Wednesday, March 2, 2011

गुरू:वाणी तो क्या उसकी मृत्यु नहींे होती?

”तो क्या उसकी मृत्यु नहींे होती?






हाँ, देह जब तक है, उसका अपना स्वाभाविक नियम रहेगा।मृत्यु वह तो प्रकृति का नियम है। समुद्र के किनारे हवा के झौकों लकड़ियाँ आ जाती है। इक्कट्ठी हो जाती है। समय पर फिर हवा के थपेड़ों से अलग-अलग हो जाती है। यह मिलना, बिछुड़ना, प्रकृति का अपना नियम है। इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता है।

मृत्यु ज्ञानी की भी होती है, जो नहीं जानता है , उसकी भी। संसार की उपस्थिति वाह्यमन में है और संस्कार नाभि में रहता है। वहीं अंतर्मन है, जो निरन्तर विराट से होने वाले प्रवाह से जुड़ा रहने के कारण उत्प्रेरित रहता है संसार उसके धक्केां से, उन लहरों से के धक्कांेे से से स्पंदित होकर, यही मन मस्तिष्क को गति देता है। यही कारण है कि एक ही घटना की अलग-अलग लोगों पर अलग-अलग प्रतिक्रियाँ होती है।



फिर साधना क्या है?

कुछ नया नहीं है। शरीर के माध्यम से की गई कोई भी विधि वहा्रँ कारगर नहीं है।यह तो मन के द्वारा मन को ही नियंत्रित करने की कला है। हाँ, शरीर की बनावट व बुनावट सबकी अलग है। इसलिए इसके लिए कोई एक रास्ता नहीं है। इसीलिए मैं किसी को भी ध्यान नहीं सिखाता। ध्यान तो सिखाने की चीज नहीं है। यह तो अपने आप हो जाता है। मन जब वर्तमान में रहने लगता है तब मन का भटकाव कम हो जाता हे। वह जहाँ है, वहीं हैं, यही ध्यान है। ध्यान तो अपने आप पाया जाता है। यह जीवन और जगत से काटकर सिखाने की चीज नहीं है। मैंने ”अंनत यात्रा“, में इस बात पर स्पष्ट लिखा है उसे लोग पढ़ते ही नहीं है।

मैं बहुत पहले रमण महर्षि के आश्रम गया था।

वहाँ मौन सत्संग होता था। वे आते थे और शांत बैठे रहते थे। लोग आते थे और सामने कतार में पंक्तिब( बैठे रहते थे। उनके प्रश्नों के उत्तर अपने आप मिल जाते थे। वहाँ मैंने पाया था, नियांत्रित मन कितना शक्तिशाली होता है।



क्या यह अन्तर्मन ही आत्मा है?



आत्मा भी दिया हुआ शब्द है। यह कोई स्थाई इकाई नहीं है। आत्म कहो या अन्र्तमन, वह भी निरन्तर बदलने वाला है। यहाँ सब बदल रहा है। विराट से जुड़ा रहने के कारण यह अंतर्मन जहाँ शक्तिशाली है, वही यहाँ लहरों के निरन्तर स्पंदन है। लहर भी क्या स्थाई होती है? निरन्तर बनती -बिगड़ती है? संस्कार बीज है। यही कारण है, जब मन नियांत्रित होता है, तब यह सं स्कार रूपी बीज भुनने लग जाता है। इसकी अंकुरण क्षमता समाप्त होने लगती है। जब तक संस्कार है , मन का भटकाव रहेगा। मन का नियंत्रण तथा संस्कारो की शु(ि एक साथ होती है। एक सधता है, दूसरे अपने आप सधने लग जाता है। यही जीवन का उद्देश्य है।



साधना के नाम पर मेरा यही कहना है, यहाँ कुछ भी स्थार्ई नहीं है। सब बदल रहा है। मेरे विचार भी आपको अच्छे लगंे। स्वीकारे नहीं तो छोड़दें। हाँ, एक बात जरुर कर सकते है, जहाँ आप का शरीर है, वहाँ आपके प्राण सदा रहतेहै, पर मन वहाँ नहीं रहता। उसको वहाँ लाना ही साधना है। मन और प्राण की वास्तविक युति ही वास्तविक योग है। इसलिए यहाँ करने के लिए कुछ भी नहीं है। यह तो रहने की कला है। जहाँ आप हांे, जो भी कार्य कर रहे हो, काम









तो आज काी दुनिया में करना ही होगा। जीवन यापन भी करना हे, धन की जरुरत होती है। बस जहाँ हम हैं, वही मन रहे। उसका भटकाव कम से कम रहे। शुरु-शुरु में कठिनाई आती है। लोगों ने बहुत गलत समझा रखा है।यह तो बहुत जटिल मार्ग है। ये करो - वो करो, कर्मकांड की भूल -भुलैया है। मैंने रास्ते सभी देखे, प्रयोग किए, प्रकृति निरन्तर मार्गदर्शन करती रही । सबमें सरल और सीधा यही रास्ता है , निरंतर वत्र्तमान में रहो।

जो गया , वह गया, जो अभी नहीं आया पता नहीं, पर मन हमेशा भूत काल को ही वत्र्तमान में ही ढकेलता रहता है। बहुत पहले सबको एक सत्तूवाली कहानी सुनाई थी। वह हांडी लाकर तरह-तरह की कल्पनाएं करता है। अपनी शादी भी कर लेता हे। बच्चे होजाते हैं। बच्चे पर गुस्सा करता हैं। मन कल्पना में उड़ान भरता रहता हैं , अचानक वत्र्तमान में खुद की लात से ही सत्तू की हांडी टूट जाती है।



रास्ता इतना सरल और सीधा है। विश्वास ही नहीं होता। वर्तमान में रहना, वर्तमान में ही सम्भव है। गीता में कहा गया है ” क्ष्प्रिं भवति धर्मात्मा,“। यह धर्मात्मा वही है, जो वर्तमान में है। वहाँ न अतीत का दबाव है, न स्मृतियाँ है, न कोई विचारणा है, न कोई अवधारणा है, शांतमन ही शक्तिशाली होता है। जब वह किसी भी क्रिया के साथ लगता है, सफलता मिलती है, यही योग की स्थिति है। तो क्या हम इसे पाने में असमर्थ हैं? यह वर्तमान में रहने की क्षमता हमारी अपनी ही है,जिसे हमने खो दिया है।इसको पाना ही धर्म है, यही आध्यात्म है और यह अभी इसी जीवन में संभव है। जो निरन्तर वर्तमान में है, वही ध्यानी है, वही शांत सजगता है। उसी को तुम लोग जाग्रति;म्दसपहीजमकद्ध कहते हो। शरीर तो जैसा सबका है, उसका भी वैसा ही रहेगा। हाँ, शांत मन, प्रसéाता, संतोष, उसकी कुछ-कुछ पहचान बता सकते हैं। वैसे तुम लोगों ने नियम -कायदे बनाए होंगे वो तुम जानो।











Tuesday, March 1, 2011

गुरू:वाणी

1 मेरी बात




अमरीका से आई केरोल नागले को अमरीका में डॉ. बसावड़ा ने बताया था कि अमरीका वाले भारत में जिन प्रबु( व्यक्तियों की तलाश में हैं, स्वामी जी उनमें से एक है। म्दसपहीजमक च्मतेवद यह उनका प्रयुक्त वाक्य था। वह कोटा में मेरे ही घर में ठहरी। उसका पहला सवाल था, क्या ये प्रबु( हैं? वे दक्षिण के साईं बाबा, केरल की अम्मा, आदि वर्तमान के प्रख्यात संतों से मिलकर यहाँ आई थी। स्वामी जी का नाम लोकप्रिय नहीं था, वे अपनी कुटिया से बाहर जाना बहुत पसन्द करते थे, बहुत ही कम लोगों का उनके पास आना-जाना था। बस पुरोहित रामप्रसाद जी कहा करते थे, मैंने अपने जीवन में ऐसे संत नहीं देखे, क्या है इनके पास में नहीं जानता, पर ऐसा कुछ है, मैं ही क्या मेरा पूरा परिवार खिंचा चला आता है। केरोल ने मुझसे कहा था, मैं क्या उत्तर देता। यही कहा पिछले पच्चीस साल से साथ हूूँ, पर तुम्हारा सवाल जो है, उसका उत्तर मैं नहीं दे सकता।



हम लोग कुटिया में थे। गुरुकुल में कार्यक्रम था। श्री कडवानीजी, ओझाजी आदि भी वहाँ थे। केरोल का पहला सवाल था, क्या आप जागृत पुरुष; मदसपहीजमक च्मतेवदद्ध हैं।

स्वामी जी बोले-”मैं नहीं जानता, आपको जो लगता है, आप माने।

उसका अगला सवाल था-” क्या आप मुझे भी जागृति;मदसपहीजमदमकद्ध करा सकते है?“

स्वामीजी चुप थे, फिर हंसे,” अभी तुम्हारा बच्चा नारायण छोटा है, पति ग्रेग है, नौकरी है, इतनी जिम्मेदारियाँ है, क्या वास्तव में चाहती हो? बहुत कुछ छोड़ना भी होगा।“

वह चुप रही।



वह स्वाजी से उनके जीवन के बारे में सवाल पूछती रही।

स्वामी जी हंस रहे थे, कह रहे थे, ”नदी तो बह रही है, पर किनारे को हो ही पकड़े रहोगी, तो भीतर कैसे प्रवेश करोगी? यहाँ सबकी हालत यही है। नाव भी पार उतारने के लिए ही होती है, पर नाव में बैठे रहे तो...?“



वह पूछ रही थी,”आपने कौन-सी साधना की है?“

स्वामी जी हँसे,”सब, तब पता नहीं था, जिसने जो बताया, सभी किया, फिर एक इंजीनियर साहब मिले, वे थियोसाफिस्ट थे, उन्होंने कुछ रास्ता बताया। तब नौ-दस साल की आयु थी। धीरे-धीरे बाहर का सब छूटता गया। पाया विधियां सब व्यर्थ हंै, मन ही कुंजी है, मन क्या है, किसी ने देखा नहीं है, इसके क्रिया कलाप को सब जानते है।



पर मन को इन्द्र्रियाँ बाहर ले जाती है, उन्हें विषय भोग चाहिए। पर यही मन जब नियंत्रित होता है, इसको बाहर जाने की जगह नहीं मिलती, तब यह अंतर्मुखी होने लगता है, वहीं द्वार है।तब यह मस्तिष्क से नीचे उतरता है, तब मन और मस्तिष्क का गठबंधन टूटता है। तब पता लगता है। मन अलग है, मस्तिष्क अलग है। मन एक कागज की तरह है, ऊपर की सतह बाह्य मन है।



नीचे की अंतर्मन, यह अंतर्मन अत्यंत शक्तिशाली है। जहाँ बाह्य मन है, वहाँ संसार है, वहाँ भटकाव है। सभी विकार वहाँ है।वही मृत्यु है, वही जन्म है। वही भव है, वहीं भटकाव है। पर बाह्य मन जब नीचे उतरता है ;यह भी सम झाने के लिए कहा गया है द्ध।

तब मन दोनो भोहांे के बीच जहाँ भृकुटी है, वहीं उसकी अनुभूति होती है। फिर यह नासिका तथा कंठ से हृदय तक आता है। तभी कहा जाता है हृदय में अंगुष्ठ बराबर उसका निवास है। मन अपने मूल निवास, नाभि तक चला जाता है, पर वहाँ टिक नहीं पाता है। उसे हृदय तक आकर ठहरना हो जाता है। यह ज्ञानी की अवस्था है। वह शांत है, वह सुखी है, वह संतोषी है, वह आत्मविश्वासी है, साथ ही वह प्रसन्न है। वहाँ उसे कोई संशय नहीं है। बु(ि विवेक में परिणित हो जाती है। तुम कहो कि वह जादूगरी से चीजंे हवा में बनाए, यह संभव नहीं है। प्राकृतिक नियमों के विरु(वह कुछ भी नहीं कर सकता है। कुछ घटता भी है तो उसके होने से संभव अपने आप हो जाता है। उसके पास जो ‘औरा है, वह सकारात्मक है। वह वह प्रकृति के हाथ का एक पुर्जा मात्र रह जाता है।‘दाइ विल बी डन’ उसकी कोई इच्छा नहीं रहती है, यह उसकी पहली मृत्यु कह सकते हो। क्योंकि मन वहाँ नहीं रहा है। जन्म और मृत्यु का कारण मन ही है। बंधन औरऔर मोक्ष भी मन का ही है। पर जब मन अंतर्मन में रिलीव होता है। तब कार्य भी होंगे। पर मन शांत है। एक दर्पण की तरह , लोग आए और गए। वह भीतर अविचलित रहता हैं



Monday, June 14, 2010

जीवन का उद्देश्य

जीवन का उद्देश्य

                बार  बार यह सवाल उठा करता है कि आखिर इस दुनियां का कारण क्या है ? यह दुनियां आई कहां से, और इस दुनियां में हमारी उत्पत्ति का कारण क्या है ?
     कोई कारण नहीं है, उस महान शक्ति की इच्छा हुई कि मैं अकेला हूं अनेक हो जांऊ, एक से अनेक होने की कामना ही यह फैलाव है और यह जब तक रहेगी तब तक फैलाव रहेगा, पर कामना होगी एक होना है।
    मुक्ति कभी किसी एक की नहीं होगी, स्वप्न जब शुरू होता है, जब खत्म होता है, देखा है- एक एक साथ कहां से आते हैं, कहां चले जाते हैं, यही उत्तर है, पर्दा एक ही साथ गिरेगा। कारण रहित कारण है।
    इतिहास भरा पड़ा है, हजारों साल हो गये, कितने बड़े साम्राज्य स्थापित हुए, सम्राट आये वंश चले, सब कहां चले गये, क्या परिवर्तन हुआ। कितने उपदेशक आये। कितने महान सन्त।बता सकते हो, कोई बड़ा परिवर्तन हुआ। आदमी जैसा हजार साल पहले था, उसमें आज कोई परिवर्तन आया है ? संसार की स्थिति वही है।
    जो आदि काल में था, वह आज चला आ रहा है। बनता बिगड़ता फिर बनना, फिर बिगड़ना, यही खेल है यही प्रकृति का स्वभाव है। हजारों साल का इतिहास इसी बात का गवाह है। उसका कोई कारण नहीं है। तथा किसी अभिप्रायः को तलाश करना व्यर्थ ही है।
    बहुत छोटी हमारी बु(ि है, तभी तो शास्त्र में नेति नेति कहा है
प्रयत्न
हमारा इस संसार में आने का क्या उद्देश्य है, और जो हम प्रयत्न करते हैं, उसकी क्या सीमा है ?
मनुष्य को प्रकृति ने कर्म करने का अधिकार दिया है, ताकि उसकी लगन बनी रहे। शरीर क्षणिक है- किसी भी समय बुलावा आ सकता है। किसी भी क्षण शरीर छूट सकता है। यहां कितना भी विकास किया जाए, कितना ही प्रयास करो- प्रकृति में क्या फर्क पड़ता है ?
    सभी नष्ट हो जाता है।
    मनुष्य को करने की स्वतन्त्रता है। करते जाओ, करते जाओ। अनुभव भी यही दृढ़ होता रहता है। यह सब मेरे करने से मुझे प्राप्त हुआ है। अनुभव सधन होता चला जाता हें सृष्टि में तो कोई फर्क नहीं पड़ता हैं
    एक दिन सब साफ हो जाता है।
    एक प्रयोगशाला आज बनायी, कल दूसरी, कल एक नया कारखाना, फिर दूसरा, बनते बिगड़ते सब रहते है। कभी एक धक्का लगता है- पूरा शहर साफ हो जाता है।
    यही सृष्टि का नियम हैं।
    इसके लिये बहुत अधिक उलझना, आपाधापी करना, अपनी महत्वकांक्षाओं के लिए तरह तरह की योजनाएं बनाना उचित नहीं है। मनुष्य को इतना ही करना चाहिए कि जब तक हम है हम अपना जीवन सुख और शांति से बितायें। उस शक्ति के साथ जुड़कर यह अनुभव करना है कि सृष्टि के अपने नियम हैं, वह अपने नियमों से चलती है- यही नाटक है। आज जो हमारी व्यक्तिगत इच्छा है, उस स्थिति में पहुंचने के बाद समष्टिगत हो जाती है। वह स्वयं सागर हो जाता है। बूंद जब सागर से मिल जाती है, तब उसे एहसास खुद हो जाता है कि वह सागर से अलग हैं ?
    आज आदमी आदमी के बीच तनाव हे।
    झागड़ा है, आपाधापी है। हर घर, हर परिवार में कष्ट है, दुख है हिंसा हैं।
    कारण है, हर व्यक्ति अपने आपको अलग मानता है। जब मैं अपने आपको अलग मानता हूं, तब तक ही मैं शत्रु हूं।
    तब तक वह जान जाता है कि वह भी नाटक का ही पात्र है, और उसे भी बस नाटक में भाग लेने के लिए उसी ने तैयार किया है। तब तक इस भावना में, उस भावना में कितना अन्तर है। जितनी हमारी बु(ि है, जितनी हमारी क्षमता है, उतनी ही गृहणशीलता होती है। कत्र्तव्य भावना की जागृति उतनी ही रहती हैं।
    हमें यह जानना होगा कि हमें यह जो मिला है, उसके पीछे अभिप्राय है। अभिप्राय- संस्कार है, वासनाएं है। संस्कार की पहचान अपेक्षित है, वांछनीय हैं वहीं वासनाओं का संग्रह है, भंडार है।
    इसीलिए जब तक शरीर है, तब तक कर्म भी आवश्यक है। अतः जो होना है, वह यह प्रयत्न होना है कि वासनाओं का भंडार, संग्रह कम जाए- खाली हो जाए।
    जैसे जैसे वासनाएं कम होती जाती हैं, हम उस शक्ति के साथ जुड़ते जाते है। फिर वही कार्य, जो प्रकृति चाहती है- इस शरीर के द्वारा होता रहता है।
    यही सहज कर्म होता है।
    बाहृा परिवेश यहां प्रभावित नहीं करता है। फिर यही किसी को राजी नाराजगी का सवाल नहीं है। दूसरों की इच्छा से हम नहीं चलते है। जरूरी कार्य अपने आप हो जाता है। सच तो यह है कि हम सब अपने साथ अपनी अपनी दुकान लाए हैं, प्रयत्न यही है कि दुकान खाली हो जाए।
    अब तो जितना किराया जमा है, वह जब तक का जमा है, तब तक दुकान रखनी पड़ेगी- तब तक रहना होगा। रामकृष्ण परमहंस इसे काली का आदेश मानते थे। जब तक काली की इच्छा है, उसे कार्य करवाना है- वे रहेंगे। जब तक उस महान शक्ति की इच्छा है, उसे जो कार्य करवाना है- शरीर तब तक रहेगा।
जिस क्षण आवश्यकता नहीं होगी, वह नहीं होगा।
यहाँ भी एक नाटक ही चल रहा है,परन्तृ इस नाटक में चयन की स्वतन्त्रता है ं
यानी जो नाटक स्टेज पर होता है, और जो यहां होता है, उसमें थोड़ा अन्तर है। स्टेज पर स्वतन्त्रता नहीं है। वहां वही करना है, जो दे दिया गया है। यहाँ स्वतन्त्रता है।
मनुष्य को इस स्टेज पर अपनी इच्छानुसार करने का अधिकार है। उसके पास पुरुषार्थ है।उसे करने का अधिकार है।परन्तु  वह कितना भी करेगा, उसे प्रकृति के लिए क्षणभर में मिटाने में देर नहीं लगेगी। प्रकृति ने इतनी सी छूट दे रखी है। यह घोड़ा है, यह मैदान है, तुम इसे अपनी मर्जी के अनुसार चलाओ। पर यह समझता है, घोड़ा मेरा है, मैदान मेरा है, मैं मर्जी का मालिक हूं। जो कुछ हो रहा है, मेरी ही सामथ्र्य है, मैं शक्तिमान हूं।
    वह यह नहीं जानता है कि जो सफलता मिली है, वह प्रकृति की इच्छा से ही है, उसकी ही इच्छा से स्वतन्त्रता है। प्रकृति जब देखती है कि वह हद से बाहर हो गया है, वह समाप्त कर देती है।
    यहां प्रश्न इस बात का नही है कि जो भूमिका मिली है, वह छोटी है या बड़ी,  परन्तु हम हमेशा महत्वपूर्ण भूमिका का ही चयन चाहते है।यही दुख का कारण है।
    रामकृष्ण परमहंस बड़े संत थे। उन्होंने बहुत त्याग किया। यहां तक कि अपनी पत्नी को भी त्याग दिया। सारा जीवन सत्य की खोज में लगा दिया। वे काली की शक्ति चाहते थे। शक्ति तो मिली, पर यह भी पता लगा कि इस स्टेज पर तुमको फल तो मिलेगा, पर उपयोग नही कर पाओगे, तो उपयोग के लिए दूसरों को ढूंढना पड़ा। शक्ति का सदुपयोग विवेकानन्दजी द्वारा हुआ।
    प्रकृति शक्तिशाली है। उसने मनुष्य की आयु भी तय कर रखी है। शरीर पंच महाभूतों से बना है। शरीर में इन महाभूतों का जरा भी संतुलन बिगड़ा- विकृति आ जाती है। आप बाहर से कितनी ही दवाएं खाएं, कितने ही बड़े चिकित्सक रख लें- विकृति का इलाज नहीं है।
    मनुष्य की सारी सत्ता, महत्वकांक्षा, प्रयत्न सब प्रकृति की दी गई छूट के भीतर ही रहता है।
    और इसी परिधि में वह कहता है- यह मैं कह रहा हूं, यह मैने किया है, यह मेरा है, मैं ही सब कुछ हूं।यही भूल है।
    करना यही है- प्रकृति के नाटक को ध्यान में रखते हुए, परिस्थिति को बदस्तूर चालू रखते हुए, यह ध्यान रखना कि यह जो कुछ हो रहा है- असार है। व्यवहार निभाते हुए यह ध्यान रखना है कि मैं बस, निभा रहा हूं, और मेरा कोई भरोसा नहीं है।
यह भय की स्थिति नहीं हैं ?
भय वही है, तभी तक है, जब तक यह विश्वास है कि हम अपने आप को बचा सकते हैं,  तभी तक भय है।यह विश्वास रखना चाहिए कि अनिष्ट तो होगा ही ं- और जब होना है, तब होकर ही रहेगा। तो उससे निर्भयता आ जाती है। मन को निश्चलता मिल जाती  है कि जो कुछ भी होने वाला है, वह तो होगा ही- हमें इस बीच अपने कार्य को करते रहना है।
    हां, सीमित ही स्वतन्त्रता है। नाटक में कितने ही बड़े बन जाओ, अभिनेता बन जाओ, नेता बन जाओ, सेठ बन जाओ, संत बन जाओ- पर अन्त में सब छूट जाता है, सबका नाश हो जाता है। यह ज्ञान होने के बाद फिर ज्यादा प्रपंच में मनुष्य नहीं पड़ता।परन्तु जानकारी सभी को है। पर वह मानता है,ऐसा कुछ किसी दूसरे के साथ ही होगा।
    इतने महान साम्राज्य स्थापित हुए। बड़े बड़े सम्राट हो गए। कहां गए सब खण्डहर ही खण्डहर रह गए है, उनके नाम तक नहीं रहे। ब्रिटिश साम्राज्य का पतन हमारे ही सामने हुआ है। अब वह भी अलग अलग होने को जा रहा है। जब बढ़ने का वक्त आया, कितना बढ़ गया।
    इसीलिए कहा जाता है कि यह अहसास हो जाना चाहिए कि हमारी सीमित स्वतन्त्रता है। हम कुछ नहीं कर सकते, वास्तविकता यही है।परन्तु हमें निरन्तर कर्मरत रहना है। इसीलिए कर्म अवश्य करो। प्रयास अवश्य करो- जो होना है, होता रहेगा, प्रयास मत छोड़ो।
    बात बिल्कुल स्पष्ट है।
    परन्तु  हम स्पष्ट नहीं है, मतलब की बात पकड़ लेते है। बाकी छोड़ देते है। इस प्रकार काट छांटकर अपना रास्ता बना लेते है। वही गलत है। जो असार है, जिसे हम सही नहीं मानते, उस प्रपंच में पड़ना भी उचित नही हैं।
   
    करना जो है, अनादि काल से चला आ रहा है, चलता रहेगा। तुम्हें स्थिर बु(ि होकर के, अपनी बु(ि स्थिर करके जो पार्ट तुम्हें मिला है, अदा करना है। अदा तो करो, पर उसका स्मरण मत करो।
    जहां तुमने याद किया, वह तुम्हें सतायेगा।
    स्मृति ही पाप है।
    इसीलिये कहता हूं, वर्तमान मंे रहो।
    क्षणभर भी पीछे मत जाओ, न क्षण में आगे का सोचो।
    पाप और पुण्य की ये जो शास्त्रीय मान्यताएं है?ये जितनी भी कल्पनाएं हैं, तभी तक हैं,जब तक हम स्वयं अनतर्मुखी नहीं बनते है। जब स्वयं अन्तर्मुखी बनने लग जावेंगे तो हमें स्वयं से प्रेरणा मिलने लगेगी, यह काम हमें करना है। यह काम हमें नहीं करना है।
    उसमें यदि अच्छा बुरा हो जाता है तो वह जिम्मेदारी हमारी नहीं वह जो हमें पार्ट दिया है, वह हमें पूरा करना है।एक थानेदार यदि किसी अपराधी को पीटते समय यह समझे कि मै पाप कर रहा हूं तो वह काम करेगा नहीं। उसकी डयूटी पूरी होगी नहीं।
    वैसे पेड़ पौधों में हरेक में जीव है।काश्तकार कहेगा, मैं फसल काटूंगा तो पाप हो जावेगा तो इस तरह से यदि हम सोचेंगे तो अपना जीवन ही नहीं चलेगा।
    यह तो सब कार्य करते रहना चाहिए ,इसीलिए बार बार अर्जुन से कृकृष्ण ने यही कहा कि यु( करो। यु( माने हिंसा।
    याने एक आदमी किसी को मार दे तो हिंसा है। यु( में एक आदमी हजारों को मार देता है।तो वह कहां पाप माना जाता है।उसको तो बहादुर मानते है।
    तो यह कल्पना है हमारी, इसने हमें धीरे धीरे इतना संकुचित बना रखा है कि हम इससे बाहर देखना ही पसन्द नहीं करते।
    यह बुरा है, यह बुरा है, वह काम मत करो, इसका पानी मत पियो, इसका खाना मत खाओ, इससे दूर रहो, इतना हमें संकुचित बना रखा है कि जरा भी इधर उधर नहीं हो सकते है। इन सबसे अगर छुटकारा पाना है तो अन्तर्मुखी होना प्रारम्भ करो।
    जैसे जैसे अन्तर्मुखी होते जाओगे, वही मन, अन्तर्मुखी मन, जो और कुछ नहीं आत्मा की शक्ति है, इसके साथ हमें जुड़ने से पता चलेगा- स्थिति क्या है, हमें क्या करना है। यही गीता का उपदेश है।
जीवन का निश्चित उद्देश्य है। हमें अपना जीवन व्यवहार कुशलता के साथ, नैतिकता के साथ जीना है। यह उचित नही है कि छीना झपटी करें। दूसरों को सताएं। नैतिकता बनी रहे। दूसरों का अधिकार नहीं छीनें। अपना प्रयास करते रहें। अगर हम सही है, हमारा प्रयत्न सही है, तो व्यवहार कुशलता और नैतिकता अपने आप आ जाती है।
    जहां तक पहुंचना है, पहुंच जाते है।
    आवश्यकताएं - शारीरिक, मानसिक, बौ(िक अपने आप पूरी हो जाती है। यही जीवन का उद्देश्य है।
जब तक हम जीवित हैं - सुख से रहें, शांति से रहें।
इस संसार में हमारे जीवन का उद्देश्ययही  है ।

संस्कृति ः अवधारणा

संस्कृति ः अवधारणा
संस्कृति क्या है? यह प्रश्न आज सर्वाधिक विवादास्पद है। परन्तु अप संस्कृति क्या है, इसे परिभाषित किया जाना सरल हो गया है। बाजारवाद से मोहासक्त होते जा रहे व्यक्ति के भीतर आत्मघाती आत्म केन्द्रिकता, अजनबीपन, अमानवीयता का घुन व्यक्ति-जीवन को इतना खाली करता जा रहा है कि उसके पास उसका हृदय भी है,... वह इससे अनभिज्ञ हो गया है। विचार ही विकार है,... विकार मस्तिष्क की उपज है,... वहाँ की संपत्ति बुद्धि है। बुद्धि का विस्तार व्यापक तथा घना होता जा रहा है, जितना व्यक्ति बुद्धिमान होता है, उतना ही वह संवेदनहीन भी होता जाता है,... यह एक स्वाभाविक विकास है। ... वहां उसके पास और कुछ करने को बहुत समय रहता है,... पर अपने भीतर ‘रागात्मकता’ का विकास करने का अवकाश ही नहीं है।
अपसंस्कृति, प्रकृति के विरूद्ध खड़ी होती है, प्रकृति और बुद्धिमता का विरोध है। मनुष्य जितना बुद्धिमान होता जा रहा है, उतना ही वह प्रकृति का विध्वंस कर रहा है। यही अप- संस्कृति है। यह प्रकृति के प्रतिकूल खड़ी होती है, इसकी उपसंपदा है,विकृति, विनाश,यह बुद्धिजन्य ज्ञान की विकृतियों पर खड़ी होती है,जो सभ्यता का छिछला छोर होता है। यह व्यक्ति को तुच्छ, संकीर्ण, लोभ और दिशाहीन बनाती है। जब हम कहते हैं, वह व्यक्ति सुसंस्कृत है, तब आशय होता है व्यक्ति के पास आदर्श है, जीवन मूल्य है। वह समाज को उर्जावान तथा आस्थावान बनाने में समर्थ है, वैसे विचार रखता है।यह संभव है, व्यक्ति सभ्य हो, लेखक भी हो , पर सुसंस्कृत हो यह आवश्यक नहीं है।
यहां यह अवधारणा, संस्कृति को मूल्यपक्षता से सन्निहित करती है। जहां यह है वहीं संस्कृति है। संस्कृति मनुष्य जाति का वह ‘सामान्य; है जो उसके अनुभव जगत की सत्ता पर आधारित है। संस्कृति के लिए व्यक्ति और समाज का अधिक बुद्धिमान तथा सभ्यता का दास होना अनिवार्य नहीं है, सभ्यता बुद्धिजन्य ज्ञान पर आधारित है।
दरअसल हमारे यहां शब्दों की छेड़छाड़ बहुत है, अपने लाभ के लिए हम शब्दों के अर्थ बदलते रहते हैं। अंग्रेजी भाषा और ईसायत का गहरा संबंध है। हमारे यहां ‘धर्म’ शब्द है, वहां रिलीजन है, जिसका अर्थ मजहब होता है। हमारे यहाँ संस्कृति शब्द है, उनके यहां ‘कल्चर’ शब्द है।
इस प्रकार ‘कल्चर’ शब्द संस्कृति का समानार्थी शब्द नहीं है। संस्कृति शब्द में ही उसका निहितार्थ निहित है। संस्कृति व्यक्ति और समाज को मूल्यवत्ता प्रदान करती है। उसे समाज में उपादेयता सौंपती है, व्यक्ति और समाज के भीतर अन्तर्सम्बन्धों में सामंजस्य लाती है।
हमारे यहाँ हमने सभ्यता को संस्कृति का पर्याय मानकर ही गांव के मुकाबले शहर को, दलित के मुकाबले  सवर्ण को, स्त्री के मुकाबले पुरुष को सुसंस्कृत करार दिया है। सभ्यता को ही मूल्यवान मानने के कारण हम आदिवासियों का ही शहरीकरण करना चाहते हैं। उन्हें संस्कृति की मुख्य धारा में लाना चाहते हैं। प्रायः ग्रामीण अंचलों के लिए, लोकभाषा तथा लोक संस्कृति शब्द बनाया गया है। ‘लोक’ क्या है? क्या ग्रामीणजन, आदिवासी ही लोक हैं। अगर ग्रामीण जन में लोक निवास करता है, तो शहरीजन के पास तो मात्र सभ्यता है, वहां तो संस्कृति की धारा कभी की सूख चुकी है?
जहाँ लोक हैं, वही संस्कृति है, जहां लोक है, वहां हृदय है, वहां संवेदना है। वहां मानव है, संभव है, वहां सभ्यता भी हो, पर सभ्यता की दासता  नहीं है। सभ्यता दैनिक जीवन जीने की एक कला है, सामग्री देने वाली व्यवस्था है, बस,... परन्तु जहां संस्कृति है, वह मानव जाति की अनुभवात्मक यात्रा का सामान्य सुरक्षित है। जिसमें बौद्धिक- शारीरिक श्रम, जीवन मूल्य, संस्कार, उसकी आध्यात्मिक चेतना के प्रयास उसकी अनुभव कला सभी सुरक्षित है। दर्शन की परिभाषा में महर्षि कणाद के वैशोषिक दर्शन के आधार पर वह उसका ‘सामान्य’ है। संस्कृति-अतीत की परंपरा में सुरक्षित रखती है, वर्तमान में जीना सिखाती है, तथा भविष्य के लिए आदर्श सौंपती है,... जीने की कला संभलाती है। जिस प्रकार वैशेषिक दर्शन में विशेष की अवधारणा है, उसी प्रकार, संस्कृति, सामान्य होते हुए भी अपने प्रकार में वर्गों के भीतर, समुदाय के भीतर जाकर, क्षेत्रीय रंगों में भी अभिव्यक्त होती है। यह उसका आंचलिक पसारा है।
सभ्यता को ही ‘संस्कृति’ मानते रहने के कारण हमारे यहां शासक वर्ग का व्यवहार तथा आचरण ही कृत्रिम-‘सांस्कृतिक होता चला गया है। ... मध्यकाल में संत मत के प्रचार-प्रसाद के साथ असभ्य व्यक्ति, अशक्त व्यक्ति की विराटता का दिग्दर्शन पहली बार हुआ था। यहां शासकों की संस्कृति से हटकर सामान्य जन की संस्कृति, उसका विश्वास मूल्यवान बना था। असामथ्र्य को, वंचित को आप असभ्य कह सकते हैं, परन्तु संस्कृति विहीन नहीं। मूल्य रहित नहीं, वह भी अपनी झोंपड़ी में, अपने परिवार के साथ वहीं संतोष पाता है, जो राजमहल में भी संभव  नहीं हो?
यहां हम सभ्यता, सभ्य और असभ्य शब्दों को संस्कृति की परिधी से बाहर जाकर विवेचित करना चाहते हैं। संस्कृति, मनुष्यता का वह सामान्य है, वह बोधक तत्व है, जो उसे इतिहास की परंपरा में इतिहास बोध सौंपता है। यह उसकी अपनी आंतरिक पूँजी है,यह उसकी श्रम के प्रति निष्ठा है, जिसके लिए उसे बाजार से जाकर कुछ खरीदना नहीं है, यह उसकी आंतरिक संवेदना है, जो सूक्ष्म है, व्यापक है, सघन है, जो उसके भीतर एक तरलता लाती है, जो उसकी हृदय की उपसंपदा है... साहित्य-कला का जन्म व उसकी सिद्धि सहृदय या कवि की हृदय की मुक्तावस्था में ही है,तो श्रमिक के श्रम की उपलब्धि उसके नवीन अध्यवसाय में है।
जिस प्रकार से संप्रदाय, धर्म नहीं है,... कर्मकांड आध्यात्म नहीं है, संस्कृति की धरती पर ही धर्म का वृक्ष खड़ा होता है। धर्म की परिभाषा है, जिसका वरण होता है, जो वरण करता है, धर्म वह धारणा, जो व्यक्ति इतिहास बोध से जन्म के साथ धारण कर लेता है। परंपरागत उसके विश्वास, उसके संस्कार जो उसे बेहतर इन्सान बनाने की ओर ले जाते हैं,।संप्रदाय सौंपा जाता है, यह बाह्य बुनावट है, जो उसे उसकी पहचान कराती है। एक धर्म में अनेक संप्रदाय हो सकते हैं, होते हैं, पर संस्कृति में उसके रंग-रूप, स्थानीय, क्षेत्रीय  आधार सभी की अभिव्यक्ति अनेक प्रकार से  हो सकती है, होती है, पर अप-संस्कृति उसका कोई हिस्सा नहीं है, यह सभ्यता और असभ्यता के बीच की कड़ी है। असभ्यता, का संस्कृति से कोई लेना देना नहीं है। संस्कृति, मानवीय है, वह आदर्श और व्यवहार का अपने आचरण के द्वारा संयोजन करना सिखाती है।
आज सांस्कृतिक पश्चिमीकरण के हथियार के रूप में  बाजारवाद का सबसे बड़ा हमला ‘संस्कृति’ की जड़ों पर हो रहा है। सांप्रदायिकता भी ‘संस्कृति’ की जड़ों में दीमक डालने का प्रयास करती है। यह संप्रदाय विशेष की संस्कृति के नाम पर प्रचारित करती है। उधर शासक वर्ग भी अपने अनुसार संस्कृति को परोसने का प्रयास करते हैं। इसकी पहली पहचान भाषा के स्तर पर होती है, हिन्दी भाषा के स्थान पर, मातृ भाषा के स्थान पर, अंग्रेजी का बढ़ता वर्चस्व, सभ्यता की देन हैं, यहां बुद्धिगत बढ़ता व्यवसाय है। इसका संस्कृति से कोई लेना-देना नहीं है। यह विशुद्ध बाजारवाद है। टी.वी. पर बढ़ते सीरियल, सामाजिक विघटन को मूल्यांकित करने का प्रयास यह भी सभ्यता का ही एक परिचय है।
एक सुसंस्कृत व्यक्ति या समाज, असभ्य भी हो सकता है, सभ्यता, शिक्षा व प्रोद्योगिकी के इस्तेमाल होने से जुड़ी हुई है। संस्कृति का इससे कोई लेना-देना नहीं है। यह मनुष्य की मनुष्य होने की पहचान है, यह उसकी अपने परिवेश, अपनी प्रकृति के साथ संतुलित सामंजस्य रखने की भावना है।

Tuesday, May 25, 2010

वर्तमान में :

वर्तमान में :
 वर्तमान में रहो, उत्तर स्चयं तुम्हारे पास आ जायेगा। पर व्यवहार में कैसे रहा जाए। और जीवन की सार्थकता को किस प्रकार पाया जाए, यह हमें समझना होगा
जो भी व्यक्ति तुम्हारे पास आता है, उसके प्रति किसी प्रकार की दुर्भावना मत रखो, कोई प्रतिब(ता नही। कोई पूर्वाग्रह नहीं। यही त्याग है। जो भी  दुराग्रह है, बनी बनायी धारणा है, उसको छोड़ देना ही त्याग है। वह बुराई उसमें नहीं है। तुम अपने भीतर की बुराई को उस पर प्रक्षेपित कर रहे हो। तुम अपने भीतर का गंदलापन उसके अन्तर्जगत पर फैक रहे हो। शांत हो जाओ। निश्छल मन से स्वागत करो। यही त्याग है।
    छोड़ना और छूटना यहां नहीं है। यही छूटना है। बाह्य में जो कुछ भी परिवर्तन होगा, वह अर्थहीन है। जब बल समाप्त होगा, फिरकनी फिर रुक जाएगी। उससे भीतर बदलाव नहीं आता। वह भीतर से नहीं जुड़ता। कुछ किया जाना हो, कुछ होना भी हो, तो वह भीतर से ही होगा।
    अतः जब भी कोई व्यक्ति सामने आए....परिस्थिति सामने आए उसके बारे में कभी पूर्व धारणा मत रखो। पूर्व में धारणा का आधार स्मृति है और स्मृति ही पाप है। बार बार विषयों के चिन्तन से वासना, स्मृति-रुप धारण कर लेती है। और फिर स्मृति जब भी किसी की उपस्थिति होती है, अवधारणा प्रस्तुत करती हे। हमारा सारा व्यवहार उसी धारणा के आधार पर होता है। यही जीवन की जटिलता है।
    हम अपने भीतर इतना कचरा समेटे हुए हैं कि वह चाहते हुए भी नहीं छूटता। हम वर्तमान में रहना ही नहीं जानते। चाहते भी नही हैं। हमारा सारा कार्य, व्यवहार स्मृति से परिचालित है। यही तनाव का कारण है। यही विक्षोभ का कारण है। व्यक्ति को हम, व्यक्ति रूप में नहीं, स्त्री हरिजन, मुसलमान महाजन, अफसर नाना रूपों में देखते हैं। हर रंग, रुप,व्यवसाय जाति के प्रति हमारे पास अपनी धारणाएं है। हम उन्हीं सांचो में उसे देखते हैं, रखते हैं, और खुद  समस्या खड़ी करते हैं।तुम्हारा काम अन्तर्मुखी होकर मन की निश्चलता को प्राप्त करना है, अन्तर्मन को जीवन का कार्य व्यवहार सौंप देना है। वर्तमान में जीना सीखो। स्वभाव स्मृति में हैं, आदत स्मृति में है, वर्तमान में रहने का अभ्यास होते ही स्वतः छूट जाएगी, पेड़ के पत्ते कब गिरते हैं, उसे अहसास भी नहीं होता, जिसे छूटना है, वह छूट जाएगा, कुछ पता भी नहीं चलेगा।
    क्रिया साक्षी-भाव है। जो व्यक्ति उपस्थित हुआ है। परमात्मा ने ही उसे तुम्हारे पास भेजा है। कल वह क्या था, कोई मतलब नही। कल उसने क्या किया था याद रखना व्यर्थ है। आज अभी जब वह आया है, साक्षी भाव से साक्षात्कार करो, तुम खुद पाओगे, वह तुम्हें बदला हुआ मिलेगा। वही तुम्हें वर्तमान में रहना सिखला पाएगा।
    यही त्याग है।
छोड़ना क्या है, यह लोग समझ नहीं पाते हैं। जब मैं कहता हूं, अन्तर्मुखी हो जाओ, वर्तमान में रहने का अभ्यास करों। जो छूटना है, स्वतः छूट जायेगा। बाहर छोड़ने पकड़ने के चक्कर में मत पड़ो।
    बाहर जो भी किया जा रहा है, हो रहा है- उसका भीतर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। कितने ही रंग के कपड़े पहन लो, घर छोड़कर जंगल में चले जाओ- माया तो भीतर है, वह कहां पीछा छोड़ेगी ? वह साथ ही तो चल रही है।श में रहे।
    प्रकृति की लहरें अनवरत उठ रही है। ये नाभि में उठती है। नाभि में विकारों के बीज है। वे बीज सूक्ष्म है। वहां मात्र स्पंदन है। वो धीरे धीरे उफनते जाते हैं, जैसे लहरें सभी के अन्दर उठ रही है, किसी को जल्दी उत्तेजित करती हैं, किसी को कम। यह व्यक्ति की बनावट, बुनावट पर निर्भर रहता है।
    जैसे कुछ लोग सो रहे है, कोई आकर आवाज देता है तो कोई एक आवाज पर, कोई दो आवाज पर, कोई चार आवाज पर उठ जाता है, और कोई होता है, उस पर असर ही नही होता- वह सोता रह जाता है। आवाज देने वाला एक ही होता है। संस्कार सूक्ष्म बीज रूप में है, लहरें टकरायी, टकराते टकराते कोई उफन जाता है, किसी पर कोई असर नही होता। यह उसी प्रकार से है कहीं बच्चों ! आवाज लगते ही उठ जाता है, कोई सोया रहता है। वासना जागृत ही नहीं होती।
    लहरें अनवरत उठ रही है धीरे धीरे यह अनुभव हो जाता है कि पकृति का कार्य यही है। हमें तो सहन करना है। सहन करने के लिए अपने स्थान पर स्थिर होकर रहना है।
    चेतन्य केन्द्र आत्मा है या यूं कहिए, वहां अवेयरनेस है वह है, उसका अनुभव हो जाता है उसके सबसे समीप अर्न्तमन ही है, मनोविज्ञान की भाषा में इसे अनकांशस कहा जा सकता है। यहा जानने का माध्यम कोई है नहीं, इन्द्रियों की पहुंच यहां तक नही है।यहा तक स्थूल शरीर की पहुंच नही रहती है। यह उसके परे की बात है, जानने का माध्यम नही है। अभ्यास यही करना है। नाभि से उठ रहे स्पंदनों को, जो चित्त पर आकर टकराते हैं तथा वहां स्थूलता ग्रहण करते हैं, वहीं वासनाएं जन्म लेती है। उस उफान को उस संवेग को, उस लहर को, उस तरंग को उस भाव दशा को गहरी जागरूकता के साथ, सतर्कता के साथ साक्षी भाव से अवलोकित करना है।
    इसी अन्तर्मन से स्पंदन आगे बढ़ते है, वे स्थूल शरीर से अभिव्यक्त होते है। नाभि से उठने वाले स्पंदन चित्त पर आकर टकरा कर स्थूलता ग्रहण करते है। यहां आकर भाव दशा शरीर के माध्यम से प्रकट होने लगती है। यहां आकर वासनाएं आकर ग्रहण करती है, स्पंदन तरंगों का रूप ग्रहण कर लेते हैं, वासनाएं विषयों के लिए लालायित रहती है, उन्हें पोषण मिल जाता है, अगर वर्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ जाता है तो वे ऊपर की ओर उठती जाती है, पर उन्हें फैलने के लिए जगह नहीं मिलती। व्यवहार अनुकरण से नहीं सीखी जाती। यदि हमारा क्रोधी स्वभाव है और उसकी हमें प्रतीती भी है, तो वर्तमान में रहने का अभ्यास होेने के बाद लहर जो उठी है, वह अनुभव होगी और लहर जिस प्रकार पत्थर पर टकरा कर वापिस लौट जाती है, वैसे ही मालूम होगा। टकराई व लौट गई, अन्तर्मुखी होेने के बाद वृत्तियां उठते हुए भी पनपती नही है। और धीरे धीरे बिल्कुल ही नहीं होती।
  
  
    इसीलिए वह बात गहराई से समझने की है कि हमें इस प्रक्रिया के प्रति जागृत होना है। जागरूकता की सबसे बड़ी यही जरूरत है। हम हजारों साल से शरीर के प्रति अत्यधिक सजग है। सारे शास्त्र यहीं आकर रूक गये हैं, जो आगे बढ़े वे भी काल भय से हमें छोड़ नहीं पाये। बु( जब बोले, तब तो शरीर से इतना लड़ चुके थे कि उनकी बात को भी स्वीकारते हुए जो उन्होंने करके छोड़ दिया था, वह भी उनके अनुयायी मानते गये। लोग कहते हैं कि मन, जो क्रिया तन्त्र है, वाक है, शरीर के इस पर नियंत्रण कर ले, और चित्त से उठने वाली तरंगों के प्रति असहयोग रखें तो साधना की ओर तेजी से बढ़ेंगे। यह सबसे बड़ा खतरा है।
    उपशमन, नियमन, नियंत्रण फिर उल्टी तरफ चलना है। शरीर के नियंत्रण व नियमन की जितनी चिन्ता होती है, शरीर उतना अधिक खतरनाक हो जाता है। वहीं जब क्रिया का स्वरूप स्पष्ट है तो मात्र साध्य अन्तर्मन से उठने वाली तरंगो के प्रति सहनशीलता को प्राप्त करना है। शरीर के नियंत्रण पर हजारों साल से जो बल दे रहे हैं, वह यह जानकर भी छोड़ने का साहस नहीं कर पा रहे है। मन से असहयोग लेना है मन का निष्क्रमण भूत और भविष्य में है। वर्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ते ही मन स्वतः अनुपस्थित हो जाता है। जससे वह स्वतः अनुपस्थित होने लग जाता है। यही पहली मंजिल है, न यहां  किसी प्रकार का दमन नहीं है। अभ्यास का  लक्ष्य है, मात्र साक्षी रहना। यही हमें जानना है, आगे गहरे समझना है। तभी साधना का रहस्य समझ में आता है। यही सार है। तभी लक्ष्य की प्राप्ति संभव है।  
रास्ता यही है

    स्मृति अनवरत चिन्तन से बनती है कोई व्यक्ति आया, बातचीत हुई। भूल गए उसको तो कोई बात नहीं। परन्तु यदि उसकी बार बार याद आती रहे, वह धीरे धीरे गहरी हो जाती है। वह संस्कार बन जाती है।
कांच के ऊपर तो जो वस्तु आई उसका प्रभाव नहीं रहता, परन्तु मन तो कांच नहीं है, वहां चित्र बनता है अंकित हो जाता है ?वह भी कब। उसका बार बार स्मरण रहे। किसी ने कोई बात कहंी और ध्यान नहीं दिया तो बात बाहर ही रह गई। वह जब याद दिलावे तो भी हल्की ही याद आती है। और कोई बात कही, ध्यान नहीं दिया तो वह भीतर चली गई।गिलास में पानी है, रंग डाल दो। कुछ हवा में उड़ जायेगा, कुछ सतह पर फैल जायेगा, कुछ नीचे जाकर बैठ जायेगा। इसी प्रकार हमारे ऊपर घटनाओं का प्रभाव पड़ता है, वह मन रूपी कांच पर इसी प्रकार असर डालती है।
    कोई तो आई और ऊपर से निकल गई। और कोई वहीं फैल गई। कोई नीचे जाकर फैल गर्इ्र। वही संस्कार बन जाती है। जो ऊपर उड़ गई, उसका पता ही नहीं। जो ऊपर सतह पर फैल गई, वह कुछ दिन ठहरी और चली गई। जो नीचे जाकर बैठ गई, वह संस्कार बन गई। वहीं से वासनाएं उत्पन्न होती है।
इसालिए
  
प्रारम्भिक अवस्था में वर्तमान में रहने के लिए मन पर उठने वाली वृत्यिों का अवलोकन आवश्यक है,
यह तो शुरू में कुछ दिन लगातार अवलोकन करने की जरूरत है। इससे आदत पड़ जाती है, विचार न उठने की। अवलोकन तो विचार उठने की स्थिति है। इससे क्या होता है, विचार धीरे धीरे उठना कम हो जाता है। उसके बाद की स्थिति जो है, वह हमेशा रहने की है। हमेशा अवलोकन नहीं होता। दिन में काम करते समय अवलोकन करते रहोगे तो काम करने में बाधा पड़ेगी।
    शुरू की अवस्था और बाद की अवस्था में अन्तर है। बच्चों की पढ़ाई शुरू करते समय पहले स्लेट पेन्सिल लेकर बैठाया जाता है।
    यही प्रारम्भिक स्थिति है।
    बाद में वह किताब देखते ही पढ़ने लग जाता है। यह बाद की स्थिति है। इस स्थिति में पहुंचने के लिए अवलोकन शुरू की स्थिति है।
    अवलोकन रहते रहते बाद में यह स्थिति आ जाती है कि विचार उठना बन्द हो जाता है।
    इस स्थिति में रहना है। यह स्थिति हमेशा रहेगी। अवलोकन हमेशा नहीं रहेगा।
    वैसे क्रिया के लिए श्रेष्ठ समय रात का है।
    साईकिल चलाते समय जब सीखा जाता है, तब ध्यान हैण्डिल पर रहता है, ध्यान वहीं टिका रहता है। बाद में, सीखने के बाद इतनी सावधानी की जरूरत नहीं रहती।
    बाद में यह आदत में आ जाता है। फिर कुछ करना नहीं पड़ता, रहना पड़ता है।यदि बात ढंग से समझ में आ गयी और अमल में आने लग गयी तो जल्दी ही सब हो जाता है। चाहिए यही, अभ्यास बना रहे।
    हम चाहते भी हैं, करते भी हैं, पर स्थिरता प्राप्त नहीं होती है। और बातों में रस आता है। जो काम दस मिनट में होता है, यहां घंटो लगा देते हैं। व्यर्थ का कार्य और फालतू बातें करते है। फालतू कामों में अपने आपको लगाये रखते हैं, दिमाग में जितना फालतू बातों का जमघट होगा, स्थिरता उतनी ही दूर रहेगी। दिमाग पर  फालतू चीजों का जो बोझा डाला है, वह बाधा डालेगा ही....।
जो चल रहा है, वह तो चलता ही रहेगा।  इसीलिए जब तक शरीर है, तब तक संसार भी है। काम भी होगा, बदस्तूर होगा। नहीं कैसे रहेगा संसार। जो कहते हैं- संसार असार है, उनका कहना है, प्रतिक्षण यह भूत में जा रहा है, इसीलिए आप आज कितना भी करो, कल उसका क्या महत्व हो, कुछ पता नहीं। हजारो सालों की बात आज कितनी सही है, कोई दावे के साथ नहीं कह सकता, वह तो बदलती ही जायेगी।
    यहां जो कर्म होगा, इसमें किसी तरह के संस्कार नहीं बनेंगे ?
क्योंकि हर चीज आयेगी और कांच के सामने से निकल जायेगी। प्रवेश द्वार अन्दर होगा ही नहीं। स्मृति तक बन जाती है, जब वह अनदर पहुंच जाती है।   इधर से आये, उधर से गये। हमने देखा ही नहीं। अन्दर पहुंचेगा ही नहीं, बोलते समय देखा है, घड़ी से घंटे बज उठते है। घंटे बज रहे है। कानों ने भी सुना था, पर बातें करते समय कोई पूछे कब बजे, पता ही नहीं रहता। वह वहीं के वहीं रह गया।
वर्तमान में रहने का मतलब है जो देखें, सुनें, वह वहीं के वहीं से वापिस लौअ जाये। अन्दर नहीं पहुंचे।
अन्दर पहुंचते ही वे संस्कार बन जावेंगे। जो बातें सुनी, वहीं छोड़ जाओं।इसके बाद जब यह स्थिति निरन्तर बनी हुई हो, तब शरीर वही काम करता है, जो शरीर के द्वारा प्रकृति को कराना होता है। उसमें वह सुन भी लेता है। कर भी लेता है। तो उसको आगे का संस्कार नहीं बनता। अपने आप ही सब कार्य होते रहते है। प्रकृति आगे सब कार्य करवाती है।इससे शांति मिलती है ?पहले का कितना भी हो। नया नहीं बनना चाहिए। कितनी भी बड़ी पूंजी हो, अगर नया नहीं बनता है तो खतम होना चाहिए। स्वाभाविक बात है। सबसे जो मोटी बात है, इतने चक्कर में पड़ने के बजाय वर्तमान में रहो। अपना सब काम करते जाओं, जरा भी आगे पीछे मत घूमो।

शुरू में जो लोग इस बात को नहीं समझते हैं, उन्हें इस स्थिति में लाने के लिए  एकाग्रता का  अभ्यास करना चाहिए। अवलोकन करना उसके बाद का अभ्यास है। इस स्थिति में लाने के लिए यहां शुरू की क्रिया है, इससे जो स्थिति बनेगी, वह वर्तमान में रहने की अवस्था होती है। और अगर यह समझ गए हो तो यह सब शुरू से करने की जरूरत नहीं हैं। इसीलिए प्रारम्भ में कह गई परम्परागत साधनों का अपना महत्व है।बगर आगे का समझे जो कर रहे हो उसे छोड़ना उचित नही है। उसके साथ ही अवलोन का अभ्यास शुरु कर देना चाहिए।अवलाकन का अभ्यास बढ़ने के सयासथ नाद श्रवण शुरु हो जाता है। तब परम्परागत साधन अपने आप छूटने लग जाता है।
    यह बात सही है कि विचार तो अवलोकन करते ही ढेर से चले आते है। इतनी बातें, इतना कचरा, साधक घबड़ा जाता है।निरन्तर ध्यान रहने से वह क्रिया शिथिल होती जाती है। इस स्थिति में ढेर जो आता है, वह आना बन्द हो जायेगा। निरन्तर ध्यान रहेगा। शिथिल होते होते नाद सुनाई पड़ता है। यही वर्तमान में रहने की स्थिति है। वह जिन्हें यह समझने में नहीं आता है, उन्हें पहले यह कहा जाता है। नाद सुनते सुनते अपना कर्म चलता रहता है, यही वर्तमान में रहने की स्थिति है। तब चिन्तन इसका होता ही नहीं है।

जहां करने का ध्यान आया। वहीं हट गए, फिर संसार आया। फिर मन का सहारा लो। फिर मन से दूसरी वस्तु का सहारा लो।सि(ान्त तो बहुत छोटा है ?
उलझा रखा है लोगों ने। जांच कर देखते हैं, शास्त्र में यह लिखा है या नहीं। इसमें न तो वर मांगना है, न सहारा लेना है, न आशीर्वाद है, न गुरू है, न कोई अलौकिक खेल है, यहां बस शांति है। यह भी नहीं है, यह छोड़ो, यह करो, जो है जहां हैं, जिस स्थिति में हैं, ठीक है।


हमारा व्यवहार

आदतें और स्वभाव, उठने वाली वृत्ति को पहचान देते हैं, जिससे जीवन की पहचान मिलती है।
    संस्कारों में यह चीज तो बीज रूप में रहेगी ही। अच्छी मिठाई भी खाते आ रहे हैं। लेकिन मिठाई के प्रति हमारी रुचि नहीं है। परन्तु मिठाई खाते आ रहे हैं, इसलिए उसका भी संस्कार है, पर जिससे लहरें उठती है, संस्कारों में से वृत्तियां वासनाएं जागृत करने में वह समान रूप से संस्कारों के भण्डार से टकराती है।
    हमारी चाय पीने की आदत है।
    चाय और मिठाई सामने आयी तो चाय पीने की वृत्ति जल्दी जागृत होगी, परन्तु मिठाई की जागृत्ति होकर भी उतनी नही होगी। परिणाम यह होगा कि चाय के लिए हाथ पहले बढ़ेगा, मिठाई के लिए नहीं। वृत्ति अपना स्वरूप स्वयं उजागर कर देती है।
    इस प्रकार जितने भोग भोग चुके हैं, उनके संस्कार रुपी बीज अन्दर हैं। पर यह सामुदायिक लहर जो उठती है। प्रकृति की वह एक व्यक्ति की नहीं, मानव मात्र की होती है, टकराते ही अंदर हलचल मचती है।
    वृत्तियां उफान खाकर ऊपर आ जाती है।
    इन्दिरा गांधी की मृत्यु से लहर उठी है। कोई शंात रह गए... कोई विचलित हुए, कोई उफान खाऐंगे। लहर तो एक ही है। चारों तरफ से उठी है। कर्म एक ही हुआ है। परन्तु प्रतिक्रिया अलग-अलग। जो जितना निकट है, उसकी अनुभूति उतनी ही गहरी होगी।
    इसी तरह से यही संस्कार है। हमने जीवन मंे जो जो भोगा है, अनुभव किया है या जिन-जिन वस्तुओं के प्रति आकर्षण रहा है, वही संस्कार रूप में, बीज रूप में उपस्थित होता है। प्रकृति उसमें वृत्तियां जागृत करके इस शरीर और इन्द्रियो द्वारा करने को प्रेरित करती है।
केवल संस्कार:-केवल संस्कार:-
    मृत्यु के बाद संस्कार शेष रह जाता है। संस्कारों का भण्डार अन्तर्मन में रहता है। उसका ही एक हिस्सा इन्द्रियां और मन हैं। यही एक शरीर छोड़कर जाता है। जिस शरीर में वह जाता है, वहीं प्राण की गति प्रारम्भ हो जाती है। बीच में कुछ नहीं रहता है। बीज रूप में यही संस्कार रहता है।
    इस जीवन में अगर वर्तमान में रहने का अभ्यास किया तो अन्दर उसमें संस्कार नहीं बनते। संस्कारों के अनुकूल ही वह जहां जहां देख लेते हैं कि वासनाओं की पूर्ति होनी सहायक होती है, उस परिस्थिति में परिवार में जन्म हो जाता है।ये स्मृतियां जो है, संग्रह रूप में हमारे अन्दर है। वो हैं संस्कार ।क्या होता है, बैठे बैठे ही, अपने आप ही, अनायास ही उसमें वासनाएं उत्पन्न होती है, और क्यों होती है, कैसे होती हैं ? इसका कोई कारण नहीं। वह मनुष्य स्वयं नहीं करता, वह प्रकृति कराती है। मैं यह कहता हूं कि इस प्रकृति से हम इतने जुड़े हुए हैं कि कई हमारे अन्दर से आने वाले विचार अपने आप उठते है। उन संस्कारों के कारण यह प्रकृति उन संस्कारों को धक्का देती है, वहां धक्का मिलते ही वासना रूपी यह प्रवृतियां उठती है और वे इन्द्रियों में जाकर के विषयों के लिए प्रेरित कर देती है। उसी से मनुष्य सब कुछ करता है। यदि पूर्व संस्कार उसके अंदर नहीं होते, उसको ज्ञान नहीं होता तो वासनाएं उत्पन्न नहीं होती।मैं वही तो कहता हूं कि मनुष्य केवल स्मृतियां अपनी और उसे स्मृतियों के    आधार पर सुख दुख जितना भोगना है वही लेकर आता है। उतना ही भोगेगा हर हालत में। वह भोगने के लिए उसके पास स्वयं का साधन नहीं है, उसकी प्रकृति अपने आप जुटाएगी।
परन्तु जो भेागता है, और वह भोगना, इसलिए कि वह संस्कार और उसके अंदर वासनाएं शेष हैं, वह अपने भोग, वो सब पूरे करवाएगी। कुछ भी साधन नहीं होते हुए भी होगा।
  
मनुष्य जन्म के साथ क्या लाता है ? पूंजी के रूप में संस्कार और ब्याज के रूप में सुख दुख मिलता है। यहां मनुष्य को  इतना ही करना है कि यह जो उपरी मन है, इसकी गति को ठीक करके अन्तर्मन के द्वारा यह जानने का प्रयास करना है कि यहां हमें कैसा व्यवहार करना है कि जिसके द्वारा यह हमारी स्मृतियां और वासनाएं आगे न बढ़े। क्योंकि वे आगे बढ़ती जाएगी और वासनाएं इस प्रकार ही उठती रहेगी। तो कभी न कभी धोखा देगी। ये कभी नीचे ले जावेगी, कभी उपर ले जावेगी, यानी यह दुख बढ़ेगा। तो कभी न कभी ये धोखा देगी।
        मनुष्य के जीवन का साध्य सुख और शांति है, सुख और शांति एक दूसरे के विरोधी  है ?बिल्कुल नहीं है, सुख होेगा तभी तो शांति मिलेगी। दुख में मनुष्य को शाांति कैसे रह सकती है ?सुख तो इन्दिय जन्य है, भोगों की प्राप्ति से प्राप्त संतुष्टि है। और संतुष्टि से शांति मिलती है। यदि वासनाएं बार बार इस प्रकार की प्रबल हो जाती है और सुख के पीछे मनुष्य पड़ा ही रहता है, तभी धोखा है। इसलिए अन्तर्मन से संबंध जोड़ने के बाद, यानी अन्तर्मन से व्यवहार होेने के बाद, वह सुख तो भोगेगा, परन्तु सुख के पीछे लालायित होकर पीछे नहीं पड़ेगा। यानी यह जो वासनाएं काम क्रोध आदि हैं, इससे छुटकारा होगा। इससे छुटकारा होने से संस्कारों में जो वासनाएं उत्पन्न होतीहै, ये वासनाएं उत्पन्न होगेी। बु(ि उसकी हमेशा स्थिर रहेगी। और प्रकृति के द्वारा जो कार्य दिया गया है, केवल वही कार्य वो सुचारू रूप से करेगा।
    बस, इतना ही सार है, इससे आगे कुछ नहीं। कोई सेठ साहब का नौकर है। यदि वह नौकर, जो काम कहा उसी काम को लापरवाही से करे। तो वह कार्य करे प्रिय नही होता है। परन्तु वह नौकर, यदि साहूकार की इच्छा जान करके उसको जा चाहिए, उसे पहले ही तैयार करता रहे तो साहूकार को प्रिया होता है।
    प्रकृति का भी यही नियम है।
    प्रकृति क्या चाहती है, क्योंकि यह सब नाटक प्रकृति का ही है।क्योंकि हम भी उस प्रकृति द्वारा निर्मित उसके पुर्ज ही है।
    प्रकृति चाहती है कि हम कुछ करें।
    जबकि हम,हमारे पूर्व संस्करों के अनुसार जो वासनाएं उत्पन्न होती है, उसके पीछे दौड़ते हैं। उसे पूरे करने के लिए चाहते है। प्रकृति के विरोध में हमारा व्यवहार होता है।
    और यह विरोध इसलिए होता है कि हम अपने मन के अधीन हो करके, उसकी ही बात मानते हुए , वह कहता है- यह अच्छा है, वह अच्छा है, करते  रहते है।
    और जो प्रकृति चाहती है, वह नहीं होता है।
    याद रहे सुख और शांति एक दूसरे के विरोधी नहीं है ?प्रयत्न का अध्किार प्रकृति ने दिया है।भौतिक जीवन में प्रयत्न अधिकार है।लक्ष्य हमारा हमें शांति प्राप्त करनी है, तो सुख और दुख दोनो समान स्थिति में पहुंचने के लिए उस स्थिति में पहुंचना पड़ेगा। आगे अन्तर्मन तक जाना पड़ेगा। परन्तु अन्तर्मन में जाने से पहले यह वर्तमान मन को हमें समाप्त करना है, तो उसके प्रयास के लिये सुखी रहना जरूरी है। इस समय यदि हम दुखी हैं तो यह मन विचलित है।
    उस अवस्था में पहुंचने के बाद सुख और दुख दोनो समान हो जाते है।
    पहला कर्त्तवय यह होगा कि हमें सुखी जीवन जीना है, उसके द्वारा शांति प्राप्त होती है। शांति के बाद आनन्द की स्थिति है, वह अन्तर्मन के द्वारा प्राप्त होती है।
 आनन्द की स्थिति में सुख दुख दोनों ही समान होते है।शांति, आनन्द के पहले की स्टेज है।शांति की अवस्था में सुख दुख दोनो का अनुभव होता है, परन्तु शांति होती है। क्योंकि सुख वहां ज्यादा होता है, दुख कम हो जाता है। आनन्द इसके बाद की स्टेज है, दोनो का समान रूप हो जाना चाहिए।
    इसके लिए केवल चर्चा करने से कुछ नहीं होता है, वह तो इसके लिए स्थिर रहकर अन्तर्मन तक जाना होगा।
    साधना का सार ,यही है,    अन्तर्मन से अपना व्यवहार करो, यही सार है।
    साधना हेतु जो साधन बताया है,इसमें पहला है- आत्मनिरीक्षण का। चित्त सरोवर पर उठने वाली लहरों का गहरी सतर्कता, जागरूकता के साथ अवलोकन जिससे क्रमशः संकल्प निवृत्ति आ जाती है।
    और उसी के साथ बताया  है- नाद श्रवण, ये दो अलग अलग बातें नहीं हैं। ये एक ही है। यदि मन से ऊपर उठने वाली वृत्तियों पर ध्यान रखा तो इससे भी नाद सुनाई देगा, यदि नाद पर ध्यान दिया तो वृत्तियां अपने आप शांत हो जावेगी। बात एक ही है।
    परन्तु दो उसके अलग अलग तरीके है।
    इस रास्ते से जाओंगे तो उधर पहसे जाओगे तो इधर पहुंचोगे।
    तो मन की स्थिरता और यह नाद, दोनो एक ही स्थिति है। परन्तु इससे होना क्या चाहिए।
    कि स्थिर बु(ि होते हुए भी हमारे व्यवहारिक कार्य बदस्तूर चलते रहने चाहिए।
    यह बात जरा कठिन है।
    काम करने लगते हैं, मन हट जाता है।
    वह नहीं हटे, इसी के लिए उसी स्थिति मंे जैसा नाद सुनाई पड़े सुनते जाओ, सुनते जाओ।
    बीच में बाधा नहीं पड़े तो अनन्य चिंतन जैसी स्थिति हो जानी चाहिए।
    उसी स्थिति में आगे जाकर धीरे धीरे यह स्थिति आती है कि चौबीस घंटे वैसा ही मन स्थिर रहता है, और तमाम कार्य सुचारू चलते रहते है।
    तो इसी से वह माम अनुस्मर यु( च वाली स्थिति आ जाती है।
    यु( भी चलता रहता है। शारीरिक कार्य भी चलते रहते है।
    मन चिंतन में एक ही जगह अपने आप में स्थिर रह जाता है।
    इसी को भक्ति भी कह सकते है। ज्ञान भी, निष्काम कर्म योग भी कह सकते है। नाम अलग अलग हैं, स्थिति एक ही है।


जीवन जीने की कला

सांसारिक जीवन और धन की उपादेयता रहेगी।
 व्यवहार के लिए धन की जरूरत है। संग्रह भी करो। सब काम करते रहो। बस चिंतन समाप्त करो।

प्रारम्भिक अवस्था में वाणी पर निगाह आवश्यक है। इससे दूसरों की आलोचना  रुक जाती है। वाणी का संयम रखने में जिहृा का संयम भी है। कम बोलना और स्वाद पर मन का नहीं जाना- यही अभ्यास है। सब से अधिक फिसलने वाली चीज जिहृा है। बोलते ही मन अधिकांश आलोचना मंे चला जाता है। और मन वर्तमान को हर जाता है। यहां गड़बड़ होने से मन हर जाता है।
ब्रहृाचर्य  का आत्म साक्षात्कार  से कोई सम्बन्ध नहीं है।
वह जो समझ रहे थे, इसमें ऐसा होगा, वह लिखते रहे। बाद में  जो भी लिखते रहे। लेकिन भूखे मरो, यह भी कोई लाभ है। शरीर  इन्द्रियों पर आधारित है। सब इन्द्रियां सही काम करेगी, तभी शरीर चलेगा। ब्रहृाचर्य का पालन करो, खूब माल खाओ। रस तो बनेगा। फिर क्या होगा। नियम यही है। दुराचारी मत बनो। व्यभिचारी मत बनो। उचित है कि भोजन की मात्रा पर निगाह रहे। रसना पर स्वतः ही निगाह हो जावेगी।
शास्त्र कहता है ,उचित आहार।
गृहस्थ की ऊपर ही इन सन्यासियों का जीवन चलता है।वास्तविक साधक गृहस्थ ही है।
छोड़ना और छूटना:-
    मैने तो कभी नहीं कहा- यह छोड़ों, यह मत छोड़ो। क्योंकि मैं मानता नहीं हूं कि इससे व्यवधान पड़ेगा। हां, अगर वर्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ता गया तो इसकी स्मृति ही नहीं होगी। वह स्वयं तुम्हारा छूट जावेगा। यही अच्छा है।
वर्तमान में रहने का अभ्यास नहीं करना पड़ता?
जहां क्रिया शुरू करो, वह चक्कर में पड़ जायेगा। प्रकृति को जो चाहिए, वह कराती रहेगी। वह मालिक है। वह नाटक करा रही है। पात्र वही देती रहेगी। वर्तमान मे रहने के लिए बाह्य साधन की जरूरत नहीं है। किसी भी चीज की आसक्ति नहीं रहे।
परम्परागत साधनों की भी प्रारम्भ में जरूरत रहती है।  
यदि हम आज कहें कि कोई जरूरत नहीं है तो जो लोग पीछे रह गये हैं यही मान बैठे हैं, कितने लोग छोड़ बैठेंगे। उससे लाभ नहीं, अहित ही होगा। वे कुण्ठा में ही रहेंगे। जरूरत इस बात की है कि वह स्वयं आकर अनुभव करे कि जो हमने किया, उसकी जरूत नहीं थी। परन्तु यह सब नाटक इसी तरह चलेगा। ना, करते हुए भी लोेग करते रहेंगे, करके ही हट सकते हैं। कोई बहुत बड़ा मकान बनाना होता है तो , उसके लिए पेड़ा भी  बनाना पड़ता है, मकान बनाने के बाद पेड़ा  हटाना पड़ जाता है। मूर्ति पूजा, भक्ति का स्थान इसी तरह ही है।
विचार, उसकी क्रिया मस्तिष्क में प्रतीत होती है- इस विचार को नाभि में ले जाना  संभव है !इसीलिए तो यह क्रिया है कि विचार धीरे धीरे जैसा कि मन का स्वभाव है, जो कि विचित्र है, जैसे कि अपन किसी चीज को पकड़ने लगते हैं तो वह भाग जाता है। तो इसी तरह से वर्तमान में हरेक व्यक्ति का मस्तिष्क ही काम कर रहा है। वहीं से विचार उठते है। हम सोचते हैं कि दिमाग से सोच रहें है, परन्तु वहीं उसे विचारों को अवलोकन करना प्रारम्भ करते हैं, क्या हो जाता है कि जो विचार करने की जो वहां क्रिया चलती है, वो क्रिया को वो नीचे सरकता जाता है।
 वहां उसे पकड़ने की कितनी कोशिश करो, पकड़ में नहीं आता है, वह धीरे धीरे नीचे सरकता जाता है। जितना विचार रहित मन होता जायेगा उतना ही वह धीरे धीरे नीचे सरकते सरकते अन्त में जाकर नाभि में विलीन हो जायेगा। जब जाकर उस मन की ऊपरी सतह पर जो हमारा वर्तमान मन है, उसका प्रयास समाप्त हो जाता है।
    जो यह लहरें टकराने का सवाल है, वह अन्तर्मन से टकराती है। और यही से फिर वो ऊपर उठत उठते वापिस दिमाग में आ जाती है, और यहां आकर फिर क्रियाएं प्रारम्भ हो जाती है। तो फिर वह किस प्रकार नीचे खिसकता जाता है, इसका भी अनुभव हो जाता है।
करने सइसकी पहचाने होती है, जैसा मेरा अनुभव है, वह मैं कह सकता हूं, पर आपको अभ्यास करना होगा। साधन वही है। कोई अलग साधन नहीं है। रास्ता एक ही है। मेन रोड़ एक ही है। दूसरा रास्ता नही है। मेन रोड को पहुंचने वाले बाई पास से होंगे।
हां, बाह्य मन नीचे आते आते समाप्त हो जाता है, अन्तर्मन जो हमेशा जागृत रहता है, उसकी अनुभूति हो जाती है कि वहां प्रकृति किस प्रकार कार्य करती है। उसका ज्ञान हो जायेगा कि सूक्ष्म से सूक्ष्म दर्शन जो यन्त्र होता है, उसको बारीक से बारीक चीज नजर आती है। वहां जाकर सूक्ष्म से सूक्ष्म लहरें किस प्रकार कार्य करती है। इसकी अनुभूति होती है। इसी से भविष्य का आभास हो जाता है।
    जब यह अभ्यास प्रारम्भ हो जाता है तो वहीं से यह आभास होता है कि यह घटना होने वाली है तो अपने को देखना चाहिए कि प्रयोग करके सचमुच यह घटना होती है या नहीं। यदि होती है तो फिर अपना विश्वास दृढ हो जाता है, फिर और प्रयास करो, इस प्रकार प्रयास करो तो और भविष्य की धटनाएं पता हो जाएगी। इस प्रकार बढ़ते जाओ तो कई बातें आगे की पता हो सकती है।
    फिर यह स्थिति आती है कि आज से आगे साल, दो साल, पांच साल बाद की घटनाओं का आभास होने लग जाता है ? परन्तु फिर उनका प्रचारहुआ, कहने की आदत हो गई तो प्रकृति को मौका मिलेगा, टाँग पकड़कर नीचे फैंकने का। अतः कहना भी हो तो संकेत में, ताकि और कोई नहंी समझे।
हम इस मार्ग पर  चलकर आत्म विश्वास पा सकते हैं।
प्रयास नाम से शून्य हो, खाली पुस्तके पढ़ने तथा चर्चा करने से कुछ भी नहीं होगा। कुछ किया नहीं तो क्या होगा !कई बार कहा है- जबान पर जो नियमन चाहिए वह तो होता नही। दवाई भी खाते जाओ, परहेज भी नहीं करो। दैनिक जीवन में कितनी गड़बड़ करते हैं, पता नही। कभी सोचा है, पहले परहेज करो, तब दवा फायदा करेगी।
जो बातें गलत हाती है, जबान से होती है, जबान का मन का- गहरा संबंध है। जब तक जीभ पर काबू नहीं है, तब तक मन पर काबू पाना कठिन है।
    हम दिनभर जो बातें करते है, उसके बारे में सोचना चाहिए। हम जो वादे करते हैं, वो कितने पूरे करते हैं, सोचा है ?
    इससे संकल्प शक्ति कम होती है। ज्यादा बोलने से शक्ति क्षीण हो जाती है। अनावश्यक बोलना, ज्यादा बोलना, इसमें तारीफ भी दूसरे की करनी होती है, बुराई भी होती है, बुराई ज्यादा होती है, सच्ची कम, झूंठी ज्यादा होती है। इस प्रकार की जो बातें हैं, वे बाधक है। बाधाएं पहले हटानी चाहिए।
    प्रयास यही है, प्रयास करो।
    मैने जो बाते कही हैं, वे पहले जानने का प्रयास करो। जो बातें कही है, उन्हें गहराई से सोचो, तभी आगे जाकर कुछ हो सकेगा।


   

Thursday, January 28, 2010

हमारा व्यवहार

आदतें और स्वभाव, उठने वाली वृत्ति को पहचान देते हैं, जिससे जीवन की पहचान मिलती है।
    संस्कारों में यह चीज तो बीज रूप में रहेगी ही। अच्छी मिठाई भी खाते आ रहे हैं। लेकिन मिठाई के प्रति हमारी रुचि नहीं है। परन्तु मिठाई खाते आ रहे हैं, इसलिए उसका भी संस्कार है, पर जिससे लहरें उठती है, संस्कारों में से वृत्तियां वासनाएं जागृत करने में वह समान रूप से संस्कारों के भण्डार से टकराती है।
    हमारी चाय पीने की आदत है।
    चाय और मिठाई सामने आयी तो चाय पीने की वृत्ति जल्दी जागृत होगी, परन्तु मिठाई की जागृत्ति होकर भी उतनी नही होगी। परिणाम यह होगा कि चाय के लिए हाथ पहले बढ़ेगा, मिठाई के लिए नहीं। वृत्ति अपना स्वरूप स्वयं उजागर कर देती है।
    इस प्रकार जितने भोग भोग चुके हैं, उनके संस्कार रुपी बीज अन्दर हैं। पर यह सामुदायिक लहर जो उठती है। प्रकृति की वह एक व्यक्ति की नहीं, मानव मात्र की होती है, टकराते ही अंदर हलचल मचती है।
    वृत्तियां उफान खाकर ऊपर आ जाती है।
    इन्दिरा गांधी की मृत्यु से लहर उठी है। कोई शंात रह गए... कोई विचलित हुए, कोई उफान खाऐंगे। लहर तो एक ही है। चारों तरफ से उठी है। कर्म एक ही हुआ है। परन्तु प्रतिक्रिया अलग-अलग। जो जितना निकट है, उसकी अनुभूति उतनी ही गहरी होगी।
    इसी तरह से यही संस्कार है। हमने जीवन मंे जो जो भोगा है, अनुभव किया है या जिन-जिन वस्तुओं के प्रति आकर्षण रहा है, वही संस्कार रूप में, बीज रूप में उपस्थित होता है। प्रकृति उसमें वृत्तियां जागृत करके इस शरीर और इन्द्रियो द्वारा करने को प्रेरित करती है।
केवल संस्कार:-केवल संस्कार:-
    मृत्यु के बाद संस्कार शेष रह जाता है। संस्कारों का भण्डार अन्तर्मन में रहता है। उसका ही एक हिस्सा इन्द्रियां और मन हैं। यही एक शरीर छोड़कर जाता है। जिस शरीर में वह जाता है, वहीं प्राण की गति प्रारम्भ हो जाती है। बीच में कुछ नहीं रहता है। बीज रूप में यही संस्कार रहता है।
    इस जीवन में अगर वर्तमान में रहने का अभ्यास किया तो अन्दर उसमें संस्कार नहीं बनते। संस्कारों के अनुकूल ही वह जहां जहां देख लेते हैं कि वासनाओं की पूर्ति होनी सहायक होती है, उस परिस्थिति में परिवार में जन्म हो जाता है।ये स्मृतियां जो है, संग्रह रूप में हमारे अन्दर है। वो हैं संस्कार ।क्या होता है, बैठे बैठे ही, अपने आप ही, अनायास ही उसमें वासनाएं उत्पन्न होती है, और क्यों होती है, कैसे होती हैं ? इसका कोई कारण नहीं। वह मनुष्य स्वयं नहीं करता, वह प्रकृति कराती है। मैं यह कहता हूं कि इस प्रकृति से हम इतने जुड़े हुए हैं कि कई हमारे अन्दर से आने वाले विचार अपने आप उठते है। उन संस्कारों के कारण यह प्रकृति उन संस्कारों को धक्का देती है, वहां धक्का मिलते ही वासना रूपी यह प्रवृतियां उठती है और वे इन्द्रियों में जाकर के विषयों के लिए प्रेरित कर देती है। उसी से मनुष्य सब कुछ करता है। यदि पूर्व संस्कार उसके अंदर नहीं होते, उसको ज्ञान नहीं होता तो वासनाएं उत्पन्न नहीं होती।मैं वही तो कहता हूं कि मनुष्य केवल स्मृतियां अपनी और उसे स्मृतियों के    आधार पर सुख दुख जितना भोगना है वही लेकर आता है। उतना ही भोगेगा हर हालत में। वह भोगने के लिए उसके पास स्वयं का साधन नहीं है, उसकी प्रकृति अपने आप जुटाएगी।
परन्तु जो भेागता है, और वह भोगना, इसलिए कि वह संस्कार और उसके अंदर वासनाएं शेष हैं, वह अपने भोग, वो सब पूरे करवाएगी। कुछ भी साधन नहीं होते हुए भी होगा।
   
मनुष्य जन्म के साथ क्या लाता है ? पूंजी के रूप में संस्कार और ब्याज के रूप में सुख दुख मिलता है। यहां मनुष्य को  इतना ही करना है कि यह जो उपरी मन है, इसकी गति को ठीक करके अन्तर्मन के द्वारा यह जानने का प्रयास करना है कि यहां हमें कैसा व्यवहार करना है कि जिसके द्वारा यह हमारी स्मृतियां और वासनाएं आगे न बढ़े। क्योंकि वे आगे बढ़ती जाएगी और वासनाएं इस प्रकार ही उठती रहेगी। तो कभी न कभी धोखा देगी। ये कभी नीचे ले जावेगी, कभी उपर ले जावेगी, यानी यह दुख बढ़ेगा। तो कभी न कभी ये धोखा देगी।
        मनुष्य के जीवन का साध्य सुख और शांति है, सुख और शांति एक दूसरे के विरोधी  है ?बिल्कुल नहीं है, सुख होेगा तभी तो शांति मिलेगी। दुख में मनुष्य को शाांति कैसे रह सकती है ?सुख तो इन्दिय जन्य है, भोगों की प्राप्ति से प्राप्त संतुष्टि है। और संतुष्टि से शांति मिलती है। यदि वासनाएं बार बार इस प्रकार की प्रबल हो जाती है और सुख के पीछे मनुष्य पड़ा ही रहता है, तभी धोखा है। इसलिए अन्तर्मन से संबंध जोड़ने के बाद, यानी अन्तर्मन से व्यवहार होेने के बाद, वह सुख तो भोगेगा, परन्तु सुख के पीछे लालायित होकर पीछे नहीं पड़ेगा। यानी यह जो वासनाएं काम क्रोध आदि हैं, इससे छुटकारा होगा। इससे छुटकारा होने से संस्कारों में जो वासनाएं उत्पन्न होतीहै, ये वासनाएं उत्पन्न होगेी। बु(ि उसकी हमेशा स्थिर रहेगी। और प्रकृति के द्वारा जो कार्य दिया गया है, केवल वही कार्य वो सुचारू रूप से करेगा।
    बस, इतना ही सार है, इससे आगे कुछ नहीं। कोई सेठ साहब का नौकर है। यदि वह नौकर, जो काम कहा उसी काम को लापरवाही से करे। तो वह कार्य करे प्रिय नही होता है। परन्तु वह नौकर, यदि साहूकार की इच्छा जान करके उसको जा चाहिए, उसे पहले ही तैयार करता रहे तो साहूकार को प्रिया होता है।
    प्रकृति का भी यही नियम है।
    प्रकृति क्या चाहती है, क्योंकि यह सब नाटक प्रकृति का ही है।क्योंकि हम भी उस प्रकृति द्वारा निर्मित उसके पुर्ज ही है।
    प्रकृति चाहती है कि हम कुछ करें।
    जबकि हम,हमारे पूर्व संस्करों के अनुसार जो वासनाएं उत्पन्न होती है, उसके पीछे दौड़ते हैं। उसे पूरे करने के लिए चाहते है। प्रकृति के विरोध में हमारा व्यवहार होता है।
    और यह विरोध इसलिए होता है कि हम अपने मन के अधीन हो करके, उसकी ही बात मानते हुए , वह कहता है- यह अच्छा है, वह अच्छा है, करते  रहते है।
    और जो प्रकृति चाहती है, वह नहीं होता है।
    याद रहे सुख और शांति एक दूसरे के विरोधी नहीं है ?प्रयत्न का अध्किार प्रकृति ने दिया है।भौतिक जीवन में प्रयत्न अधिकार है।लक्ष्य हमारा हमें शांति प्राप्त करनी है, तो सुख और दुख दोनो समान स्थिति में पहुंचने के लिए उस स्थिति में पहुंचना पड़ेगा। आगे अन्तर्मन तक जाना पड़ेगा। परन्तु अन्तर्मन में जाने से पहले यह वर्तमान मन को हमें समाप्त करना है, तो उसके प्रयास के लिये सुखी रहना जरूरी है। इस समय यदि हम दुखी हैं तो यह मन विचलित है।
    उस अवस्था में पहुंचने के बाद सुख और दुख दोनो समान हो जाते है।
    पहला कत्र्तवय यह होगा कि हमें सुखी जीवन जीना है, उसके द्वारा शांति प्राप्त होती है। शांति के बाद आनन्द की स्थिति है, वह अन्तर्मन के द्वारा प्राप्त होती है।
 आनन्द की स्थिति में सुख दुख दोनों ही समान होते है।शांति, आनन्द के पहले की स्टेज है।शांति की अवस्था में सुख दुख दोनो का अनुभव होता है, परन्तु शांति होती है। क्योंकि सुख वहां ज्यादा होता है, दुख कम हो जाता है। आनन्द इसके बाद की स्टेज है, दोनो का समान रूप हो जाना चाहिए।
    इसके लिए केवल चर्चा करने से कुछ नहीं होता है, वह तो इसके लिए स्थिर रहकर अन्तर्मन तक जाना होगा।
    साधना का सार ,यही है,    अन्तर्मन से अपना व्यवहार करो, यही सार है।
    साधना हेतु जो साधन बताया है,इसमें पहला है- आत्मनिरीक्षण का। चित्त सरोवर पर उठने वाली लहरों का गहरी सतर्कता, जागरूकता के साथ अवलोकन जिससे क्रमशः संकल्प निवृत्ति आ जाती है।
    और उसी के साथ बताया  है- नाद श्रवण, ये दो अलग अलग बातें नहीं हैं। ये एक ही है। यदि मन से ऊपर उठने वाली वृत्तियों पर ध्यान रखा तो इससे भी नाद सुनाई देगा, यदि नाद पर ध्यान दिया तो वृत्तियां अपने आप शांत हो जावेगी। बात एक ही है।
    परन्तु दो उसके अलग अलग तरीके है।
    इस रास्ते से जाओंगे तो उधर पहसे जाओगे तो इधर पहुंचोगे।
    तो मन की स्थिरता और यह नाद, दोनो एक ही स्थिति है। परन्तु इससे होना क्या चाहिए।
    कि स्थिर बु(ि होते हुए भी हमारे व्यवहारिक कार्य बदस्तूर चलते रहने चाहिए।
    यह बात जरा कठिन है।
    काम करने लगते हैं, मन हट जाता है।
    वह नहीं हटे, इसी के लिए उसी स्थिति मंे जैसा नाद सुनाई पड़े सुनते जाओ, सुनते जाओ।
    बीच में बाधा नहीं पड़े तो अनन्य चिंतन जैसी स्थिति हो जानी चाहिए।
    उसी स्थिति में आगे जाकर धीरे धीरे यह स्थिति आती है कि चैबीस घंटे वैसा ही मन स्थिर रहता है, और तमाम कार्य सुचारू चलते रहते है।
    तो इसी से वह माम अनुस्मर यु( च वाली स्थिति आ जाती है।
    यु( भी चलता रहता है। शारीरिक कार्य भी चलते रहते है।
    मन चिंतन में एक ही जगह अपने आप में स्थिर रह जाता है।
    इसी को भक्ति भी कह सकते है। ज्ञान भी, निष्काम कर्म योग भी कह सकते है। नाम अलग अलग हैं, स्थिति एक ही है।
वर्तमान में रहना:
 वर्तमान में रहो, उत्तर स्चयं तुम्हारे पास आ जायेगा। पर व्यवहार में कैसे रहा जाए। और जीवन की सार्थकता को किस प्रकार पाया जाए, यह हमें समझना होगा
जो भी व्यक्ति तुम्हारे पास आता है, उसके प्रति किसी प्रकार की दुर्भावना मत रखो, कोई प्रतिब(ता नही। कोई पूर्वाग्रह नहीं। यही त्याग है। जो भी  दुराग्रह है, बनी बनायी धारणा है, उसको छोड़ देना ही त्याग है। वह बुराई उसमें नहीं है। तुम अपने भीतर की बुराई को उस पर प्रक्षेपित कर रहे हो। तुम अपने भीतर का गंदलापन उसके अन्तर्जगत पर फैक रहे हो। शांत हो जाओ। निश्छल मन से स्वागत करो। यही त्याग है।
    छोड़ना और छूटना यहां नहीं है। यही छूटना है। बाह्य में जो कुछ भी परिवर्तन होगा, वह अर्थहीन है। जब बल समाप्त होगा, फिरकनी फिर रुक जाएगी। उससे भीतर बदलाव नहीं आता। वह भीतर से नहीं जुड़ता। कुछ किया जाना हो, कुछ होना भी हो, तो वह भीतर से ही होगा।
    अतः जब भी कोई व्यक्ति सामने आए....परिस्थिति सामने आए उसके बारे में कभी पूर्व धारणा मत रखो। पूर्व में धारणा का आधार स्मृति है और स्मृति ही पाप है। बार बार विषयों के चिन्तन से वासना, स्मृति-रुप धारण कर लेती है। और फिर स्मृति जब भी किसी की उपस्थिति होती है, अवधारणा प्रस्तुत करती हे। हमारा सारा व्यवहार उसी धारणा के आधार पर होता है। यही जीवन की जटिलता है।
    हम अपने भीतर इतना कचरा समेटे हुए हैं कि वह चाहते हुए भी नहीं छूटता। हम वर्तमान में रहना ही नहीं जानते। चाहते भी नही हैं। हमारा सारा कार्य, व्यवहार स्मृति से परिचालित है। यही तनाव का कारण है। यही विक्षोभ का कारण है। व्यक्ति को हम, व्यक्ति रूप में नहीं, स्त्री हरिजन, मुसलमान महाजन, अफसर नाना रूपों में देखते हैं। हर रंग, रुप,व्यवसाय जाति के प्रति हमारे पास अपनी धारणाएं है। हम उन्हीं सांचो में उसे देखते हैं, रखते हैं, और खुद  समस्या खड़ी करते हैं।तुम्हारा काम अन्तर्मुखी होकर मन की निश्चलता को प्राप्त करना है, अन्तर्मन को जीवन का कार्य व्यवहार सौंप देना है। वर्तमान में जीना सीखो। स्वभाव स्मृति में हैं, आदत स्मृति में है, वर्तमान में रहने का अभ्यास होते ही स्वतः छूट जाएगी, पेड़ के पत्ते कब गिरते हैं, उसे अहसास भी नहीं होता, जिसे छूटना है, वह छूट जाएगा, कुछ पता भी नहीं चलेगा।
    क्रिया साक्षी-भाव है। जो व्यक्ति उपस्थित हुआ है। परमात्मा ने ही उसे तुम्हारे पास भेजा है। कल वह क्या था, कोई मतलब नही। कल उसने क्या किया था याद रखना व्यर्थ है। आज अभी जब वह आया है, साक्षी भाव से साक्षात्कार करो, तुम खुद पाओगे, वह तुम्हें बदला हुआ मिलेगा। वही तुम्हें वर्तमान में रहना सिखला पाएगा।
    यही त्याग है।
छोड़ना क्या है, यह लोग समझ नहीं पाते हैं। जब मैं कहता हूं, अन्तर्मुखी हो जाओ, वर्तमान में रहने का अभ्यास करों। जो छूटना है, स्वतः छूट जायेगा। बाहर छोड़ने पकड़ने के चक्कर में मत पड़ो।
    बाहर जो भी किया जा रहा है, हो रहा है- उसका भीतर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। कितने ही रंग के कपड़े पहन लो, घर छोड़कर जंगल में चले जाओ- माया तो भीतर है, वह कहां पीछा छोड़ेगी ? वह साथ ही तो चल रही है।श में रहे।
    प्रकृति की लहरें अनवरत उठ रही है। ये नाभि में उठती है। नाभि में विकारों के बीज है। वे बीज सूक्ष्म है। वहां मात्र स्पंदन है। वो धीरे धीरे उफनते जाते हैं, जैसे लहरें सभी के अन्दर उठ रही है, किसी को जल्दी उत्तेजित करती हैं, किसी को कम। यह व्यक्ति की बनावट, बुनावट पर निर्भर रहता है।
    जैसे कुछ लोग सो रहे है, कोई आकर आवाज देता है तो कोई एक आवाज पर, कोई दो आवाज पर, कोई चार आवाज पर उठ जाता है, और कोई होता है, उस पर असर ही नही होता- वह सोता रह जाता है। आवाज देने वाला एक ही होता है। संस्कार सूक्ष्म बीज रूप में है, लहरें टकरायी, टकराते टकराते कोई उफन जाता है, किसी पर कोई असर नही होता। यह उसी प्रकार से है कहीं बच्चों ! आवाज लगते ही उठ जाता है, कोई सोया रहता है। वासना जागृत ही नहीं होती।
    लहरें अनवरत उठ रही है धीरे धीरे यह अनुभव हो जाता है कि पकृति का कार्य यही है। हमें तो सहन करना है। सहन करने के लिए अपने स्थान पर स्थिर होकर रहना है।
    चेतन्य केन्द्र आत्मा है या यूं कहिए, वहां अवेयरनेस है वह है, उसका अनुभव हो जाता है उसके सबसे समीप अन्र्तमन ही है, मनोविज्ञान की भाषा में इसे अनकांशस कहा जा सकता है। यहा जानने का माध्यम कोई है नहीं, इन्द्रियों की पहुंच यहां तक नही है।यहा तक स्थूल शरीर की पहुंच नही रहती है। यह उसके परे की बात है, जानने का माध्यम नही है। अभ्यास यही करना है। नाभि से उठ रहे स्पंदनों को, जो चित्त पर आकर टकराते हैं तथा वहां स्थूलता ग्रहण करते हैं, वहीं वासनाएं जन्म लेती है। उस उफान को उस संवेग को, उस लहर को, उस तरंग को उस भाव दशा को गहरी जागरूकता के साथ, सतर्कता के साथ साक्षी भाव से अवलोकित करना है।इसी अन्तर्मन से स्पंदन आगे बढ़ते है, वे स्थूल शरीर से अभिव्यक्त होते है। नाभि से उठने वाले स्पंदन चित्त पर आकर टकरा कर स्थूलता ग्रहण करते है। यहां आकर भाव दशा शरीर के माध्यम से प्रकट होने लगती है। यहां आकर वासनाएं आकर ग्रहण करती है, स्पंदन तरंगों का रूप ग्रहण कर लेते हैं, वासनाएं विषयों के लिए लालायित रहती है, उन्हें पोषण मिल जाता है, अगर वर्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ जाता है तो वे ऊपर की ओर उठती जाती है, पर उन्हें फैलने के लिए जगह नहीं मिलती। व्यवहार अनुकरण से नहीं सीखी जाती। यदि हमारा क्रोधी स्वभाव है और उसकी हमें प्रतीती भी है, तो वर्तमान में रहने का अभ्यास होेने के बाद लहर जो उठी है, वह अनुभव होगी और लहर जिस प्रकार पत्थर पर टकरा कर वापिस लौट जाती है, वैसे ही मालूम होगा। टकराई व लौट गई, अन्तर्मुखी होेने के बाद वृत्तियां उठते हुए भी पनपती नही है। और धीरे धीरे बिल्कुल ही नहीं होती।
   
   
    इसीलिए वह बात गहराई से समझने की है कि हमें इस प्रक्रिया के प्रति जागृत होना है। जागरूकता की सबसे बड़ी यही जरूरत है। हम हजारों साल से शरीर के प्रति अत्यधिक सजग है। सारे शास्त्र यहीं आकर रूक गये हैं, जो आगे बढ़े वे भी काल भय से हमें छोड़ नहीं पाये। बु( जब बोले, तब तो शरीर से इतना लड़ चुके थे कि उनकी बात को भी स्वीकारते हुए जो उन्होंने करके छोड़ दिया था, वह भी उनके अनुयायी मानते गये। लोग कहते हैं कि मन, जो क्रिया तन्त्र है, वाक है, शरीर के इस पर नियंत्रण कर ले, और चित्त से उठने वाली तरंगों के प्रति असहयोग रखें तो साधना की ओर तेजी से बढ़ेंगे। यह सबसे बड़ा खतरा है।
    उपशमन, नियमन, नियंत्रण फिर उल्टी तरफ चलना है। शरीर के नियंत्रण व नियमन की जितनी चिन्ता होती है, शरीर उतना अधिक खतरनाक हो जाता है। वहीं जब क्रिया का स्वरूप स्पष्ट है तो मात्र साध्य अन्तर्मन से उठने वाली तरंगो के प्रति सहनशीलता को प्राप्त करना है। शरीर के नियंत्रण पर हजारों साल से जो बल दे रहे हैं, वह यह जानकर भी छोड़ने का साहस नहीं कर पा रहे है। मन से असहयोग लेना है मन का निष्क्रमण भूत और भविष्य में है। वर्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ते ही मन स्वतः अनुपस्थित हो जाता है। जससे वह स्वतः अनुपस्थित होने लग जाता है। यही पहली मंजिल है, न यहां  किसी प्रकार का दमन नहीं है। अभ्यास का  लक्ष्य है, मात्र साक्षी रहना। यही हमें जानना है, आगे गहरे समझना है। तभी साधना का रहस्य समझ में आता है। यही सार है। तभी लक्ष्य की प्राप्ति संभव है।   
रास्ता यही है

    स्मृति अनवरत चिन्तन से बनती है कोई व्यक्ति आया, बातचीत हुई। भूल गए उसको तो कोई बात नहीं। परन्तु यदि उसकी बार बार याद आती रहे, वह धीरे धीरे गहरी हो जाती है। वह संस्कार बन जाती है।
कांच के ऊपर तो जो वस्तु आई उसका प्रभाव नहीं रहता, परन्तु मन तो कांच नहीं है, वहां चित्र बनता है अंकित हो जाता है ?वह भी कब। उसका बार बार स्मरण रहे। किसी ने कोई बात कहंी और ध्यान नहीं दिया तो बात बाहर ही रह गई। वह जब याद दिलावे तो भी हल्की ही याद आती है। और कोई बात कही, ध्यान नहीं दिया तो वह भीतर चली गई।गिलास में पानी है, रंग डाल दो। कुछ हवा में उड़ जायेगा, कुछ सतह पर फैल जायेगा, कुछ नीचे जाकर बैठ जायेगा। इसी प्रकार हमारे ऊपर घटनाओं का प्रभाव पड़ता है, वह मन रूपी कांच पर इसी प्रकार असर डालती है।
    कोई तो आई और ऊपर से निकल गई। और कोई वहीं फैल गई। कोई नीचे जाकर फैल गइ्र्र। वही संस्कार बन जाती है। जो ऊपर उड़ गई, उसका पता ही नहीं। जो ऊपर सतह पर फैल गई, वह कुछ दिन ठहरी और चली गई। जो नीचे जाकर बैठ गई, वह संस्कार बन गई। वहीं से वासनाएं उत्पन्न होती है।
इसालिए
   
प्रारम्भिक अवस्था में वर्तमान में रहने के लिए मन पर उठने वाली वृत्यिों का अवलोकन आवश्यक है,
यह तो शुरू में कुछ दिन लगातार अवलोकन करने की जरूरत है। इससे आदत पड़ जाती है, विचार न उठने की। अवलोकन तो विचार उठने की स्थिति है। इससे क्या होता है, विचार धीरे धीरे उठना कम हो जाता है। उसके बाद की स्थिति जो है, वह हमेशा रहने की है। हमेशा अवलोकन नहीं होता। दिन में काम करते समय अवलोकन करते रहोगे तो काम करने में बाधा पड़ेगी।
    शुरू की अवस्था और बाद की अवस्था में अन्तर है। बच्चों की पढ़ाई शुरू करते समय पहले स्लेट पेन्सिल लेकर बैठाया जाता है।
    यही प्रारम्भिक स्थिति है।
    बाद में वह किताब देखते ही पढ़ने लग जाता है। यह बाद की स्थिति है। इस स्थिति में पहुंचने के लिए अवलोकन शुरू की स्थिति है।
    अवलोकन रहते रहते बाद में यह स्थिति आ जाती है कि विचार उठना बन्द हो जाता है।
    इस स्थिति में रहना है। यह स्थिति हमेशा रहेगी। अवलोकन हमेशा नहीं रहेगा।
    वैसे क्रिया के लिए श्रेष्ठ समय रात का है।
    साईकिल चलाते समय जब सीखा जाता है, तब ध्यान हैण्डिल पर रहता है, ध्यान वहीं टिका रहता है। बाद में, सीखने के बाद इतनी सावधानी की जरूरत नहीं रहती।
    बाद में यह आदत में आ जाता है। फिर कुछ करना नहीं पड़ता, रहना पड़ता है।यदि बात ढंग से समझ में आ गयी और अमल में आने लग गयी तो जल्दी ही सब हो जाता है। चाहिए यही, अभ्यास बना रहे।
    हम चाहते भी हैं, करते भी हैं, पर स्थिरता प्राप्त नहीं होती है। और बातों में रस आता है। जो काम दस मिनट में होता है, यहां घंटो लगा देते हैं। व्यर्थ का कार्य और फालतू बातें करते है। फालतू कामों में अपने आपको लगाये रखते हैं, दिमाग में जितना फालतू बातों का जमघट होगा, स्थिरता उतनी ही दूर रहेगी। दिमाग पर  फालतू चीजों का जो बोझा डाला है, वह बाधा डालेगा ही....।
जो चल रहा है, वह तो चलता ही रहेगा।  इसीलिए जब तक शरीर है, तब तक संसार भी है। काम भी होगा, बदस्तूर होगा। नहीं कैसे रहेगा संसार। जो कहते हैं- संसार असार है, उनका कहना है, प्रतिक्षण यह भूत में जा रहा है, इसीलिए आप आज कितना भी करो, कल उसका क्या महत्व हो, कुछ पता नहीं। हजारो सालों की बात आज कितनी सही है, कोई दावे के साथ नहीं कह सकता, वह तो बदलती ही जायेगी।
    यहां जो कर्म होगा, इसमें किसी तरह के संस्कार नहीं बनेंगे ?
क्योंकि हर चीज आयेगी और कांच के सामने से निकल जायेगी। प्रवेश द्वार अन्दर होगा ही नहीं। स्मृति तक बन जाती है, जब वह अनदर पहुंच जाती है।   इधर से आये, उधर से गये। हमने देखा ही नहीं। अन्दर पहुंचेगा ही नहीं, बोलते समय देखा है, घड़ी से घंटे बज उठते है। घंटे बज रहे है। कानों ने भी सुना था, पर बातें करते समय कोई पूछे कब बजे, पता ही नहीं रहता। वह वहीं के वहीं रह गया।
वर्तमान में रहने का मतलब है जो देखें, सुनें, वह वहीं के वहीं से वापिस लौअ जाये। अन्दर नहीं पहुंचे।
अन्दर पहुंचते ही वे संस्कार बन जावेंगे। जो बातें सुनी, वहीं छोड़ जाओं।इसके बाद जब यह स्थिति निरन्तर बनी हुई हो, तब शरीर वही काम करता है, जो शरीर के द्वारा प्रकृति को कराना होता है। उसमें वह सुन भी लेता है। कर भी लेता है। तो उसको आगे का संस्कार नहीं बनता। अपने आप ही सब कार्य होते रहते है। प्रकृति आगे सब कार्य करवाती है।इससे शांति मिलती है ?पहले का कितना भी हो। नया नहीं बनना चाहिए। कितनी भी बड़ी पूंजी हो, अगर नया नहीं बनता है तो खतम होना चाहिए। स्वाभाविक बात है। सबसे जो मोटी बात है, इतने चक्कर में पड़ने के बजाय वर्तमान में रहो। अपना सब काम करते जाओं, जरा भी आगे पीछे मत घूमो।

शुरू में जो लोग इस बात को नहीं समझते हैं, उन्हें इस स्थिति में लाने के लिए  एकाग्रता का  अभ्यास करना चाहिए। अवलोकन करना उसके बाद का अभ्यास है। इस स्थिति में लाने के लिए यहां शुरू की क्रिया है, इससे जो स्थिति बनेगी, वह वर्तमान में रहने की अवस्था होती है। और अगर यह समझ गए हो तो यह सब शुरू से करने की जरूरत नहीं हैं। इसीलिए प्रारम्भ में कह गई परम्परागत साधनों का अपना महत्व है।बगर आगे का समझे जो कर रहे हो उसे छोड़ना उचित नही है। उसके साथ ही अवलोन का अभ्यास शुरु कर देना चाहिए।अवलाकन का अभ्यास बढ़ने के सयासथ नाद श्रवण शुरु हो जाता है। तब परम्परागत साधन अपने आप छूटने लग जाता है।
    यह बात सही है कि विचार तो अवलोकन करते ही ढेर से चले आते है। इतनी बातें, इतना कचरा, साधक घबड़ा जाता है।निरन्तर ध्यान रहने से वह क्रिया शिथिल होती जाती है। इस स्थिति में ढेर जो आता है, वह आना बन्द हो जायेगा। निरन्तर ध्यान रहेगा। शिथिल होते होते नाद सुनाई पड़ता है। यही वर्तमान में रहने की स्थिति है। वह जिन्हें यह समझने में नहीं आता है, उन्हें पहले यह कहा जाता है। नाद सुनते सुनते अपना कर्म चलता रहता है, यही वर्तमान में रहने की स्थिति है। तब चिन्तन इसका होता ही नहीं है।

जहां करने का ध्यान आया। वहीं हट गए, फिर संसार आया। फिर मन का सहारा लो। फिर मन से दूसरी वस्तु का सहारा लो।सि(ान्त तो बहुत छोटा है ?
उलझा रखा है लोगों ने। जांच कर देखते हैं, शास्त्र में यह लिखा है या नहीं। इसमें न तो वर मांगना है, न सहारा लेना है, न आशीर्वाद है, न गुरू है, न कोई अलौकिक खेल है, यहां बस शांति है। यह भी नहीं है, यह छोड़ो, यह करो, जो है जहां हैं, जिस स्थिति में हैं, ठीक है।