Wednesday, September 30, 2009

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    बीसंवी सदी के प्रारंभ में  अंग्रेजी सल्तनत का सूर्य अस्त नही हो रहा था, बल्कि उसके मध्यान्ह की प्रखरता के कारण विश्व की अधिक से अधिक जनसंख्या त्रस्त एवं क्षुब्ध थी। इसी बीच एक संभ्रान्त तथा अंगेज परस्त परिवार में मेरा जन्म हुआ। इस जमाने में ईसाई स्कूलों में अंगे्रजी माध्यम से पढ़ाई करना जहां बड़े भाग्यवानों के लिए सुरक्षित माना जाता था, वहां समाज में भी ऐसे बालक के प्रति बड़ा सम्मान प्रदर्शित किया जाता था। पितृविहिन तथा माता से अलग किया पाकर निकटतम रिश्तेदारों ने मुझे अपनाया और एक ख्याति प्राप्त स्कूल में भर्ती करके उस जमाने की अच्छी से अच्छी शिक्षा के साथ उच्च सामाजिक स्तर तथा प्रतिष्ठा का जीवन जीने के लिए श्रेष्ठतम साधनो का प्रबंध मेरे लिए किया।
    परिणाम होना था वही हुआ। ईसा मसीह के लुभावने उपदेश, बाईबल की रोचक तथा मन की गहरी पकड़ करने वाली कथाएं पढ़ भाव विभोर होकर धीरे धीरे मन वचन और कर्म से ईसाइयत मेरे रोम रोम में व्याप्त हो गई। परन्तु मेरे पैनी दृष्टि वाले अभिभावकों से मेरी मानसिक स्थिति ओझल न हो सकी तथा ईसाइयत का प्रभाव कम करने के लिए समानांतर वैदिक शिक्षा एवं सनातन संस्कारों को पुनस्र्थापित करने का पूरा प्रयास किया गया। परन्तु मैं परस्पर विरोधी संस्कार एवं विचारधाराओं के पाटों में पिसता हुआ भी ऐसी विचित्र दशा को पहुंच गया जहां मेरा वास्तविक स्वरूप एक तीसरे ही रूप में प्रकट होने लगा। एक तरफ जहां मन अत्यन्त शुद्ध निर्मल व पवित्र हुआ वहीं बा्रह्म व्यवहार, मेरे अभिभावकों को नास्तिक संस्कारहीन तथा परिवार, समाज, धर्म एवं देश के प्रति असम्मानजनक भासित होने लगे।
    मेरी अपनी स्थिति से मैं कभी संतुष्ट नही हुआ। इस संसार को समझने तथा देश के अनेक दारूण दुखों से ग्रसित मेरे देशवासियों के कष्टों का निवारण किस प्रकार हो, इसका उपाय किसी चमत्कारिक शक्ति से अभिप्रेरित होकर करने लगा।
    अनेक धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन, नाम, जप, मंत्र जप तथा यौगिक क्रियाएं प्रकाश के स्थान पर भयानक अंधकार को और दौड़ने लगी। सभी प्रयास धीरे धीरे समाप्त प्रायः हुए। मन निराशा के गर्त में डूब गया और.............और................तब।
    एक दिन एक विचित्र घटना घटी। हमारे पड़ौस में रहने वाली छः वर्षीय कमला बड़े जोर जोर से अपने पूर्व जन्म की घटनाएं कहने लगी। दस बीस कोस किसी देहात में उसका वृद्ध पति आज भी मौजूद था। चार लड़के दो लड़कियां तथा पोते पोतियों से भरा पूरा संसार आज भी उसे अपनी ओर आकर्षित कर रहा था। उत्कंठावश अनेक सत्यान्वेषितों ने सही पता तथा अन्य जानकारी कमला से लेकर सच्चाई का पता लगाने की कोशिश की तथा कुछ दिनों बाद कुछ बातें सही किन्तु बहुत कुछ गलत होने के निर्णय दिया। अनेक दिनों की चर्चा के बाद घटना भूतकाल में विलीन हो गई।
    पाश्चात्य संसार और शिक्षा के कारण पुनर्जन्म पर मेरा विश्वास नहीं था। मैंने अपनी बुद्धि अनुसार कमला को मानसिक रूप से विकृत बताया इस विषय पर अधिक सोचने की आवश्यकता नहीं समझी व घटना को भूलने का प्रयास करने लगा।
    परन्तु न मालूम क्यों, पुनर्जन्म हो सकता है या नहीं यह विचार दिन रात मेरे मन में चक्कर काटने लगा।
    मेरे एक मित्र अर्जुनदेव से घंटों इस विषय पर वाद विवाद होता रहा तथा एक ग्रंथ ”योग वशिष्ठ“ की अनेक घटनाएं सुना सुना कर उसने मुझे पुनर्जन्म के सिद्धान्तों पर विश्वास करने के लिए बाध्य करने का प्रयास किया। अचानक एक दिन जबकि मैं मात्र बारह वर्ष का किशोर था, संध्या समय अर्ध मूच्र्छित अवस्था में पहुंच कर मैंने एक विचित्र अनुभव किया।
क्या वह एक स्वप्न था या वास्तविकता इसका आज तक निर्णय नहीं कर पा रहा हँू ? तथापि पाठकों के सम्मुख उस घटना को यथावत रखने का प्रयास कर रहा हँू।

पूज्य स्वामीजी

”अनंत यात्रा“



कृति एवं कृतिकार

    यह कृति मात्र लघु उपन्यास ही नहीं है, वरन-अद्भुत साधन ग्रन्थ है। यह एक आख्यायिका है। वृतान्त योगवशिष्ठ के रानी चूड़ाला प्रसंग पर आधारित है।योगवशिष्ठ में यह साधारण कथा रानी चूड़ाला के माध्यम से व्यक्त हुई है कि वह किस प्रकार अपने पति राजा शिखिध्वज को जो योग साधना के आकर्षण में घर छोड़कर वन को चले जाते हैं, आत्मोपलब्धि करवाती है। इस कथा सूत्र के माध्यम से पूज्य स्वामीजी ने साधारण जन तक ”साधना रहस्य“ को पहुंचाया है।
    यह ”अनंत यात्रा“ है। मनुष्य की सहज आकांक्षा सुख एवं शांति की है। वह अपने जीवन को किस प्रकार, किस उपाय से व्यवस्थित कर जीवन के उद्देश्य को प्राप्त करे, यह उसकी सनातन जिज्ञासा है। धर्म, साधना, योग, तंत्र आदि सदैव से मनुष्य की जिज्ञासा को उत्प्रेरित करते रहे है। यह कृति इन्हीं चिरंतन प्रश्नों का मात्र उत्तर ही नहीं देती है, वरन जीवन और जगत की सहज व्याख्या भी करती है। कथा नायक एक बालक है। उसका मित्र अर्जुन देव है, जो कि उसका ही प्रतिरूप है। इस आख्यायिका के प्रवेश में, अर्जुनदेव को समझना आवश्यक है। वह सांसारिक मन है, जो तमस का प्रतिरूप है। नीलकंठ साधक मन है, जो अनन्त की यात्रा पर गतिशील है। जीवन के पार क्या है ? अचानक आई बेहोशी में यह बालक अपने आपको एक दीर्घ स्वप्न में अतीत की किसी माया नगरी में पाता है। उसका मित्र अर्जुनदेव भी साथ ही है। वह वहां भी चपल है। नायक स्वप्न गाथा में वह अपने आपको नीलकंठ के रूप में पाता है।
    नीलकंठ को कार्य सौंपा जाता है कि वह राजा शिखिध्वज का पता लगाकर आये। राजा शिखिध्वज, योग साधना के आकर्षण में राज्य, घर, परिवार छोड़कर अरण्य मे चले गये हैं नीलकंठ कई यात्राओं के बाद, जहां वह साधना के रहस्यों को समझता है, वहीं राजा शिखिध्वज से मिलता है। वह पाता है कि राजा शिखिध्वज जिस साधना पथ पर अग्रसित हुए हैं, वहां उन्हें मात्र निराशा ही प्राप्त हुई है। रानी चूड़ाला, नीलकंठ के साथ राजा शिखिध्वज से मिलने निकलती है तथा उन्हें वह सहज साधना सौंपती है। जिससे राजा शिखिध्वज आत्मोपलब्धि पाकर पुनः गृहस्थ जीवन में प्रवेश करते हैं। एक सन्यासी के द्वारा ”गृहस्थ जीवन“ का अभिनन्दन तथा ”स्त्री गरिमा“ का रेखांकन अपने आप में अद्भुत परिकल्पना है।
    स्वामीजी संन्यासी हैं। दंडी सन्यासी। पूर्व नाम भालचन्द्र। लगभग चालीस वर्ष से राजस्थान के इस सुदूर अंचल में झालावाड़ जिले की बकानी उप तहसील के ग्राम मोलक्या में रह रहे हैं। पहले गुरूकुल चलाया था। अब वह भी राज्य सरकार को सौंपकर सहज वटवृक्ष की तरह हर पथिक को शांत छाया प्रदान कर रहे है। कभी महाराष्ट्र से आये थे। अहिन्दी भाषी। पर अब लगता है, यहां के ग्रामीण समुदाय से जैसे अभिन्न हो गये है। अठहत्तर वर्षीय स्वामीजी ने इस आयु में यह कृति क्यों लिखी है। इस प्रश्न का उत्तर ही यह कृति है।
    आखिर वेदांत साधना क्या चीज ? क्या उसके लिए अरण्य चिंतन ही मार्ग है। जीवन भर धर्म व आध्यात्म के गूढ़ प्रश्नों से हुआ साक्षात्कार ही इस कृति का केन्द्र है। स्वामीजी प्रयोग धर्मी है। उनकी प्रयोगशीलता, कठोर अनुशासन से होकर गुजरी है। जो आरोपित नहीं होकर सहज है। रानी चूड़ाला निर्देशित करती है- सतत् अभ्यास, तीव्र लगन और स्वयं कृपा ही, साधक को साध्य से अभिन्न करने में समर्थ है। साधना जब तक ”पर“ पर केन्द्रित है, बाहर ही भटकाती है। यह ”पर“ गुरू भी है। ”ईश्वर“ भी है। वेदान्त की साधना निज का उद्घाटन है। वह बाहर नही भीतर है। तब उसके लिए ”पर“ कृपा नहीं स्वयं कृपा आवश्यक है। निजता की खोज ही विराट से जोड़ती है। ”विराट“ शब्द स्वामीजी की मौलिक उद्भावना है। ”रानी चूड़ाला“ के माध्यम से स्वामीजी यहां ”ब्रह्म“ के समानार्थी इस विराट की उद्भावना को रेखांकित करते हैं। वहीं वे ”अन्तर्मन“ के रूप में एक नई प्रस्तुति दे रहे हैं। नीलकंठ और अर्जुनदेव एक दूसरे के प्रतिरूप है। नदी के दो तल है। ऊपर और नीचे, जल दोनों तरफ है। चेतना का ऊपरी अस्तर अर्जुनदेव है, निचला नीलकंठ है। यह अन्तर्मन सदैव विराट से संयुक्त रहता है। संस्कार शब्द यहां एक नई व्याख्या के साथ आया है, जो कि अत्यंत गत्यात्मक उपकरण है। यह अन्तर्मन के समीप है। यही ”वैयक्तिक विभिन्नताओं का कारण है।“ जो विराट है, वह सर्वत्र सब जगह व्याप्त है तथा अन्तर्मन उससे सदैव संयुक्त रहता है। फिर साधना क्या है ? स्वामीजी कहते हैं, हम अलग है ही कहां, पर उसका अहसास नही है। यह ज्ञान होना ही आत्म ज्ञान है।
    इस आख्यायिका के माध्यम से आघ्यात्म के गूढ़ प्रश्नों को सरल व सहज भाषा में स्वामीजी ने मात्र व्यक्त नही किया है, वरन् सत्य का जो ‘कुंभ’ शास्त्रों की दुरूह शब्दावली से ढका हुआ था, उसके आवरण को हटा दिया है। कर्म और ज्ञान पर आधारित साधना ही वेदांत की धरोहर है। शरीर कर्म से संयुक्त रहे और चेतना अज्ञान के कल्मष से मुक्त हो यही अनन्त यात्रा है। यहां जीवन और जगत से पलायन नहीं है, वरन् सीधा साक्षात्कार है। जिसके लिए प्रत्येक मनुष्य स्वतंत्र है। ”वेदान्त दर्शन“ का यही अनुपम संदेश है। ”शिप्रं भवति धर्मात्मा“ यही पूज्य स्वामीजी की मंगल वाणी है।
    स्वामीजी की मातृभाषा मराठी है। यह उनकी हिन्दी में पहली कृति है। अठहत्तर वर्ष की आयु में इस कृति का सृजन चमत्कार ही कहा जा सकता है। भाषा स्वामीजी की ही है। उसमें किसी प्रकार का संशोधन, सम्पादन कर्ता ने नही किया है। उसके मूल स्वरूप को बनाये रखा गया है।
    उन सभी के लिए जो साधना पथ पर हैं तथा जो जीवन और जगत के रहस्यों का साक्षात्कार करना चाहते हैं, यह कृति अपने आप में अमृत वाणी है। साधकों का पथ प्रशस्त हो, वे सुख एवं शांति इसी जीवन में प्राप्त करे, यही अनन्त यात्रा की उपलब्धि है।

Thursday, July 16, 2009

ेेआज का समय और हम

ेेआज का  समय और हम  

जो शास्त्र में लिखा है, वही सही है, उसे मानकर यह चलना भूल है। शास्त्र भी मनुष्य ने बनाए हैं, उस समय जैसी बुद्धि थी, ... जैसा चिन्तन था, वह कहा गया है। यह संसार विकासशील है, हमारे समय में जो बालक थे, वे आज के बालकों की तुलना में बहुत पीछे थे, आगे आने वाले बच्चे और भी बुद्धिगत योग्यता में आगे आएंगे।
मनुष्य की बौद्धिक क्षमता पहले से बहुत बढ़ गई है। नए-नए विचार उत्पन्न हुए हैं। विज्ञान के क्षेत्र में नए-नए आविष्कार हुए हैं। टेक्नोलोजी का इतना तेजी से विकास हुआ है कि हमारे विचारों में बहुत बड़ा परिवर्तन हुआ है।
पुराने विचार वर्तमान में लाभप्रद नहीं है। कई प्रकार की विसंगतियां उनसे उत्पन्न होती है।
ग्रन्थ भी मनुष्य ने ही बनाए हैं। भगवान तो लिखने आए नहीं हैं।
भगवान कृष्ण को भगवान माना, भागवत पुराण ही है। पुरानी घटनाओं पर आधारित है। इसमें लोगों ने विशेषताएं, शक्तियां बढ़ा-चढ़ाकर बताई है।
थे, तो वे भी मनुष्य ही।
मानव शरीरधारी कोई भी हो, उसकी सीमा होती है। महान शक्ति उसमें समा नहीं सकती है। सौ वाट के लट्टू में चार हजार वाट की पावर आ जाए तो वह फ्यूज हो जाएगा।
शरीर में शक्ति को सहन करने की एक सीमा है।
शास्त्र आप पढ़ते रहे।
शास्त्र आपको प्रभावित नहीं करेंगे, यदि आपने सही तरीके से मुझे सुना है। इन विचारों पर मनन-चिंतन किया है। तो पुराने शास्त्र आपको प्रभावित नहीं करेंगे। पढ़कर देखें, पढ़ा करें, क्या नई बात आपको पता होती है, चिंतन करें, बुद्धि से परीक्षण करें, उचित लगे अभ्यास में लावे।
जितनी बातें हम सुनते हैं, अधिकतर अतिश्योक्ति होती है। सब मन को उलझाने के प्रयास हैं।
सृष्टि के दो भाग हैं।
एक ब्रह्म है, एक माया है। ब्रह्म शक्ति है। उसकी क्रियाशीलता माया है। माया में पांच महाभूत हैं। पांच महाभूतों से ही सारी सृष्टि और यह शरीर बना है। इसमें पृथ्वी, अग्नि, वायु, पवन और आकाश है। इससे बना हुआ शरीर या हर वस्तु, इस दृष्टि के साथ निरंतर घूम रही है। तो यह माया है। पंचमहाभूत है। इसका स्वभाव स्थिरता नहीं है। निरंतर गतिशीलता और परिवर्तन। वह इतना सूक्ष्म है कि हमको नज़र नहीं आता है। कण-कण में परिवर्तन हो रहा है। निरंतर हो रहा है। इस परिवर्तन के साथ, विकास समझिए, बनना, बिगड़ना, हर वस्तु का समान है। मनुष्य का भी यही स्वभाव है।
बचपन से बुढ़ापे तक गतिशीलता ही है। वृद्धावस्था में विकार होता है, इन्द्रियां थक जाती है। फिर शरीर का टिका रहना मुश्किल है। हमारे यहां सौ वर्ष की आयु अधिकतम मानी गई है। आज कोई कहे किसी की हजार-पांच सौ साल की आयु है, ... वे हिमालय पर रहते हैं, ... मात्र अतिश्योक्ति है। हमें अपनी बुद्धि से निर्णय करना है।
आप भी मेरी बात पर इसीलिए विश्वास मत करना कि आप मेरे प्रतिश्रद्धा रखत हैं। मेरे विचार मेरे लिए हैं।
आप सही तरीके से सोचें-
ळववक उंेजमत जमंबीमे ीवू जव जीपदा दवज ूींज जव जीपदाण्
निर्णय अपनी बुद्धि से लेना है। मनन चिंतन करके सही निर्णय पर पहुंचना है। सुनी-सुनाई बातें, केवल सुनाने के लिए होती है।
पुरानी कहावत है-
।सस जींज हसपजजमते पे दवज हवसकण्
चमकने वाली हर चीज सोना नहीं होती है। करोड़ों में कोई एक संत होता है, ... कोई एक दार्शनिक, ... इसके लिए चित्त का निर्मल होना अत्यधिक आवश्यक है।
संसार एक विचित्र नाटक है। ।इेनतक क्तंउं कहा जाता है। विचित्र है। यहां अनेकों विचित्रताएं होंगी।
यदि हमें कोई भी व्यक्ति यह कहे कि यही सच है, तो जितनी शक्ति से वह कहेगा लोग उसे ही सही मानेंगे।
थोड़े दिन बाद दूसरा विचार आएगा, वह उसको खारिज कर देगा। यही प्रकृति का बड़ा नाटक है।
साधक कहता है, वह साधना करता है। प्रकृति के नियम के अनुसार, साधना आवश्यक ही नहीं है। स्वाभाविकता आनी चाहिए। साधना मात्र प्रयास है, यह स्वाभाविकता के निकट है।
म्ििवतजे ंतम तमुनपतमक जव ादवू जींज दव मििवतज पे तमुनपतमकण्
मििवतजेए (प्रयास) तो करने हैं, यदि नहीं करते हैं तो कर्म की प्रकृति के खिलाफ जाते हैं। कर्म तो करना ही है। पर अंत में जाकर- सच्ची साधना स्वाभाविकता ही है। बालक स्वाभाविक है। वह अपना आचरण बाह्य दबावों से नहीं बदलता है। विचित्रता संसार रूपी नाटक की विशेषता है।एक भी अंग इसका अनावश्यक नहीं है। परन्तु इसमें उलझने के स्थान पर तटस्थ रहो। तटस्थता केवल वर्तमान में रहने से आती है। यदि वर्तमान में नहीं है तो हर विचार हमें धक्का देगा, सोचने पर मजबूर करेगा।
... साधु-संतों की चर्चा व्यर्थ है।
जिन्हें हम साधु समझते हैं, वास्तविक साधु नहीं है।
लाखों करोड़ों में कोई एक साधु होता है।
सब अपने-अपने स्वार्थों से चिपटे लोग हैं, ... यह भी उदरपूर्ति साधन है, इसीलिए बने हुए हैं।

- हमारे यहां बहुत बड़ी परंपरा है।
पुराने ग्रन्थों के चार्वाक को भी ऋषि माना है। उनकी भी परंपरा रही हैं। जब तक जीना है, सुख से जीना है। कर्ज लेकर भी घी को पीना है। सुख से रहना है। एक बार शरीर भस्म हो गया फिर किसने उसे देखा है। यही संसार की विचित्रता है।
जितने दर्शन उतने विचार, ... जितनी संप्रदाय उतनी ही पद्दतियां है। यही संसार की विचित्रता है। सही-गलत के चक्कर में मत पड़ो। संसार लीला क्षेत्र है। प्रकृति का आनंद लो। तटस्थता बनी रहे। स्थितप्रज्ञ रहते हुए सांसारिक कर्म करो, यही सार है। भागकर कहीं जाना नहीं है।

वाचिक मौन, मौन नहीं होता है। परन्तु मानसिक मौन मन का मौन है। मानसिक मौन जब एक सीमा तक पहुंच जाता है, तब उस मन में तरंगे जैसी निकलती है। वो सीधी दूसरे के मन को जाकर उसे वे प्रेरणा देती है। वह भी इसी प्रकार मौन रहकर के, मौन होने से जो वह महान शक्ति है, उसके द्वारा आने वाली तरंगों से  दूसरे व्यक्ति को, मन की तरंगों द्वारा प्रभावित कर देता है।
वह संदेश उन तक पहुंचा देता है जिससे उनकी मानसिक स्थिति अपने आप ही एक विशेष स्थिति में पहुंच जाती है, उन्हें अटूट शांति मिलती है। संतोष होता है। उनकी शंकाओं का समाधान हो जाता है।

किसी के भविष्य को जानने का प्रयास मत करो, पता भी लग जावे तो बोलो मत, पूर्वाभास होता है, तो इससे आत्मविश्वास बढ़ता है। परन्तु यह भी बाधक है। पहले एक दो बातें सही होंगी, फिर तीसरी बात गलत हो जाएगी। प्रकृति किसी को भी अपने रहस्य को जानने का अवसर नहीं देती है। कोई भी जान भी लेता है तो उसका मुंह बंद करा देती है, उसे हटा देती है।

‘मैं’ का अर्थ, गीता में भक्ति मार्गियों ने भगवान कृष्ण के लिए किया है। भगवान मानकर उनकी पूजा करो ‘शरणा गति में जाओ’
- ‘मैं का अर्थ, मैं शरीर धारी नहीं हं। यह तो पंच महाभूतों का बना है। स्वभाव है, वह निरंतर परिवर्तनशील है।
व्यवहार और आध्यात्मिकता में परस्पर विरोधी बातें हैं।
मैं का अर्थ, अंतर्मुखी होना पड़ेगा। तभी सामंजस्य का पता लगता है।

याद रखना। जो भी समस्या आपके सामने आएगी। उसका मुकाबला सीना तानकर करना। फिर वह कभी आएगी ही नहीं। यदि पीठ दिखाई तो फिर वह हावी होती जाएगी। कहां तक भागते फिरोगे। भागकर जावेगे भी कहां, मेरे सामने अनेक समस्याएं आई, मैं नहीं भागा। समस्याएं इसीलिए आती है कि हमें अपनी योग्यता का परिचय देने का मौका मिलता है। इससे मुझे जीवन में सफलताएं मिलीं।
निडर होकर मुकाबला करना होगा।
भागकर चले जान चाहो तो कहां जाओगे, हमारे भीतर से अंदर का डर निकल जाना चाहिए। इसीलिए भीतर किसी तरह की आसक्ति नहीं रहे।
आसक्ति नहीं होने से जो भी चीज चाही है, हमारे पास आएगी, जिस क्षण उसे जाना है, चली जाएगी।
आपका इस पर वश नहीं चलेगा।
समुद्र में लकड़ियां लहरें ले आती है, एक जगह इकट्ठी हो जाती है। फिर हवा का झोंका आता है, बिखर जाती है।
वर्तमान में हर चीज मेरी है।
जब संबंध टूटेगा।
टूट जाएगा, बस आसक्ति नहीं होनी चाहिए। चिंता नहीं होनी चाहिए। यही सार है। हमेशा मुस्कराते रहो।  प्रसन्न रहो। हर परिस्थिति में प्रसन्न रहो। जहां आत्मविश्वास नहीं है वहीं दूसरे का सहारा लिया जाता है। चाहे बीमार पड़ने पर बार-बार चिकित्सा व चिकित्सक का हो। भोगने में विश्वास करो। भागने में नहीं। शारीरिक विकार है, हमें भोगना है। शांति के साथ भोगना हैं। प्रसन्नता रहे, जैसा सुख है, वैसा ही दुख है।
भगवान शंकर का प्रतीक इसी बात का है।
खुद विष पी गए, पर गले से भी नीचे नहीं उतरने दिया।
अर्जुन को मोह हुआ था, ... हमारे भाई-बन्धु मारे जाएंगे। मृत्यु को कोई पसंद नहीं करता। भगवान ने उससे कहा- ‘तुम इन विचारों से कर्तव्य से हट रहे हो। धर्म से विचलित हो रहे हो। तुम्हे युद्ध करना है। लोग कुछ भी कहें। प्रकृति को तो युद्ध चाहिए। जो बना है, वह बिगड़ेगा ही। प्रकृति में जो पैदा हुआ है, ... वह रहेगा, ... नष्ट भी होगा।
जितनी सृजन की आवश्यकता है, उतनी ही नाश की भी है। सृष्टि की गति के लिए नाश भी आवश्यक है।
परिस्थिति से भागना नहीं है, मुकाबला करो।
अर्जुन के प्रश्न के उत्तर में कहा था- स्थितिप्रज्ञ बनकर युद्ध करो। यही सार है।

Monday, July 13, 2009

पूज्य स्वामीजी

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समर्पण का पथ

               
यहां मात्र विधि है। सब स्वीकार है मुझे
    प्रकृति ने जो दिया है
    जो सौंपा है
    श्रेष्ठतम है।मैं कहाँ तक बदलूंगा, मेरा सामथ्र्य ही बहुत कम है।कहीं तो मुझे रुकना ही होगा।जो भी मुझे आज मिला है ,कल मैंने ही तो यह चाहा था।तब हम साधना का प्रारंभ कर सकते हैं।यहां लड़ना किसी से नहीं है।न निंदा न वंदना।न कोई चाहत।
स्वामी जी कहा करते थे,याचक मत बनो।तुम अनिष्ट की कल्पना कर-कर ही टूट जाते हो।तूफ़ान आता है,पेड. किस तरह सामना करता है,पूरा हिल जाता है,पर वह गिड़गिड़ता नहीं है।

योग के नाम पर प्रारभ में ही पूरा बल छोड़ने और छूटने पर होता है। यहा उसकी कोई जरूरत ही नहीं है।तुम तो बस जो विधि तुमने ली है उस पर चलते रहो जिसे छूटना होगा वह स्वतः छूटता चला जाएगा। साधना के नाम पर साधक को लड़ने के लिए तैयार किया जाता है।यह योग का मार्ग है।    संकल्प का मार्ग है, संघर्ष करना है
    पहला संघर्ष- काम से
    काम के विरूद्ध  रहना है, जब विवाह किया है,तब आप योग की तैयारी में नहीं जासकते।पर सब जगह उल्टा पाठ पढ़ाया जारहा है।गृहस्थ का मार्ग दूसरा होगा,उसका मार्ग गृहस्थी से ही जाएगा।उसे अपने परिवार की सभी जिम्मेदारियाँ पूरी तरह से निभानी ही होंगी।
    इसीलिए  योगी  जो भी साधन अपनाता है वह गृहस्थ के प्रतिकूल है।भारत की हजार साल की गुलामी का मुख्य कारण यही रहा कि हमने मूढ़ता में आकर गृहस्थ के विरुद्ध ही रास्ता पकड़ लिया।  शक्ति का मूल केन्द्र नाभि के पास है।उसे जागृत होना है।परन्त परम्परागत  साधना  मूलाधार के विरूद्ध है।हमारी सारी साधनाओं का प्रारंभ इसी मूलाधार के विरुद्ध ही रहता है।यही गलती हमें कहीं का नहीं रहने देती।
     गहरी सांस लेना सीखें।प्राण वायु नाभि तक जाए ,विचार कम से कम हों, मस्तिष्क की क्रिया पर कम से कम दबाब डाला जाए।इससे स्वाभाविक रूप से उर्जा का विकास होगा।उर्जा का विकसित होना  कोई पाप नहीं है।
होना  यही चाहिए-    यह जगत परमात्मा की लीला भूमी है। सब उसी का  ही है, शिव और शक्ति का मिलन  है यहाँ
    किसके खिलाफ जाना है?
    किससे कब लड़ना है?
    - उसका उपभोग करो, काम शक्ति परमात्मा की देन है।उसके आभारी रहो। तुमने असहयोग किया ,क्या इ्र्रश्वर खुश होगा,यह तुम्हारी भूल है।जो भी परमात्मा ने दिया है ,साधन सामग्री है।
    उपयोग करो
    रूपांतरण करो
    - जो भी है, उसे स्वीकार करो। सामथ्र्य का सदुपयोग ही साधना का प्रारंभ है।
    समग्र स्वीकार
     मांगो मत, प्रयास करो। जो भी क्रिया है उसमें अपने आपको पूरा लगादो। कर्तुम, अकर्तुम ,अन्यथा कर्तुम, यही होगा।होगा,नहीं होगा,कुछ तीसरा होगा। परन्तु यहां तुम्हारी लगन महत्वपूर्ण है। लेकिन सजगता में रहो- होश में रहो
    संसार और मोक्ष- विपरीत नहीं है
    जाल  सनातन से रहा है
    किससे छुटकारा
    मुक्ति किसी की नहीं होती, कहां जाओगे ,जो भी गया लौटके बताने नहीं आया,इस दुनिया से बेहतर कोई भी जगह नहीं है।
    संसार रसमय है, ऐसा कोई स्थान नहीं है, जहां परमात्मा न हो
    जब सब जगह परमात्मा है
    तो फिर किसे छोड़कर कहां जाना है-
    सब जगह जो भी है स्वीकार है, अच्छा मिला उसके अनुग्रही बनो।मन माफिक नहीं हुआ ,उसकी इच्छा तुमनत ही तो की थी।।तुम भी तो अपने बच्चों के हर काम पूरे नहीं कर पाते हो।उसकी भी मजबूरी रही होगी।तुम्हारा प्रयास कम रहा होगा।कम से कम सोचो।कोई संघर्ष नहीं होना है।
    तब मन का अनावश्यक भटकाव कम होने लगता है
    - सबको प्रकृति ने अपने कार्य से भेजा है।  हम सब इसरंगमंच के पात्र है
     जो ‘रोल’ हमेें दिया गया है, उसको वैसा ही करता है।
    शैतान भी उन्हीं ने बनाया है, उसका भी कार्य होना है।हम कौन उसका खेल बिगाड़ने वाले होते हैं।

,जहां समर्पण होता है, वहां मन की उहापोह भी खो जाती है
    अहंकार कभी भी समर्पण नहीं होने देता है, वह हर जगह कुतर- कुतर  करता है।वह किसी की बात स्वीकार ही नहीं करता।जब दूसरा चाहे वह गुरू ही क्यों नहो वह उस वक्त भी  इसमें नई बात क्या है? यह तो मुझे पहले से ही पता है, यह तो उस किताब में भी लिखा है मानकर अपनी ग्राहकता को रोक देता है।पत्थर की तरह जो रात दिन नदी में भीगा रहने बाद भी सूखा रहता है।
    बुद्धि अनेक उत्तर अपने पास रखती है
    -सीस देय ले जाए- कबीर ने कहा था, प्रेम बाजार में नहीं मिलता, शर्त है, सिर दे जाओ ।अहंकार कभी भी नहीं जाता।
    .. रावण के दस सिर थेे, दस गुना अहंकार, ... हांॅं
    तीर जब नाभि पर मारा गया, तब वह मरा..। अहम् की मृत्यु माम् के साथ लय में होती है। माम् का मूल स्थान नाभि पर है।अहम्, माम् में लय हो जाता है। मम् माया दुरत्या,  पार होनी कठिन है।परन्तु इस माम् की शरण ही पार कराने में समर्थ है।
               

Wednesday, June 10, 2009

जीवन का स्त्रोत












मरने की कला

जिस दुनिया में हम रह रहे हैं, वह उस दुनिया से अलग नहीं है जो हमारे भीतर है,
हमारे और दुनिया के बीच में जो बंटवारा है, वह अस्वाभिवक है, जैसी दुनिया से बाहर है, हम भी भीतर वैसे ही है।
हम बाहर प्रेम तलाश करते हैं, सहानुभूति पाना चाहते हैं, सहृदयता चाहते हैं, पर क्या वह हमारे भीतर भी है? कभी जाना। हम जैसे है, बाहर की दुनिया भी वैसी ही है।
जब हमारे भीतर मौलिक परिवर्तन होगा, हमारे विचारों में, हमारे भावों में, हमारे व्यवहार में, बाहर भी हम वैसा ही परिवर्तन पाएंगे।
हमें अपने आपको, अपने आपके द्वारा समझना है, कोई दूसरा हमें हमारे बारे में समझा नहीं सकता।
हमारी अपने बारे में गहरी समझ ही, हमें अपने बारे में सही बता सकती है, और कोई दूसरा नहीं।
-जब हम आदर्शों के हिसाब से जीवन शुद्ध कर देते हैं, हमने तो हमारा काम कर दिया, जिम्मेदारी पूरी कर दी, हम समझते हैं, हम भले हैं, पर यह मात्र भौतिकवादी क्रियाकलाप ही रहता है, इसमें भावना का पोषण छूट जाता है, यह मात्र एक औपचारिक घटना होकर रह जाती है। हम तब वास्तविकता के साथ जुड़ नहीं पाते हैं। न ही हम अपने आपको सही रूप में समझ पाते हैं।

-हमारे विचार, हमारी मन-स्थिति, हमारी धारणाएं जो हमारी जीवन शैली को बनाती है, वे टुकड़ों में बंटी हुई है। हमारे विचार परस्पर विरोधी विचार भी है, जहां हम रहते हैं हमें अपने भीतर इस अराजक स्थिति को देखना होगा। उन कारणों को पहचानना होगा जहां से यह सारी अनियमितता पैदा होती है।
अपने आपको जब हम देखने का प्रयास करते हैं, तब हम पाते हैं कि हमारा अपना नजरिया न दूसरों के प्रति वरन अपने प्रति भी पूर्वाग्रह से भरा हुआ है। हम अपने आपको भी देखने में स्वतंत्र नहीं है। हमारे विचार, हमारी मान्यताएं, हमारे समाज व संस्कृति से प्रभावित है। हमारे भीतर जो मन है, जो दृष्टा है, वह स्वयं रंगा हुआ है। वह निर्मल नहीं है। स्वच्छ नहीं है। हमें कैसे देखना है, क्या देखना है, सब पूर्वाग्रह से ग्रसित है। यही हमारे भय का कारण है।
-पूर्वाग्रह से रहित होना, स्वतंत्र होने की पहली शर्त है। हमें अपने प्रति यह सजगता लानी होगी कि हम जिस प्रकार सोचते हैं, क्या सोचते हैं, क्यों सोचते हैं, हमारे विचार क्या हैं? न तो हमें उनकी निंदा करनी है न उसके साथ बढ़ना है। मात्र उन्हें स्पष्टता में, जैसे ही वे आ रहे हैं, उन्हें देखते रहना है। तब हम धीरे-धीरे यह समझने में सफल हो जाते है कि हमारे विचारों का ढांचा किस प्रकार का है, हम ऐसा ही क्यों सोचते हैं। तब हम अपने मन को विचारों की शृंखला से मुक्त कर पाने मे ंसफल हो पाते हैं।
गीता में भी कहा गया है- ‘श्रिप्रं भवति धर्मात्मां, या तो आप तुरंत बदल सकते हैं, या कभी नहीं, यह परिवर्तन शृंखला में नहीं होता है। मौलिक परिवर्तन त्वरित घटता है। उसके लिए आवश्यक है कि हम इस विधि के, इस प्रक्रिया को गंभीरता से ले- हम अपने जीवन को घटता हुआ देखें, हम अपने विचारों को देखें, ‘अपने क्रियाकलापों को देखें। तब हमारे और जिसे हम देखना चाहते हैं, उसके बीच दूरी नहीं होती है। यह इसी विचारों के कारण से होती है।
मेरे भीतर भय है, जब मैं अपने भय को सीधे देखता हूं, मुझमें और भय के भीतर कोई अंतराल नहीं है, न ही में भागना चाहता हूं, न ही लड़ना चाहता हूं, तब पाया भय मुझसे दूर नहीं रहता है। इस दूरी के टूटते ही, जो दिख रहा था, जो देख रहा था, दोनों में एक रूप होते ही समय का अंतराल विदा हो जाता है।
जीवन क्या है, मृत्यु क्या है, रहना क्या है?
हमारे जीवन का एक मात्र ध्येय अधिक से अधिक सुख पाना है। पर जहां सुख है, वहीं उसके पीछे भय और दुख भी छिपा हुआ है। सुख-शारीरिक है, मानसिक है बौद्धिक है स्वास्थ्य है, काम है, प्रशंसा है, सम्मान है, हमने सुख को ही जीवन की अनिवार्यता मान लिय है। हमने सुख को इतना महत्व क्यों दिया है? जीवन अनुभवों की एक अनवरत शृंखला है। हम उन अनुभवों को नहीं चाहते हैं, जो दुखात्मक है। बीमारी है, असफलता है, मृत्यु है, नाश है, नहीं चाहते हैं। जहां सुख मिल सकता है, संभावना भी है, वहां हम उसे पाने के लिए भागते हैं, मंदिर में, पूजा में, तंत्र में, राजनेताओं के पास, धन लिप्सा में, सुंदर भोजन में, कहां नहीं जाते। हम सुख पाना चाहते हैं, सुख इसीलिए हमें खींचते हैं।
आखिर यह सुख कहां है? कहां रहता है, जाना जो भोग हुआ है उसकी मधुर छाप स्मृति पर रह जाती है, वह बार-बार उसकी पुनरावृत्ति चाहती है। जब भी अनुभव नया हो उसके पूर्व स्मृति उस क्षण को निकाल लाती है। वहां नया अनुभव नहीं होता, मात्र एक दोहराव रहता है, वह भी यांत्रिक सा हो जाता है।
... तब जो अनुभव विचार ने संग्रहित कर, बाहर फैंका था, वह विचार भय तथा दुख को भी संग्रहित कर निरंतर बाहर लाता रहता है। कल क्या होगा? आज यह दुख आया है, भोगा है,उसकी कटु स्मृतियां कल भी आ सकती है, यही भय है।

यही विचार जो सुख को जगाता रहता है, यही भय को, दुख को भी पैदा करता रहता है। हमारा सादा जीवन इन्हीं स्मृतियों का ही विकास है। एक निरंतर संघर्ष, दुख और सुख का बना रहता है। और हमारा जीवन हम ध्यान से देखें तो दुख से अधिक भरा हुआ है। जहां सुख है, वहां भय भी साथ रखा हुआ है।
हमारे अतीत में जहां सुख का संग्रह कम है, वहां भय और दुख की छाप अधिक संग्रहित है। प्रश्न उठता है, क्या हम इन सबको जो अतीत का हिस्सा बन चुका है, एक साथ हटा सकते हैं?
तब एक ही प्रश्न शेष रह जाता है कि क्या विचार जो दुख और सुख को एक सातव्य एक निरंतरता प्रदान करता है, रूक सकता है, अप्रभावी हो सकता है कि वह दुख और सुख को स्थायित्व नहीं दे पाए, उसे आधार न दे पाए। हम यह जान चुके हैं कि विचार ही उसे आधार देता है, तब क्या विचार से मुक्त हुआ जा सकता है?
विचार तो रहेगा, तथ्यात्मक विचार के आधार पर बाह्य संसार चल रहा है, पर हम यहां मनोवैज्ञानिक विचार की बात कर रहे हैं जो मात्र हमारी स्मृति का भंडार है, अवधारणाओं का जनक है, अनावश्यक विचारणा यहा से निरंतर प्रभावित होती रहती है। भीतर हमारे अंतर्जगत में इस मनोवैज्ञानिक विचार के लिए कोई आधार नहीं है क्योंकि जहां यह सुखात्मक अवधारणा को रखता है वहीं यह भय और दुख का जनक भी है। जहां आवश्यक हो, वहां विचार का सहयोग ले, अन्यथा उससे अप्रभावित रहे। मात्र देखें। तब यह संभव हो जाता है कि हम वास्तविक अनुभव के साथ रहें, उसमें जीएं, तब विचार का अनावश्यक दखल कम होता जाता है। तब हम उस वास्तविक क्षण में जीने में समर्थ हो जाते हैं जो हमेशा ‘वर्तमान होता है।

मृत्यु क्या है, हम मृत्यु के नाम से भय खाते हैं। जानते हैं, कहना कठिन है, जो सामने अभी था, वह नहीं रहा है। मात्र उसकी स्मृतियां रह जाती है। हर याद, उसके न होने की पीड़ा का दंश दे जाती है। कटुता खिन्नता हृदय दुखों के सागर में डूब जाता है। अपनी मौत का इतना दुख नहीं होता, जितना परिजन की मृत्यु का होता है। अपनी मौत का मात्र भय होता है। जबकि हम जानते हैं कि हम स्वयं मरने की ओर ही जा रहे हैं। हम मृत्यु शब्द से ही डरते हैं। हम इस बारे में विचार ही नहीं करते हैं। स्मृति हमेशा अतीत की होती है। मृत्यु भविष्य में है, अतः वहां कल्पना का आधार ही नहीं मिलता है।

मृत्यु- पंचमहाभूतों से जोे शरीर बना है, उसका स्वाभाविक विसर्जन है। इसीलिए बुढ़ापा, बीमारी, दुर्घटना जो मृत्यु के वाहक हैं,, भयभीत करते रहते हैं। हम पुनर्जन्म की चर्चा करते हैं, पर अभी तक उसका वैज्ञानिक आधार तलाश नहीं कर पाए हैं, पर हमारी मान्यताएं दृढ़ है।

हम चाहते हैं, मृत्यु टल जाए, हमारी पूजा, प्रार्थना, प्रार्थना यहां तक की ध्यान का भी अभिप्राय यही रहता है। हम दुख नहीं चाहते है। मृत्यु सबसे अधिक भयावह है, हम उससे दूर जाना चाहते हैं।

तब प्रश्न उठता है कि हम जो कुछ भी हमारा जाना गया है, हमारे भीतर स्मृति है, उससे मनोवैज्ञानिक रूप से उसके बोझ से उसकी आसक्ति से हट सकंे। उसके प्रति मर सकंे। यहां शारीरिक मृत्यु की बात नहीं है, हमारी जो आसक्ति है, जो चिपकाव है, यहां उसकी मृत्यु की बात हो रही है, क्या कभी हमने उस सुखात्मक क्षण को, अनुभव को, याद को जिसे हमने बहुत संभालकर अपने भीतर रख रखा है, क्या उसे हटने दिया है, क्या उसे अप्रभावी होने दिया है? क्या हम उसे भूल पाए हैं? लेकिन यदि हम उन सबके प्रति, हमारी सारी आसक्तियों के प्रति, अपने परिवार अपने पद, अपनी उपलब्धियों के प्रति मर सकंे, उन्हें भूल सकंे तब हम वास्तविक रूप से स्मृतियों के, उस जाल से बाहर आ सकते हैं, जो विचारणा का भंडार है। जहां अतीत हमेशा भविष्य की ओर प्रेरित करता रहता है, तथा स्वयं अतीत में ही है। उनका हम इन सबके प्रति मर सकें तब हम जीवन को समझ सकते हैं। तब जीवन जीने का अर्थ बदल जाता है। यहां जो अनुभव है, जो उससेे परे है, वह प्रेम है। यह प्रेम सुख-दुख से परे हैं।
यहां आने की प्रक्रिया ध्यान है। ध्यान यह वह नहीं है, जो सिखाया जाता है। ध्यान जो जाना गया है, जो ज्ञात का भंडार है, उसका खाली हो जाना है। यहां मन जो जाना गया है, जो स्मृतियों  का भंडार है, उसके अनुकरण में काम नहीं करता है, परन्तु मन स्वतंत्र होकर उसका प्रयोग भी करता है। यही मन का नियंत्रण कहा जाता है।
इसीलिए जीवन जीने की कला, वर्तमान में रहना है। यहां जो अतीत है, जो भविष्य है, दोनों के प्रति मर जाना है। तब मात्र वर्तमान में रहा जा सकता है। यहां आत्मा या शरीर का विभाजन नहीं है, शरीर बिना चैतन्य के जड़ है, चैतन्य को आधार शरीर का चाहिए। इस एकरूपताप में विभाजन गलत दृष्टि है। वर्तमान में जहां शरीर है, वहां मन है। वहीं चैतन्य है, यही वह स्वाभाविक अवस्था है जिसे ‘सहज’ कहा जाता है।

Sunday, June 7, 2009

जीवन का स्त्रोत

जीवन का स्त्रोत   
जीवन का स्त्रोत क्या है ,यह प्रश्न सभी चिंतकों को व्यथित करता रहा हैं।भगवान बुद्ध ने अव्याृत प्रश्न कहकर इसे पूछने पर मना कर दिया था।भारतीय दर्शन की यात्रा , मैं हूँ,मेरी सत्ता है, मैं चैतन्य हूँ, तथा अद्धैत वेदान्त तक आते - आते मैं आनंद भी हूँ,  गीता में भगवान ने ”मम माया दुरत्या कहकर परम सत्ता ”आत्म“ तक दी है।पूज्य स्वामीजी जहाँबुद्ध के आलय मत को मानते हुए परम चैतन्य को अत्यंत गत्यात्मक कहरहे हैं, वहीं वे केन्द्र की सत्ता को भी स्वीकृति दे रहे हैं, पर यहाँ जो केन्द्र है ,वह निरन्तर परिवर्तनशील है , जो अनेक ज्योतियों के एक थिर होने का अहसास भी कराता है।

कृपया आप इसे पढें ,अपनी प्रतिकिया दें,यहाँंस्थागत धर्म से हटकर भारतीय संस्कृति और धर्म दर्शन की विवेचना होरही हैं
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साधकांे से हुई बातचीत के आधार पर
योग मात्र शारीरिक क्रिया प्रक्रिया का सामन्जस्य ही नही है, वरन योग सम्पूर्णता पाने की प्रक्रिया है। जो पूर्ण है, जहां किसी प्रकार का कोई अभाव नहीं है। अभाव ही विक्षोभ का जनक है। वही दुख है। प्रत्येक प्राणी में किसी न किसी प्रकार की कोई न कोई कमी रहती है। कमी प्रकृति जन्य है। विषमता प्रकृति का स्वरूप ही है। आकांक्षा से गति उत्पन्न होती है, गति इस विषमता को हलचल देती है। एक स्फुरणा, पूर्णता की ओर बढ़ने की ललक, यही विकास यात्रा है। हम निरन्तर सम्भावना में है, रूपान्तरण में हैं, अपने आप को बदलने की प्रक्रिया में हैं।
यही कर्म का स्वभाव है। कर्म उस तरंग की स्वाभाविक गति है, जो चित्त सरोवर में उठी है। स्फुरणा क्यों ? क्या मात्र इसलिए ही नहीं कि वहां मात्र उद्वेलन ही है। सरोवर में आने वाली हर लहर एक छाप छोड़ जाती है। फिर उसी छाप पर, उसी  प्रभाव पर दूसरी लहर लाती है।यही तो संकल्पों का सिलसिला है, कारण है- संस्कार ! संस्कार ही वह छाप है, जहां नाभि से आने वाले स्पन्दन तरंग उत्पन्न करते हैं। इस तरह यन्त्र जो कि स्वचालित है, चलता रहता है। लहर उठती है, गिरती है, छाप बनती है, उस पर पुनःलहर उठती है। यह छाप ही वह संस्कर है जो कि संकल्पों की जनक है। हर संकल्प जो जितना गहरा होता है, उतना ही कर्म में ढल जाता है और कर्म की परिस्थिति भोग में होती है। भोगावस्था में वह तरंग पुनः टूटती है और उसका प्रभाव शेष रह जाता है। उस प्रभाव से पुनःतरंग उठती है।
यह एक लंबा सिलसिला है।
प्रश्न उठता है, फिर इस सिलसिले को योग में कैसे परिणित किया जाये ? योग-सम्पूर्ण रूपान्तरण ! अभाव का ही अभाव ! मात्र पूर्णता। यहां हैं गहरी शांति हार्दिकता तथा प्रेम।
शरीर मात्र जड़ ही नहीं है, वह परम चेतन्य के साथ जुड़कर चेतन तथा जड़ के साथ जुड़कर जड़वत हो जाता है। वह जड़ और चेतन का समवाय है, जो अद्भुत है, इसलिए ही रूपान्तरण संभव है। इस शरीर का सम्पूर्ण समर्पण ही साधक के लिए श्रेयस्कर है। साधक कहते हैं कि वे ध्यान करते हैं कुछ कहते हैं जाप करते हैं, कुछ कीर्तन करते हैं, एक-एक इन्द्रिय को लेकर वे संयमित हो रहे है। वाणी जाप करती है, तब मन बाजार घूम आता है। हाथ से सुमिरिनी फिरती है, तब कान पड़ौस का बाजा सुनता है। घण्टे भर मौन रहे, पर आसन से उठते ही क्रोध से आग बबूला हो उठे हैं। इतना गुस्सा, यह कैसा योग हैं ? योग- जुड़ना। परम सत्य में लय भाव। यह मात्र एकांकी नही है, वरन यहां जुड़ना सम्पूर्ण है। टोटल....कुछ भी बाकी नहीं रखना। अपने आपको पूरा दे देना। चैबीस घंटे दे देना। तब जो कर्म है, वह भगवद कर्म में ढल जाता है।
यह कर्म कब संभव हो ?
प्रश्न उठ खड़ा होता है, यह कैसे संभव हो ? हम जो कुछ करते हैं, क्या वह सार्थक कर्म नही है? हां उत्तर सम्भवतः यही है। सार्थक कर्म पूर्णता देता है, जब कि निरर्थक कर्म मात्र अभाव और असंतोष सौंपता है। निरर्थक कर्म जन्म लेता है उन बातों से जो आज की नही है। आगे और पीछे का जो व्यर्थ का चिन्तन है, उसमें हम डूबे रहते है। वह इस प्रभाव का चित्त सरोवर पर सौंपता है, जिससे विक्षोभ जन्य लहरें उत्पन्न होती हैं, जहां मात्र अभाव ही है।
अतः आवश्यक है कि पहले निरर्थक कर्म से सार्थक कर्म की और बढ़ा जावे जो प्रकृति जन्य है, वही सहज है।
वही स्वाभाविक है। वह अपने आप पूरा हो जाता है। निरर्थक कर्म होता है, मन-तन के आगे और पीछे के चिन्तन में डूबने से। मन को जितना इससे हटाया जाकर वर्तमान में लाया जायेगा। उतना ही मन अपनी स्वाभाविक स्थिति में होगा।और मन जितनी शांत अवस्था में होगा, उतनी ही सक्रियता बढ़ेगी। साथ ही, उतनी ही सृजनात्मकता रहेगी। कर्म, सार्थकता पाएगा। कर्म, सार्थकता तभी पाता है, जब वह कर्म दुबारा न किया जावे यह भावना पूरी हो जावे। यही कर्म का रहस्य है। अन्यथा कर्म का भोग शेष रह जाता है। कर्म की स्वाभाविक परिणति लय है और जब कर्म मुक्ति का कारण बन जाता है, तब वही योेग कहलाता है, अन्यथा कर्म की परिणति भोग में ही होती है।
कर्म भी साधन ही है। इसके स्वरूप को समझे बिना बचने का उपाय नही है। यह जगत, कर्म के ही ताने-बाने से बना हुआ है। अतः जगत से बाहर जाना तो संभव नही है। करोड़ो में कोई बिरला बाहर आ सकता है, परन्तु अपने भीतर से जगत को बाहर कर सकता है। जगत में रहते हुए भीतर के जगत से छुटकारा ! यही साध्य है। जगत आगे और पीछे के व्यर्थ के चिन्तन में उपस्थित रहता है वह तरंग पैदा करता है। जो कर्म को उपस्थित कर भोगों में बदल देती है।
अतः कर्मयोग का रहस्य यही है। कर्म का योग में रूपान्तरण ही साध्य रहे। चित्त सरोवर मे आने वाली हर लहर पर ध्यान रहे। उसका साक्षी भाव से निरीक्षण। निरर्थकता से बचा जाये। तभी गंदलाया जल स्थिर होना शुरू हो जाता है। और पारदर्शी तली उपस्थिति देती है।
यह स्थिति मात्र जड़ हो जाना नही है, वरन यह है- सम्पूर्ण सृजनात्मकता का अवतरण, टोटल रिवोल्यूशन सम्पूर्ण परिवर्तन दूसरे शब्दों में सम्पूर्ण योग। यहां मात्र क्रिया का अन्त नही है, परन्तु क्रिया का सहज और स्वाभाविक रूपान्तरण है।
इसकी साधक में पहचान है, हार्दिकता और आचरण में निस्वार्थता।
कर्मयोग, साधक को अदभुत क्रिया शक्ति से जोड़ता है, जिसकी परिणति होती है, त्याग और सेवा में। उसका हर क्षण प्रकृति जन्य होने लगता है। जिससे प्रकृति से साधक की सम्प्रत्ति गहरी होने लगती है।
व्यक्तित्व की संरचना
प्रश्न     ः     यह माना जाता है कि शरीर जड़ और चेतन दोनो का समवाय है, शरीर में चेतना का प्रकाश कहां होता है, तथा चेतना किस प्रकार कार्य करती है इस सन्दर्भ में विवाद है। क्या मन, चित्त और आत्मा के बीच में भी अन्य किसी प्रकार के स्तर है।
स्वामी जी     ः     यह तो वही बता सकता है, जिसने सवाल खड़ा किया है। किताबों में पढ़ा होगा। प्रश्न अगर मन से आया है तो उत्तर उसी के पास होगा, उत्तर उसी से पूछा जाए मिल जायेगा। रमण महर्षि ने प्रश्न यही उठाया था और इसी की तलाश में रहे।
प्रकृति की लहरें अनवरत उठ रही हैं। ये नाभि में उठती हैं। नाभि में विकारों के बीज हैं। वे बीज सूक्ष्म हैं। वहां मात्र स्पंदन है। वे धीरे धीरे उफनते जाते हैं, जैसे लहरें सभी के अन्दर उठ रही है, किसी को जल्दी उत्तेजित करती हैं, किसी को कम। यह व्यक्ति की बनावट, बुनावट पर निर्भर रहता है।
जैसे कुछ लोग सो रहे हैं, कोई आकर आवाज देता है तो कोई एक आवाज पर, कोई दो आवाज पर, कोई चार आवाज पर उठ जाता है, और कोई होता है, उस पर असर ही नही होता- वह सोता रह जाता है। आवाज देने वाला एक ही होता है। संस्कार सूक्ष्म बीज रूप में हैं, लहरें टकरायी, टकराते टकराते कोई उफन जाता है, किसी पर कोई असर नही होता। यह उसी प्रकार से है कहीं बच्चों ! आवाज लगते ही उठ जाता है, कोई सोया रहता है। वासना जागृत ही नहीं होती।लहरें अनवरत उठ रही हैं धीरे-धीरे यह अनुभव हो जाता है कि प्रकृति का कार्य यही है। हमें तो सहन करना है। सहन करने के लिए अपने स्थान पर स्थिर होकर रहना है।
चेतन्य केन्द्र आत्मा है या यूं कहिए, वहां अवेयरनेस है वह है, उसका अनुभव हो जाता है, उसके सबसे समीप अन्तर्मन ही है, मनोविज्ञान की भाषा में इसे अनकांशस कहा जा सकता है। यहां जानने का माध्यम कोई है नहीं, इन्द्रियों की पहुंच यहां तक नहीं है। यहां तक स्थूल शरीर की पहुंच नही रहती है। यह उसके परे की बात है, अभ्यास यही करना है कि नाभि से उठ रहे स्पंदनों को, जो चित्त पर आकर टकराते हैं तथा वहां स्थूलता ग्रहण करते हैं, और वासनाएं जन्म लेती है, उस उफान को उस संवेग को, उस लहर को, उस तरंग को उस भाव दशा को गहरी जागरूकता के साथ, सतर्कता के साथ साक्षी भाव से अवलोकित करना है।
इसी अन्तर्मन से स्पंदन आगे बढ़ते हैं, वे स्थूल शरीर से अभिव्यक्त होते हैं। नाभि से उठने वाले स्पंदन चित्त पर आकर टकरा कर स्थूलता ग्रहण करते हैं। यहां आकर भाव- दशा शरीर के माध्यम से प्रकट होने लगती है। यहां आकर वासनाएं आकर ग्रहण करती हैं, स्पंदन तरंगों का रूप ग्रहण कर लेते हैं, वासनाएं विषयों के लिए लालायित रहती हैं, उन्हें पोषण मिल जाता हैं, अगर वर्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ जाता है तो वे ऊपर की ओर उठती जाती हैं, पर उन्हें फैलने के लिए जगह नहीं मिलती स्वभाव में बदलाव व्यवहार की श्रेष्ठता अनुकरण से नहीं सीखी जाती। यदि हमारा क्रोधी स्वभाव है और उसकी हमें प्रतीती भी है, तो वर्तमान में रहने का अभ्यास होेने के बाद लहर जो उठी है, वह अनुभव होगी और लहर जिस प्रकार पत्थर पर टकरा कर वापिस लौट जाती है, वैसे ही मालूम होगा। टकराई व लौट गई, अन्तर्मुखी होेने के बाद वृत्तियां उठते हुए भी पनपती नही है। और धीरे-धीरे बिल्कुल ही नहीं होती।
इसीलिए कहा है, स्वभाव बाद की स्थिति है। इसीलिए स्वभाव का पता तब तक नही चलता, जब तक क्रिया नहीं होती। आप चुप हैं, मौन हैं, पर बोलते ही शब्द बाहर आते ही जब क्रिया होती है, स्वभाव का पता चल जाता है। वर्तमान में रहने वाले का स्वभाव समझ में नही आता है, क्योंकि वहां प्रतिक्रिया नही होगी। न भूत है, न भविष्य, न कल्पना है, न अतीत से संग्रहित कोई व्याख्या है। क्योंकि बाह्य, मन अनुपस्थित है। उसका काम होता है-स्मृति करना, कल्पना करना, चिन्तन करना, संग्रहित करना, रिकार्ड रूम नहीं रहा तब न अतीत रहा न भविष्य रहा, मात्र क्रिया, कोई प्रतिक्रिया नहीं। स्वभाव सहज, साधारण बन जाता है। हां, यह भी नहीं होता कि निठल्लापन होता है, या पलायन। हां, अत्यधिक सृजनशीलता, और चित्त की नमनीयता वहीं संभव है। सवेंदनशीलता यही प्राप्त होती है। जो भी कार्य प्रकृति को करना है, वह कराती जायेगी, तथा कार्य स्वतः होता जायेगा।
मैं इतनी देर से चुप बैठा था, आपने प्रश्न पूछा मैं बोला। नही तो चुप रहता हूं। प्रश्न पूछा है तो क्रिया होती है। नहीं तो व्यवहार कुशलता नही रही। हम सब भीतर से जुड़े हुए हैं। व्यवहार ही सबके प्रति सही होना चाहिए। यहां इतने लोग आते हैं, पर आवश्यक नहीं है, बोला जावे। पर कोई प्रश्न पूछता है, तब उत्तर आ जाता है, अन्यथा मौन, व्यवहार का सही तरीका यही है। अन्तर्मुखी होने पर कर्म स्वतः प्रकृति जन्य हो जाता है, वहीं यह पहचान होती है।
इसीलिए वह बात गहराई से समझने की है कि हमें इस प्रक्रिया के प्रति जागृत होना है। जागरुकता की सबसे बड़ी यही जरूरत है। हम हजारों साल से शरीर के प्रति अत्यधिक सजग हैं। सारे शास्त्र यहीं आकर रूक गये हैं, जो आगे बढ़े वे भी काल भय से हमें छोड़ नहीं पाये। बुद्ध जब बोले, तब तो शरीर से इतना लड़ चुके थे कि उनकी बात को भी स्वीकारते हुए जो उन्होंने करके छोड़ दिया था, वह भी उनके अनुयायी मानते गये। लोग कहते हैं कि मन, जो क्रिया-तन्त्र है, वाक है, शरीर के इस पर नियंत्रण कर ले, और चित्त से उठने वाली तरंगों के प्रति असहयोग रखें तो साधना की ओर तेजी से बढ़ेंगे। यह सबसे बड़ा खतरा है।
उपशमन, नियमन, नियंत्रण फिर उल्टी तरफ चलना है। शरीर के नियंत्रण व नियमन की जितनी चिन्ता होती है, शरीर उतना अधिक खतरनाक हो जाता है। वहीं जब क्रिया का स्वरूप स्पष्ट है तो मात्र साध्य अन्तर्मन से उठने वाली तरंगो के प्रति सहनशीलता को प्राप्त करना है। शरीर के नियंत्रण पर हजारों साल से जो बल दे रहे हैं, वह यह जानकर भी छोड़ने का साहस नहीं कर पा रहे है। मन से असहयोग लेना है मन का निष्क्रमण भूत और भविष्य में है। वर्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ते ही मन स्वतः अनुपस्थित हो जाता है। यह क्रिया तन्त्र को राजी रखने का तरीका नहीं है, वरन उसका सहज साक्षात्कार है। जिससे वह स्वतः अनुपस्थित होने लग जाता है। यही पहली मंजिल है, न यहां दमन है, न क्षय की स्पर्धा। अभ्यास का क्रम है, मात्र साक्षी ध्यान। यही हमें जानना है, आगे गहरे समझना है। तभी साधना का रहस्य समझ में आता है। यही सार है। तभी लक्ष्य की प्राप्ति संभव है।