कहा गया है। प्रायः ध्यान का अर्थ मानसिक एकाग्रता के लिए लिया जाता है। मन के द्वारा किसी यंत्र, रूप या नाम के प्रति सजगता पूर्वक रखी गई एकाग्रता ही आजकल ध्यान कही जाती है। यह याद रखिए ध्यान मात्र एकाग्रता नही है। एकाग्रता मन का बहिर्मुख वृत्तियों को किसी नाम, रूप या मंत्र पर केन्द्रित करने का अभ्यास ही है। एकाग्रता के बाद ही अन्तर्यात्रा प्रारम्भ होती है। परन्तु एकाग्रता को ही साधन यात्रा स्वीकारने से साधक साधक पथ को ही छोड़ बैठता है। हमारे संकल्प से निश्चित की गई, यह देव प्रतिमा यह मंत्र यह नाम फिर इतना शक्तिशाली हो जाता है कि मन उससे छूट नहीं पाता, और जो होना चाहिए था वह नहीं हो पाता है। चित्त पुनः और अशांत हो जाता है। अप्रमाद के स्थान पर प्रमाद पुनः उपस्थित हो जाता है। ”ध्यान“ एकाग्रता नही है। ”ध्यान“ सतर्कता सहित आंतरिक विचारणा का अवलोकन का पथ है,यहयह भी आंशिक सही है। हम जो भीतर है, वही वास्तव है। उस वास्तव की सही सही विश्वसनीय पहचान हो,यहां ”ध्यान“ प्रक्रिया है। हम जो हैं एक स्थिर इकाई नही है। हर क्षण हम बदल रहे हैं। जो चीज बदल रही है, वह हमारी आन्तरिकता नही है। मन के संकल्प विकल्प की अनवरत श्रंृखला है। इसी श्रृंखला, इसी विचारणा का सतर्कता पूर्वक किया गया अवलोकन होना ,ध्यान की प्रक्रिया हैै। अवलोकन दूसरे शब्दों में मात्र देखना। बाहर नहीं भीतर देखना है। देखते समय ईमानदारी यही रखनी है कि किसी प्रकार का कोई पूर्वाग्रह नहीं रखना है। बनी बनाई पूर्व निर्धारित कल्पना को क्या देखना । जो बात तय कर ली जाए, जैसे कोई नाम, कोई रूप उसका अवलोकन ध्यान नहीं है। यहां जो लहरें उठ रही है, उन्हें बिना किसी तिरस्कार के, बिना किसी चश्में के देखना है, यहां पर संपूर्ण विचारणा को उसके वास्तविक रूप में देखने का प्रयास है। यह अवलोकन ही क्रमशः एक खालीपन एक गैप ,विचार और विचार के बीच में प्रदान करता है। यह अंतराल ही, यह खलीपन ही साधना का एक पड़ाव है। मन का आगे पीछे का चिंतन ही बेहोशी है। यह वर्तमान से पलायन है। यह बेहोशी है, यह नींद है। सच है हम जागते हुए भी सोए रहते है। कोई पूछे तो हमे लगता है, हम कहीं ओर थे। यही विवशता असाधन है। इसका त्याग होते ही साधक स्वयं को प्राप्त हो जाता है। यह साधन अगर साधक में पर्याप्त धैर्य रहा तो अवश्य ही साध्य से मिलाएगा। मन की गति असाधारण है। क्षण भर में ही न जाने कहां से कितनी बातें आ जाती है। चित्र ही चित्र। न जाने कितने युगों से हम चित्र ही चित्र सहेजते आ रहे है। ये ही स्मृतियां हैं, जिन्हें हम अपनी पूंजी मान बैठे है। मन जब इनके साथ सहयोग करता है, तो ये गाढ़ी हो जाती है। मूलधन ब्याज कमा लेता है। मन अगर स्मृतियां के साथ असहयोग करे तो संभव है कि मूलधन ही खर्च होना शुरू हो जाता है। यही हमें करना है। यहां न कुछ अच्छा है, न बुरा। अन्यथा हम सही रूप को जान ही नहीं पाऐंगे। जो कुछ है भीतर अंधेरी बावड़ी में रखा हुआ उसे बाहर तो आने दे। जहां अस्वीकार किया, वहीं ध्यान ध्यान नहीं रहा। प्रायः अपने भीतर के गंद लाए जल को देखकर हम चैंक जाते हैं, और अस्वीकार करने लग जाते है। या उससे बचकर ईश्वर के किसी रूप या नाम में डूबने लगते है। यह क्या है, यह तो पलायन है। परमात्मा का मार्ग कायरता का मार्ग नही है। यह अज्ञान ही है। यहां हमारी जागरूकता यही है। कि हमारी उपस्थिति बनी रहे, जहां हम है हाजरी रहे। छात्र कक्षा में आते हैं, बैठते हैं। पर जरा पूछो तो लगता है यहा थे ही कहां, कहीं और थे। गायब। ”ध्यान“ गायब होने का नाम नहीं, साक्षात अनुभवन है। जो कुछ है उसका विश्वसनीय साक्षात्कार यहां है। यही ध्यान उस विराट आनन्द स्त्रोत से हमें जोड़ देता है, जो हमारा साध्य है। इसीलिए ध्यान मात्र प्रक्रिया ही नही है, हर प्रकार की क्रिया का यहां अन्त भी है। यहां सब प्रकार के बंधन टूट जाते हैं। ज्ञान की अग्नि उठते ही अज्ञान रूपी कूड़ा कचरा जल कर राख हो जाता है। बंधन, वे पाश जिनसे हमने अपने आपको बांध रखा है, टूट जाते है। संसार के प्रति उमड़ती हुई कामनाओं के बादलों के हटते ही शेष रह जाता है, खुला आकाश निरभ्र और शांत जहां फिर कोई अभाव नहीं। अगर हमारे पास थोड़ा सा अवकाश हो, और हम अपने आपको सामने रख कर देखें तो पाऐंगे, हमारे भीतर जो आकांक्षाएं वे दो विभिन्न रास्तों पर चलना चाहती है। ज्वार सा उमड़ता है। यही वह द्वन्द है, जो मनुष्य को मनुष्य बनाता है। भोगेच्छा और भगवद् इच्छा भोगेच्छा संसार की ओर ले जाती है, यह सांसारिक सुख को ही जीवन की उपलब्धि मानती है। दूसरी ओर इस सुख दुख के झंझावत से उठकर फिर शांति की ओर बढ़ने की इच्छा उमड़ती है। यही भगवत्इच्छा है, जो मनुष्य को सांसारिक जगत में व्याकुल बनाए रखती है। शास्त्रों में इसे ही योगमाया कहा जाता है। यही सोच मोक्ष अभिलाषा है यही साधन यात्रा में साधक के मन में प्रयत्न उपस्थित करती है। साधन यात्रा...... संसार से पलायन नही है। यह संसार के प्रति सही संबंधों की तलाश है। यहां जो प्रयत्न है, वह उस समझ पर आधारित है, जो उसे आम्यंतरिक परिवर्तन के लिए प्रेरित करती है। वह अधूरापन जो उसे हर समय अशांत रखता है, उसे दूर करने का है। इसलिए यहां व्यक्तित्व का संपूर्ण रूपान्तरण है। यहां आभ्यांतर तथा बाहय जीवन का एक ऐसा परिवर्तन है कि यहां देह परमात्म भाव के साथ ही परमात्म कर्म को साधन बन जाती है। इसीलिए साधन यात्रा की उपलब्धि सांसारिक देहात्मभाव से ऊपर उठ कर आत्मानुभव ही नही हैं, परन्तु साथ ही उस परमात्मभाव को जीवन तक भी ले जाना है। आज के मनुष्य के सामने उसका अशांत मन ही कष्टकर है। वह पाता है कि अपने समस्त भौतिक प्रयत्नों के बाद भी वह विक्षोभ से बाहर नहीं निकल पाता है, वह इसी विक्षोभ को दूर करने के लिए कभी जगत में पूरी तरह बैठना चाहता है तो कभी इससे दूर कहंी ओर भागना चाहता है। मन जो बीमार है, अशांत है, एक पल भी तो स्थिर नहीं रह पाता है। कभी अतीत में तो कभी भविष्य में दौड़ता ही रहता है। कितनी हिंसा भरी है। कितनागंदलाया, जल है। हमेशा निज को छोड़ परायी खिड़की में झांकता ही रहता है। क्यों वहीं तो इसका रस है। जब तक उसे संसार से निराशा नहीं होती तब तक मन का अपना जो स्वरूप है वहां लौटना असंभव ही है। यह जो विक्षोभ है, उसका जनक यह संसार और उसकी ओर ले जाने वाली आकांक्षाएं है। यही हम जान पाए है। अभिलाषा ही कारण है जो कार्य में परिणत होती है। ज्यों ज्यों हम निम्न प्रकृति से मुक्त होने लगते हैं, त्यो त्यों भगवत्कृपा के हम हकदार बनते चले जाते है। साथ ही जितनी भगवत कृपा हम पर होती रहेगी उतनी ही निम्न प्रकृति भी शुद्व होती रहेगी। यह साधारण नियम है। इसीलिए बर्हिजगत में छोड़ने और छूटने के प्रति यहां अत्यधिक आग्रह नहीं है। जो कुछ छूटना है स्वतः ही होता जाएगा। जब हम इस यात्रा पर बढ़ेंगे। छोड़ता और ग्रहण करता मन ही है। मन को छोड़ा ही छूटा है, और मन का ग्रहण किया चिपटा है। चित्त शुद्वि और भगवत कृपा का पारस्परिक संबंध है। जितनी अधिक स्थिरता हम प्राप्त करते जाते हैं, उतनी ही अधिक भगवत कृपा हम प्राप्त करते है। यही साधन यात्रा है। इच्छा रूप ही संसार है और इच्छा निवृत्ति ही मोक्ष है। यही विक्षोभ का अन्त है। और प्राप्ति उस विराट शांति की जिसके लिए हम इस अन्र्तयात्रा पर गतिशील है। यह स्थिति जीवन और जगत से पलायन नही है। यहां जिस में जिस संसार की उपस्थिति है उसका अभाव तो है, परन्तु अब जगत के प्रति जो अब तक संबंध था, वह भी तो परिवर्तित है। कभी आचार्य ने कहा था। ब्रह्म सत्य है। जगत मिथ्या है। और साथ ही जगत ही ब्रह्म है। यह तीसरा कथन अत्यधिक महत्वपूर्ण है। यही तो आध्यात्मिक यात्रा की उपलब्धि है। यह पूर्व कथनों की अवहेलना न कर उन्हें ही अधिक स्पष्ट कर रहा है। यही वह स्थिति है जहां साधक जीवन और जगत के प्रति सही संबंध स्थापित कर पाता है। आसक्ति के स्थान अनासक्ति भोगेच्छा के स्थान पर भगवत इच्छा तभी तो कर्म का स्वरूप ही बदल जाता है। यहां जगत के प्रति त्याग और सेवा ही शेष रह जाती है। ये शब्द मात्र शाब्दिक ही नहीं रह जाते हैं, वरन् आचरण मे स्वतः ही आ जाते है। यही तो भगवतकर्म है। जो साधक को साधन यात्रा प्रदान करती है। यह स्थिति पलायन नही है। वरन् जीवन की सही स्वीकृति है। जीवन कुशलता से जीने के लिए है और योग उसकी श्रेष्ठकला है। अभिलाषाओं सेसन्यास ही तो विक्षोभ का अंत है। यही तो मोक्ष है। इसीलिए हमें इसी जीवन में भगवत कृपा प्राप्त करनी है और साथ ही इस शरीर को भगवतकर्म से युक्त करना है। अशांत मनुष्य के लिए उसका मन ही भार है। वह अनुकूलता की तलाश में इधर से उधर भटकता रहता है। उसका अशांत मन, कामनाओं की पूर्ति के लिए भटकता फिरता है। प्रतिकूलताएं जहां उसे दुख देती है वहीं अनुकूलताएं उसे गुलाम बनाती है। यही कारण है कि वह स्थिर नहीं रह पाता है। इसीलिए स्थूल देह की अपेक्षा मन जो है वही महत्वपूर्ण है। इस मन का नियमन ही महत्वपूर्ण है। इसीलिए मनोनिग्रह के अलावा दूसरा कोई प्रयत्न नही है। इसी से विक्षोभ का अंत संभव है। सच तो यह है कि अभिलाषाओं का ही नाम चित्त है। जब यह सांसारिक पदार्थों की इच्छा से रहित हो जाता है तभी सकल त्याग संभव है। जो कुछ भी अतीत है, वहां मात्र स्मृतियां है। जन्म जन्म का संस्कार है। स्थिरता के लिए वांछनीय है, इन स्मृतियों से असहयोग। साधक स्मृति मात्र से ही असहयोग सफलता देगा। अतीत के जो निष्कर्ष हैं, वे साधन पथ के चयन मे सहायक तो हैं पर मन का बार बार स्मृतियांे जाना तनाव ही लाता है। जो कुछ भी अतीत का संग्रहित है। वह अशुभ ही अधिक है। दुखद है। वर्तमान पर अपनी काली छाया छोड़ता है। सच तो यह है कि हम स्मृतियों को ही ध्यान मान बैठे है। जमा की गई पूंजी। जब तक यह ताला बंद है। मन का शांत भाव में आना असंभव ही है। हर साधक प्रयोगशील है । उसे चाहिये अनंत धैर्य अनंत प्रतीक्षा। साधन के प्रति गहरा विश्वास। जब तक विश्वास नहीं होगा, सफलता नही मिलेगी। स्पष्ट है, ध्यान सजगता पूर्वक किया गया आंतरिक अवलोकन है। यह एकाग्रता से प्रारम्भ होकर स्थिरता प्रदान करता है। निरन्तर सजगता पूर्वक की गई मन की निगरानी स्थिरता प्रदान अवश्य करेगी। यहां कोई दबाव नही है। वरन् जो कुछ है वह सहज है। यहां किसी प्रकार का बाह्य आरोपण नही है। नहीं, नया कुछ सीखना है। वरन् जो जरूरी नही है उसको छोड़ना है इसी से ”जो“ है उस स्वरूप का ज्ञान हो जाता है। जरूरी नहीं है, आज जो मौन मिला है, वह दीर्घ हो। हो सकता है क्षणिक हो। आज होश कम रहा, नींद अधिक हो, पश्चाताप नहीं करना है। पुनः यात्रा पर गतिशील रहना है। टुकड़े टुकड़े जोड़ते हुए कभी तो संपूर्ण पाया जा सकता है। इतना धैर्य अवश्य रखना है। प्रायः, ध्यान को हमने अपने जीवन से अलग कोई निश्चित अभ्यास मान लिया है। जो आरोपित है। और उसमें जाना बहुत ही महत्वपूर्ण है। जिसके लिए परिवार, तथा समाज से महत्ता प्राप्त होना आवश्यक है। यह विचारणा अनुचित है। ध्यान तो ”जो“ जरूरी नही है, उसका छूटना है। असाधन का त्याग ही साधन है। ध्यान, सहज और साधक की आवश्यकताओं के अनुरूप है, उसके लिए प्रिय और मंगलकारी हे। जहां भी रहे जब भी रहें, यह सतर्कता बनी रहे। हम वहीं रहे उसी क्षण में रहे। स्मृतियां तथा आकांक्षाओं मे जाना ही होश खोना है। नींद में जाना है वर्तमान से पलायन है। सजगता बनी रहे। जागरूकता रहे। हर पल, हर क्षण हमारी हमारे कर्म में मौजूदगी रहे। इसीलिए साधन, साधक के लिए जिंदगी से पलायन नही है। वरन् जिंदगी को सुचारू रूप से जीने की कला है। यहां संसार को छोड़कर कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है। नहीं कोई विचित्र वेशभूषा धार ण करनी है,संसार में रहते हुए ही अपनी सर्वोत्तम भूमिका प्राप्त करनी है।हम जहां भी हैं ,जो भी कार्य कर रहे हैं,उस कार्य को बेहतर करते हुए,वहीं जीवन में सुख एवं शांति पासकते हैं। साधन मात्र है ,निरंतर वत्र्तमान में रहने का अधिक से अधिक से अधिक अभ्यास रखना।यहां किसी भी प्रकार के पलायन की कोई आवश्यकता नहीं है,जितना हम वत्र्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ाते जाएंगे उतना ही जिसे छूटना है वह स्वतः छूटता चला जाता है।सुख इन्द्रियों के माध्यम से मन ही प्राप्त करता है,स्थायी सुख ही शांति की ओर लेजाता है।

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