Thursday, November 24, 2011

साधन क्यों ? यह प्रश्न और कहीं नहीं हर साधक के सम्मुख ही सबसे पहले उपस्थित होता है कि साधन क्यों ? हम चाहते क्या हैं ? मनुष्य की मांग क्या है ? अगर वह अपनी वर्तमान स्थिति से संतुष्ट है तो फिर यह प्रश्न उपस्थित ही नहीं होता है। पर अगर उत्तर नहीं में आए......तो यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है। जिसका पेट खाली है उसके सामने भूख का सवाल सबसे बड़ा है। लगता है, यही सबसे बड़ी जरूरत है। नौकरी, और नौकरी उससे बड़ी नौकरी या बड़ी दुकान खोलना, सब पेट भरने का ही तो साधन है। पर पेट कितना बड़ा है, जितना धन होता है, उतना ही खाली रहता है। किसी तरह जब पेट भरता है तब शरीर की भूख जगती है। इसीलिए शरीर की भूख न जगे, हजारों साल से पेट की भूख पर नियंत्रण रखने की बात कही जा रही है। अनशन, उपवास, सब उसी के रूप है। पेट की भूख और शरीर की भूख और शरीर की भूख जैविक आवश्यकताएं है। इससे इतर मनुष्य की मानसिक और बौद्विक आवश्यकताएं भी बढ़ती है। कला और संस्कृति, सभ्यता और विकास यात्रा, इन्हीं का विस्तार है। सभ्यता, मनुष्य की बर्हिमुखता का ही विस्तार है। मन चंचल है, गत्यात्मक है, इसीलिए सभ्यता निरंतर गतिशील है। पर यह मन की स्वाभाविक अवस्था नही है, वह कितना भी गति में क्यों न हो, सदैव नहीं रह सकता, उसे विश्राम की स्थति में आना ही होता है। हर श्रम का प्रारम्भ और अंत प्रशांति में है। नींद से उठकर मनुष्य सब कुछ करता हुआ नींद में जाना चाहता है। यही उसके संपूर्ण जीवन की यात्रा है।वह गहरी नींद से जन्म लेता है फिर उसी में लौट जाता है। विश्राम, मन की स्थिरता है, यही कला और संस्कृति आकार ग्रहण करती है। संस्कृति मन की अन्र्तमुखी यात्रा है। यह भी मनुष्य की मांग है। पेट की भूख और शरीर की भूख के बाद विलासिता की भूख बढ़ती है। विलासिता का आधार आकांक्षा है, संसार इसी कामना का ही विस्तार है।मनुष्य संभावना की भूख में रहता है, निरन्तर कुछ न कुछ होने की संभावना। जैविक आवश्यकताओं के ऊपर मानसिक और बौद्विक आवश्यकताएं यह जो भूख है, उसका आधार आकांक्षा है। और इन सब आवश्यकताओं का एक लंबा सिलसिला है, जिसमें कि मनुष्य उलझता है। सवाल फिर खड़ा होता है। यह सब क्यों ? मैं इतना सब कुछ क्यां चाहता हूं ? मैं, आखिर जीवित ही क्यों हूं ? मैं इस लंबी यात्रा पर निरन्तर चल ही नहीं रहा हूं, दौड़ रहा हूं आखिर किसलिए ? पेट की भूख, समाप्त होते ही, तुष्टि देती है। शरीर अपनी कामक्षुधा की तृप्ति के बाद क्षणिक तुष्टि लेता है। सिलसिला रूकता नही है, चलता ही रहता है। पढ़ना, रोज पढ़ना...........नौकरी तक......नौकरी से और दूसरी बड़ी नौकरी तक धन की ललक। आदिम पारस की ललक जो वस्तुएं देगी। वस्तुएं जिनसे परितुष्टि प्राप्त होगी। शरीर क्षणिक है, जर्जर है, कब ढह जाए इसीलिए अमृत की खोज हुई। शरीर ही नहीं रहा तब तुष्टि किसे ? अक्सर इन्हीं सबके लिए उमर बीत जाती है। मन्दिर, यज्ञ, तप, स्वाध्याय, गुरू भण्डारे, इन सबके पीछे जो भीड़ है............वह क्या चाहती है ? तुष्टि का अगाध भण्डार। उसकी तृप्ति में कभी कोई कमी न आए । यही सुखोपासना सभ्यता का केन्द्र है। संकल्प पूर्ति सुख देती है, और सकल्प पूर्ति का अभाव दुःख देता है। यही सुख दुख की यात्रा है। मनुष्य सुख चाहता है, मात्र सुख। सुख अल्प है, दुख अनंत है। इसीलिए ईश्वर की खोज है...............एक बड़े आधार को खोज जो दुख दूर करेगा...........अनवरत सुख देगा। अनंत सुख। और यही नहीं मिलता है................. शेष रह जाता है, विक्षोभ, व्यथा, दुख का प्रभाव यही से साधन यात्रा शुरू होती है। स्थायी सुख की खोज........ जहां अमृत है। कामना पूर्ति से प्राप्त तुष्टि का भाव ही सुख है। यह क्षणिक है। मन कामनाओं का सागर है। एक कामना की पूर्ति हो इसके पूर्व ही हजार कामनाएं पैदा हो जाती है। क्या वे सब पूरी हो पाती है ? वस्तुगत उपलब्धियों की खोज में व्यक्ति डूबा रहता है। वे ही जीवन का साध्य हो जाती है। और इधर जीवनी शक्ति निरन्तर क्षीण होती चली जा रही है। भारी छटपटाहट है। वस्तु में सुख तलाशा,.............प्रयास किया। पर जब तक वस्तु आई शरीर धोखा दे रहा है। लौटकर दुख ही शेष रहता है। विक्षोभ का धारावही व्यूह मनुष्य को जकड़े रहता है। सामान्यतः यही मनुष्य की यात्रा है। मनुष्य यह मानकर चलता है कि यह जो दूसरा है वह उसे सुख देगा। दूसरे की खोज ही संसार की यात्रा है। दूसरा पिता में, पत्नी में, पुत्र में , समाज में, धन में, मकान में, धर्म में, यश में, हर जगह ढूंढा जाता है। सुख दूसरे से ही प्राप्त होगा, यह वह मानता है, और दुख ? इस सवाल पर वह सोचता ही नहीं है।यह जो दूसरा है। जो संसार है, क्या कभी उसकी आवश्यकता की पूर्ति कर पाता है ? और सच तो यह है कि यह जो दूसरा है, हमेशा आज मंे ही आता है। दूसरा, जो है, जीवेषणा में है। कामना में है। उसका आकर्षण यही है कि उसके आधार पर भविष्य की आशा शेष है। इसीलिए मनुष्य भगवान को अपने से अलग मानता है उनसे कुछ मांगता है, और इसी तरह वह इस आशा में जीवित रहता है कि वह जो दूसरा है, उसे आज नहीं तो कल सुख ही देगा। जहां मनुष्य अपने स्वरूप को छोड़कर, अपने स्वभाव से अनभिज्ञ रहकर दूसरे से जुड़ता है वही वह दुख पाता है। यह जो दूसरा है उसका कभी नही हुआ। क्योंकि वह उसका है ही नहीं। उसकी इससे नित्य दूरी है। इसलिए इस दूसरे के लिए, जो संसार है, शरीर है, धन है,परिवार है, सुख की लालसा बनी हुई है। वह कमी पूरी होगी कि नहीं ? मनुष्य उसे ही पा सकता है, जो कि उसका है। सदा से उसका है। हां, आज भले ही उसकी विस्मृति हो गई हो। लेकिन होता यह नहीं है, मनुष्य जो उसका है, जो वह है उसे छोड़कर जो उसे कभी प्राप्त नहीं होने वाला है, निरन्तर परिवर्तनशील है उसे चाहता है और जब वह उसे नहीं मिलता है, तब वह दुखी होता है। विक्षोभ जग जाता है। दुख का कारण है, अपने को छोड़कर, परे सुख को खोज करना। जो स्वभाव है, जो है, उसे भूलकर जो नहीं है, उसमें डूबना। जब तक स्वयं की समझ नहीं होती। दुख के कारण की तलाश नहीं होती। तब तक यह दूसरा ही महत्वपूर्ण रहता है। यही विडम्बना है। दुख, दुखी के उद्वार के लिए आता है। उसकी समझ को जागृत करता है। पर वह लोलुपता के अधीन होकर सुख की तलाश में भटकता रहता है। इसीलिए दुख और उसका प्रभाव आदर के योग्य है। यही प्रभाव अपनी तीव्रता में ”जो है“ उसके प्रति ध्यान दिलाता है। जब वह पाता है कि संसार उसकीआवश्यकता की पूर्ति में सहायक नही है तभी वह अन्वेषी बनता है, खोजी होता है। ”जो“ अब तक विस्मृति में था, उसकी स्मृति ही जिज्ञासा जगा देती है। जिज्ञासा जगते ही विवेक का आदर होता है। विवेक था अभी भी जीवन में था, पर बुद्वि का आदर था। विवेक तिरस्कृत था। विवेक का आदर होते ही अविवेक छूटता है। विवेक ”जो“ है उसके प्रति आदर भाव तथा ”जो“ नहीं है उसके प्रति अनादर का भाव जगाता है। आदर का भाव ज्यों ज्यों दृढ़ होता जाता है, आचरण में स्वाभाविक परिवर्तन आता है। जिसे छूटना है वह छूटना शुरू हो जाता है। अविवेक से ही बुरे भाव और बुरे कर्म होते है। विवेक के जागृत होते ही, जो कुछ श्रेष्ठ है वह आचरण में आने लगता है। साधन प्रारम्भ हो जाता है। साधन कहीं बाहर नहीं, अपने पास ही है। अपनी आवश्यकताओं को समझा जाए। मन का आगे पीछे का चिंतन ही बाधक है। जो स्मृतियांे तथा आकांक्षाओं में डूबा रहता है। यही अविवेक है। यही विक्षोभ का कारण है। इसीलिए आवश्यक है कि पहले निज के विक्षोभ को समझा जाए। जब तक विक्षोभ की समझ नहीं होगी तब तक बाहर आने का सार्थक प्रयास भी नहीं हो सकता। वह सोचता है कि जो दुख है वह जगत के कारण से है। जगत ही सुख देने वाला है। जगत ही दुख दूर कर देगा। जीवन भर भौतिक वस्तुओं की अप्राप्ति ही दुख बन जाती है। वस्तुओं की दासता और उनकी अप्राप्ति दुख का बहुत बड़ा कारण हो जाती है। वह वस्तुओं से अपने आपको बाहर ला नहीं पाता। वह उनकी प्राप्ति के लिए छटपटाता रहता है। यह प्राप्ति ओस कणों से प्यास बुझाने की तरह है। उसकी सांसारिक भूख उसी तरह आजीवन कायम रहती है। कभी कभी अवसर आता है, विवेक कौंध जाता है। उसे लगता है कि कामनाओं की पूर्ति से प्राप्त तुष्टि क्षणिक है। हर कामना पूरी भी नहीं होती, अतृप्त कामनाएं असंख्य रहती है। अपूर्ति से विक्षोभ दुख का अनवरत प्रवाह कायम रहता है। कभी कभी विवेक का आदर जब साधक करता है, तो व्याकुलता बढ़तीहै। जिज्ञासा बढ़ती है। वह अविवेक को समझ जाता है, समझ बढ़ते ही, वह साधन यात्रा पर बढ़ जाता है। अन्यथा वह पुनः विवेक का अनादर करते ही सांसारिक प्रवाह में डूबता चला जाता है। कामना निवृत्ति ही शांति मंे प्रवेश कराती है। यहां सरोवर की लहरें शांत है। तली स्पष्ट दिखाई देने लगती है। चित्त दर्पण है। पक्षी उड़ा तो लगा वह यह दिखा। जब तक वह उड़ता रहा बिम्ब रहा। जाते ही जल फिर वही दर्पण का दर्पण। यही तो प्रशांत मन है। उस दिन पाया, शरद के शांत सरोवर में भी हवा के स्पर्श से लहरें उठ गयी। तब जाना मात्र सरोवर का उद्वेलन हीन होना ही साध्य नहीं है। कामना निवृत्ति से प्राप्त शांति भी स्थायी नहीं है। उसमे रहने का भाव, साधक के मन में सूक्ष्म अंहकार जगा देता है। यहां से पार जाना ही कठिन है। उसके जगते ही यह जो दूसरा है, संसार है, वह उपस्थित हो जाता है। हो सकता है, साधक उपदेशक बन जाए, ऋषि महर्षि हो जाए, भगवान बन बैठे। संसार पर प्रभाव डालने की आकांक्षा बलवती हो जाती है। साधक अपनी विशिष्टता स्थापित करने के प्रयास में डूब जाता है। वह पुनः संसार के आकर्षण में लौट आता है। तो फिर ? जल का बर्फ हो जाना ही यहां साध्य है। सुख दुख, शांति से परे ”जो“ है वही साध्य है। यह सच है शांति बहुमूल्य है। पर अंत मे उससे भी परे जाना है। तभी ”जो“ है उसकी प्राप्ति संभव है। साध्य वही है। जो नित्य है, तथा जिसकी प्राप्ति से नित्य अभय और नित्य शांति प्राप्त होती है। यही धर्म का रहस्य है। जो धार्मिक है वह इसे पाने में समर्थ है। जिसकी प्राप्ति सहज हो, जो दूर नहीं जो विनाश युक्त न हो, तथा जिसमें आत्मीयता हो। जो इसी जीवन में, आज में अभी ही प्राप्त किया जा सकता है, वही साध्य है। साधन की सही समझ और विवेक के प्रति आदर भाव साध्य से अवश्य ही मिला देता है। जीवन आज में, अभी में, वर्तमान में ही जिया जाता है। वही साध्य उपस्थित है। विवेक का आदर होते हीमन की रूग्णता चली जाती है, जो दुख का कारण है। हाॅं, यह जो कल है,हमेशा स्मृति की कोटर से निकल कर आता है, वहीं वापिस लौट जाता है।स्मृति जननी है ,वह निरंतर विचारणा को सृजित करती रहती है।अवधारणा ीभी वहीं जगह पाती है।यह वह ऐसा है, वह तो ऐसा ही है,विचारणा ,अवधारणा का आधार पाकर और पुख्ता होती जाती है।तब विचार बन जाता है। यही विचार मन का ही स्वरूप है। विचार जैसा होता है,मन वैसा ही होजाता है। विचारों का परिवर्तन ही मौलिक परिवत्र्तन है। विचार ही भय है, विचार ही घृणा है,विचार ही लोभ है,वही राक्षस भी बना सकता है,और निर्विचारता ही परमात्मा है,वहीं शक्ति है,वहीं शांति है।वह और कहीं दूर नहीं स्वयं के समीप है,जब यह जाना जाता है,तब जानने की जिज्ञासा में जो प्रयास अब तक किए थे तब उनकी अर्थहीनता का पता लगता है। पूज्य स्वामी जी कहाकरते थे,‘ प्रयासों की आवश्यकता है ,यह जानने के लिए कि उनकी आवश्यकता नहीं रही है।’ शांत रहने के लिए ,शक्ति पाने के लिए आवश्यक है,हम मन के नियंत्रण के लिए,विचारों के नियंत्रण के लिए प्रयास करें। यही आध्यात्म का मार्ग है,जिसका प्रवेश हमारे अंतः करण से ही होता है।

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